यह अकथ-मन ! यहाँ प्रश्नों और उत्तरों की टकराहटों में एक सार्थक दुनियाँ तलाशनें की आकुलता है...
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शनिवार, 19 सितंबर 2026
मोमबत्तियों के नीचे का अँधेरा
रविवार, 12 अप्रैल 2026
नमस्ते
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सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर ढक्कन सीमेंट से जाम था। पिछले दस मिनट से वह छेनी और हथौड़े की मदद से इसे मेनहोल से हटाने में जुटा था। ढक्कन के कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे छेनी टिकाता और इसपर हथौड़े से चोट मारता। लेकिन ढक्कन था कि टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा था। पास में खड़ा ठेकेदार रमेसर चुपचाप उसके काम की निगरानी कर रहा था।
अचानक रमेसर के 'इस किनारे छेनी लगाओ’ कहने पर उसने दरार पर छेनी टिकाकर एक जोरदार हथौड़ा चला दिया।
छेनी छिटककर दूर दूब वाली घास में जा गिरी, इस झटके में उसकी कमीज की जेब से दो सिक्के भी घास में जा गिरे।
छेनीवाले को झुककर घास टटोलते देख उन्होंने पूछा, 'छेनी नहीं मिल रही क्या?' लेकिन उसकी बजाय रमेसर बोला उठा, “छेनी तो बड़ी चीज है वह मिल गई है, ये अपना सिक्का खोज रहे हैं।”
रमेसर के दो साथी भी चुपचाप खड़े यह देख रहे थे, उसकी मदद के लिए आगे नहीं आए। उनकी ओर देखकर ‘वे’ ने कहा, “इसके मेहनत के सिक्के होंगे, खोजना ही चाहिए।"
सिक्के मिलते ही छेनीवाला काम में जुट गया। रमेसर ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा, ‘बड़का दिमाग है इसके पास।’ इस मुस्कान में कुछ ऐसा था कि ‘वे’ को लगा, यह ‘बड़का दिमाग’ रमेसर के लिए मुफीद तो है ही, स्वयं छेनीवाले के लिए भी है। उनकी नजरें छेनीवाले पर गड़ गई।
मोटे कपड़े का मटमैली कमीज, ऊपर धूसर-सी फटी सदरी, ढीली-ढाली पैंट, जैसे इन कपड़ों ने महीनों से पानी न देखा हो। पैरों में चप्पल नहीं, सिर पर घने उलझे बाल, जिन्हें शायद ही कभी कंघी ने छुआ हो।
लेकिन काम में उसकी तल्लीनता देख ‘वे’ उसके इस हुलिए से उसके मिजाज का अंदाजा नहीं लगा सके। रमेसर से कुछ पूछने को हुए, लेकिन वह भी छेनीवाले के काम पर ध्यान लगाए था।
छेनी पर पड़ते हथौड़े की चोट से ढक्कन हिल उठता। इसे ढीला हुआ सोचकर, रमेसर ट्रैक्टर के टूल बॉक्स से रम्मा निकाल लाया। लेकिन इसका एक सिरा अभी भी मेनहोल से जाम था। उसने इस सिरे पर और छेनी चलाने के लिए कहा।
कुछ देर बाद ढक्कन चारों ओर से ढीला पड़ता दिखा, तो रमेसर ने छेनी रुकवा दी। फिर रम्मा अड़ाकर ढक्कन का एक सिरा उठाया और छेनीवाले से बोला, “अब इसे मेनहोल से हटा दो।”
‘वे’ को अचरज हुआ कि पास में ही खड़े अपने अन्य दो साथियों से रमेसर ने ढक्कन हटाने के लिए क्यों नहीं कहा!
आखिर छेनीवाले ने ही ढक्कन दूसरी ओर उलट दिया। पूरा मेनहोल खुल गया। इसमें झांककर रमेसर ने कहा,
'अरे! कीचड़ तो कम है, पानी ज्यादा है।’
"तो सेप्टिक-टैंक में जमा मल ही रमेसर की व्यावसायिक भाषा में 'कीचड़' है!" 'वे' के लिए यह नई बात थी।
उत्सुकतावश उन्होंने भी मेनहोल में झाँका, तली पर जमा मल सचमुच कीचड़ जैसा ही दिखाई पड़ा।
इसी समय छेनीवाला टैंकर का सक्शन-पाइप मेनहोल की ओर खींचकर ले आ रहा था। जबकि दूसरा साथी वैक्यूम पंखा चलाने के लिए ट्रैक्टर स्टार्ट करने लगा।
रमेसर ने बढ़कर पाइप अपने हाथ में लेकर इसे सेप्टिक-टैंक में उतारा। उधर वैक्यूम फैन चालू होते ही पाइप से पानी सुड़कना शुरू हो गया।
अब तक सांझ भी स्याह हो चली थी। बल्ब की रोशनी में रमेसर का चेहरा साफ पढ़ा जा सकता था। वह मेनहोल पर झुका था। उसकी शांत और गंभीर मुखाकृति देखकर ‘वे’ ने सोचा -
'चार लोगों की टीम में छेनीवाले के अलावा एक रमेसर ही है जिसने सक्शन-पाइप छुआ! वह टीम लीडर भी है, पाइप किसी को भी पकड़ा सकता है, पर हो सकता है दूसरे लोग इसे छूने से कतराते हों।'
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इधर इस कीचड़ को देखते हुए रमेसर के सामने सेप्टिक-टैंक का मेनहोल नहीं, जैसे स्मृतियों की सुरंग खुल गई हो!
"दद्दा की बाल्टी में यह ‘कीचड़’ कुछ और ही रंग में होता। वे रोज़ सुबह नौ बजे बाल्टी, झाड़ू और टिन लेकर ब्लॉक की कॉलोनी निकल पड़ते। एक दिन जिद करके मैं भी उनके साथ हो लिया। मेरा साथ चलना दद्दा को अखर रहा था; उन्होंने मुझे पुचकारकर रोकना भी चाहा, पर मैं नहीं माना। तब मेरी उम्र कोई चार–पाँच साल रही होगी।"
...उस दिन दद्दा पहले एक बड़े क्वार्टर के पीछे की ओर गए। वहां नींव के ऊपर दीवाल पर लोहे का एक ढक्कन लटक रहा था। दद्दा ने इसे उठाया। यहां आले जैसा एक चौकोर गड्ढा था। उसमें यही 'कीचड़' पीले रंग के ढेर में जमा था।
....दद्दा ने मुड़े टिन से उस पीले मैले के ढेर को बाल्टी में भर लिया फिर आले को झाड़ू से साफ भी किया। यह मुझे बहुत अजीब लगा, लेकिन दद्दा एक-एक कर सभी क्वार्टरों पर जाते गए। धीरे-धीरे उनकी बाल्टी उसी पीले मैले से भर गई, जिसे दूर झाड़ियों में जाकर खाली कर आए थे।
....इस काम के दरमियान न दद्दा बोले, न मैंने कुछ पूछा; बस चुपचाप उन्हें यह काम करते देखता रहा। लेकिन बाल्टी खाली करके लौटे तो एक पल के लिए दद्दा ने मुझे घूरा। आज भी याद है, दद्दा की उन आँखों में जैसे नाराजगी थी। मुझे लेकर वे सीधे हैंडपंप पर आए। अपने सभी सामान धोए फिर नहाए और मुझे भी नहलाए। फिर मैं कभी दद्दा के साथ कॉलोनी की ओर नहीं गया।"
इसके काफी दिन बाद मैंने दद्दा से कहा भी था,
“दद्दा मुझे घिन आती है, मत करो यह काम।”
“इसमें क्या घिनाना! यह तो हमारा कर है यही रोजी है” दद्दा ने यही बोलकर तब मुझे चुप करा दिया था।
रोजी तो मैंने भी सीवर में कूदने वाला ही चुना था बल्कि इसके लिए सीवर के काले गंधाते पानी वाले नाले में झम्म से कूदा भी, जो नहीं कूदे वे सब ऊँच-नीच वाले थे… केवल मुझे ही यह नौकरी मिली जैसे कि इस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो!
