यह अकथ-मन ! यहाँ प्रश्नों और उत्तरों की टकराहटों में एक सार्थक दुनियाँ तलाशनें की आकुलता है...
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शनिवार, 4 जुलाई 2026
सुबह, गुस्सा और पकौड़ियाँ
बुधवार, 1 जुलाई 2026
विश्वास-धर्म
जैसे ही गिलास खाली कर मेज पर रखा, उन्होंने सीख देने के अंदाज में कहा, "बिना गिलास में देखे इस तरह नहीं पीना चाहिए।
उनकी बात पर मैं कह उठा, "लेकिन जब कोई अपने हाथ से गिलास दे रहा हो, तो उस पर विश्वास करना ही चाहिए। मैंने गिलास में इसलिए नहीं झांका, क्योंकि विश्वास बहुत बड़ी चीज है!’ मेरी यह बात सुनकर मित्र निरुत्तर-से हो गए।
हाँ यहां वे कह सकते थे, "यदि गिलास थमाने वाले से ही कोई लापरवाही हो रही हो तो? इसलिए भी देखना चाहिए।'
खैर बातों का क्या, बातें तो बहुत हो सकती है, मुझे एक घटना याद आती है,
बरसात का मौसम ढलान पर था। उन दिनों रसोई में मिट्टी के चूल्हे पर उपलों और लकड़ियों से ही खाना बनता था और रोशनी के लिए मिट्टी के तेल की ढिबरी जलती थी।
मेरे दादा जी को चाय पीने की आदत थी। वे बखरी के बाहर दलान में रहते थे। उस दिन भी शाम ढल रही थी। रोज़ की तरह अम्मा ने मिट्टी के चूल्हे पर उनके लिए चाय बनाई। मैं गिलास में चाय लेकर दादा जी के पास गया। जैसे ही उन्होंने मेरे हाथ से गिलास लिया उनकी निगाह अचानक चाय पर पड़ी। चाय में एक मरा हुआ मेढक का बच्चा तैर रहा था। यह दृश्य देखकर मैं भी सिहर उठा।
बस, फिर क्या था! दादा जी अम्मा पर बुरी तरह नाराज़ हो उठे। घर के बाकी लोगों ने काफी देर तक उनका मान-मनौव्वल किया और उन्हें समझाया-बुझाया, तब कहीं जाकर उनका गुस्सा शांत हुआ। आखिरकार वे चाय पीने के लिए इस शर्त पर राजी हुए कि चाय उनके सामने बनाई जाएगी।
उन दिनों स्टोव का जमाना था। दालान में स्टोव, चायपत्ती, गुड़, दूध और बाकी सारा सामान लाकर रख दिया गया। दादा जी ने एक-एक चीज को बारीकी से देखकर तसल्ली कर ली, तब चाय बननी शुरू हुई।
लेकिन विडंबना देखिए, जब चाय छन्नी से छानकर गिलास में डाली जा रही थी, तभी छन्नी में एक नन्हा मेंढक दिखाई पड़ा। वह अभी-अभी टैडपोल से मेंढक बना था।
एक पल के लिए हम सब स्तब्ध रह गए। अब किसी को दोष भी कैसे देते? सारी सामग्री दादा जी की आँखों के सामने जाँची-परखी गई थी, फिर भी वह नन्हा मेंढक चाय तक पहुँच ही गया था।
उस समय मेरी उम्र इतनी नहीं थी कि इस घटना के पीछे छिपे निहितार्थ को समझ पाता। मेरे लिए वह बस एक अजीब और हैरान कर देने वाली घटना थी।
लेकिन आज, जब कभी यह प्रसंग याद आता है, तो लगता है कि जीवन की बहुत सी घटनाएँ किसी एक व्यक्ति के दोष से नहीं घटतीं। कई बार पूरी सावधानी बरतने के बाद भी ऐसी बातें हो जातीं हैं, जिनका कोई स्पष्ट दोषी नहीं होता। इसलिए किसी की अनजाने में हुई गलती पर अनावश्यक टंटा खड़ा कर देने से न तो समस्या का समाधान होता है और न ही मन को संतोष मिलता है। उल्टे जीवन में कड़वाहट ही घुलती है।
उस दिन छन्नी में मिला वह नन्हा मेंढक जैसे चुपचाप यही सिखा गया था कि हर घटना में दोषी तलाशना जरूरी नहीं होता; कभी-कभी उसे एक संयोग मानकर आगे बढ़ जाना ही अधिक समझदारी होती है।
आज सुबह टहलकर लौटा तो मन में एक ही बात बार-बार चकरघिन्नी की तरह घूमती रही—विश्वास।
सोचता हूँ, जब मनुष्य ने संगठित धर्मों की कल्पना भी नहीं की होगी, तब भी जीवन किसी न किसी आधार पर तो टिका होगा, शायद वह आधार विश्वास ही रहा होगा। यदि विश्वास न होता, तो न परिवार बनते, न समाज बनता और न ही मानव सभ्यता इतनी दूर तक पहुँच पाती।
यह विश्वास केवल मनुष्य तक ही सीमित नहीं है। किसी घोंसले में चोंच फैलाए बैठे चिड़िया के बच्चे भी यही विश्वास किए रहते हैं कि उनकी माँ लौटेगी और उन्हें दाना चुगाएगी। वे कोई प्रमाण नहीं मांगते, कोई तर्क नहीं करते; उनका जीवन विश्वास पर टिका होता है।
शायद इसी कारण मुझे लगता है कि 'विश्वास-धर्म' सबसे पुराना धर्म है। और आज के समय में, जब संदेह हमारे रिश्तों, व्यवहार और समाज में तेजी से बढ़ रहा है, तब यही धर्म सबसे अधिक बचाए जाने योग्य भी है। बाकी सारे धर्म तभी तक सार्थक हैं, जब तक उनके भीतर विश्वास जीवित है।
लेकिन आज लगता है मनुष्य का सबसे बड़ा संकट विश्वास का संकट है। हम सामने वाले को स्वीकार करने से पहले उसे अपने जैसा ही बनाना चाहते हैं। बस यहीं से विश्वासघात की आशंका जन्म लेती है और विश्वासघात की प्रवृत्ति भी।
इन्हीं बातों के बीच सोचता हूँ आज मित्र ने जो गिलास मेरी ओर बढ़ाया था, उसमें मेरे झाँककर न देखने का कारण यह नहीं था कि मैं लापरवाह था, बल्कि इसलिए कि वह गिलास किसी अपने के हाथ से दिया गया था। मुझे लगा, विश्वास का अर्थ ही यही है कि हर बार प्रमाण की माँग न की जाए।
हो सकता है, व्यवहारिक दृष्टि से मेरा ऐसा करना सावधानी न माना जाए लेकिन मन की दृष्टि से उस क्षण मैंने 'विश्वास-धर्म' निभाया था। विश्वास में जोखिम हो सकता है, कभी-कभी धोखा भी मिल सकता है, फिर भी विश्वास के बिना न मित्रता टिकती है, न परिवार और न समाज। अंततः सभ्यता का सबसे मजबूत आधार नियम नहीं है, विश्वास ही है।
#चलते_चलते
मस्त रहिए, आप अपनी जगह सही रहेंगे, तो बहुत-सी चीजें अपने-आप ठीक हो जाती हैं।
#सुबहचर्या
(२४.१०.१९)
गुरुवार, 25 जून 2026
ऐ इंसां, ज़रा पागल होना भी सीख ले!
