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गुरुवार, 25 जून 2026

ऐ इंसां, ज़रा पागल होना भी सीख ले!

मैं जाग ही रहा था, लेकिन फोन मुझे जगाने के लिए आया था। थोड़ी देर बाद मैं मार्निंग वॉक के लिए निकल पड़ा। सड़क पर पहुँचते ही मैंने फोन करके उनको बताया कि मैं सड़क पर आ गया हूँ। 

उधर से मुस्कुराहट में पगी आवाज सुनाई पड़ी, 'देखो, मैंने तुम्हें सड़क पर ला दिया।' 

मैंने उस चौड़ी, शानदार सड़क पर दूर तक निगाह दौड़ाई और मुस्कुराते हुए कहा, सड़क पर आना कोई बुरी बात नहीं। सड़क तो वह रास्ता है, जो आदमी को उसकी मंजिल तक पहुँचाती है।” 

मेरी इस बात के साथ ही दोनों ओर हल्की-सी हँसी बिखर गई और बातचीत समाप्त हो गई। तब-तक फोन करने वाले शख्स सड़क के किनारे खड़े हमारा इंतजार करते दिखाई पड़ ग‌ए थे। वहां से हम दोनों साथ-साथ सड़क पर चल पड़े।

तभी उनकी बैडमिंटन टीम के एक साथी खिलाड़ी मोटरसाइकिल से पीछे से आ पहुँचे। वे उनके साथ बैठना तो चाह रहे थे, पर संकोच कर रहे थे। मैंने ही उन्हें थोड़ा सा धक्का दिया कि बैठ जाइए। शायद उन्हें यह शंका थी कि कहीं मैं रास्ते से ही वापस न मुड़ जाऊँ, इसलिए मोटरसाइकिल पर बैठते हुए वे हँसकर बोले, ‘देखिए, आपको स्टेडियम तक आना है, लौटना नहीं है।’ खैर…

वैसे मेरे वे साथी स्टेडियम में पहुंचते हैं तो पहले नीम के एक पेड़ को गले लगाते हैं, उसके तने को छूते हैं। अभी कल वाली सुबह उन्होंने मुझसे भी ऐसा ही करने के लिए कहा था। मैं स्टेडियम में पहुँचा तो वे शायद इन्डोर बैडमिंटन कोर्ट में जा चुके थे। इधर मैं भी स्टेडियम के टहलने वाले ट्रैक की ओर चला गया। उस पर दो चक्कर लगाकर मैं वापस हो लिया।

मैं लौट रहा था। तभी एक व्यक्ति के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी। ध्यान से देखा तो यह आवाज मेरे आगे-आगे चल रहे एक पागल की थी। उसका यूँ बेवजह अजीब-सी आवाज में चिल्लाना, उसकी पागलों वाली अवस्था की अभिव्यक्ति थी। 

फिर अचानक एक जगह उसे झुकते देख, मैंने सोचा शायद वह कोई ढेला उठाने के लिए झुका हो। लेकिन उसने वहाँ पड़ी एक मैली-कुचैली तौलिया उठा ली। उसे पास के मील-पत्थर पर बड़े करीने से रख दिया और उसके ऊपर एक छोटा सा पत्थर भी रख दिया। 

मैंने सोचा, शायद तौलिया के ऊपर पत्थर उसने इसलिए रखा होगा कि हवा से वह न उड़ जाए। यह सब करने के बाद वह पूरी तरह निर्लिप्त भाव से वहां से आगे बढ़ गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे चल रहा था। तभी मैंने गौर किया कि वह चलते-चलते बीच-बीच में झुक जाता और सड़क पर पड़ी कोई न कोई चीज उठा लेता, कभी कोई ऐसा कंकड़, जो किसी के पैरों में गड़ सकता था, तो कभी कूड़े जैसी चीज। फिर वह उसे सड़क से दूर फेंक देता।

उस पागल के इन कृत्यों को देखकर मैंने सोचा, मानो सड़क पर चलते हुए वह अनजाने में ही राह को दूसरों के लिए थोड़ा और सुगम बनाता जा रहा हो।

आज लिखने का मन नहीं था, लेकिन उस "पागल" की वजह से लिखने बैठ गया, बस आज इतना ही।

#चलते_चलते

 ऐ इंसां, तू किस गुमान में है! ज़रा पागल होना भी सीख ले।

#सुबहचर्या

 (४.९.१९)

बुधवार, 17 जून 2026

संतोष का कारण

आज चार-पचास पर फोन की घंटी बजी। उधर से आई परिचित आवाज ने पांच-पंद्रह पर निकल लेने के लिए कहा और मुस्कुराने की भी ताकीद कर दी। मैं मुस्कुराया, जो हंसी में भी बदल गई। इस मुस्कुराहट से मन जैसे ताजा हो उठा।
बाहर आया। दूर कहीं बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ रही थी। आसमान में बादल छाए थे, पर उनके यहां बरसने की संभावना नहीं दिखाई पड़ी। लगा, ये दूर कहीं बरस रहे होंगे।
हम और वे परिचित, दोनों साथ चले। स्टेडियम की ओर लगभग छह-सात सौ मीटर आए होंगे कि पीछे एक बोलेरो गाड़ी आकर रुकी। बोलेरो सवार, जो दोनों के परिचित भी थे, हम लोगों से बोलेरो में बैठने का आग्रह किया। 
मेरे साथी फुर्ती दिखाते हुए उसमें सवार हो गए। लेकिन मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “आप लोग बैडमिंटन-कोर्ट में पसीना बहाने वाले हैं। मुझे तो बस टहलना होता है। टहलते-टहलते मैं स्टेडियम पहुँच रहा हूँ।”
खैर, थोड़ी दूर चलने पर उबड़-खाबड़ खड़ंजे वाला वह रास्ता दिखाई पड़ा, जो स्टेडियम की ओर जाता है। पर न जाने क्यों मेरे कदम उस ओर नहीं मुड़े। आगे बढ़ गया।
“सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है..” मोबाइल में यह गीत बजा, मैं समझ गया कि सात बज ग‌ए। यह गाना मुझे बचपन से ही प्रिय है, मुझे स्मृतियों में लौटा ले जाता है। आजकल इसे एलार्म बनाया है।
लेकिन भाई मेरे, इस गीत में छिपी नसीहत से मेरा कोई लेना-देना नहीं! ऑफिसों में दिनभर खुशी के लिए हमें सच के साथ फाइलों, टिप्पणियों, स्पष्टीकरणों में शब्दों की बाजीगरी करनी पड़ती है। फिर मूँछों पर ताव देकर वहाँ से बाहर ऐसे निकलते हैं, मानो सच को शीशे पर उतार दिया हो, कि सबको वही दिखाई दे।
यह लिखते-लिखते बाहर बारिश शुरू हो गई है। गिरती बूंदों की आवाज कानों में पड़ रही है।
तो, आज की अपनी टहलाई पर बात। सड़क पर सीधे चलते-चलते मैं स्वयं द्वारा निर्धारित उस बिंदु पर पहुँचा, जहाँ से लौटना होता है। वहाँ से लौट पड़ा। इस आने-जाने में कुल तीन किलोमीटर की टहलाई हो जाती है। 
खैर, वापसी में, कंधों की एक्सरसाइज भी करते हुए चल रहा था। इसी दौरान पीछे से आवाज आई थी, "साहब, कंधे में दर्द होथै का?" 
मुड़कर देखा, एक मजदूरनुमा व्यक्ति, अपनी साइकिल की रफ्तार धीमी किए हुए मुझसे यही पूछ रहा था। 
उसकी ओर देखते हुए मैंने कहा, "हाँ दरद होथ‌अ, थोड़ा हम कहे कि इह‌उ क‌इ लेई.." 
वह मजदूर बोला, "अरे, साहब, हम‌ई सबका त‌‌अ, ई मौक‌ई नाहीं मिलत।" 
उसका आशय सुबह टहलने के मौके से था। जो उसे नहीं मिलता।
मैंने कहा, "अरे! तोहका क‌उन टहलै के जरूरत बा! तू सब वैसेई दिनभर एतना मेहनत क‌इ लेथ‌अ कि.." 
उसने अब साइकिल की रफ्तार मेरे पैदल चलने के बराबर कर लिया। शायद उसकी इच्छा मुझसे बात करने की थी। 
मुझसे बोला, "साहब, बीस-पच्चीस बिगहा धान बाटइ, उही क राति भर रखाव‌ई क पड़थै, नाहीं त‌अ ससुरन जानवरन क मारा कुछ बचबै न करै.. लेकिन इहूँ में ऊ सारे मरकहवे तो बहुत परेशान कर‌अथै।" 
उसकी इस समस्या से मैंने भी सहमति जताया।
फिर उसने मेरे काम के बारे में पूछा। मैंने उसे गोलमोल जवाब देकर बताया कि किसी आफिस में काम करता हूँ। 
उसने पूछा, "साहब आप कहां के है।" 
जौनपुर बताकर मैंने उससे पूछा, "अउर‌ऊ कुछ कर‌अथ‌अ कि खेतिन भरि?" 
उसकी बात, "नाहीं साहब छह-सात भैसि‌य‌उ पाले ह‌ई..आठ-दस लीटर दूध सेंटर (मिल्क कलेक्शन सेंटर) पर भेज देईथ अउर सांझ वाला दूध लड़िकन के पिय‌ई-खाई के बदे रहथ‌अ।" 
फिर इसमें जोड़ते हुए कहा,, "साहब, सात-आठ टाली गोबर क खादि‌उ होइ जाथ‌अ..एक टाली दुई हजार क बिक‌अथ‌अ..पंद्रह-सोलह हजार क‌अ एक तूरे में।" 
उसकी बात सुनते ही मेरे मुँह से निकल पड़ा, "अच्छा..!" 
गोबर की यह खाद वह अपने भी खेतों में डालता हैै। खेतों में यूरिया खाद नाममात्र डालता है।
खेत में गोबर की खाद डालने से इस सूखे के समय में भी उसकी धान की फसल अभी ठीक है। उसने कुछ ऐसा ही बताया।
 फिर मुझसे पूछा, "तो साहब आप बिहार के अह‌ईं..?" 
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे नाहीं आर..ई जौन‌ऊपुर तोहरेनि उत्तर‌ई प्रदेश में पड़‌अथ‌अ।"
"अच्छा साहब" कहते हुए बाईं ओर इशारा करके उसने कहा, “साहब ई, ज‌ऊन फूल खिला बा न, सफेद फूल चढ़ाव‌इ के लिए ई दस रूपिया में एक्खी बिकाथै।" 
उन खिली कुमुदिनियों को देखकर मैंने कहा, "लेकिन यार अब ई, यहं न खिले, देखत नाहीं बाट‌अ, ई नदियव‌ऊ में घेरि के बाउंड्री खड़ी क‌इ लिहेंन सब, कुछ दिन में अब इहां मकान बनि जाए।"
"हां.. ई बात तो है साहब।" वह बोला।
मैंने उसके गाँव का नाम पूछा। उसने सिरसिया बताया । जो यहाँ से बीस किलोमीटर दूर है। 
मैंने थोड़ा चौंकते हुए पूछा, "तो यहां कैसे?"
उसके कहे अनुसार, वह बहन के यहां गया था। वहीं से लौट रहा था। 
सामने जिला अस्पताल दिखाई पड़ा, उसने वहाँ कुछ काम बताया और उसकी ओर मुड़ गया।
उसके मुड़ते ही, मुझे पिछले दिन सिरसिया में एक गौशाला देखने की बात याद आई। 
खैर, वह मजदूरनुमा या किसाननुमा या दोनों, जो भी था, मैंने उसकी बातों के भीतर छिपे उसके संतोष का अनुभव किया।
बाहर से अभी भी बारिश हो रही थी।
#चलते_चलते
मैं उस किसान के बारे में सोचने लगा। उसके भीतर एक अनजानी-सी खुशी थी। शायद वह स्वयं भी उसके कारण से अनजान था।
#सुबहचर्या
  (३१.८.१९)

शनिवार, 13 जून 2026

तबियत से पत्थर उछालने वाले की तबियत

मुझे बड़ी परेशानी की अनुभूति हो रही थी... दरअसल, एक डब्बेनुमा बॉक्स के भीतर गोल फ्रेम में जड़ा दर्पण जैसा कुछ फिट था। जो अपनी जगह से निकल गया था.. मुझे उसे फिर से उसी स्थान पर लगाना था। इस प्रयास में कफी समय बीत चुका था। 
तभी मैंने ध्यान से देखा,
बॉक्स के भीतर दो तरफ स्टैंड निकले थे। यह फ्रेम उन्हीं स्टैंडों पर पेंचों से कसा हुआ था… पेंच निकले तो फ्रेम भी निकल लिया! उन पेंचों को मैं खोजने लगा। देखा! एक पेंच तो बिस्तर पर ही मिल गया! अब दूसरे पेंच की ढूँढ़ाई शुरू हुई। यह पेंच उस डिब्बेनुमा बाक्स के भीतर ही गिरा था! मैंने फ्रेम को डिब्बे के भीतर के स्टैंड पर फिर से कसना चाहा कि तभी मोबाइल की धीमी-सी रिंगटोन सुनाई पड़ी..
मोबाइल टटोला। मिलते ही उसे कान पर लगा लिया… 
उधर से आवाज आई, "डी डी ओ साहब बोल रहे हैं?" 
"जी हां, डीडीओ ही बोल रहा हूँ।" मैं बोला था। 
दूसरी ओर से हल्के-फुल्के अंदाज में बोला गया, 
"अरे, मैंने कहा कि सुबह की ठंडी हवा से कंधे का दर्द और बढ़ जाएगा.. मैं डीडीओ साहब से कहुंगा कि वहीं कमरे की गर्म हवा में टहलने से दर्द ठीक हो जाएगा।"  
मैं भी नहीं चूका, बोल दिया, "नहीं, डीडीओ तो चाहते हैं कि बाहर की ठंडी हवा में दर्द को थोड़ा और बढ़ाया जाए।" 
उधर से फिर हँसी के स्वर में बोला गया, "तो फिर, हमारी भी इच्छा है कि हम पांच-दस पर निकल लें।" 
मैंने तत्काल यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
जैसे ही कॉल कटी, समय देखा। सुबह के चार बजकर पचास मिनट हो रहे थे। हां, शुक्ला जी ने मुझे जगाने के लिए यह फोन किया था। तब मैं गहरी नींद में था। 
इस बातचीत के बाद मैं थोड़ी देर तक यूँ ही बिस्तर पर पड़ा रहा। फिर पांच बजकर पंद्रह मिनट पर बाहर निकला। 
मैंने शुक्ला जी से अपनी गाढ़ी निद्रा का जिक्र किया और रात में देखे गए स्वप्न की पूरी कहानी कह सुनाया। इसे सुनकर वे मुस्कुराते हुए बोले, "तो मैंने आपको पेंच नहीं कसने दिया!" 
अब मैं सोचने लगा, अगर उस वक्त उनका फोन न भी आया होता, तो भी मैं वह पेंच नहीं कस पाता। आखिर, निद्रावस्था में देखे गए स्वप्न कहाँ पूरे हो पाते हैं! ऐसे स्वप्न तो अधूरे ही रह जाते हैं!! खैर।
टहलकर आया। कपड़ा धोया। फिर चाय बनाई। चाय पीते हुए अखबार के संपादकीय पर निगाह पड़ी।
विगत तीन वर्षों में गंगा जल के साफ होने का उद्धरण देकर बताया गया था कि वास्तव में सरकारी संकल्प ने बड़ा काम करके दिखाया है, जबकि वही आधिकारी और वही प्रयोगशालाएं हैं जो पहले भी थीं।
अब मुझे अपनी रोडवेज बस-यात्रा का स्मरण हुआ। 
मेरे पीछे वाली सीट पर तीन लोग बैठे थे। शायद ये प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक रहें हों। वे स्कूल में शिक्षकों की उपस्थिति को लेकर सरकार की सख्ती पर चर्चारत थे। एक कह रहा था कि अब तो स्कूल, टाइम से पहुँचना पड़ रहा है।
इस पर दूसरे ने कहा, “आखिर कब तक? फिर सब वैसे ही चलने लगेगा।”
पहला व्यक्ति फिर बोला, "कोई नहीं सुनेगा तो सरकार अब जबरिया रिटायर भी करेगी।" 
तभी तीसरा कह उठा, "अरे, रिटायर करके तो देखें, ये यूनियन वाले किस काम के हैं?" 
यह बातचीत सुनकर मैंने सोचा, कोई यहां क्या-क्या सुधारे? आदमी को सुधारे या सिस्टम! दोनों नहीं सुधरने वाले।
इसी बीच कंडक्टर आ गया। वह टिकट बना रहा था। उसे वर्दी में देख उस पहले व्यक्ति ने पूँछा, "भाई यह वर्दी कब से पहनने लगे?"  
कंडक्टर बोला, "अब सरकार इसपर सख्ती कर रही है, इसलिए पहनना पड़ रहा है।" 
मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने भी कंडक्टर से पूछ लिया, क्या अब सभी कंडक्टर वर्दी पहनने लगे हैं? 
कंडक्टर ने कहा, "हाँ सभी।" 
कंडक्टर की बात सुनते ही मैंने गर्दन घुमाकर पीछे बैठे उन व्यक्तियों से कहा, 
"देखा ! सरकारें चाह लें, तो कुछ भी हो सकता है।" 
दूसरा व्यक्ति निरूत्तर-सा हो गया था। मेरे मन में आया कि अब उसे ‘तबियत से पत्थर उछालने’ वाली बात भी कह दूँ। पर अगले ही पल मैं यह सोचकर चुप्पी साध गया कि उसकी बात में भी तो दम कि “आखिर कब तक? ..” क्योंकि जो आज पत्थर को तबियत से उछाल रहा है, हो सकता है कल उसकी ही तबियत न बिगड़ जाए! और फिर किसी डर या भय से हम कब तक सुधरे रहेंगे?
मेरा यह चुप रह जाना ठीक ही था।
हो सकता है ये सारी बातें निरर्थक हों!
#चलते_चलते
     मुस्कुराइए कि निरर्थक बातें करके थोड़ी देर के लिए ही सही, हमारी तबियत सुधर जाती है, क्यों है न?
#सुबहचर्या
(२९.८.१९)

गुरुवार, 11 जून 2026

परसेप्शन बनाएं लेकिन…

आज टहलने नहीं गया। बीती रात, सोने के पहले ही तय कर लिया था कि सुबह टहलने नहीं जाना। इसके बजाय कंधे की कुछ एक्सरसाइज कर लेंगे। जिसमें सिंकाई भी शामिल है। इन सब में लगभग एक घंटा खर्च होता है। खैर।
 
रात दस बजे के आसपास, दूसरे कमरे में मोबाईल को चार्जिंग पर लगा दिया था कि जब भी नींद टूटेगी इसे चार्जिंग से हटा लेंगे। दूसरे मोबाइल को बिस्तर के कोने में रख लिया था कि अलसुबह शुक्ला जी का फ़ोन आएगा तो उनसे कह देंगे कि आज टहलने नहीं जाना है। दरअसल वे टहलने के लिए रोज ही जगाते हैं। फिर हम साथ-साथ स्टेडियम निकलते हैं, खैर। 

सुबह हुई शुक्ला जी का फ़ोन नहीं आया और इधर मैं भी इत्मीनान से उठा। कंधे के व्यायाम आदि से निवृत्त होकर चाय बनाया। चाय पीते समय फोन चेक करना चाहा। लेकिन मोबाइल स्विच‌ऑफ था। याद आ गया, रात में ही इसकी भी बैटरी खतरे के लेबल पर थी। रात भर में यह भी डिस्चार्ज हो गया। 

अब मुझे ध्यान हुआ कि हो सकता है सुबह शुक्ला जी का फोन आया हो। मैं दूसरे कमरे में गया। चार्जिंग पर लगे मोबाइल को चेक किया। उसमें दो मिसकाल थे। शुक्ला जी ने ये कॉल पांच बजे के आसपास किए थे। 

चाय सुड़कते हुए मैं अखबार पर भी निगाह फेर रहा था। इसी समय घड़ी में देखा, सात बजकर पांच मिनट हो चुके थे। हम लोग स्टेडियम से लौटकर इसी समय आवास पर पहुंचते हैं। मैंने शुक्ला जी को, उनका हालचाल जानने के लिए फोन लगाया, यही पूँछना था कि स्टेडियम से लौटे कि नहीं। इसके साथ ही फोन न उठाने की सजा के तौर पर उनके कुछ व्यंग्यवाण भी सुनने की मेरी इच्छा थी।

उधर से भी वही व्यंग्यात्मक लहजे में उनकी आवाज सुनाई पड़ी, 'सारी..सारी...अब हम आपको डिस्टर्ब नहीं किया करेंगे..।" और अपनी इस बात के साथ मोबाइल स्विच‌आफ कर लेने का तोहमत भी मुझपर जड़ दिया। 

मैं समझ गया। क्योंकि अकसर मैं आलसपन में अलसुबह स्टेडियम जाने से ना-नुकुर करता हूँ। शायद इस बात से ही उन्होंने अनुमान लगाया हो कि जानबूझकर मैंने मोबाइल बंद कर लिया था। उन्हें जो सफाई देना था मैंने दिया भी। 

फिर बातों-बातों में वे बोले कि “आप चिंतन-मनन करते हो इस पर कुछ लिखिए।” बातचीत यहीं पर समाप्त हो गई। 

सोचा, 'क्या कुछ लिखें? इधर क‌ई दिन से सुबहचर्या पर भी कुछ नहीं लिखा है। बात तो, सुबह की टहलाई पर जाने से ही निकलती है, टहलने बाहर निकला ही नहीं, तो क्या लिखें ?' 

