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रविवार, 12 अप्रैल 2026

नमस्ते

                                 1

         सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर ढक्कन सीमेंट से जाम था। पिछले दस मिनट से वह छेनी और हथौड़े की मदद से इसे मेनहोल से हटाने में जुटा था। ढक्कन के कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे छेनी टिकाता और इसपर हथौड़े से चोट मारता। लेकिन ढक्कन था कि टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा‌ था। पास में खड़ा ठेकेदार रमेसर चुपचाप उसके काम की निगरानी कर रहा था। 

          अचानक रमेसर के 'इस किनारे छेनी लगाओ’ कहने पर उसने दरार पर छेनी टिकाकर एक जोरदार हथौड़ा चला दिया। 

          छेनी छिटककर दूर दूब वाली घास में जा गिरी, इस झटके में उसकी कमीज की जेब से दो सिक्के भी घास में जा गिरे। 

           छेनीवाले को झुककर घास टटोलते देख उन्होंने पूछा, 'छेनी नहीं मिल रही क्या?' लेकिन उसकी बजाय रमेसर बोला उठा, “छेनी तो बड़ी चीज है वह मिल गई है, ये अपना सिक्का खोज रहे हैं।” 

         रमेसर के दो साथी भी चुपचाप खड़े यह देख रहे थे, उसकी मदद के लिए आगे नहीं आए। उनकी ओर देखकर ‘वे’ ने कहा, “इसके मेहनत के सिक्के होंगे, खोजना ही चाहिए।"

        सिक्के मिलते ही छेनीवाला काम में जुट गया। रमेसर ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा, ‘बड़का दिमाग है इसके पास।’ इस मुस्कान में कुछ ऐसा था कि ‘वे’ को लगा, यह ‘बड़का दिमाग’ रमेसर के लिए मुफीद तो है ही, स्वयं छेनीवाले के लिए भी है। उनकी नजरें छेनीवाले पर गड़ गई।

         मोटे कपड़े का मटमैली कमीज, ऊपर धूसर-सी फटी सदरी, ढीली-ढाली पैंट, जैसे इन कपड़ों ने महीनों से पानी न देखा हो। पैरों में चप्पल नहीं, सिर पर घने उलझे बाल, जिन्हें शायद ही कभी कंघी ने छुआ हो। 

          लेकिन काम में उसकी तल्लीनता देख ‘वे’ उसके इस हुलिए से उसके मिजाज का अंदाजा नहीं लगा सके। रमेसर से कुछ पूछने को हुए, लेकिन वह भी छेनीवाले के काम पर ध्यान लगाए था।  

          छेनी पर पड़ते हथौड़े की चोट से ढक्कन हिल उठता। इसे ढीला हुआ सोचकर, रमेसर ट्रैक्टर के टूल बॉक्स से रम्मा निकाल लाया। लेकिन इसका एक सिरा अभी भी मेनहोल से जाम था। उसने इस सिरे पर और छेनी चलाने के लिए कहा।

         कुछ देर बाद ढक्कन चारों ओर से ढीला पड़ता दिखा, तो रमेसर ने छेनी रुकवा दी। फिर रम्मा अड़ाकर ढक्कन का एक सिरा उठाया और छेनीवाले से बोला, “अब इसे मेनहोल से हटा दो।” 

          ‘वे’ को अचरज हुआ कि पास में ही खड़े अपने अन्य दो साथियों से रमेसर ने ढक्कन हटाने के लिए क्यों नहीं कहा! 

           आखिर छेनीवाले ने ही ढक्कन दूसरी ओर उलट दिया। पूरा मेनहोल खुल गया। इसमें झांककर रमेसर ने कहा,

         'अरे! कीचड़ तो कम है, पानी ज्यादा है।’

        "तो सेप्टिक-टैंक में जमा मल ही रमेसर की व्यावसायिक भाषा में 'कीचड़' है!" 'वे' के लिए यह न‌ई बात थी।

         उत्सुकतावश उन्होंने भी मेनहोल में झाँका, तली पर जमा मल सचमुच कीचड़ जैसा ही दिखाई पड़ा।

         इसी समय छेनीवाला टैंकर का सक्शन-पाइप मेनहोल की ओर खींचकर ले आ रहा था। जबकि दूसरा साथी वैक्यूम पंखा चलाने के लिए ट्रैक्टर स्टार्ट करने लगा।      

          रमेसर ने बढ़कर पाइप अपने हाथ में लेकर इसे सेप्टिक-टैंक में उतारा। उधर वैक्यूम फैन चालू होते ही पाइप से पानी सुड़कना शुरू हो गया। 

        अब तक सांझ भी स्याह हो चली थी। बल्ब की रोशनी में रमेसर का चेहरा साफ पढ़ा जा सकता था। वह मेनहोल पर झुका था। उसकी शांत और गंभीर मुखाकृति देखकर ‘वे’ ने सोचा -

          'चार लोगों की टीम में छेनीवाले के अलावा एक रमेसर ही है जिसने सक्शन-पाइप छुआ! वह टीम लीडर भी है, पाइप किसी को भी पकड़ा सकता है, पर हो सकता है दूसरे लोग इसे छूने से कतराते हों।'

                             2

       इधर इस कीचड़ को देखते हुए रमेसर के सामने सेप्टिक-टैंक का मेनहोल नहीं, जैसे स्मृतियों की सुरंग खुल गई हो! 

         "दद्दा की बाल्टी में यह ‘कीचड़’ कुछ और ही रंग में होता। वे रोज़ सुबह नौ बजे बाल्टी, झाड़ू और टिन लेकर ब्लॉक की कॉलोनी निकल पड़ते। एक दिन जिद करके मैं भी उनके साथ हो लिया। मेरा साथ चलना दद्दा को अखर रहा था; उन्होंने मुझे पुचकारकर रोकना भी चाहा, पर मैं नहीं माना। तब मेरी उम्र कोई चार–पाँच साल रही होगी।"

      ...उस दिन दद्दा पहले एक बड़े क्वार्टर के पीछे की ओर गए। वहां नींव के ऊपर दीवाल पर लोहे का एक ढक्कन लटक रहा था। दद्दा ने इसे उठाया। यहां आले जैसा एक चौकोर गड्ढा था। उसमें यही 'कीचड़' पीले रंग के ढेर में जमा था। 

          ....दद्दा ने मुड़े टिन से उस पीले मैले के ढेर को बाल्टी में भर लिया फिर आले को झाड़ू से साफ भी किया। यह मुझे बहुत अजीब लगा, लेकिन दद्दा एक-एक कर सभी क्वार्टरों पर जाते ग‌ए। धीरे-धीरे उनकी बाल्टी उसी पीले मैले से भर गई, जिसे दूर झाड़ियों में जाकर खाली कर आए थे।

           ....इस काम के दरमियान न दद्दा बोले, न मैंने कुछ पूछा; बस चुपचाप उन्हें यह काम करते देखता रहा। लेकिन बाल्टी खाली करके लौटे तो एक पल के लिए दद्दा ने मुझे घूरा। आज भी याद है, दद्दा की उन आँखों में जैसे नाराजगी थी। मुझे लेकर वे सीधे हैंडपंप पर आए। अपने सभी सामान धोए फिर नहाए और मुझे भी नहलाए। फिर मैं कभी दद्दा के साथ कॉलोनी की ओर नहीं गया।"

         इसके काफी दिन बाद मैंने दद्दा से कहा भी था, 

        “दद्दा मुझे घिन आती है, मत करो यह काम।” 

       “इसमें क्या घिनाना! यह तो हमारा कर है यही रोजी है” दद्दा ने यही बोलकर तब मुझे चुप करा दिया था।

            रोजी तो मैंने भी सीवर में कूदने वाला ही चुना था बल्कि इसके लिए सीवर के काले गंधाते पानी वाले नाले में झम्म से कूदा भी, जो नहीं कूदे वे सब ऊँच-नीच वाले थे… केवल मुझे ही यह नौकरी मिली जैसे कि इस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो!

          ख्यालों की डोर टूटी। “अब यही अपना काम..अपनी मशीन और अपना धंधा..“ इस भाव से रमेसर ने अपने ट्रैक्टर-टैंकर की ओर ऐसे देखा जैसे दद्दा की ‘रोजी’ से अपनी ‘रोजी’ की तुलना कर रहा हो! 

             पास में खड़े ‘वे’ कुछ जाने-पहचाने लगे तो चालीस वर्ष पुरानी धुँधली-सी अपनी स्मृति में उतर गया-

         “तब ये घर कच्चे होते, दद्दा इन घरों में त्योहारी लेने आते। कभी-कभी उनके साथ मैं भी होता। शायद ‘वे’ को तभी देखा हो। आज यहां इनके बराबर खड़ा मैं इनसे सौदेबाजी कर रहा हूँ तो अपने इसी खुद के ‘रोजी’ के बल पर…!”

            अगर अम्मा जबर्दस्ती स्कूल न भेजतीं तो आज मैं यहां इस तरह खड़ा न होता। वह यही तो कहतीं थीं कि 'तुम्हारे दद्दा और पप्पा तो करिया अक्षर हैं, तभी वे मैला ढोते हैं, मुला तुम खूब पढ़ना।

            मेरा स्कूल और घर, एक ब्लॉक के कैंपस में था।

        बीडीओ ऑफिस के पीछे एक छोटी सी कोठरी ही मेरा घर था और वह भी जर्जर। उसके सामने टटिया खड़ी कर दद्दा ने घेर बना लिया था, इसी में उनकी झोपड़ी थी। जिसमें वे अपनी गैया के साथ रहते थे।

        त्योहारों की छुट्टियों में यहां सन्नाटा पसर जाता। तब मेरे भी घर चलने की जिद्द पर अम्मा कहतीं, यही हमारा घर है।      

        लेकिन कक्षा पांच में जाकर पता चला कि आजादी के बाद पहले यह विकास खंड बना, फिर स्कूल, तो मैं चौंक पड़ा था‌। 

           उस दिन कक्षा में पीछे, सबसे अलग-थलग बैठा मैं, अचानक पंडी जी से पूछ बैठा था - 

           ‘तब मेरा घर भी यहाँ नहीं था न?’ 

        इस पर कक्षा में सब हँसे थे, जैसे कोई ऊल-जलूल बात कहा हो मैंने। पंडी जी भी मुझे घूरने लगे तो मैं सहम गया था। वे फिर यही बोले थे,

          “हाँ यहां नहीं था।”

         आज सोचता हूं, वह सवाल कैसे पूछ लिया था! तब हमारी जाति में जन्मे बच्चे परली बात सोच ही नहीं सकते थे! जो है, उसे ही सच मानकर जीना सिखा दिया जाता था। 

          घर को लेकर मन में उत्कंठा थी। स्कूल से लौटने के बाद दद्दा को देख मैं उनकी ओर लपका कि चलकर पूछूं। पर उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक गया। 

        दद्दा यह काम सुबह ही निपटा लेते हैं, सोचकर चुपचाप लौटकर हैंडपंप के पास आ खड़ा हुआ। 

          दद्दा भी वहीं आए। सारा सामान नल के नीचे रख दिया। मैं हैंडपंप चलाने लगा। वे एक-एक करके उन्हें धोने लगे थे। मैंने उनके चेहरे पर बेचारगी भरी मायूसी देखा। वे किसी कारण सुबह यह काम नहीं कर पाए थे, इसके लिए साहब ने उन्हें तिरस्कृत कर डांटा था। 

          दद्दा ने ही बताया था कि वे तब तेरह-चौदह साल के थे जब अपने बप्पा बद्दन के साथ सीमा पार करके आए थे। वहाँ उन्हें नाली-सीवर से छुटकारा नहीं मिला, उल्टे रस्मोरिवाज निभाना भी मुश्किल था। लेकिन यहां भी वही काम उनका इंतजार कर रहा था।

           चार बरस दिल्ली में रहने के बाद यह ब्लाक बना तो यहां आ ग‌ए।

         फिर दद्दा ने कोठरी की ओर इशारा करके इतना कहा था - 

           'तबसे यही हमारा घर है।’

          टैंक से उठती 'सुड़-सुड़' की आवाज ने ख्यालों की परत हटा दिया। रमेसर ने देखा, टैंक में पाइप के मुहाने के नीचे पानी उतर रहा है।

       रमेसर ने ‘वे’ को मेनहोल में झाँकने का इशारा करके बोला, “टैंक में पानी चार फीट उतर चुका है। एक टैंकर फुल हो गया दूसरा चक्कर भी होगा..दो टैंकर सीवर था इसमें।” विश्वास दिलाने के लिए 'वे' को टैंकर का पारदर्शी संकेतक भी दिखाया।  

        इशारा पाकर छेनीवाले ने टैंकर का नोजल बंद किया और रमेसर ने सेप्टिक-टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाला। वह टैंकर खाली करने पास के खेत की ओर बढ़ा ही था कि 'वे' ने टोक दिया कि "इसमें मत गिराना, खेत मालिक नाराज होंगे।" 

          रमेसर को बचपन की वह बात याद आई, जब दद्दा से उसने पूछा था, 

         “दद्दा, वहाँ तो सब लड़िकन खेलने जाते हैं…बाल्टी वहाँ क्यों खाली किए? जानते हैं, हमारी गेंद भी वहीं चली गई थी, विज्जू गेंद लेने गया तो उसका पैर छपाक से उसमें पड़ गया, इसे वहाँ न डाला करिए‌।”  

           वे पल भर ठहरकर बोले थे -

         “बचवा, कहां गिराऊँ? यहाँ तो कोई जगह भी नहीं। एक बार उस खेत के कोने में बाल्टी उलट दी थी तो खेत-मालिक ने जी भर के गरियाया था।" 

           यह सुनते ही मेरा रोयां-रोयां सुलग उठा था.. फिर उनकी ओर देखा था। 

          उनके बूढ़ाते शरीर पर पीढ़ियों की बेइज्जती का बोझ साफ झलकता था। जैसे उनका मन हर बात से उचट गया हो, उन्हें देखकर लगा जैसे वे कहना चाह रहे थे - "जिंदगी ने सब सहना सिखा दिया है।"

          इसे याद करते ही रमेसर की मुट्ठियां भिंच ग‌ईं। मन में गुस्से से भरी एक टीस उभरी..

        "हूँ... खेत मालिक नाराज होंगे!" बुदबुदाकर मन में उठे गुस्से को जज्ब किया। फिर कठोर स्वर में यह बोलकर कि - 'खेत के लिए यह खाद ही तो होता' टैंकर लेकर अँधेरे में दूसरी दिशा में बढ़ गया।

                              3      

       सीवर गिराकर टैंकर लौटा तो इसके नोजल में छेनीवाले ने सक्शन-पाइप फिर जोड़ दिया। रमेसर ने पाइप को हाथ में लेकर मेनहोल में झाँका। बल्ब की रोशनी उसमें नहीं पहुँच रही थी। फिर मोबाइल फोन का टार्च ऑन करके देखा। भीतर 'सीवर' का गाढ़ापन उभर आया।

        ऐसे ही गाढ़े सीवर में पप्पा बेहिचक उतर जाया करते थे! यह स्मरण होते ही रमेसर की आँखें सजल हो आईं।      

         सक्शन-पाइप हाथ में लेते ही भीतर कहीं कुछ चुभ उठता है, पप्पा सामने आ खड़े होते हैं! 

        फ़िर वह पाइप तब तक नहीं छोड़ता, जब-तक ‘कीचड़’ पूरी तरह बाहर न आ जाए। 

         उस क्षण पाइप पर हाथ की पकड़ और भी कस उठती है- मानो वह पप्पा की अधूरी लड़ाई पूरी कर रहा हो।

         उस जमाने में यह मशीन नहीं थी। वे खुद सेप्टिक टैंक में उतरते। यह गाढ़ा ‘कीचड़’ बाल्टियों में भर-भरकर बाहर निकालते। उनका पूरा शरीर उस कीचड़ में लथपथ हो जाता।

          पप्पा यह नौकरी नहीं करना चाहते थे, पर दद्दा इसे पुश्तैनी काम मानते। इससे पप्पा चिढ़ते, बेचैन हो उठते और घुटते। शहर में दिहाड़ी की तलाश में निकल जाते, पर वहां भी न टिकते; वापस आकर घर पर ही चुपचाप पड़े रहते। 

           एक बार अम्मा से पप्पा को कहते सुना था - 

         “क्या कीचड़ में लिथड़ी इस पुश्तैनी जाति को उतारकर हम फेंक नहीं सकते?” 