ख्यालों की डोर टूटी। “अब यही अपना काम..अपनी मशीन और अपना धंधा..“ इस भाव से रमेसर ने अपने ट्रैक्टर-टैंकर की ओर ऐसे देखा जैसे दद्दा की ‘रोजी’ से अपनी ‘रोजी’ की तुलना कर रहा हो!
पास में खड़े ‘वे’ कुछ जाने-पहचाने लगे तो चालीस वर्ष पुरानी धुँधली-सी अपनी स्मृति में उतर गया-
“तब ये घर कच्चे होते, दद्दा इन घरों में त्योहारी लेने आते। कभी-कभी उनके साथ मैं भी होता। शायद ‘वे’ को तभी देखा हो। आज यहां इनके बराबर खड़ा मैं इनसे सौदेबाजी कर रहा हूँ तो अपने इसी खुद के ‘रोजी’ के बल पर…!”
अगर अम्मा जबर्दस्ती स्कूल न भेजतीं तो आज मैं यहां इस तरह खड़ा न होता। वह यही तो कहतीं थीं कि 'तुम्हारे दद्दा और पप्पा तो करिया अक्षर हैं, तभी वे मैला ढोते हैं, मुला तुम खूब पढ़ना।
मेरा स्कूल और घर, एक ब्लॉक के कैंपस में था।
बीडीओ ऑफिस के पीछे एक छोटी सी कोठरी ही मेरा घर था और वह भी जर्जर। उसके सामने टटिया खड़ी कर दद्दा ने घेर बना लिया था, इसी में उनकी झोपड़ी थी। जिसमें वे अपनी गैया के साथ रहते थे।
त्योहारों की छुट्टियों में यहां सन्नाटा पसर जाता। तब मेरे भी घर चलने की जिद्द पर अम्मा कहतीं, यही हमारा घर है।
लेकिन कक्षा पांच में जाकर पता चला कि आजादी के बाद पहले यह विकास खंड बना, फिर स्कूल, तो मैं चौंक पड़ा था।
उस दिन कक्षा में पीछे, सबसे अलग-थलग बैठा मैं, अचानक पंडी जी से पूछ बैठा था -
‘तब मेरा घर भी यहाँ नहीं था न?’
इस पर कक्षा में सब हँसे थे, जैसे कोई ऊल-जलूल बात कहा हो मैंने। पंडी जी भी मुझे घूरने लगे तो मैं सहम गया था। वे फिर यही बोले थे,
“हाँ यहां नहीं था।”
आज सोचता हूं, वह सवाल कैसे पूछ लिया था! तब हमारी जाति में जन्मे बच्चे परली बात सोच ही नहीं सकते थे! जो है, उसे ही सच मानकर जीना सिखा दिया जाता था।
घर को लेकर मन में उत्कंठा थी। स्कूल से लौटने के बाद दद्दा को देख मैं उनकी ओर लपका कि चलकर पूछूं। पर उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक गया।
दद्दा यह काम सुबह ही निपटा लेते हैं, सोचकर चुपचाप लौटकर हैंडपंप के पास आ खड़ा हुआ।
दद्दा भी वहीं आए। सारा सामान नल के नीचे रख दिया। मैं हैंडपंप चलाने लगा। वे एक-एक करके उन्हें धोने लगे थे। मैंने उनके चेहरे पर बेचारगी भरी मायूसी देखा। वे किसी कारण सुबह यह काम नहीं कर पाए थे, इसके लिए साहब ने उन्हें तिरस्कृत कर डांटा था।
दद्दा ने ही बताया था कि वे तब तेरह-चौदह साल के थे जब अपने बप्पा बद्दन के साथ सीमा पार करके आए थे। वहाँ उन्हें नाली-सीवर से छुटकारा नहीं मिला, उल्टे रस्मोरिवाज निभाना भी मुश्किल था। लेकिन यहां भी वही काम उनका इंतजार कर रहा था।
चार बरस दिल्ली में रहने के बाद यह ब्लाक बना तो यहां आ गए।
फिर दद्दा ने कोठरी की ओर इशारा करके इतना कहा था -
'तबसे यही हमारा घर है।’
टैंक से उठती 'सुड़-सुड़' की आवाज ने ख्यालों की परत हटा दिया। रमेसर ने देखा, टैंक में पाइप के मुहाने के नीचे पानी उतर रहा है।
रमेसर ने ‘वे’ को मेनहोल में झाँकने का इशारा करके बोला, “टैंक में पानी चार फीट उतर चुका है। एक टैंकर फुल हो गया दूसरा चक्कर भी होगा..दो टैंकर सीवर था इसमें।” विश्वास दिलाने के लिए 'वे' को टैंकर का पारदर्शी संकेतक भी दिखाया।
इशारा पाकर छेनीवाले ने टैंकर का नोजल बंद किया और रमेसर ने सेप्टिक-टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाला। वह टैंकर खाली करने पास के खेत की ओर बढ़ा ही था कि 'वे' ने टोक दिया कि "इसमें मत गिराना, खेत मालिक नाराज होंगे।"
रमेसर को बचपन की वह बात याद आई, जब दद्दा से उसने पूछा था,
“दद्दा, वहाँ तो सब लड़िकन खेलने जाते हैं…बाल्टी वहाँ क्यों खाली किए? जानते हैं, हमारी गेंद भी वहीं चली गई थी, विज्जू गेंद लेने गया तो उसका पैर छपाक से उसमें पड़ गया, इसे वहाँ न डाला करिए।”
वे पल भर ठहरकर बोले थे -
“बचवा, कहां गिराऊँ? यहाँ तो कोई जगह भी नहीं। एक बार उस खेत के कोने में बाल्टी उलट दी थी तो खेत-मालिक ने जी भर के गरियाया था।"
यह सुनते ही मेरा रोयां-रोयां सुलग उठा था.. फिर उनकी ओर देखा था।
उनके बूढ़ाते शरीर पर पीढ़ियों की बेइज्जती का बोझ साफ झलकता था। जैसे उनका मन हर बात से उचट गया हो, उन्हें देखकर लगा जैसे वे कहना चाह रहे थे - "जिंदगी ने सब सहना सिखा दिया है।"
इसे याद करते ही रमेसर की मुट्ठियां भिंच गईं। मन में गुस्से से भरी एक टीस उभरी..