फिर ये बातें दिमाग में कौंधीं। इसे ही सुबहचर्या का हिस्सा मान लिया। इस चेतावनी के साथ कि यह कहानी है और इस कहानी के पात्र, स्थान, घटना आदि से साम्यता स्थापित होने की स्थिति में उसे संयोग मात्र माना जाए। 

लेकिन चलिए मान लेते हैं, अनंत ब्रह्माण्ड में अनंत पृथ्वियों की भी संभावना हो सकती है और हो सकता है इन्हीं अनंत पृथ्वियों में से किसी एक पृथ्वी पर यह कहानी घट भी रही हो!! 

और... मुस्कुराइए कि हो सकता है आप भी यह कहानी पढ़ रहें हों..

#चलते_चलते

किसी भी विषय के प्रति हमारा 'परसेप्शन' बहुत सावधानी पूर्वक बनना चाहिए।
 
#सुबहचर्या
 (२७.८.१९)

भारत को तो बख्श दीजिए!

आज आठ अगस्त दो हजार उन्नीस है। सुबह पौने पाँच बजे ही शुक्ला जी ने फोन करके जगा दिया। बोले, कि  साढ़े पांच बजे तक आ जाइए, स्टेडियम चल दिया जाएगा। हालांकि अभी नींद की खुमारी दूर नहीं हुई थी। थोड़ी सुस्ती भी छाई थी। सोचा, चाय पीकर चलें। चाय बनाया। चाय पीने के बाद अचानक मन हुआ कि ज़रा छत पर चलकर भोर होती बेला को निहार लें। 

साढ़े पांच बज रहे होंगे जब मैं आवास की छत पर आया। इस भोर की एक तस्वीर भी ली। तस्वीर लेते समय मुझे कामायनी की यह पंक्ति याद आई,

'दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात'   

स्टेडियम पहुंचते ही शुक्ला जी इनडोर बैडमिंटन कोर्ट की ओर चले गए और मैं खुले ग्राउंड की ओर। दौड़ते हुए इस मैदान का मैंने दो चक्कर लगाया। और फिर सामान्य चाल से एक चक्कर और पूरा किया। ग्राउंड का एक चक्कर लगभग पांच सौ कदम का है। 

बालीबाल टीम के सदस्य दृष्टिगोचर हुए। तो उनके ग्राउंड की ओर चला गया। चूंकि मैं बालीबाल खेलना सीख ही रहा हूँ, इसलिए कौन कैसे बाल हैंडल करता है, ध्यान से देखता हूँ। आज भी ध्यान इसी पर था। 

उन्हें मैं मझा खिलाड़ी समझता था, लेकिन साथी खिलाड़ी को बॉल पास करने में उनसे चूक हो गई। वह गलत दिशा में चली गई। मुझे लगा बॉल को नहीं छूना चाहिए था। लेकिन फिर मन में कौंधा कि यदि बाल को हैंडल करने में कोई गलती हुई है तो उससे सीख ही मिलेगा।

स्टेडियम से लौटते समय शुक्ला जी साथ थे। उन्होंने कहा, "जो विजेता होता है, वही इतिहास लिखता है और विजेता वही होता है जो लड़ता है।" उनकी यह बात सही लगी। 

कश्मीर से धारा 370 हटाने पर विवाद और संघर्ष की आशंका थी। लेकिन यह भी एक प्रयास है, समस्या से लड़ने का।

एक बात अनुभव से भी सीखता आया हूँ, सही मन से लिए गए निर्णयों के परिणाम अच्छे होते हैं। यहाँ हार में भी जीत होती है। 

लोग कश्मीर पर दिल जीतने का तर्क देते हैं। लेकिन हँसी आती है इसपर। क्या दिल जीतना इतना आसान है? वैसे 'राज्य' के सारे कानून दिल जीतने के लिए ही तो हैं फिर भी दिल हैं कि मानता नहीं और समस्या ज्यों की त्यों!

भाई मेरे! राज्य अपने नागरिकों का दिल जीतने वाला कानून तो बनाता ही है लेकिन दूसरी ओर उसे ऐसे कानून भी गढ़ने होते हैं जो स्वयं राज्य को भी संरक्षित करे। इसलिए इन बातों पर ज्यादा हाय-तौबा मचाने और बौद्धिक विश्लेषण की जरूरत नहीं।

मैं देख रहा हूं, धारा 370 हटाए जाने की व्याख्या तमाम नजरिए से हो रही है। जैसे, राष्ट्रवादी, संम्प्रदायवादी, वामपंथी, बुद्धिवादी, संविधानवादी और राजनीतिक; सबकी अपनी-अपनी व्याख्या।

लेकिन सबसे अधिक घातक साम्प्रदायवादी व्याख्या है। ऐसा करने वालों को मैं "नान-स्टेट-ऐक्टर" मान सकता हूँ। ये राज्य की अवधारणा को फालो नहीं करते। यह उर्वर जमींन में ज़हर बोने जैसी व्याख्या है।

खैर यह तो हमारे संविधान की खुबसूरती है कि यहाँ ज़हर बोने की भी स्वतंन्त्रता है!  

रही बात कुछ साहित्यकार टाइप के बुद्धिजीवियों की, तो उनकी बात ही निराली है। 

प्रकाशकों की कृपा से साहित्यकार बने इन बेचारों को, बस बात को घुमाफिरा कहने की कला भर आती है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। दिल्ली में बैठकर साहित्य नहीं रचा जा सकता। ये अपनी बातों में जबर्दस्ती का साहित्य ठूँसते हैं। जनसरोकार के नाम पर जन से कटे हुए लोग हैं ये।

जहाँ तक ‘लोकतंत्र विरोधी’ जैसी राजनीतिक व्याख्या की बात है, तो उन्हें भी समझना चाहिए कि सत्ता को ताकत भी लोकतंत्र से ही मिलती है।

एक बात और, संविधानवादी व्याख्या की बात है, तो संसद की बात माननी ही पड़ेगी, बाकी सर्वोच्च न्यायालय है ही इस बात की व्याख्या करने के लिए।

अंत में एक बात, प्रकृति ने ही भारत की सीमा को निर्धारित किया था। शायद यही कारण रहा होगा कि इसके एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक हजारों वर्षों से निर्बाध आवागमन चला। अगर ऐसा न होता तो अफगानिस्तान में बामियान न होता, या फिर एक ही संस्कृति के प्रमाण न मिलते। 

भाई मेरे, यह भारतभूमि यूरोपियन देशों की तरह किसी राजनीतिक एकता का परिणाम नहीं, एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण का परिणाम था, और आप इसकी तुलना सोवियत या यूरोपियन यूनियन के देशों से करते हो!! 

कामरेड, इसे समझिए, आप जैसे लोग धर्म को धर्म नहीं, किसी खास राजनीतिक विचारधारा को ही धर्म मानते हो, या फिर धर्म को संम्प्रदाय बना देते हो, अन्यथा धर्म के नाम पर देश का विभाजन न हुआ होता। 

अब तो भारत को बख्श दीजिए और इसे तोड़ने वाले प्राविधानों को ही तोड़िए! 

मित्रों, इस सुबहचर्या को मैंने थोड़ी तल्खी में लिख डाला है, क्षमा करें।

#चलते_चलते

       किसी चीज के लिए किया गया हमारा सद्प्रयास ही अपने आप में विजय के समान होता है।

#सुबहचर्या

(८.८.१९)

बुधवार, 10 जून 2026

अरे साहब, आपने इन्हें..!

घड़ी में अभी सात भी नहीं बजे थे। दसेक मिनट बाकी था सात बजने में। यूँ ही घर के अंदर-बाहर चहलकदमी करने लगा। 

दरअसल आज नींद पांच-बीस पर खुल गई। मोबाइल देखा।  शुक्ला जी का एक मिसकाल था। पाँच उन्नीस पर आया था यह काल। उन्हें फोन मिलाया। उनींदी-सी आवाज में वे बोल रहे थे कि तैयार हो लीजिए। 

खैर रात में तीन-चार बार नींद खुली थी। कारण कि मेरे कंधे का दर्द मुझे बेचैन किए था। यह दर्द चार-पांच महीने से है। तो ठीक से सो न पाने के कारण मन में आलसपन भी था। बिस्तर छोड़ते ही चाय पीने का मन हुआ। चाय बनाने चला गया। 

चाय बनी। चाय पीते हुए व्हाट्स‌अप पर मित्रों के गुडमॉर्निंग संदेश देखने लगा। इधर यहाँ श्रावस्ती में दो-तीन महीने से नेटवर्क की जबर्दस्त प्रॉब्लम है। पता नहीं क्यों? न संदेश खुल रहे थे और न भेज पा रहा था। बात केवल गोल-गोल घूमकर ट्राई अगेन पर रुक जाती। दिन में सिंग्नल मिलता भी है तो सुबह की "सुप्रभात" दोपहर बाद कहने में संकोच होता है। खैर चाय पीते हुए मैंने फटाफट good morning वाला संदेश छोड़ दिया कि नेटवर्क आते ही यह चला जाए।

चाय और गुड मॉर्निंग से निवृत्त हु‌आ तो शुक्ला जी के यहां चल पड़ा। लेकिन वे स्टेडियम के लिए निकल ग‌ए थे। मैं भी खरामा-खरामा उसी ओर चल पड़ा। 

स्टेडियम के मोड़ पर पहुँचा तो कल की सुबहचर्या पर भाई यशवंत सिंह जी की टिप्पणी याद आ गई। उनकी टिप्पणी थी, "बुढ़ौती में खेल मत खेला।" हालांकि इसी पर भाई रनवीर सिंह चौहान जी ने भी शायराना अंदाज में टिप्पणी किया था कि "दाढ़ी की सफ़ेदी पे न जाओ/सालों की बटोरी हुई चाँदी है वो।" ये दोनों टिप्पणियां जैसे एक-दूसरे को संतुलित कर रहीं हों, सोचकर मुस्कुरा उठा।

लौटते समय एक खच्चर जैसा घोड़ा सड़क के किनारे गिरा पड़ा था। उसके शरीर एक-दो कौवे बैठे उस पर चोंच मारते दिखाई पड़े। वहां किसी वाहन के शीशे के छोटे-छोटे टुकड़े भी बिखरे पड़े थे। इस घोड़े को रात में जरूर किसी वाहन ने टक्कर मारा होगा। एक दूसरा खच्चर उस मृत खच्चर के पास खड़ा था। उसकी आंखों से आंसू बहता प्रतीत हुआ। मैं भी उस खच्चर के दुख से दुखी-सा हो उठा। मुझे लगा दुख या कष्ट प्राकृतिक है किस प्राणी को नहीं होता? चाहे वह मनुष्य हो या फिर जानवर, संवेदना की अनुभूति तो सभी को होती है।

जब मैं घर के अंदर-बाहर चहल-कदमी कर रहा था, तो निगाह बड़े होते उस पाकड़ के पेड़ पर पड़ी, जिसे काटने के लिए मैं क‌ई बार मंगलेश्वर से कह चुका था। एक बार तो वह कुल्हाड़ी भी लाया था, लेकिन फिर उसे वापस लेकर चला गया। 

असल में वह उसे काटना नहीं चाहता था, यही नहीं घर की दीवारों के एकदम किनारे बड़े होते पीपल के पौधों को काटने से उसने यह कहकर मना कर दिया था कि किसी अन्य संम्प्रदाय के व्यक्ति को बुलवाकर इन्हें हटवा देंगे।

इस बीच ये पौधे बड़े हो चुके थे,  इनसे दीवारों को नुक़सान पहुंचने का डर हो आया था। यही नहीं, उन पौधों के बीच सांप वगैरह के छिपने का भी डर था।  

आज मैंने स्वयं इन पौधों को वहां से हटाया। मंगलेश्वर महोदय अभी जब सुबह आए तो आश्चर्य से पूंछा,

 'अरे साहब, आपने इन्हें..!" 

मैंने उसे समझाया - “इनसे दीवारों को नुकसान होता और फिर उसकी झाड़ में कोई सांप-वांप भी तो छिप सकता था, वैसे भी अपने रहने के आसपास की जगह को साफ-सुथरा तो रखना ही चाहिए।” 

वाकई! कितनी चिंता रहती है हमें एक कण से लेकर पेड़ पौधे और सभी प्राणियों तक की!!

हाँ, टहलकर लौटते समय अखबार देने वाला बच्चा मिल गया था, आज अखबार की वैन देर से आई थी। बच्चे ने रास्ते में ही मुझे अखबार पकड़ा दिया था।

अखबार के पन्नों पर छपी खबरें पढ़ने लगा, अगर मीडिया या अखबार न होते तो क्या होता? 

लेकिन राज्य हो या यह मीडिया, सबको देर से जागने की आदत हो चली है। मतलब तब तक घटनाएं घटकर खबर बन चुकी होतीं हैं।

आज यह सब लिखने का मन नहीं था। लेकिन सुबह की टहलाई के बाद लौटा तो मन भीतर तक निश्चल और शांत हो चुका था। सुबह जो भी देखा सुना उसे लेकर मन के भाव, व्यक्त होने के लिए भीतर ही भीतर कुलांचें मार रहा था। सो लिखना पड़ा।

#चलते_चलते

देर से जागने पर केवल लकीर पीटना भर रह जाता है। 

#सुबहचर्या

   (२.८.१९)

यूँ ही में अच्छा लगना

सुबह उठे तो मन ने यूँ ही टहलने न जाने का इरादा जता दिया। पीछे वाला दरवाजा खोलकर पूरब दिशा की ओर निहारा‌। मखमली-से बाल सूरज के दर्शन हुए। लेकिन मैं इनके इस भोले रूप के भुलावे में नहीं आया। जानता था, अभी दो-चार घंटे बाद यही अपने उग्र स्वरूप में दिखाई पड़ेंगे। उस आने वाली तीखी तपन की कल्पना भर से इनके इस बाल रूप की भृकुटी मुझे टेढ़ी नजर आने लगी। अभी से मुझे गर्मी का एहसास होने लगा।

मैं बाहर आया। पौधों पर निगाह गई। पत्तियों पर धूल-गुबार की परत जमी हुई थी। इससे इन पौधों का दम घुटता नजर आया। मैं कमरे से झाड़ू लेकर आया। इन पौधों के आस-पास सफाई किया। फिर बाथरूम में गया। नल की टोंटी खोली। बाल्टी भर गई, तो उसे लेकर फिर इन पौधों के पास आया। उस पानी से इन्हें नहलाया। धूल हटते ही पत्तियाँ चमक उठी, जैसे पौधे खिलखिलाकर मुस्कुरा उठे हों। 

अब कमरे की ओर लौटा। देखा, कमरों के फर्श पर भी धूल की महीन-सी परत जमी थी। तीन-चार बाल्टी पानी कमरों में फैलाया। फिर वायपर से उसे खींचकर बाहर कर दिया। 

घर के आसपास यदि थोड़ी नमी बनी रहे तो मुझे अच्छा लगता है। वैसे भी हमारा देश धूल-धक्कड़ और गर्मी-सूखे से प्रभावित भू-भाग माना जाता है। शायद बाबर ने अपनी किताब बाबरनामा में इसका ज़िक्र किया है।  

खैर, यह सब करके मैंने मन के इरादे को ही चकमा दे दिया था, “बच्चू! मत ले चलो मुझे टहलाने, मैंने भी यूँ ही में काम भर का एक्सरसाइज तो कर ही लिया।

इसके बाद चाय बनानी शुरू की। आज दूध कुछ गड़बड़-सा लगा। फटा तो नहीं था, फ्रिज में ही रखा था और रात भर बिजली भी रही थी। दूध सीधे फ्रिज से ही निकाला था। लेकिन उसमें चिकनाई कुछ जियादा ही प्रतीत हो रही थी। 

चाय पीते हुए देखा, गिलास की सतह पर कुछ महीन कण जैसे जमा हो गए थे। मन में आशंका उठी, कहीं दूध मिलावटी या बनावटी तो नहीं? यह सोचकर दूधिए पर मन ही मन गुस्सा भी हुआ। फिर मन को यह कहकर शांत किया कि कल उससे इस बारे में जरूर पूछूँगा। आखिर पूरी चाय भी नहीं पी पाया। गिलास वैसे ही रख दिया। 

इधर आज ईद है। सोशल मीडिया पर इस पर कोई बढ़िया सा शुभकामनाओं वाला संदेश खोजा। इसे फेसबुक के  टाइमलाइन पर पोस्ट कर दिया। सोशल मीडिया से ही पता चला कि आज विश्व पर्यावरण दिवस भी है। इसपर शुभकामना संदेश देने की इच्छा ही नहीं हु‌ई। क्योंकि सोशल मीडिया पर दिए संदेश से धरती हरी-भरी नहीं होने वाली!