          पप्पा के इस बात का अर्थ मुझे बाद में समझ में आया कि जाति आदमी का भविष्य भी लिख देती है! वे मजदूर भी नहीं बन पा रहे थे। पुश्तैनी पेशा आड़े आ जाता।

          एक दिन दद्दा गाँव से त्योहारी लेकर लौटे थे। उनकी गठरी में ढेर सारी पूरियां-कचौरियां और खाने की चीजें देखकर पप्पा गुस्से में बोले थे - 

         'यह भिखमंग‌ई ठीक नहीं बाबा, इससे अच्छा तो फिर मैला ढोने का काम है.. कम से कम इसमें कुछ करके तो कमाना है।' 

           मैंने देखा था… दद्दा गाँव के ‘बड़े’ घरों की देहरी पर बारी-बारी जाकर खड़े होते; भीतर से कोई निकलता और दूरी बनाकर उनकी चादर में ऊपर से ही त्योहारी डाल देता। लोग उनकी चादर छूने से भी कतराते।

              पप्पा की बात पर दद्दा ने ऐतराज नहीं जताया। लेकिन बोले थे -

       “देख दिन्ने, यह भिखमंगाई नहीं, इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना होता है। यदि दिखाई न पड़ूं तो लोग पूँछने लगते हैं.. दिन्ने! एक बात और! गाँव के लोग शादी-ब्याह पर मुझे नेग-चार देना नहीं भूलते!” 

        दद्दा और पप्पा, दोनों की बातें दो छोर की होती। इनके बीच मैं एक अजीब द्वन्द्व में फंस जाता।

        एक दिन निठल्लेपन से ऊबकर पप्पा स्वीपर बनने शहर चले ग‌ए। एक सफाई ठेकेदार ने उन्हें अपनी टीम में रख लिया।”

          सीवर में उतरने का अपना अनुभव पप्पा कुछ ऐसा ही अम्मा को बताते - 

          “जब सीवर में घुसता हूँ तो तिलचट्टों से घिर जाता हूँ ये मेरे शरीर पर दौड़ने लगते हैं!” 

            शायद स्वप्न में भी ये तिलचट्टे उन्हें अपने शरीर पर रेंगते दिखाई पड़ते इसीलिए कभी-कभी रात में सोते से अचानक उठकर वे अपना शरीर झाड़ने लगते!! 

           यही नहीं वे बार-बार अपना हाथ धोते, टोकने पर अम्मा से कहते - 

           “क्या करूँ..मेरे हाथों में जैसे मैले की बदबू आती रहती है, इसीलिए बार-बार हाथ धोना पड़ता है!”

        उन दिनों डाक्टर ने उन्हें सीवर में उतरने से मना किया था। लेकिन “आज एक बड़े सेप्टिक टैंक की सफाई होना है, न जाने पर ठेकेदार नाराज होगा” कहकर वे सुबह-सुबह शहर चले ग‌ए थे। 

          उस दिन पप्पा नहीं, उनका शरीर लौटकर घर आया। मैं स्कूल से लौट रहा था। घेर के सामने कुछ लोग खड़े थे। सबके चेहरों पर एक अजीब-सी खामोशी थी। मुझे अनहोनी की आशंका हुई। घबड़ाहट में भागते हुए मैं घेर में पहुँचा। वहां पप्पा जमीन पर लेटे थे और अम्मा उनके सिरहाने बैठी थीं..

          कुछ समझता कि दद्दा ने मुझे कसकर अपने अँकवार में भर लिया, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। उधर अम्मा की रुलाई फूट पड़ी थी।

         कहते हैं कि सेप्टिक-टैंक में उतरते ही पप्पा बेहोश हो ग‌ए थे। कुछ देर बाद जब अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्हें देखने एक साथी उतरा.. वे भी वहीं बेहोश हो ग‌ए। 

        ऊपर खड़े लोग शोर मचाते रहे.. लेकिन ठेकेदार वहां से खिसक लिया था। 

       जैसे-तैसे दोनों को बाहर निकालकर अस्पताल ले जाया गया। 

          पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

        दद्दा और अम्मा थाना-कचहरी खूब दौड़े… पर न मुआवजा मिला, न किसी पर दोष आया।

       ....घेर का दृश्य देख मैं जड़वत खड़ा रह गया। अम्मा का रोना और दद्दा के आँसू, सब देखता रहा। पप्पा के पहने हुए कपड़े सीवर के कीचड़ में सने उनके निर्जीव शरीर से अब भी चिपके थे। मेरी आँखें डबडबा आईं, पर मैंने उन्हें बाँह से पोंछ लिया। रोया नहीं।

                               4

          इस गाढ़े कीचड़ का सुड़कना अब मुश्किल है, सोचकर उसने ‘वे’ से एक बाँस मंगाया।

          रमेसर ने बाँस हाथ में लिया। उसने छेनीवाले को पंप चालू करने का इशारा किया और पाइप मेनहोल पर टिका दिया। पंप चालू होते ही पानी टैंक में गिरने लगा। 

          रमेसर ने बांस से टैंक के भीतर जमे हुए गाढ़े कीचड़ को हिलाना शुरू कर दिया। ताकि पानी में घुलकर यह आसानी से खिंच सके।

         तभी सक्शन-पाइप के मुहाने के पास कपड़ेनुमा कोई चीज दिखाई पड़ी। वह पाइप में न फँसे, इसलिए रमेसर ने उसे बाँस से दूर हटा दिया। छेनीवाले ने उसके हाथ से बाँस ले लिया और उसके सहारे उस कपड़े को बाहर निकाल दिया। 

         छेनीवाले के हाथ और पैर सीवर की कीचड़ में सने थे। यह देखकर ‘वे’ ने रमेसर से कहा, “यह छेनीवाला तो बहुत कामकाजी है?

         कुछ पल सोचने के बाद स्थिर और संयत आवाज में रमेसर बोला, 

          देखिए, यह काम और जाति, एक ही रस्सी में बँधे हैं। शुरू में ट्रैक्टर चलाने के लिए कोई ड्राइवर तक न मिलता। एक लड़का मिला भी, पर पाइप न छूने की शर्त पर!

          ऐसे में, पाइप को जोड़ने से लेकर सेप्टिक-टैंक में उतारने और काम के बाद उसे धो-पोंछकर समेटने तक, सारा काम मुझे ही करना पड़ता। 

           फिर वह छेनीवाले की ओर देखकर मुस्कुराते हुए बोला-

           "यदि यह न मिलाता तो सेप्टिक-टैंक सफाई वाला मेरा यह धंधा परवान न चढ़ता… पहली नजर में मुझे यह पागल ही लगा था। 

         गाँव की बस्ती से दूर सीवान में एक कमरे की, झोपड़ीनुमा इसकी कोठरी देख, मैंने केवल यही पूँछा था इससे- 

            "यहाँ बस्ती से दूर अकेले में घर क्यों बनाया?" 

             यह छूटते ही बोला था - 

         “मेरी कोई जाति नहीं इसलिए... और खुशी-खुशी मेरे साथ काम करने के लिए तैयार हो गया था।

         पहले ही दिन छेनी-हथौड़ी पकड़ाकर इससे मेनहोल का ढक्कन खुलवाया था। बिना झिझके इसने वे सारे काम किए जिसे आज यहाँ कर रहा है। 

          काम समाप्त करके हम लोग चलने को हुए तो इसने बख्शीश मांगा। तभी इसके बड़के दिमाग के बारे में मुझे पता चला। यह बख्शीश मांगने वाली बात कभी मेरे मन में आया ही नहीं। पैसे की बात पर यह बहुत चैतन्य हो जाता है। उसी दिन से यह 'छेनीवाला' बन गया। 

            बात पूरी होते ही रमेसर ने 'वे' से कहा - 

        "यह छेनीवाला न, आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है, इसीलिए इसे आदमियों की बस्ती से दूर घर बनाकर रहना पड़ता है!" 

                                       5     

         रमेसर के मुँह से छेनीवाले के लिए गूढ़ बात सुनकर ‘वे’ ने उसे गौर से देखा, जैसे उसके जीवन की कहानी जानना चाहते हों-

         वही बिखरे बाल और ढीले-ढाले कपड़े… चेहरे पर एक अजीब-सी निस्पृहता…!  

          अचानक रमेसर बोला, 

          “मैं इसकी दुखती रग को ज्यादा कुरेदता तो नहीं हूं.. पर लोगों से सुनी-सुनाई बात है…”

        पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटा था.. माँ-बाप के अतिशय लाड़-प्यार के तरीके ने इसे बिगाड़ दिया.. स्कूल-उस्कूल का मुँह नहीं देखा। दिमाग का खुलना बाकी रह गया…

       छेनीवाला बाँस हिला-हिलाकर सेप्टिक-टैंक में कीचड़ घोलने में जुटा था। उसकी ओर देखकर रमेसर ने फिर कहा, 

        “लोग ‘बऊक’ समझकर इसकी हँसी उड़ाते; विवाह भी न हो सका। माँ-बाप भी दुनियां से कूच कर गए.. फिर अपने ही घर में पराया हो गया.. उपेक्षित-सा.. भाइयों ने इसके हिस्से की जमीन भी अपने नाम करा लिया।”

          तभी टैंक से सर्र-सर्र की आवाज आई। छेनीवाले ने बाँस एक ओर रखा और पाइप का मुहाना तली तक ले जाकर उसे इधर-उधर चलाने लगा। रमेसर भी उसके पास चला आया। 

         अब दोनों बारी-बारी एक-दूसरे से पाइप अपने हाथ में लेते और टैंक में बचा-खुचा सीवर सुड़कवाने लगे!

          ‘वे’ ने देखा,

         छेनीवाला बिना झिझक पाइप के कीचड़ से सने हिस्से पर हाथ लगा देता; वहीं रमेसर इसे ऊपर से ही पकड़ता, मानो कीचड़ से बचना चाहता हो। फिर भी दोनों का तालमेल ऐसा था, जैसे एक ही देह के दो हाथ हों। 

          रमेसर ने छेनीवाले को कुछ समझाकर पाइप उसके हाथ में थमाया और फिर 'वे' की ओर मुखातिब हुआ -  

         “फिर एक दिन यह कहीं चला गया.. किसी ने कोई खोज-खबर नहीं ली… और जब वर्षों बाद लौटा तो एक कूबड़ वाली स्त्री को साथ लेकर…”

        इधर छेनीवाला टैंक से पाइप बाहर निकालने लगा। लेकिन वह अपने काम में ऐसे मगन था जैसे उसकी नहीं, किसी और की बात चल रही हो..

       ..अपने ही घर के दरवाजे नहीं खुले इसके लिए.. लोग हँसते..क‌ई दिन गाँव में भटका… जाति निकाला दे दिया इसको.. गाँव के बाहर जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा मिला.. जिसमें कोठरी बनाया.. उस स्त्री के साथ वहां रहने लगा….

          थोड़ी देर की चुप्पी के बाद रमेसर ही बोला,

        “लेकिन जैसा इसे देख रहे हैं न, यही बात इसके लिए ढाल बन गया.. इसे टूटने नहीं दिया… अच्छा ही है कि यह आदमियों की बस्ती में नहीं रहता।" 

      यह कहकर रमेसर अचानक चुप हो गया। ‘वे’ कहीं छेनीवाले की जाति न पूछ बैठें, इस आशंका में बात को मोड़ते हुए बोला, 

         "बात यह कि बस्ती में रहता तो आदमियों के बहकावे में आ जाता...सौदेबाजी सीख जाता।" 

         उधर छेनीवाला टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाल चुका था। इसे एक किनारे रखकर धो रहा था।

       'वे' ने मेनहोल में झुककर देखा, गाढ़ा कीचड़ पानी में घुलकर लगभग खिंच चुका था; तली में बचा पानी पाइप की पकड़ में अब नहीं आने वाला था। 

          फिर उनका ध्यान रमेसर के दोनों साथियों पर गया, 

         दोनों पूरे समय वहीं मौजूद रहे, लेकिन न तो उन्होंने पाइप को हाथ लगाया, न ही इसे धोने में छेनीवाले की मदद की। 

           उनके मन में प्रश्न उभरा,

         यहां काम की या फिर जाति की, क्या कोई एक अदृश्य रेखा है जो उन्हें एक-दूसरे से अलग किए हुए है? 

        उनकी नजरें रमेसर पर ठहर गई- मानो इन बातों का मर्म टटोल रही हों।  

        छेनीवाले पर बात थम गई थी। रमेसर मन ही मन बुदबुदाया -

         “यह कितना अजीब है..छेनीवाले की जाति जानकर लोग उसके साथ सहज हो जाते हैं और एक हम हैं, हमारे लिए वही पुराना भाव, चाहे यह दबा हुआ ही हो, पर उभर तो आता ही है…हाँ…पप्पा! उस जमाने में कितना झेले होंगे….”  

                              6

         अचानक रमेसर ने ‘वे’ को एक तरफ चलने के लिए कहा। वह उन्हें एक अँधेरे कोने में ले गया। वहां जमीन की ओर इशारा करके उन्हें कुछ दिखाते हुए धीरे से बोला, 

         "देखिए, इसे मैंने यहाँ एक किनारे रखवा दिया है। सोचा, आपको बता दूँ, नहीं तो अनजाने में कोई इसे हाथ लगा देता। सुबह किसी से कहकर इसे फिंकवा दीजिएगा।”

       ‘अरे! यह तो वही कपड़ा है...सेप्टिक-टैक से निकला, सीवर में लिथड़ा हुआ...तो इसे यहाँ रखवाया था रमेसर ने! छेनीवाले से इसे कहीं दूर भी तो फेंकवा सकता था!’ 

          उस कपड़े को लेकर रमेसर का यह वर्ताव ‘वे’ को कुछ विचित्र लगा। वे उस कपड़े को देखते हुए मौन रहे।

          रमेसर ने ‘वे’ को नजर भर देखा! वे अपने विचार में खोए हुए-से उसी कपड़े को देख रहे थे।  

          वह पोर्टिको की ओर चला गया जहां बाबू जी कुर्सी पर बैठे थे। उनसे काम का हिसाब किया। छेनीवाला भी अपने हाथ-पैर धोकर वहीं आया। उसे बख्शीश लेना था। यह उसे मिला, जो उसकी अपेक्षा से ज्यादा था। इससे रमेसर और वह, दोनों खुश हो ग‌ए थे।

         यकायक रमेसर ने छेनीवाले को सीवर में लिथड़े उस कपड़े को फेंक आने के लिए कहा। शायद यह प्रतिमूल्य था अतिरिक्त बक्शीश मिलने का और इसमें रमेसर की खुद्दारी भी छिपी थी। 

           ‘वे’ समझ चुके थे कि छेनीवाले के लिए रमेसर ने ‘बड़का दिमाग’ वाली बात यूँ ही नहीं कहा था। यह उस भाव की पहचान थी, जहाँ आदमी अपने मूल्य को जानता है। 

         और वह केवल अपना ही नहीं, उसके हिस्से की गरिमा की भी रक्षा कर रहा था। अन्यथा, उस सीवर में लिथड़े कपड़े को वह पहले भी उससे फिंकवा सकता था। लेकिन तब रमेसर का ठहर जाना उस अदृश्य हीनता के विरुद्ध एक छोटा-सा प्रतिरोध था, जो खुलकर नहीं… भीतर ही भीतर लड़ा जाता है। इसमें बदला नहीं बदलाव की बात थी।

           रमेसर काम समेटकर जाने को हुआ तो अचानक मुड़कर नमस्ते कर गया। ‘वे’ ने भी प्रत्युत्तर में नमस्ते कहा, पर उनके भीतर वही कपड़ा अब भी कहीं अटका हुआ था।

          अँधेरे में, ज़मीन पर पड़ा वह कपड़ा अब उन्हें मात्र एक परित्यक्त वस्तु नहीं लगा..वह जैसे एक अनकहा विचार बनकर उनकी आंखों में ठहर चुका था।

                                *******             

        

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

वह बातूनी टैक्सी ड्राइवर!