"हूँ... खेत मालिक नाराज होंगे!" बुदबुदाकर मन में उठे गुस्से को जज्ब किया। फिर कठोर स्वर में यह बोलकर कि - 'खेत के लिए यह खाद ही तो होता' टैंकर लेकर अँधेरे में दूसरी दिशा में बढ़ गया।
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सीवर गिराकर टैंकर लौटा तो इसके नोजल में छेनीवाले ने सक्शन-पाइप फिर जोड़ दिया। रमेसर ने पाइप को हाथ में लेकर मेनहोल में झाँका। बल्ब की रोशनी उसमें नहीं पहुँच रही थी। फिर मोबाइल फोन का टार्च ऑन करके देखा। भीतर 'सीवर' का गाढ़ापन उभर आया।
ऐसे ही गाढ़े सीवर में पप्पा बेहिचक उतर जाया करते थे! यह स्मरण होते ही रमेसर की आँखें सजल हो आईं।
सक्शन-पाइप हाथ में लेते ही भीतर कहीं कुछ चुभ उठता है, पप्पा सामने आ खड़े होते हैं!
फ़िर वह पाइप तब तक नहीं छोड़ता, जब-तक ‘कीचड़’ पूरी तरह बाहर न आ जाए।
उस क्षण पाइप पर हाथ की पकड़ और भी कस उठती है- मानो वह पप्पा की अधूरी लड़ाई पूरी कर रहा हो।
उस जमाने में यह मशीन नहीं थी। वे खुद सेप्टिक टैंक में उतरते। यह गाढ़ा ‘कीचड़’ बाल्टियों में भर-भरकर बाहर निकालते। उनका पूरा शरीर उस कीचड़ में लथपथ हो जाता।
पप्पा यह नौकरी नहीं करना चाहते थे, पर दद्दा इसे पुश्तैनी काम मानते। इससे पप्पा चिढ़ते, बेचैन हो उठते और घुटते। शहर में दिहाड़ी की तलाश में निकल जाते, पर वहां भी न टिकते; वापस आकर घर पर ही चुपचाप पड़े रहते।
एक बार अम्मा से पप्पा को कहते सुना था -
“क्या कीचड़ में लिथड़ी इस पुश्तैनी जाति को उतारकर हम फेंक नहीं सकते?”
पप्पा के इस बात का अर्थ मुझे बाद में समझ में आया कि जाति आदमी का भविष्य भी लिख देती है! वे मजदूर भी नहीं बन पा रहे थे। पुश्तैनी पेशा आड़े आ जाता।
एक दिन दद्दा गाँव से त्योहारी लेकर लौटे थे। उनकी गठरी में ढेर सारी पूरियां-कचौरियां और खाने की चीजें देखकर पप्पा गुस्से में बोले थे -
'यह भिखमंगई ठीक नहीं बाबा, इससे अच्छा तो फिर मैला ढोने का काम है.. कम से कम इसमें कुछ करके तो कमाना है।'
मैंने देखा था… दद्दा गाँव के ‘बड़े’ घरों की देहरी पर बारी-बारी जाकर खड़े होते; भीतर से कोई निकलता और दूरी बनाकर उनकी चादर में ऊपर से ही त्योहारी डाल देता। लोग उनकी चादर छूने से भी कतराते।
पप्पा की बात पर दद्दा ने ऐतराज नहीं जताया। लेकिन बोले थे -
“देख दिन्ने, यह भिखमंगाई नहीं, इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना होता है। यदि दिखाई न पड़ूं तो लोग पूँछने लगते हैं.. दिन्ने! एक बात और! गाँव के लोग शादी-ब्याह पर मुझे नेग-चार देना नहीं भूलते!”
दद्दा और पप्पा, दोनों की बातें दो छोर की होती। इनके बीच मैं एक अजीब द्वन्द्व में फंस जाता।
एक दिन निठल्लेपन से ऊबकर पप्पा स्वीपर बनने शहर चले गए। एक सफाई ठेकेदार ने उन्हें अपनी टीम में रख लिया।”
सीवर में उतरने का अपना अनुभव पप्पा कुछ ऐसा ही अम्मा को बताते -
“जब सीवर में घुसता हूँ तो तिलचट्टों से घिर जाता हूँ ये मेरे शरीर पर दौड़ने लगते हैं!”
शायद स्वप्न में भी ये तिलचट्टे उन्हें अपने शरीर पर रेंगते दिखाई पड़ते इसीलिए कभी-कभी रात में सोते से अचानक उठकर वे अपना शरीर झाड़ने लगते!!
यही नहीं वे बार-बार अपना हाथ धोते, टोकने पर अम्मा से कहते -
“क्या करूँ..मेरे हाथों में जैसे मैले की बदबू आती रहती है, इसीलिए बार-बार हाथ धोना पड़ता है!”
उन दिनों डाक्टर ने उन्हें सीवर में उतरने से मना किया था। लेकिन “आज एक बड़े सेप्टिक टैंक की सफाई होना है, न जाने पर ठेकेदार नाराज होगा” कहकर वे सुबह-सुबह शहर चले गए थे।
उस दिन पप्पा नहीं, उनका शरीर लौटकर घर आया। मैं स्कूल से लौट रहा था। घेर के सामने कुछ लोग खड़े थे। सबके चेहरों पर एक अजीब-सी खामोशी थी। मुझे अनहोनी की आशंका हुई। घबड़ाहट में भागते हुए मैं घेर में पहुँचा। वहां पप्पा जमीन पर लेटे थे और अम्मा उनके सिरहाने बैठी थीं..
कुछ समझता कि दद्दा ने मुझे कसकर अपने अँकवार में भर लिया, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। उधर अम्मा की रुलाई फूट पड़ी थी।
कहते हैं कि सेप्टिक-टैंक में उतरते ही पप्पा बेहोश हो गए थे। कुछ देर बाद जब अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्हें देखने एक साथी उतरा.. वे भी वहीं बेहोश हो गए।
ऊपर खड़े लोग शोर मचाते रहे.. लेकिन ठेकेदार वहां से खिसक लिया था।
जैसे-तैसे दोनों को बाहर निकालकर अस्पताल ले जाया गया।
पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
दद्दा और अम्मा थाना-कचहरी खूब दौड़े… पर न मुआवजा मिला, न किसी पर दोष आया।
....घेर का दृश्य देख मैं जड़वत खड़ा रह गया। अम्मा का रोना और दद्दा के आँसू, सब देखता रहा। पप्पा के पहने हुए कपड़े सीवर के कीचड़ में सने उनके निर्जीव शरीर से अब भी चिपके थे। मेरी आँखें डबडबा आईं, पर मैंने उन्हें बाँह से पोंछ लिया। रोया नहीं।
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इस गाढ़े कीचड़ का सुड़कना अब मुश्किल है, सोचकर उसने ‘वे’ से एक बाँस मंगाया।
रमेसर ने बाँस हाथ में लिया। उसने छेनीवाले को पंप चालू करने का इशारा किया और पाइप मेनहोल पर टिका दिया। पंप चालू होते ही पानी टैंक में गिरने लगा।
रमेसर ने बांस से टैंक के भीतर जमे हुए गाढ़े कीचड़ को हिलाना शुरू कर दिया। ताकि पानी में घुलकर यह आसानी से खिंच सके।
तभी सक्शन-पाइप के मुहाने के पास कपड़ेनुमा कोई चीज दिखाई पड़ी। वह पाइप में न फँसे, इसलिए रमेसर ने उसे बाँस से दूर हटा दिया। छेनीवाले ने उसके हाथ से बाँस ले लिया और उसके सहारे उस कपड़े को बाहर निकाल दिया।
छेनीवाले के हाथ और पैर सीवर की कीचड़ में सने थे। यह देखकर ‘वे’ ने रमेसर से कहा, “यह छेनीवाला तो बहुत कामकाजी है?
