आजकल यूं ही आलसपन घेरे रहता है। जब आदमी को करने को कुछ नहीं सूझता तो ऐसा ही होता है। पांच के आसपास जागा। कुछ देर तो इसी उधेड़बुन में बीता कि टहलने जाएं या नहीं.. खैर.. निकल लिए।
यह अलसायी-सी सुबह जैसे मौन थी.. वही सड़क.. वही सुबह.. वैसे ही इक्का-दुक्का आने-जाने वाले लोग और वाहन… और वैसे ही सड़क पर पड़ते मेरे कदम.. रोजमर्रा के वही दृश्य।
फिर भी मन को यह सब अबूझ-सा लग रहा था। इसमें कोई कहानी नजर नहीं आ रही थी।
रोज आते-आते यह सुबह जैसे थक चली हो! बस मजबूरी है उसका आना और गुजर जाना।
हाँ समय या काल,जो कुछ भी हो! केवल दिखाई पड़ने वाली चीजों का गुजर जाना भर है!! हमारा देखना बंद हो जाना, हमारा भी गुजर जाना है.. शायद समय इसी को कहते हैं।
सामने निगाह पड़ी..एक सांड़ आ रहा था… पहले तो मैंने इसे जानवर समझा। इससे बचने की कोशिश भी किया। लेकिन सांड़ ने स्वयं ही रास्ता बदल लिया… वैसे जो हिंसक हो उसे ही जानवर मानना चाहिए!
अब तो ‘जानवर’ की परिभाषा बदले जाने की जरूरत है। अकारण ही किसी भी जीव को ‘जानवर’ कह देना अनुचित और आपत्तिजनक है। फिर तो इंसान भी जानवर है!!
सोच रहा हूं.. अगर सांड़ मन-वाला हुआ तो जरूर.. मुझे भी जानवर ही समझा होगा.. तभी तो रास्ता बदल लिया। हाँ किसी को जानवर समझ लेना मनुष्य की ही बपौती नहीं है।
लेकिन क्या पता हम दोनों ही एक दूसरे को समझने में गलत हों? वैसे हम अपने “समझने” को भी समझ पाते हैं या नहीं, अकसर हमें यह नहीं पता होता।
कहते हैं, प्रेम की भाषा मूक होती है, इतनी सहज कि उसे एक शिशु भी बिना शब्दों के समझ लेता है।
लेकिन जब वही भाषा समझ में आनी बंद हो जाए, तो मान लेना चाहिए कि वह शिशु अब बड़ा हो चुका है।
शायद इसीलिए तो, बड़े लोग प्रेम को बार-बार शब्दों, संकेतों और व्यवहारों के माध्यम से जताते और समझते हैं। क्योंकि उनके के लिए अब ‘प्रेम’ एक निष्कलुष भावना नहीं, बल्कि ‘व्यवहार’ में बदल चुका होता है।
खैर, चीजें यूं ही गुजर जाती है, अपने समय-भर हम इसे समझते रह जाते हैं..
चलते-चलते ध्यान आया, 'मदर्स डे’ पर ऑफिस की सीढ़ियों के कोने में एक मरणासन्न टाइप की कृशकाय वृद्धा दिखाई पड़ी थी। पता चला उसका एक पुत्र है, वह ड्राईवरी करता है और शराब पीता है।
लोग उस वृद्धा पर दया दिखाते हैं उसका वह पुत्र उस दया में से अपने लिए भी कुछ झटक लेता है।
मुझे समझ में नहीं आता ऐसे ‘डे’ क्यों बनाए गए हैं? कुछ बात होगी इसे ‘बनाने वालों” के लिए।
खैर लौटकर आया, अपने लिए ग्रीन टी बनाया। पहले मैं ग्रीन टी पीने वालों की खिल्ली उड़ाता था।
चलते_चलते
किसी चीज को कुछ नाम देना यह हमारा शगल है, शब्दों को मायाजाल में नहीं बांधना चाहिए, शब्द निरीह होते हैं। वैसे मौन भी एक भाषा ही है।
#सुबहचर्या
17.5.19
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