        सामने ही बस अड्डा था। जहाँ से लखनऊ के लिए मुझे बस पकड़ना था। मोबाइल का स्क्रीन ऑन किया। समय देखा, रात का सवा दस बज चुका था। बस अड्डे पर अभी भी चहल-पहल थी। काफी संख्या में यात्री अपने गंतव्य की बस की प्रतीक्षा में इधर-उधर खड़े थे। जिनके चेहरों पर प्रतीक्षा की हलकी सी व्यग्रता थी। दो बसें रवानगी के स्थान पर खड़ी थीं। इनमें से कोई एक बस लख‌न‌ऊ जाएगी, मैंने सोचा। तभी एक कंडक्टर ने आवाज लगाई -’लखन‌ऊ जाने वाले यात्री इस बस में बैठें।’ इतना सुनते ही जहाँ-तहाँ खड़े लोगों में हलचल सी हुई, लोग बस की ओर लपक पड़े। देखते-देखते बस के दरवाजे पर भीड़ जमा हो ग‌ई। बस में सीट सुरक्षित कर लेने की होड़ में दरवाजे पर लोग धक्का-मुक्की शुरू कर दिए। 

       यह दृश्य देख मेरी निगाह अनायास ही सड़क के उस पार स्थित टैक्सी स्टैंड की ओर उठ गई, जो बस‌-अड्डे से अधिक दूर नहीं था। पर वहाँ से भी लोग बस की ओर ही भाग रहे थे‌; इसे देख मन में एक आशंका उभरी कि अब टैक्सी को सवारी मिलने में देर हो सकती है- फिर भी ‘थोड़ी और प्रतीक्षा कर ली जाए’ - सोचकर मैं टैक्सी स्टैंड की ओर बढ़ गया। 
        
      एक टैक्सी चालक लखनऊ जाने वाली सवारियों की बाट जोहता दिखाई पड़ा। मैंने उससे लखनऊ चलने के लिए पूँछा तो वह बोला, एक-दो सवारी और मिल जाए तो तुरंत चल देंगे।’ उसके इस ‘तुरंत’ में न जाने क्यों मुझे अपनी ही उतावली की प्रतिध्वनि सुनाई दी। मैं भी उसके साथ खड़ा आने-जाने वालों में संभावित सवारियां तलाशने लगा। 
     
       मैंने उससे कहा, ‘लोग बस से जाने के चक्कर में यहां से खिसक लिए…पता नहीं लखनऊ के लिए अब सवारी कब जुटेगी।’ वह टैक्सी वाला मानो बातचीत का बहाना ही ढूँढ़ रहा था, तपाक से बोल उठा- 
   
    “ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इस रूट पर खूब सवारियां मिलती हैं लखनऊ के लिए तो मिलती ही हैं खाड़ी के देशों के लिए एयरपोर्ट जाने के लिए भी सवारियां मिल जाती हैं। मैं तो अकसर इसी रूट पर चलता हूँ…अन्यथा मेरी टैक्सी आल इंडिया परमिट वाली है, जरूरत पड़ने पर अन्य राज्यों का भी ट्रिप लगा लेता हूँ। आजकल कोविड महामारी का दौर है, पैसे वाले लोग किराए की प्राइवेट टैक्सी में ही चलना सुरक्षित मानते हैं, इससे भी सवारियों की कमी नहीं है।"

      फिर मेरी जिज्ञासा यह जानने की हुई कि वह केवल ड्राइवर है या टैक्सी मालिक भी?"
 
        "अभी बमुश्किल से छह महीना हुआ होगा यह कार लिए हुए, लेकिन साढ़े तीन लाख किलोमीटर चल चुकी है! ससुरा लोहा भी कभी पुराना होता है..बस ग्रीस-तेल-पानी और सर्विसिंग होती रहे तो चकाचक न‌ई बनी रहे! बेचारी मेरी यह कार अभी काफी दिन साथ देगी, लोन अदा हो जाए तब बदलने की सोचेंगे..अभी तो लोन-फोन, तेल-पानी और टैक्स-फैक्स के खर्चे-वर्चे निकाल कर भी बीस हजार बच जाता है, फिलहाल यह क्या कम है! मुझे नशा-पाती, गुटखा-फुटका की लत भी नहीं है कि फालतू के पैसे खर्च हो रहे हों, अपनी टैक्सी अपना राज और अपने मन की सवारी!!”
      
     टैक्सी वाला एक ही सांस में बोलता चला गया। बातों से वह दिलचस्प और सच्चा लगा! उसकी बातों में एक अजीब-सा आत्म-संतोष था‌। मुस्कुराते हुए वह फिर शुरू हो गया-

       “हूँह.. कैसी-कैसी सवारियों से पाला पडता है लेकिन मुझे तो अपने धंधे से मतलब है, कुछ यात्री खंडूस भी होते हैं वे ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे टैक्सी डीजल से नहीं, उनके कुंए के पानी से चलती है और मैं उनका ज़रख़रीद गुलाम होऊँ..लेकिन इनका भी इलाज मैं जानता हूँ…जैसी सवारी वैसी बात।”
  
         उसकी बातें सुनकर मुस्कुराते हुए मैंने बस-अड्डे की ओर देखा -
    
      बस-अड्डे पर आने-जाने वाले लोग जैसे टैक्सी स्टैण्ड से अनजान दिखाई पड़े। विलंब के अनुमान से मेरी भाव-भंगिमा में बेचैनी आ गई। जैसे टैक्सी ड्राइवर ने इसे भाँप लिया हो! ठेकेदार पर भड़ास निकालते हुए वह बोला- 

       “'ये ससुरे टैक्सी-स्टैंड के ठेकेदार भी कम हरामी पीस नहीं होते... पाँच सौ खुद खाने के चक्कर में यात्री को लखनऊ का किराया दो हजार बताएंगे, गजब की गुंडागर्दी है इनकी! पता नहीं ऐसी गुंड‌ई की गाड़ी कब पलटेगी? वैसे भी बस के डेढ़ सौ की जगह टैक्सी पर दो हजार कौन खर्चेगा? सवारी-फवारी जाए भाड़ में अब चला जाए।”

       मैंने देखा, वह ठेकेदार एक टूटी कुर्सी पर विराजमान है। तभी एक बुलेरो से तीन लोग उतरकर बस की ओर लपक लिए! लेकिन कुछ क्षण बाद इनमें से दो लोग टैक्सी की ओर लौट पड़े!

        ड्राइवर ने चार सवारी से कम पर चलने को घाटे का सौदा बताकर इनसे एक सवारी के आने तक प्रतीक्षा करने के लिए कहा। वाकई इस टैक्सी वाले को केवल अपने धंधे से ही मतलब है।

       इसी बीच तीसरा यात्री भी वहां आ गया, मुझे लेकर अब चार सवारी हो चुकी थी। ड्राइवर को कुल आठ सौ रूपया किराया मिलना सुनिश्चित हो गया।
    
       लेकिन चालक ने खुश होकर ड्राइविंग सीट सँभाला ही था कि वह ठेकेदार आ धमका। उसने खिड़की के भीतर हाथ बढ़ाकर चालक से डेढ़ सौ रुपए मांग लिए। मैं चालक के बगल वाली सीट पर बैठा था। जाते-जाते ठेकेदार ने मुझे नमस्कार किया। उसके जाने के बाद चालक बुदबुदाया-

       “आठ सौ में डेढ़ सौ ये ले जाएगा और बचेंगे साढ़े छह सौ जिसमें से तेल के जाएंगे पाँच सौ, खैर डेढ़ सौ तो बचेंगे ही।”

          तभी पीछे से एक परिचित यात्री ने कहा कि उसने ‘साहब’ का परिचय पहले दे दिया था, नहीं तो वह पाँच सौ से कम न लेता।

        टैक्सी रोड पर दौड़ रही थी। चालक ने मेरी ओर देखा जैसे परखा रहा हो। कोई ‘साहबी ठाट’ न दिखाई देने पर उसे मेरे साहब होने पर संदेह हुआ होगा.. क्योंकि उससे डेढ़ सौ रूपए ठेकेदार तो ले ही गया था।

         अचानक मैंने उससे पूँछ लिया कि तुम टैक्सी चलाने का यह धंधा कब से कर रहे हो?

           जैसे यही वह चाहता था कि कोई उससे बतियाता चले। उसने तपाक से बोला - 

         “मैं तो पहले दिल्ली में बड़े-बड़े नेताओं और मंत्रियों के फ्लीट की गाड़ियां चलाता था..क‌ई मंत्रियों-नेताओं का ड्राइवर रहा हूँ…लेकिन ये बड़े लोग भी न, सब ऐसे ही हैं! ये स्वयं को समाज से ऊपर समझते हैं। नियम-कानून तो हम जैसों के लिए है। आम आदमी इनसे कितना धोखा खाता है! उसे समझ नहीं। देखने में ये एक-दूसरे के धुर विरोधी, लेकिन सांझ ढले सब आपस में गलबहियां डाले ठहाके लगाते हैं। बाकी वोटरों को जाति-धर्म के बंधन का एहसास कराते हैं। मैंने तो फाइव-स्टार होटलों में इन्हें छोड़ते और वहाँ से लाते समय इनकी कारगुजारियाँ भी देखी हैं।”
       
           इस समय वह एक ट्रक को ओवरटेक करने की कोशिश में था लेकिन तभी सामने से तेज गति में आती एक कार की हेड लाईट से आँखें चौंधिया गई! इसपर वह बोला, 
    
       “ये देखो, साला हाई बीम मारते चला आ रहा है, इसे तो ड्राइविंग सेंस ही नहीं है! पता नहीं कैसे-कैसे लोग लाइसेंस पा जाते हैं।” 

         अब ड्राइवर ट्रक को ओवरटेक करने में कोई हड़बड़ी नहीं दिखा रहा था। तभी पीछे से एक यात्री अचानक भड़ककर बोला -

        “बैलगाड़ी चला रहे हो क्या? तुम्हारी इस चाल पर तो मेरी फ्लाइट छूट जाएगी।”
      
         ड्राइवर को यात्री की बात खल गई, अचानक कार को सड़क के किनारे रोककर उसने यात्री से कहा, 

       “तो अभी मेरी कार से उतर जाइए..” ड्राइवर थोड़े गुस्से में था।” 

      फिर शांत होते हुए कहा, “मै अस्सी से ज्यादा नहीं चलता। आपको समय पर एयरपोर्ट पहुँचा देंगे।” 

         इधर यात्री भी शांत रहा। 

         कुछ क्षण की शांति के बाद ड्राइवर ने कहा, “ड्राइविंग के समय गुस्सा आना ठीक नहीं।”  
    
        इसके बाद मैंने भी चुप्पी को तोड़ी, ड्राइवर से पूँछा, “तुम लोग विरोध क्यों नहीं करते ठेकेदारों का?”
      
          मेरे इस प्रश्न पर ड्राइवर क्षण-भर की चुप्पी के बाद बोला,

      “सर, माना आज आप बैठे हैं, लेकिन हमारा तो रोज़ इन्हीं से पाला पड़ेगा। कहाँ तक इनसे पंगा लेते फिरेंगे? आखिर हैं तो हम टैक्सी-ड्राइवर ही।” 

         फिर वह अपने अनुभव सुनाने लगा -

    “साहब, मैंने तो इस टैक्सी ड्राइवरी में बहुत कुछ देखा-सुना है। एक बार एक बड़े ढाबे के कैश काउंटर पर एक शराबी को ढाबे मालिक से उलझा देखा। ढाबे मालिक से उसे पाँच हजार रुपए चाहिए था। कुछ देर ना-नुकूर के बाद मालिक ने उसे पंद्रह सौ रुपए थमाए। बाद में ढाबे के मालिक ने मुझसे यही कहा कि कौन उलझे इनसे धंधा ख़राब होता।”

        इसके बाद टैक्सी ड्राइवर ने दूसरी घटना सुनाई - 

     “कितनी-कितनी बातें बताऊँ साहब! एक दिन तो एक आदमी जबर्दस्ती आकर मेरी गाड़ी में बैठ गया, जबकि गाड़ी पहले से ही बुक थी। उतरने को कहा तो वह उतरने को तैयार नहीं, उल्टा झगड़ा करने लगा। 

        थाने से सौ कदम दूर थे हम..पर उसे ज़रा भी डर नहीं लगा। कहने लगा कि ‘दारोगा और सिपाही सब उसके जान-पहचान के हैं’ जैसे-तैसे करके उसे नीचे उतारा, तो जाते-जाते सिर में मुक्का मारकर भाग गया! 

        सच कहूँ तो साहब, इस देश में मेहनत करके खाने-कमाने वालों की कोई कद्र नहीं है। इज्जत-उज्जत सब बड़े लोगों के चोंचले हैं। हम लोगों की इज्जत बस इतनी है कि बिना दंद-फंद और चोरी-चकारी के अपना परिवार पाल ले…लेकिन अब उसमें भी चैन कहाँ है…"

       और पुलिस? उसके पास जाओ तो लगता है उल्टा हमें ही फंसा देगी। डंडा फटकारते ही मिलती है। 
      
      कहने के लिए बहुत टीम-टाम है लेकिन हमारे लिए नहीं..हम तो राम भरोसे ही रहते हैं। वर्षों की इस टैक्सी ड्राइवरी में मैंने यही समझा है।” 

      टैक्सी ड्राइवर की बातें मैं बहुत ध्यान से सुन रहा था, वह फिर अपनी रौं में बहने लगा..

       “उस दिन तो साहब, गजब ही हो गया था! साँझ ढल चुकी थी, एक लड़की ने टैक्सी बुक किया। दूर खड़ी होकर वह साथ जाने वाले किसी का इंतजार करने लगी थी‌। देर होता देख उसे इशारे से मैं बुलाने लगा तो एक पुलिसवाला आ धमका..डंडे से मेरी टैक्सी ठकठकाते हुए उसने मुझे एक भद्दी गाली दिया। फिर मुझ पर इल्जाम लगाया कि मैं गाड़ी में गलत धंधा कराता हूँ! और मुझे जेल भेजने की धमकी देने लगा। मेरी गवाही देने के लिए वहां कोई नहीं था वह लड़की भी नहीं! उस दिन तो मैं एकदम से फँस ही गया था!! 

        एक हजार रुपए की उस दिन की पूरी कमाई उस पुलिस वाले को रिश्वत के रूप में देना पड़ा…मुझे बहुत मलाल हुआ था इसका।”

        अंत में टैक्सी ड्राइवर ने कहा -
 
      साहब, बुरा मत मानिएगा…उस वक्त तो लगा कि इस सरकारी व्यवस्था का हर आदमी जैसे लुटेरा है। 

         लुटेरा!! और ये लूटनेवाले भी अजीब हुनर रखते हैं साहब!” 
    
          फिर उसने बहुत ही तल्ख़ स्वर में कहा -

       “साहब जी, बुरा मत मानिएगा…लूटने में जो जितना माहिर होता है, वह उतने ही ऊँचे ओहदे पर बैठा मिलता है।”
     
       ड्राइवर की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक मेरे मुँह से हड़बड़ी में निकल पड़ा, 

      “रुको… रुको, यहीं रोक दो…मुझे यहीं उतरना है!”

     दरअसल हम लखनऊ के शहीद पथ पर थे। जैसे ही रमाबाई अंबेडकर पार्क नजर आया, मुझे एकदम से ध्यान आया, अरे, यहीं तो उतरना था!
     