कुछ पल सोचने के बाद स्थिर और संयत आवाज में रमेसर बोला,
देखिए, यह काम और जाति, एक ही रस्सी में बँधे हैं। शुरू में ट्रैक्टर चलाने के लिए कोई ड्राइवर तक न मिलता। एक लड़का मिला भी, पर पाइप न छूने की शर्त पर!
ऐसे में, पाइप को जोड़ने से लेकर सेप्टिक-टैंक में उतारने और काम के बाद उसे धो-पोंछकर समेटने तक, सारा काम मुझे ही करना पड़ता।
फिर वह छेनीवाले की ओर देखकर मुस्कुराते हुए बोला-
"यदि यह न मिलाता तो सेप्टिक-टैंक सफाई वाला मेरा यह धंधा परवान न चढ़ता… पहली नजर में मुझे यह पागल ही लगा था।
गाँव की बस्ती से दूर सीवान में एक कमरे की, झोपड़ीनुमा इसकी कोठरी देख, मैंने केवल यही पूँछा था इससे-
"यहाँ बस्ती से दूर अकेले में घर क्यों बनाया?"
यह छूटते ही बोला था -
“मेरी कोई जाति नहीं इसलिए... और खुशी-खुशी मेरे साथ काम करने के लिए तैयार हो गया था।
पहले ही दिन छेनी-हथौड़ी पकड़ाकर इससे मेनहोल का ढक्कन खुलवाया था। बिना झिझके इसने वे सारे काम किए जिसे आज यहाँ कर रहा है।
काम समाप्त करके हम लोग चलने को हुए तो इसने बख्शीश मांगा। तभी इसके बड़के दिमाग के बारे में मुझे पता चला। यह बख्शीश मांगने वाली बात कभी मेरे मन में आया ही नहीं। पैसे की बात पर यह बहुत चैतन्य हो जाता है। उसी दिन से यह 'छेनीवाला' बन गया।
बात पूरी होते ही रमेसर ने 'वे' से कहा -
"यह छेनीवाला न, आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है, इसीलिए इसे आदमियों की बस्ती से दूर घर बनाकर रहना पड़ता है!"
5
रमेसर के मुँह से छेनीवाले के लिए गूढ़ बात सुनकर ‘वे’ ने उसे गौर से देखा, जैसे उसके जीवन की कहानी जानना चाहते हों-
वही बिखरे बाल और ढीले-ढाले कपड़े… चेहरे पर एक अजीब-सी निस्पृहता…!
अचानक रमेसर बोला,
“मैं इसकी दुखती रग को ज्यादा कुरेदता तो नहीं हूं.. पर लोगों से सुनी-सुनाई बात है…”
पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटा था.. माँ-बाप के अतिशय लाड़-प्यार के तरीके ने इसे बिगाड़ दिया.. स्कूल-उस्कूल का मुँह नहीं देखा। दिमाग का खुलना बाकी रह गया…
छेनीवाला बाँस हिला-हिलाकर सेप्टिक-टैंक में कीचड़ घोलने में जुटा था। उसकी ओर देखकर रमेसर ने फिर कहा,
“लोग ‘बऊक’ समझकर इसकी हँसी उड़ाते; विवाह भी न हो सका। माँ-बाप भी दुनियां से कूच कर गए.. फिर अपने ही घर में पराया हो गया.. उपेक्षित-सा.. भाइयों ने इसके हिस्से की जमीन भी अपने नाम करा लिया।”
तभी टैंक से सर्र-सर्र की आवाज आई। छेनीवाले ने बाँस एक ओर रखा और पाइप का मुहाना तली तक ले जाकर उसे इधर-उधर चलाने लगा। रमेसर भी उसके पास चला आया।
अब दोनों बारी-बारी एक-दूसरे से पाइप अपने हाथ में लेते और टैंक में बचा-खुचा सीवर सुड़कवाने लगे!
‘वे’ ने देखा,
छेनीवाला बिना झिझक पाइप के कीचड़ से सने हिस्से पर हाथ लगा देता; वहीं रमेसर इसे ऊपर से ही पकड़ता, मानो कीचड़ से बचना चाहता हो। फिर भी दोनों का तालमेल ऐसा था, जैसे एक ही देह के दो हाथ हों।
रमेसर ने छेनीवाले को कुछ समझाकर पाइप उसके हाथ में थमाया और फिर 'वे' की ओर मुखातिब हुआ -
“फिर एक दिन यह कहीं चला गया.. किसी ने कोई खोज-खबर नहीं ली… और जब वर्षों बाद लौटा तो एक कूबड़ वाली स्त्री को साथ लेकर…”
इधर छेनीवाला टैंक से पाइप बाहर निकालने लगा। लेकिन वह अपने काम में ऐसे मगन था जैसे उसकी नहीं, किसी और की बात चल रही हो..
..अपने ही घर के दरवाजे नहीं खुले इसके लिए.. लोग हँसते..कई दिन गाँव में भटका… जाति निकाला दे दिया इसको.. गाँव के बाहर जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा मिला.. जिसमें कोठरी बनाया.. उस स्त्री के साथ वहां रहने लगा….
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद रमेसर ही बोला,
“लेकिन जैसा इसे देख रहे हैं न, यही बात इसके लिए ढाल बन गया.. इसे टूटने नहीं दिया… अच्छा ही है कि यह आदमियों की बस्ती में नहीं रहता।"
यह कहकर रमेसर अचानक चुप हो गया। ‘वे’ कहीं छेनीवाले की जाति न पूछ बैठें, इस आशंका में बात को मोड़ते हुए बोला,
"बात यह कि बस्ती में रहता तो आदमियों के बहकावे में आ जाता...सौदेबाजी सीख जाता।"
उधर छेनीवाला टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाल चुका था। इसे एक किनारे रखकर धो रहा था।
'वे' ने मेनहोल में झुककर देखा, गाढ़ा कीचड़ पानी में घुलकर लगभग खिंच चुका था; तली में बचा पानी पाइप की पकड़ में अब नहीं आने वाला था।
फिर उनका ध्यान रमेसर के दोनों साथियों पर गया,
दोनों पूरे समय वहीं मौजूद रहे, लेकिन न तो उन्होंने पाइप को हाथ लगाया, न ही इसे धोने में छेनीवाले की मदद की।
उनके मन में प्रश्न उभरा,
यहां काम की या फिर जाति की, क्या कोई एक अदृश्य रेखा है जो उन्हें एक-दूसरे से अलग किए हुए है?
