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शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

मेरे दिमाग जी!

कार का पंचर दखाई पड़ना!
         उस इन्स्टीट्यूट में, दोपहर के लगभग ढाई बजे होंगे, जब लंच के लिए मुख्य भवन के कांफ्रेंस रूम से डाइनिंग हाल के लिए बाहर निकला। बाहर ठंड थी लेकिन जाड़े की गुनगुनी धूप खिली थी। डाइनिंग हाल मुख्य भवन से चंद कदम दूर हास्टल की बिल्डिंग में था। इसी के सामने मैंने कार को पार्क किया हुआ था। देखा, कार का अगला पहिया पिचका हुआ है, मुझे इसके पंचर होने का संदेह हुआ! दरअसल आज ही दो सौ किमी ड्राइव करके यहाँ आया था...जिसके लिए सुबह पाँच बजे उठना पड़ा था। जाड़े में सुबह रजाई छोड़कर उठना अपने आप में एक मुश्किल भरा काम होता है, ऊपर से इतनी दूर गंतव्य पर समय से पहुँचने का टेंशन ! सोचा था यहाँ से छुट्टी मिलते ही सीधे घर चलकर आराम करेंगे, वैसे भी कल से लेकर आज तक चार सौ किमी कार चला चुका हूँ! लेकिन कार पंचर के रूप यह एक नया टेंशन मेरे सामने था! अब पहले इसे बनवाना होगा! यहाँ से देर शाम छूटने पर अंधेरा घिर चुका होगा! पता नहीं कोई मिस्त्री मिले या न मिले और अंधेरे में पहिया बदलना भी आसान नहीं होगा! कार के पास खड़े-खड़े मैं कुछ ऐसा ही मंथन करने लगा था।
             अचानक पेट में कुलबुलाहट हुई, मुझे भूख लगी थी। दो बार चाय पीने के अलावा सुबह से कुछ नहीं खाया था। पहली चाय सुबह आठ बजे के आसपास रास्ते में पी थी, और वह भी उस ढाबे पर जहाँ यह सोच कर रुका था कि यहाँ अच्छी चाय मिलेगी, लेकिन चाय मन मुताबिक़ नहीं थी। आधी चाय पीकर खिन्न मन से उठ गया था। चाय वाले को दस रूपए टिकाते हुए इस खिन्नता को जाहिर भी किया। सोचा, शायद आगे से अच्छी चाय बनाने के लिए वह सचेत रहे। लेकिन गज़ब ज़माना आ गया है जैसे कोई कुछ समझना ही नहीं चाहता, पैसा पकड़ते हुए उसने मुझे ऐसे देखा जैसे उसकी अच्छी चाय को मैं खराब बता रहा होऊँ। फिर दूसरी चाय इसी इंस्टिट्यूट में दोपहर इग्यारह बजे के आसपास दो बिस्कुट के साथ पिया था। भूख का अहसास होते ही पहिए से दृष्टि फेर डाइनिंग हाल की ओर जाते रास्ते की ओर मैं देखने लगा। कांफ्रेंस के कई साथी हाल की ओर जाते दिखाई दिए।  कार पंचर की चिंता को थोड़ी देर के लिए स्थगित रखते हुए मैं भी उस हाल की ओर चल पड़ा।
रसगुल्ले का कस्टोडियन
              खाना खाकर जूठी प्लेट ठिकाने लगाया। हाथ-मुँह धुलते ही रसगुल्ले वाली टेबल पर ध्यान चला गया। देखा, खाने के बाद कुछ मीठा हो जाए वाले भाव से लोग उस टेबल के पास जाकर खड़े हो जा रहे थे और रसगुल्ले का कस्टोडियन उनके मौन मंतव्य को समझ टेबल के नीचे से रसगुल्ला निकाल कर दोने में रख देता। रसगुल्ले लेने और देने वाले के बीच का यह मौन संवाद मेरे मन में भी रस घोलती प्रतीत हुई!! इस मौन भाषा की मिठास का शिकार पिछले दो दिन से मैं भी हो रहा था, क्योंकि इस संस्थान में आज यह मेरा तीसरा दिन था।
           वैसे आदमी को उस वक्त थोड़ा सजग हो जाना चाहिए, जब किसी मीठी भाषा का शिकार होकर वह अपना कोई निर्णय बदलने वाला हो। क्या है कि मैं मीठे के प्रति स्वयं को नियंत्रित रखता हूँ। लेकिन लगातार आज तीसरी बार यहाँ की यह मौन भाषा मेरे ऊपर खतरा बनकर मँडराने लगा और मैं रसगुल्ला खायें या न खायें के उधेड़बुन में पड़ गया। लेकिन जैसा कि मीठी बोली अंततः मन को प्रभावित कर ही‌ लेती है, मैं रसगुल्ले वाली टेबल के कस्टोडियन से मौन संवाद स्थापित करने से स्वयं को रोक नहीं पाया और मंत्रबिद्ध टइप से उसकी ओर तीन कदम बढ़ा दिए। इधर कोई सीधे इन रसगुल्लों से ही मौन संवाद न स्थापित कर ले, इसीलिए उसने रसगुल्लों की टोकरी को टेबल के नीचे छिपा रखा था।  
          खैर, खाने के बाद कुछ मीठा घटित हुआ और हैंडकरचीफ से हाथ पोंछते हुए डाइनिंग हाल से बाहर आया। जहाँ कार पंचर होने के टेंशन से मेरा सामना होने जा रहा था। पिचके टायर को ध्यान से देखकर दिमाग की कुंडलियों को खंगाला कि, आखिर यह कब, कहाँ और कैसे पंचर हुई? याद आया, यहाँ आते समय रास्ते में एक गाँव के पास दो तीन बच्चे खेलते दिखे थे। उसमें से एक बच्चा बीच सड़क पर कोई चीज रखा था। और भागकर पटरी पर जा खड़ा हुआ था और वहाँ से सड़क पर आ-जा रही मोटर गाड़ियों को कौतूहल से देखने लगा था। बच्चों के इस शरारतपूर्ण खेल को मैं समझ गया था, क्योंकि बचपन में हम भी ऐसे खेल में सम्मिलित रहे हैं! मेरे देखते-देखते वहाँ से एक ट्रक गुजरा और फिर मैं। मैंने उस जगह साइड लेकर कार निकाला था, जिससे  कोई कील टायर में न चुभे। इस बात को यादकर मैंने उन बच्चों को कोसा और पहिया बदलने की सोचने लगा।
          लेकिन यहाँ, इस संस्थान में, मैं एक सरकारी अफसर की हैसियत से था। इस तरह सबके सामने जैक लगाकर पहिया बदलना मेरी अफसरियत वाली शान में गुस्ताखी थी, जिसके खिलाफ काम करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई! अपने आसपास नजर दौड़ाया, लेकिन ऐसा कोई शख्स दिखाई नहीं दिया, जिससे मदद के लिए कहता। इंस्टिट्यूट के बाहर सड़क पर पंचरवाले को तलाशने चला आया। लेकिन यहाँ भी दूर-दूर तक पंचर बनाने वाला नहीं मिला। किसी से पता चला कि यहाँ से दो किमी दूर हाईवे पर पंचर बनाने वाला मिलेगा। 
         लेकिन इस बीच कांफ्रेंस के सेकेंड सेशन का भी समय हो चुका थाI पंचर बनवाने के लिए हाईवे पर जाने को लेकर मैं ऊहापोह में पड़ गया। इस सेशन में अनुपस्थित होना मेरे अपने गैरजिम्मेदारपने का परिचायक होता और वैसे भी यह दूसरा सेशन काफी महत्वपूर्ण होने जा रहा था। लेकिन कार पंचर रहने की स्थिति में देर शाम होने वाली संभावित परेशानी मेरी चिंता बढ़ा रही थी। अंततः मैंने इसी समय पंचर बनवा लेना उचित समझा। कार के पहिए में थोड़ी हवा अभी बाकी है, मतलब रिम ने जमीन को नहीं छुआ था। कार स्टार्ट किया और धीरे-धीरे हाईवे की ओर चल पड़ा। 
                   
एक लड़का!!

        ट्यूब के साथ कोई गड़बड़ न हो, इसलिए एहतियातन कार  धीरे-धीरे चला रहा था। हाईवे तक पहुँचने में करीब पंद्रह मिनट खर्च हुए। हाइवे पर पहुँचकर मैं अपने बायीं ओर मुड़ा, थोड़ी दूर चलने पर दाहिने साइड वाली लेन पर पंचर बनाने वाला दिखाई पड़ गया। वहाँ एक लड़का किसी बड़े वाहन के पहिए पर मसक्कत कर रहा था। कार रोककर बाहर आया और इशारे से उस लड़के का ध्यान आकर्षित करने लगा। उसके देखने पर कार के अगले पहिए की ओर इशारा कर इसके पंचर होने की बात समझाने की कोशिश की। लेकिन उसके देखकर भी अनदेखा करने पर कार वहीं छोड़कर सड़क के डिवाइडर को पार कर उस लड़के के पास चला आया। इस फोर लेन पर द्रुत गति से वाहन ऐसे भागे जा रहे थे जैसे किसी चीज की धर-पकड़ मची है और वह चीज इनके हाथ से छूटी जा रही हो! हाँ वाहनों की गति में थोड़ी बहुत भिन्नता से इनकी चिंता के स्तर को भी मापा जा सकता था। जिसकी जितनी तेज गति वह उतना ही अधिक चिंतित दिखाई जान पड़ रहा था! अब ऐसी चिंताओं के बीच कहीं हमारी चिंता घायल न हो जाए, इसलिए चिंताओं के इस भागम-भाग के बीच मुझे अपनी चिंता के लिए सड़क पार करना मुश्किल हो रहा था। 
           लड़का अपने काम में तल्लीन था। मैं चाहता था कि वह यह काम छोड़कर पहले मेरा वाला काम कर दे, लेकिन उसने मुझे थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के लिए कहा। मैंने उसे समझाया भी, कि मैं एक अधिकारीनुमा जीव हूँ, जिसके पास समय की समस्या रहती है। फिर भी उसने मेरी बात पर कोई तवज्जो नहीं दिया। उसके इस‌ व्यवहार पर मैं अपने मन में यह सोचकर स्वयं को तसल्लियाने लगा कि आखिर काम में तल्लीन रहने वालों के लिए क्या अधिकारी क्या नेता! सब धान बाइस पसेरी ही होता है। और यह भी तो नहीं कि मेरा काम पहले कर देने से इसे कोई तमगा हांसिल होने जा रहा हो! वैसे भी जहाँ तक मेरा मंतव्य है तमगा व्यवस्थाजीवियों को ही प्राप्त होता है। लेकिन यह बेवकूफ लड़का अपनी मर्जी का मालिक दिखाई पड़ा, इसके लिए जैसे व्यवस्था गई तेल लेने! मतलब यह हम लोगों की तरह व्यवस्था का गुलाम नहीं। उसे देखते हुए सोचा, "बच्चू तभी तुम पंचर बना रहे हो ! काम के सिवा दुनियादारी सीखा होता तो शायद कुछ बड़ा कर रहे होते! कम से कम आदमी को पहचानना आना तो चाहिए..! लेकिन नहीं पहले जो काम हाथ में आया उसे ही पूरा करेंगे ये ज़नाब! काम के प्रति इतनी ईमानदारी भी ठीक नहीं बेट्टा..अन्यथा तुम मुझे अफसर की बजाय सामान्य जीव न समझते!" दरअसल समय के साथ मेरी बेसब्री बढ़ रही थी और झल्लाहट में मैं उस लड़के को लेकर अनाप-शनाप सोच रहा था।
        मैं पशोपेश में था कि कैसे उसे समझाएं कि जनहित में मेरा काम पहले करना चाहिए। वैसे जनहित में काम करने का महत्व या तो अफसर को पता होता है या फिर नेता को! भारत‌ की ऐतिहासिक पवित्र भूमि में यही दो टाइप के जीव जनहित में काम करते हैं क्योंकि यह पावरफुलों के ही वश की बात है। असल में क्या है कि जनहित में नियमों से ऊपर उठना होता है, नियमों को धता बताना होता है और ये दोनों प्राणी इन सब टाइप से ऊपर उठे हुए होते हैं! लेकिन एक लड़का! हाँ यह एक लड़का ही था और वह भी मजदूर टाइप का !! इसे अभी ऊपर उठना है, इसलिए इसे नहीं पता कि जनहित क्या चीज होती है! मै जनहित में काम करते-करते अमीर हुए अमीरों की कहानी उसे सुनाना चाहता था लेकिन समय और अपनी समस्या की चिंता के मद्देनज़र सुनाने का मन नहीं हुआ।  
         अचानक पीछे से कोई "क्या है" बोलता सुनाई पड़ा। मुड़ा तो एक बौने कद का व्यक्ति मेरी ओर मुखातिब हो लँगड़ाते हुए चला आ रहा था। मेरी समस्या के प्रति अधिकार भाव वाली उसकी उत्सुकता देखकर लगा जैसे यह इस दुकान का प्रोपाइटर हो! शायद उसने मेरी जल्दबाजी वाली हड़बड़ाहट को भाँप लिया था!! मेरी परेशानी समझ लेने के बाद मुझे लेकर वह कार की ओर चल पड़ा, यही नहीं सावधानी से सड़क पार करने के लिए भी कहा। उसने मुझे यह भी बताया कि इस मार्ग पर आए दिन दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। लेकिन यह छोटा आदमी हम जैसों की चिंता क्या समझे! इसलिए उसकी दुर्घटनाओं वाली चिंता को मैंने उसकी सदाशयता समझा!! तो क्या छोटे आदमी सदाशयी होते हैं, हो सकता है, क्योंकि उनकी चिंता हम जैसों से भिन्न होती है|
प्रोप्राइटर जी !