      टैक्सी रुक गई। मैं उतरा। टैक्सी ड्राइवर ने एक नज़र मेरी ओर देखा, जैसे वह कुछ कहना चाहता हो, पर कहा नहीं। गाड़ी आगे बढ़ा दिया।

      मैं सड़क किनारे खड़ा रह गया उसके शब्द अब भी मेरे भीतर गूंज रहे थे,
      
      “लूटने में जो जितना माहिर है…”
                               ******

बुधवार, 25 मार्च 2026

अम्मा : स्मृति की अनंत परिधि



         मेरी गाड़ी घर के सामने आकर रुक गई थी, पर दरवाज़े पर अम्मा दिखाई नहीं पड़ीं। पहले ऐसा कभी नहीं होता था। मेरी गाड़ी की आवाज़ सुनते ही वे दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जातीं, जैसे मेरी राह देख रही हों। आज दरवाज़ा वैसा ही था, पर अम्मा नहीं थीं।

     मैं जानता था..अब गाड़ी की आवाज़ सुनकर अम्मा कभी दरवाज़े पर नहीं आएँगी।

     भारी मन से मैं गाड़ी से उतरा और दरवाज़े की ओर बढ़ा, पर कुछ कदम चलकर ही ठिठक गया। भीतर कहीं एक हूक-सी उठी। पहले होता तो सीधे जाकर दरवाज़े पर खड़ी अम्मा के पैर छूता और सामने पड़े तख़्त पर जा बैठता। पीछे-पीछे अम्मा भी अपनी प्लास्टिक की कुर्सी खींचकर तख़्त के पास ले आतीं। उसी कुर्सी पर बैठी वे मेरा हाल-चाल पूछती रहतीं।

       आज तखत भी वहीं था, कुर्सी भी वहीं रखी थी..पर न जाने क्यों उन्हें देखते ही एक अजीब-सा उजाड़ मन में उतर आया। मैंने ध्यान से देखा…तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी।

     यही वह तखत था, जिस पर अम्मा तह किए हुए कपड़े रखती थीं। उनकी छोटी-सी डोलची भी यहीं रहती थी। रोज़मर्रा की कई चीज़ें वे इसी तख़्त पर सहेजकर रख देतीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें ढूँढना न पड़े।

        मैं भी जब नहाने जाता तो अम्मा से ही कह देता, ‘अम्मा, नहाने जा रहा हूँ।’ और वे वहीं से बता देतीं, ‘तौलिया तख़्त पर रखा है, कंघी और तेल की शीशी डोलची में है…शीशा भी उसी में मिल जाएगा।’

      लेकिन आज उस तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी..सिवा एक गहरी उदासी से भरे खालीपन के।

    मैंने दरवाज़े से नज़रें फेर लीं। ठिठके हुए मेरे कदम अनायास ही पापा के कमरे की ओर मुड़ गए। 

       मेरी पहली तैनाती एक सुदूर जिले में हुई थी। पत्नी और बच्चे भी मेरे साथ जा रहे थे। उस दिन घर के इसी दरवाज़े पर अम्मा खड़ी थीं। वे चुपचाप हमें जाते हुए देख रही थीं। उनके चेहरे पर कोई शब्द नहीं था, लेकिन आँखों में एक ऐसी नमी थी जो बहुत कुछ कह रही थी। जैसे मन का सारा स्नेह उस क्षण पलकों तक आकर ठहर गया हो।

       अम्मा हमेशा चाहती थीं कि घर का कोई भी सदस्य उनसे दूर न जाए। परिवार को एक साथ बाँधे रखना जैसे उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प था। शायद इसी जिद में कभी उन्होंने पापा का तबादला बम्बई से इलाहाबाद कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। पापा केन्द्र सरकार की नौकरी में थे, पर अम्मा के लिए नौकरी की चमक-दमक से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि परिवार बिखरे नहीं। वे चाहती थीं कि सब उनकी आँखों के सामने रहें..एक ही आँगन, एक ही छत के नीचे।

      लेकिन उस दिन शायद परिवार के साथ रहने का सुख उनसे दूर जा रहा था।

       बच्चे रिक्शे पर बैठे थे। रिक्शा धीरे-धीरे घर से कच्चे रास्ते से गाँव से बाहर निकलने लगा। पापा उस रिक्शे के साथ-साथ चल पड़े। वे पक्की सड़क के मोड़ तक आए, फिर उससे आगे सड़क पर चलने लगे थे। वे बिना कुछ कहे चलते रहे..जैसे लौटने का मन ही न हो। अंततः जब वे वापस होने को हुए, तो उनकी चाल में एक अनकही थकान उतर आई थी।

       उसी क्षण मेरी आँखें भी भर आई थीं, पर मैंने उन्हें छिपा लिया। उस समय पहली बार लगा, जैसे मैं किसी नौकरी पर नहीं, अपने ही घर से विदा ले रहा हूँ।

        बच्चों का घर से चले जाना अम्मा को भीतर तक दुःखी कर गया था। वही दुःख धीरे-धीरे उनकी चुप रहने वाली सी नाराज़गी में बदलने लगा। इसके बाद वे मुझसे भी कुछ खिंची-खिंची सी रहने लगीं। अम्मा बहुत भावुक थीं, पर उतनी ही स्वाभिमानी भी। अपने मन की पीड़ा वे किसी से कहती नहीं थीं; उसे भीतर ही भीतर जज़्ब कर लेती थीं।

         और मैं, उनके इतने निकट होकर भी, उनके मन की उन हलचलों को समझने की फुर्सत नहीं निकाल पाया।

       अब जब उस दिन को याद करता हूँ, तो लगता है..दरवाज़े पर खड़ी अम्मा की नम आँखें केवल विदा की नहीं थीं; वे एक ऐसे खालीपन की शुरुआत थीं, जिसे समझने में मुझे बहुत हो गई।

          शायद उस दिन घर से केवल मैं ही नहीं गया था, अम्मा के जीवन का एक हिस्सा भी चुपचाप मेरे साथ चला गया था।

          मैं अपनी नौकरी की व्यस्तताओं में इस कदर उलझता चला गया था कि समय जैसे अनजाने ही हाथ से फिसलता जा रहा था, और इधर अम्मा धीरे-धीरे उम्र की ढलान की ओर बढ़ रही थीं। मेरे मोबाइल में ‘अम्मा’ तो दर्ज था, पर विडंबना यह थी कि उस नाम पर उँगली बहुत कम जाती थी। अक्सर मैं पापा के ही मोबाइल पर फोन कर देता। मन में यह सहज-सा विचार आ जाता कि अम्मा भी तो वहीं पास ही होंगी; यदि इच्छा होगी तो पापा से फोन लेकर मुझसे बात कर लेंगी। पर ऐसा शायद ही कभी हुआ।

     वैसे भी, जब कभी फोन पर अम्मा से बात होती, तो वह दो-तीन वाक्यों से आगे बढ़ ही नहीं पाती। वे पूछतीं—‘सब ठीक है?’

        मैं कहता, ‘हाँ, सब ठीक है।’

        फिर वे दुबारा पूछ लेतीं, ‘खूब ठीक है न?’

      और मैं उतने ही संक्षिप्त स्वर में कह देता, ‘हाँ, खूब ठीक है।’

      बस, इस ‘खूब’ के बाद जैसे शब्दों की डोर टूट जाती और बातचीत वहीं समाप्त हो जाती।

      पर एक दिन उनके सब्र का बाँध जैसे चुपचाप टूट गया। बड़ी करुण आवाज़ में वे बोली थीं, ‘तुम्हारे मुँह से “अम्मा” सुनने को तरस जाती हूँ।’

     उनके स्वर में जो पीड़ा थी, वह आज भी मेरे भीतर कहीं गूंजती है। पर उस समय मैं था कि उनकी इस बात को भी हँसकर टाल गया। कभी-कभी तो वे मुझे आधे उलाहने, आधे स्नेह में ‘निर्मोही’ भी कह देतीं।

      अम्मा चाहती थीं कि मैं उनसे हुलसकर बातें करूँ, जैसे बेटा अपनी माँ से करता है। पर न जाने क्यों, मेरे हिस्से में मौन ही अधिक था। और अम्मा कभी-कभी हल्की-सी शिकायत के साथ पूछ बैठतीं, ‘तुम इतना चुप क्यों रहते हो?’     

         मैं अकसर सोच में पड़ जाता कि आख़िर मेरी मानसिक बनावट कैसी है? और क्यों अम्मा मेरे बारे में इस तरह की धारणाएँ बना लेती हैं? इन प्रश्नों के साथ मैं अपनी स्मृतियों की तहों में उतरने लगता।  

      मेरे बालमन पर अंकित सबसे पहली स्मृति कुछ धुँधली-सी, पर गहरी है। मैं घुटनों के बल सरकता हुआ घर की ऊँची डेहरी लाँघने की कोशिश कर रहा हूँ। डेहरी मेरे छोटे कद के लिए बहुत ऊँची है। घर के दूसरे सदस्य वहीं मौजूद हैं, पर जैसे मेरी ओर उनका ध्यान ही नहीं है। कोई मुझे गोद में उठाकर पार नहीं करा रहा, कोई हाथ बढ़ाकर सहारा नहीं देता। उस क्षण मेरे भीतर पहली बार उपेक्षित होने की एक अनजानी अनुभूति जन्म लेती है।

       इस स्मृति का ज़िक्र बाद में मैंने अम्मा से किया, तो उन्होंने मुझे समझाने के अंदाज में बताया था कि उस समय मेरी उम्र मुश्किल से एक वर्ष रही होगी। तब वे बीटीसी की ट्रेनिंग के लिए इलाहाबाद गई हुई थीं और कभी-कभार मुझे भी अपने साथ वहाँ ले जाती थीं। मेरी स्मृतियों में कर्नलगंज का वह कच्चा दोमंज़िला मकान आज भी धुँधली-सी तस्वीर की तरह बसा हुआ है; वही मकान, जहाँ अम्मा अपनी बीटीसी की ट्रेनिंग कर रही थीं।

       एक बार अम्मा क‌ई महीनों की ट्रेनिंग के बाद घर लौटी थीं। इतने लंबे समय बाद उनका लौटना मेरे बालमन को खल गया था। भीतर कहीं रूठा हुआ गुस्सा जमा था। मैं एक डंडा उठाकर उनके पास पहुँचा और उसे उनके सिर पर चला दिया। पर अम्मा ने न तो डाँटा, न ही क्रोध किया, उन्होंने मुझे तुरंत अपनी गोद में खींच लिया। उस क्षण उनके स्नेह ने मेरे बाल-क्रोध को जैसे पिघला दिया।

       अम्मा यह जानतीं थीं कि मैं बचपन से ही उनसे रूठता आया हूँ..कभी-कभी रूठकर मैं अम्मा से बोलना बंद कर देता तब अम्मा भी मुझसे न बोलतीं‌। मैं सोचता रहता कि अम्मा मुझे मनाए तब मैं बोलूँ। लेकिन अम्मा मुझे सुनाते हुए कहतीं कि देखो यह अपने अम्मा से भी नहीं बोलता, इससे मेरे बालमन को ठेस लगता और अचानक मैं ‘अम्मा’ बोल देता। 

         कभी-कभी इन प्रसंगों को यादकर मैं अम्मा से इसकी चर्चा छेड़ देता। तब अम्मा कहतीं, हाँ बाबा बहुत छोटे थे जब आपको छोड़कर मैं बीटीसी की ट्रेनिंग करने गई थीं। इसके बाद वे मेरा बचपन याद कर भावुक हो उठतीं। इन दिनों अम्मा को मेरा बचपन कुछ ज़्यादा ही याद आने लगा था। अक्सर मुझसे बात करते-करते वे एक घटना का ज़िक्र छेड़ देतीं कि… “बाबा, आप साल भर के हो रहे थे जब पहली बार आप खड़े होकर चले थे। आँगन में तुलसी के चौरा के पास खड़े होकर आपका यह चलना देख मैंने खुशी से चिल्लाकर माई (मेरी नानी) को पुकारा था कि माई देख बाबा चलने लगे..!!”  यह बात पूरी होते-होते अम्मा की आँखें छलछला उठती। इधर दो-एक वर्षों से मैं यह भी देख रहा था अम्मा मेरे बचपन की बातें यादकर बेचैन हो उठतीं थीं जैसे उन्हें कोई बात कचोटती हो! जब भी मैं घर आता अम्मा मुझसे पूँछती, बाबा नजदीक ट्रांसफर नहीं होगा! जब मैं कहता, नहीं, इधर नहीं होगा, तो उनकी यह बेचैनी और भी बढ़ जाती। लेकिन अम्मा की यह बेचैनी मैं नहीं समझ सका। 

         जब अम्मा अध्यापिका बनीं तो एक दिन मुझे भी अपने साथ पहली बार स्कूल ले ग‌ईं। अम्मा ने मुझे अन्य बच्चों के बीच बैठा दिया। कक्षा में अन्य बच्चे अपनी-अपनी पुस्तकें पढ़ रहे थे अम्मा ने मुझे भी पढ़ने के लिए एक पुस्तक दिया और किसी शब्द को पढ़ने के लिए कहा‌। उस समय मैं पढ़ना सीख ही रहा था। किसी अनपहचानी सी शब्दाकृति पर मैं अटक गया। इसे पहचानने की कोशिश कर रहा था कि तभी अम्मा का एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गालों पर पड़ा। उस तमाचे की स्मृति आज भी मेरे गालों पर उभर आती है। एक शिक्षिका होने से इतर अम्मा के व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी था जैसे कि वे सत्य के प्रति आग्रहशील और अपने आदर्शों से समझौता न करने वाली महिला थीं। वे साहसी भी थीं। उस जमाने में साइकिल चलाकर अम्मा स्कूल में पढ़ाने जातीं। इसके लिए उन्हें चार से पाँच किलोमीटर तक साइकिल चलाना पड़ता। कभी-कभी अम्मा मुझे भी साइकिल के पीछे कैरियर पर बैठाकर अपने स्कूल लिवा जातीं। वे मुझे घर पर भी पढ़ने के लिए प्रेरित करतीं।        

     पापा, दादा जी की अकेली संतान थे और मैं तीन बहनों में अकेला भाई। इसलिए दादा जी मुझे ‘तुरुक का दातुन’ कहते, यानी सबके लिए प्रिय अकेली चीज। दादा जी का स्वभाव बड़ा अनुशासनप्रिय था। वे जीवन को नियम और संयम की डोरी से बाँधकर जीने में विश्वास रखते थे। बचपन में उन्होंने मुझे अनुशासन का ऐसा कठोर पाठ पढ़ाया कि उसकी छाप मेरे स्वभाव पर गहराई से अंकित हो गई—आज भी उनकी वह सीख जीवन की राह में मेरा मार्गदर्शन करती है। अम्मा भी तो ऐसी ही थीं। कहते हैं कभी-कभी बहुत दुलार से बच्चों के बिगड़ने का डर होता है, यह बात अम्मा को भी पता थी। अम्मा सदैव मुझे अपने आदर्शों पर कसती रहीं-गढ़ती रहीं। एक दिन रसोईं के पास बैठाकर अम्मा ने मुझे एक पाठ बहुत समझाकर पढ़ाया था: सच्चा बालक! किसी कहानी का यह मेरा पहला पाठ था। इस पाठ के बहाने अम्मा ने मुझे जैसे जीवन का पाठ पढ़ाया था‌। इस तरह अनजाने में ही सही अम्मा मुझे अपने तरीके से गढ़ रही थी।

      पर न जाने क्यों, अम्मा के साथ मेरे संबंधों में एक अदृश्य-सा भावनात्मक शीतयुद्ध भी चलता रहा। शायद ऐसा इसलिए होता है कि जो व्यक्ति हमारे जीवन में सबसे अधिक प्रिय और सबसे अधिक निकट होता है, उसके खो जाने का भय भी उतना ही गहरा होता है। संभव है, माँ-बेटे के बीच यह मौन खिंचाव उसी भीतरी आशंका की उपज रहा हो।

       लेकिन इसके पीछे एक और कारण भी रहा होगा। उम्र चाहे जितनी बीत गई हो, अम्मा के सामने जाते ही मैं अनायास वही छोटा-सा बच्चा बन जाता था…हाँ, वही बच्चा, जो शैशव से ही उनसे रूठता-मनाता चला आया था।

      शायद इसी भावनात्मक शीतयुद्ध का परिणाम था कि न तो अम्मा ने मुझ पर अपना अधिकार जताया, न ही मैं उन पर। और जब जीवन के किसी मोड़ पर मुझे लगा कि अब मुझे अम्मा पर अपना अधिकार जताना चाहिए तभी वे इस दुनिया से विदा हो गईं।

        अम्मा ने अपना पूरा जीवन अपनी ही शर्तों पर जिया… स्वाभिमान और संतोष के साथ। उन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं थी; जो मिला, उसे उन्होंने सहज भाव से स्वीकार किया और उसी में प्रसन्न रहना सीखा। शायद वे मुझसे यही चाहती थीं कि मैं उनके पास बैठूँ, उनसे खुलकर, हुलस-हुलसकर बातें करूँ। पर न जाने क्यों, यह छोटी-सी खुशी भी मैं उन्हें नहीं दे पाया।

        मैं मन ही मन सोचता था, नौकरी से निवृत्त होने के बाद फिर एक बच्चे की तरह अम्मा के पास रहूँगा। उनके साथ समय बिताऊँगा, उनसे जी भरकर बातें करूँगा। बरसों से मन में जो कुछ दबा है, उसे उनके सामने उँडेल दूँगा। और जब मेरी बातों से अम्मा के चेहरे पर वह तृप्त मुस्कान लौट आएगी, तब शायद पहली बार मैं उन पर अपना वह सहज अधिकार भी जता सकूँगा, जो एक बेटे को अपनी माँ पर होना चाहिए।

       लेकिन जीवन हमेशा हमारी प्रतीक्षा नहीं करता। मन की वह इच्छा मन में ही रह गई। जब तक मैं उस अधूरे स्नेह को शब्द दे पाता, अम्मा चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गईं…और मेरे हिस्से में रह गईं बस उनकी स्मृतियाँ, और एक ऐसी रिक्तता, जिसे अब कोई भर नहीं सकता।

         अम्मा के भावनात्मक संसार में यदि कोई सबसे अधिक निकट था, तो शायद वह मैं ही था। यह बात मुझे बचपन में उनके साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों से धीरे-धीरे समझ में आई। पर अम्मा का स्वभाव ऐसा था कि वे इस स्नेह को कभी खुलकर दिखने नहीं देती थीं। शायद उन्हें डर रहता कि कहीं ऐसा न लगे कि मैं ही उनका सबसे प्रिय हूँ और बाकी लोग अपने को उपेक्षित समझ बैठें। इसलिए कई बार सबके सामने वे मेरी उपेक्षा भी कर देतीं।

      लेकिन जब मैं घर आता और घर में बस हम दोनों ही होते, तब अम्मा का वह दबा हुआ स्नेह जैसे अपने आप बाहर आ जाता। वे मेरे आसपास ही मँडराती रहतीं…कभी मेरे बचपन की कोई भूली-बिसरी घटना सुनाने लगतीं, कभी तेल की छोटी-सी शीशी उठा लातीं और बड़े स्नेह से मेरे सिर पर मालिश करने बैठ जातीं।

      एक बार उन्हें लगा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। उन्होंने पूछा, ‘डॉक्टर को दिखाया कि नहीं?’ जब मैंने सहज ही ‘नहीं’ कह दिया, तो वे हल्की-सी चिंता में डूबकर बोलीं थीं कि ‘जब अपने को ही नहीं दिखा रहे हो, तो बीमार पड़ने पर अम्मा को डॉक्टर को क्या दिखाओगे?’