मैं जाग ही रहा था, लेकिन फोन मुझे जगाने के लिए आया था। थोड़ी देर बाद मैं मार्निंग वॉक के लिए निकल पड़ा। सड़क पर पहुँचते ही मैंने फोन करके उनको बताया कि मैं सड़क पर आ गया हूँ।
उधर से मुस्कुराहट में पगी आवाज सुनाई पड़ी, 'देखो, मैंने तुम्हें सड़क पर ला दिया।'
मैंने उस चौड़ी, शानदार सड़क पर दूर तक निगाह दौड़ाई और मुस्कुराते हुए कहा, सड़क पर आना कोई बुरी बात नहीं। सड़क तो वह रास्ता है, जो आदमी को उसकी मंजिल तक पहुँचाती है।”
मेरी इस बात के साथ ही दोनों ओर हल्की-सी हँसी बिखर गई और बातचीत समाप्त हो गई। तब-तक फोन करने वाले शख्स सड़क के किनारे खड़े हमारा इंतजार करते दिखाई पड़ गए थे। वहां से हम दोनों साथ-साथ सड़क पर चल पड़े।
तभी उनकी बैडमिंटन टीम के एक साथी खिलाड़ी मोटरसाइकिल से पीछे से आ पहुँचे। वे उनके साथ बैठना तो चाह रहे थे, पर संकोच कर रहे थे। मैंने ही उन्हें थोड़ा सा धक्का दिया कि बैठ जाइए। शायद उन्हें यह शंका थी कि कहीं मैं रास्ते से ही वापस न मुड़ जाऊँ, इसलिए मोटरसाइकिल पर बैठते हुए वे हँसकर बोले, ‘देखिए, आपको स्टेडियम तक आना है, लौटना नहीं है।’ खैर…
वैसे मेरे वे साथी स्टेडियम में पहुंचते हैं तो पहले नीम के एक पेड़ को गले लगाते हैं, उसके तने को छूते हैं। अभी कल वाली सुबह उन्होंने मुझसे भी ऐसा ही करने के लिए कहा था। मैं स्टेडियम में पहुँचा तो वे शायद इन्डोर बैडमिंटन कोर्ट में जा चुके थे। इधर मैं भी स्टेडियम के टहलने वाले ट्रैक की ओर चला गया। उस पर दो चक्कर लगाकर मैं वापस हो लिया।
मैं लौट रहा था। तभी एक व्यक्ति के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी। ध्यान से देखा तो यह आवाज मेरे आगे-आगे चल रहे एक पागल की थी। उसका यूँ बेवजह अजीब-सी आवाज में चिल्लाना, उसकी पागलों वाली अवस्था की अभिव्यक्ति थी।
फिर अचानक एक जगह उसे झुकते देख, मैंने सोचा शायद वह कोई ढेला उठाने के लिए झुका हो। लेकिन उसने वहाँ पड़ी एक मैली-कुचैली तौलिया उठा ली। उसे पास के मील-पत्थर पर बड़े करीने से रख दिया और उसके ऊपर एक छोटा सा पत्थर भी रख दिया।
मैंने सोचा, शायद तौलिया के ऊपर पत्थर उसने इसलिए रखा होगा कि हवा से वह न उड़ जाए। यह सब करने के बाद वह पूरी तरह निर्लिप्त भाव से वहां से आगे बढ़ गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे चल रहा था। तभी मैंने गौर किया कि वह चलते-चलते बीच-बीच में झुक जाता और सड़क पर पड़ी कोई न कोई चीज उठा लेता, कभी कोई ऐसा कंकड़, जो किसी के पैरों में गड़ सकता था, तो कभी कूड़े जैसी चीज। फिर वह उसे सड़क से दूर फेंक देता।
उस पागल के इन कृत्यों को देखकर मैंने सोचा, मानो सड़क पर चलते हुए वह अनजाने में ही राह को दूसरों के लिए थोड़ा और सुगम बनाता जा रहा हो।
आज लिखने का मन नहीं था, लेकिन उस "पागल" की वजह से लिखने बैठ गया, बस आज इतना ही।
#चलते_चलते
ऐ इंसां, तू किस गुमान में है! ज़रा पागल होना भी सीख ले।
#सुबहचर्या
(४.९.१९)
बुधवार, 17 जून 2026
संतोष का कारण
शनिवार, 13 जून 2026
तबियत से पत्थर उछालने वाले की तबियत
गुरुवार, 11 जून 2026
परसेप्शन बनाएं लेकिन…
भारत को तो बख्श दीजिए!
साढ़े पांच बज रहे होंगे जब मैं आवास की छत पर आया। इस भोर की एक तस्वीर भी ली। तस्वीर लेते समय मुझे कामायनी की यह पंक्ति याद आई,
'दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात'
स्टेडियम पहुंचते ही शुक्ला जी इनडोर बैडमिंटन कोर्ट की ओर चले गए और मैं खुले ग्राउंड की ओर। दौड़ते हुए इस मैदान का मैंने दो चक्कर लगाया। और फिर सामान्य चाल से एक चक्कर और पूरा किया। ग्राउंड का एक चक्कर लगभग पांच सौ कदम का है।
बालीबाल टीम के सदस्य दृष्टिगोचर हुए। तो उनके ग्राउंड की ओर चला गया। चूंकि मैं बालीबाल खेलना सीख ही रहा हूँ, इसलिए कौन कैसे बाल हैंडल करता है, ध्यान से देखता हूँ। आज भी ध्यान इसी पर था।
उन्हें मैं मझा खिलाड़ी समझता था, लेकिन साथी खिलाड़ी को बॉल पास करने में उनसे चूक हो गई। वह गलत दिशा में चली गई। मुझे लगा बॉल को नहीं छूना चाहिए था। लेकिन फिर मन में कौंधा कि यदि बाल को हैंडल करने में कोई गलती हुई है तो उससे सीख ही मिलेगा।
स्टेडियम से लौटते समय शुक्ला जी साथ थे। उन्होंने कहा, "जो विजेता होता है, वही इतिहास लिखता है और विजेता वही होता है जो लड़ता है।" उनकी यह बात सही लगी।
कश्मीर से धारा 370 हटाने पर विवाद और संघर्ष की आशंका थी। लेकिन यह भी एक प्रयास है, समस्या से लड़ने का।
एक बात अनुभव से भी सीखता आया हूँ, सही मन से लिए गए निर्णयों के परिणाम अच्छे होते हैं। यहाँ हार में भी जीत होती है।
लोग कश्मीर पर दिल जीतने का तर्क देते हैं। लेकिन हँसी आती है इसपर। क्या दिल जीतना इतना आसान है? वैसे 'राज्य' के सारे कानून दिल जीतने के लिए ही तो हैं फिर भी दिल हैं कि मानता नहीं और समस्या ज्यों की त्यों!