         कार के पास पहुंचकर प्रोप्राइटर ने मुझसे जैक मांगा, जिसे मैंने डिक्की से निकालकर दिया। फिर पहिया खोलने के लिए उसे बोल्ट पर जूझते देख मैंने स्वयं एक-एक कर सारे बोल्ट ढीले किए। इसके बाद पहिया निकालने के लिए जैक लगाकर अभी कसा ही था कि भड़ाक की आवाज के साथ कार पुन: नीचे पहिए पर आ टिकी और उसका अगला हिस्सा लुढ़कने से बच गया। लगा जैसे जैक फिसला हो। लेकिन जैक अपने स्थान पर ही था। उसे निकालकर मुझे दिखाते हुए उसने कहा, "यह तो चला गया..कार का लोड नहीं सह पाया।" मैंने देखा, उसके स्क्रू राड की चूड़ी घिसी हुई थी। "इस जैक का उपयोग किसी गैराज के जैक जैसा प्रोफेशनल टइप से भी नहीं हुआ फिर अचानक कैसे खराब हो गया? जरूर कार सर्विसिंग के समय आटो गैराज के लड़के ने बदल लिया होगा।" मेरी इस शंका पर उसने मुझे समझाने की कोशिश की, सही स्थान पर कार पार्क न होने से इंजन समेत इसके अगले हिस्से का भार जैक पर आ गया था, इससे यह ओवरलोडिंग का शिकार हुआ। हलांकि मेरे सामने यह एक नई समस्या थी, लेकिन राहत की बात यह थी कि हम पंचर वाले की दूकान पर थे, जिसके पास अपना भी जैक होता है।
      मेरा अनुमान सही था "अब मुझे अपना जैक लाना पड़ेगा" बोलते हुए प्रोप्राइटर जी ने दुकान में काम करते लड़के को देखा, शायद उससे कुछ कहना चाह रहे थे। लेकिन फिर जैक लेने स्वयं चल दिए। सड़क पर ट्रैफिक का तारतम्य टूटने का नाम ही नहीं ले रहा था। खैर इस आदमी को लंगड़ाकर सड़क पार करते हुए मै देख रहा था। उसकी लंबाई साढ़े तीन फीट के आसपास ही रही होगी! लेकिन उसकी दुकान में बौनेपन का कोई लक्षण नहीं था। उसे देखते हुए मैंने सोचा, 'यदि लंबाई में चौड़ई न हो, तो ऐसी लंबाई का भी कोई महत्व नहीं!!' लेकिन इस बौने व्यक्ति के कद में भरपूर चौड़ाई थी, जो उस कद को स्वयमेव ऊँचा बना रही थी। वास्तव में, जिसे अपनी कमियों की फीलिंग होती है, वही भरा-पूरा और चौड़ा भी हो सकता है, इस दुकान से उसके व्यक्तित्व के चौड़ेपन की झलक मिली, यही उसकी 'फीलिंग' थी!! हाथ में जैक लिए वह अब वापस आ रहा था, यह जैक मुझे उसके शरीर के अनुपात में भारी प्रतीत हुआ।
         जैक बड़े साइज का था। कार को कुछ उठाकर ही इसे उसके नीचे लगाया जा सकता था, यह अकेले प्रोप्राइटर जी के वश की बात नहीं थी। किसी अन्य की तलाश में समय ज़ाया न हो, मैंने स्वयं कार पर जोर-अज़माइश किया। सफल न होने पर प्रोप्राइटर जी के कहने पर मैंने ईंट तलाशा, इसके न मिलने पर दुकान में काम करते लड़के को अपने इशारे से बुलाया। काम छोड़कर वह तुरंत आ गया। मैं समझ गया कि मज़ाक में जिसे मैं प्रोप्राइटर समझ रहा था, दरअसल वह असली ही हैं। खैर, मेरे साथ लड़के ने भी जोर लगाया, फिर भी कार को अपेक्षित ऊँचाई तक नहीं उठा पाए। इधर विलंब से मेरी अकुलाहट भी बढ़ रही थी। हमसे थोड़ी ही दूर पर एक गुमटी के पास दो लोग कंडे सुलगा रहे थे, उनमें एक सोलह-सत्रह साल का लड़का भी था, शायद वे बाटी सेंकने के लिए आग तैयार कर रहे थे। उसी गोमती के पास एक 'छोटा हाथी' भी खड़ा था। प्रोपाइटर जी ने उस लड़के को मदद के लिए बुलाया। लड़का भला था, एक ही बुलावे में आ गया। इस बीच ड्राइवर छोटे हाथी को लेकर जा चुका था। हम तीनों ने मिलकर संघे-शक्ति का उदाहरण पेश कर कार को ऊपर उठाया और जैक लगाकर प्रोप्राइटर जी ने पहिया निकाला।
पहिए जैसा संविधान है!
       अब तक आधा घंटा हो चुका था। बीतते समय के साथ मेरी हड़बड़ी भी बढ़ती जा रही थी। पहिया लेकर प्रोप्राइटर जी दुकान की ओर बढ़े तो मैं भी उनके साथ हो लिया। सड़क पार करते‌ समय एक बार फिर उनने मुझे सावधानी के लिए नसीहत दी। शायद मेरी हड़बड़ाहट भांप लिया था। दुकान पर पहुँचकर लड़के को पहिया सौंप दिया। यही होता है, मालिक आखिर मालिक ही होता है, जो जिसके अंडर होता है उसका निर्देश मानना ही पड़ता है। अगर कोई और अवसर होता तो मैं लड़के की इस बदलती नैतिकता पर व्याख्यान दे मारता कि देखो, कैसे अपने मालिक के दबाव में इसने, पहले आओ पहले पाओ की अपनी ही नीति का परित्याग कर दिया है, यह तो अँधेरगर्दी है  इससे अनाचार बढ़ता है और समय से लोगों को न्याय नहीं मिलता। 
            लेकिन लड़के ने जब पहले आया काम किनारे सरका मेरे पहिए को हाथ लगाया तो, यह उसकी अँधेरगर्दी नहीं, मेरे लिए उजालागर्दी थी। उसके इस नैतिकता-समन्वित उचित निर्णय पर प्रसन्न होकर मैंने उसे साधुवाद दिया। वाकई! नैतिक प्रश्नों में बड़ा झोल होता है, मतलब इनके उत्तर का ऊँट किसी भी करवट बैठाया जा सकता है! और इस झोल में, क्या राजनीतिक, क्या बौद्धिक-संप्रदाय, झूल-झूलकर खूब मजे लेता है, जैसे मैं, मेरी अपेक्षानुरूप काम करने पर मैं भी लड़के से खुश था। मतलब आज के दस्तूरानुसार जिसको जिस बात में फ़ायदा नजर आए वही उसके लिए अच्छा, उचित और सत्य है।
          वैसे तो दुनिया भर के नैतिक प्रश्नों के उत्तर से संविधान को सजाया सँवारा गया है, लेकिन ज्यादा जोगी मठ उजाड़ टाइप से इसमें खूब झोल भी है। गँवई अर्थों में भी 'झोल' को सही अर्थों में नहीं लिया जाता, गाँव वाले यह कह कर कि "भइया, एहमें तअ बड़ा झोल बा!" इससे पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं। आखिर इसी झोलदारी से कुछ बड़े भाई टाइप के लोग खुद के लिए बहुत बड़ा 'आशियाना' खड़ा कर लेते हैं, बावजूद इसके कि सब कुछ संवैधानिक होता है।
           इधर समय की चिंता मेरी बेचैनी बढ़ा रही थी और उधर लड़के को रिम से टायर उतारने में देर हो रही थी। इसमें वह ऐसे जूझा था गोया पहिया नहीं भारत का संविधान हो! जो अपने मूल ढाँचे रिम से लचीलेपन वाले टायर को अलग नहीं होने देना चहता! खैर क्यों अलग होने दे! क्योंकि उसे यह पता है कि बिना टायर-ट्यूब के केवल रिम कायदे से ढनग नहीं सकता!! सच ही कहा गया है कि अतिवाद बुरा होता है, दुनियाँ 'विरुद्धों के सामंजस्य' से चलती है! खैर, लड़का ढंग से पहिए को नहीं समझा पा रहा है कि इसके (पहिया) मूल-ढाँचे से छेड़छाड़ नहीं, अपितु लीकेज दूर करने की कवायद में जुटा है, जिससे पहिया सरपट दौड़ सके! और इधर मैं मारे जल्दी के लड़के को जुगत बताने उसके पास भी पहुँच गया।
          लेकिन इतनी सी छोटी बात ये संविधान प्रेमी समझेंगे या नहीं!! दरअसल लड़का पहिए के साथ राजनीति नहीं कर रहा था, बल्कि पहिए की कमी ठीक कर रहा था, जिससे कार दौड़ सके। और अपने इस काम से दो जून की रोटी कमाना चाहता है ! लेकिन राजनीतिक लोग तो संविधान के साथ राजनीति करके रोटी कमाते हैं और रोटी सेंकते भी हैं।
         खैर मेरी बताई तकनीक पर उसने ध्यान नहीं दिया, जैसाकि इस देश के आम मेहनतकशों को केवल अपनी ही तकनीक पर भरोसा होता है। शायद पहिए को भी उस मजदूर टाइप लड़के पर भरोसा जागा! कि वह किसी राजनीतिक के हाथ में नहीं एक मजदूर के हाथ में है। अंततः उसकी तकनीक सफल हुई और रिम से टायर को छुड़ाकर उसने ट्यूब निकाल लिया। इसके बाद मामला प्रोप्राइटर जी के हाथ में आ गया।
प्रोप्राइटर जी की डीलिंग       ‌   
        लड़के से ट्यूब लेने के पहले प्रोप्राइटर जी सौदेबाजी की एक‌ डीलिंग में व्यस्त थे। उनके दूकान के सामने मेटाडोरनुमा एक मोटर आकर रूकी। धड़धड़ाते हुए उसमें से दो-तीन लोग उतरे। उन्हें देख मैं थोड़ा सहम गया, कि कहीं मेरा काम लटका कर प्रोप्राइटर जी उनका काम न टेकअप कर लें !! मुझे अपने काम की प्राथमिकता बनाए रखनी थी, इसलिए रिम और टायर के बीच के संबंध की संवैधानिक व्याख्या करने मैं लड़के के पास पहुँच गया था। इस दौरान नजर लड़के के काम पर और कान पीठ पीछे प्रोप्राइटर जी और उन नवागत व्यक्तियों के बीच आसन्न वार्तालाप पर थी। लेकिन उनकी प्रारंभिक बातचीत सुनकर मैं मुतमईन हो लिया कि मेरा काम प्रभावित नहीं होने जा रहा है|             
            संस्थान के लिए मुझे विलंब हो रहा था। इस चिंता में मेरा ध्यान लड़के के पहिए की मशक्कत पर था, कि जल्दी ट्यूब बाहर निकले और पंचर जोड़ने का काम हो। इसलिए प्रोप्राइटर जी एवं उन नवागंतुक व्यक्तियों के बीच की बातचीत पर मैं पूरा कान नहीं दे पाया। यह बातचीत किसी टायर के मोलभाव की थी। लगा जैसे कहीं से मार-झाँस कर लाए गए टायर को वे यहाँ बेचना चाहते हैं तथा जिसकी कीमत प्रोप्राइटर जी ने साढ़े पाँच हजार आंकी है। उनकी बातचीत से मैंने सोचा, "तो प्रोप्राइटर जी चोरी का माल भी खरीदते हैं! मतलब ये माफियागीरी भी कर लेते हैं!" लेकिन प्रोप्राइटर जी ने जब चार हजार रूपए से एक पैसा कम न करने की बात कहकर टायर की अनिंद्य गुणवत्ता का बखान किया, तब मेरे समझ में आया कि ये टायर खरीद नहीं, बेच रहे हैं।  
                डील फाइनल हुई या नहीं, इसे नहीं सुन पाया। टायर के ग्राहक जा चुके थे। प्रोप्राइटर जी ने ट्यूब में लीकेज चेक करने के लिए अपने 'हवामहल' की घुंडी घुमाई और उसका पाइप हाथ में लिया। ट्यूब में बेमुरौव्वत होकर हवा भरा, लगा जैसे ट्यूब ही फट पड़ेगी! इसमें लीकेज देखने की उत्सुकता में मेरी दृष्टि इस पर जम गई। मेरा अनुमान था कि पानी से भरे किसी कठौते में इसे डुबोया जाएगा, जिससे चट से लीकेज का पता चलेगा और पट से पंचर जोड़कर पहिया रेडी हो कर देंगे ये लोग! मैं इधर-उधर पानी भरा टब खोजने लगा, लेकिन ऐसी कोई चीज वहाँ नजर नहीं आई। कोई भी सोच सकता है भला यह भी ध्यान देने की बात हुई ! लेकिन नहीं, किसी काम की सारी व्यवस्थाएँ चकाचक होने पर उस कार्य के शीघ्र संपन्न होने की संभावना होती है! 