     अम्मा की वह साधारण-सी बात आज भीतर कहीं गहरी टीस की तरह चुभ जाती है।

       पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से अम्मा की स्मरण-शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी थी। कभी उन्हें समय का ठीक-ठीक बोध नहीं रहता, कभी स्थान का, तो कभी अभी-अभी घटित कोई छोटी-सी घटना भी उनकी स्मृति से फिसल जाती। उस समय यह सब उम्र के स्वाभाविक ढलान जैसा ही लगा।

       जब मैं गाँव गया, तब भी इन संकेतों को मैंने संकेत की तरह नहीं देखा। अम्मा की लगातार बनी रहने वाली खाँसी को भी साधारण समझकर टाल गया। कई महीनों से उनसे ठीक से कुछ खाया भी नहीं जा रहा था…मैंने इसे भी कोई गंभीर बात नहीं माना। कस्बे के डॉक्टर ने भी सहज स्वर में कह दिया था, “कोई बड़ी बीमारी नहीं है।” 

        शायद उसी एक वाक्य ने मेरी लापरवाही को जैसे एक तर्क दे दिया।

       आज सोचता हूँ…कभी-कभी मनुष्य अपने आश्वस्त रहने की सुविधा के लिए भी सच से आँख चुरा लेता है।

      अम्मा भीतर से बहुत मजबूत थीं। वे अपनी पीड़ा को सहजता के आवरण में छिपाकर जीने की आदी थीं। उनके चेहरे को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन था कि भीतर कोई बीमारी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है।

        और सच तो यह भी है कि अम्मा ने स्वयं भी कभी नहीं कहा, “मैं बीमार हूँ।”

        वे हमेशा यही कहतीं,

        “मैं ठीक हूँ।”

       शायद उन्हें लगता था कि उनकी बीमारी की बात सुनकर मैं व्यर्थ ही व्याकुल हो जाऊँगा।

       एक दिन पहले ही मैंने पापा के फोन पर उनसे बात की थी।

        “हलो अम्मा… अम्मा…!”

        उधर से हल्की-सी आवाज आई…

        “बाबा…”

         “हाँ अम्मा…”

          अम्मा बोलीं,

        “बाबा… घबड़ा जिन। काहे एतना घबड़ात हउ तू सभे? बीमारी-उमारी त होए जाथ है… हम ठीक होइ जाब…एतना परेशान जिन होत जा…”

         इतना कहते-कहते उन्हें खाँसी आ गई।

       मैंने उस खाँसी को भी एक सामान्य खाँसी की तरह ही लिया।

        किसे पता था कि यह हमारे बीच अंतिम संवाद होगा।

       अगले ही दिन अस्पताल में मैंने अम्मा को एक-एक साँस के लिए संघर्ष करते देखा।

        डॉक्टर ने धीमे और लगभग निर्विकार स्वर में कहा…

      “अब बहुत देर हो चुकी है। इन्फेक्शन पूरे फेफड़ों में फैल चुका है। लगभग पूरा फेफड़ा नष्ट हो चुका है। अभी जो ये साँस ले रही हैं, उसमें भी इन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ रही है.. कुछ देर में ये थक जाएंगी फिर इनकी सांसें थम जाएगी..अगर समय रहते इलाज मिल जाता तो शायद स्थिति अलग होती…”

       डॉक्टर की बात सुनते ही जैसे भीतर कहीं गहराई में टूट गया।

       उस क्षण पहली बार अपनी लापरवाही का पूरा आकार दिखाई दिया।

      अम्मा के जीवन और स्वास्थ्य के प्रति मैंने स्वयं घोर उपेक्षा बरती थी। और फिर एक दिन अम्मा नहीं रहीं।

        अम्मा और उनके बेटे के बीच की इस कहानी का वहीं अंत हो गया….या इस कहानी की वहीं से एक दूसरी शुरुआत हुई। 

           उस दिन अम्मा की चिता जल रही थी। चिता से कुछ दूर बैठा मैं अग्नि की लपटों को देर तक देखता रहा। धीरे-धीरे लकड़ियाँ अंगारों में बदल रही थीं, और मेरे भीतर स्मृतियों का एक लंबा सिलसिला खुलता जा रहा था।

तभी पहली बार यह विचार मन में आया…

        समय वास्तव में कितना अमूल्य होता है। हम अक्सर उसे पहचानने में देर कर देते हैं। और जब तक उसकी महत्ता समझ में आती है, तब तक बहुत कुछ हमारे हाथों से छूट चुका होता है।

       उस दिन लगा..अम्मा की चेतना इस दृश्य जगत से उठकर कहीं उस अनंत ब्रह्मांड में विलीन हो गई है। लेकिन धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगा कि अम्मा कहीं गई नहीं हैं। वे अब भी हमारे भीतर हैं…हमारी स्मृतियों में, हमारे व्यवहार में, हमारे निर्णयों में।

       अम्मा चुपचाप हमें गढ़ती रही थीं…मुझे ही नहीं, पूरे परिवार को, अपने आसपास के संसार को भी। उन्होंने अपने एक साधारण-से बेटे को भी ऐसा आत्मविश्वास दिया कि वह अपने दम पर अपना संसार रच सके।

तेरहवीं के दिन किसी ने सुझाव दिया—

       “अम्मा की एक तस्वीर रख दी जाए, ताकि आने वाले लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें।”

        पापा ने मना कर दिया। मुझे भी वही ठीक लगा। क्योंकि उस समय लगा…अम्मा अब किसी एक तस्वीर में समा जाने वाली उपस्थिति नहीं रहीं। वे स्मृति बनकर हमारे भीतर फैल गई हैं….

      एक ऐसी अदृश्य चेतना की तरह, जो शायद अब कभी हमसे दूर नहीं होगी।


मंगलवार, 24 अक्टूबर 2023

जमानतदार

          उसने अपना नाम हलकाई और स्वयं को भूमिहीन बताया। इस क्षेत्र में कुछ ऐसे ही नाम होते हैं..हल्कू..हलकाई..बारेलाल जैसा। नामों में ही जैसे गरीबी झलक उठती है। उसकी कहानी सुन लेने के बाद मैं हैरानी के साथ उसे देखने लगा था ! और वह भी कपाल में गहरी धँसी अपनी मिचमिचाती आँखों से मुझ पर नजरें गड़ाए था। मेरे मन-मस्तिष्क में एक अजीब सी संज्ञाशून्यता उभर आई ! आसपास का शोर भी मुझे सुनाई नहीं पड़ रहा था।
           
           उसने मुझसे गरीबी का राशनकार्ड ही मांगा था, उसे देखते हुए मैंने भी यही सोचा था कि यह कार्ड इसे मिलना चाहिए। लेकिन जब उसने कहा कि पहले उसके पास यह कार्ड था, जिसे उसके जेल जाने पर काट दिया गया और वह तीन साल जेल में रह कर आया है, तो मेरे कान खड़े हो गए थे। मैं सोचा रहा था कि मरियल सा दिखने वाला यह बूढ़ा व्यक्ति क्या कोई अपराध कर सकता है ? और क्या ऐसा करना इसके बूते में है? 

            वैसे मेरा अपना अनुभव रहा है कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में अशिक्षा और रूढ़िवादिता के कारण गरीबी सिर चढ़कर बोलती है। छोटी-छोटी बातों में भी लोग अपना विवेक खो देते हैैं, ऐसा हो भी क्यों न, गरीबी में उलझी जिन्दगी लोगों को परिणामों से बेपरवाह बना देती है! और गाहे-बगाहे खून के रिश्तों में भी हत्या जैसा अपराध घटित हो जाता है। तो, उसकी जेल जाने वाली बात पर मैंने यह सोचकर कि "हो न हो इसने भी कोई अपराध कारित किया हो!" उससे पूँछ बैठा था, "तुम जेल क्यों गए थे?" फिर उसने अपनी कहानी सुनाई थी।
     
            *                                *                                 *

               दरअसल भूमिहीन नहीं था वह, तीन-चार बीघे की खेती थी उसके पास। वैसे जो बुंदेलखंड को जानते हैं, वहां पड़ने वाले सूखे को भी जानते होंगे। जब दस-दस बीघे वाला किसान दाने-दाने को मोहताज हो रहा होता है, तो तीन-चार बीघा वाले किसान की स्थिति समझी जा सकती है, इनमें सूखा झेलने की कुव्वत नहीं होती, इन्हें तो वैसे ही गरीब माना जाता है। लेकिन सूखे में यही मजे में भी रहते हैं, क्योंकि तब बुंदेलखंड की समस्याओं पर राजनीति भी होने लगती है ! और खाद्य-सुरक्षा जैसी योजनाओं के पालन में तत्परता आ जाती है। इधर इज्जतदार बनने के चक्कर में दस बीघे वाला किसान न मजदूरी करता है और न ही राहत ले पाता है और सूखे की मार सबसे ज्यादा इसी पर पड़ती है, जिसके घरों से चूहे भी विदायी मांग रहे होते हैं।

             हलकाई को खाद्य-सुरक्षा वाला कार्ड मिला था जिसके बलबूते उसकी गरीबी और सूखे की समस्या हल हो जाती। लेकिन उम्र के इस तीसरे पड़ाव में भी उसके मन के किसी कोने में विवाह की इच्छा राख में दबी तिनगी की तरह अब भी सुलगती रहती। गाँव का नत्थू, जो थोड़ा अकड़ूँ और चालू स्वभाव का था और उम्र के लिहाज़ से उससे छोटा भी था, अकसर अपनी चुहलबाजी से इस आग को हवा दे देता और हलकाई के मन में विवाह के लड्डू फूटने लगते। इस चक्कर में ही उसने नत्थू से अपने संबंध प्रगाढ़ कर लिए थे।

          एक दिन अलसुबह ही नत्थू उसके पास आकर जेल में बंद अपने रिश्तेदार की जमानत लेने की उससे चिरौरी करने लगा था। हालांकि हलकाई ने अपनी गरीबी का हवाला जरूर दिया लेकिन समझाने पर वह नत्थू की बातों में आ गया था और अपनी तीन-चार बीघे की जमीन बंधक रख उसके रिश्तेदार की जमानत ले ली थी। जमानत वाले दिन जेल में बंद नत्थू के रिश्तेदार के बारे में जज ने हलकाई से पूँछा भी था कि "क्या तुम इसे जानते हो" लेकिन उसने बेखटके "हाँ" में सिर हिला दिया था। नत्थू के रिश्तेदार की जमानत हो गई। उस दिन शहर के एक होटल में नत्थू ने हलकाई को छक कर भोजन कराया था, पूँछ-पूँछकर उसे मनपसंद की चीजें खिलाई गई थी। फिर तीनों खुशी-खुशी गाँव लौट आए थे।
        
            धीरे-धीरे जमानत लिए हुए पाँच-छह महीने खिसक गये थे, इस बीच हलकाई को देखकर भी नत्थू उसे अनदेखा करने लगा था। यही नहीं हलकाई के साथ हंसी-मजाक करना भी उसने बंद कर दिया। जबकि पहले वह हलकाई से घंटों चिपका रहता और जब-तब घर ले जाकर उसे खाना भी खिलाता। हलकाई को नत्थू का यह बदला व्यवहार कुछ समझ में नहीं आ रहा था। यदि वह नत्थू से मुखातिब होना चाहता भी तो वह हाँ-हूँ करके नत्थू उससे मुँह मोड़ लेता।

              एक दिन गाँव के कोटेदार के यहाँ से हलकाई अनाज लेकर आ रहा था। रास्ते में पड़ोसी बुधुवा का बेटा रमइया, जो कक्षा सात में पढ़ता था, दौड़ते हुए आते हुए दिखाई पड़ा था। पास आकर वह हांफते हुए बोला था, "दादू..आपके घर पुलिस आई है..आपको पूंछ रहे हैं.."
          
            हलकाई को पुलिस वाली बात कुछ समझ में नहीं आई और वह डर भी गया था। उस दिन घबड़ाहट में वह हाँफते-कांपते घर पहुँचा था। घर के दरवाजे पर खड़े दो पुलिस वालों को देख उसके मुंह से कोई बोल नहीं फूट पाया था। वह अनाज का झोला पास की झिंलगी चारपाई पर रखकर पुलिस वालों के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया था। उसके कानों में एक पुलिस वाले की कड़कती आवाज गूँज उठी थी, "क्यों रे, तेरा ही नाम हलकाई है न?" काँपती आवाज में उसके द्वारा "हाँ" कहने पर पुलिस वालों ने कहा था, "हम कोर्ट की नोटिस तामील कराने आए हैं, सात दिन बाद तारीख है, मुल्जिम को कोर्ट में हाजिर करा देना..नहीं तो तुमको ही अन्दर कर दिया जाएगा।" उसे कुछ समझ में नहीं आया था कि वह किसे वह हाजिर कराए। क्योंकि उसे तो अब यह भी याद नहीं रहा कि कभी उसने किसी की जमानत भी ली थी। पुलिस वालों ने उसे जैसे याद दिलाते हुए कहा, "तुम इसकी जमानत लिए थे..कहाँ मर गया यह साला ? दो तारीखों से कोर्ट में हाजिर नहीं हुआ है।" उस दिन हलकाई पुलिस वालों के सामने किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रहा और पुलिस वाले एक कागज उसे पकड़ा कर अँगूठे का निशान लेकर चले गए थे। 

          पुलिस वालों के चले जाने के बाद हलकाई को अचानक नत्थू याद आया। साथ में उसके रिश्तेदार की जमानत लेने वाली बात भी याद आई। अब उसे पछतावा भी हो रहा था कि उसने नत्थू से उसके रिश्तेदार का नाम क्यों नहीं पूँछा था। बात समझ में आते ही उसका दिल धड़क उठा था और वह भागते हुए नत्थू के घर पहुँचा था। उस दिन नत्थू अपने घर नहीं मिला। घर वालों के अनुसार नत्थू बिना बताए घर छोड़कर कहीं चला गया है। यह सुनकर हलकाई को जैसे काठ मार गया था। तय तारीख पर वह मुलजिम को कोर्ट में हाजिर नहीं करा पाया था। कोर्ट द्वारा उसकी जमानत जब्त करने के आदेश पारित हो गए थे। बाद में, जमानत की धनराशि न जमा कर पाने के कारण न्यायालय ने हलकाई को जेल भेज दिया था।

          अपनी कहानी के अंत में हलकाई ने अपनी मिचमिचाती आँखों से मुझे देखते हुए यही कहा था, "हाँ  साहब, पैरवी में हमारी जमीन दूसरे ने लिखा लिया अब हमारे पास कोई खेती नहीं है।" 

           *                            *                             *

          धीरे-धीरे मेरे आसपास का शोर मुझे सुनाई देने लगा। मैंने हलकाई की मुलमुलाती आँखों में झाँकने की कोशिश की और उससे पूँछा,  

           "जिसे तुम ठीक से जानते भी नहीं थे, फिर उसकी जमानत क्यों लिए..?"

           "साहब, मैं ठहरा सीधा-सादा आदमी, मैंने नत्थू पर विश्वास कर लिया था और जमानत ले ली।" हलकाई ने कहा।

            "फिर तो, नत्थू..." मैं पूरी बात कह पाता बीच में ही वह फिर बोल उठा,  

            "साहब तभी से उसका भी तो पता नहीं चला है, और साहब अगर वह मिल भी जाए तो यहाँ मेरी कौन सुनता है!"
   