उनकी नजरें रमेसर पर ठहर गई- मानो इन बातों का मर्म टटोल रही हों।
छेनीवाले पर बात थम गई थी। रमेसर मन ही मन बुदबुदाया -
“यह कितना अजीब है..छेनीवाले की जाति जानकर लोग उसके साथ सहज हो जाते हैं और एक हम हैं, हमारे लिए वही पुराना भाव, चाहे यह दबा हुआ ही हो, पर उभर तो आता ही है…हाँ…पप्पा! उस जमाने में कितना झेले होंगे….”
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अचानक रमेसर ने ‘वे’ को एक तरफ चलने के लिए कहा। वह उन्हें एक अँधेरे कोने में ले गया। वहां जमीन की ओर इशारा करके उन्हें कुछ दिखाते हुए धीरे से बोला,
"देखिए, इसे मैंने यहाँ एक किनारे रखवा दिया है। सोचा, आपको बता दूँ, नहीं तो अनजाने में कोई इसे हाथ लगा देता। सुबह किसी से कहकर इसे फिंकवा दीजिएगा।”
‘अरे! यह तो वही कपड़ा है...सेप्टिक-टैक से निकला, सीवर में लिथड़ा हुआ...तो इसे यहाँ रखवाया था रमेसर ने! छेनीवाले से इसे कहीं दूर भी तो फेंकवा सकता था!’
उस कपड़े को लेकर रमेसर का यह वर्ताव ‘वे’ को कुछ विचित्र लगा। वे उस कपड़े को देखते हुए मौन रहे।
रमेसर ने ‘वे’ को नजर भर देखा! वे अपने विचार में खोए हुए-से उसी कपड़े को देख रहे थे।
वह पोर्टिको की ओर चला गया जहां बाबू जी कुर्सी पर बैठे थे। उनसे काम का हिसाब किया। छेनीवाला भी अपने हाथ-पैर धोकर वहीं आया। उसे बख्शीश लेना था। यह उसे मिला, जो उसकी अपेक्षा से ज्यादा था। इससे रमेसर और वह, दोनों खुश हो गए थे।
यकायक रमेसर ने छेनीवाले को सीवर में लिथड़े उस कपड़े को फेंक आने के लिए कहा। शायद यह प्रतिमूल्य था अतिरिक्त बक्शीश मिलने का और इसमें रमेसर की खुद्दारी भी छिपी थी।
‘वे’ समझ चुके थे कि छेनीवाले के लिए रमेसर ने ‘बड़का दिमाग’ वाली बात यूँ ही नहीं कहा था। यह उस भाव की पहचान थी, जहाँ आदमी अपने मूल्य को जानता है।
और वह केवल अपना ही नहीं, उसके हिस्से की गरिमा की भी रक्षा कर रहा था। अन्यथा, उस सीवर में लिथड़े कपड़े को वह पहले भी उससे फिंकवा सकता था। लेकिन तब रमेसर का ठहर जाना उस अदृश्य हीनता के विरुद्ध एक छोटा-सा प्रतिरोध था, जो खुलकर नहीं… भीतर ही भीतर लड़ा जाता है। इसमें बदला नहीं बदलाव की बात थी।
रमेसर काम समेटकर जाने को हुआ तो अचानक मुड़कर नमस्ते कर गया। ‘वे’ ने भी प्रत्युत्तर में नमस्ते कहा, पर उनके भीतर वही कपड़ा अब भी कहीं अटका हुआ था।
अँधेरे में, ज़मीन पर पड़ा वह कपड़ा अब उन्हें मात्र एक परित्यक्त वस्तु नहीं लगा..वह जैसे एक अनकहा विचार बनकर उनकी आंखों में ठहर चुका था।
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026
वह बातूनी टैक्सी ड्राइवर!
बुधवार, 25 मार्च 2026
अम्मा : स्मृति की अनंत परिधि
मेरी गाड़ी घर के सामने आकर रुक गई थी, पर दरवाज़े पर अम्मा दिखाई नहीं पड़ीं। पहले ऐसा कभी नहीं होता था। मेरी गाड़ी की आवाज़ सुनते ही वे दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जातीं, जैसे मेरी राह देख रही हों। आज दरवाज़ा वैसा ही था, पर अम्मा नहीं थीं।
मैं जानता था..अब गाड़ी की आवाज़ सुनकर अम्मा कभी दरवाज़े पर नहीं आएँगी।
भारी मन से मैं गाड़ी से उतरा और दरवाज़े की ओर बढ़ा, पर कुछ कदम चलकर ही ठिठक गया। भीतर कहीं एक हूक-सी उठी। पहले होता तो सीधे जाकर दरवाज़े पर खड़ी अम्मा के पैर छूता और सामने पड़े तख़्त पर जा बैठता। पीछे-पीछे अम्मा भी अपनी प्लास्टिक की कुर्सी खींचकर तख़्त के पास ले आतीं। उसी कुर्सी पर बैठी वे मेरा हाल-चाल पूछती रहतीं।
आज तखत भी वहीं था, कुर्सी भी वहीं रखी थी..पर न जाने क्यों उन्हें देखते ही एक अजीब-सा उजाड़ मन में उतर आया। मैंने ध्यान से देखा…तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी।
यही वह तखत था, जिस पर अम्मा तह किए हुए कपड़े रखती थीं। उनकी छोटी-सी डोलची भी यहीं रहती थी। रोज़मर्रा की कई चीज़ें वे इसी तख़्त पर सहेजकर रख देतीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें ढूँढना न पड़े।
मैं भी जब नहाने जाता तो अम्मा से ही कह देता, ‘अम्मा, नहाने जा रहा हूँ।’ और वे वहीं से बता देतीं, ‘तौलिया तख़्त पर रखा है, कंघी और तेल की शीशी डोलची में है…शीशा भी उसी में मिल जाएगा।’
लेकिन आज उस तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी..सिवा एक गहरी उदासी से भरे खालीपन के।
मैंने दरवाज़े से नज़रें फेर लीं। ठिठके हुए मेरे कदम अनायास ही पापा के कमरे की ओर मुड़ गए।
मेरी पहली तैनाती एक सुदूर जिले में हुई थी। पत्नी और बच्चे भी मेरे साथ जा रहे थे। उस दिन घर के इसी दरवाज़े पर अम्मा खड़ी थीं। वे चुपचाप हमें जाते हुए देख रही थीं। उनके चेहरे पर कोई शब्द नहीं था, लेकिन आँखों में एक ऐसी नमी थी जो बहुत कुछ कह रही थी। जैसे मन का सारा स्नेह उस क्षण पलकों तक आकर ठहर गया हो।
अम्मा हमेशा चाहती थीं कि घर का कोई भी सदस्य उनसे दूर न जाए। परिवार को एक साथ बाँधे रखना जैसे उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प था। शायद इसी जिद में कभी उन्होंने पापा का तबादला बम्बई से इलाहाबाद कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। पापा केन्द्र सरकार की नौकरी में थे, पर अम्मा के लिए नौकरी की चमक-दमक से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि परिवार बिखरे नहीं। वे चाहती थीं कि सब उनकी आँखों के सामने रहें..एक ही आँगन, एक ही छत के नीचे।
लेकिन उस दिन शायद परिवार के साथ रहने का सुख उनसे दूर जा रहा था।