        हाँ मुझे जल्दी थी, शायद इसलिए मैं इन बातों पर ध्यान दे रहा था। लेकिन प्रोप्राइटर महोदय ट्यूब हाथ में लेकर उसे घुमाने लगे और उसपर धीरे-धीरे हाथ फिरा-फिरा लीकेज का पता कर रहे थे। इस तरह पंचर खोजाई में सफलता मिलती न देख, पास में रखे बोतल का पानी ट्यूब पर ऐसे चुआने लगे जैसे यह पानी विशेष किस्म का और मूल्यवान हो! इसके साथ कभी-कभी सूँ-सूँ सीं-सीं टाइप की आवाज सुनने के लिए ट्यूब को कान से भी लगा लेते। इधर विलंब से मेरी बेचैनी बढ़ रही थी, मुझसे रहा नहीं गया और मैंने ट्यूब को पानी में डुबोकर देखने के लिए कहा। लेकिन मेरी सलाह खारिज करते हुए 'यही सबसे बढ़िया तरीका है...अभी मैं बताता हूँ कि इसमें क्या हुआ है!' ऐसे कहा जैसे कोई रहस्य बताने जा रहे हों! लेकिन जब ट्यूब में एक बार फिर हवा भरा तो मुझे थोड़ी कोफ्त हुई। फिलहाल मैं करता क्या, चुपचाप देखते रहने के सिवा कोई चारा भी तो नहीं था!
ट्यूब में लीकेज एक रहस्य!
           अंतत: प्रोप्राइटर जी ने अपना फैसला सुना दिया कि "ट्यूब में पंचर नहीं है!" मैंने कहा "तो हवा कैसे निकली!" उनने कहा, "निकल गई होगी..जैसे निकलती है..इसमें क्या?" "नहीं मेरा मतलब ट्यूब के सही होने पर कैसे निकलेगी?" "एक या दो जगह पंचर का जोड़ है, कहें तो उसे खोल कर फिर बना दें! हो सकता है वहीं से.." कहते हुए प्रोप्राइटर जी पर जैसे किसी डाक्टर की आत्मा सवार थी। लेकिन मैंने दृढ़ता से कहा, "वहाँ कोई लीकेज तो है नहीं, फिर क्यों बनाओगे...हो सकता है वाल्व से हवा निकली हो!" प्रोप्राइटर जी के अनुसार ट्यूब का वाल्व भी ठीक था और इस तरह मुझे लीकेज का रहस्य नहीं समझा पाए ! खैर वो क्या समझा पाते, यह तो इस देश की महान संस्कृति की मान्यता में ही निहित है कि यह जगत, ज्ञान से परे एक अलक्षित और सर्वव्यापी व्यवस्था से संचालित है, और यह लीकेज भी मुझे ऐसी ही किसी सर्वव्यापी व्यवस्था का अंग जान पड़ा! 
         लेकिन देखा जाए तो बौद्धिक-सांप्रदायिकों की दार्शनिक-बुद्धि बड़े फ़क्र से पलक झपकते जाकी रही भावना जैसी टाइप से इस मायामय जगत की व्याख्या कर देती है। और इसके पीछे के रहस्य को उद्घाटित कर समस्याओं का तत्काल समाधान प्रस्तुत करने को उद्धत भी हो जाती है। चूँकि मैं भी तथाकथित लेखक टाइप से लिख लेता हूँ, जाहिर सी बात है मुझमें भी कोई न कोई बुद्धि तो होगी ही, ऐसा मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं भी अपनी बुद्धि के सहारे ट्यूब से हवा निकलने के पीछे का रहस्य खोजने में जुट गया।
         और मैंने इस प्रकार चिंतन किया,  "हाँ तो, अच्छे भले पहिए से हवा निकली कैसे ! ...आज सुबह कार की चाभी हाथ में लेते ही मुझे एक जोरदार छींक आई थी, हो न हो इस अपशकुन की वजह से ही पहिए की हवा निकली हो! काश, उस समय इस छींक को मैं रोक लेता !! लेकिन बेचारी छींक ठंड लगने से आई थी, दोष ठंड का है, तो ठंड ही वजह रही होगी पहिए से हवा निकलने की! मतलब न ठंड होती न छींक आती और न पहिए से हवा निकलती!" इसके साथ ही अब मुझे भी बुद्धिवादियों के समान अपनी बुद्धि पर फ़क्र हो आया और इस चिंतन को देशहित टाइप का चिंतन घोषित किया। ऐसे ही चिंतनों के सहारे देश के पहिया रूपी संविधान से हवारूपी लोकतंत्र के रिसाव को ठीक किए जाने का उपाय सुझाया जा सकता है और संविधान की सुरक्षा हो सकती है। 
        वैसे मन ने यह भी विचारा कि, कहीं प्रोप्राइटर जी पंचर को लेकर पहिए पर कोई राजनीति तो नहीं कर रहे! या इनका कोई छिपा हुआ एजेंडा तो नहीं है! आखिर हैं तो धंधेबाज ही, अपने कद से ऊँची दुकान ऐसे ही नहीं खड़ी कर लिए होंगे!! ये महाशय कहीं मेरे पहिए की छीछालेदर न कर दें! क्योंकि धंधेबाज टाइप के लोग चीजों के साथ खूब राजनीति करते है। हाथ कंगन को आरसी क्या देश की चिंता में सक्रिय दो गैंगों को ही देख लीजिए; इनमें से एक है 'देश-भक्त' गैंग तो दूसरा 'संविधान बचाओ' गैंग! ये दोनों गैंग देशहित में आपस में ही मरे-कटे जा रहे है। कोई किसी को देश की एकता-अखंडता के लिए खतरा, तो कोई किसी को टुकड़े-टुकड़े गैंग बताए जा रहा है! देश में आजादी मांगने का आंदोलन ऐसे उठ खड़ा हुआ है, जैसे सन सैंतालिस में देश को बेवकूफ बनाया गया हो!! 
            वैसे एक बात है, आखिर लोकतंत्र भी तो अपने यहाँ धंधा है, और धंधेबाजी में लोग असहिष्णु होते ही हैं अगर कोई असहिष्णु नहीं होगा तो उसका धंधा कैसे परवान चढ़ेगा! धंधा करना संवैधानिक अधिकार भी है, इसे परवान चढ़ाने के विविध तरीके हैं। इसलिए पत्थरबाजी, आगजनी, तोड़-फोड़ गाली-गलौज आदि अब असंवैधानिक कृत्य नहीं हैं। एक बात और रीडेबल है; संविधान की सुरक्षा के लिए इस तरह की असहिष्णुताएँ अनिवार्य हो चुकी है। इसे विश्वविद्यालयी कैरीकुलम में लगभग सम्मिलित भी किया जा चुका है, यहाँ थीसिस गढ़ी जा रही है कि देश और संविधान एक दूसरे के विरोधी हैं। इसी के तहत देश-भक्त गैंग देश को, और संविधान बचाओ गैंग संविधान को सर्वोपरि मानते है। कुल मिलाकर बड़ी गपड़चौथ मची हुई है! बुद्धिजीवी इसपर कुछ रिसर्च करके बताएँ कि देश और संविधान में कौन किससे है? 