            मैं उससे कहने वाला था, "ऐसा कैसे? हम सब सुनने के लिए ही तो बैठे हैं यहाँ।" लेकिन बोल नहीं पाया, क्योंकि हमें लगा हम सिस्टम के प्यादे हैं और प्यादे बोलते नहीं! हाँ मैं उसे उसका राशनकार्ड दिलवाकर जैसे उसकी सुन लिया था! वह भी खुश हो रहा होगा कि आखिर उसकी सुनवाई जो हुई! ऐसी ही छोटी-छोटी बातों में सिस्टम का उद्देश्य पूरा हो जाता है। 
         
            लेकिन उसके जाते ही मेरे मन में यही खयाल उठा,

            "यदि मैं न्यायाधीश होता तो क्या इस कपाल में धँसी मिचमिचाती आँखों वाले जमानतदार के जमानत-पत्र को अस्वीकार कर देता? और अभियुक्त के वकील को दूसरा जमानतदार ढूँढ़ने का आदेश देता? लेकिन कानून के साथ हम भी तो अंधे ही होते.!!"  

चायवाला

         आज सुबह छह बजे टहलने निकला। सोसायटी से बाहर सर्विस रोड पर कुछ दूर चला होगा कि उस स्थान की ओर नजर गई जहाँ आठ नौ फीट ऊँचे बांस के एक पतले डंडे में राष्ट्रीय झंडा हमेशा फहरता रहता है। आज यहाँ बरसाती का टपरा भी लगा दिखाई दिया। ऐसे ही एक दिन सुबह पहली बार जब इस तिरंगे पर मेरी नजर पड़ी थी तो अकेले इस झंडे को यहाँ फहरते देख मुझे तनिक आश्चर्य हुआ था कि आखिर कौन इसे यहाँ फहराकर गया है क्योंकि उस दिन यह बरसाती यहाँ नहीं लगी थी कि अनुमान लगाता। अकसर यहाँ से गुजरते हुए मैं इस ओर निहार लेता हूँ। ऐसे ही एक दिन मैंने पाया था कि एक व्यक्ति प्रतिदिन सुबह आठ बजे के आसपास यहाँ आकर अपनी चाय की दुकान सजाता है। जो तेज धूप या मौसम के खराब होने पर इस बरसाती को तान लेता है। आजकल मौसम खराब चल रहा है इसलिए दुकान समेटने के बाद भी वैसे ही तनी बरसाती छोड़ गया है। वही चायवाला इस तिरंगे झंडे को यहाँ फहराए रखता है। जो मेरे यहाँ आने से भी क‌ई महीने पहले से अनवरत फहरता चला आ रहा है।
      
       यह स्थान हमारी सोसायटी के पास में है, बल्कि इस स्थान के पीछे एक अन्य बहुमंजिली सोसायटी की इमारत भी है। जहाँ तक मैं समझता हूं सोसायटी में रहने वालों से इसकी दुकानदारी नहीं चलती है और न ही उस पेट्रोल पंप के कर्मियों से चलती है जो इसके नजदीक ही स्थित है। तो चायवाले की यह दुकान किनसे चलती है? इस स्थान से ठीक सामने गोल चौराहा है जिससे होकर कामगार निकलते रहते हैं। इनमें से कोई पैदल, कोई साइकिल से और कोई स्कूटी से भी होता है। सुबह और शाम इनकी आवाजाही बढ़ जाती है। अकसर इन्हीं लोगों से इस दुकानवाले की दुकानदारी चलती है। आज इस स्थान को देखकर मुझे उस दिन की बात याद आई।    
       
           उस दिन छुट्टी का दिन था। घर की दीवारों के बीच लगातार रहने से मन कभी-कभी अनमना हो उठता है। तब घर की ये दीवारें भी मन को नहीं मना पाती। ऐसे में मन को किसी भुलावे में डाल देना चाहिए क्योंकि इससे मिले समयान्तराल से मनोदशा बदल सकती है। इसी को शायद रिफ्रेश होना भी कह सकते हैं। आखिर मन को भी स्पेस चाहिए और यह मौका मन को मिलना चाहिए। तो, उस दिन अपने अनमने मन को लेकर मैं घर से बाहर आया था कि थोड़ी देर के लिए खुली हवा में सांस लेगा। यह दोपहर बाद ढाई बजे का समय था। बाहर आने पर संझलौके का अहसास हुआ। इस मार्च के महीने में आसमान में घने काले बादल छाये थे। बिजली की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें इन बादलों के बीच कौंध रही थी फिर गड़गड़ाहट की आवज उठती। प्रकृति जैसे किसी बात पर गुस्साई हो! इस दृश्य के बीच मन में आया कि वापस घर की ओर कदम खींच लें, लेकिन सुरसुराती हवा और मौसम के इस मिजाज में एक गजब का आकर्षण था इसलिए सोसायटी के बाहर निकल आया।

        यूँ ही कुछ देर सर्विस रोड पर टहलता रहा। इस रोड पर भी इक्का-दुक्का कारें आ जा रही थी। लेकिन मेन स्ट्रीट पर वाहनों की चिल्ल-पों थी। धीरे-धीरे मौसम का मिजाज कुछ करवट लेता दिखाई पड़ा। अब हवाएं वेगवान हो चली थीं। घने काले बादल भूरे हो चुके थे और गर्जन-तर्जन भी थम गया था। बूँदाबांदी शुरू हुई तो मैं छाँव तलाशने पेड़ की छाँव में चला आया। यहाँ एक बेंचनुमा दीवाल पर बैठकर गोल चौराहे पर दृष्टि जमा दिया। चौराहे को हरियाली से सजाया गया था। वहां के पेड़ पौधों को कुछ देर निहारने के बाद इस चौराहे का चक्कर लेती कारों को देखने लगा। चौराहे की यह कृत्रिम हरियाली आदमी के स्वयं के कुकृत्य को ढँकने का प्रयास जान पड़ा। अब इसे देखने से मन का उचाट हो गया। मैं उठ खड़ा हुआ। लेकिन अभी भी बूँदाबादी हो रही थी। उस ओर आया जिधर फलूदा आइस्क्रीम, मोमोज और ठंडे पेयपदार्थ बेचने वाले ठेले लगे थे। एक ठेले की सजावट पर मैं आकर्षित भी हुआ था। लेकिन बूंदाबादी बारिश में बदलने को बेताब जान पड़ी तो छाँव तलाशने के लिए फिर इधर-उधर देखने लगा था। सहसा मेरी दृष्टि इसी बरसाती की ओर ग‌ई थी। उस दिन भी यह बरसाती ऐसे ही बंधी थी जिसके दो कोने बाउंड्री के कटीले तार से और तीसरा कोना बिजली के खंभे वाले सपोर्टिंग वायर से बांधकर चौथे कोने को एक पतले बांस के डंडे से बंधा गया था। एक व्यक्ति जो साठ की वय से ऊपर का था इसके नीचे अपनी दुकान लगाकर बैठा था। उसके सामने एक छोटा स्टोव, इसके ऊपर भगोना और एक केतली रखा था। इसके बगल में ही बिस्कुट और नमकीन के कुछ डिब्बे भी रखे थे तथा पाउच की कुछ झालरें लटक रही थी। ग्राहकों के बैठने के लिए दुकानदार के पीछे सीमेंट के दो-तीन पटिए रखकर उसपर बोरे बिछाए गए थे। उस दिन बरसाती के सामने लगा यह राष्ट्रीय ध्वज तेज हवा में फड़-फड़कर फहरा रहा था। 

       तेज हो रही बूंदाबांदी से बचने के लिए मैं इसी बरसाती के नीचे चला आया था और ग्राहकों वाले आसन पर आलथी-पालथी मारकर बैठा। यहाँ पहले से एक आदमी बैठा चाय सुड़क रहा था। उस दिन का मौसम ही कुछ ऐसा हो चला था कि मेरी भी इच्छा चाय पीने की हुई थी। लेकिन पास में कोई नगदी न होने से इस इच्छा को दुकानवाले से व्यक्त नहीं कर पा रहा था। वैसे भी आजकल मैं नकदी कम ही रखता हूं, आवश्यकता पड़ने पर पेटीएम वगैरह की सुविधा का उपयोग कर लेता हूँ। बरसाती में जाने से पहले मैंने देखा था कि दुकानदार ने यहाँ कोई क्यूआर कोड नहीं लगाया है। फिर भी चाय पीने की अपनी इच्छा जताने के लिए मैंने दुकानदार से पूँछा था कि चाय बनाते हो। उसके 'हाँ' कहने के बाद मैंने फिर पूँछा कि क्या पेटीएम से भुगतान लेते हो। इसके उत्तर में उसने अबोले ही सिर हिलाया था कि नहीं। मतलब ऐसी व्यवस्था उसके पास नहीं है। मेरे बगल बैठा व्यक्ति उसके इस 'नहीं' की व्याख्या करते हुए बोला था, अरे! इतनी बड़ी कौन सी इनकी दुकानदरी है कि बैंक में पेमेंट लेंगे, इन्हें तो रोज कमाना रोज खाना है, कौन सी बचत है कि बैंक की जरूरत पड़े।"  मैं चुप ही रहा क्योंकि मैं भी यह समझता था। मैंने तो पेटीएम वाली बात इसलिए पूँछा था कि चायवाले को यह पता चल जाए कि मैं चाय पीना चाहता हूं लेकिन मेरे पास नगदी नहीं है। 
       
        वह आदमी चाय पीकर उठ गया था। इधर यहाँ बैठे-बैठे मैं सोच रहा था कि यदि चायवाला मुझे चाय देता है तो घर से पैसे लाकर दे देंगे और फुटकर न होने का बहाना कर कोई बड़ा नोट इसे पकड़ाएंगे। मैंने कुछ देर तक उसकी प्रतिक्रिया का इन्तजार किया। लेकिन मुझ पर ध्यान न देकर उसने एक डिब्बे से बिस्कुट के बचे टुकड़े निकाले। इसे अपनी हथेलियों में लेकर उसे मसला। फिर बिस्कुट के इस भूरे को बरसाती के बाहर के एक साफ-सुथरी जगह पर फेंक दिया था। ये भूरे वहाँ छितराए हुए स्पष्ट दिख‌ई पड़ रहे थे। एक नन्हीं सी खूबसूरत चिड़िया वहाँ आई और निर्भय होकर इसे चुगने लगी थी। जैसे उस चिड़िया को यह पता हो कि दुकानदार ने उसी के लिए ये भूरे छितराए हैं। शायद वह पहले से ही इसके ताक में थी!! इसे चुग कर चिड़िया उड़ गई थी‌। मैं अभी भी वहां बैठा था‌। अब चाय वाले ने मेरी ओर देखे बिना मुझसे चाय के लिए पूँछा था। मैंने उसे बताया था कि मेरे पास नगद पैसे नहीं हैं। उसने चाय बनाने की कोई कवायद शुरू नहीं की‌। इससे मैंने यह समझ लिया था कि इस चायवले के लिए पाँच या दस रूपए भी बहुत मायने रखते हैं। कुछ क्षण और बिताने के बाद मैं इस बरसाती से बाहर निकल आया था। अब तक मैं अपना अनमनापन भी भूल चुका था।     
       
       आज अभी दुकानवाला यहाँ नहीं आया है लेकिन झंडे को फहरते देख मैंने सोचा कि यह चायवाला भी न, पता नहीं किस मिट्टी का बना है जो अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के बावजूद भी तिरंगे से इतना प्रेम कर सकता है! उसकी खुद्दारी पर मुझे आश्चर्य हो रहा था। 

#सुबहचर्या
(04.04.2023)

अम्मा

      "अम्मा! पहचानूं हम‌इ?" 
       "अरे बिटिया भला तोह‌इं न पहिचानब!" यह कहकर उन्होंने नाम लेकर बताया कि वह कौन है। 
       पिचासी वर्ष से कुछ अधिक ही आयु होगी उन वृद्धा की, जो अभी-अभी व्हील चेयर से यहाँ आई हैं। आज उनके पौत्र का व्रतबंध संस्कार का कार्यक्रम है। उनके चेहरे पर की झुर्रियां और उनके सिर के सफेद बाल उनकी गरिमा को बढ़ाता हुआ प्रतीत हो रहा था। वे अम्मा क‌ई साल बाद देख रहीं थी। कुछ साल पहले बाबूजी अर्थात अम्मा के पति का देहांत हो गया था। उनके पति कोई सरकारी मुलाजिम थे और रिटायर होने के बाद पेंशन मिल रहा था उन्हें। बाबूजी के जाने के बाद अम्मा भी बीच में गंभीर रूप से बीमार पड़ी थीं। इसीलिए आज जब अम्मा को उन्होंने देखा तो वे काफी कमजोर दिखाई पड़ीं थी। उम्र और बीमारी का प्रभाव उनके शरीर पर साफ दिखाई पड़ रहा था। अभी वे अम्मा को ध्यान से देख ही रहीं थी कि अचानक अम्मा बोलीं, "बिटिया हमार चोटी थोड़ा गुहि द्यौ।" अम्मा ने उनसे चोटी बनाने के लिए कहा था। 
        वे अम्मा की चोटी ठीक करने लगी थीं। इसे ठीक कर वे अम्मा से बोली, "ल्यौ अम्मा तोहार चोटी ठीक हुइ ग्यौ।" 
       "अरे वाह बिटिया बहुत बढ़िया!" अम्मा ने पीछे चोटी पर हाथ फिराते हुए कहा। 
     इसके बाद अम्मा ने वहीं पास में एक साड़ी के पैकेट को दिखाते हुए कहा, देखो बिटिया, एह साड़ी में फाल-वाल लगा है कि नहीं। वे उस पैकेट को खोलकर देखने लगी। उसमें साड़ी, पेटीकोट और ब्लाउज सभी तहियाया हुआ रखा था। साड़ी को देखकर अम्मा को बताया कि इसमें फाल लगा है। इसके बाद अम्मा की निगाह इस कमरे में महिलाओं पर चली गई। यहाँ अम्मा की बहुओं के अलावा नाते- रिस्तेदार से आई महिलाएं जुटी पड़ी थीं। अम्मा एक एक कर सबको ध्यान से देख रहीं थी, जैसे वह चाह रहीं थी कि इनमें से कोई आकर उन्हें साड़ी पहना दें। लेकिन यहां महिलाएं ज्यादातर अपनी तैयारी या सँजने-सँवरने में व्यस्त दिखाई पड़ी। और अम्मा भी चाहकर भी किसी से कुछ नहीं बोल पा रहीं थीं।
      इसी समय उनके बड़े बेटे इस कमरे में किसी काम से आए। इनके बेटे अर्थात अम्मा के पोते का यह ब्रतबंध कार्यक्रम था। अपने बेटे को देखते ही अम्मा बोली, "अरे बेटवा, ज‌उन सड़िया लियाइ रह्यो हमका द‌इ द्यौ.. ओका हमहूँ पहिन लेई!" बेटे से पहनने के लिए उन्होंने साड़ी मांगा था। यह कहते हुए उनकी यह भी इच्छा थी कि बेटा किसी से कहकर उन्हें साड़ी पहनवा दे।
       बेटे ने अम्मा और साड़ी वाले थैले की ओर देखा। इधर पूजा कार्यक्रम में भी विलंब हो रहा था। उन्हें तुरंत ही मंडप में जाना था। कमरे में भीड़ और यहाँ सबको तैयारियों में व्यस्त देखकर उनके बेटे ने अम्मा से कहा, "अरे अम्मा! तू वैसे ही ठीक लागत ह‌ऊ, ई साड़ी पहनै का तोहका कौन‌ऊ जरूरत नाहीं है, अम्मा अब पूजा में देर हो रही है।" इस बीच मंडप से बेटे को बुलावा भी आ गया था।
      बेटे के जाते ही अम्मा बोली, "देखत अहू बिटिया.. कौन‌उ हमको ई साड़ी नहीं पहिना रहा !" साड़ी के थैले की ओर टकटकी लगाए हुए अम्मा बोली थी।
       इधर कमरे से अब सभी औरतें मंडप में जाने की तैयारी में लगी थीं। कोई किसी पर ध्यान नहीं दे रहा था । अम्मा की ओर एक भरपूर निगाह डालकर वे सोचने लगीं थीं कि अम्मा यह साड़ी कैसे पहनेंगी, उम्र के इस पड़ाव में अम्मा झुककर छोटी भी हो गई हैं, यह नई साड़ी उनसे ठीक से पहना भी नहीं जाएगा, और तो और पहनकर इसे संभाल भी नहीं पाएंगी। इसे पहनने से उनकी परेशानी ही बढ़ेगी! इससे अच्छा है कि अम्मा यह साड़ी न पहनें। इसीलिए अम्मा की ओर देखकर उनसे बोलीं, "नाहीं अम्मा, तू जो साड़ी पहनी हो, उसमें एकदम फिट हो अच्छी लागत हो।" यह सुनते ही अम्मा ने भी कह दिया, "अच्छा ठीक है बिटिया हम अब न‌ई साड़ी न पहनब।" 
      पूजा का कार्यक्रम शुरू हो गया था। इसी समय मँझली बहू अम्मा के पास आई और अम्मा से बोली, "अम्मा पूजा शुरू हो गया है, पूजा में अपनी ओर से कुछ चढ़ावै के द‌इ द्यौ।"
       अम्मा ने बहू की ओर देखा फिर अपने थैले में से पाँच-पाँच सौ के दो नोट निकालकर बहू को देते हुए कहा, "ई ल्यौ, हमरी ओर से चढ़ाई दो जाकर।" बहू ने उन नोटों को अपने हाथ में लिया और मुस्कुराकर अम्मा से फिर बोली, "अम्मा कुछ हमहूँ के लिए चढ़ावै बदे द‌इ द्यौ।" मतलब हमें भी तो पूजा में चढ़ाने के लिए कुछ दे दो।
         अम्मा ने बहू के चेहरे की ओर देखा, फिर अपने उसी थैले में से एक सौ रूपए का नोट निकाल कर बहू को दे दिया। अम्मा के हाथ से उसे लेते हुए बहू बोलीं, "अरे ई का अम्मा! बस इह‌ई सौ रूपया हम चढ़ाइब! अरे कम से कम पाँच सौ रुपए होई के चाही।!" बहू ने पूजा में चढ़ाने के लिए अम्मा से पाँच सौ रूपए मांगा‌।
     अम्मा भी बहू से बोली, "बहू..ई सौ रूपया बहुत है पूजा में चढ़ावै के लिए तोहका,बस..!" इसके साथ ही अम्मा ने यह भी कहा कि इधर बहुत खर्च हो रहा है अब और हम नहीं देंगे।
       अम्मा की बात सुनकर बहू ने भी थोड़ा नाटकीय अंदाज में जैसे मायूस होकर कहा, "अच्छा अम्मा, इसे ही चढ़ा देंगे।" और वहाँ से जाने को हुई थीं। इसी समय अम्मा ने अचानक अपने थैले में फिर हाथ डाल दिया था और थैले में से पांच सौ का एक नोट निकाल कर बहू को देते हुए कहा कि अच्छा जाओ खुश रहो, इसे चढ़ा दो। बहू हँसते हुए पूजा मंडप की ओर चली गई थी।
       बहू के जाते ही अम्मा एक बार फिर उनकी ओर फिर मुखातिब हुई। वे बोली थी। देख्यौ बिटिया! तोहरे बाबू के जाने के बाद ई पैंतीस हजार पेंशन हमका मिलत है, तोहार बाबू बहुत पुण्यात्मा थे बहुत अच्छा काम किए थे, हमारे लिए बहुत कुछ करके ग‌ए हैं, अऊर एक बात है बिटिया..आखिर हम क‌उन बहुत काम किहे हैं..सरकार बेचारी जैसे ई मुफ्त में हमको पेंशन देत है, हम भी इसको ऐसेई खर्च क‌इ देइत है!" इस समय अम्मा के चेहरे पर एक गंभीर प्रकृति वाला संतोष का भाव था। वे देश दुनियां से बेपरवाह जैसे अपनी इस अवस्था को क्षण-क्षण जी लेना चाहती थीं। अम्मा को देखकर वे बहुत देर तक यही सोचती रहीं कि इस अवस्था में इनके मन की यह निर्लिप्त चाह कितनी प्यारी और प्राणवान है!
                            *******