बच्चे रिक्शे पर बैठे थे। रिक्शा धीरे-धीरे घर से कच्चे रास्ते से गाँव से बाहर निकलने लगा। पापा उस रिक्शे के साथ-साथ चल पड़े। वे पक्की सड़क के मोड़ तक आए, फिर उससे आगे सड़क पर चलने लगे थे। वे बिना कुछ कहे चलते रहे..जैसे लौटने का मन ही न हो। अंततः जब वे वापस होने को हुए, तो उनकी चाल में एक अनकही थकान उतर आई थी।
उसी क्षण मेरी आँखें भी भर आई थीं, पर मैंने उन्हें छिपा लिया। उस समय पहली बार लगा, जैसे मैं किसी नौकरी पर नहीं, अपने ही घर से विदा ले रहा हूँ।
बच्चों का घर से चले जाना अम्मा को भीतर तक दुःखी कर गया था। वही दुःख धीरे-धीरे उनकी चुप रहने वाली सी नाराज़गी में बदलने लगा। इसके बाद वे मुझसे भी कुछ खिंची-खिंची सी रहने लगीं। अम्मा बहुत भावुक थीं, पर उतनी ही स्वाभिमानी भी। अपने मन की पीड़ा वे किसी से कहती नहीं थीं; उसे भीतर ही भीतर जज़्ब कर लेती थीं।
और मैं, उनके इतने निकट होकर भी, उनके मन की उन हलचलों को समझने की फुर्सत नहीं निकाल पाया।
अब जब उस दिन को याद करता हूँ, तो लगता है..दरवाज़े पर खड़ी अम्मा की नम आँखें केवल विदा की नहीं थीं; वे एक ऐसे खालीपन की शुरुआत थीं, जिसे समझने में मुझे बहुत हो गई।
शायद उस दिन घर से केवल मैं ही नहीं गया था, अम्मा के जीवन का एक हिस्सा भी चुपचाप मेरे साथ चला गया था।
मैं अपनी नौकरी की व्यस्तताओं में इस कदर उलझता चला गया था कि समय जैसे अनजाने ही हाथ से फिसलता जा रहा था, और इधर अम्मा धीरे-धीरे उम्र की ढलान की ओर बढ़ रही थीं। मेरे मोबाइल में ‘अम्मा’ तो दर्ज था, पर विडंबना यह थी कि उस नाम पर उँगली बहुत कम जाती थी। अक्सर मैं पापा के ही मोबाइल पर फोन कर देता। मन में यह सहज-सा विचार आ जाता कि अम्मा भी तो वहीं पास ही होंगी; यदि इच्छा होगी तो पापा से फोन लेकर मुझसे बात कर लेंगी। पर ऐसा शायद ही कभी हुआ।
वैसे भी, जब कभी फोन पर अम्मा से बात होती, तो वह दो-तीन वाक्यों से आगे बढ़ ही नहीं पाती। वे पूछतीं—‘सब ठीक है?’
मैं कहता, ‘हाँ, सब ठीक है।’
फिर वे दुबारा पूछ लेतीं, ‘खूब ठीक है न?’
और मैं उतने ही संक्षिप्त स्वर में कह देता, ‘हाँ, खूब ठीक है।’
बस, इस ‘खूब’ के बाद जैसे शब्दों की डोर टूट जाती और बातचीत वहीं समाप्त हो जाती।
पर एक दिन उनके सब्र का बाँध जैसे चुपचाप टूट गया। बड़ी करुण आवाज़ में वे बोली थीं, ‘तुम्हारे मुँह से “अम्मा” सुनने को तरस जाती हूँ।’
उनके स्वर में जो पीड़ा थी, वह आज भी मेरे भीतर कहीं गूंजती है। पर उस समय मैं था कि उनकी इस बात को भी हँसकर टाल गया। कभी-कभी तो वे मुझे आधे उलाहने, आधे स्नेह में ‘निर्मोही’ भी कह देतीं।
अम्मा चाहती थीं कि मैं उनसे हुलसकर बातें करूँ, जैसे बेटा अपनी माँ से करता है। पर न जाने क्यों, मेरे हिस्से में मौन ही अधिक था। और अम्मा कभी-कभी हल्की-सी शिकायत के साथ पूछ बैठतीं, ‘तुम इतना चुप क्यों रहते हो?’
मैं अकसर सोच में पड़ जाता कि आख़िर मेरी मानसिक बनावट कैसी है? और क्यों अम्मा मेरे बारे में इस तरह की धारणाएँ बना लेती हैं? इन प्रश्नों के साथ मैं अपनी स्मृतियों की तहों में उतरने लगता।
मेरे बालमन पर अंकित सबसे पहली स्मृति कुछ धुँधली-सी, पर गहरी है। मैं घुटनों के बल सरकता हुआ घर की ऊँची डेहरी लाँघने की कोशिश कर रहा हूँ। डेहरी मेरे छोटे कद के लिए बहुत ऊँची है। घर के दूसरे सदस्य वहीं मौजूद हैं, पर जैसे मेरी ओर उनका ध्यान ही नहीं है। कोई मुझे गोद में उठाकर पार नहीं करा रहा, कोई हाथ बढ़ाकर सहारा नहीं देता। उस क्षण मेरे भीतर पहली बार उपेक्षित होने की एक अनजानी अनुभूति जन्म लेती है।
इस स्मृति का ज़िक्र बाद में मैंने अम्मा से किया, तो उन्होंने मुझे समझाने के अंदाज में बताया था कि उस समय मेरी उम्र मुश्किल से एक वर्ष रही होगी। तब वे बीटीसी की ट्रेनिंग के लिए इलाहाबाद गई हुई थीं और कभी-कभार मुझे भी अपने साथ वहाँ ले जाती थीं। मेरी स्मृतियों में कर्नलगंज का वह कच्चा दोमंज़िला मकान आज भी धुँधली-सी तस्वीर की तरह बसा हुआ है; वही मकान, जहाँ अम्मा अपनी बीटीसी की ट्रेनिंग कर रही थीं।
एक बार अम्मा कई महीनों की ट्रेनिंग के बाद घर लौटी थीं। इतने लंबे समय बाद उनका लौटना मेरे बालमन को खल गया था। भीतर कहीं रूठा हुआ गुस्सा जमा था। मैं एक डंडा उठाकर उनके पास पहुँचा और उसे उनके सिर पर चला दिया। पर अम्मा ने न तो डाँटा, न ही क्रोध किया, उन्होंने मुझे तुरंत अपनी गोद में खींच लिया। उस क्षण उनके स्नेह ने मेरे बाल-क्रोध को जैसे पिघला दिया।
अम्मा यह जानतीं थीं कि मैं बचपन से ही उनसे रूठता आया हूँ..कभी-कभी रूठकर मैं अम्मा से बोलना बंद कर देता तब अम्मा भी मुझसे न बोलतीं। मैं सोचता रहता कि अम्मा मुझे मनाए तब मैं बोलूँ। लेकिन अम्मा मुझे सुनाते हुए कहतीं कि देखो यह अपने अम्मा से भी नहीं बोलता, इससे मेरे बालमन को ठेस लगता और अचानक मैं ‘अम्मा’ बोल देता।
कभी-कभी इन प्रसंगों को यादकर मैं अम्मा से इसकी चर्चा छेड़ देता। तब अम्मा कहतीं, हाँ बाबा बहुत छोटे थे जब आपको छोड़कर मैं बीटीसी की ट्रेनिंग करने गई थीं। इसके बाद वे मेरा बचपन याद कर भावुक हो उठतीं। इन दिनों अम्मा को मेरा बचपन कुछ ज़्यादा ही याद आने लगा था। अक्सर मुझसे बात करते-करते वे एक घटना का ज़िक्र छेड़ देतीं कि… “बाबा, आप साल भर के हो रहे थे जब पहली बार आप खड़े होकर चले थे। आँगन में तुलसी के चौरा के पास खड़े होकर आपका यह चलना देख मैंने खुशी से चिल्लाकर माई (मेरी नानी) को पुकारा था कि माई देख बाबा चलने लगे..!!” यह बात पूरी होते-होते अम्मा की आँखें छलछला उठती। इधर दो-एक वर्षों से मैं यह भी देख रहा था अम्मा मेरे बचपन की बातें यादकर बेचैन हो उठतीं थीं जैसे उन्हें कोई बात कचोटती हो! जब भी मैं घर आता अम्मा मुझसे पूँछती, बाबा नजदीक ट्रांसफर नहीं होगा! जब मैं कहता, नहीं, इधर नहीं होगा, तो उनकी यह बेचैनी और भी बढ़ जाती। लेकिन अम्मा की यह बेचैनी मैं नहीं समझ सका।