          "अरे साहब जी, आपका ध्यान किधर है!! इसे ही लगाके पहिया बाँध देते हैं?" हाथ में कार की ट्यूब लिए प्रोप्राइटर जी पूँछ रहे थे। अचानक जैसे जागकर मैंने बोला ,"नहीं-नहीं संशोधन करके लगाओ..मेरा मतलब नई ट्यूब लगा दो" मैं कोई खतरा मोल लेने को तैयार नहीं था। प्रोप्राइटर जी ने नई ट्यूब की कीमत पाँच सौ रूपये बताई। मोलभाव में समय न गवाते हुए मैंने बस इतना ही कहा कि रेट सही लगाना। 
          अपनी पैकेजिंग से बाहर आई ट्यूब पहिए की साइज से थोड़ी छोटी प्रतीत हुई। इस शंका के निवारण हेतु मैंने कई बार प्रोप्राइटर जी से पूँछतांछ करी‌ और वे मुझे संतुष्ट करते रहे। लेकिन मेरे शंका का समाधान हो इसके पहले ही कैंची उठाकर उन्होंने उस ट्यूब को फाड़ दिया। नई ट्यूब लेने के सिवा अब मेरे पास कोई चारा भी नहीं था। पूँछने पर बताया कि इसे नई ट्यूब पर चढ़ाने से वह सुरक्षित हो जाएगी। लेकिन, मुझे लगा कि जैसे मेरा अनुमान सही था। खैर, जो भी हो अब उसकी साइंटिफिक बुद्धि पर मुझे भरोसा करना ही था। अपने अनुमान को तूल देना मैंने उचित नहीं समझा। इधर पहि‌या अपनी धुरी पर चढ़ने के लिए तैयार हो चुका था।
            सही पैसा लेने की बात दुबारा कहा तो चार सौ रूपए पर बात आ गई। मैंने पाँच सौ रूपए का एक नोट दिया। प्रोप्राइटर महोदय ने उलट-पलट कर ध्यानपूर्वक देखने के बाद उसे नकली बताकर वापस कर दिया। हलांकि मुश्किल से मैं उन्हें समझा पाया कि एटीएम से निकला यह नोट असली है। लेकिन यह  चिंता की बात थी, क्या इस देश में नकली नोट का मिलना इतना आसान है! खैर, पहिया तैयार हो चुका था उसे लेकर हम सड़क पार करते हुए कार की ओर चल पड़े।
 मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट और न्यूरॉन्स 
           इस कार पंचर बनवाई में मेरा एक घंटे से ज्यादा खर्च हो गया था। इधर दिमाग के किसी खाने ने हुए इस विलंब पर गौर करना शुरू किया कि, "संस्थान के लोग मुझे खोज रहे होंगे कि मैं कहाँ गायब हो गया! स्वयं उप निदेशक ने भी तो इस सत्र में उपस्थित रहने के लिए मुझसे कहा था, पता नहीं मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे वे!" और इस दिमागी हड़बोंग के साथ मैं कब सड़क पार कर गया मुझे पता ही नहीं चला। कार के पास पहुँचा तो पीछे मुड़कर देखा, लेकिन लड़का पहिया हाथ में लेकर अभी भी सड़क के उस ओर ही खड़ा है। वह गाड़ियों की आवाजाही को ध्यान से देख रहा था। 'बेवकूफ लड़का मेरे समय की कीमत क्या जाने!' मैंने सोचा। उसकी इस बेपरवाही पर मेरे लाल हो चुके क्रोध-तंतु उस समय डिफ्यूज हुए, जब उसे घूरते हुए मैंने सोचा, दरअसल वह मेरे प्रति नहीं, अपने प्रति सजग तो है ही। खैर, लड़के ने इत्मीनान से सड़क पार किया।
         कार के पास पहुँचकर उसने डिग्गी से स्टेपनी निकाला। इसे लगाने में शीघ्रता हो, मैंने भी बोल्ट-सोल्ट कसने में उसकी मदद किया। इसके बाद जैसे हाथ झाड़ते हुए उस लड़के ने कहा, 'काम हो गया अब आप जा सकते हैं।' कार के ऊपर एक सरसरी दृष्टि डालकर मैंने राहत की सांस ऐसे ली, जैसे कोई योद्धा अपने विजित मैदान को निहारता हो! फिर किसी राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष जैसे देश चलाने के अंदाज में, कार का दरवाजा खोलकर ड्राइविंग सीट पर सवार हो गया। लेकिन मेरी कार और देश में यही अंतर है कि जहाँ देश की मैन्यूफैक्चरिंग डेट सन 47 की है वहीं यह कार 2004 मॉडल की है। इधर आए दिन देश की एकता और संविधान को लेकर मच रहे हो-हल्ले से इतना तो स्पष्ट होने ही लगा है कि सन् 47 वाले अपने देश के मॉडल में ही मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट है, इससे बढ़िया तो इस जेन कार का माॅडल है, जिसमें पंचर-वंचर छोड़ अन्य कोई  डिफेक्ट-विफेक्ट आज तक समझ में नहीं आया, खैर। असल में क्या है कि, इन दिनों मेरी कार का रिमोट लॉकिंग सिस्टम खराब है, जिसे मैं मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट नहीं मानता, लाॅक के लिए मैन्युअली चाभी का प्रयोग करते हैं। 
          टूल्स वगैरह लेने के चक्कर में कार का गेट लॉक नहीं था। सीट पर बैठते ही चाभी के लिए पैंट की जेब में हाथ डाला, लेकिन इस जेब में चाभी नहीं थी। फिर दूसरी जेब में हाथ डाला, यहाँ भी असफल होने पर कोट की जेब टटोला तो वहाँ भी चाभी नहीं मिली! चेहरे पर थोड़ी चिंता की लकीरें खिंची और साथ में हड़बड़ाहट भी हुई। 'लेकिन चाभी गायब होने का प्रश्न ही नहीं' सोचकर कार से बाहर आ गया। बाहर खड़े-खड़े कोट एवं पैंट की जेबों में हाथ डाल-डाल कर टटोलना शुरू किया, लेकिन चाभी का पता नहीं चला! 
               पास में खड़े लड़के से मैंने कहा, "देखो, तुम्हारी दुकान में कार की चाभी तो नहीं छूटी है!" सुनते ही वह दुकान की ओर गया और इधर-उधर देखकर वहाँ से इशारा किया कि चाभी यहाँ नहीं है! मेरी उलझन अब बढ़ गई ! एक तो वैसे ही काफी विलंब हो चुका है, दूसरे मेरे सामने यह एक नई समस्या आ खड़ी हुई !!
          मैंने, मस्तिष्क में स्मृतियों के कोठे की कोशिकाओं में उन न्यूरॉन्स को तलाशने की कोशिश की, जिनसे पता मिलता कि आखिर कहाँ रख दिया है मैंने कार की चाभी !! लेकिन कोई तंतु पकड़ में नहीं आ रहा था! पता नहीं ये न्यूरॉन्स मस्तिष्क के किस ब्लैक-होल में गायब हो गए थे!! अगर कुछ याद था तो बस यही कि, पंचर बनाने वाली दुकान देखकर कार रोकना...सड़क पार कर उसकी ओर जाना..प्रोप्राइटर जी के साथ पुन: कार तक वापस आना..डिक्की से जैक निकालना...जैक का खराब हो जाना...प्रोप्राइटर जी का जैक लाना...कार को उठाना...बाटी वाले लड़के को बुलाना…कार उठाते समय दरवाजे का खुला रखना...और..और...चाभी! हाँ केवल चाभी ही मेरी यादों कि लिस्ट से गायब थी...हो सकता है, दरवाजे में ही लगा छोड़ा हो..!! (कार के दरवाजे को देखते हुए) लेकिन चाभी यहाँ भी नहीं लगी है..ओफ्फोह...आखिर कहाँ रख दिया मैंने? सँकरे सी जगह में रखा था क्या..!
         फिर दूकान में हाथ धुलने का ध्यान आया, "हो सकता है हाथ धुलते समय वहीं कहीं रखा हो..!" क्या है कि विचारों में खोए रहने पर कभी-कभी हाथ में ली हुई चीज इधर-उधर रखकर भूल जाता हूँ। खैर, मैं दुकान की ओर गया और प्रोप्राइटर जी से कहा "कार की चाभी खो गई है, जरा यहाँ देखिए तो" और वहाँ सभी संभावित स्थानों पर देखने के बाद मैंने न जाने क्यों 'सँकरा स्थान' समझ एक छोटे डिब्बे में भी देखा, जिसमें कुछ छोटे पेंच रखे थे, लेकिन उसमें वह चाभी नहीं थी !! मेरी मायूसी भाँपकर प्रोप्राइटर जी ने मुझे समझाया, "आराम से खोजिए जेब में या फिर गाड़ी में ही कहीं पड़ी होगी।" मेरे यह बताने पर कि "सारे जेब देख लिए, कहीं नहीं है!" "तो फिर तो कार में ही खोजिए" कहते हुए वे भी मेरे साथ कार तक चले आए।
                 मेरे मन मस्तिष्क में, संस्थान के लिए होते विलंब और चाभी गुम होने की चिंता ने, लगभग बदहवासी का रुख़ अख़्तियार कर लिया था। हमने कार की डिक्की में भी तलाशी ली, कि कहीं स्टेपनी रखते-निकालते वक्त भूलवश उसी में न छोड़ा हो! लेकिन ऐसा भी नहीं था। अब मैं गहरे निराशा की गर्त में धँस चुका था। मेरी इस स्थिति को समझकर प्रोप्राइटर जी ने एक बार फिर मुझसे कार के अंदर ही चाभी खोजने के लिए कहा, मैने वैसा ही किया। मेरे दिमाग में कोई 'संकीर्ण स्थान' उभरा जहाँ चाभी हो सकती है, अवचेतन मस्तिष्क के इस संदेश पर मैंने कार के डैश बोर्ड के बॉक्स की भी तलाशी ली। इसके बाद कार में इग्निशन प्वाइंट को भी देखा कि शायद चाभी उसी में लगी रह गई हो, फिर कार की चटाई, पावदान आदि के नीचे भी खोजा! चाभी नहीं मिली। आखिर में थक-हारकर बाहर आ गया। 
           बाहर प्रोप्राइटर जी ने एक बार फिर कहा, चाभी कार में या आपकी जेब-वेब में ही कहीं होनी चाहिए, ज़रा आराम से खोजिए मिल जाएगी, हड़बड़ाइए नहीं, चाभी कौन ले जाएगा! एक बार फिर सारी जेबें टटोलकर मैंने प्रोप्राइटर जी से कहा, "वह बाटी वाला लड़का, जिसने कार उठाने में हमारी मदद की थी, हो न हो उसी ने शरारतन कार से चाभी निकाल लिया हो! नहीं तो कहाँ जाएगी!!" पहले तो नहीं, मेरे जोर देने पर प्रोप्राइटर जी ने कहा, "हो सकता है, उस लड़के ने ही निकाला हो!" और उसकी गुमटी की ओर देखते हुए कहा, "वह लड़का चला गया है, अब कल आएगा तो पूंछेंगे।" और अपनी दुकान की ओर चले गए। 
अंकित मोटर्स     
       एक बार मुझे प्रोपराइटर जी पर भी संदेह हुआ, क्योंकि उनकी दूकान छोड़कर मैं और कहीं नहीं आया-गया था। लेकिन इस संदेह का औचित्य मुझे समझ में नहीं आया और इसे फिर से बाटी वाले लड़के पर ही अंतिम रूप से शिफ्ट कर दिया। इस वक्त कार के पास मैं अकेला खड़ा कुछ इस तरह सोच रहा था-
        "कार छोड़कर जा भी नहीं सकता...कार लॉक नहीं और दूसरे क्या पता चाभी किसी के हाथ में हो, आँख ओट होते ही बिना किसी हुचकी-धमधम के कार लेकर वह चलता बने! मैं कितना अजीब और बेवकूफ आदमीं हूँ कि एक अदद जरूरी चीज का भी ध्यान नहीं रख सका..धिक्कार है मुझे..हाँ घर पर डुप्लीकेट चाभी तो है..! वही मंगा लेते हैं..लेकिन नहीं..तब तो पत्नी और बच्चों के समक्ष मेरे एक लापरवाह और बेवकूफ व्यक्ति होने पर भी मुहर लग जाएगी और हँसी का पात्र बनुँगा अलग से.!! दूसरे यह भी तो, घर से चाभी आने में एक घंटा से ज्यादा लग जाएगा और तब तक मुझे भी यहीं रुकना होगा..उस समय तक तो संस्थान में आज का सत्र भी समाप्त हो जाएगा, नहीं...नहीं वहाँ मेरी अनुपस्थिति ठीक नहीं..!" 