ठीक इसी समय दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज हुई। दरवाज़ा खोलकर देखा, दो नन्हें-मुन्नें-से बच्चे अपने नन्हें हाथ में दूध का डिब्बा लिए खड़े थे। उन्हें घूरते हुए मैंने दूध का डिब्बा ले लिया। भगोने में उड़ेला। दूध ठीक दिखाई पड़ा। बच्चों को खाली डिब्बा लौटाते हुए सोचा, दूध के लिए इन्हें क्या बोलें! ये बच्चे क्या समझेंगे। 

दूध को लेकर बच्चों से कुछ नहीं कहा बल्कि उनसे इतना भर पूंछा, "तुम्हारे यहां भैंस दूध देती है?" 

इस प्रश्न पर बच्चे ने सहमति में सिर हिलाया कि  भैंस है वह दूध देती है। बच्चे झूँठ नहीं बोलेंगे। तो दूध बनावटी या नकली नहीं रहा होगा‌। मैंने निष्कर्ष निकाला। लेकिन साथ में यह भी मन में आया कि इस जमाने में "आदमी के लालच का कोउनऊ भरोसा नाहीं!" 

एक बच्चे ने मुझसे अखबार मांगा। असल में बच्चे जब भी दूध लेकर आते हैं तो मुझसे पुराना अखबार जरूर मांगते हैं। एक दिन मैंने इनसे पूंछा था कि "अखबार का क्या करोगे?" "किताबों पर जिल्द चढ़ाएंगे।" उनकी उस बात से मुझे भी अपना बचपन याद आ गया था। मैंने बच्चों को अखबार दिया और वे चले गए।

उनके जाने के बाद मैं कमरे में आ गया। बिस्तर पर नजर गई। चादर और तकिए के खोल कुछ मैले-से दिखाई पड़े। उन्हें समेटकर बाथरूम में ले आया। बाल्टी में सर्फ घोला और चादर तकिए के खोल उसमें भिगो दिए।उन्हें बाल्टी में डाल दिया। 

इतने में मंगलेश्वर भी आ गए थे। जो मेरा खाना बनाते हैं। लेकिन मैं चुपचाप चादर और तकिए के खोल धोता रहा। फिर उन्हें सूखने के लिए धूप में फैलाने बाहर आया। यह देखते ही मंगलेश्वर बोले, 

अरे साहब, आप क्यों धोए? मैं धो देता..!" 

मैंने जैसे अपनी सफाई देते हुए कहा, 

“नहीं यार, इसी बहाने थोड़ी मेहनत भी हो जाती है।” 

वह चुप हो गया और हमारे हाथ से कपड़े लेकर रस्सी पर फैलाने लगा। खैर..

#चलते_चलते    

कभी-कभी मन, अपने अरयें ही मस्त-सा हो उठता है! फिर उसी मन:स्थति में जो भी हम करते या सोचते हैं, हमें अच्छा लगता है। मतलब छोटी-छोटी बातें भीतर एक संतुष्टि और अपनापन भर जाती हैं।

#सुबहचर्या

   5.6.19 

    विनय     

सोमवार, 8 जून 2026

खैर, हम ऐसे ही हैं!

कहते हैं, लक्ष्य बड़ा है तो उसे पाने के लिए छोटी-छोटी बातों को नज़र‌अंदाज कर देना चाहिए। क्योंकि तुच्छ बातों में उलझ जाना आदमी को बड़े लक्ष्य से भटका देता है। 

सत्ता-प्राप्ति सबसे बड़ा सार्वकालिक राजनीतिक लक्ष्य रहा है। उसके लिए विकास, कानून का राज, संविधान, जनकल्याण और विचारधाराएँ, ये सब आवश्यक पड़ाव भर हैं। सत्ता को ऐसे पड़ाव से वैधता एवं स्वीकार्यता प्राप्त होती है। लेकिन यह विडंबना है कि सत्ता की राजनीति, सत्ता की प्राप्ति और इसके संरक्षण के लिए इन पड़ावों का इस्तेमाल करने लगती है। 

हमारे यहां का सिस्टम कभी भी 'आ‌‌ॅटो-मोड' में काम करता प्रतीत नहीं होता। इसे चलाने के लिए राजनीतिक शक्ति चाहिए, जिसकी अपनी कार्यशैली और नियंत्रण-पद्धति होती है। इसीलिए इसके बरक्स ही चीजें सत्तावादी चरित्र में ढल जाती हैं।

ईमानदारी या पारदर्शिता को ही देखिए। सत्तावादी व्यवस्था इसके साथ खेलते हैं। इन मूल्यों को अपने ढाँचे में ढाल लेते हैं। वहाँ ईमानदारी और पारदर्शिता का कोई स्वतंत्र नैतिक अर्थ नहीं बचता; वे केवल सत्ता वैध और मजबूत दिखाने के औजार बनकर रह जाती हैं। अन्यथा ये मूल्य सत्ता-शक्ति को नाकाबिले बरदाश्त होती है। 

मैंने कहा न, कि यह देश ‘ऑटो-मोड’ में नहीं चलता। सत्ता के जोर से चलता है और वह भी बंदूक की नली से नहीं, खजाने के प्रवाह से संचालित होती है। इसीलिए ‘सत्ता-नीति’ में ईमानदारी और पारदर्शिता की स्थिति बहुत विचित्र है, वे सत्ता के लिए ‘वाह’ भी हैं, और ‘आह’ भी! 

सत्ता का चरित्र ही ऐसा है कि वह धीरे-धीरे अपनी 'मान्यताओं का सिस्टम' गढ़ लेता है। उस सिस्टम में न तो कोई गुंडा होता है, न माफिया; न कोई ईमानदार होता है न बेईमान!

वहाँ व्यक्ति और मूल्य अपने मूल अर्थों में नहीं, बल्कि इनका प्रयोग सत्ता के सोपान के रूप में किया जाता है।

यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि हमारे सत्तावादी चरित्र में, ईमानदारी-फीमानदारी, पारदर्शिता-सार्दर्शिता, नियम-फियम, कानून-फानून और यहाँ तक कि संविधान-फंविधान, ये सब ढकोसले हैं। ये वहीं तक काम करते हैं, जहां तक सत्ता के उपयोग और उसकी आवश्यकता के अनुसार परिभाषित हों।

खैर, इन बातों के तस्दीक के लिए किसी को कुछ भी नहीं करना है, केवल इस सिस्टम की प्रत्येक चमकती हुई चीज का, मने व्यक्ति, संस्था, नीति और स्वयं सिस्टम का चीरफाड़ करके देख ले! उसमें बेहद लिजलिजा, पिलपिला और पीब जैसा पदार्थ नजर आएगा! फिर भी सत्तावादी लोग बेहद गुमान में जीते हैं!!

वाकई, हम ऐसे ही हैं।

शनिवार, 6 जून 2026

दरिया से लौटती नेकी


उस दिन मैंने कोई नेकी नहीं की थी 

बस इतना हुआ था कि 

किसी बड़े शो में, 

बड़े लोगों के बीच पहुँचकर 

इतराने की बजाय 

किसी की नेकी में शामिल हो गया था

शायद वही मेरी नेकी थी।


तभी किसी पुराने जमाने की कही बात  

याद आ गई -

“नेकी कर, दरिया में डाल।” 


मैं अपनी नेकी पर दयावान हो उठा।

सोचा, 

बेचारी को दरिया ही पसंद होगा।

इसीलिए नेकी को कंधे पर लादे

उदास मन से 

मैं दरिया की तलाश में निकल पड़ा।


शायद उस जमाने में 

नेकी कोई अजूबा नहीं रही होगी, 

कोई ऐसी चीज नहीं

जिसे दिखाकर इतराया जाए।


तभी तो, 

उसे दरिया में बहा देने का चलन रहा होगा! 


लेकिन अब

कोई ऐसी दरिया नहीं 

जिसके झिलमिल, कल-कल पानी में 

मेरी नहीं, नेकी ही सही, 

यह कह सके -

“देखो, मैं अब भी जिंदा हूँ!


मैंने दरिया को देखा, 

अब समझ गया - 

इसके काले पड़ चुके जलों में 

नेकी का दम घुट जाएगा, 

वह मर जाएगी।


फिर कौन मानेगा 

कि दुनियां में 

कभी नेकी जैसी कोई चीज भी थी।


मैं लौट पड़ा

उसे फिर अपने कंधे पर लादे।

मगर अब 

उसके बोझ से

मेरे कंधे दुखने लगे थे।


तभी नेकी तडफड़ाई, 

और मुझपर दया करके बोली,

तू क्यों दबता है 

मेरे बोझ तले?

ले चल मुझे 

सोशल मीडिया पर डाल दे।

वहाँ लोग देखेंगे मुझे! 


शायद कोई कह उठे,

इस चमकीली, भड़कीली दुनियाँ में 

नेकी अब भी 

किसी कोने में दुबकी मिल जाती है‌।”

           - विनय 

काठियावाड़ का खारा पानी

आज पाँच बजे ही आँख खुल गई। सोमनाथ से निकलना था। कुछ देर तक यूं ही चहल-कदमी करता रहा। फिर नहाने का विचार आया, लेकिन यहाँ यह भी कठिन काम लगा। दरअसल पानी इतना खारा था कि जैसे सीधे समुद्र का पानी हो! मैंने होटल वाले से पूँछा भी था, *क्या सीधे समुद्र का पानी सप्लाई करते हो?” वह हँसकर बोला था, “नहीं, बोरिंग का पानी है।” 

गुजराती भोजन में मीठे का प्रयोग होता है। साथ में छाछ भी होता है? मैं इसपर सोचने लगा कि ऐसा क्यों? मुझे लगता है पूरे काठियावाड़ के भोजन में एक अलग तरह का स्वाद संतुलन दिखाई देता है। यहाँ दाल-सब्जियों में हलकी मिठास, साथ में छाए, और क‌ई व्यंजनों में दूध-घी या खोए का प्रयोग सामान्य बात है। यह पहले तो मुझे थोड़ा अजीब लगा लेकिन फिर मुझे भी ऐसे भोजन का स्वाद अच्छा लगने लगा। दरअसल इसके पीछे केवल स्वाद नहीं, बल्कि वहां की जलवायु और जीवन स्थितियों का बड़ा हाथ है। 

काठियावाड़ क्षेत्र में पानी स्वभावत: कुछ खारा या क्षारीय है। संभव है भोजन में मिठास और छाछ का प्रचलन इसी खारेपन को संतुलित करने से जुड़ा हो। वैसे भी गर्म जलवायु में छाछ भोजन को सुपाच्य रखता है। 

गुजरात व्यापारिक प्रदेश है। यहां यात्राएं भी लोग करते रहे होंगे, लंबी यात्राओं में भोजन खराब न हो इसलिए भोजन को मधुर और सुपाच्य रखने की परंपरा रही होगी। यही बात यहां की भोजन-संस्कृति का हिस्सा बन गई हो। 

खैर जो भी हो, यहां बाटी भी खोया डालकर बनाते हैं, यह बहुत स्वादिष्ट होता है। घी और खोए की वह मिली-जुली सुगंध साधारण बाटी को भी एक अलग ही व्यंजन बना देती है। पहली बार खाने पर लगता है जैसे राजस्थानी बाटी और किसी मिठाई का स्वाद एक साथ मिल गया हो।

यहां काठियावाड़ में नारियल की खेती तो खूब होती ही है, मूँगफली की भी होती है। फिर बीच-बीच में फैले छोटे-बड़े उद्योग और समुद्र से जुड़े बंदरगाह, सब मिलकर यहां की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं।  

लगता है भारत के उद्योगपतियों के लिए गुजरात मुफीद जगह प्रतीत हुई। समुद्री बंदरगाहों की उपलब्धता, अपेक्षाकृत कम आबादी वाले विस्तृत भू-भाग, और व्यापारिक दृष्टि से अनुकूल वातावरण ने यहाँ औद्योगिक इकाइयों को तेजी से विकसित होने का अवसर दिया होगा। छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक कहीं न कहीं कोई फैक्ट्री, प्रोसेसिंग यूनिट या औद्योगिक परिसर दिखाई पड़ ही जाता है।

इन्हें देखकर सहज ही समझ में आता है कि उत्तर भारत के इतने मजदूर रोज़गार की तलाश में यहाँ क्यों आते हैं। दरअसल उद्योग केवल पूँजी को नहीं बुलाते, वे श्रम को भी आकर्षित करते हैं। शायद यही कारण है कि गुजरात के शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में आपको उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान तक के लोग काम करते दिखाई पड़ जाते हैं। यहाँ की आर्थिक सक्रियता ने अलग-अलग प्रदेशों के लोगों को एक साझा श्रम-संस्कृति में जोड़ दिया है।

इस समय हम सोमनाथ-अहमदाबाद हाईवे पर चल रहे थे। ऐसे मार्गों का प्रभाव गुजरात की आर्थिक गतिविधियों पर ही नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी अच्छा प्रभाव पड़ा है। 

#चलते_चलते

देश में हो रहे विकास के बावजूद भारतीय नागरिक एक जिम्मेदार नागरिक नहीं बन पा रहे हैं।

#सुबहचर्या

 (2.07.19)

शुक्रवार, 5 जून 2026

धर्म की नदी और संप्रदाय की नावें

सुबह जल्दी उठे। कल द्वारिकाधीश के दर्शन हो ग‌ए थे। आज का प्लान सोमनाथ जाने का था। कल मैं द्वारिकाधीश में एक साधू के बगल में बैठा था। जिसकी तस्वीर मैंने फेसबुक पर शेयर की थी। 

वैसे किसी भी धर्म के विषय में टिप्पणी करना अत्यंत संवेदनशील मसला है, क्योंकि धार्मिक विचार सीधे आस्था से जुड़े होते हैं। जिसकी जैसी आस्था होती है, उसका धर्म बोध भी वैसा ही आकार लेता है। मनुष्य अपनी आस्थाओं के ताने-बाने से ही अपनी जीवन-शैली, व्यवहार और दृष्टिकोण का निर्माण करता है।

लेकिन धार्मिकों को भी चाहिए कि अपने विचारों को लेकर आक्रांता न बनें। धार्मिक विचार बिल्कुल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित होने चाहिए।

खैर, कल किसी बात पर क्षण भर के लिए मन उदास हो आया था। एक पीतवस्त्रधारी साधू बाबा के बगल में आकर बैठ गया। उनसे अपनी तुलना कर बैठा। उनकी निश्चिंतता से मुझे रश्क-सा हुआ!

वैसे धार्मिक परम्पराओं में संसार को अक्सर ‘भवसागर’ कहा गया है। यहाँ ‘भव’ का अर्थ है जन्म-मरण और उससे जुड़ा यह नश्वर संसार, जबकि ‘सागर’ उसकी अथाह और दुस्तर प्रकृति का प्रतीक है। मनुष्य इस भवसागर में मोह, माया, दुःख, भय, रोग, जरा और मृत्यु जैसी अनगिनत लहरों के बीच डगमगाती जीवन-नौका लेकर भटकता रहता है। अपनी-अपनी चिंताओं, इच्छाओं और अस्तित्व के संकटों से जूझते हुए वह किसी स्थिर तट की तलाश करता है।

तो क्या साधु हो जाने मात्र से कोई इस भवसागर के उस स्थिर तट को पा लेता है? संभवतः नहीं। अनेक साधु-संत इससे मुक्ति का उपाय संसार से कुछ दूरी बनाकर अपनी एक अलग दुनिया रच लेने में देखते हैं। किन्तु वे भी अंततः इसी संसार, इसी भवसागर पर आश्रित रहते हैं। उनकी साधना, उनका वैराग्य, यहाँ तक कि उनका अस्तित्व भी उसी समाज और जीवन-व्यवस्था से जुड़ा होता है, जिससे वे स्वयं को अलग मानते हैं। बस वे जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते।

वैसे, आम भारतीय अपने व्यक्तिगत अस्तित्व को लेकर बहुत अधिक फ़िक्रमंद नहीं रहा, वह अपने होने की निरंतरता को पारिवार और आने वाली पीढ़ियों में अवश्य देखता है, किंतु भारतीय चिंतन ने वानप्रस्थ जैसी अवधारणा के माध्यम से इस भाव को भी संतुलित किया, ताकि पारिवार जैसी संस्था की निरंतरता पर व्यक्ति का अहं न टिक जाए। शायद इसी कारण यहाँ जीवन और जगत की वस्तुओं को क्षणभंगुर माना गया, और वैराग्य तथा अनासक्ति को भी जीवन-दृष्टि का हिस्सा बनाया गया। 

लेकिन चतुर और लोभी मन प्रायः अपने अस्तित्व-बोध को ही केंद्र में रखकर जीता है। यही कारण है कि वह परिवार और सामाजिक संस्थाओं को भी अपने अहं तथा वर्चस्व का माध्यम बना देता है। जब व्यक्ति निरंतरता को साधना के बजाय स्वामित्व की दृष्टि से देखने लगता है, तब वही प्रवृत्ति परिवारों और संस्थाओं में विकृतियाँ उत्पन्न कर देती है। जिससे इन संस्थाओं के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो जाता है। सामंती मानसिकता का मूल भी कहीं न कहीं इसी आग्रह में दिखाई देता है।”

भारतीय संदर्भों में धार्मिक विचार एक बहती नदी की तरह रहा है, जिसमें निषेध या बहिष्कार का आग्रह कम, और विविध धाराओं को आत्मसात कर उन्हें अपने प्रवाह का हिस्सा बना लेने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। शायद इसी कारण यहाँ अस्तित्व को स्थिर रूप में बचाए रखने की चिंता से अधिक, जीवन-प्रवाह को सतत और जीवंत बनाए रखने पर बल दिया गया।

लेकिन जब धार्मिक-विचार किसी कठोर सम्प्रदाय में बदलने लगते हैं, तब उनकी यही जीवंतता क्षीण होने लगती है। प्रवाह की जगह आग्रह आ जाता है और समावेश की जगह सीमाएँ खिंचने लगती हैं। तभी अपने बगल में बैठे उस साधु को देखकर मन में यह विचार आया कि कोई भी बाना या पहचान, यदि अस्तित्व-बोध और अहं की चिंता से मुक्त होकर धारण की गई हो, तो वह न कभी दूसरों को भ्रमित करती है और न ही किसी अन्य के होने की अवहेलना करती है।

कल जब हम द्वारिकाधीश के दर्शन करने गए तो वहां के पुरोहित ने मुझसे मेरी जाति पूँछी, मैंने बता दिए! लेकिन अगले ही पल मैंने सोचा मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, एक ऊँच-नीच जातीय मानसिकता वाले समाज में यह किसी और के लिए अपमानजनक हो सकता है। बाद में पत्नी ने भी इसी बात को लक्षित कर मुझसे कहा, "यहाँ तो जाति पूँछते हैं! मुझे खराब लगा।" दरअसल ऐसी ही होती है, अस्तित्ववादी सोच! इसे हम एक अलगाववादी सोच मानते हैं, इसे क्यों न हम एक जिहादी सोच मानें? खैर..