भाई मेरे! राज्य अपने नागरिकों का दिल जीतने वाला कानून तो बनाता ही है लेकिन दूसरी ओर उसे ऐसे कानून भी गढ़ने होते हैं जो स्वयं राज्य को भी संरक्षित करे। इसलिए इन बातों पर ज्यादा हाय-तौबा मचाने और बौद्धिक विश्लेषण की जरूरत नहीं।
मैं देख रहा हूं, धारा 370 हटाए जाने की व्याख्या तमाम नजरिए से हो रही है। जैसे, राष्ट्रवादी, संम्प्रदायवादी, वामपंथी, बुद्धिवादी, संविधानवादी और राजनीतिक; सबकी अपनी-अपनी व्याख्या।
लेकिन सबसे अधिक घातक साम्प्रदायवादी व्याख्या है। ऐसा करने वालों को मैं "नान-स्टेट-ऐक्टर" मान सकता हूँ। ये राज्य की अवधारणा को फालो नहीं करते। यह उर्वर जमींन में ज़हर बोने जैसी व्याख्या है।
खैर यह तो हमारे संविधान की खुबसूरती है कि यहाँ ज़हर बोने की भी स्वतंन्त्रता है!
रही बात कुछ साहित्यकार टाइप के बुद्धिजीवियों की, तो उनकी बात ही निराली है।
प्रकाशकों की कृपा से साहित्यकार बने इन बेचारों को, बस बात को घुमाफिरा कहने की कला भर आती है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। दिल्ली में बैठकर साहित्य नहीं रचा जा सकता। ये अपनी बातों में जबर्दस्ती का साहित्य ठूँसते हैं। जनसरोकार के नाम पर जन से कटे हुए लोग हैं ये।
जहाँ तक ‘लोकतंत्र विरोधी’ जैसी राजनीतिक व्याख्या की बात है, तो उन्हें भी समझना चाहिए कि सत्ता को ताकत भी लोकतंत्र से ही मिलती है।
एक बात और, संविधानवादी व्याख्या की बात है, तो संसद की बात माननी ही पड़ेगी, बाकी सर्वोच्च न्यायालय है ही इस बात की व्याख्या करने के लिए।
अंत में एक बात, प्रकृति ने ही भारत की सीमा को निर्धारित किया था। शायद यही कारण रहा होगा कि इसके एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक हजारों वर्षों से निर्बाध आवागमन चला। अगर ऐसा न होता तो अफगानिस्तान में बामियान न होता, या फिर एक ही संस्कृति के प्रमाण न मिलते।
भाई मेरे, यह भारतभूमि यूरोपियन देशों की तरह किसी राजनीतिक एकता का परिणाम नहीं, एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण का परिणाम था, और आप इसकी तुलना सोवियत या यूरोपियन यूनियन के देशों से करते हो!!
कामरेड, इसे समझिए, आप जैसे लोग धर्म को धर्म नहीं, किसी खास राजनीतिक विचारधारा को ही धर्म मानते हो, या फिर धर्म को संम्प्रदाय बना देते हो, अन्यथा धर्म के नाम पर देश का विभाजन न हुआ होता।
अब तो भारत को बख्श दीजिए और इसे तोड़ने वाले प्राविधानों को ही तोड़िए!
मित्रों, इस सुबहचर्या को मैंने थोड़ी तल्खी में लिख डाला है, क्षमा करें।
#चलते_चलते
किसी चीज के लिए किया गया हमारा सद्प्रयास ही अपने आप में विजय के समान होता है।
#सुबहचर्या
(८.८.१९)
बुधवार, 10 जून 2026
अरे साहब, आपने इन्हें..!
