सुबह की टहलाई के लिए स्टेडियम की ओर निकला। चलते हुए अचानक एक कुत्ते पर निगाह चली गई। सड़क के किनारे वह अपनी पिछली दो टाँगों और आगे की दोनों टाँगों के पंजों को जमीन पर टिकाए आँख बंद किए बैठा था! उसके बैठने के अंदाज से मैं उसे देखता रहा गया। उस कुत्ते की भाव-भंगिमा एकदम से ध्यानावस्था जैसी थी। सड़क पर अभी भी सन्नाटा पसरा था, हम जैसे बस इक्का-दुक्का लोग ही आ-जा रहे थे। वहां एक खंभे पर लगे लैम्प-पोस्ट की रोशनी जरूर आस-पास बिखर रही थी। कुत्ता इसी रोशनी में सड़क की ओर मुँह करके बैठा था।
मैं स्टेडियम से वाकिंग करके वापस आ गया। रोज की तरह चाय बनाया। चाय पीने के कार्यक्रम के बीच घर भी फोन लगा दिया। पूरी घंटी गई लेकिन फोन नहीं उठा.. कुछ पल बाद घर से फोन आ गया...चाय सुड़कते हुए मैं फोन पर बतियाने लगा...
मैंने पूँछा, "का हो..! का, हो रहा है..?"
"रोटी बना रही हूँ..." का हो की आवाज।
"इतनी सुबह-सुबह रोटी बन रही है?" थोड़ा चौंकते हुए मैंने पूँछा। असल में घर पर किसी के लिए टिफिन बनाने की तैयारी नहीं करनी होती।
फिर उन्होंने बताया, "आज सुबह-सुबह जब गेट खोला तो कहीं से वह दौड़कर आ गया था... पहले उसे कुछ बिस्कुट दिया… इसे खाने के बाद भी वह बैठा रहा, गया नहीं.. इसलिए अब उसके लिए रोटी बनानी पड़ रही है।"
यह पालतू नहीं है। बस हमारी गली में उसका जन्म हुआ था, दो वर्ष पहले। और इस गली में ही वह बड़ा भी हुआ। यह जुड़वा था। इसका भाई मेरे घर के सामने के चौराहे पर ही किसी वाहन से हुई दुर्घटना में चल बसा था। पहले उसका मेरे घर से बहुत लगाव था। कभी-कभी वह घर के बारामदे में चला आता और हम सबके साथ खेलता। जबकि उस समय यह बाहर सड़क पर बैठा रहता और वहीं से घर के गेट की ओर निहारता रहता… घर के अंदर न आता।
लेकिन उसके जाने के बाद एक दिन यह घर के अंदर बारामदे में बैठा दिखाई पड़ा। इसे वहां देखकर हम लोग विस्मित हुए थे। अब इसका हम लोगों से लगाव हो गया था! जब भी इसका कुछ खाने का मन होता है, यह घर के गेट के बाहर आकर चुपचाप बैठ जाता है। खाने को मिलते ही फिर वापस चला जाता है। और जब इसका आराम करने का मन होता है, तो गेट खुला मिलते ही यह बेधड़क भीतर चला आता है और किसी कोने में या कार के नीचे कुकुर-कुंडली मारकर इस तरह पसर जाता है मानो इसे किसी की परवाह ही न हो! तब घर के लोग भी इसके आराम में खलल डालने से बचते हैं।
एक दिन श्रीमती जी इसी के बारे में बता रही थीं। उस दिन जैसे ही उन्होंने गेट खोला, यह न जाने कहाँ से दौड़ता हुआ आ गया। इसके आने पर उनका ध्यान नहीं गया। कुछ देर तक यह उनके आस-पास मंडराता रहा, लेकिन उन्होंने इसे पुचकारने के बजाय झिड़क दिया। इसके बाद यह चुपचाप लौट गया था।
लेकिन अगले दिन की बात है। पत्नी को कहीं बाहर जाना था। उन्होंने गेट खोला, तो यह गली में ही खड़ा दिखाई दिया। उन्हें देखकर भी इसने जैसे अनदेखा कर दिया और अनजान बन दूसरी ओर चल पड़ा। तभी श्रीमती जी को एहसास हुआ कि यह उनकी उपेक्षा से नाराज़ है। फिर उन्होंने इसे जबरन अपने पास बुलाया, रोटी-बिस्किट देकर मनाया। तब जाकर इसका मन पिघला और यह फिर उनसे खेलने लगा.. मानो इसे भी अपनी नाराज़गी पर संकोच हो आया हो!