मैंने ओखा में हजारों नावें खड़ी हुई देखी! पहले तो किसी ने बताया ये मरम्मत वगैरह के लिए खड़ी हैं, लेकिन बाद में एक स्थानीय व्यक्ति ने जानकारी दिया कि ये मछुआरों की नावें हैं, मौसम और तेज चलती हवाओं के कारण सरकार ने इन्हें अभी समुद्र में उतारने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है, प्रतिबंध हटते ही यहां एक भी नावें नहीं दिखाई पड़ेंगी!

वाकई, उन नावों और समुद्र को देखते-देखते मेरे भीतर सागर, भवसागर, नाविक, पुरोहित, संप्रदाय, धार्मिक रीति-कुरीतियाँ और जर्जर नावों की छवियाँ आपस में घुलने-मिलने लगीं। मन में प्रश्न उठा, क्या इन धार्मिक नावों के खेवैयों को यह स्मरण है कि नावों की भी समय-समय पर मरम्मत करनी पड़ती है? विचार जब जीवंत रहते हैं तभी वे पार ले जाते हैं, लेकिन जब वे जड़ होकर केवल सम्प्रदाय और मजहबी आग्रह में बदल जाते हैं, तब वे धीरे-धीरे जीर्ण नावों जैसे हो जाते हैं। विडम्बना यह है कि भवसागर से पार होने की आशा में हम आज भी उन्हीं पुरानी, मरम्मत-विहीन नावों पर चढ़े चले जा रहे हैं।

मैं इन नावों के नाविकों से कहता हूं कि- भ‌इया! अपनी-अपनी नावों के रंग-रोगन का ही नहीं, इनके आधुनिकीकरण के बारे में भी सोचिए! खैर।

आइए, अब इन बेफालतू की उलझी हुई बातों से ध्यान हटाकर काठियावाड़ की ओर लौटें। सुबह सोमनाथ के रास्ते पर चलते हुए जगह-जगह दूर तक फैले पवन-ऊर्जा के ऊँचे टावर दिखाई पड़ रहे थे। रास्ते में एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि यहाँ पिछले पाँच वर्षों से ढंग की बारिश नहीं हुई है। फिर भी लोगों के चेहरों को देखकर लगा कि जीवन की जिजीविषा अब भी सूखी नहीं है। कठिन परिस्थितियों में भी यह उन्हें जीने की राह सुझा रही है।

#चलते_चलते

        अपनी जिजीविषा के साथ प्रसन्न चित्त रहिए! यह किसी पंथ,संप्रदाय या मज़हब के ताने-बाने का मोहताज नहीं। खराब मौसम में तो नावें भी खड़ी हो जाती हैं! लेकिन जिजीविषा ही है जो आपको तैरना सिखा जाती है।

#सुबहचर्या

(१९.७.१९)

मंगलवार, 2 जून 2026

एक अबूझ-सी सुबह!

आजकल यूं ही आलसपन घेरे रहता है। जब आदमी को करने को कुछ नहीं सूझता तो ऐसा ही होता है। पांच के आसपास जागा। कुछ देर तो इसी उधेड़बुन में बीता कि टहलने जाएं या नहीं.. खैर.. निकल लिए। 

यह अलसायी-सी सुबह जैसे मौन थी.. वही सड़क.. वही सुबह.. वैसे ही इक्का-दुक्का आने-जाने वाले लोग और वाहन… और वैसे ही सड़क पर पड़ते मेरे कदम.. रोजमर्रा के वही दृश्य। 

फिर भी मन को यह सब अबूझ-सा लग रहा था। इसमें कोई कहानी नजर नहीं आ रही थी।
     
रोज आते-आते यह सुबह जैसे थक चली हो! बस मजबूरी है उसका आना और गुजर जाना। 
      
हाँ समय या काल,जो कुछ भी हो! केवल दिखाई पड़ने वाली चीजों का गुजर जाना भर है!! हमारा देखना बंद हो जाना, हमारा भी गुजर जाना है.. शायद समय इसी को कहते हैं।
        
सामने निगाह पड़ी..एक सांड़ आ रहा था… पहले तो मैंने इसे जानवर समझा। इससे बचने की कोशिश भी किया। लेकिन सांड़ ने स्वयं ही रास्ता बदल लिया… वैसे जो हिंसक हो उसे ही जानवर मानना चाहिए! 
      
अब तो ‘जानवर’ की परिभाषा बदले जाने की जरूरत है। अकारण ही किसी भी जीव को ‘जानवर’ कह देना अनुचित और आपत्तिजनक है। फिर तो इंसान भी जानवर है!! 
      
सोच रहा हूं.. अगर सांड़ मन-वाला हुआ तो जरूर.. मुझे भी जानवर ही समझा होगा.. तभी तो रास्ता बदल लिया। हाँ किसी को जानवर समझ लेना मनुष्य की ही बपौती नहीं है। 
       
लेकिन क्या पता हम दोनों ही एक दूसरे को समझने में गलत हों? वैसे हम अपने “समझने” को भी समझ पाते हैं या नहीं, अकसर हमें यह नहीं पता होता।
         
कहते हैं, प्रेम की भाषा मूक होती है, इतनी सहज कि उसे एक शिशु भी बिना शब्दों के समझ लेता है। 
      
लेकिन जब वही भाषा समझ में आनी बंद हो जाए, तो मान लेना चाहिए कि वह शिशु अब बड़ा हो चुका है। 
     
शायद इसीलिए तो, बड़े लोग प्रेम को बार-बार शब्दों, संकेतों और व्यवहारों के माध्यम से जताते और समझते हैं। क्योंकि उनके के लिए अब ‘प्रेम’ एक निष्कलुष भावना नहीं, बल्कि ‘व्यवहार’ में बदल चुका होता है। 
          
खैर, चीजें यूं ही गुजर जाती है, अपने समय-भर हम इसे समझते रह जाते हैं..
        
चलते-चलते ध्यान आया, 'मदर्स डे’ पर ऑफिस की सीढ़ियों के कोने में एक मरणासन्न टाइप की कृशकाय वृद्धा दिखाई पड़ी थी। पता चला उसका एक पुत्र है, वह ड्राईवरी करता है और शराब पीता है। 
     
लोग उस वृद्धा पर दया दिखाते हैं उसका वह पुत्र उस दया में से अपने लिए भी कुछ झटक लेता है। 
     
मुझे समझ में नहीं आता ऐसे ‘डे’ क्यों बनाए गए हैं? कुछ बात होगी इसे ‘बनाने वालों” के लिए। 
       
खैर लौटकर आया, अपने लिए ग्रीन टी बनाया। पहले मैं ग्रीन टी पीने वालों की खिल्ली उड़ाता था।

चलते_चलते
      
किसी चीज को कुछ नाम देना यह हमारा शगल है, शब्दों को मायाजाल में नहीं बांधना चाहिए, शब्द निरीह होते हैं। वैसे मौन भी एक भाषा ही है।

#सुबहचर्या
  17.5.19

शनिवार, 30 मई 2026

गेट पर खड़ी संवेदना

     सुबह की टहलाई के लिए स्टेडियम की ओर निकला। चलते हुए अचानक एक कुत्ते पर निगाह चली गई। सड़क के किनारे वह अपनी पिछली दो टाँगों और आगे की दोनों टाँगों के पंजों को जमीन पर टिकाए आँख बंद किए बैठा था! उसके बैठने के अंदाज से मैं उसे देखता रहा गया। उस कुत्ते की भाव-भंगिमा एकदम से ध्यानावस्था जैसी थी। सड़क पर अभी भी सन्नाटा पसरा था, हम जैसे बस इक्का-दुक्का लोग ही आ-जा रहे थे। वहां एक खंभे पर लगे लैम्प-पोस्ट की रोशनी जरूर आस-पास बिखर रही थी। कुत्ता इसी रोशनी में सड़क की ओर मुँह करके बैठा था। 
        मैं स्टेडियम से वाकिंग करके वापस आ गया। रोज की तरह चाय बनाया। चाय पीने के कार्यक्रम के बीच घर भी फोन लगा दिया। पूरी घंटी गई लेकिन फोन नहीं उठा.. कुछ पल बाद घर से फोन आ गया...चाय सुड़कते हुए मैं फोन पर बतियाने लगा...
          मैंने पूँछा, "का हो..! का, हो रहा है..?"
          "रोटी बना रही हूँ..." का हो की आवाज।
      "इतनी सुबह-सुबह रोटी बन रही है?" थोड़ा चौंकते हुए मैंने पूँछा। असल में घर पर किसी के लिए टिफिन बनाने की तैयारी नहीं करनी होती।
       फिर उन्होंने बताया, "आज सुबह-सुबह जब गेट खोला तो कहीं से वह दौड़कर आ गया था... पहले उसे कुछ बिस्कुट दिया… इसे खाने के बाद भी वह बैठा रहा, गया नहीं.. इसलिए अब उसके लिए रोटी बनानी पड़ रही है।"
         यह पालतू नहीं है। बस हमारी गली में उसका जन्म हुआ था, दो वर्ष पहले। और इस गली में ही वह बड़ा भी हुआ। यह जुड़वा था। इसका भाई मेरे घर के सामने के चौराहे पर ही किसी वाहन से हुई दुर्घटना में चल बसा था। पहले उसका मेरे घर से बहुत लगाव था। कभी-कभी वह घर के बारामदे में चला आता और हम सबके साथ खेलता। जबकि उस समय यह बाहर सड़क पर बैठा रहता और वहीं से घर के गेट की ओर निहारता रहता… घर के अंदर न आता‌। 
        लेकिन उसके जाने के बाद एक दिन यह घर के अंदर बारामदे में बैठा दिखाई पड़ा। इसे वहां देखकर हम लोग विस्मित हुए थे। अब इसका हम लोगों से लगाव हो गया था! जब भी इसका कुछ खाने का मन होता है, यह घर के गेट के बाहर आकर चुपचाप बैठ जाता है। खाने को मिलते ही फिर वापस चला जाता है। और जब इसका आराम करने का मन होता है, तो गेट खुला मिलते ही यह बेधड़क भीतर चला आता है और किसी कोने में या कार के नीचे कुकुर-कुंडली मारकर इस तरह पसर जाता है मानो इसे किसी की परवाह ही न हो! तब घर के लोग भी इसके आराम में खलल डालने से बचते हैं। 
      एक दिन श्रीमती जी इसी के बारे में बता रही थीं। उस दिन जैसे ही उन्होंने गेट खोला, यह न जाने कहाँ से दौड़ता हुआ आ गया। इसके आने पर उनका ध्यान नहीं गया। कुछ देर तक यह उनके आस-पास मंडराता रहा, लेकिन उन्होंने इसे पुचकारने के बजाय झिड़क दिया। इसके बाद यह चुपचाप लौट गया था।
       लेकिन अगले दिन की बात है। पत्नी को कहीं बाहर जाना था। उन्होंने गेट खोला, तो यह गली में ही खड़ा दिखाई दिया। उन्हें देखकर भी इसने जैसे अनदेखा कर दिया और अनजान बन दूसरी ओर चल पड़ा। तभी श्रीमती जी को एहसास हुआ कि यह उनकी उपेक्षा से नाराज़ है। फिर उन्होंने इसे जबरन अपने पास बुलाया, रोटी-बिस्किट देकर मनाया। तब जाकर इसका मन पिघला और यह फिर उनसे खेलने लगा.. मानो इसे भी अपनी नाराज़गी पर संकोच हो आया हो!
      यह केवल एक कुत्ता भर नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील प्राणी है! इसकी इसी संवेदनशीलता को भाँपकर जब भी यह दिखाई पड़ता है, इससे मुखातिब होना पड़ता है, इसकी आवभगत करनी होती है; अन्यथा इसके नाराज हो जाने का डर बना रहता है। 
      सुबह हो या शाम, जैसे ही यह गेट पर आकर खड़ा होता है इसे रोटी दे दी जाती है। लेकिन इसकी सबसे अजीब बात यह है कि यदि यह कभी गेट पर आए और इसे रोटी न मिले तो फिर यह दुबारा उसी तरह गेट पर आकर खड़ा नहीं होगा। मानो इसे केवल रोटी से ही मतलब न हो, बल्कि अपनी उपेक्षा का एहसास भी भीतर तक छू जाता हो! इसके साथ व्यवहार करते हुए इसके पेट का ही नहीं इसकी भावनाओं का भी खयाल रखना पड़ता है!!
     तो आज सुबह-सुबह श्रीमती जी इसी के लिए रोटी बना रहीं थी। मैं मुस्कुरा उठा।
     “भाई, इसे केवल एक कुत्ते की कहानी समझकर हँसी में मत टाल दीजिएगा…! हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि बचपन में जाड़े की रातों में गाँव के अलाव के पास बैठकर हमने ऐसी ही न जाने कितनी कुत्ते-बिल्ली की कहानियाँ सुनी हैं। उन कहानियों में जानवर केवल जानवर नहीं होते थे, वे मनुष्यों की तरह रूठते-मनाते, अपनापन जताते और उपेक्षा महसूस करते थे।
       हाँ, तब कुछ रिश्तेदार हमें इन कहानियों में रस लेते देख ‘गँवार’ कहकर चिढ़ाते भी थे। लेकिन हम कभी चिढ़े नहीं। शायद इसलिए कि उन कहानियों में हमें जीवन की एक सच्चाई दिखाई पड़ती थी… संवेदना केवल मनुष्यों की जागीर नहीं है। यदि उन दिनों हम उन बातों से चिढ़ गए होते, तो आज यहाँ बैठकर आपको यह कहानी भी न सुना रहे होते। सच तो यह है कि अलाव के किनारे सुनी गई उन्हीं मामूली-सी लगने वाली कहानियों ने हमें इतना भर सिखा दिया कि किसी प्राणी की आँखों में उपेक्षा, अपनापन, नाराज़गी और प्रतीक्षा को पढ़ सकें। और शायद उसी का परिणाम है कि आज इस कुत्ते का गेट पर आकर चुपचाप खड़ा होना भी हमें एक कहानी जैसा लगने लगता है…!”
       आज के अखबार के अन्तिम पृष्ठ पर एक समाचार हेडिंग "इतिहास के सबसे खतरनाक मोड़ पर मानवता" में स्टीफन हाँकिंग के हवाले से लिखा था "मानव समुदाय भयानक पर्यावरण संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है। ...मानवता अपने विकास क्रम में सबसे खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर रहा है।" खैर...
#चलते_चलते
          हम भी यहाँ यही कहना चाहते हैं कि....
       ...असल में हमारा अहंकार में डूबा मन दूसरों की संवेदनाओं को पहचान ही नहीं पाता… संवेदनशीलता केवल भावुकता नहीं, बल्कि दूसरे के भीतर घट रही हलचल को महसूस कर पाने की क्षमता है।
 #सुबहचर्या 
    5/12/16

गुरुवार, 28 मई 2026

हिंदू होने की पहली शर्त

      सुबह गहरी नींद में था, जब लाउडस्पीकर का शोर कानों में पड़ा। मैं उठ गया‌, जिस आवाज से निद्रावस्था जैसी समाधि भंग हो निश्चित ही वह आवाज सुकूंन और शांतिदायक तो नहीं ही होगी!! 
       बाहर घना कुहरा छाया था, सड़क पर चलते हुए ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी धुंध में घुसे चले जा रहे हों! पीछे से कुछ लोगों की बातचीत की आवाज आती सुनाई पड़ी, किसी ने किसी को कहीं जाने के लिए कहा था लेकिन वह जाने के लिए तैयार नहीं था। बस इसी खुन्नस में वह "किसी" उस कहने वाले "किसी" को पुलिसिया शैली में गरियाये जा रहा था। उसकी गालियां मातृशक्ति को भी बीच में घसीट रही थी। 
     लौटते समय कुहरा छंटने लगा था। चाय पीते समय ध्यान लाउडस्पीकर पर गूँजती धार्मिक आवाजों पर गया, जिसके कारण सुबह-सुबह ही जाग उठा था। मैं विचार करने लगा…
 .... सभ्यता के प्रारंभ से जिज्ञासु मानव-मन ने अपने रहस्यात्मक-भाव वाले अनुत्तरित प्रश्नों को आध्यात्मिक भाव में बदले होंगे और फिर इसके बरक्स अपना जीवन-दर्शन गढ़ा होगा। मनीषियों ने कालान्तर में 'चाहिए' के भाव के साथ आचरण से सम्पृक्त करने के प्रयास में ही इसे "धर्म" कहा। यहाँ इस "चाहिए" में "बाँधने" का भाव नहीं, अपितु तार्किकता के आधार पर जीवन-दृष्टि का भाव समावेशित है, जो जीवन को सतत और सहज रूप से गतिशील बनाता है। यही "सनातन जीवनशैली" है, जिसे इधर 'हिन्दू धर्म' के नाम से संबोधित किया जा रहा है। यह सनातन जीवनशैली, आध्यात्मिकता और प्रकृति से तादात्म्य स्थापित कर हजारों वर्षों से अपना अस्तित्व बनाए हुए है तथा दुनियाँ की श्रेष्ठ सभ्यताओं में से एक है। 
          हम सदैव से जिज्ञासु रहे हैं; यह जिज्ञासा हमें तर्क के रास्ते वाह्य और अन्तर्जगत के चरम बिंदु अर्थात आध्यात्मिकता के धरातल पर ले जाकर खड़ा कर देती है, जहाँ से विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में ढलकर यह अपना उत्तर तलाशती है। इसप्रकार आध्यात्मिक-दृष्टि, जिसमें वैज्ञानिक और तार्किक दोनों दृष्टि अन्तर्वलित है, वैचारिक-सांस्कृतिक मान्यताओं को औदात्यपूर्ण बनाती है। हमारे इसी सनातन जीवन-शैली के औदात्यपूर्ण चिंतन से एक सर्वसमावेशी-सांस्कृतिक-सभ्यता निर्मित हुई और यही "हिंदू" होने की पहली शर्त भी है। 
     लेकिन आज "भक्ति-भाव" के बढ़ते आडंबर में यह हिंदू जीवन-दृष्टि धीरे-धीरे छीजते हुए कैसे हमें असहज बनाकर अपने ही मूल संदर्भ से विलग हो रही है, यह एक चिंतनीय विषय है। इसकी प्रक्रिया क्या और कैसे रही है, इसे समझने के लिए हम महाकाव्यों में वर्णित "राम" के चरित्र के भावबोध का सहारा ले सकते हैं, क्योंकि हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में राम एक ऐसे चरित्र रहे हैं, जिनसे यह समाज अनुप्राणित होता आया है। 
      हमारे रामायण-महाकाव्य अपने-अपने युगबोध के अनुसार राम के चरित्र को विभिन्न भाव-भूमि पर ग्रहण करते आए हैं। अतः इनमें राम का चरित्र अपने समय से संवाद करता हुआ प्रतीत होता है। इससे तत्कालीन समाज के उस सांस्कृतिक मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को भी समझा जा सकता है, जिससे धार्मिक मनोवृत्तियों में परिवर्तन के साथ समाज भी इससे प्रभावित हुआ। जैसे, ऐसा क्यों है कि जीवन-संघर्ष में जूझते बाल्मीकि के राम एक सामान्य मानवीय चरित्र हैं और वहीं तुलसी के राम 'ईश्वरत्व' की भावभूमि पर स्थापित हैं? यह अध्यात्म से भक्ति की ओर जाते समाज की अपने सांस्कृतिक संदर्भों के साथ प्रतिक्रिया रही होगी। समाज पर इसके प्रभाव का विश्लेषण एक विचारणीय बिंदु है ।...
      हाँ तो आज बस यहीं तक, कोशिश रहेगी इसपर फिर कभी गुफ्तगूँ करेंगे। हो सकता है आप मेरी बातों से इत्तेफाक न रखते हों, लेकिन कोई बात नहीं। 
#चलते_चलते
     धुंध के पार जाने के लिए चलते रहना चाहिए। 
#सुबहचर्या 
 (3.12.18)

ये आवाजें धर्म की नहीं!