घड़ी में अभी सात भी नहीं बजे थे। दसेक मिनट बाकी था सात बजने में। यूँ ही घर के अंदर-बाहर चहलकदमी करने लगा।
दरअसल आज नींद पांच-बीस पर खुल गई। मोबाइल देखा। शुक्ला जी का एक मिसकाल था। पाँच उन्नीस पर आया था यह काल। उन्हें फोन मिलाया। उनींदी-सी आवाज में वे बोल रहे थे कि तैयार हो लीजिए।
खैर रात में तीन-चार बार नींद खुली थी। कारण कि मेरे कंधे का दर्द मुझे बेचैन किए था। यह दर्द चार-पांच महीने से है। तो ठीक से सो न पाने के कारण मन में आलसपन भी था। बिस्तर छोड़ते ही चाय पीने का मन हुआ। चाय बनाने चला गया।
चाय बनी। चाय पीते हुए व्हाट्सअप पर मित्रों के गुडमॉर्निंग संदेश देखने लगा। इधर यहाँ श्रावस्ती में दो-तीन महीने से नेटवर्क की जबर्दस्त प्रॉब्लम है। पता नहीं क्यों? न संदेश खुल रहे थे और न भेज पा रहा था। बात केवल गोल-गोल घूमकर ट्राई अगेन पर रुक जाती। दिन में सिंग्नल मिलता भी है तो सुबह की "सुप्रभात" दोपहर बाद कहने में संकोच होता है। खैर चाय पीते हुए मैंने फटाफट good morning वाला संदेश छोड़ दिया कि नेटवर्क आते ही यह चला जाए।
चाय और गुड मॉर्निंग से निवृत्त हुआ तो शुक्ला जी के यहां चल पड़ा। लेकिन वे स्टेडियम के लिए निकल गए थे। मैं भी खरामा-खरामा उसी ओर चल पड़ा।
स्टेडियम के मोड़ पर पहुँचा तो कल की सुबहचर्या पर भाई यशवंत सिंह जी की टिप्पणी याद आ गई। उनकी टिप्पणी थी, "बुढ़ौती में खेल मत खेला।" हालांकि इसी पर भाई रनवीर सिंह चौहान जी ने भी शायराना अंदाज में टिप्पणी किया था कि "दाढ़ी की सफ़ेदी पे न जाओ/सालों की बटोरी हुई चाँदी है वो।" ये दोनों टिप्पणियां जैसे एक-दूसरे को संतुलित कर रहीं हों, सोचकर मुस्कुरा उठा।
लौटते समय एक खच्चर जैसा घोड़ा सड़क के किनारे गिरा पड़ा था। उसके शरीर एक-दो कौवे बैठे उस पर चोंच मारते दिखाई पड़े। वहां किसी वाहन के शीशे के छोटे-छोटे टुकड़े भी बिखरे पड़े थे। इस घोड़े को रात में जरूर किसी वाहन ने टक्कर मारा होगा। एक दूसरा खच्चर उस मृत खच्चर के पास खड़ा था। उसकी आंखों से आंसू बहता प्रतीत हुआ। मैं भी उस खच्चर के दुख से दुखी-सा हो उठा। मुझे लगा दुख या कष्ट प्राकृतिक है किस प्राणी को नहीं होता? चाहे वह मनुष्य हो या फिर जानवर, संवेदना की अनुभूति तो सभी को होती है।
जब मैं घर के अंदर-बाहर चहल-कदमी कर रहा था, तो निगाह बड़े होते उस पाकड़ के पेड़ पर पड़ी, जिसे काटने के लिए मैं कई बार मंगलेश्वर से कह चुका था। एक बार तो वह कुल्हाड़ी भी लाया था, लेकिन फिर उसे वापस लेकर चला गया।
असल में वह उसे काटना नहीं चाहता था, यही नहीं घर की दीवारों के एकदम किनारे बड़े होते पीपल के पौधों को काटने से उसने यह कहकर मना कर दिया था कि किसी अन्य संम्प्रदाय के व्यक्ति को बुलवाकर इन्हें हटवा देंगे।
इस बीच ये पौधे बड़े हो चुके थे, इनसे दीवारों को नुक़सान पहुंचने का डर हो आया था। यही नहीं, उन पौधों के बीच सांप वगैरह के छिपने का भी डर था।
आज मैंने स्वयं इन पौधों को वहां से हटाया। मंगलेश्वर महोदय अभी जब सुबह आए तो आश्चर्य से पूंछा,
'अरे साहब, आपने इन्हें..!"
मैंने उसे समझाया - “इनसे दीवारों को नुकसान होता और फिर उसकी झाड़ में कोई सांप-वांप भी तो छिप सकता था, वैसे भी अपने रहने के आसपास की जगह को साफ-सुथरा तो रखना ही चाहिए।”
वाकई! कितनी चिंता रहती है हमें एक कण से लेकर पेड़ पौधे और सभी प्राणियों तक की!!
हाँ, टहलकर लौटते समय अखबार देने वाला बच्चा मिल गया था, आज अखबार की वैन देर से आई थी। बच्चे ने रास्ते में ही मुझे अखबार पकड़ा दिया था।
अखबार के पन्नों पर छपी खबरें पढ़ने लगा, अगर मीडिया या अखबार न होते तो क्या होता?
लेकिन राज्य हो या यह मीडिया, सबको देर से जागने की आदत हो चली है। मतलब तब तक घटनाएं घटकर खबर बन चुकी होतीं हैं।
आज यह सब लिखने का मन नहीं था। लेकिन सुबह की टहलाई के बाद लौटा तो मन भीतर तक निश्चल और शांत हो चुका था। सुबह जो भी देखा सुना उसे लेकर मन के भाव, व्यक्त होने के लिए भीतर ही भीतर कुलांचें मार रहा था। सो लिखना पड़ा।
#चलते_चलते
देर से जागने पर केवल लकीर पीटना भर रह जाता है।
#सुबहचर्या
(२.८.१९)
यूँ ही में अच्छा लगना
सुबह उठे तो मन ने यूँ ही टहलने न जाने का इरादा जता दिया। पीछे वाला दरवाजा खोलकर पूरब दिशा की ओर निहारा। मखमली-से बाल सूरज के दर्शन हुए। लेकिन मैं इनके इस भोले रूप के भुलावे में नहीं आया। जानता था, अभी दो-चार घंटे बाद यही अपने उग्र स्वरूप में दिखाई पड़ेंगे। उस आने वाली तीखी तपन की कल्पना भर से इनके इस बाल रूप की भृकुटी मुझे टेढ़ी नजर आने लगी। अभी से मुझे गर्मी का एहसास होने लगा।
मैं बाहर आया। पौधों पर निगाह गई। पत्तियों पर धूल-गुबार की परत जमी हुई थी। इससे इन पौधों का दम घुटता नजर आया। मैं कमरे से झाड़ू लेकर आया। इन पौधों के आस-पास सफाई किया। फिर बाथरूम में गया। नल की टोंटी खोली। बाल्टी भर गई, तो उसे लेकर फिर इन पौधों के पास आया। उस पानी से इन्हें नहलाया। धूल हटते ही पत्तियाँ चमक उठी, जैसे पौधे खिलखिलाकर मुस्कुरा उठे हों।
अब कमरे की ओर लौटा। देखा, कमरों के फर्श पर भी धूल की महीन-सी परत जमी थी। तीन-चार बाल्टी पानी कमरों में फैलाया। फिर वायपर से उसे खींचकर बाहर कर दिया।
घर के आसपास यदि थोड़ी नमी बनी रहे तो मुझे अच्छा लगता है। वैसे भी हमारा देश धूल-धक्कड़ और गर्मी-सूखे से प्रभावित भू-भाग माना जाता है। शायद बाबर ने अपनी किताब बाबरनामा में इसका ज़िक्र किया है।
खैर, यह सब करके मैंने मन के इरादे को ही चकमा दे दिया था, “बच्चू! मत ले चलो मुझे टहलाने, मैंने भी यूँ ही में काम भर का एक्सरसाइज तो कर ही लिया।
इसके बाद चाय बनानी शुरू की। आज दूध कुछ गड़बड़-सा लगा। फटा तो नहीं था, फ्रिज में ही रखा था और रात भर बिजली भी रही थी। दूध सीधे फ्रिज से ही निकाला था। लेकिन उसमें चिकनाई कुछ जियादा ही प्रतीत हो रही थी।
चाय पीते हुए देखा, गिलास की सतह पर कुछ महीन कण जैसे जमा हो गए थे। मन में आशंका उठी, कहीं दूध मिलावटी या बनावटी तो नहीं? यह सोचकर दूधिए पर मन ही मन गुस्सा भी हुआ। फिर मन को यह कहकर शांत किया कि कल उससे इस बारे में जरूर पूछूँगा। आखिर पूरी चाय भी नहीं पी पाया। गिलास वैसे ही रख दिया।
इधर आज ईद है। सोशल मीडिया पर इस पर कोई बढ़िया सा शुभकामनाओं वाला संदेश खोजा। इसे फेसबुक के टाइमलाइन पर पोस्ट कर दिया। सोशल मीडिया से ही पता चला कि आज विश्व पर्यावरण दिवस भी है। इसपर शुभकामना संदेश देने की इच्छा ही नहीं हुई। क्योंकि सोशल मीडिया पर दिए संदेश से धरती हरी-भरी नहीं होने वाली!