       इस ऊहापोह और किंकर्तव्यविमूढ़ता के बीच घर फोन कर मैं डुप्लीकेट चाभी के बारे में सुनिश्चित हुआ। लेकिन चाभी भेजने से मना भी किया। इसके बाद मदद की आस में पंचर बनानेवाली उसी दुकान की ओर गया।
        प्रोप्राइटर जी दूकान बंद करके जाने वाले थे।  मुझे चंद कदम दूर स्थित मोड़ से सौ मीटर दूर 'अंकित मोटर्स' जाने का उन्होंने सुझाव दिया। मैं वहाँ गया। बेचारे 'मोटर्स' मालिक चाभी का एक गुच्छा लेकर मुझे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर कार तक आए। लेकिन चाभियाँ काम न आई, उल्टे कार की स्टेयरिंग भी लाॉक हो गई! समस्या अब जटिल होकर 'अंकित मोटर्स' के वश के बाहर की बात हो गई। ऐसी स्थिति में तीन किमी दूर से मैकेनिक बुलाकर लाॅक ठीक कराने को कहा, जिसमें एक घंटे से अधिक समय लगता।
         मै पशोपेश में पड़ गया था, क्योंकि आज के सत्र समाप्ति के पूर्व, संस्थान में हाजिरी लगाना जरूरी समझ रहा था। मैंने उन्हें अपनी स्थिति समझायी तो उनका प्रस्ताव था कि "कार ठीक होकर 'अंकित मोटर्स' पर खड़ी रहेगी, शाम को लौटते समय ले लेना।" इस पर मैं सहर्ष सहमत हो गया। इसके बाद मेरे अनुरोध करने पर मुझे अपनी मोटरसाइकिल से संस्थान तक छोड़ने भी गए! तथा मेरी अटैची समेत कार मेें रखे अन्य सामानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लिया। खैर, संस्थान में मुझे देखकर आयोजकों के चेहरों पर संतोष का भाव था।
       यहाँ से फुरसत पाने में शाम के छह बज गए!  फोन करने पर पता चला कि कार ठीक हो गई है। मैं गैराज पहुँचा तो पता चला कि कार का स्टेयरिंग-लॉक मय अपने पेंचोें के कार के ही डैश बॉक्स में विश्राम फ़रमा रहा है, मतलब स्टेयरिंग उजड़ा चमन टाइप दिखाई दिया। और उन 'अंकित मोटर्स' के अनुसार स्टेयरिंग-लॉक तोड़ने से बचा लिया तथा इसे सावधानी से खोलकर पेंचों सहित बॉक्स में रख दिया गया है। उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि कोई भी मैकेनिक पाँच सौ रूपए में फिर से इसे फिट कर देगा, अन्यथा नया ढाई हजार में आता। उन्होने अपने मेहनताना के ढाई सौ रूपए लिए और मैं घर के लिए निकल पड़ा। ड्राइविंग के समय मुझे कोई समस्या नहीं हुई।   
कुकुर झौं झौं
          खैर, बिना स्टेयरिंग लॉक के स्टेयरिंग-वील पर मैं हाथ जमाए था। संयोग से अपने लखनऊ शहर में, यहाँ 'अपने' शब्द के प्रयोग में थोड़ा कंफ्यूजन है मुझे, दरअसल मेरा शहर जो अपना जैसा था जीवन के आपाधापी में, न जाने कब के उसे बहुत पीछे छोड़ आया हूँ! लेकिन नो मेंन्शन! जहाँ रहते हैं उसे अपना ही मानना चाहिए, इसीलिए 'अपने' का विशेषण लगाया है। तो, मैं कह रहा था, लखनऊ शहर में संविधान बचाओ के तहत नागरिकताबाजी मने तोड़फोड़, आगजनी, मार-कुटाई आदि चल रही थी! इस लोकतांत्रिक-बवाल में न फसें, इसीलिए मानव-बस्ती से दूर क्योंकि, मानव बस्तियों में अब आदमी नहीं नागरिक टाइप के जीव रहने लगे हैं, एक वीराने रास्ते से कार को दफा-सरपट भगाते चला जा रहा था। 
         वैसे, अब समझा कि आजादी आंदोलन में भी फूँको-तापो, तोड़ो-फोड़ो वाली लोकतांत्रिक स्टाइल का पक्का योगदान था। नहीं तो आज लखनऊ क्या, बड़की राजधानी तक में धुँआ उठता न दिखाई देता! बाकी गाँधी बाबा तो मुखौटा ही थे! अंग्रेजों को तो वैसे भी जाना ही था! अगर न जाते तो क्या भारत माता की ठठरी चबाते, है कि नहीं? दरअसल अंग्रेज भी समझ गए थे कि, उनके लिए हिदुस्तान में कुकुर झौं-झौं के सिवा कुछ भी नहीं बचा  है। इसीलिए गाँधी बाबा को आगे कर इज्जत के साथ वे अपने विलायत लौट गए! और चूँकि इंडिया वाले संस्कारों पर भरोसा रखते हैं, इसलिए आजादी में जिस स्टाइल के संस्कार का योगदान समझ में आया उसे ही लोकतांत्रिक हथियार बना रहे हैं। अगर गाँधी बाबा समझ में आते तो गाँधीगरी अपनाते! हम तो डंके की चोट पर कहेंगे, इसी लोकतांत्रिक स्टाइल से हमने संविधान पाया है, तो इसे बचाएंगे भी इसी तरह, है कि नही?
         तो, संविधान बचाने के लिए लोकतांत्रिक बवाल का मुज़ाहिरा करना ही होगा! आखिर, लोकतंत्र होगा तभी न संविधान होगा!! अन्यथा संविधान एक कोने की बिल्ली बन कर रह जाएगा! और अगर संविधान दुबका तो हो चुका देश का कल्याण। इसे तो खुले मैदान में सर्वजन सुलभ टाइप से तांडव की मुद्रा में दिखाई पड़ते रहना चाहिए, जिससे देशवासी संविधान को सुरक्षित समझें, क्यों है न? बताइए, जतन से बने संविधान पर ही खतरा! आदमी भजन गाता फिरे और संविधान दुबक के रहे! इस देश में अब यह नहीं चलने वाला!! इसीलिए ये लोकतंत्र सेनानी देश की लत्तेरे की धत्तेरे की करने निकले होंगे, क्यों सही दिशा में जा रहे हैं न सब?
          इसलिए हिन्दुस्तानियों के इस नृत्य मुद्रा पर बंदिश नहीं होनी चाहिए। आखिर पता तो चले कि बंदे नहीं, ये साक्षात संविधान की आत्माएँ नृत्य कर रही हैं और देश में चहुँ ओर संविधान ही संविधान व्याप्त है। सभी संविधानवादियों से गुजारिश होनी चाहिए कि खुले मैदान में इसी तांडवीय पोज़ में आते रहें, जिससे भारतभूमि में लोकतंन्त्र को हलके में लेने की जुर्रत कोई न कर सके। और लोकतंत्र का आकर्षण आलओभर इंडिया के आल द प्यूपिल को अपनी गिरफ्त में ले ले। वाकई! इसमें देश का कल्याण निहित है!!      
       अचानक मुझे रोड-ब्रेकर नजर आया, जो ब्रेकर कम सड़क पर मेड़ बाँधकर बनायी गई नाली ज्यादा लगी !! हलका सा ब्रेक लेते हुए स्टेयरिंग को बाँए घुमाया, कार का दाँया पहिया ब्रेकर पर से और बाया पटरी के समतल भाग से आधी हकीकत आधा फ़साना टाइप से गुजरा!! लेकिन कार की इस हलकी कुदाई में उसके डैश बोर्ड पर रखा स्टेयरिंग-लॉक का कवर सरक कर नीचे गिर पड़ा, जिसे टटोल कर मैने पुनः उसी पर रख दिया| इसी के साथ दिमाग भन्ना गया कि इस स्टेयरिंग लॉक की क्या जरूरत है?
 हॉरर-टेरर और थ्रिल वाली फिल्म!   
         सही.. आखिर क्या जरूरत है इसकी? अरे ! एक बार तो इसी स्टेयरिंग लॉक की वजह से मैं खतरे में पड़ गया था!! कुछ ऐसी ही बेवकूफी हुई थी उस दिन मुझसे! एक हाईवे पर ऐसे ही कार को ड्राइव कर रहा था मै, लगभग अस्सी से ज्यादा की स्पीड रही होगी उस समय, जब एक ओवरब्रिज की ढलान पर मेरे मस्तिष्क में बेवकूफी कुलबुलाने लगी थी! मुझे पता नहीं क्या सूझा कि भागती कार को न्यूट्रल गियर में डाल दिया, फ़कत यह देखने के लिए कि देखें ऩयूटन के नियमानुसार कार कितनी दूर जाएगी.!! लेकिन बाप रे!! कुछ ही पल में मुझे एहसास हुआ कि कार की स्टेयरिंग लॉक हो चुकी है!!! संयोग से उस समय कार स्टेट ड्राइव पर तो थी, लेकिन दाहिनी ओर थोड़ी झुक चुकी थी, मेरे तब हाथ-पाँव फूल उठे, जब सामने से आता ट्रक मुझे दिखाई दिया!!! 
         खैर 'भगवान सोझ' थे, मेरी इस धृष्टता पर टेढ़े नहीं हुए, अन्यथा ट्रक ने कार के साथ मेरा भी कचूमर निकाल दिया होता| मेरे दिमाग ने जैसे अपनी बेवकूफी से मुझे खतरे में डाला, वैसे ही प्रत्युत्पन्नमति देकर इस डैंजरस पोजिशन से उबारा भी!! हुआ यह कि खतरे का अहसास होते ही बिना देर किए मैंने कार का इंजन पुनः स्टार्ट कर दिया और लॉक खुल गया!! तथा अगले ही पल कार मेरे नियंत्रण में आ गयी थी! ठीक उसी समय वह ट्रक भी बगल से गुजर गया था| मेरी जान में जान आई! मन ही मन कान पकड़कर ऐसी डैंजरस टाइप की बेवकूफियों से तौबा किया। 
           कोई मैकेनिकल टाइप की योग्यता नहीं है मुझमें, लेकिन इतना पता है कि कार को चोरी से बचाने के लिए यह सिस्टम लगाया जाता है! बस मैं मुस्कुरा उठा, मतलब इतना भारी-भरकम संविधान होने के बावजूद 'अपने सामान की सुरक्षा खुद करो' के स्टाइल में देश अभी भी चल रहा है!! इसमें कोई ऐसा लाॉकिंग सिस्टम नहीं कि देश में चोरी-चकारी और बदमाशी रोक पाए! इकहत्तर साल का हो चला है यह संविधान ! मुला इससे एक अदद कार की सुरक्षा नहीं हो पा रही और हम हैं कि इसे बचाने के लिए मरे जा रहे। इसमें संविधान का नहीं, कुसूर इसके लचीलेपन का है!! इससे चोरी रोकिए या फिर न रोकिए!! 
             एक बात और चोरी रुकने से रामराज आएगा और यह सेक्युलरिज्म पर खतरे की बात है, क्योंकि चोरी-बेईमानी, दंगा-फसाद-अपराध आदि सेक्युलरिज्म के गुण है। इसके विपरीत रामराज आने से संविधान की मूल आत्मा प्रभावित होगी। वैसे 'रामराज' मेरे दादा जी का नाम था, वे मुझसे बेहद प्रेम करते थे, इसलिए इसपर टिप्पणी करना मैं उचित नहीं समझता।
         काश कि संविधान में भी स्टेयरिंग-लॉक टाइप का सिस्टम होता तो देश चोरी-चकारी और राजनीति-फाजनीति से मुक्त होता और इसपर खतरे की गुंजाइश भी न बनती। लेकिन तब  बिना थ्रिल के हमारी नागरिकता एकरसता की शिकार होती !! और ऐसी ऊबन भरी नागरिकता किस काम की? आखिर नागरिकता जाहिर करने का मक़सद भी तो होना चाहिए। रामराज में नागरिकता जाहिर करने का अवसर मिलने से रहा! तब नागरिक लोग घर में बैठकर या तो आराम फरमाएंगे या काम-धंधे में लिप्त होंगे! मतलब फालतू में नागरिक लोग अपनी नागरिकता के साथ सड़क पर क्यों नाचेंगे जब सब कुछ अच्छा ही अच्छा हो रहा हो! लेकिन नागरिकता का सड़क पर न आना लोकतांत्रिकों की नजर में इसकी कमजोरी है। खुले मैदान में आकर यह हिष्ट-पुष्ट होकर टेररवान बन जाती है! जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में बेहद गुणकारी सिद्ध होती है! इस प्रकार ऐसी नागरिकता आनंददायिनी भी मानी जा सकती है!!
        इसलिए हमें नागरिकता के हॉरर-टेरर का एहसास होते रहना चाहिए! क्योंकि ऐसी फिल्मों में खूढ मज़ा भी आता है, है न? अच्छा ही है कि संविधान में कोई लॉकिंग-सिस्टम नहीं लगाया गया है! अन्यथा चहुँ ओर रामराज ही होता और हम लोकतांत्रिक थ्रिल के मज़े से वंचित होते।
        इस तरह मन से बातें करते हुए मैं घर के पास पहुँच रहा था और रात के आठ बज चुके थे। 'वाहे गुरू' के गैरेज का ध्यान हुआ तो कार उस ओर मोड़ लिया। सोचा, सुबह संस्थान जाते समय लॉक बनवाने का झंझट भी न रहे। लेकिन पता चला, गैराज के लड़के जा चुके थे। सरदार जी ने लॉक बनवाने का आश्वासन देते हुए अगले दिन सुबह साढ़े नौ बजे आने के लिए कहा।
        घर पहुँने पर परिवार एक तरफ और मैं अकेला दूसरी ओर! गायब हुई चाभी को लेकर मेरी बुद्धि और योग्यता को, हलांकि जिस पर मैं भी संदेह करता आया हूँ, व्यंग्य बाणों से छलनी किया गया। मौनं स्वीकार लक्षणं टाइप से मैंने सारे व्यंग्य बाण सहे, आखिर इसके सिवा मेरे पास और कोई चारा भी तो नहीं था !! वैसे भी, नौकरी-चाकरी में इस बात की भी ट्रेनिंग मिलती है कि बॉस की झाड़ को 'बेचारे' बनकर 'नो आर्ग्यूमेंट' टाइप से सिर झुकाकर पी लेना चाहिए और फिर, तरकश के तीर खतम होते ही उल्टे बॉस के मन में आप के प्रति सिम्पैथी जाग जाती है। अंततः यहाँ भी मेरी चुप्पी से पत्नी और बच्चों के मन में मेरे प्रति दया-भाव जाग उठा और सबने मिलकर सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में मेरी समस्या का हल खोजना शुरू कर दिया!