        आज रविवार है..टहलने नहीं जाना था, रविवार का दिन निरुद्देश्य बिताने की इच्छा रहती है। लेकिन सुबह की अजान कानों में पड़ी तो नींद खुल गई। दुबारा सोने की कोशिश किया तो भजन की आवाज सुनाई पड़ने लगा। जैसे दो "धर्मानुयायियों" के बीच "राइवलरी" हो! इधर ध्यान दे रहा हूं तो यह प्रवृत्ति कुछ बढ़ती जान पड़ती है। जैसे आज ही लाउडस्पीकर पर सुनाई देने वाली ये आवाजें शोर की हद तक परस्पर गड्डमड्ड हुए जा रही थीं!
     अब तो 'धर्मों' का लाउडस्पीकरीकरण हो चुका है। इससे धर्मों की शान्त..स्निग्ध..कोमल भावना कर्कश ध्वनि में बदलती जा रही है! खैर, 
       यह "धर्मों" में आया यह नया "भक्ति-वाद" हमारे "ज्ञान-तंतु" को धीरे-धीरे कमजोर करने लगा है। इस शोर के बीच मैंने स्वयं से गुफ्तगूं किया - जैसे कि…
       "हिन्दू जीवनशैली या भारतीय जीवन-दर्शन की आधारभूमि वेदः प्रसूत आध्यात्मिकता है, जो हमारी धार्मिक-सांस्कृतिक मनोवृत्तियों को साम्प्रदायिक-मनोवृत्ति में बदलने नहीं देती और व्यक्ति को अपने मान्यताओं के केंद्र में रखकर चलती है। इसकी पुष्टि "बिंब प्रतिबिंब" उपन्यास में स्वामी विवेकानंद के इस कथन से की जा सकती है- 
      "प्रत्येक व्यक्ति का विकास अपनी आन्तरिक शक्ति द्वारा ही होना चाहिए, अपने स्वभावानुसार ही उसका विकास होना चाहिए, उन्नति होनी चाहिए, अवनति होनी चाहिए।"
      यह कथन उस वैदिक संस्कृति की ओर संकेत है जिसमें निहित आध्यात्मिकता से व्यक्ति में स्वतंत्र चेतना के साथ आत्मिक विकास की भावना सुदृढ़ होती है और उसे किसी "सम्प्रदाय" का अंग बनने से रोकती है। 
        लेकिन यहीं पर एक प्रश्न उभरता है, क्या 'हिंदू-धर्म' के रूप में रूढ़ होते इस सनातन जीवनशैली को "धर्म" की संज्ञा देकर "रिलिजन" या "मजहब" की परिधि में लाकर उसकी मूलभावना "आध्यात्मिकता" से इसे अलग नहीं किया जा रहा? 'धर्म' के नाम पर ये आडंबर कहीं हमें अपनी जड़ से काटकर कटी पतंग की तरह भटकने के लिए तो नहीं छोड़ रहे? आखिर इसके लिए कौन सी धार्मिक-वैचारिक सांस्कृतिक परिस्थितियाँ उत्तरदायी है? 
       ये प्रश्न और इनके उत्तर भारतीय जीवन-दर्शन के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके पीछे का मनोविज्ञान किसी राष्ट्र-राज्य की सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक उन्नति के साथ उसे एक श्रेष्ठ समाज व्यवस्था में बदलने का कारण हो सकता है। इस मनोविज्ञान का सामान्य जनमानस पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, इसे समझने का प्रयास किया जा सकता है।"
       हाँ..आज बस इतना ही! इस बात पर फिर बात करने का मन हुआ आगे की बात करेंगे।
 #चलते_चलते
      किसी बात के कई पहलू हो सकते हैं, सार्थक और निरर्थक! लेकिन बात कुछ अर्थ छोड़ते हैं, बस इन अर्थों को पकड़ने कोशिश होनी चाहिए... 
  #सुबहचर्या 
    (2.12.18)
       विनय

ज्ञान का विरोधी ज्ञान

      आज सुबह छह बजे टहलने के लिए निकला‌। बाहर वातावरण में धुँधलका छाया हुआ था, एकदम कुहरा के माफिक! सड़क पर मोटरसाइकिलों एवं अन्य वाहनों का आना-जाना शुरू हो चुका था। मन में खीझ-सी उठी कि इनसे सबेरे की शान्ति भंग हो रही थी। सोचा, इन्हें सुबह-सुबह निकलने की ऐसी क्या जल्दी पड़ी है?
      इस बीच एक मोटरसाइकिल तो धुँएं का गुबार छोड़ते हुए ऐसे निकली कि उसके धुएँ और गंध से मेरे नथुने भर गए! एक अजीब से गुस्से और खीझ लिए मैं वापस लौटने को हुआ, फिर यह सोचकर कि इधर टहलने का रुटीन सही नहीं चल रहा, कम से कम टहलने का कोटा भी तो पूरा होना चाहिए, लौटने का विचार त्याग दिया। खैर..
       टहलाई पूरी कर आवास पर आया। वही रोज़ की भांति अखबार उठाया। पहली निगाह ही "वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का निधन" की हेडिंग पर पड़ी..
         ....हाँ.. अखबार पढ़ने का चाव मुझे बचपन से ही था, लेकिन जैसे-जैसे देश-काल की समझ विकसित होती गई, मैं सम्पादकीय पृष्ठों के लेख भी पढ़ने लगा। जिन लेखकों को मैं विशेष रूचि से पढ़ता था उनमें कुलदीप नैयर भी शामिल थे! 
       उन दिनों इंटर कालेज में पढ़ता था..किसी समसामयिक विषय पर कुलदीप नैयर का एक लेख छपा था। उस दिन घर पर दादा जी समेत कई लोग उसी लेख को लेकर बतिया रहे थे। तब, आज से तीस-पैंतीस वर्ष पहले, लोगों के पास आपस में बिना लाग-लपेट के और बिना जल्दबाजी के बैठकर बतियाने का समय भी हुआ करता था। मैं कुलदीप नैयर का वही लेख पढ़ते हुए उनकी यह बातचीत सुनने लगा। 
     तभी किसी ने मुझसे कहा, "अरे यह कुलदीप नैयरवा तअ.. वामपंथी..है एकर लेख तअ ऐसई ऊटपटांग रहथअ.." लेकिन उसके बाद कुलदीप नैयर के लेख पढ़ने को लेकर मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई.. वह जिज्ञासा आज तक बनी रही..
      यही नहीं किसी विषय पर अपनी बनायी धारणा के विपरीत वाली धारणा को जानने की जिज्ञासा भी धीरे-धीरे बढ़ती गई थी…
       असल में घटनाओं और बातों पर नैयर जी का बौद्धिक विश्लेषण तार्किक हुआ करते थे.. उनके लेख पढ़ते हुए ऐसा लगता जैसे सोचने की एक और न‌ई दृष्टि खुल रही हो!
#चलते_चलते 
      अगर हम अपने ज्ञान के विरोधी ज्ञान को नहीं जानते तो कुछ नहीं जानते...
#सुबहचर्या 
 (24.8.2018)
    श्रावस्ती

बुधवार, 27 मई 2026

इंसानी फितरत को समझने वाले जानवर!

       आज सुबह टहलने निकले, वही पाँच पैंतालीस पर! पहले तो मन ही नहीं हो रहा था कि टहलने निकलें.. लेकिन मन का क्या! वह तो ऐसा ही है। उसके हिसाब से चलें तो फिर हो चुका! यह चीजों को चौपट करके ही माने। इसीलिए कभी-कभी मन के विरुद्ध चलने में भी भलाई छिपा होता है… बशर्ते यह इस बात पर निर्भर है कि हम ऐसा करके चाहते क्या हैं? खैर।
       मैं स्वयं का स्वास्थ्य-शुभेक्षु हुआ सड़क पर पग-चालन करने लगा.. चलते-चलते विकास भवन की एक तस्वीर ली.. सोचा, यदि तस्वीर लेते हुए कोई मुझे देखता है तो वह यही अनुमान लगा सकता है कि हो न हो इस बिल्डिंग में जरूर कोई खास बात है। वैसे यह बिल्डिंग मेरे लिए खास तो है ही! फिलहाल इन विचारों को परे हटाकर मैंने विकास भवन की तस्वीर मोबाइल में कैद कर लिया।
      इधर सड़क पर झुंड में गौ-पशु ऐसे खड़े दिखाई पड़े, मानो आदमियों के काम में व्यवधान डालने की ठान कर आए हों..! मेरे सामने एक ट्रक और एक बस इन्हें बचाते हुए साइड से निकले। 
      थोड़ा आगे बढ़ा तो गायों की देखा-देखी घोड़े भी सड़क पर साधिकार खड़े दिखाई दिए… शायद गायों को देखकर घोड़ों को भी अस्तित्व-बोध हुआ हो कि नहीं हमारे भी कुछ जीवनाधिकार हैं हम भी सड़क पर गायों की तरह खड़े हो सकते हैं, वैसे भी मार्गों पर सदियों से हमारा जन्मसिद्ध अधिकार रहा है! 
       सड़क पर गाय और घोड़े बेफिक्र खड़े थे, मैंने मन ही मन सोचा, अन्य जानवरों को भी इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। सभी जानवर इकट्ठे होकर समझदारी दिखाते हुए एक जानवर-संघ बनाकर सड़क पर आकर खड़े हो जाएं और इंसानों को चेता दें कि हमारे भी मूलाधिकार की चिंता की जाए! 
        वैसे एक बात है, यह जानवर-संघ इंसानों पर अवश्य भारी पड़ेगा, क्योंकि यहाँ प्रत्येक इंसानों में एक दूसरे को इंसान न मानने की प्रजातीय बिमारी है, पशु-संघ इंसानों के बीच की इस बिमारी का लाभ उठा सकते हैं! क्यों है न? खैर। 
     फिर नजर ग‌ई सड़क के ऊपर आर-पार लगे साइन-बोर्ड पर, जिसपर लखनऊ, बहराइच, श्रावस्ती की दूरी लिखा था, उस बोर्ड पर लंगूर परिवार अपने बाल-बच्चों समेत चहलकदमी कर रहे थे! शायद इन्हें इंसानी फितरत की अच्छी समझ है, इन्हें जानवर-संघ का सदस्य बनने की जरूरत नहीं, इसलिए ये सड़क पर नहीं उतरे! 
     यहां सेथोड़ा आगे बढ़ा, एक कुत्ता महाशय जानवर-महासंघ का विद्रोही टाइप बने आदमियों का सहयोग करते प्रतीत हुए..! ये महाशय अकेले ही सड़क के नियमों का पालन करते हुए चले जा रहे थे। इन्हें ऐसे चलते देख मैंने सोचा, "ये महाशय भी आदमगीरी को बखूबी जानते इसके बरक्स इन्हें अपने कुत्तागीरी में ही मज़ा है, इसलिए इन्हें भी जानवर-महासंघ में सम्मिलित होने की क्या जरूरत? शायद इसीलिए निश्चिंत हैं! खैर..
      रात में बारिश हुई थी। अभी तक सुबह के वातावरण में उससे ठंडकपन बनी हुई थी। हवाओं में घुली यह ठंडकपन मेरे विचारों को गर्मी प्रदान कर रही थी। इस मौसम में मुझे अपने विचारों के साथ चलने में मजा आ रहा था। 
     तभी देखा! सामने कुछ दूर एक इंसान सड़क पर ही (पटरी नहीं) अपनी साइकिल छोड़ वहीं खंती की ओर बढ़ गया। वहां बैठा वह प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान को धता बताने लगा! खैर इस सार्वजनिक स्थान पर भी किसी की निजता भंग न हो मैंने उससे नजरें फेर लिया उसकी गिरी-पड़ी साइकिल की तस्वीर भी नहीं लिया‌। 
      इसके लिए कुछ लोग बेचारे प्रधानमंत्री को दोष दे सकते हैं कि उनका स्वच्छता अभियान मात्र दिखावा है! फिर मैंने मन ही मन सोचा, "काश! प्रधानमंत्री यहाँ लट्ठ लेकर खड़े होते, तो उनका स्वच्छता अभियान अवश्य सफल होता!! लेकिन खैर यह देश ही ऐसा है, यहाँ सब को जोर की लगी है..महान से महान प्रधानमंत्री के पुरखे भी इसे नहीं रोक सकते!!!
     अब मैं वापस अपने आवास के पास पहुँचा ही था कि बकरियों की आर्त्र स्वर में मिमियाहट सुनाई पड़ी, मेरे सामने से गुजरती मोटरसाइकिल पर एक आदमी दो बकरियों को अपनी गोद में बेरहमी से दबाए था। उस मोटरसाइकिल के दोनों ओर दो बोरे भी टंगे थे, उसमें भी एक-एक बकरियां बँधी थी! मतलब मोटरसाइकिल पर कुल चार बकरियां और दो आदमी थे! इन्हें इस तरह जाते देख मैंने सोचा, "पता नहीं इन बकरियों की अम्मा इनका खैर मनाने के लिए बची भी होगी या नहीं..."
#चलते_चलते 
      जिसे केवल अपनी पड़ी है, उसे ऊँच-नीच कुछ भी नहीं सूझता..
#सुबहचर्या 
   (26.7.18)

जीवन तो जीवन है!

        इधर सुबह नींद तो खुलती है लेकिन मन अलसाया रहता है। मन को समझाते-समझाते लगभग पौने छः बज गये थे, तब उठा। एक बात और है हो सकता है वाकिंग के लिए कोई उचित स्थान न पाकर मन टहलने जाने से आनाकानी करता हो? वैसे यहां नया-नया हूँ अभी सामने से गुजरती सड़क पर टहल लेता हूँ। यहाँ एक स्टेडियम भी है; लेकिन वहाँ तक जाने में ही सुबह की टहलाई का कोटा खर्च हो जाता है, वहां टहलने को कुछ नहीं बचता। लेकिन सड़क पर टहलना भी आजकल कम खतरनाक नहीं। सड़क के नियम को लोग नियम-फियम मानकर हवा में उड़ा देते हैं! और अपनी जान के साथ-साथ दूसरे की जान भी खतरे में डाल देते हैं। खैर यह सब जानते-फानते हुए भी हम इसी सड़क पर टहल लेते हैं। 
        आज जिज्ञासावश पहली बार स्टेडियम चलने की सूझी। उधर चलते हुए मैं अपने कदम गिन रहा था। सड़क से स्टेडियम की ओर एक खड़जा-मार्ग जा रहा था। मैं इस रास्ते पर मुड़ गया। इस रास्ते में एक मैदान में कुछ खच्चर नुमा घोड़े घास चरते नजर आए। 
        घर से स्टेडियम के गेट तक पहुँचने में लगभग सोलह सौ कदम हो चुका था। इसके मैदान में चार-छह लोग क्रिकेट खेल रहे थे... एक बच्चा था, वह हाथ में हाकी थामे था। उसके सामने एक सयाना शख्स भी हाकी लिए खड़ा था.. दोनों के बीच नीचे जमीन पर गेंद पड़ी थी। 
       कुछ ही क्षण बाद बच्चा डिबलिंग की कोशिश करने लगा। 
       एक अन्य व्यक्ति मेरी ही तरह स्टेडियम के मैदान को भर-आँख निहार रहा था। मैं इस मैदान का चक्कर लगाने की सोचने लगा। महोबा जैसा यहां मैदान के चारों ओर कंक्रीट-पथ नहीं बना है। 
     "आज पहला दिन है, बाद में टहलने की सोचेंगे" सोचकर मैं वापस होने को हुआ कि तभी दूर एक लंबे-चौड़े सीमेंटेड जमीन के कोने पर आराम से सोए एक कुत्ते पर निगाह पड़ी, वह तो जैसे घोड़ा बेचकर सो रहा था। उसके सोने के अंदाज से मुझे ईर्ष्या हुई कि मैं ही बेवकूफ हूँ जो टहलने आ गया। 
        खैर लौट पड़ा। आवास तक आने में यूँ ही लगभग चौंतीस-पैंतिस सौ कदम चल चुका था।
       अखबार आया था। इसे लेकर पढ़ने बैठ गया। सोचा जब तक चाय बनेगी तबतक मैं अखबार पढ़ चुका होऊंगा। 
      अखबार में मलिक मुहम्मद जायसी की मृत्यु के बारे में एक खबर छपी थी। वे सिंह के धोखे में अमेठी नरेश के बाण का शिकार हो गए थे और जायस कस्बे में उसी स्थल पर उनकी समाधि है…
       इस खबर को पढ़कर मैंने सोचा... उस जमाने में गंगा के इस विशाल मैदान में सिंह गर्जना करते रहे होंगे!  
       अभी कुछ ही दिन पहले आवारा कुत्तों को पकड़ने या उन्हें मारने के विरोध पर सुनवाई करते हुए किसी हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि कुत्तों के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण मानव जीवन है.. 
       ...लेकिन एक बात है, जीवन तो जीवन है चाहे जिसका हो। यह धरती केवल मनुष्यों के लिए ही तो नहीं बनी है? सोचता हूँ क्या मानव जीवन इतना महत्वपूर्ण है वह अपने लिए जल..जंगल...जानवर...जमीन..सबकी बलि लेकर जिंदा रहना चाहता है?? फिर तो ऐसे बियाबान धरती पर जीना भी क्या जीना…!!!
 #चलते-चलते 
        जैसे-जैसे हम स्वार्थी होते चले जाते हैं, वैसे-वैसे स्वयं को ही नष्ट करते जाते हैं..
#सुबहचर्या 
    (6.7.18)

मंगलवार, 26 मई 2026

लगाम

 
      मित्रों! आज सुबह जब टहलने के लिए निकला तो पाँच बजकर अड़तीस मिनट हो चुके थे… यह टाइम यहां इसलिए बता रहा हूँ कि इत्ती सुबह मेरे उठ जाने की सोच आप भी इसके लिए प्रेरित होंगे! वैसे जो सुबह की नींद खराब नहीं करना चाहते पक्का है कि मुझे बेवकूफ समझकर इस नींद का मजा लेते होंगे… चलिए कोई बात नहीं।

        मैं सड़क पर चढ़ चुका था.. चलते हुए अपने आसपास के प्रति थोड़ा इसलिए सजग था कि #सुबहचर्या में लिखने के लिए कोई मसाला मिले! लेकिन सच बताएँ.. ऐसी कोई चीज नजर नहीं आ रही थी कि मतलब की चीज हो और उसका कोई अर्थ निकालें.! 
        तभी एक मोटरसाइकिल भड़-भड़ करती हुई मेरे पीछे आकर रुक गई.. इसके साथ ही कोई कहते सुनाई दिया.. "शायद तेल खतम हो गया..!" 
       पीछे मुड़कर देखा, वह व्यक्ति मोटरसाइकिल स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा था... उसके दो बुर्काधारी महिलाएँ भी थीं.. मन ही मन सोचा, इसे कम से कम मोटरसाइकिल की टंकी में तेल का पता करके चलना चाहिए। 
     इन बातों के बीच मैं अपनी टहलाई का आधा भाग पूरा कर चुका था..मोबाइल से सड़क की तस्वीर ली..सोचा फेसबुक पर इस लेख के साथ यह तस्वीर चेंप कर आपको दिखा दूँ कि मैं इसी सड़क पर टहलता हूँ.. 