वह मनभावन नोकझोंक

     अभी उस दिन की बात है, मैं लखनऊ से अपने गृह कस्बे मुंगराबादशाहपुर के रास्ते पर था। रायबरेली के आगे एक स्थान पर कार रोककर मुँह धोते हुए जब ड्राइवर ने कहा कि नींद आ रही थी तो मैंने अनुमान लगा लिया था कि रात की नींद पूरी नहीं हुई है। इसलिए मैंने उसे चाय पीने के लिए कहा। लेकिन चाय की दुकानें अभी या तो खुली नहीं थीं या या खुलने की तैयारी में थी। इधर समय पर घर भी पहुँचना था इस फेर में ड्राइवर से यह भी कह दिया था कि जहाँ चाय बनती दिखाई पड़े वहीं गाड़ी रोकना। इसके बाद वह काफी देर तक गाड़ी चलाता रहा। जब एक स्थान पर अचानक कार रोकते हुए उसने कहा कि चाय पी लें तो चलें तो मेरी नज़र सड़क के दाहिने पटरी की ओर ग‌ई। वहां चाय की एक दूकान थी जहां चार-पांच लोग थे। दुकानदार चाय छान रहा था। ड्राइवर ने इसी दूकान को देखकर गाड़ी रोका था। मैं गाड़ी में ही बैठा रहा क्योंकि चाय पीने का मेरा मन नहीं था। इस समय हम निहायत एक ग्रामीण क्षेत्र में थे। जहाँ एक पतली सड़क गाँवों से आकर हाईवे से जुड़ रही थी। 
          मैंने दुकान की ओर देखा कि ड्राइवर जल्दी चाय पीकर आए और हम चलें। दुकान के सामने खड़ा वह कुल्हड़ में चाय उड़ेले जाने का इंतजार कर रहा था। इसी समय किसी व्यक्ति की तेज आवाज सुनाई पड़ी। वह किसी से बिगड़ैल अंदाज में कह रहा था, 
         'एक घंटे से देख रहा हूँ अखबार लिए बैठे हो।'
       मैंने ध्यान दिया, यह आवाज एक लम्बी सफेद दाढ़ी वाले मुस्लिम व्यक्ति की थी जिसकी उम्र साठ-पैंसठ की रही होगी। ये महाशय एक आदमी के हाथ से अखबार खींचते दिखाई पड़े जो पचास-पचपन के वय का था। सफारी सूट वाला वह व्यक्ति कुर्सी पर बैठा अखबार पढ़ रहा था। हाथ से अखबार छीने जाने से ये महोदय भुनभुना लगे थे। दोनों के बीच नोक-झोंक शुरू हो गई। इसे सुनने के लिए मैं उत्सुक हो उठा। अखबार अब उन चाचा जी के कब्जे में था।
          "हाँ कब से मैं इंतजार में था कि अब खतम करो तब खतम करो, लेकिन जैसे पढ़ नहीं अख़बार को चाट रहे थे.." दाढ़ी वाले चचा की आवाज थी।
            "तो का इसका सूरत देखकर दे देते!" सफारी सूट वाले की आवाज थी।
             "नहीं तो क्या एक घंटा लगता है पढ़ने में? चचा फिर बोले थे।
             इसके बाद सफारी सूट वाला आदमी कुछ भुनभुनाया था लेकिन ठीक से सुनाई नहीं पड़ा।
            "इसे एक घंटा से पढ़ रहे हो। मैं अभी दस मिनट में पढ़कर रख देता हूँ!" चचा ने कुछ ताव में आकर कहा था।
              "हूँ..बड़े आए दस मिनट में पढ़ लेने वाले..ऐसे ही पढ़ना हो तो मैं पाँच ही मिनट में पढ़ डालूँ.." अबकी बार सफारी सूट वाले की आवाज कुछ तेज थी।
             "नहीं…परीक्षा पास करनी है कि रटने के लिए घंटा भर समय चाहिए।" यह बोलकर दाढ़ी वाले चचा अखबार लेकर बेंच पर पढ़ने बैठ ग‌ए थे।
              इसके बाद सफारी सूट वाला आदमी कुछ बड़बड़ा रहा था जो सुनाई नहीं पड़ा। मैंने देखा इन दोनों के इस नोक-झोंक को सुनकर दुकान पर बैठे बाकी सभी चुपचाप मुस्कुराए जा रहे थे। उस दुकान की एक बेंच पर एक और लम्बी दाढ़ी वाले बुजुर्ग बैठे थे, वे भी मुस्कुरा रहे थे, वहीं दूसरी ओर एक अन्य शख्स इन दोनों के नोक-झोंक पर हँसने लगा था। एक और व्यक्ति था जो इन दोनों को देखते हुए मुस्कुराए जा रहा था। इधर कार में बैठे-बैठे मुझे भी इस दृश्य को देखकर मजा आने लगा और मैं भी मुस्कुरा दिया। मैं दुकान के पास जाकर इस दृश्य को मोबाइल में कैद करना चाहा। लेकिन डर लगा कि मुझे फोटो खींचते देख कोई इस निर्दोष नोकझोंक की राजनीतिक व्याख्या न करने लगे। फिर तो यहाँ उपस्थित लोग दो मुस्लिम और तीन हिंदू में बंट जाएंगे। इसलिए कार में बैठे-बैठे चुपके से मैंने उस दुकान की एक तस्वीर अपने मोबाइल में कैद कर लिया। इसी समय मेरा ड्राईवर भी चाय पीकर वापस आ गया था। हम वहाँ से चल दिए थे। 

रविवार, 26 जुलाई 2015

छतरी के नीचे बैठे लोग

    वह सुबह थाने पहुँचा तो उसे कुछ पुलिसवाले छतरी के नीचे बैठे आराम करते दिखाई पड़े। वह अपनी तहरीर लेकर सीधे उनके पास गया। उनमें से एक ने बेरुखी से उसे मुंशी के कक्ष में जाने का इशारा किया।

     घसीटू थाने के फर्श पर ही ऊँकडू-मुकडू बैठा था। उसकी जेब में अब एक भी पैसा नहीं बचा था। किसी तरह सौ रुपये का इंतज़ाम करके वह घर से निकला था। उनमें से आधा तो तहरीर टाइप कराने में खर्च हो गए और बचे रुपये थाने के मुंशी को दही-जलेबी खिलाने में। लेकिन उसकी तहरीर अब भी मुंशी के मेज पर वैसे ही अनसुनी पड़ी है।

     उसे यह डर सता रहा था कि कहीं मुंशी फिर दही-जलेबी लाने के लिए न कह दे। उसकी झुँझलाहट मन ही मन दही-जलेबी वाले दुकानदार पर उतरने लगी, "उफरि पड़‌इ ई दुकानदार! एहका भी यहीं थाने के मुहाने पर दूकान खोल‌इ के रही? पता नहीं का सोचि के खोलिस? जरूर थाने से मिलीभगत होई!” 

     फिर वह खुद पर ही झुँझला उठा। पहली बार मुंशी ने तो कहा था कि पैसे लेते जाओ, लेकिन उसने ही मना कर दिया था। भला वह मुंशी से पैसे कैसे लेता! आखिर रिपोर्ट तो उसी से लिखवानी थी। यही सोचकर उसने पैसे नहीं लिए थे।

     मुंशी एक-एक जलेबी दही में डुबोकर बड़े चाव से खा रहा था। उधर घसीटू सुबह एक ढेला गुड़ और एक लोटा पानी के सहारे घर से निकला था; तब से उसके पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं गया था।

     मुंशी दही-जलेबी के दोनों दोने खाली कर चुका था। अब वह बोतल मुँह से लगाकर पानी पीने लगा। तभी पंखे की हवा से खाली दोने मेज़ से सरककर फर्श पर आ गिरे। पानी पीने के बाद उसकी नज़र एक पल के लिए घसीटू पर पड़ी। फिर उसने दराज़ से एक कागज़ निकाला और उस पर कुछ लिखने लगा।

     घसीटू चुपचाप उठा, दोने उठाकर बाहर कूड़ेदान में डाल आया। जैसे रिपोर्ट लिखवाने के लिए यह करना भी ज़रूरी हो।

    घसीटू लौटा तो मुंशी अब भी उसी कागज़ पर झुका हुआ था। उसे लगा, दोने फेंकने से पहले मुंशी को बता देना चाहिए था। शायद तब मुंशी उसकी रिपोर्ट लिख देता। तभी मुंशी की नज़र उस पर पड़ी। घसीटू बिना कुछ कहे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

    मुंशी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। गाली बुदबुदाकर तल्ख़ लहजे में बोला, "अरे, बैठ अभी! एक तो उसे ठीक से खूंटे से बाँधता नहीं, ऊपर से रिपोर्ट लिखाने चला है... जैसे बाप का थाना हो! अब यही काम रह गया है हमन सब का! पहले बड़े साहब तौ आवन दे।” यह बोलते हुए उसने अपनी नजरें फिर उसी कागज पर गड़ा दीं। मानो घसीटू सामने खड़ा ही न हो।

     मुंशी की झिड़की खाकर उसकी यह पूछने की भी हिम्मत नहीं हुई कि "मुंशी जी, बड़े साहब कित्ती देर में अइहैं?" वह चुपचाप बैठ गया। ये 'बड़े साहब' ही थाने के इंचार्ज थे।

     दूसरी बार घसीटू को दही-जलेबी एक 'साहब' के लिए तब लानी पड़ी, जब मुंशी ने, "ये छोटे साहब हैं," कहकर उनकी ओर देखा और खिस्स से हँस दिया था। वह हँसी घसीटू को भीतर तक चुभ गई थी।

      इस बार मुंशी ने 'पैसे लेते जाओ' भी नहीं कहा। घसीटू समझ गया कि पहली बार का वह कहना केवल दिखावा भर था। अब वह मन ही मन यही प्रार्थना कर रहा था, “'हे भगवान! अब दही-जलेबी लाने की नौबत ही न आए।'”

    इसी बीच उन साहब की नज़र घसीटू पर टिक गई। अचानक उन्होंने मुंशी से उसकी ओर इशारा करते हुए पूछा,       

"ये यहाँ क्यों बैठा है?”

     “भैंस गायब होने की रिपोर्ट लिखाने आया है..” मुंशी के इतना कहते ही उन्होंने घसीटू को सिर से पाँव तक घूरा। फिर होंठ बिचकाकर बोले, "क्यों रे..! अब तुम्हारी हगनी-मुतनी उठाने के लिए ही पुलिस बैठी है क्या? जब भैंस की रखवाली नहीं कर सकता था, तो खरीदी ही क्यों?" 

    ये शब्द सुनते ही घसीटू के पैरों और घुटनों में जैसे अजीब-सी झनझनाहट दौड़ गई। उससे वैसे बैठा नहीं गया। वह थोड़ा पीछे खिसका और दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया। क्या कहता? उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था।

     बैंक से कर्ज लेकर भैंस खरीदा। इसके लिए वह बाजार से नया पगहा खरीदकर लाया था। घंटियों वाला पगहा था। घर के दरवाजे के ठीक सामने खूँटा गाड़ा था। उसी में भैंस को बाँधता। रात में, पगहे की घंटियां टन-टन बजती तो अचानक वह सोते से जाग उठता। भैंस खूंटे से बँधी मिलती। लेकिन न जाने क्यों उस रात घंटी की आवाज वह नहीं सुन पाया। तड़के उठा तो भैंस खूँटे पर नहीं थी। 

      कितना और कहाँ-कहाँ नहीं खोजा उसे। जब कहीं पता नहीं चला, तो गाँव वालों की सलाह पर ही वह थाने आया था। गाँव वाले भी कह रहे थे कि भैंस चोरी हुई है।

       उसी समय निहलवा की बात उसके कानों में फिर से गूँज उठी, "भँइस मत खरीद, पइसा रखि ल्यौ।"

       घसीटू ने सोचा, अगर उस दिन निहलवा की बात मान ली होती, तो शायद आज यह दिन न देखना पड़ता। गाँव में कुछ लोगों ने तो बैंक से मिलीभगत करके यही किया था। लेकिन उसने तो सपने देख लिए थे। उस पर धुन सवार थी कि भैंस की सेवा करेगा, दूध बेचेगा, घर का खर्च चलाएगा और धीरे-धीरे बैंक का कर्ज भी उतार देगा। लेकिन अब उसे लगा, भैंस नहीं, उसने अपने लिए ही आफत मोल ले ली थी। 

    तभी छोटे साहब के मोबाइल फोन की रिंगटोन बजी। मुंशी ने उनसे कहा, “देखिये साहब किसका फोन है।” 

      “अरे इंचार्ज साहब का फोन है!” कहकर वह फोन पर बात करने लगा,

     “जी सर...क्या?... अच्छा!... जी सर...  जी, जी.. सर.. क्या.. चौबीस घंटे के भीतर? यस सर.. फिर तो अभी निकलता हूँ।"

     यह वार्ता समाप्त होते ही वह मुंशी से बोला, ‘क्या कहें.. अब हमें भी जाना पड़ेगा.. बड़े साहब को अल्टीमेटम मिल गया है... यदि चौबीस घंटे के भीतर उसका पता नहीं चला, तो उन्हें अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर तैयार रखना होगा.. ससुरा अब तो यह भी हाईप्रोफाइल मामला हो गया है।”  

     घसीटू कुछ समझ पाता, उससे पहले ही वे साहब कुर्सी से उठे और हड़बड़ी में बाहर निकल गए।

     उनके के बाहर निकलते ही पूरे थाने में हलचल मच गई। हाई-प्रोफाइल मामले की सूचना मिलते ही वही पुलिस वाले, जो अभी तक सुस्त पड़े थे, छतरी के नीचे से दौड़ते हुए निकल पड़े। 

    घसीटू की तहरीर अब भी पेपरवेट के नीचे दबी थी। पंखे की हवा से उसका एक कोना बार-बार फड़फड़ा उठता। घसीटू दीवार से पीठ टिकाए चुपचाप बैठा रहा। 

     उसने मुंशी की ओर देखा। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट तैर रही थी। वह मुस्कुराहट उसकी समझ से बाहर थी। उसे लगा, शायद अब उसकी रिपोर्ट लिखे जाने की बारी आ जाए। तभी मुंशी की कही बात याद आई, "पहिले बड़े साहब तौ आवन दे।" उसकी उम्मीद फिर ढीली पड़ गई। "बड़े साहब कब आएँगे?" यह पूछने का साहस भी उसमें नहीं बचा था।

     मुंशी फिर से कागजों में कुछ लिखने में खो गया था। पिछले दो घंटे की जद्दोजहद उसके तन और मन दोनों पर भारी पड़ चुकी थी। अब वहाँ बैठे रहना उसके लिए कठिन होता जा रहा था। आखिर कब तक यूँ ही बैठा रहे?