ठीक इसी समय दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज हुई। दरवाज़ा खोलकर देखा, दो नन्हें-मुन्नें-से बच्चे अपने नन्हें हाथ में दूध का डिब्बा लिए खड़े थे। उन्हें घूरते हुए मैंने दूध का डिब्बा ले लिया। भगोने में उड़ेला। दूध ठीक दिखाई पड़ा। बच्चों को खाली डिब्बा लौटाते हुए सोचा, दूध के लिए इन्हें क्या बोलें! ये बच्चे क्या समझेंगे।
दूध को लेकर बच्चों से कुछ नहीं कहा बल्कि उनसे इतना भर पूंछा, "तुम्हारे यहां भैंस दूध देती है?"
इस प्रश्न पर बच्चे ने सहमति में सिर हिलाया कि भैंस है वह दूध देती है। बच्चे झूँठ नहीं बोलेंगे। तो दूध बनावटी या नकली नहीं रहा होगा। मैंने निष्कर्ष निकाला। लेकिन साथ में यह भी मन में आया कि इस जमाने में "आदमी के लालच का कोउनऊ भरोसा नाहीं!"
एक बच्चे ने मुझसे अखबार मांगा। असल में बच्चे जब भी दूध लेकर आते हैं तो मुझसे पुराना अखबार जरूर मांगते हैं। एक दिन मैंने इनसे पूंछा था कि "अखबार का क्या करोगे?" "किताबों पर जिल्द चढ़ाएंगे।" उनकी उस बात से मुझे भी अपना बचपन याद आ गया था। मैंने बच्चों को अखबार दिया और वे चले गए।
उनके जाने के बाद मैं कमरे में आ गया। बिस्तर पर नजर गई। चादर और तकिए के खोल कुछ मैले-से दिखाई पड़े। उन्हें समेटकर बाथरूम में ले आया। बाल्टी में सर्फ घोला और चादर तकिए के खोल उसमें भिगो दिए।उन्हें बाल्टी में डाल दिया।
इतने में मंगलेश्वर भी आ गए थे। जो मेरा खाना बनाते हैं। लेकिन मैं चुपचाप चादर और तकिए के खोल धोता रहा। फिर उन्हें सूखने के लिए धूप में फैलाने बाहर आया। यह देखते ही मंगलेश्वर बोले,
अरे साहब, आप क्यों धोए? मैं धो देता..!"
मैंने जैसे अपनी सफाई देते हुए कहा,
“नहीं यार, इसी बहाने थोड़ी मेहनत भी हो जाती है।”
वह चुप हो गया और हमारे हाथ से कपड़े लेकर रस्सी पर फैलाने लगा। खैर..
#चलते_चलते
कभी-कभी मन, अपने अरयें ही मस्त-सा हो उठता है! फिर उसी मन:स्थति में जो भी हम करते या सोचते हैं, हमें अच्छा लगता है। मतलब छोटी-छोटी बातें भीतर एक संतुष्टि और अपनापन भर जाती हैं।
#सुबहचर्या
5.6.19
विनय
सोमवार, 8 जून 2026
खैर, हम ऐसे ही हैं!
शनिवार, 6 जून 2026
दरिया से लौटती नेकी
उस दिन मैंने कोई नेकी नहीं की थी
बस इतना हुआ था कि
किसी बड़े शो में,
बड़े लोगों के बीच पहुँचकर
इतराने की बजाय
किसी की नेकी में शामिल हो गया था
शायद वही मेरी नेकी थी।
तभी किसी पुराने जमाने की कही बात
याद आ गई -
“नेकी कर, दरिया में डाल।”
मैं अपनी नेकी पर दयावान हो उठा।
सोचा,
बेचारी को दरिया ही पसंद होगा।
इसीलिए नेकी को कंधे पर लादे
उदास मन से
मैं दरिया की तलाश में निकल पड़ा।
शायद उस जमाने में
नेकी कोई अजूबा नहीं रही होगी,
कोई ऐसी चीज नहीं
जिसे दिखाकर इतराया जाए।
तभी तो,
उसे दरिया में बहा देने का चलन रहा होगा!
लेकिन अब
कोई ऐसी दरिया नहीं
जिसके झिलमिल, कल-कल पानी में
मेरी नहीं, नेकी ही सही,
यह कह सके -
“देखो, मैं अब भी जिंदा हूँ!
मैंने दरिया को देखा,
अब समझ गया -
इसके काले पड़ चुके जलों में
नेकी का दम घुट जाएगा,
वह मर जाएगी।
फिर कौन मानेगा
कि दुनियां में
कभी नेकी जैसी कोई चीज भी थी।
मैं लौट पड़ा
उसे फिर अपने कंधे पर लादे।
मगर अब
उसके बोझ से
मेरे कंधे दुखने लगे थे।
तभी नेकी तडफड़ाई,
और मुझपर दया करके बोली,
तू क्यों दबता है
मेरे बोझ तले?
ले चल मुझे
सोशल मीडिया पर डाल दे।
वहाँ लोग देखेंगे मुझे!