      इसी समय सड़क के किनारे खुरचाली करते हुए एक घोड़े पर नजर पड़ी.. जैसे जमीन पर टाप धरने में आनाकानी कर रहा हो, एक आदमी उसकी लगाम पकड़े हुए था। घोड़ा तो हृष्ट-पुष्ट था लेकिन भारतीय मानक वाला था। मेरी नजर अभी घोड़े पर ही थी एक बंदर उछलते हुए सड़क पार करता दिखाई पड़ा! 
       खैर, इन बातों को पीछे छोड़ मैं आगे बढ़ आया। पीछे से घोड़े के टाप की टप-टप सुनाई पड़ा… मुड़कर कर देखा, वही आदमी जो घोड़े का लगाम पकड़े खड़ा था अब साइकिल लगाम को पकड़े मेरे पास से गुजर गया… घोड़ा भी उसी गति से दौड़ते हुए चला जा रहा था। शायद वह आदमी घोड़े को दौड़ना सिखा रहा था।
      अब तक मेरे टहलाई का द एंड होने वाला था... अचानक फिर घोड़े पर निगाह पड़ गई.. अबकी बार साइकिल सवार घोड़े की नाक से कसी लगाम अपनी ओर खींचे, उससे झुंझलाहट में कुछ बड़बड़ा रहा था... लेकिन मैं चौंक तब उठा, जब घोड़े ने भी अपनी गर्दन मोड़कर उसे ऐसी नाराज निगाहों से देखा, जैसे उससे कह रहा हो...कि..
    "अमां यार..तुम इंसान हो, या पायजामा..? सिखाना भी नहीं आता और खींचे जा रहे हो लगाम!" 

        खैर, अब तक मैं एकदम घर के पास पहुँच चुका था, मेरी दृष्टि चचाजान के चाय की दुकान पर अटक गयी.. एकदम झक सफेद दाढ़ी में... सुबहई-सुबहई गोमती खोलकर चाय पिलाना शुरू कर देते हैं…इतने सबेरे अकसर वहां मजदूर ही दिखाई पड़ते हैं, चाय की चुस्की लेकर ये काम पर चले जाते हैं.... 

      अपना देश विचित्रताओं को समेटे है.. तहाँ सभी अपने में मगन! सोशल मीडिया पर एक तस्वीर देखा। एक बाबा की ठुकाई-पिटाई हुई थी। उन्हें देखकर लगा बाबाजी ढंग से साधना करना नहीं आता होगा नहीं तो ऐसी दुर्दशा न होती! हो सकता है लगे होंगे किसी बात पर टांग अड़ाने।

#चलते_चलते 

       वैसे, इस देश की संस्कृति किसी लगाम पर विश्वास नहीं करती..और सारी समस्या की जड़ में, लगाम हाथ में पकड़ने की अभिलाषा रखने वाले ही होते हैं..

#सुबहचर्या 
   (18.7.18)

रविवार, 10 मई 2026

विश्वास का धागा

        आज तो सुबह सात बजे बिस्तर छोड़ा.. असल में क्या है कि रात में सोने के ठीक पहले तक यदि आप गंभीर वैचारिक चिंन्तन में उलझे होते हैं, तो निश्चित ही नींद कुछ न कुछ खराब तो होगी ही! मैं बीती रात सोने जाने के ठीक पहले तक ऐसे ही बौद्धिक जुगाली में उलझा था.. सोने की कोशिश किया तो जैसे ही नींद आने को होती अचानक मस्तिष्क में कुछ चुभने जैसा अहसास होता, जिसे पिंच करना समझ सकते हैं। फिर बेचैनी में नींद टूट जाती! अंततः इस नींद की भरपाई मैं सुबह सात बजे तक करता रहा, बिस्तर नहीं छोड़ा।
         हाँ, एक बात है, सोने जाने से एक घंटा पहले मन-मस्तिष्क को रिलैक्स, मने ढीला छोड़ देना चाहिए। इस समय पढ़ने की आदत वालों को भी चाहिए कि गंभीर विषयों का पाठन न करें। मनोरंजन पूर्ण और हल्के-फुल्के विषय ही पढ़ें। एक बात पर और ध्यान देने की जरूरत है, आजकल सोशल-मीडिया का जमाना है... यहां तर्क-वितर्क और स्क्रॉल में लोग उलझ जाते हैं… इससे भी अनावश्यक तनाव पैदा होता है।
         खैर जब तक बिस्तर छोड़ता तब तक लड़का भी आ गया.. उसने चाय बनायी। 
        चाय पीते हुए अखबार उठाया। सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों पर निगाह पड़ी..इन्हें पढ़ते हुए मन ही मन मुस्कराया..एक फैसला तो मानवीय रिश्तों में आपसी विश्वास बहाली या यों कहें विश्वास की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता प्रतीत हुआ... 
        वाकई! मानव निर्मित संबंधों में आपसी विश्वास से बढ़कर कुछ नहीं होता...कानून-फानून तो बनते बिगड़ते रहते हैं...
     ....इन फैसलों से मुझे बचपन (कक्षा पाँच-छह के आसपास) में श्रीमद्भागवत, कल्याण और सुखसागर में पढ़ी वैदिक कहानियाँ याद हो आयी…
       “कामाग्नि से व्याकुल एक व्यक्ति, उसके पति के सामने ही, एक स्त्री से प्रणय-याचना करता है। स्त्री स्वयं को विवाहित बताकर प्रस्ताव अस्वीकार कर देती है, तो वह उसे श्राप देने पर उतारू हो उठता है।” 
         ऐसी ही एक अन्य कथा में 
       पत्नी पति को अपने कंधों पर बैठाकर स्वयं गणिका के पास ले जाती है।
      लेकिन उन वैदिक कथानकों में इन बातों को अनैतिकता की तरह नहीं देखा गया। नहीं तो पहले प्रसंग में ‘श्राप’ नहीं, ‘पाप’ का भाव उभरता और दूसरे में पति-पत्नी के विश्वास के बजाय अपराध-बोध की छाया दिखाई पड़ती।
       बल्कि इन कथाओं में पति-पत्नी के संबंधों, उनके पारस्परिक दायित्वों और सबसे बढ़कर उनके बीच विश्वास की व्याख्या मिलती है। सच तो यह है किसी भी रिश्ते की असली नींव विश्वास ही होता है! विश्वास ही वह नाजुक-सा धागा है जिससे रिश्ते बंधे और टिके रह सकते हैं!!
       बचपन के उन्हीं दिनों मैं अपने बाबू (दादा जी) के मुख से अकसर किसी की पोंगापंथी पर उसे "लकीर का फकीर होना" जुमले से नवाजते सुना करता। इससे अनजाने में ही मुझे यह सीख नसीब हुई कि बातों को केवल तर्क पर ही नहीं संवेदनाओं की भावभूमि पर भी कसना चाहिए।
       ...एक बात और.. हमने ओखली (संविधान अंगीकरण) में सिर दे दिया है, तो मूसलों (संवैधानिक व्यवस्थाओं के निर्णयों) से क्या डरना..! आखिर बिना कुटाई दाना कहां निकलता है… इसमें आया मुहावरा भी कभी दादा जी से ही सुना था… खैर,
        मेरी सुबहचर्या पढ़कर आप इसे बौद्धिक जुगाली समझ बैठें, उससे पहले ही बता दें कि कई दिनों से पड़ोसी के साथ बैठकर चाय नहीं पी थी। मुझे यह कमी महसूस हो रही थी। आज वे दिखाई भी पड़ ग‌ए! मैंने चाय का आग्रह किया, पहले तो वे मुस्कुराए फिर मेरे बैठक में आ ग‌ए। हम दोनों गप्पें लड़ाते हुए साथ-साथ बैठकर चाय पीते रहे...सुबह की यह चाय बहुत सूकूनदायक थी..

#सुबहचर्या 
 (28.9.18)

शनिवार, 9 मई 2026

विचारों का मैन्युप्यूलेशन

        प्रातःकालीन परिदृश्य जैसे कुछ कह रहा होता है। इसे समझने के लिए मन का खाली और बेलाग होना जरूरी है। और सुबह-सुबह मन कुछ ऐसा ही होता है। इसीलिए सुबहचर्या में मैं दुनियाँ से टकराता हूँ। संवेदित हो उठता हूँ, नवीन विचार प्रस्फुटित होते हैं, लिखास जागती है, और इसे फेसबुक पर अभिव्यक्त करता हूँ। 

       लेकिन कभी-कभी मन 'स्टैग्नेशन' जैसी विरामावस्था में आ जाता है। न कुछ सोच पाता है और न कुछ समझता है। ऐसा मन तब जीवन में रमा हुआ-सा होता है, विचार स्वत:स्फूर्त नहीं होते बल्कि विचारों को ‘मैन्यूप्युलेट’ करना होता है। यदि विचार मैन्यूप्युलेट हों तो इससे स्वाभाविक लेखन नहीं हो पाता। क्योंकि तब पाठक को मात्र प्रभावित करने की इच्छा होती है न! 

        दूसरी स्थिति यह भी बनती है कि विचार सृजन के लिए कभी-कभी मन को अंतस की दुनियाँ में ढकेलता हूँ, तो वहाँ की दुनिया भी भाव-अभाव से मुक्त मिलती है.. विचार रूखे ही रह जाते हैं! या विचार निकलते ही नहीं।

      अरे हाँ..! क्या किसी "साहित्य" का सृजन विचारों या कल्पनाओं को बिना "मैन्यूप्युलेट" किए हुए लिखा जा सकता है… और लिख भी दिया गया तो क्या उस लिखे में, उस विषय की आत्मा भी प्रतिष्ठित होती है? मैं मानता हूँ नहीं, क्योंकि संवेदना को कभी "मैन्यूप्युलेट" नहीं किया जा सकता.. हाँ अभिव्यक्ति को तो किया जा सकता है! मतलब सुंदर मूर्तियां तो गढ़ी जा सकती है लेकिन बिना संवेदना के इन मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो सकती! बिना संवेदना की आंच के शब्द और वाक्य केवल बेजान मूर्तियां ही गढ़ते हैं, और पाठक भी इसे वैसे ही विसर्जित कर देता है।

        आजकल लोग अपनी लिखास मिटा रहे हैं लेखक बन रहे हैं; लेखकों के लिए ही लिख रहे हैं, और लेखकों का लिखा लेखक ही समझ रहे हैं या फिर स्वयं ही अपना लिखा समझते होंगे । 

        पत्नी मुझे पढ़कर अकसर यही कहती हैं, "तुम्हीं लिखो तुम्हीं समझो या फिर कोई लेखक ही तुम्हारा लिखा समझता होगा।" मैं पत्नी को कभी-कभी अपना पाठक मान लेने के भ्रम में होता हूँ लेकिन इस कथन के बाद यह भ्रम भी जाता रहा..

        आज सुबह टहलने का मन हो आया था, लेकिन ध्यान हो आया कि जूता अभी सूखा ही नहीं है और हवाई चप्पल में ठंड लगती। असल में दो दिन पहले जूता धुल दिया था। वैसे इस समय अन्य क्षेत्रों में मौसम खुश्क हो चुका होगा लेकिन तराई जैसे क्षेत्र में शायद आर्द्रता बनी रहती है, वैसे भी भिनगा में जंगल होने से यहाँ आर्द्रता की मात्रा कुछ ज्यादा ही है। इसीलिए कपड़े वगैरह दिनभर में भी नहीं सूखते, जूता तो खैर कैनवास का है ही। 

      लेकिन आज Morning walk की इच्छा बलवती हो चुकी थी और गीले जूते को पाँव में डाल कर निकल लिया। कुछ देर के बाद अचानक जूते पर ध्यान गया। देखा, जूते के कैनवास के ऊपर साबुन का झाग निकलकर फैल चुका है। शायद यह ठीक से नहीं धुल पाया था! खैर चलतेे हुए इस झाग को हटाने की कोशिश भी करता रहा। क्योंकि यह कुछ अजीब लगता था! 

        यूँ ही चलते-चलते एक कार्यक्रम में नारी सशक्तिकरण पर दिया अपना भाषण याद आया! भाषण स्वभाविक नहीं, बल्कि इसपर अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर बोल रहा था। कि सामने बैठे लोग मेरे भाषण से प्रभावित हो जाएं! श्रोता के रूप में सामने स्त्रियाँ ही थी, मंच पर केवल और केवल पुरूष थे। मतलब उस भाषण में मेरी ‘आत्मा’ नहीं बोल रही थी।

       खैर, टहल कर लौटा तो उसी तरह से चाय बनाया और अखबार पढ़ा। अखबार में "असली नारी सशक्तिकरण" पर कोई संपादकीय था, लेकिन नहीं पढ़ा। पढ़ा इसलिए नहीं कि वही घिसी-पिटी बातें, इन बातों को क्या पढ़ना! वैसे पर इस विषय पर घिसी-पिटी बातें ही की जाती हैं!

        इस सुबहचर्या को अभी रात में लिख रहा हूँ, तो दिन में एक और अखबार में एक लेख पढ़ लिया था उस लेख में एक हृदयविदारक घटना का जिक्र था, दिल्ली जैसे शहर में एक पढ़े-लिखे परिवार में एक दादी अपनी पोती को पानी की टंकी में इसलिए डुबोकर मार डालती है, क्योंकि वह पहले बच्चे के रूप में पोता चाहती थी। वहीं किसी दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र में बी ए की पढ़ाई पूरी करने की इच्छा रखने वाली बहू को कोई सास उसे ही सुनाकर कहती है "बड़ी आई हो अंगर्रा-बीयर्रा करने"। 

         तो इन भाषणों से क्या होने वाला? 

      और यहां मैं सुबह की बातें रात में लिखने के लिए अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर रहा हूँ...

#चलते_चलते

      "मैन्यूप्युलेशन" उतना बुरा नहीं होता जितना मैं इसे बता रहा हूँ..शरीर को प्रकृति ने "मैन्यूप्युलेट" किया हुआ है, लेकिन इसमें आत्मा डालकर!! तो यह मैन्यूप्युलेशन भी कलात्मक पुनर्सृजन है!

  #सुबहचर्या 

 (22.11.18)

शुक्रवार, 8 मई 2026

फिट होने के राज!

          क‌ई दिन हो गए थे टहले हुए, तो आज सुबह पौने पाँच बजे ही निकल पड़ा। वैसे यह टहलाई हप्ते में औसतन तीन दिन होती है। स्टेडियम में ग्रुप में टहलने वाले टहलते मिले। ये लोग आपस में किसी राजनीतिक मुद्दे पर चर्चावान थे। उनकी बात सुनते हुए मैं आगे बढ़ गया… ऊपर आसमान में चाँद दूधिया रंग बिखेर रहा था। कुछ क्षण चाँद के शांत मगर चटक धवल रंग पर टकटकी लगाए रहा। खैर..

        स्टेडियम में बढ़ती भीड़ से मुझे लगा कि फिटनेस को लेकर जागरूकता बढ़ी है। तभी ग्रुप का कोई सदस्य "आप फिट तो इंडिया फिट" कहता सुनाई पड़ा। देशभक्ति का यह श्लोगन सुनकर मैं चौंक उठा, इस श्लोगन का ही असर है कि सुबह-सुबह देश के चक्कर में स्टेडियम का एक चक्कर फटाफट पूरा किया।

        लेकिन मेरे आगे-आगे एक निहायत आम आदमी तेज डग भरता चला जा रहा था। उसके दोनों हाथ भी उसी गति से पेंडुलमायमान थे। उसकी यह कवायद मुझे सनक जैसी लगी क्योंकि वह तो आलरेडी फिट दिख रहा था! मैंने सोचा, शायद देशवासी उसे फिट न मान रहे हों इसलिए वह और ज्यादा फिट होने पर तुला है। उसकी चप्पलों की फटर-फटर में उसकी बेचैनी छिपी थी - भ‌ई मैं भी फिट हूँ, और देश को फिट रखने की कुव्वत रखता हूँ। 

        लेकिन मुझे चिंता हुई - भला इस देश को कभी आम आदमी ने फिट किया है! कहीं उसकी यह कवायद इंडिया को अनफिट करने की तैयारी तो नहीं? सोचकर यकायक मैं भी आत्मावलोकन की मुद्रा में आ गया। फिर तो आत्मविभोर होने की फीलिंग हुई। 

       वाकई, इंडिया को फिट करना आम आदमी के बूते की बात नहीं, हम या हमारे जैसों के ही बस का है। क्योंकि इसके लिए पहले देशहित की फाइलों का नियम-नियामक और कर्ताधर्ता बनकर खुद को फिट करना होता है, मतलब राज-प्रदत्त पौरुष धारण करना पड़ता है! इस पौरुष का अद्भुत प्रभाव मुझे अपने पदचालन में अनुभूत होने लगा -

         शानदार ब्रांडेड स्पोर्ट्स शूज से सुसज्जित मेरे राजपुरुषोचित चरणों की प्रत्येक धमक धरती को यह संदेश देती जान पड़ती थी कि:

        “हे इंडिया की धरती! मैं तो फिट हो चुका, अब तू भी फिट हो ले!!”

        तत्पश्चात देशभक्ति-भाव से लबरेज मुझ जैसे राजपुरुष के चरणों की धमक धरती पर और तीव्र हो उठी।

       सहसा मुझे मोहन राकेश के नाटक "अषाढ़ का एक दिन" में दन्तुल और कालिदास के बीच का एक प्रसंग स्मरित हुआ। 

         दन्तुल का बाण एक मृगशावक को घायल कर देता है। कालिदास उसे बचाने का प्रयास करता है। दन्तुल घायल मृगशावक को सौंपने का आदेश देता है और न मानने पर दंड की धमकी देता है। किंतु कालिदास उसे ही मृगशावक का अपराधी ठहराकर सौंपने से इंकार कर देता है। दोनों के बीच वार्तालाप होता है -

         "दन्तुल : तो राजपुरुष के अपराध का निर्णय ग्रामवासी करेंगे! ग्रामीण युवक, अपराध और न्याय का शब्दार्थ भी जानते हो! 