जब अम्मा अध्यापिका बनीं तो एक दिन मुझे भी अपने साथ पहली बार स्कूल ले गईं। अम्मा ने मुझे अन्य बच्चों के बीच बैठा दिया। कक्षा में अन्य बच्चे अपनी-अपनी पुस्तकें पढ़ रहे थे अम्मा ने मुझे भी पढ़ने के लिए एक पुस्तक दिया और किसी शब्द को पढ़ने के लिए कहा। उस समय मैं पढ़ना सीख ही रहा था। किसी अनपहचानी सी शब्दाकृति पर मैं अटक गया। इसे पहचानने की कोशिश कर रहा था कि तभी अम्मा का एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गालों पर पड़ा। उस तमाचे की स्मृति आज भी मेरे गालों पर उभर आती है। एक शिक्षिका होने से इतर अम्मा के व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी था जैसे कि वे सत्य के प्रति आग्रहशील और अपने आदर्शों से समझौता न करने वाली महिला थीं। वे साहसी भी थीं। उस जमाने में साइकिल चलाकर अम्मा स्कूल में पढ़ाने जातीं। इसके लिए उन्हें चार से पाँच किलोमीटर तक साइकिल चलाना पड़ता। कभी-कभी अम्मा मुझे भी साइकिल के पीछे कैरियर पर बैठाकर अपने स्कूल लिवा जातीं। वे मुझे घर पर भी पढ़ने के लिए प्रेरित करतीं।
पापा, दादा जी की अकेली संतान थे और मैं तीन बहनों में अकेला भाई। इसलिए दादा जी मुझे ‘तुरुक का दातुन’ कहते, यानी सबके लिए प्रिय अकेली चीज। दादा जी का स्वभाव बड़ा अनुशासनप्रिय था। वे जीवन को नियम और संयम की डोरी से बाँधकर जीने में विश्वास रखते थे। बचपन में उन्होंने मुझे अनुशासन का ऐसा कठोर पाठ पढ़ाया कि उसकी छाप मेरे स्वभाव पर गहराई से अंकित हो गई—आज भी उनकी वह सीख जीवन की राह में मेरा मार्गदर्शन करती है। अम्मा भी तो ऐसी ही थीं। कहते हैं कभी-कभी बहुत दुलार से बच्चों के बिगड़ने का डर होता है, यह बात अम्मा को भी पता थी। अम्मा सदैव मुझे अपने आदर्शों पर कसती रहीं-गढ़ती रहीं। एक दिन रसोईं के पास बैठाकर अम्मा ने मुझे एक पाठ बहुत समझाकर पढ़ाया था: सच्चा बालक! किसी कहानी का यह मेरा पहला पाठ था। इस पाठ के बहाने अम्मा ने मुझे जैसे जीवन का पाठ पढ़ाया था। इस तरह अनजाने में ही सही अम्मा मुझे अपने तरीके से गढ़ रही थी।
पर न जाने क्यों, अम्मा के साथ मेरे संबंधों में एक अदृश्य-सा भावनात्मक शीतयुद्ध भी चलता रहा। शायद ऐसा इसलिए होता है कि जो व्यक्ति हमारे जीवन में सबसे अधिक प्रिय और सबसे अधिक निकट होता है, उसके खो जाने का भय भी उतना ही गहरा होता है। संभव है, माँ-बेटे के बीच यह मौन खिंचाव उसी भीतरी आशंका की उपज रहा हो।
लेकिन इसके पीछे एक और कारण भी रहा होगा। उम्र चाहे जितनी बीत गई हो, अम्मा के सामने जाते ही मैं अनायास वही छोटा-सा बच्चा बन जाता था…हाँ, वही बच्चा, जो शैशव से ही उनसे रूठता-मनाता चला आया था।
शायद इसी भावनात्मक शीतयुद्ध का परिणाम था कि न तो अम्मा ने मुझ पर अपना अधिकार जताया, न ही मैं उन पर। और जब जीवन के किसी मोड़ पर मुझे लगा कि अब मुझे अम्मा पर अपना अधिकार जताना चाहिए तभी वे इस दुनिया से विदा हो गईं।
अम्मा ने अपना पूरा जीवन अपनी ही शर्तों पर जिया… स्वाभिमान और संतोष के साथ। उन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं थी; जो मिला, उसे उन्होंने सहज भाव से स्वीकार किया और उसी में प्रसन्न रहना सीखा। शायद वे मुझसे यही चाहती थीं कि मैं उनके पास बैठूँ, उनसे खुलकर, हुलस-हुलसकर बातें करूँ। पर न जाने क्यों, यह छोटी-सी खुशी भी मैं उन्हें नहीं दे पाया।
मैं मन ही मन सोचता था, नौकरी से निवृत्त होने के बाद फिर एक बच्चे की तरह अम्मा के पास रहूँगा। उनके साथ समय बिताऊँगा, उनसे जी भरकर बातें करूँगा। बरसों से मन में जो कुछ दबा है, उसे उनके सामने उँडेल दूँगा। और जब मेरी बातों से अम्मा के चेहरे पर वह तृप्त मुस्कान लौट आएगी, तब शायद पहली बार मैं उन पर अपना वह सहज अधिकार भी जता सकूँगा, जो एक बेटे को अपनी माँ पर होना चाहिए।
लेकिन जीवन हमेशा हमारी प्रतीक्षा नहीं करता। मन की वह इच्छा मन में ही रह गई। जब तक मैं उस अधूरे स्नेह को शब्द दे पाता, अम्मा चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गईं…और मेरे हिस्से में रह गईं बस उनकी स्मृतियाँ, और एक ऐसी रिक्तता, जिसे अब कोई भर नहीं सकता।
अम्मा के भावनात्मक संसार में यदि कोई सबसे अधिक निकट था, तो शायद वह मैं ही था। यह बात मुझे बचपन में उनके साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों से धीरे-धीरे समझ में आई। पर अम्मा का स्वभाव ऐसा था कि वे इस स्नेह को कभी खुलकर दिखने नहीं देती थीं। शायद उन्हें डर रहता कि कहीं ऐसा न लगे कि मैं ही उनका सबसे प्रिय हूँ और बाकी लोग अपने को उपेक्षित समझ बैठें। इसलिए कई बार सबके सामने वे मेरी उपेक्षा भी कर देतीं।
लेकिन जब मैं घर आता और घर में बस हम दोनों ही होते, तब अम्मा का वह दबा हुआ स्नेह जैसे अपने आप बाहर आ जाता। वे मेरे आसपास ही मँडराती रहतीं…कभी मेरे बचपन की कोई भूली-बिसरी घटना सुनाने लगतीं, कभी तेल की छोटी-सी शीशी उठा लातीं और बड़े स्नेह से मेरे सिर पर मालिश करने बैठ जातीं।
एक बार उन्हें लगा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। उन्होंने पूछा, ‘डॉक्टर को दिखाया कि नहीं?’ जब मैंने सहज ही ‘नहीं’ कह दिया, तो वे हल्की-सी चिंता में डूबकर बोलीं थीं कि ‘जब अपने को ही नहीं दिखा रहे हो, तो बीमार पड़ने पर अम्मा को डॉक्टर को क्या दिखाओगे?’