शायद कोई कह उठे,
इस चमकीली, भड़कीली दुनियाँ में
नेकी अब भी
किसी कोने में दुबकी मिल जाती है।”
- विनय
काठियावाड़ का खारा पानी
आज पाँच बजे ही आँख खुल गई। सोमनाथ से निकलना था। कुछ देर तक यूं ही चहल-कदमी करता रहा। फिर नहाने का विचार आया, लेकिन यहाँ यह भी कठिन काम लगा। दरअसल पानी इतना खारा था कि जैसे सीधे समुद्र का पानी हो! मैंने होटल वाले से पूँछा भी था, *क्या सीधे समुद्र का पानी सप्लाई करते हो?” वह हँसकर बोला था, “नहीं, बोरिंग का पानी है।”
गुजराती भोजन में मीठे का प्रयोग होता है। साथ में छाछ भी होता है? मैं इसपर सोचने लगा कि ऐसा क्यों? मुझे लगता है पूरे काठियावाड़ के भोजन में एक अलग तरह का स्वाद संतुलन दिखाई देता है। यहाँ दाल-सब्जियों में हलकी मिठास, साथ में छाए, और कई व्यंजनों में दूध-घी या खोए का प्रयोग सामान्य बात है। यह पहले तो मुझे थोड़ा अजीब लगा लेकिन फिर मुझे भी ऐसे भोजन का स्वाद अच्छा लगने लगा। दरअसल इसके पीछे केवल स्वाद नहीं, बल्कि वहां की जलवायु और जीवन स्थितियों का बड़ा हाथ है।
काठियावाड़ क्षेत्र में पानी स्वभावत: कुछ खारा या क्षारीय है। संभव है भोजन में मिठास और छाछ का प्रचलन इसी खारेपन को संतुलित करने से जुड़ा हो। वैसे भी गर्म जलवायु में छाछ भोजन को सुपाच्य रखता है।
गुजरात व्यापारिक प्रदेश है। यहां यात्राएं भी लोग करते रहे होंगे, लंबी यात्राओं में भोजन खराब न हो इसलिए भोजन को मधुर और सुपाच्य रखने की परंपरा रही होगी। यही बात यहां की भोजन-संस्कृति का हिस्सा बन गई हो।
खैर जो भी हो, यहां बाटी भी खोया डालकर बनाते हैं, यह बहुत स्वादिष्ट होता है। घी और खोए की वह मिली-जुली सुगंध साधारण बाटी को भी एक अलग ही व्यंजन बना देती है। पहली बार खाने पर लगता है जैसे राजस्थानी बाटी और किसी मिठाई का स्वाद एक साथ मिल गया हो।
यहां काठियावाड़ में नारियल की खेती तो खूब होती ही है, मूँगफली की भी होती है। फिर बीच-बीच में फैले छोटे-बड़े उद्योग और समुद्र से जुड़े बंदरगाह, सब मिलकर यहां की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं।
लगता है भारत के उद्योगपतियों के लिए गुजरात मुफीद जगह प्रतीत हुई। समुद्री बंदरगाहों की उपलब्धता, अपेक्षाकृत कम आबादी वाले विस्तृत भू-भाग, और व्यापारिक दृष्टि से अनुकूल वातावरण ने यहाँ औद्योगिक इकाइयों को तेजी से विकसित होने का अवसर दिया होगा। छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक कहीं न कहीं कोई फैक्ट्री, प्रोसेसिंग यूनिट या औद्योगिक परिसर दिखाई पड़ ही जाता है।
इन्हें देखकर सहज ही समझ में आता है कि उत्तर भारत के इतने मजदूर रोज़गार की तलाश में यहाँ क्यों आते हैं। दरअसल उद्योग केवल पूँजी को नहीं बुलाते, वे श्रम को भी आकर्षित करते हैं। शायद यही कारण है कि गुजरात के शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में आपको उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान तक के लोग काम करते दिखाई पड़ जाते हैं। यहाँ की आर्थिक सक्रियता ने अलग-अलग प्रदेशों के लोगों को एक साझा श्रम-संस्कृति में जोड़ दिया है।
इस समय हम सोमनाथ-अहमदाबाद हाईवे पर चल रहे थे। ऐसे मार्गों का प्रभाव गुजरात की आर्थिक गतिविधियों पर ही नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी अच्छा प्रभाव पड़ा है।
#चलते_चलते
देश में हो रहे विकास के बावजूद भारतीय नागरिक एक जिम्मेदार नागरिक नहीं बन पा रहे हैं।
#सुबहचर्या
(2.07.19)
शुक्रवार, 5 जून 2026
धर्म की नदी और संप्रदाय की नावें
सुबह जल्दी उठे। कल द्वारिकाधीश के दर्शन हो गए थे। आज का प्लान सोमनाथ जाने का था। कल मैं द्वारिकाधीश में एक साधू के बगल में बैठा था। जिसकी तस्वीर मैंने फेसबुक पर शेयर की थी।
वैसे किसी भी धर्म के विषय में टिप्पणी करना अत्यंत संवेदनशील मसला है, क्योंकि धार्मिक विचार सीधे आस्था से जुड़े होते हैं। जिसकी जैसी आस्था होती है, उसका धर्म बोध भी वैसा ही आकार लेता है। मनुष्य अपनी आस्थाओं के ताने-बाने से ही अपनी जीवन-शैली, व्यवहार और दृष्टिकोण का निर्माण करता है।
लेकिन धार्मिकों को भी चाहिए कि अपने विचारों को लेकर आक्रांता न बनें। धार्मिक विचार बिल्कुल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित होने चाहिए।
खैर, कल किसी बात पर क्षण भर के लिए मन उदास हो आया था। एक पीतवस्त्रधारी साधू बाबा के बगल में आकर बैठ गया। उनसे अपनी तुलना कर बैठा। उनकी निश्चिंतता से मुझे रश्क-सा हुआ!