       कालिदास: शब्द और अर्थ राजपुरुषों की सम्पत्ति है, जानकर आश्चर्य हुआ।" 

       इसी के साथ एक बार फिर मेरी निगाह आसमान की ओर उठी चाँद में अभी चमक बाकी था, इसी नाटक में मल्लिका एक जगह कह रही है -

       "एक दोष गुणों में उसी तरह छिप जाता है जैसे चाँद की किरणों में कलंक ; परन्तु दारिद्र्य नहीं छिपता।" 

        बस फिर क्या था मेरे अंदर का राजपुरुष हँस पड़ा, मन में आया कि उस आदमी के पास पहुँचकर उसे समझा ही दें कि - राजपुरुष जो कहें वही सही होता है, इसलिए मैं जो कहूँ मान लो, मैं तुमसे कहना चाहता हूं -

       “यार तुम्हारी यह कवायद व्यर्थ है, तुम्हारे फिट होने से इंडिया नहीं फिट होने वाला! क्योंकि यह फिट-उट होना बड़े लोगों और उनके ही बस की बातें हैं। देखो, दारिद्र्य नहीं छिपता! इसलिए तुम्हारी यह दौड़ा-भागी इंडिया को अनफिट होने की श्रेणी में डाल देगा…

        तुमको लोग फिट कहें इसके लिए जरूरी है कि पहले मैं फिट हो लूं जिससे इंडिया मतलब अपना देश फिट हो ले, फिर इंडिया के फिट होते ही आटोमेटिक सब फिट मान लिए जाएंगे; जैसे कि तुम भी! इसलिए पीछे हटो मुझे आगे जाने दो। तुम केवल अपनी रोजमर्रा की चीजों जैसे दाल-रोटी पर ही ध्यान लगाओ। यही देश हित में है! समझे न?”

         यह समझाने मैं उसके पीछे लगभग भागा। 

         लेकिन उस तक मैं पहुँचता कि पाथ-वे से उतर वह स्टेडियम से बाहर निकल गया। जैसे मेरे सामने का कोई अवरोध हट गया हो। मैं स्टेडियम का दूसरा चक्कर लगाने लगा।

       खैर आज की टहलाई पूरी कर अपने आवास लौट आया। यहाँ लान की हरी-हरी दूब पर निगाह पड़ी। दूब की कोमलता देख मुझे "अषाढ़ का एक दिन" नाटक की एक और पंक्ति याद आई - 

     "जीवन एक भावना है! कोमल भावना! बहुत-बहुत कोमल भावना!!"  

      कहते हैं कोमल भावनाएं व्यक्ति को ईर्ष्या-द्वेष, लोभ-लालच वश दुर्नीति बनाने से रोकता है। इस विचार से तो मैं डर ही गया कि कहीं इस भावना के प्रभाव में हम फिट होना ही न छोड़ दें!! क्योंकि फिट होने के लिए कोमल नहीं कठोर भावना की जरूरत पड़ती है! 

         इसी समय मोबाइल बजा। पत्नी का फोन था। वे बोलीं - 

        वह जो कामवाली है न, उसका पति जो राजमिस्त्री है उसको सुबह-सुबह पुलिस पकड़ के ले ग‌ई।

         मैंने उत्सुकतावश पूछा - क्यों? 

         पत्नी - अरे कुछ नहीं, दस-बारह लाख की कोई जमीन लिया था, ब्रोकर ने ही पुलिस से पकड़वाया है।

          मुझे थोड़ा अचंभा हुआ कि राजमिस्त्री ने कहीं कोई घोटाला तो नहीं किया, लगता तो बहुत सीधा और आम आदमी जैसा है, ऐसा फरेब तो वह नहीं कर पाएगा। 

         मैंने पूछा - तो कुछ गड़बड़ किया था क्या?

         पत्नी - अरे नहीं, ऐसा कुछ नहीं, पहले इस जमीन के लिए उसकी ब्रोकर से बात हुई, लेकिन फिर सीधे मालिक से सौदा कर लिया। थोड़ा सस्ता पड़ा तो बेचारे ने एक-एक पैसा जोड़कर इसे खरीद लिया! बेचारी कामवाली भी बड़ी दु:खी थी। फोन पर बता करके कहा - दीदी आज काम पर आने का मन नहीं है।

          मैंने - ब्रोकर ने उसे पुलिस से क्यों पकड़वाया?

          पत्नी बोलीं - अरे वही, ब्रोकर को नुक़सान हो गया उसका कमीशन मारा गया, इस बात से वह नाराज था, ऐसे लोग तो पहुँचवाले होते ही हैं. थाने में बेचारे को धमकाया और मारा-पीटा भी गया..! 

        पत्नी की बात सुनकर मैं साइलेंट हो गया.. मेरी चुप्पी पर वे बोलीं -

         पत्नी - “सरकार-वरकार इस अन्याय पर कुछ करती क्यों नहीं?

           मैं - अरे भई, सरकारें हर जगह दुरबीन-उरबीन लेकर तो बैठी नहीं रहतीं कि कहाँ क्या हो रहा है, नजर में आ जाए!

           पत्नी बेचारी चुप और अब मैं भी चुप। इस चुप्पी के बीच ही बातों का सिलसिला टूट गया।

        वह राजमिस्त्री बिलकुल वैसा ही है जैसे आज स्टेडियम के पाथ-वे पर मेरे आगे-आगे चल रहा वह आम आदमी! 

       तो इस फिट-उट वाली बात पर एक बात और - 

        राजपुरुष बड़े कठोर होते हैं, कठोर फ्रेम से जुड़े भी रहते हैं! यही इनकी फिटनेस का राज है!! जैसे राजमिस्त्री को फिट किया गया, वैसे ही ये देश को भी फिट करते रहते हैं!!!

#चलते-चलते 

       फिटनेस का रहस्य हमारी कोमलता में नहीं हमारी कठोरता में छिपा है…

#सुबहचर्या  

1.06.18

रविवार, 12 अप्रैल 2026

नमस्ते

                                 1

         सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर ढक्कन सीमेंट से जाम था। पिछले दस मिनट से वह छेनी और हथौड़े की मदद से इसे मेनहोल से हटाने में जुटा था। ढक्कन के कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे छेनी टिकाता और इसपर हथौड़े से चोट मारता। लेकिन ढक्कन था कि टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा‌ था। पास में खड़ा ठेकेदार रमेसर चुपचाप उसके काम की निगरानी कर रहा था। 

          अचानक रमेसर के 'इस किनारे छेनी लगाओ’ कहने पर उसने दरार पर छेनी टिकाकर एक जोरदार हथौड़ा चला दिया। 

          छेनी छिटककर दूर दूब वाली घास में जा गिरी, इस झटके में उसकी कमीज की जेब से दो सिक्के भी घास में जा गिरे। 

           छेनीवाले को झुककर घास टटोलते देख उन्होंने पूछा, 'छेनी नहीं मिल रही क्या?' लेकिन उसकी बजाय रमेसर बोला उठा, “छेनी तो बड़ी चीज है वह मिल गई है, ये अपना सिक्का खोज रहे हैं।” 

         रमेसर के दो साथी भी चुपचाप खड़े यह देख रहे थे, उसकी मदद के लिए आगे नहीं आए। उनकी ओर देखकर ‘वे’ ने कहा, “इसके मेहनत के सिक्के होंगे, खोजना ही चाहिए।"

        सिक्के मिलते ही छेनीवाला काम में जुट गया। रमेसर ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा, ‘बड़का दिमाग है इसके पास।’ इस मुस्कान में कुछ ऐसा था कि ‘वे’ को लगा, यह ‘बड़का दिमाग’ रमेसर के लिए मुफीद तो है ही, स्वयं छेनीवाले के लिए भी है। उनकी नजरें छेनीवाले पर गड़ गई।

         मोटे कपड़े का मटमैली कमीज, ऊपर धूसर-सी फटी सदरी, ढीली-ढाली पैंट, जैसे इन कपड़ों ने महीनों से पानी न देखा हो। पैरों में चप्पल नहीं, सिर पर घने उलझे बाल, जिन्हें शायद ही कभी कंघी ने छुआ हो। 

          लेकिन काम में उसकी तल्लीनता देख ‘वे’ उसके इस हुलिए से उसके मिजाज का अंदाजा नहीं लगा सके। रमेसर से कुछ पूछने को हुए, लेकिन वह भी छेनीवाले के काम पर ध्यान लगाए था।  

          छेनी पर पड़ते हथौड़े की चोट से ढक्कन हिल उठता। इसे ढीला हुआ सोचकर, रमेसर ट्रैक्टर के टूल बॉक्स से रम्मा निकाल लाया। लेकिन इसका एक सिरा अभी भी मेनहोल से जाम था। उसने इस सिरे पर और छेनी चलाने के लिए कहा।

         कुछ देर बाद ढक्कन चारों ओर से ढीला पड़ता दिखा, तो रमेसर ने छेनी रुकवा दी। फिर रम्मा अड़ाकर ढक्कन का एक सिरा उठाया और छेनीवाले से बोला, “अब इसे मेनहोल से हटा दो।” 

          ‘वे’ को अचरज हुआ कि पास में ही खड़े अपने अन्य दो साथियों से रमेसर ने ढक्कन हटाने के लिए क्यों नहीं कहा! 

           आखिर छेनीवाले ने ही ढक्कन दूसरी ओर उलट दिया। पूरा मेनहोल खुल गया। इसमें झांककर रमेसर ने कहा,

         'अरे! कीचड़ तो कम है, पानी ज्यादा है।’

        "तो सेप्टिक-टैंक में जमा मल ही रमेसर की व्यावसायिक भाषा में 'कीचड़' है!" 'वे' के लिए यह न‌ई बात थी।

         उत्सुकतावश उन्होंने भी मेनहोल में झाँका, तली पर जमा मल सचमुच कीचड़ जैसा ही दिखाई पड़ा।

         इसी समय छेनीवाला टैंकर का सक्शन-पाइप मेनहोल की ओर खींचकर ले आ रहा था। जबकि दूसरा साथी वैक्यूम पंखा चलाने के लिए ट्रैक्टर स्टार्ट करने लगा।      

          रमेसर ने बढ़कर पाइप अपने हाथ में लेकर इसे सेप्टिक-टैंक में उतारा। उधर वैक्यूम फैन चालू होते ही पाइप से पानी सुड़कना शुरू हो गया। 

        अब तक सांझ भी स्याह हो चली थी। बल्ब की रोशनी में रमेसर का चेहरा साफ पढ़ा जा सकता था। वह मेनहोल पर झुका था। उसकी शांत और गंभीर मुखाकृति देखकर ‘वे’ ने सोचा -

          'चार लोगों की टीम में छेनीवाले के अलावा एक रमेसर ही है जिसने सक्शन-पाइप छुआ! वह टीम लीडर भी है, पाइप किसी को भी पकड़ा सकता है, पर हो सकता है दूसरे लोग इसे छूने से कतराते हों।'

                             2

       इधर इस कीचड़ को देखते हुए रमेसर के सामने सेप्टिक-टैंक का मेनहोल नहीं, जैसे स्मृतियों की सुरंग खुल गई हो! 

         "दद्दा की बाल्टी में यह ‘कीचड़’ कुछ और ही रंग में होता। वे रोज़ सुबह नौ बजे बाल्टी, झाड़ू और टिन लेकर ब्लॉक की कॉलोनी निकल पड़ते। एक दिन जिद करके मैं भी उनके साथ हो लिया। मेरा साथ चलना दद्दा को अखर रहा था; उन्होंने मुझे पुचकारकर रोकना भी चाहा, पर मैं नहीं माना। तब मेरी उम्र कोई चार–पाँच साल रही होगी।"

      ...उस दिन दद्दा पहले एक बड़े क्वार्टर के पीछे की ओर गए। वहां नींव के ऊपर दीवाल पर लोहे का एक ढक्कन लटक रहा था। दद्दा ने इसे उठाया। यहां आले जैसा एक चौकोर गड्ढा था। उसमें यही 'कीचड़' पीले रंग के ढेर में जमा था। 

          ....दद्दा ने मुड़े टिन से उस पीले मैले के ढेर को बाल्टी में भर लिया फिर आले को झाड़ू से साफ भी किया। यह मुझे बहुत अजीब लगा, लेकिन दद्दा एक-एक कर सभी क्वार्टरों पर जाते ग‌ए। धीरे-धीरे उनकी बाल्टी उसी पीले मैले से भर गई, जिसे दूर झाड़ियों में जाकर खाली कर आए थे।

           ....इस काम के दरमियान न दद्दा बोले, न मैंने कुछ पूछा; बस चुपचाप उन्हें यह काम करते देखता रहा। लेकिन बाल्टी खाली करके लौटे तो एक पल के लिए दद्दा ने मुझे घूरा। आज भी याद है, दद्दा की उन आँखों में जैसे नाराजगी थी। मुझे लेकर वे सीधे हैंडपंप पर आए। अपने सभी सामान धोए फिर नहाए और मुझे भी नहलाए। फिर मैं कभी दद्दा के साथ कॉलोनी की ओर नहीं गया।"

         इसके काफी दिन बाद मैंने दद्दा से कहा भी था, 

        “दद्दा मुझे घिन आती है, मत करो यह काम।” 

       “इसमें क्या घिनाना! यह तो हमारा कर है यही रोजी है” दद्दा ने यही बोलकर तब मुझे चुप करा दिया था।

            रोजी तो मैंने भी सीवर में कूदने वाला ही चुना था बल्कि इसके लिए सीवर के काले गंधाते पानी वाले नाले में झम्म से कूदा भी, जो नहीं कूदे वे सब ऊँच-नीच वाले थे… केवल मुझे ही यह नौकरी मिली जैसे कि इस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो!

          ख्यालों की डोर टूटी। “अब यही अपना काम..अपनी मशीन और अपना धंधा..“ इस भाव से रमेसर ने अपने ट्रैक्टर-टैंकर की ओर ऐसे देखा जैसे दद्दा की ‘रोजी’ से अपनी ‘रोजी’ की तुलना कर रहा हो! 

             पास में खड़े ‘वे’ कुछ जाने-पहचाने लगे तो चालीस वर्ष पुरानी धुँधली-सी अपनी स्मृति में उतर गया-

         “तब ये घर कच्चे होते, दद्दा इन घरों में त्योहारी लेने आते। कभी-कभी उनके साथ मैं भी होता। शायद ‘वे’ को तभी देखा हो। आज यहां इनके बराबर खड़ा मैं इनसे सौदेबाजी कर रहा हूँ तो अपने इसी खुद के ‘रोजी’ के बल पर…!”

            अगर अम्मा जबर्दस्ती स्कूल न भेजतीं तो आज मैं यहां इस तरह खड़ा न होता। वह यही तो कहतीं थीं कि 'तुम्हारे दद्दा और पप्पा तो करिया अक्षर हैं, तभी वे मैला ढोते हैं, मुला तुम खूब पढ़ना।

            मेरा स्कूल और घर, एक ब्लॉक के कैंपस में था।

        बीडीओ ऑफिस के पीछे एक छोटी सी कोठरी ही मेरा घर था और वह भी जर्जर। उसके सामने टटिया खड़ी कर दद्दा ने घेर बना लिया था, इसी में उनकी झोपड़ी थी। जिसमें वे अपनी गैया के साथ रहते थे।

        त्योहारों की छुट्टियों में यहां सन्नाटा पसर जाता। तब मेरे भी घर चलने की जिद्द पर अम्मा कहतीं, यही हमारा घर है।      

        लेकिन कक्षा पांच में जाकर पता चला कि आजादी के बाद पहले यह विकास खंड बना, फिर स्कूल, तो मैं चौंक पड़ा था‌। 

           उस दिन कक्षा में पीछे, सबसे अलग-थलग बैठा मैं, अचानक पंडी जी से पूछ बैठा था - 

           ‘तब मेरा घर भी यहाँ नहीं था न?’ 

        इस पर कक्षा में सब हँसे थे, जैसे कोई ऊल-जलूल बात कहा हो मैंने। पंडी जी भी मुझे घूरने लगे तो मैं सहम गया था। वे फिर यही बोले थे,

          “हाँ यहां नहीं था।”

         आज सोचता हूं, वह सवाल कैसे पूछ लिया था! तब हमारी जाति में जन्मे बच्चे परली बात सोच ही नहीं सकते थे! जो है, उसे ही सच मानकर जीना सिखा दिया जाता था। 

          घर को लेकर मन में उत्कंठा थी। स्कूल से लौटने के बाद दद्दा को देख मैं उनकी ओर लपका कि चलकर पूछूं। पर उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक गया। 

        दद्दा यह काम सुबह ही निपटा लेते हैं, सोचकर चुपचाप लौटकर हैंडपंप के पास आ खड़ा हुआ। 

          दद्दा भी वहीं आए। सारा सामान नल के नीचे रख दिया। मैं हैंडपंप चलाने लगा। वे एक-एक करके उन्हें धोने लगे थे। मैंने उनके चेहरे पर बेचारगी भरी मायूसी देखा। वे किसी कारण सुबह यह काम नहीं कर पाए थे, इसके लिए साहब ने उन्हें तिरस्कृत कर डांटा था। 

          दद्दा ने ही बताया था कि वे तब तेरह-चौदह साल के थे जब अपने बप्पा बद्दन के साथ सीमा पार करके आए थे। वहाँ उन्हें नाली-सीवर से छुटकारा नहीं मिला, उल्टे रस्मोरिवाज निभाना भी मुश्किल था। लेकिन यहां भी वही काम उनका इंतजार कर रहा था।

           चार बरस दिल्ली में रहने के बाद यह ब्लाक बना तो यहां आ ग‌ए।

         फिर दद्दा ने कोठरी की ओर इशारा करके इतना कहा था - 

           'तबसे यही हमारा घर है।’

          टैंक से उठती 'सुड़-सुड़' की आवाज ने ख्यालों की परत हटा दिया। रमेसर ने देखा, टैंक में पाइप के मुहाने के नीचे पानी उतर रहा है।

       रमेसर ने ‘वे’ को मेनहोल में झाँकने का इशारा करके बोला, “टैंक में पानी चार फीट उतर चुका है। एक टैंकर फुल हो गया दूसरा चक्कर भी होगा..दो टैंकर सीवर था इसमें।” विश्वास दिलाने के लिए 'वे' को टैंकर का पारदर्शी संकेतक भी दिखाया।  

        इशारा पाकर छेनीवाले ने टैंकर का नोजल बंद किया और रमेसर ने सेप्टिक-टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाला। वह टैंकर खाली करने पास के खेत की ओर बढ़ा ही था कि 'वे' ने टोक दिया कि "इसमें मत गिराना, खेत मालिक नाराज होंगे।" 

          रमेसर को बचपन की वह बात याद आई, जब दद्दा से उसने पूछा था, 

         “दद्दा, वहाँ तो सब लड़िकन खेलने जाते हैं…बाल्टी वहाँ क्यों खाली किए? जानते हैं, हमारी गेंद भी वहीं चली गई थी, विज्जू गेंद लेने गया तो उसका पैर छपाक से उसमें पड़ गया, इसे वहाँ न डाला करिए‌।”  

           वे पल भर ठहरकर बोले थे -

         “बचवा, कहां गिराऊँ? यहाँ तो कोई जगह भी नहीं। एक बार उस खेत के कोने में बाल्टी उलट दी थी तो खेत-मालिक ने जी भर के गरियाया था।" 

           यह सुनते ही मेरा रोयां-रोयां सुलग उठा था.. फिर उनकी ओर देखा था। 

          उनके बूढ़ाते शरीर पर पीढ़ियों की बेइज्जती का बोझ साफ झलकता था। जैसे उनका मन हर बात से उचट गया हो, उन्हें देखकर लगा जैसे वे कहना चाह रहे थे - "जिंदगी ने सब सहना सिखा दिया है।"

          इसे याद करते ही रमेसर की मुट्ठियां भिंच ग‌ईं। मन में गुस्से से भरी एक टीस उभरी..