यह केवल एक कुत्ता भर नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील प्राणी है! इसकी इसी संवेदनशीलता को भाँपकर जब भी यह दिखाई पड़ता है, इससे मुखातिब होना पड़ता है, इसकी आवभगत करनी होती है; अन्यथा इसके नाराज हो जाने का डर बना रहता है।
सुबह हो या शाम, जैसे ही यह गेट पर आकर खड़ा होता है इसे रोटी दे दी जाती है। लेकिन इसकी सबसे अजीब बात यह है कि यदि यह कभी गेट पर आए और इसे रोटी न मिले तो फिर यह दुबारा उसी तरह गेट पर आकर खड़ा नहीं होगा। मानो इसे केवल रोटी से ही मतलब न हो, बल्कि अपनी उपेक्षा का एहसास भी भीतर तक छू जाता हो! इसके साथ व्यवहार करते हुए इसके पेट का ही नहीं इसकी भावनाओं का भी खयाल रखना पड़ता है!!
तो आज सुबह-सुबह श्रीमती जी इसी के लिए रोटी बना रहीं थी। मैं मुस्कुरा उठा।
“भाई, इसे केवल एक कुत्ते की कहानी समझकर हँसी में मत टाल दीजिएगा…! हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि बचपन में जाड़े की रातों में गाँव के अलाव के पास बैठकर हमने ऐसी ही न जाने कितनी कुत्ते-बिल्ली की कहानियाँ सुनी हैं। उन कहानियों में जानवर केवल जानवर नहीं होते थे, वे मनुष्यों की तरह रूठते-मनाते, अपनापन जताते और उपेक्षा महसूस करते थे।
हाँ, तब कुछ रिश्तेदार हमें इन कहानियों में रस लेते देख ‘गँवार’ कहकर चिढ़ाते भी थे। लेकिन हम कभी चिढ़े नहीं। शायद इसलिए कि उन कहानियों में हमें जीवन की एक सच्चाई दिखाई पड़ती थी… संवेदना केवल मनुष्यों की जागीर नहीं है। यदि उन दिनों हम उन बातों से चिढ़ गए होते, तो आज यहाँ बैठकर आपको यह कहानी भी न सुना रहे होते। सच तो यह है कि अलाव के किनारे सुनी गई उन्हीं मामूली-सी लगने वाली कहानियों ने हमें इतना भर सिखा दिया कि किसी प्राणी की आँखों में उपेक्षा, अपनापन, नाराज़गी और प्रतीक्षा को पढ़ सकें। और शायद उसी का परिणाम है कि आज इस कुत्ते का गेट पर आकर चुपचाप खड़ा होना भी हमें एक कहानी जैसा लगने लगता है…!”
आज के अखबार के अन्तिम पृष्ठ पर एक समाचार हेडिंग "इतिहास के सबसे खतरनाक मोड़ पर मानवता" में स्टीफन हाँकिंग के हवाले से लिखा था "मानव समुदाय भयानक पर्यावरण संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है। ...मानवता अपने विकास क्रम में सबसे खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर रहा है।" खैर...
#चलते_चलते
हम भी यहाँ यही कहना चाहते हैं कि....
...असल में हमारा अहंकार में डूबा मन दूसरों की संवेदनाओं को पहचान ही नहीं पाता… संवेदनशीलता केवल भावुकता नहीं, बल्कि दूसरे के भीतर घट रही हलचल को महसूस कर पाने की क्षमता है।
#सुबहचर्या
5/12/16
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