वैसे धार्मिक परम्पराओं में संसार को अक्सर ‘भवसागर’ कहा गया है। यहाँ ‘भव’ का अर्थ है जन्म-मरण और उससे जुड़ा यह नश्वर संसार, जबकि ‘सागर’ उसकी अथाह और दुस्तर प्रकृति का प्रतीक है। मनुष्य इस भवसागर में मोह, माया, दुःख, भय, रोग, जरा और मृत्यु जैसी अनगिनत लहरों के बीच डगमगाती जीवन-नौका लेकर भटकता रहता है। अपनी-अपनी चिंताओं, इच्छाओं और अस्तित्व के संकटों से जूझते हुए वह किसी स्थिर तट की तलाश करता है।
तो क्या साधु हो जाने मात्र से कोई इस भवसागर के उस स्थिर तट को पा लेता है? संभवतः नहीं। अनेक साधु-संत इससे मुक्ति का उपाय संसार से कुछ दूरी बनाकर अपनी एक अलग दुनिया रच लेने में देखते हैं। किन्तु वे भी अंततः इसी संसार, इसी भवसागर पर आश्रित रहते हैं। उनकी साधना, उनका वैराग्य, यहाँ तक कि उनका अस्तित्व भी उसी समाज और जीवन-व्यवस्था से जुड़ा होता है, जिससे वे स्वयं को अलग मानते हैं। बस वे जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते।
वैसे, आम भारतीय अपने व्यक्तिगत अस्तित्व को लेकर बहुत अधिक फ़िक्रमंद नहीं रहा, वह अपने होने की निरंतरता को पारिवार और आने वाली पीढ़ियों में अवश्य देखता है, किंतु भारतीय चिंतन ने वानप्रस्थ जैसी अवधारणा के माध्यम से इस भाव को भी संतुलित किया, ताकि पारिवार जैसी संस्था की निरंतरता पर व्यक्ति का अहं न टिक जाए। शायद इसी कारण यहाँ जीवन और जगत की वस्तुओं को क्षणभंगुर माना गया, और वैराग्य तथा अनासक्ति को भी जीवन-दृष्टि का हिस्सा बनाया गया।
लेकिन चतुर और लोभी मन प्रायः अपने अस्तित्व-बोध को ही केंद्र में रखकर जीता है। यही कारण है कि वह परिवार और सामाजिक संस्थाओं को भी अपने अहं तथा वर्चस्व का माध्यम बना देता है। जब व्यक्ति निरंतरता को साधना के बजाय स्वामित्व की दृष्टि से देखने लगता है, तब वही प्रवृत्ति परिवारों और संस्थाओं में विकृतियाँ उत्पन्न कर देती है। जिससे इन संस्थाओं के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो जाता है। सामंती मानसिकता का मूल भी कहीं न कहीं इसी आग्रह में दिखाई देता है।”
भारतीय संदर्भों में धार्मिक विचार एक बहती नदी की तरह रहा है, जिसमें निषेध या बहिष्कार का आग्रह कम, और विविध धाराओं को आत्मसात कर उन्हें अपने प्रवाह का हिस्सा बना लेने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। शायद इसी कारण यहाँ अस्तित्व को स्थिर रूप में बचाए रखने की चिंता से अधिक, जीवन-प्रवाह को सतत और जीवंत बनाए रखने पर बल दिया गया।
लेकिन जब धार्मिक-विचार किसी कठोर सम्प्रदाय में बदलने लगते हैं, तब उनकी यही जीवंतता क्षीण होने लगती है। प्रवाह की जगह आग्रह आ जाता है और समावेश की जगह सीमाएँ खिंचने लगती हैं। तभी अपने बगल में बैठे उस साधु को देखकर मन में यह विचार आया कि कोई भी बाना या पहचान, यदि अस्तित्व-बोध और अहं की चिंता से मुक्त होकर धारण की गई हो, तो वह न कभी दूसरों को भ्रमित करती है और न ही किसी अन्य के होने की अवहेलना करती है।
कल जब हम द्वारिकाधीश के दर्शन करने गए तो वहां के पुरोहित ने मुझसे मेरी जाति पूँछी, मैंने बता दिए! लेकिन अगले ही पल मैंने सोचा मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, एक ऊँच-नीच जातीय मानसिकता वाले समाज में यह किसी और के लिए अपमानजनक हो सकता है। बाद में पत्नी ने भी इसी बात को लक्षित कर मुझसे कहा, "यहाँ तो जाति पूँछते हैं! मुझे खराब लगा।" दरअसल ऐसी ही होती है, अस्तित्ववादी सोच! इसे हम एक अलगाववादी सोच मानते हैं, इसे क्यों न हम एक जिहादी सोच मानें? खैर..
मैंने ओखा में हजारों नावें खड़ी हुई देखी! पहले तो किसी ने बताया ये मरम्मत वगैरह के लिए खड़ी हैं, लेकिन बाद में एक स्थानीय व्यक्ति ने जानकारी दिया कि ये मछुआरों की नावें हैं, मौसम और तेज चलती हवाओं के कारण सरकार ने इन्हें अभी समुद्र में उतारने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है, प्रतिबंध हटते ही यहां एक भी नावें नहीं दिखाई पड़ेंगी!
वाकई, उन नावों और समुद्र को देखते-देखते मेरे भीतर सागर, भवसागर, नाविक, पुरोहित, संप्रदाय, धार्मिक रीति-कुरीतियाँ और जर्जर नावों की छवियाँ आपस में घुलने-मिलने लगीं। मन में प्रश्न उठा, क्या इन धार्मिक नावों के खेवैयों को यह स्मरण है कि नावों की भी समय-समय पर मरम्मत करनी पड़ती है? विचार जब जीवंत रहते हैं तभी वे पार ले जाते हैं, लेकिन जब वे जड़ होकर केवल सम्प्रदाय और मजहबी आग्रह में बदल जाते हैं, तब वे धीरे-धीरे जीर्ण नावों जैसे हो जाते हैं। विडम्बना यह है कि भवसागर से पार होने की आशा में हम आज भी उन्हीं पुरानी, मरम्मत-विहीन नावों पर चढ़े चले जा रहे हैं।
मैं इन नावों के नाविकों से कहता हूं कि- भइया! अपनी-अपनी नावों के रंग-रोगन का ही नहीं, इनके आधुनिकीकरण के बारे में भी सोचिए! खैर।
आइए, अब इन बेफालतू की उलझी हुई बातों से ध्यान हटाकर काठियावाड़ की ओर लौटें। सुबह सोमनाथ के रास्ते पर चलते हुए जगह-जगह दूर तक फैले पवन-ऊर्जा के ऊँचे टावर दिखाई पड़ रहे थे। रास्ते में एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि यहाँ पिछले पाँच वर्षों से ढंग की बारिश नहीं हुई है। फिर भी लोगों के चेहरों को देखकर लगा कि जीवन की जिजीविषा अब भी सूखी नहीं है। कठिन परिस्थितियों में भी यह उन्हें जीने की राह सुझा रही है।
#चलते_चलते
अपनी जिजीविषा के साथ प्रसन्न चित्त रहिए! यह किसी पंथ,संप्रदाय या मज़हब के ताने-बाने का मोहताज नहीं। खराब मौसम में तो नावें भी खड़ी हो जाती हैं! लेकिन जिजीविषा ही है जो आपको तैरना सिखा जाती है।
#सुबहचर्या
(१९.७.१९)
मंगलवार, 2 जून 2026
एक अबूझ-सी सुबह!
शनिवार, 30 मई 2026
गेट पर खड़ी संवेदना
गुरुवार, 28 मई 2026
हिंदू होने की पहली शर्त
ये आवाजें धर्म की नहीं!
ज्ञान का विरोधी ज्ञान
बुधवार, 27 मई 2026
इंसानी फितरत को समझने वाले जानवर!