        "हूँ... खेत मालिक नाराज होंगे!" बुदबुदाकर मन में उठे गुस्से को जज्ब किया। फिर कठोर स्वर में यह बोलकर कि - 'खेत के लिए यह खाद ही तो होता' टैंकर लेकर अँधेरे में दूसरी दिशा में बढ़ गया।

                              3      

       सीवर गिराकर टैंकर लौटा तो इसके नोजल में छेनीवाले ने सक्शन-पाइप फिर जोड़ दिया। रमेसर ने पाइप को हाथ में लेकर मेनहोल में झाँका। बल्ब की रोशनी उसमें नहीं पहुँच रही थी। फिर मोबाइल फोन का टार्च ऑन करके देखा। भीतर 'सीवर' का गाढ़ापन उभर आया।

        ऐसे ही गाढ़े सीवर में पप्पा बेहिचक उतर जाया करते थे! यह स्मरण होते ही रमेसर की आँखें सजल हो आईं।      

         सक्शन-पाइप हाथ में लेते ही भीतर कहीं कुछ चुभ उठता है, पप्पा सामने आ खड़े होते हैं! 

        फ़िर वह पाइप तब तक नहीं छोड़ता, जब-तक ‘कीचड़’ पूरी तरह बाहर न आ जाए। 

         उस क्षण पाइप पर हाथ की पकड़ और भी कस उठती है- मानो वह पप्पा की अधूरी लड़ाई पूरी कर रहा हो।

         उस जमाने में यह मशीन नहीं थी। वे खुद सेप्टिक टैंक में उतरते। यह गाढ़ा ‘कीचड़’ बाल्टियों में भर-भरकर बाहर निकालते। उनका पूरा शरीर उस कीचड़ में लथपथ हो जाता।

          पप्पा यह नौकरी नहीं करना चाहते थे, पर दद्दा इसे पुश्तैनी काम मानते। इससे पप्पा चिढ़ते, बेचैन हो उठते और घुटते। शहर में दिहाड़ी की तलाश में निकल जाते, पर वहां भी न टिकते; वापस आकर घर पर ही चुपचाप पड़े रहते। 

           एक बार अम्मा से पप्पा को कहते सुना था - 

         “क्या कीचड़ में लिथड़ी इस पुश्तैनी जाति को उतारकर हम फेंक नहीं सकते?” 

          पप्पा के इस बात का अर्थ मुझे बाद में समझ में आया कि जाति आदमी का भविष्य भी लिख देती है! वे मजदूर भी नहीं बन पा रहे थे। पुश्तैनी पेशा आड़े आ जाता।

          एक दिन दद्दा गाँव से त्योहारी लेकर लौटे थे। उनकी गठरी में ढेर सारी पूरियां-कचौरियां और खाने की चीजें देखकर पप्पा गुस्से में बोले थे - 

         'यह भिखमंग‌ई ठीक नहीं बाबा, इससे अच्छा तो फिर मैला ढोने का काम है.. कम से कम इसमें कुछ करके तो कमाना है।' 

           मैंने देखा था… दद्दा गाँव के ‘बड़े’ घरों की देहरी पर बारी-बारी जाकर खड़े होते; भीतर से कोई निकलता और दूरी बनाकर उनकी चादर में ऊपर से ही त्योहारी डाल देता। लोग उनकी चादर छूने से भी कतराते।

              पप्पा की बात पर दद्दा ने ऐतराज नहीं जताया। लेकिन बोले थे -

       “देख दिन्ने, यह भिखमंगाई नहीं, इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना होता है। यदि दिखाई न पड़ूं तो लोग पूँछने लगते हैं.. दिन्ने! एक बात और! गाँव के लोग शादी-ब्याह पर मुझे नेग-चार देना नहीं भूलते!” 

        दद्दा और पप्पा, दोनों की बातें दो छोर की होती। इनके बीच मैं एक अजीब द्वन्द्व में फंस जाता।

        एक दिन निठल्लेपन से ऊबकर पप्पा स्वीपर बनने शहर चले ग‌ए। एक सफाई ठेकेदार ने उन्हें अपनी टीम में रख लिया।”

          सीवर में उतरने का अपना अनुभव पप्पा कुछ ऐसा ही अम्मा को बताते - 

          “जब सीवर में घुसता हूँ तो तिलचट्टों से घिर जाता हूँ ये मेरे शरीर पर दौड़ने लगते हैं!” 

            शायद स्वप्न में भी ये तिलचट्टे उन्हें अपने शरीर पर रेंगते दिखाई पड़ते इसीलिए कभी-कभी रात में सोते से अचानक उठकर वे अपना शरीर झाड़ने लगते!! 

           यही नहीं वे बार-बार अपना हाथ धोते, टोकने पर अम्मा से कहते - 

           “क्या करूँ..मेरे हाथों में जैसे मैले की बदबू आती रहती है, इसीलिए बार-बार हाथ धोना पड़ता है!”

        उन दिनों डाक्टर ने उन्हें सीवर में उतरने से मना किया था। लेकिन “आज एक बड़े सेप्टिक टैंक की सफाई होना है, न जाने पर ठेकेदार नाराज होगा” कहकर वे सुबह-सुबह शहर चले ग‌ए थे। 

          उस दिन पप्पा नहीं, उनका शरीर लौटकर घर आया। मैं स्कूल से लौट रहा था। घेर के सामने कुछ लोग खड़े थे। सबके चेहरों पर एक अजीब-सी खामोशी थी। मुझे अनहोनी की आशंका हुई। घबड़ाहट में भागते हुए मैं घेर में पहुँचा। वहां पप्पा जमीन पर लेटे थे और अम्मा उनके सिरहाने बैठी थीं..

          कुछ समझता कि दद्दा ने मुझे कसकर अपने अँकवार में भर लिया, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। उधर अम्मा की रुलाई फूट पड़ी थी।

         कहते हैं कि सेप्टिक-टैंक में उतरते ही पप्पा बेहोश हो ग‌ए थे। कुछ देर बाद जब अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्हें देखने एक साथी उतरा.. वे भी वहीं बेहोश हो ग‌ए। 

        ऊपर खड़े लोग शोर मचाते रहे.. लेकिन ठेकेदार वहां से खिसक लिया था। 

       जैसे-तैसे दोनों को बाहर निकालकर अस्पताल ले जाया गया। 

          पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

        दद्दा और अम्मा थाना-कचहरी खूब दौड़े… पर न मुआवजा मिला, न किसी पर दोष आया।

       ....घेर का दृश्य देख मैं जड़वत खड़ा रह गया। अम्मा का रोना और दद्दा के आँसू, सब देखता रहा। पप्पा के पहने हुए कपड़े सीवर के कीचड़ में सने उनके निर्जीव शरीर से अब भी चिपके थे। मेरी आँखें डबडबा आईं, पर मैंने उन्हें बाँह से पोंछ लिया। रोया नहीं।

                               4

          इस गाढ़े कीचड़ का सुड़कना अब मुश्किल है, सोचकर उसने ‘वे’ से एक बाँस मंगाया।

          रमेसर ने बाँस हाथ में लिया। उसने छेनीवाले को पंप चालू करने का इशारा किया और पाइप मेनहोल पर टिका दिया। पंप चालू होते ही पानी टैंक में गिरने लगा। 

          रमेसर ने बांस से टैंक के भीतर जमे हुए गाढ़े कीचड़ को हिलाना शुरू कर दिया। ताकि पानी में घुलकर यह आसानी से खिंच सके।

         तभी सक्शन-पाइप के मुहाने के पास कपड़ेनुमा कोई चीज दिखाई पड़ी। वह पाइप में न फँसे, इसलिए रमेसर ने उसे बाँस से दूर हटा दिया। छेनीवाले ने उसके हाथ से बाँस ले लिया और उसके सहारे उस कपड़े को बाहर निकाल दिया। 

         छेनीवाले के हाथ और पैर सीवर की कीचड़ में सने थे। यह देखकर ‘वे’ ने रमेसर से कहा, “यह छेनीवाला तो बहुत कामकाजी है?

         कुछ पल सोचने के बाद स्थिर और संयत आवाज में रमेसर बोला, 

          देखिए, यह काम और जाति, एक ही रस्सी में बँधे हैं। शुरू में ट्रैक्टर चलाने के लिए कोई ड्राइवर तक न मिलता। एक लड़का मिला भी, पर पाइप न छूने की शर्त पर!

          ऐसे में, पाइप को जोड़ने से लेकर सेप्टिक-टैंक में उतारने और काम के बाद उसे धो-पोंछकर समेटने तक, सारा काम मुझे ही करना पड़ता। 

           फिर वह छेनीवाले की ओर देखकर मुस्कुराते हुए बोला-

           "यदि यह न मिलाता तो सेप्टिक-टैंक सफाई वाला मेरा यह धंधा परवान न चढ़ता… पहली नजर में मुझे यह पागल ही लगा था। 

         गाँव की बस्ती से दूर सीवान में एक कमरे की, झोपड़ीनुमा इसकी कोठरी देख, मैंने केवल यही पूँछा था इससे- 

            "यहाँ बस्ती से दूर अकेले में घर क्यों बनाया?" 

             यह छूटते ही बोला था - 

         “मेरी कोई जाति नहीं इसलिए... और खुशी-खुशी मेरे साथ काम करने के लिए तैयार हो गया था।

         पहले ही दिन छेनी-हथौड़ी पकड़ाकर इससे मेनहोल का ढक्कन खुलवाया था। बिना झिझके इसने वे सारे काम किए जिसे आज यहाँ कर रहा है। 

          काम समाप्त करके हम लोग चलने को हुए तो इसने बख्शीश मांगा। तभी इसके बड़के दिमाग के बारे में मुझे पता चला। यह बख्शीश मांगने वाली बात कभी मेरे मन में आया ही नहीं। पैसे की बात पर यह बहुत चैतन्य हो जाता है। उसी दिन से यह 'छेनीवाला' बन गया। 

            बात पूरी होते ही रमेसर ने 'वे' से कहा - 

        "यह छेनीवाला न, आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है, इसीलिए इसे आदमियों की बस्ती से दूर घर बनाकर रहना पड़ता है!" 

                                       5     

         रमेसर के मुँह से छेनीवाले के लिए गूढ़ बात सुनकर ‘वे’ ने उसे गौर से देखा, जैसे उसके जीवन की कहानी जानना चाहते हों-

         वही बिखरे बाल और ढीले-ढाले कपड़े… चेहरे पर एक अजीब-सी निस्पृहता…!  

          अचानक रमेसर बोला, 

          “मैं इसकी दुखती रग को ज्यादा कुरेदता तो नहीं हूं.. पर लोगों से सुनी-सुनाई बात है…”

        पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटा था.. माँ-बाप के अतिशय लाड़-प्यार के तरीके ने इसे बिगाड़ दिया.. स्कूल-उस्कूल का मुँह नहीं देखा। दिमाग का खुलना बाकी रह गया…

       छेनीवाला बाँस हिला-हिलाकर सेप्टिक-टैंक में कीचड़ घोलने में जुटा था। उसकी ओर देखकर रमेसर ने फिर कहा, 

        “लोग ‘बऊक’ समझकर इसकी हँसी उड़ाते; विवाह भी न हो सका। माँ-बाप भी दुनियां से कूच कर गए.. फिर अपने ही घर में पराया हो गया.. उपेक्षित-सा.. भाइयों ने इसके हिस्से की जमीन भी अपने नाम करा लिया।”

          तभी टैंक से सर्र-सर्र की आवाज आई। छेनीवाले ने बाँस एक ओर रखा और पाइप का मुहाना तली तक ले जाकर उसे इधर-उधर चलाने लगा। रमेसर भी उसके पास चला आया। 

         अब दोनों बारी-बारी एक-दूसरे से पाइप अपने हाथ में लेते और टैंक में बचा-खुचा सीवर सुड़कवाने लगे!

          ‘वे’ ने देखा,

         छेनीवाला बिना झिझक पाइप के कीचड़ से सने हिस्से पर हाथ लगा देता; वहीं रमेसर इसे ऊपर से ही पकड़ता, मानो कीचड़ से बचना चाहता हो। फिर भी दोनों का तालमेल ऐसा था, जैसे एक ही देह के दो हाथ हों। 

          रमेसर ने छेनीवाले को कुछ समझाकर पाइप उसके हाथ में थमाया और फिर 'वे' की ओर मुखातिब हुआ -  

         “फिर एक दिन यह कहीं चला गया.. किसी ने कोई खोज-खबर नहीं ली… और जब वर्षों बाद लौटा तो एक कूबड़ वाली स्त्री को साथ लेकर…”

        इधर छेनीवाला टैंक से पाइप बाहर निकालने लगा। लेकिन वह अपने काम में ऐसे मगन था जैसे उसकी नहीं, किसी और की बात चल रही हो..

       ..अपने ही घर के दरवाजे नहीं खुले इसके लिए.. लोग हँसते..क‌ई दिन गाँव में भटका… जाति निकाला दे दिया इसको.. गाँव के बाहर जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा मिला.. जिसमें कोठरी बनाया.. उस स्त्री के साथ वहां रहने लगा….

          थोड़ी देर की चुप्पी के बाद रमेसर ही बोला,

        “लेकिन जैसा इसे देख रहे हैं न, यही बात इसके लिए ढाल बन गया.. इसे टूटने नहीं दिया… अच्छा ही है कि यह आदमियों की बस्ती में नहीं रहता।" 

      यह कहकर रमेसर अचानक चुप हो गया। ‘वे’ कहीं छेनीवाले की जाति न पूछ बैठें, इस आशंका में बात को मोड़ते हुए बोला, 

         "बात यह कि बस्ती में रहता तो आदमियों के बहकावे में आ जाता...सौदेबाजी सीख जाता।" 

         उधर छेनीवाला टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाल चुका था। इसे एक किनारे रखकर धो रहा था।

       'वे' ने मेनहोल में झुककर देखा, गाढ़ा कीचड़ पानी में घुलकर लगभग खिंच चुका था; तली में बचा पानी पाइप की पकड़ में अब नहीं आने वाला था। 

          फिर उनका ध्यान रमेसर के दोनों साथियों पर गया, 

         दोनों पूरे समय वहीं मौजूद रहे, लेकिन न तो उन्होंने पाइप को हाथ लगाया, न ही इसे धोने में छेनीवाले की मदद की। 

           उनके मन में प्रश्न उभरा,

         यहां काम की या फिर जाति की, क्या कोई एक अदृश्य रेखा है जो उन्हें एक-दूसरे से अलग किए हुए है? 

        उनकी नजरें रमेसर पर ठहर गई- मानो इन बातों का मर्म टटोल रही हों।  

        छेनीवाले पर बात थम गई थी। रमेसर मन ही मन बुदबुदाया -

         “यह कितना अजीब है..छेनीवाले की जाति जानकर लोग उसके साथ सहज हो जाते हैं और एक हम हैं, हमारे लिए वही पुराना भाव, चाहे यह दबा हुआ ही हो, पर उभर तो आता ही है…हाँ…पप्पा! उस जमाने में कितना झेले होंगे….”  

                              6

         अचानक रमेसर ने ‘वे’ को एक तरफ चलने के लिए कहा। वह उन्हें एक अँधेरे कोने में ले गया। वहां जमीन की ओर इशारा करके उन्हें कुछ दिखाते हुए धीरे से बोला, 

         "देखिए, इसे मैंने यहाँ एक किनारे रखवा दिया है। सोचा, आपको बता दूँ, नहीं तो अनजाने में कोई इसे हाथ लगा देता। सुबह किसी से कहकर इसे फिंकवा दीजिएगा।”

       ‘अरे! यह तो वही कपड़ा है...सेप्टिक-टैक से निकला, सीवर में लिथड़ा हुआ...तो इसे यहाँ रखवाया था रमेसर ने! छेनीवाले से इसे कहीं दूर भी तो फेंकवा सकता था!’ 

          उस कपड़े को लेकर रमेसर का यह वर्ताव ‘वे’ को कुछ विचित्र लगा। वे उस कपड़े को देखते हुए मौन रहे।

          रमेसर ने ‘वे’ को नजर भर देखा! वे अपने विचार में खोए हुए-से उसी कपड़े को देख रहे थे।  

          वह पोर्टिको की ओर चला गया जहां बाबू जी कुर्सी पर बैठे थे। उनसे काम का हिसाब किया। छेनीवाला भी अपने हाथ-पैर धोकर वहीं आया। उसे बख्शीश लेना था। यह उसे मिला, जो उसकी अपेक्षा से ज्यादा था। इससे रमेसर और वह, दोनों खुश हो ग‌ए थे।

         यकायक रमेसर ने छेनीवाले को सीवर में लिथड़े उस कपड़े को फेंक आने के लिए कहा। शायद यह प्रतिमूल्य था अतिरिक्त बक्शीश मिलने का और इसमें रमेसर की खुद्दारी भी छिपी थी। 

           ‘वे’ समझ चुके थे कि छेनीवाले के लिए रमेसर ने ‘बड़का दिमाग’ वाली बात यूँ ही नहीं कहा था। यह उस भाव की पहचान थी, जहाँ आदमी अपने मूल्य को जानता है। 

         और वह केवल अपना ही नहीं, उसके हिस्से की गरिमा की भी रक्षा कर रहा था। अन्यथा, उस सीवर में लिथड़े कपड़े को वह पहले भी उससे फिंकवा सकता था। लेकिन तब रमेसर का ठहर जाना उस अदृश्य हीनता के विरुद्ध एक छोटा-सा प्रतिरोध था, जो खुलकर नहीं… भीतर ही भीतर लड़ा जाता है। इसमें बदला नहीं बदलाव की बात थी।

           रमेसर काम समेटकर जाने को हुआ तो अचानक मुड़कर नमस्ते कर गया। ‘वे’ ने भी प्रत्युत्तर में नमस्ते कहा, पर उनके भीतर वही कपड़ा अब भी कहीं अटका हुआ था।

          अँधेरे में, ज़मीन पर पड़ा वह कपड़ा अब उन्हें मात्र एक परित्यक्त वस्तु नहीं लगा..वह जैसे एक अनकहा विचार बनकर उनकी आंखों में ठहर चुका था।

                                *******