           दरअसल मैं छह दिन के लिए उस संस्थान में गया था, ऐसे में सरकारी ड्राइवर और गाड़ी का उपयोग मेरे लिए असुविधाजनक और दुरूपयोग दोनों था, इसलिए अपनी कार का प्रयोग कर रहा था। खैर, मेरा प्रस्ताव था कि सुबह कार छोड़कर ओला टैक्सी बुक कर लुँगा और पुत्र महोदय अॉथराइज गैरेज जाकर कार में नया स्टेयरिंग-लॉक सिस्टम लगवा लेंगे। क्योंकि मेरे अनुसार पुराने स्टेयरिंग लॉक  को ठीक कराने में अब कार चोरी का भय रहेगा। क्या पता जिसके हाथ चाभी लगी हो, उसने कार चोरी करने की नीयत से ही चाभी गायब की हो, और ऐसा करना भी उसके लिए बहुत आसान होगा। चाभी से कार का दरवाजा खोला, स्टार्ट किया और आराम से लेकर चलता बना, देखने वाले भी यही समझेंगे कि कोई अपनी कार ले जा रहा है। लेकिन मेरे इस प्रस्ताव पर सुपुत्र जी असहमत थे। उनके अनुसार-
       चाभी गायब होने वाले इलाके मेें आप नहीं रहते, फिर इस बात की एकदम संभावना नहीं कि चोरी के लिए वह आपकी कार का पीछा ही करे! और इसके लिए ही बैठा रहे! दूसरे यह भी कि इस 2004 मॉडल के लिए कोई चोरी करने का रिस्क भी नहीं लेना चाहेगा। इस प्रकार ऐसे ही कथनों के साथ चोरी वाली मेरी बात को हास्यास्पद ठहराया गयॎा। उनकी राय थी कि डुप्लीकेट चाभी तो है ही, लॉक ठीक कराकर उसी से काम लिया जाए। मुझे यह बात जँची और यही प्रस्ताव पास हुआ। मैंने तय कर किया कि किसी मैकेनिक को कार दिखाते हुए संस्थान  जाएंगे।
दिमाग जी का अट्टहास!
             सुबह साढ़े नौ बजे संस्थान के लिए निकलते समय पहली बार क़ायदे से स्टेयरिंग पर निगाह पड़ी| तार के साथ लटक रहे इग्निशन प्वाइंट में किसी भी छोटी चाभीनुमा चीज से ऐंठ देने पर कार स्टार्ट हो जा रही थी| मुझे साक्षात इंडियन जुगाड़-कल्चर का दर्शन हुआ! लेकिन कार के इस जुगाड़ हालात पर मुझे दया आई! और सीधे संस्थान न जाकर पहले "वाहे गुरू गैराज" चलने का निश्चय किया, वैसे मेरे पास 'अंकित मोटर्स' का भी आप्शन था। उसके अनुसार यदि आज मैं वहाँ कार छोड़ता तो वह ठीक करा देता। खैर मेरी निगाह कार के स्पीडोमीटर के साथ तेलोमीटर पर भी पड़ी, यहीं पर पता चला कि चश्मा घर भूल आया हूँ, अब पहले उसे लेना जरूरी हो गया और उसके बाद पेट्रोल भराना। कार घर की ओर मोड़ लिया।
       "मैं चश्मा क्यों भूला! क्यों भाई दिमाग जी..आजकल मेरे से ऐसा मिसविहैव क्यों! घर से निकलते समय चश्मे की याद क्यों नहीं दिलाई!" तल्ख़ियाते हुए दिमाग को उलाहना दिया|
           अच्छा! उल्टा चोर कोतवाल को डाटे..पहले तू अपना चित्त देख! तेरे चित्त ने ऐसा गबड़गंज मचा रखा है कि मुझे कुछ समझने ही नहीं देता कि तुझे कब किस बात की याद दिलाना है.! तूने तो पूरा कचड़ा करके रख दिया है मुझे !! अब इसमें मेरी क्या गलती है बे!!" दिमाग जी ने डाटा मुझे|
            ओह! यह तू-तड़ाक ! मेरी ही बिल्ली और मुझी से म्याऊँ! लेकिन मुझे कचड़े वाली बात कुछ समझ में न आई, मैंने पोलाइटिली पूँछा-
        नहीं, गलती की बात नहीं, मैं ये पूँछ रहा था कि..चश्मे की याद क्यों नहीं दिलाई आपने..और इसमें..मेरा मतलब कचड़े वाली बात कहाँ से आ गई!!
        अच्छा! तो..तू भी बता..कार की चाभी के बारे में तूने क्यों नहीं पूँछा..तू तो अपने ही मुद्दों से भेदभाव करता है रे! तेरे लिए कब कौन मुद्दा जरूरी है इसपर भी कभी सोचा है? लोकप्रियता के चक्कर में तू..कभी इस, तो कभी उस मुद्दे पर कूद-फाँद कर कूड़े का ढेर लगा लेता है, आखिर तू ही बता तेरी जरूरत की बात याद दिलाना इस ढेर में सूई खोजने जैसा है कि नहीं? पहले तू सोच..मेरे साथ कितना ख़ुराफ़ात करता है तू ! बुद्धिजीवी है क्या रे तू, जो मुझे कचराखाना समझ रखा है!!
          बाप रे!! दिमाग जी इतना भन्नाए हैं कि सीधे रे-ते पर उतारू हो गए..लेकिन दिमाग जी को कूल करने की कोशिश में मैंने सफाई पेश किया,
           नहीं मेरे साहब! चाभी को बाटी वाले लड़के ने शरारतन चुरा लिया था..इसलिए उसके बारे में नहीं पूँछा था..लेकिन चश्मा तो…
      हाँ..हाँ..बोल.बोल..! चश्मा तो किसी ने गायब नहीं किया...यही न, तो क्या मैं इतना फालतू हूँ कि जिस बात की तुझे चिंता नहीं उसकी याद दिलाता फिरूँ..! अरे! जिस समय तुझे चाभी..मेरा मतलब चश्मे की चिंता होनी चाहिए उस समय भी तेरा मन स्टेयरिंग-लॉक..स्टेयरिंग-लॉक...आफिस..आफिस कर रहा था..जैसे कल कार का इंजन बंद करते समय पंचर..पंचर...विलंब..विलंब कर रहा था! तो मैं कैसे समझता कि तुझे चाभी...मेरा मतलब चश्मे की भी जरूरत है..कहता कि..ले बेट्टा, चश्मा भी ले ले...!! है कि नहीं? बोल..तुझे सन्नाटा क्यों मार गया…!!
         इसके बाद दिमाग महोदय ने जो अट्टहास किया कि पूँछिए मत! अब मेरी हिम्मत कुछ पूँछने की नहीं रह गई थी उनसे! लेकिन रे-ते को भी बुरा नहीं माना, क्योंकि दिमाग जी को मेरा मन बेहद प्रिय है, वैसे जो जिसको प्रिय होता है वह उसे ऐसे ही डाटता है, और यदि डाट खाने वाला डाट खिलाने वाले की बात पर गौर नहीं किया, तो उसका नुकसान होना तय!
           वाकई ! दिमाग जी के इस झाड़ के बाद मेरा ध्यान इस विराट राष्ट्र के बुद्धिजीवियों, राजनीतिकों, देशभक्तों और संविधान-भक्तों आदि जैसों पर चला गया| आजकल इनके बीच मुद्दों की धर-पकड़ ऐसे चालू हैं कि कुछ पूंछिए मत, कोई मुद्दा सामने आया नहीं कि उसकी ओर लपके, वहीं दूसरा ठठाया तो पहला छोड़ उसकी ओर लपक लेते हैं; यही नहीं मुद्दे की काट में मुद्दे पैदा किए जा रहे हैं ! हाँ मुद्दों की इस धमाचौकड़ी और लपका-लपकी के बीच असली मुद्दा किसी कोने में बैठकर हाँफते हुए सुस्ता रहा होता है कि चलो इन गिद्धों से फुरसत मिली! 
         इधर घर के गेट तक आ गया था, देखा, चश्मा हाथ में लिए श्रीमती जी मेरी ही प्रतीक्षा कर रही थी। उनसे नौकरी के चक्कर में होश खोने का उलाहना मिला, लेकिन चुपचाप चश्मा लिया और चलता बना। 
इंटरनेट की बंदी में मंदी!  
            पेट्रोल पंप पर आ गए। कार की खिड़की का शीशा नीचे किया और एटीएम कार्ड हाथ में लेकर पंप वाले से एक हजार का पेट्रोल डालने के लिए कहा। लेकिन अपनी जगह से खड़े-खड़े ही वह मुझे शान्त भाव से देख रहा था, हाथ में नोजल लेकर कार की टंकी का ढक्कन खोलने नहीं गया। जब मैंने फिर तेल के लिए इशारा किया तो वह समझ गया कि मैं नासमझी में हूँ और अवगतार्थ मुझसे बोला कि इंटरनेट नहीं है। इधर मैं एक इन्नोसेंट नागरिक की भाँति समसामयिक सिच्युएशन से अनभिज्ञ इंटरनेट और तेल के बीच के संबंध को नहीं पढ़ पाया! मेरी अज्ञानता भाँपकर पंपवाले ने पुनः अपनी व्याख्यात्मक टिप्पणी मेरी ओर उछाला। इसके बाद मैंने समझा कि इंटरनेट नहीं है का मतलब एटीएम से पेमेंट नहीं हो पाना है और तेल नगद भराना होगा। तो यह बात है! मेरे हाथ में एटीएम कार्ड देखकर ही उसने इंटरनेट बंद होने की सूचना मुझे  दी थी! इसके साथ ही देश का मंज़र भी ध्यान में आ गया! कि संविधान-प्रेमी गैंग कोई असंवैधानिक काम न कर पाए इसलिए देशहित में यह इंटरनेट सेवा बंद है!! 
       खैर, देशभक्ति में सब ज़ायज मानकर जेब टटोलने पर इसकी कैश लिक्विडिटी क्षमता का ध्यान हुआ और एक हजार की बजाय पांच सौ का तेल भरने के लिए कह दिया। अबकि बार उसने पाइप का नोजल कार की टंकी में लगा दिया और मैं मशीन के स्क्रीन पर ईकाई, दहाई, सैकड़ा गिनने लगा। पाँच सैकड़ा होने पर पंपवाला कार का ढक्कन बंदकर मेरी ओर मुखातिब हुआ। उसकी ओर पाँच सौ का नोट बढ़ते हुए अपनी नासमझी पर बुद्धिमत्ता का मुलम्मा चढ़ाकर कहा, "अच्छा ! तो यह इंटरनेट संविधान-प्रेमियों के डर से देशप्रेमियों के हित में बंद है!!"  इसे उसने समझा या नहीं, लेकिन मेरी मुस्कुराहट में साथ जरूर दे दिया!