जीवन तो जीवन है!
मंगलवार, 26 मई 2026
लगाम
रविवार, 10 मई 2026
विश्वास का धागा
शनिवार, 9 मई 2026
विचारों का मैन्युप्यूलेशन
प्रातःकालीन परिदृश्य जैसे कुछ कह रहा होता है। इसे समझने के लिए मन का खाली और बेलाग होना जरूरी है। और सुबह-सुबह मन कुछ ऐसा ही होता है। इसीलिए सुबहचर्या में मैं दुनियाँ से टकराता हूँ। संवेदित हो उठता हूँ, नवीन विचार प्रस्फुटित होते हैं, लिखास जागती है, और इसे फेसबुक पर अभिव्यक्त करता हूँ।
लेकिन कभी-कभी मन 'स्टैग्नेशन' जैसी विरामावस्था में आ जाता है। न कुछ सोच पाता है और न कुछ समझता है। ऐसा मन तब जीवन में रमा हुआ-सा होता है, विचार स्वत:स्फूर्त नहीं होते बल्कि विचारों को ‘मैन्यूप्युलेट’ करना होता है। यदि विचार मैन्यूप्युलेट हों तो इससे स्वाभाविक लेखन नहीं हो पाता। क्योंकि तब पाठक को मात्र प्रभावित करने की इच्छा होती है न!
दूसरी स्थिति यह भी बनती है कि विचार सृजन के लिए कभी-कभी मन को अंतस की दुनियाँ में ढकेलता हूँ, तो वहाँ की दुनिया भी भाव-अभाव से मुक्त मिलती है.. विचार रूखे ही रह जाते हैं! या विचार निकलते ही नहीं।
अरे हाँ..! क्या किसी "साहित्य" का सृजन विचारों या कल्पनाओं को बिना "मैन्यूप्युलेट" किए हुए लिखा जा सकता है… और लिख भी दिया गया तो क्या उस लिखे में, उस विषय की आत्मा भी प्रतिष्ठित होती है? मैं मानता हूँ नहीं, क्योंकि संवेदना को कभी "मैन्यूप्युलेट" नहीं किया जा सकता.. हाँ अभिव्यक्ति को तो किया जा सकता है! मतलब सुंदर मूर्तियां तो गढ़ी जा सकती है लेकिन बिना संवेदना के इन मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो सकती! बिना संवेदना की आंच के शब्द और वाक्य केवल बेजान मूर्तियां ही गढ़ते हैं, और पाठक भी इसे वैसे ही विसर्जित कर देता है।
आजकल लोग अपनी लिखास मिटा रहे हैं लेखक बन रहे हैं; लेखकों के लिए ही लिख रहे हैं, और लेखकों का लिखा लेखक ही समझ रहे हैं या फिर स्वयं ही अपना लिखा समझते होंगे ।
पत्नी मुझे पढ़कर अकसर यही कहती हैं, "तुम्हीं लिखो तुम्हीं समझो या फिर कोई लेखक ही तुम्हारा लिखा समझता होगा।" मैं पत्नी को कभी-कभी अपना पाठक मान लेने के भ्रम में होता हूँ लेकिन इस कथन के बाद यह भ्रम भी जाता रहा..
आज सुबह टहलने का मन हो आया था, लेकिन ध्यान हो आया कि जूता अभी सूखा ही नहीं है और हवाई चप्पल में ठंड लगती। असल में दो दिन पहले जूता धुल दिया था। वैसे इस समय अन्य क्षेत्रों में मौसम खुश्क हो चुका होगा लेकिन तराई जैसे क्षेत्र में शायद आर्द्रता बनी रहती है, वैसे भी भिनगा में जंगल होने से यहाँ आर्द्रता की मात्रा कुछ ज्यादा ही है। इसीलिए कपड़े वगैरह दिनभर में भी नहीं सूखते, जूता तो खैर कैनवास का है ही।
लेकिन आज Morning walk की इच्छा बलवती हो चुकी थी और गीले जूते को पाँव में डाल कर निकल लिया। कुछ देर के बाद अचानक जूते पर ध्यान गया। देखा, जूते के कैनवास के ऊपर साबुन का झाग निकलकर फैल चुका है। शायद यह ठीक से नहीं धुल पाया था! खैर चलतेे हुए इस झाग को हटाने की कोशिश भी करता रहा। क्योंकि यह कुछ अजीब लगता था!
यूँ ही चलते-चलते एक कार्यक्रम में नारी सशक्तिकरण पर दिया अपना भाषण याद आया! भाषण स्वभाविक नहीं, बल्कि इसपर अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर बोल रहा था। कि सामने बैठे लोग मेरे भाषण से प्रभावित हो जाएं! श्रोता के रूप में सामने स्त्रियाँ ही थी, मंच पर केवल और केवल पुरूष थे। मतलब उस भाषण में मेरी ‘आत्मा’ नहीं बोल रही थी।
खैर, टहल कर लौटा तो उसी तरह से चाय बनाया और अखबार पढ़ा। अखबार में "असली नारी सशक्तिकरण" पर कोई संपादकीय था, लेकिन नहीं पढ़ा। पढ़ा इसलिए नहीं कि वही घिसी-पिटी बातें, इन बातों को क्या पढ़ना! वैसे पर इस विषय पर घिसी-पिटी बातें ही की जाती हैं!
इस सुबहचर्या को अभी रात में लिख रहा हूँ, तो दिन में एक और अखबार में एक लेख पढ़ लिया था उस लेख में एक हृदयविदारक घटना का जिक्र था, दिल्ली जैसे शहर में एक पढ़े-लिखे परिवार में एक दादी अपनी पोती को पानी की टंकी में इसलिए डुबोकर मार डालती है, क्योंकि वह पहले बच्चे के रूप में पोता चाहती थी। वहीं किसी दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र में बी ए की पढ़ाई पूरी करने की इच्छा रखने वाली बहू को कोई सास उसे ही सुनाकर कहती है "बड़ी आई हो अंगर्रा-बीयर्रा करने"।
तो इन भाषणों से क्या होने वाला?
और यहां मैं सुबह की बातें रात में लिखने के लिए अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर रहा हूँ...
#चलते_चलते
"मैन्यूप्युलेशन" उतना बुरा नहीं होता जितना मैं इसे बता रहा हूँ..शरीर को प्रकृति ने "मैन्यूप्युलेट" किया हुआ है, लेकिन इसमें आत्मा डालकर!! तो यह मैन्यूप्युलेशन भी कलात्मक पुनर्सृजन है!
#सुबहचर्या
(22.11.18)