अम्मा की वह साधारण-सी बात आज भीतर कहीं गहरी टीस की तरह चुभ जाती है।
पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से अम्मा की स्मरण-शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी थी। कभी उन्हें समय का ठीक-ठीक बोध नहीं रहता, कभी स्थान का, तो कभी अभी-अभी घटित कोई छोटी-सी घटना भी उनकी स्मृति से फिसल जाती। उस समय यह सब उम्र के स्वाभाविक ढलान जैसा ही लगा।
जब मैं गाँव गया, तब भी इन संकेतों को मैंने संकेत की तरह नहीं देखा। अम्मा की लगातार बनी रहने वाली खाँसी को भी साधारण समझकर टाल गया। कई महीनों से उनसे ठीक से कुछ खाया भी नहीं जा रहा था…मैंने इसे भी कोई गंभीर बात नहीं माना। कस्बे के डॉक्टर ने भी सहज स्वर में कह दिया था, “कोई बड़ी बीमारी नहीं है।”
शायद उसी एक वाक्य ने मेरी लापरवाही को जैसे एक तर्क दे दिया।
आज सोचता हूँ…कभी-कभी मनुष्य अपने आश्वस्त रहने की सुविधा के लिए भी सच से आँख चुरा लेता है।
अम्मा भीतर से बहुत मजबूत थीं। वे अपनी पीड़ा को सहजता के आवरण में छिपाकर जीने की आदी थीं। उनके चेहरे को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन था कि भीतर कोई बीमारी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है।
और सच तो यह भी है कि अम्मा ने स्वयं भी कभी नहीं कहा, “मैं बीमार हूँ।”
वे हमेशा यही कहतीं,
“मैं ठीक हूँ।”
शायद उन्हें लगता था कि उनकी बीमारी की बात सुनकर मैं व्यर्थ ही व्याकुल हो जाऊँगा।
एक दिन पहले ही मैंने पापा के फोन पर उनसे बात की थी।
“हलो अम्मा… अम्मा…!”
उधर से हल्की-सी आवाज आई…
“बाबा…”
“हाँ अम्मा…”
अम्मा बोलीं,
“बाबा… घबड़ा जिन। काहे एतना घबड़ात हउ तू सभे? बीमारी-उमारी त होए जाथ है… हम ठीक होइ जाब…एतना परेशान जिन होत जा…”
इतना कहते-कहते उन्हें खाँसी आ गई।
मैंने उस खाँसी को भी एक सामान्य खाँसी की तरह ही लिया।
किसे पता था कि यह हमारे बीच अंतिम संवाद होगा।
अगले ही दिन अस्पताल में मैंने अम्मा को एक-एक साँस के लिए संघर्ष करते देखा।
डॉक्टर ने धीमे और लगभग निर्विकार स्वर में कहा…
“अब बहुत देर हो चुकी है। इन्फेक्शन पूरे फेफड़ों में फैल चुका है। लगभग पूरा फेफड़ा नष्ट हो चुका है। अभी जो ये साँस ले रही हैं, उसमें भी इन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ रही है.. कुछ देर में ये थक जाएंगी फिर इनकी सांसें थम जाएगी..अगर समय रहते इलाज मिल जाता तो शायद स्थिति अलग होती…”
डॉक्टर की बात सुनते ही जैसे भीतर कहीं गहराई में टूट गया।
उस क्षण पहली बार अपनी लापरवाही का पूरा आकार दिखाई दिया।
अम्मा के जीवन और स्वास्थ्य के प्रति मैंने स्वयं घोर उपेक्षा बरती थी। और फिर एक दिन अम्मा नहीं रहीं।
अम्मा और उनके बेटे के बीच की इस कहानी का वहीं अंत हो गया….या इस कहानी की वहीं से एक दूसरी शुरुआत हुई।
उस दिन अम्मा की चिता जल रही थी। चिता से कुछ दूर बैठा मैं अग्नि की लपटों को देर तक देखता रहा। धीरे-धीरे लकड़ियाँ अंगारों में बदल रही थीं, और मेरे भीतर स्मृतियों का एक लंबा सिलसिला खुलता जा रहा था।
तभी पहली बार यह विचार मन में आया…
समय वास्तव में कितना अमूल्य होता है। हम अक्सर उसे पहचानने में देर कर देते हैं। और जब तक उसकी महत्ता समझ में आती है, तब तक बहुत कुछ हमारे हाथों से छूट चुका होता है।
उस दिन लगा..अम्मा की चेतना इस दृश्य जगत से उठकर कहीं उस अनंत ब्रह्मांड में विलीन हो गई है। लेकिन धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगा कि अम्मा कहीं गई नहीं हैं। वे अब भी हमारे भीतर हैं…हमारी स्मृतियों में, हमारे व्यवहार में, हमारे निर्णयों में।
अम्मा चुपचाप हमें गढ़ती रही थीं…मुझे ही नहीं, पूरे परिवार को, अपने आसपास के संसार को भी। उन्होंने अपने एक साधारण-से बेटे को भी ऐसा आत्मविश्वास दिया कि वह अपने दम पर अपना संसार रच सके।
तेरहवीं के दिन किसी ने सुझाव दिया—
“अम्मा की एक तस्वीर रख दी जाए, ताकि आने वाले लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें।”
पापा ने मना कर दिया। मुझे भी वही ठीक लगा। क्योंकि उस समय लगा…अम्मा अब किसी एक तस्वीर में समा जाने वाली उपस्थिति नहीं रहीं। वे स्मृति बनकर हमारे भीतर फैल गई हैं….
एक ऐसी अदृश्य चेतना की तरह, जो शायद अब कभी हमसे दूर नहीं होगी।