        वैसे इस पेट्रोल-पंप पर, मुझे पहली बार इंटरनेट बंद होना राष्ट्रीय महत्व का विषय लगा!! सही में, अगर इंटरनेट न हो तो आज सांस लेना भी दूभर हो!! चूँकि मैं संविधान-भक्त नहीं, देश-भक्त हूँ, इसलिए  इंटरनेट की यह बंदी इस मंदी में बड़ा फाय‌देमंद प्रतीत हुआ। आखिर मेरे पाँच सौ खर्च होने से जो बचे थे! एक तथ्य और इंटरनेट बंद होने से संविधान-भक्तों के हाथों सरकारी संम्पत्तियाँ जलने या टूटने-फूटने से रह जाती हैं, इससे भी देश की अर्थव्यवस्था को करोड़ों का फ़ायदा पहुँचता है! इसतरह एक देशभक्त की नज़र में लोकतंत्र की चरमावस्था में इंटरनेट बंद कर देना जहाँ एक ओर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में योगदान है, तो वहीं दूसरी ओर मंदी के विरुद्ध हथियार भी!
          वैसे तो इस देश में, देशभक्ति में बंद करने लायक बहुत सी चीजें हैं, लेकिन पता नहीं देशभक्त और इनके फ़रमाएदारों का इन बातों पर ध्यान जाता भी है या नहीं? लेकिन ध्यान जाता तो कोई पुल न ढहता! और..और…इसके आगे भी सोचना होगा कि देशभक्तों को और क्या-क्या ढहने से रोकना चाहिए। यहाँ मैं अपनी पोल नहीं खोल सकता! चाहे मुझमें कितनी ही देशभक्ती क्यों न भरी हो! मैं ठहरा एक सरकारी मुलाज़िम! मेरी अपनी देशभक्ति-व्यवहरण की सीमा है! हम जैसों के साथ यही प्रॉब्लम है। 
        इधर मेरे पीछे एक और कार वाला टीं-टीं कर रहा है..उसे भी तेल लेना है! अब मुझे शीघ्र खिसकना होगा ! उसकी टिंटियाहट से मंदी-मंदी चिल्लाने वालों को मैंने मन ही मन खूब लानत-मलामत की। कौन सी मंदी और कहाँ की मंदी बे!! सब राजनीति करते हैं... नहीं तो तेल भरवाने के लिए यह ... इतना उतावला न भया रहता! खैर लटकते इग्निशन प्वाइंट में छोटी चाभी लगाकर ऐंठते ही कार स्टार्ट हो गई और मैं वहाँ से चल पड़ा। 
लॉ लाइक्स टू रिसाइड इन द सिटी!
             पेट्रोल-पंप से सड़क मने राजपथ पर आ गया। राजधानी की सड़कों को राजपथ नहीं तो और क्या कहा जाएगा, आखिर यहाँ राज करने वाले जो रहते हैं! सामने कुछ दूर चौराहे पर भीड़नुमा लोग खड़े दिखाई दिए! सुबह-सुबह दिहाड़ी की तलॎश में यहाँ श्रमिकों का जमावड़ा होता है। लेकिन इस वक्त इनकी संख्या कम हो चुकी थी, शायद कुछ काम पा कर चले गए होंगे और कुछ अभी काम पाने के इंतजार में हैं। आचानक, वहाँ खड़े एक शख्स की आकृति मेरे दिमाग को जानी-पहचानी लगी! उसे तीन-चार लोग घेरे थे। अरे, यह तो घिसइया है!! मैंने पहचाना। वही घिसइया, जिसे जब देखो तब कोई न कोई समस्या घेरे ही रहती है।
             दरअसल ये घिसई महराज मुद्दों के बीच झूलते एक आदमकद इंसान हैं। गाहे-बगाहे इनकी जागरूकता जब थोड़ी बढ़ जाती है तो इन्हीं मुद्दों से फायदा भी उठाने की कोशिश कर लेते हैं। वैसे ये अपने आप में एक मुद्दा हैं। मुझे देखते ही यह आदमक़द मुद्दा दौड़कर मेरा रास्ता न छेंक ले, उससे कन्नी काटने के अंदाज में मैंने कार को दाहिने लेन पर लेने की कोशिश की! सोचा, बच्चू मुझे देखोगे तब न दौड़ोगे मेरे पास! लेकिन दुर्भाग्यवश इसी समय ट्रैफिक का एक सिपाही दिखाई पड़ गया, जैसे वह मेरी ही ओर देख रहा हो! वाकई, जब आप इंडियन पैनल कोड जैसे किसी कानूनी पचड़े में फँसे भये रहते हैं तो अदना सा होमगार्ड का सिपाही भी डी.आई.जी. से कम नहीं लगता! उसी तरह ये महाशय मुझे ट्रैफिक कमिश्नर टइप लगे! खैर दिमाग जी ने मेरे जेब की लिक्विडिटी रेसियो पर गौर फरमाते हुए मुझे तत्काल कानून-पालन की सलाह इस चेतावनी के साथ दिए कि अन्यथा इस कानून का हाथ मेरी जेब तक पहुँच जाएगा! वह ट्रैफिक का सिपाही मेरी ओर लपके, इसके पहले ही मैंने सीट-बेल्ट बाँध लिया। इस उपक्रम में कार के एक्सीलरेशन में कमी आ गई!
          वैसे तो हाईवे पर हवा से बात करते हुए भी सीट-बेल्ट बाँधने का ख़याल नहीं आता। लेकिन वहीं शहर में, और वह भी राजधानी में, जहाँ चिहुँटिया चाल से रेंगना होता है, इसे बाँधना जरूरी हो जाता है! दरअसल यहाँ चौराहे-चौराहे पर कानून स्टैंडअप मुद्रा में खड़ा दिखाई दे जाता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि राजधानी टाइप के शहरों में ही कानून भी निवास करना पसंद करता है, और यहाँ की सारी गैरकानूनी बातें मारे डर के अन्डरवर्ल्ड में छिप जाती हैं। इसीलिए इन जैसे शहरों में कानून गर्वानुभूति में इठलाते हुए सलीके से पेश आती है और इसके यहाँ रहने का चार्म ही कुछ अलग है। जहाँ कानून का सामाजिक दायरा भी बढ़ जाता है। शायद यही देख सुनकर किसी ने मुझे सुनाया था कि लाॅ लाइक्स टू रिसाइड इन द सिटी।
 हमहूं त देशहित में इहाँ फंसा पड़ा अही !      
              सीट-बेल्ट बाँधकर एक्सीलेटर दबाने के लिए जैसे ही उसपर पैर रखा, चिहुँक उठा,  "ये ल्यौ ! घिसइया तो कार का बोनट पीट रहा है!" और "अरे गुरू! एत्ता दिन बाद अइन मउके पर मिल्यो, जइसे कहूँ हेराई गै रह्यो!" उवाचते हुए मिलने की खुशी भी जाहिर करता सुनाई दिया| मेरी यह बात कि "ड्यूटी पर जा रहा हूं, जरा जल्दी में हूँ।"  को भी सुनने के लिए वह तैयार नहीं हुआ।
         "तअ्..कआ..गुरू ! हमहीं फालतू अही कsआ, हमहूँ तअ्.. देशहित में इहाँ फँसा पड़ा अही..एकरे बदे तनी सलाह लेना चाहिथै आपसे।"
             घिसई ने अस्फुट गलगलाहट जैसी आवाज में बोला। 
         वाकई! मैंने देखा, इस वाक्य के साथ मुँह में गुटखा भरे उसके मुखमंडल पर देशहित के लिए प्रतिबद्धता साफ झलक रही थी, जिससे मैं अभिभूत हो गया। इधर मुझे उसकी इस भावभंगिमा में स्वातंन्त्र्योत्तर काल के लोकतंत्र का ज्योतिकलश छलकने को आतुर होता परिलक्षित हुआ! अब रुकने के सिवा मेरे लिए और कोई चारा भी नहीं था। अन्यथा वह मुझे देशद्रोही साबित करने में कोई कोर-कसर बाकी न लगाता। गए मेरे दस-पाँच मिनट। समय की ऐसे चिंता की, जैसे मेरे जेब से कुछ जा रहा हो!
           "अरे गुरू कछु सोचऊ मति..कोनऊ कठिन सलाह न मगिबै..जरा पहिले आपन मरुतिया किनारे लगावा तअ।." 
                  मुँह ऊपर करके वह गलगलाया।
                 कार को मैंने थोड़ा और किनारे कर लिया। मुँह में भरे हुए गुटखे के गलार की पिचकारी वहीं सड़क पर उसने दे मारी और कार की खिड़की से अपना सिर लगभग अंदर  लाते हुए बोला-
                   हम जानिथै गुरू, तू देशहित के बारे मां कुछ ज़ियादा सोचsथौ। तनी हमहूँ के बतावा, केहमें देशहित ज़ियादा है! एहमें वा ओहमें।"
               उससे अपनी देशभक्ति का प्रमाण पाकर मेरा मन थोड़ा गदगद् टाइप का हुआ,
                     "वाकई! यह तो है ही कि मैं ठहरा देशभक्त टाइप का आदमी। ...और जब घिसइया जैसा मुद्दई, अनपढ़..गँवार..मूरख..गरीब...मजदूर देशहित की चिंता में पड़ा है तो मेरी क्या बिसात कि देशहित के लिए कोई सलाह मांगे और मैं न दूं !"
                   बस फिर क्या था, इस विचार के साथ जैसे मेरा जमीर जाग उठा! और सोचा-
                "यदि संस्थान के लिए विलंब होता है तो होता रहे, पहले इसका और अपना देशहित निपटाना जरूरी है..आखिर, किसी को देशहित की बात समझाना भी तो एक तरीके की देशभक्ति ही है, हाथ आए इस अवसर को फिसल जाने देना उचित नहीं होगा|." 
                 और मैं, उसे सहर्ष देशभक्ति का ज्ञान देने के लिए तैयार हो गया,
            "पूँछो..पूँछो..यह एहमें, अोहमें क्या पूँछ रहे थे..!" घिसइया के मुँह से गुटखे की सुगन्ध निकल मेरे नथुनों तक पहुँची|
             "गुरू..एतना पूँछई के रहा कि हमरे सामने समस्या ईs अहै कि दुइ पालटी..उ.ऊ..का है कि…" सिर खुजलाते हुए आगे बोला, "हाँ..एक पालटी..हमें संविधान बचाओ वाली रैली माँ..तो दूसर पालटी देशभगती वाली रैली माँ लीन्हें जाई चाहथै...गुरू तू अपनी की नाईं हमहू कs देशभगतई समझउ..कौउने रैली में जाई से ज़ियादा देशभगती होई, बस इहै हमइ बताइ द्यौ..!
        कुछ पल सोचने के बाद मन ही मन उसकी बात को महत्वहीन समझ टालू अंदाज में कहा-
         "अरे..घिसई..तू कौउनऊ में चल्ये जाऊ यार..! इहऊ देशभक्ती अउर उहऊ देशभक्तई...चाही संविधान बचावा..चाही देश, ई एक्कइ बात अहै..समझेउ!" 
          लेकिन गुरू...हमई बेवकूफ मत बनावा..सीधे-सीधे ई बतावा कि...टुकड़ा गैंग..एकता के लिए खतरा...देशद्रोही...में से कऊन गैंग मतलब पाल्टी देशहित के हिसाब से बढ़िया रहे...हाँ ऊ बतावा, जौउने से हम वोहमें शामिल होइ जाई, इब ज़ियादा बुझावा मत।
          घिसइया पर देशभक्ति का पारा कुछ ज़्यादा ही चढ़ा था। अब मेरे दिमाग जी भी उसकी बातों में उलझना नहीं चाह रहे थे| मैंने उसे सीधे लताड़ा-
           "तुम्हें आज कुछ काम-धाम नहीं मिला क्या? जो देशहित में पड़े हो, इसके चक्कर में तुम आज अपना पूरा दिन खराब करोगे क्या !
          लेकिन मेरे इस लताड़ से वह जैसे और खिलकर चहक उठा और सीधी बात पर उतर आया-
             "अरे गुरू..हम सेंत-मेंत में रैली में थोड़ी न जा रहे, दिन भर की दिहाड़ी के साथ खान-खच्च ऊपर से मिलना है!"