     उसके मन में आया, पूछ ही ले कि बड़े साहब कब आएंगे। ज्यादा से ज्यादा मुंशी एक बार फिर गाली ही तो देगा।

      अचानक मुंशी के चेहरे पर एक हल्की-सी शिकन उभरी। वह सिर उठाकर सामने की ओर देखने लगा। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि आँखें सामने थीं, मगर वह सोच कुछ और रहा था।

        घसीटू को जैसे ही लगा कि वह उसे देख रहा है। उसने तुरंत लड़खड़ाती-सी आवाज में पूछा, "मुंशी जी... बड़े साहब कब..?"

      लेकिन वह जैसे घसीटू को भूल ही चुका था। घसीटू के यह पूछते ही चौंक उठा। अगले पल ही सहज होते हुए बोला, "अरे... तू अभी तक बैठा है? आज जाओ। एक हाईप्रोफाइल मामला आ गया है। कल आना।"

      यह 'कल आना' सुनते ही घसीटू का मुँह खुला का खुला रह गया। उसे लगा, पिछले दो घंटे से वह थाने के फर्श पर नहीं, अपनी उम्मीदों की ज़मीन पर बैठा था; और अभी-अभी किसी ने उसके पैरों तले से यह जमीन खिसका दी हो!

    वह मायूस हो गया। एक क्षण के लिए उसे लगा, शायद उसकी मायूसी देखकर मुंशी पसीज जाए। लेकिन उसकी कड़क आवाज गूँजी, "अच्छा, चल... उठ यहाँ से। कल सुबह आना।"

     घसीटू चुपचाप उठ खड़ा हुआ। उसके पैर जैसे भारी हो गए थे। वह धीमे-धीमे, बोझिल कदमों से थाने के बाहर निकल गया।

        आज दूसरा दिन था।

       घसीटू खोई भैंस की चिंता में सुबह ही घर से निकल पड़ा था। थाने पहुँचा तो दिन चढ़ आया था। सूरज की तपन महसूस होने लगी थी। वह सीधे मुंशी के पास गया। मुंशी ने उसे देखते ही बाहर लॉन में छतरी के नीचे बैठे लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा, “उधर जा...  साहब लोग वहीं बैठे हैं, पहले उनसे अपनी बात बता।” 

      बाहर आकर उसने देखा -

     लॉन में बने गोल चबूतरे पर लगी छतरी के नीचे बड़े साहब और छोटे साहब बैठे थे। सामने रखी मेज़ के चारों ओर कई कुर्सियाँ थीं। उन्हीं में से एक पर सफेद शर्ट, सफेद पैंट और सफेद जूते पहने एक लंबा-चौड़ा आदमी इत्मीनान से बैठा था। छतरी से कुछ ही दूर दो फ़ॉर्च्यूनर गाड़ियाँ खड़ी थीं, जिनके इर्द-गिर्द हथियारबंद लोग चौकन्ने खड़े थे। वहाँ मानो किसी बड़े आदमी का दरबार लगा था।

     साहब लोगों के सामने मेज पर झबरे बालों वाला कोई विचित्र-सा जानवर बैठा था, वे बारी-बारी से उसके सिर पर दुलार से हाथ फेर रहे थे। उधर दो-तीन सिपाही बिस्कुट जैसी कोई चीज अपने हाथ से उसे खिलाने की कोशिश कर रहे थे। तभी एक सिपाही कटोरी में कुछ लेकर आया और बड़े जतन से उसे पिलाने लगा। 

     घसीटू को अचरज हुआ। उसे लगा, उस विचित्र-से जानवर को खिलाने-पिलाने की इन सिपाहियों के बीच मानो होड़-सी मची हो।

     वह चबूतरे से कुछ दूर ही आकर ठिठक गया। चबूतरे पर चढ़ने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। वह दोनों हाथ जोड़े चुपचाप खड़ा रहा। उसकी निगाहें बार-बार छतरी के नीचे बैठे साहबों की ओर उठतीं और फिर झुक जातीं। लेकिन छतरी के नीचे बैठे लोगों की निगाहें अभी उसकी ओर उठनी बाकी थीं।

    इसी बीच कुछ लोग और आ गए। देखते ही देखते हँसी-ठट्ठा शुरू हो गया। छतरी के नीचे दो-तीन कुर्सियां और लगा दी ग‌ईं। नवांगतुक लोग बैठ ग‌ए। थोड़ी देर बाद ठंडा भी आ गया।

      कुछ ही देर में साहबों के सामने माइक लगा दिए गए। घसीटू समझ नहीं पा रहा था कि वहाँ क्या होने वाला है। तभी एक आदमी आगे बढ़ा और उनसे सवाल पूछने लगा। अगले ही पल कैमरों की फ्लैश लाइटें चमकने लगीं। यह सब देखकर घसीटू को लगा, जरूर कोई बहुत बड़ा मामला है।

     उस आदमी ने पूछा, "सर, इस महत्वपूर्ण मामले का वर्कआउट कैसे हुआ?" उन्होंने इसे एक शातिर चोर की करतूत बताते हुए कहा…

     "हम इस मामले पर लगातार काम कर रहे थे। मुखबिर से सूचना मिली कि वह इसे शहर में बेचने की फिराक में है। हमने तुरंत बरामद कर लिया।”

     तभी कैमरामैन ने कैमरा मेज़ पर बैठे झबरे बालों वाले उस विचित्र जानवर की ओर घुमा दिया, फिर कुछ पल बाद कैमरे का मुँह सफेद शर्ट-पैंट पहने उस लंबे-चौड़े आदमी पर टिक गया। उसके चेहरे पर एक खास किस्म की दबंगई और आत्मविश्वास तैर रहा था। उसकी आवभगत में मानो पूरा थाना ही लगा हुआ था और वह मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। 

    बरामदगी का स्थान पूछे जाने पर बड़े साहब एक पल को सकपका गए। वे छोटे साहब की ओर देखने लगे। उन्होंने तुरंत संगठित गिरोह की आशंका जताते हुए विवेचना जारी होने का हवाला दे दिया।

       इस उत्तर पर हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति की मुस्कान चौड़ी हो उठी। उसने पत्रकार की ओर ठंडे का गिलास बढ़ाते हुए कहा, "अरे छोड़िए न... ठंडा लीजिए, बाहर बड़ी गर्मी है।”

       उसके इस अंदाज पर थाने के बड़े साहब भी मुस्कुरा उठे। दोनों की नजरें मिलीं और उनके होंठों पर एक-सी मुस्कान तैर गई। लगा, जैसे दोनों बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह गए हों। लेकिन वे फिर गंभीर हो गए। फिर वह पत्रकारों से मुखातिब हुआ—

    “ये हमारे थानाध्यक्ष अच्छा काम कर रहे हैं। इनके पहले वाले का काम देखकर मैंने ही उनका ट्रांसफर कराया था…”

     हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति के चुप होते ही एक पत्रकार उनके पास जाकर उनके कान में फुसफुसाया, "सर जी, मैं तो आपके घर अकसर आता-जाता रहता हूँ। यह पिल्ला वह पिल्ला नहीं है!”

     उसने पत्रकार के कंधे पर हाथ रखा और हलकी मुस्कान लाकर महीन आवाज में कहा, "यार, जाने भी दो... पहले वाले से बढ़िया नस्ल का है। मेरे लिए तो यही वही है... समझो, मिल गया।" 

      वह पत्रकार भी मुस्कुराया। दोनों की बातें बड़े साहब सुन रहे थे। उनके चेहरे पर भी दबी-सी मुस्कान थी। उन्होंने हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति से धीरे से कहा, 

     "महोदय, ऐसी नस्ल का पिल्ला आसानी से नहीं मिलता... हमारे छोटे दरोगा जी ने बहुत मेहनत की है।" 

      यह सुनते ही उसका हाथ उनके कंधे पर जा टिका। उनके चेहरे पर वैसी ही संतुष्टि उतर आई, जैसी किसी कठिन 'वर्क-आउट' के सफल हो जाने पर उतरती है। 

      उधर घसीटू धूप में खड़े-खड़े थकने लगा था। इस बीच एक पुलिस वाले ने उसे दो बार छाया में खड़े हो जाने को कहा। लेकिन घसीटू ने उसकी बात अनसुनी कर चबूतरे के पास, छतरी के छज्जे के नीचे चला आया। फिर भी वहाँ भी धूप उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। धूप की परवाह किए बिना उसके मन में बस एक ही उम्मीद थी, शायद छतरी के नीचे बैठे लोगों की नज़र उस पर भी पड़ जाए। 

       उन लोगों की निगाह तो उस पर नहीं पड़ी, मगर उनकी आवाजें अब उसके कानों तक पहुँचने लगी थीं। बड़े साहब के मुँह से 'शातिर चोर', 'शहर में बेचने' और 'बरामदगी' जैसी बातें सुनते ही उसका दिल धक् से रह गया। उसे लगा, जरूर उसकी चोरी हुई भैंस की ही बात हो रही है। वह खुशी से भर उठा। पुलिस वालों के लिए उसके मन से दुआएँ निकलने लगीं। उसे पूरा विश्वास हो गया कि पुलिस ने उसकी भैंस का पता लगा लिया है और छतरी के नीचे बैठे लोग उसी चोरी का खुलासा कर रहे हैं।

     लेकिन अगले ही क्षण उनके मुँह से 'पिल्ला' शब्द और फिर, 'छोटे दरोगा ने इसके लिए बहुत मेहनत की है' निकलते ही घसीटू की सारी उम्मीदें भरभराकर ढह गईं।

     सुबह से खाली पेट, कड़ी धूप में लगातार खड़े रहने और इस अचानक मिले मानसिक आघात का बोझ उसका शरीर सह न सका। उसकी आँखों के आगे क्षणभर के लिए अँधेरा-सा छा गया और वह लड़खड़ा उठा।

     ठीक उसी समय वही पत्रकार, जो हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति के असली पिल्ले को पहचाता था, हलकी सी मुस्कान लेकर बड़े साहब की ओर मुखातिब हो रहा था,

      "सर जी, एक बात और... पिल्ला तो मिल गया, लेकिन चोर की गिरफ्तारी भी हुई या अभी नहीं?"

     उन्होंने गला साफ करते हुए उत्तर दिया "नहीं... हमारे सब इंस्पेक्टर साहब इस पर भी लगातार काम कर रहे हैं। एक संदिग्ध व्यक्ति को हिरासत में लिया गया है। उससे पूछताछ चल रही है। पूछताछ पूरी होते ही हम उसे..."

      इसी बीच छोटे साहब किंचित घबड़ाहहट में चिल्ला उठे थे, 

      "अरे..पकड़ो.. पकड़ो उसे...!" 

      छोटे साहब की इस अचानक उठी चीख में बड़े साहब के मुँह से निकलने वाला शब्द, "गिरफ्तार कर लेंगे" दबकर रह ग‌या। 

     तब तक दो सिपाही लपककर पहुँचे और गिरने ही वाले घसीटू को अपनी बाँहों में थाम लिया। उसके पैरों में जैसे जान ही नहीं बची थी। दोनों लगभग उसे टाँगे हुए तेजी से बरामदे की ओर ले गए।

      तभी एक पत्रकार ने घसीटू की ओर इशारा करके कहा, 

     “यही होगा चोर..!”

     बस फिर क्या था! कैमरों की फ्लैश लाइटें यकायक उसी पर चमकने लगीं। अगले ही पल घसीटू, बिना कुछ जाने-समझे, 'पिल्ला चोर' के संदिग्ध के रूप में तस्वीरों में कैद किया जा रहा था।

        कुछ पल के लिए छतरी के नीचे बैठे लोग असमंजस में पड़ गए। बड़े साहब कुछ बोलने को हुए, तभी छोटे साहब ने हलके-से इशारे से उन्हें रोक दिया। बड़े साहब चुप रह गए।

    अब तक पत्रकार वार्ता समाप्त हो चुकी थी। पत्रकार एक-एक कर वहाँ से निकलने लगे। जाते-जाते वे एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा देते।

     उधर हाई-प्रोफाइल शख्स अपनी गाड़ी की ओर बढ़ा। एक सिपाही उसके पिल्ले को लेकर पीछे-पीछे चल रहा था। गाड़ी के पास पहुँचते ही छोटे साहब लपककर आगे बढ़े और दरवाज़ा खोल दिया। उसने सिपाही से पिल्ला लिया, उसे गोद में रखा और कार में बैठ गया।

     तब तक घसीटू को बरामदे की छाया में पड़ी एक बेंच पर लिटा दिया गया था। उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे गए। कुछ देर बाद उसकी पलकों में हरकत हुई। उसने धीरे-धीरे आँखें खोली।

     अपने चारों ओर खड़े पुलिस वालों को देख भौंचक्का-सा वह उन्हें ताकता रह गया। उस क्षण उसे अपनी तहरीर की भी सुध न रही। उसके मन में अब बस एक ही इच्छा बची थी, किसी तरह यहाँ से निकलकर जल्द से जल्द अपने घर पहुँच जाए।

     इसी क्षण दोनों साहब बरामदे में आ पहुँचे। उनकी निगाहें सीधे बेंच पर लेटे घसीटू पर जाकर ठहर गईं।

        अचानक बड़े साहब सिपाहियों पर गरज पड़े, "अरे, इसे अभी... इसी वक्त इसके घर पहुँचाओ! यहाँ इसे कुछ हो जाता, तो लेने के देने पड़ जाते। पूरे थाने की बदनामी हो जाती!”

     दो सिपाही घसीटू को बाँह थामे उसे सहारा देते हुए धीरे-धीरे उसे जीप की ओर ले चले। उसकी तहरीर मुंशी के टेबल पर अभी भी पेपरवेट के नीचे पंखे की हवा में फड़फड़ा रही थी।

    घसीटू घर लौट आया। उसकी भैंस नहीं मिली। तहरीर का क्या हुआ, उसने फिर कभी पता नहीं किया।

     अगले दिन अखबारों में एक खबर छपी थी-

     "हाई-प्रोफाईल पिल्ला चोरी कांड में संदिग्ध हिरासत में"       

    खबर के साथ दो तस्वीरें थीं। पहली तस्वीर में साहब लोग मीडिया को जानकारी दे रहे थे। दूसरी में दो पुलिसकर्मी एक संदिग्ध को सहारा देकर ले जा रहे थे। संयोग से उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

       निहलवा उससे मिलने आया था। वह कुछ पूछने ही वाला था कि घसीटू ने उसे हाथ के इशारे से चुप करा दिया। उसे छतरी के नीचे का दृश्य याद हो आया। वह बोला, “अब बसि करऽ... हम मजूरै भले। ई रोजगार-फोजगार, थाना-फाना अउर कोरट-कचहरी सब बड़कन के बदे हय। हमन सुभा ऐसेई भल, एहिमइ हमार इज्जत बची हय। हमार बेटउआ इही बदे सहर भागि के मजूरी करै चलि गवा। कउन इंहाँ रहिके गारी खाय... गाँऊ-देस का हालि तू तो जनतै हया।”

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