              मैंने भी उससे पल्ला झाड़ा-
            "तो, तुम्हें जिस पार्टी से ज़्यादा दिहाड़ी मिल रही हो उसी की रैली में जाओ। हाँ, और अगर समझ में न आए तो मोल-भाव कर लो।"
           "का.आ..गुरू, आप जैसे देशभगत से ई उम्मीद नाहीं रही कि देशहित के बदे हमहिंन को सउदेबाजी-मोलभाउ करइ सिखउबा! ई त फिरि हमसे ना होई।"
         घिसइया ने मुझपर ही तंज कसा, मेरे ही हथियार को मेरे सिर पर दे मारने के माफिक! अब ऐसे चतुर आदमी को मेरा मन आम आदमी के दर्जे पदच्युत करने के लिए उद्धत हो उठा! लेकिन अगले ही पल मैंने सोचा-
         "आम आदमी ऐसेइ होता है, वह परिस्थितियों के साथ अपने आदर्शों, मान्यताओं का अनुकूलन करना जानता है। जहाँ एक तरफ उसे देशभक्ति की रैली में जाने के लिए दिहाड़ी भी चाहिए, तो वहीं दूसरी ओर आदर्श के फेर में हाथ आए मोलभाव का अवसर खोने से भी उसे ग़ुरेज़ नहीं। बेचारा यह आम आदमी ! दरअसल इस आम आदमी को सिंहासन नहीं चाहिए, इसे जीने के लिए बस छोटी-मोटी जरूरतों के पूरी होने की दरकार होती है, और अगर कुछ ज्यादा हुआ तो, ठसके के लिए बस थोड़ा सा जमीर चाहिए, जिसे ये अपने रोजमर्रा के झंझटों के बीच बचाए रखने की कोशिश करते रहते हैं।" 
         और अपने इसी विचार के साथ मैंने उसे आम आदमी के सिंहासन से पदच्युत करना उचित नहीं समझा। केवल करूणान्वित भाव से मुस्कुरा दिया। यह घिसइया तो मुझसे भी बड़ा देशभक्त निकला ! फिर भी उसके तंज से जैसे मेरे अहं को चोट लगी हो! निरूत्तर सा मैं सिर खुजलाने लगा, लेकिन अगले ही पल अचानक चहककर मैं बोल पड़ा-
           "घिसई तू न, निरे बेवकूफ के बेवकूफ ही रहे, अगर ऐसे ही बेवकूफी करते फिरोगे तो कर चुके देशहित का काम! देशहित में काम करने के लिए बुद्धी की आवश्यकता पड़ती है, समझे ! दोनों पार्टियां अपनी-अपनी रैली में ले जाने के लिए तुम्हारे पीछे पड़ी हुई हैं, क्यों है न?
       "हाँ..हाँ गुरू! ईहइ तो हम कहित रहे!" उसकी इस स्वीकारोक्ति पर मैं आगे बढ़ा-
            "तो फिर, रैली के लिए तुम्हारी जबर्दस्त मांग है, क्यों नहीं सौदेबाजी करोगे, अँय.! अगर तुम इनसे सौदेबाजी कर लोगे तो तुम्हें फ़ायदा ही होगा। कुछ अधिक पैसे मिल जाएंगे और इससे तुम्हारी गरीबी दूर होने में मदद मिलेगी! है कि नहीं!! तो क्या गरीबी दूर करना देशहित का काम नहीं है !! अरे मेरे बच्चे, यह भी देशहित का ही काम है। तो सुनो, इस तरह चाहे अपनी हो या फिर दूसरे की, गरीबी दूर करना भी परम् देशभक्ति का ही काम है। समझे..!!"
           मेरा बस इतना ही बोलना था कि घिसइया देशहित में उछल पड़ा-
             व..व्वाह..गुरू..! आपके मन में देशहित के सिवा अऊर कुछ नाहीं चलथै..फुराखरि में ! जो आपसे सलाह न मांगे समझऊ ऊ देशद्रोही!! 
              उसने जैसे मेरी बलैया ली हो!! इसके बाद भाग कर वह फिर से उस लेबर वाले अपने स्थान जा खड़ा हुआ। मैंने देखा, रैली के आयोजकों ने उसे घेर लिया था, और उसके असपास जैसे गदर कटी हो! सोचा, जरूर वह सौदेबाजी में व्यस्त हो चुका है ! 

घूसकांड और मैकेनिक लड़का!
          खैर, घिसई से पिंड छूटने पर यह सोचकर कि "ओह! दस मिनट खा गया होगा यह तो.." राहत की सांस ली। लेकिन तभी ठक-ठक की आवाज सुनाई पड़ी! वही चौराहे वाले ट्रैफिक पुलिस महोदय मेरे कार के विंडो वाले शीशे को ठकठका रहे थे! दिल धड़का, शीशा नीचे कर उन्हें जिज्ञासु भाव से देखा। मुझपर 'नो पार्किंग जोन' में कार खड़ी करने का आरोप लगाया। इसके  प्रतिउत्तर में जब मेरे सारे तर्क फेल हुए तब मैं समझा कि वर्दी के अंदर के इस आदमी का हृदय देशभक्ति की भावना से लबरेज़ है। मुझे लगा अब ये महाशय देशहित करके ही मानेंगे! मौके की नजाक़त के हिसाब से उनसे कहना-सुनना व्यर्थ था। फिर भी ये मुझे देशद्रोही सिद्ध करें, इसके पहले ही मैंने देशहित पर सौदेबाजी करना शुरू कर दिया। यह कि, कुछ तुम देशहित करो और कुछ मैं करता हूँ। मतलब आओ दोनों मिलकर देशहित कर लें! सौदा पट जाने पर एक सौ तीस करोड़ देशवासियों के देशहित को दरकिनार कर हम दोनों ने अपने-अपने हिस्से का देशहित कर डाला। इस प्रकार जुर्माने का मात्र दसवाँ हिस्सा सिपाही जी को देकर मैंने अपने हिस्से में ज्यादा देशहित बचाया था। गज्जब! इस देश में देशहित के लिए देशहित को ही घूस के रूप में देना पड़ता है।
       इस घूसकांड के कुछ ही मिनटों बाद मैं 'वाहे गुरू गैराज' पर पहुँचा। जिसके सामने तीन-चार लड़के गप्पें लड़ा रहे थे और उसका गेट खुला था! वाकई, इस दृश्य से संतोष हुआ कि गैराज खुल गया है और लड़के भी आ गए हैं। लेकिन वो कल वाले सरदार जी नहीं दिखाई दिए, मालिक हैं आ रहे होंगे सोचते हुए मैंने लड़कों की ओर देखा। उनमें से जब एक लड़का आगे बढ़कर मुझसे मुखातिब हुआ तो मैं समझ गया कि अब स्टेयरिंग-विस्टेयरिंग का काम हो जाएगा। खैर, मैं कार से बाहर निकल आया। उसे मैंने पूरी बात बताई, और कहा कि स्टेयरिंग-लाॅक पेंच सहित सुरक्षित है, बस इसे फिट भर करना है। डुप्लीकेट चाभी के बारे में भी मैंने बताया कि मेरे पास है, अन्यथा मैं नया सिस्टम लगवाता। कुछ सेकेंड स्टेयरिंग का मुआयना करने के बाद उसने बताया कि इस तरह चलाने से स्टेयरिंग लॉक होने का खतरा रहता है, हलॉकि मैं समझा नहीं कि जब स्टेयरिंग से लॉक ही निकाल लिया गया हो, तो लॉक कैसे हो जाएगी यह! लेकिन समय ज़ाया होने के डर से उस मैकेनिक लड़के से बहस न कर लॉक फिट करने के लिए कहा।
           कुछ क्षण विचारने के बाद लड़के ने कार गैराज पर छोड़ने और दो घंटे बाद आने के लिए कहा। शायद, इस 'कुछ क्षण' में उसने यही सोचा हो-
       "इसमें कोई खास काम तो है नहीं, मुश्किल से पंद्रह-बीस मिनट लगेगा फिट करने में...हो सकता है पाँच-छह सौ रूपया मांगने पर देने में ये आनाकानी करें, कह सकते हैं कि इतने छोटे से काम के लिए इतना लोगे..! ..तो मैं क्या करूँ..इनके सामने लाॅक फिट करना ठीक नहीं होगा...हाँ इन्हें जल्दी भी है..तो इनसे यही कह देते हैं कि काम होने में दो घंटा लगेगा हो सकता है तब ये चले जाएं..इन्हें क्या पता कि इसमें कितना काम था..फिर तो इस काम को बड़ा और पेंचीदा बताकर मनचाहा पैसा ऐंठा जा सकता है…"
        इधर मेरे मन में भी चला  "तो यह लड़का चालाकी से मुझे यहाँ से टरकाना चाहता है..अंकित मोटर वाले ने तो बताया था कि कोई भी मैकेनिक पाँच सौ रुपये में इसे फिट कर देगा, इससे ज्यादा क्या लेगा यह।" अंततः मैं बोल पड़ा, "तुम इस स्टेयरिंग-लाॅक को फिट करने का कितना लोगे..?"

साथी हाथ बढ़ाना..      
            लड़के से "पाँच सौ रूपए" सुनकर, जब "मैं इंतजार करता हूँ, तुम काम तुरंत शुरू करो" कहा तो वह‌ भी अपना औजार लेने चला गया। इधर मन ही मन मैंने भी ठान लिया कि देर हो तो होने दो, देर होने से कोई पहाड़‌ नहीं टूट पड़ेगा..संस्थान-फंस्थान में पहुँचते रहेंगे देर-अबेर। इस विचार पर दृढ़ होते ही मेरे स्नायु तंन्त्र शिथिल हो गए और विलंब की बात पर मेरा तनाव जाता रहा ! मेरी ऐसी धारणा बनते ही मेरे दिमाग जी भी मेरे साथ संतुलित वर्ताव करने लगे ! दरअसल आदमी जब अपनी दुविधाओं से पार पा जाता है तो उसे दुश्चिंताओं से भी मुक्ति मिल जाती है और उसका मन-मस्तिष्क संतुलित और सहज हो जाता है। 
           इधर लड़का भी‌ अपने औजारों को लेकर मैकेनिकगीरी करने आ पहुँचा और पेंच-वेंच लेकर स्टेयरिंग-लाॅक‌ की फिटिंग‌ में जुट गया। खड़े-खड़े मैं उसका काम देखने लगा। पूँछने पर जब उसने अपना नाम मोहम्मद असलम बताया, तो मेरा ध्यान संविधान बचाओ मुहिम पर चला गया। आखिर असलम क्यों नही गया संविधान बचाने, जबकि यहाँ लखनऊ में तो संविधान बचाने के लिए हड़कंप मचा है! लेकिन हो सकता है, अभी इसे संविधान बचाने की जल्दी न हो! शायद काम करने के बाद इत्मीनान से संविधान बचाने की सोच रहा हो! हाँ इसकी दृष्टि में हो सकता है पहले काम हो, फिर संविधान। अकस्मात मैंने असलम के चेहरे को देखा! वहाँ मुझे शिकन के दर्शन हुए! तो क्या असलम को भी सीएए-फीएए का टेंशन है!! कहीं ऐसा न हो, यह भी संविधान बचाने को दौड़ पड़े!! उसे देखते हुए मैंने कुछ ऐसा ही सोचा।
      लेकिन अगले ही पल मैं अपने ऊपर शर्मिंदा था, दरअसल किसी पेंच के कसने को लेकर वह परेशान हो रहा था! काफी देर से पेंचकस को आड़े-तिरछे करते हुए उस पेंच पर पिला पड़ा था!! और पेंच था कि कसावट ही नहीं ले रहा था। बल्कि इसी बीच उसने पेंचकस भी बदला था, उसे फिर भी सफलता नहीं मिल रही थी! अचानक दिमाग जी ने मुझे समझाया, क्या बेफालतू में राजनीतिक विचारों के दाँव-पेंच में उलझे हो! ख़ामखा इसमें अपना समय बर्बाद कर रहे हो, अरे इतनी देर तक बेचारे की पेंच कसने में मदद किए होते तो अब तक उसका काम पूरा हो गया होता..कामगार को इन पचड़ों से क्या लेना-देना! यह तो बैठे-ठाले फालतू लोगों का शगल है! दिमाग जी की इस सलाहियत के तत्काल बाद मुझे "साथी हाथ बढ़ाना.." फिल्मी गाने की याद आई, और बिना देर किए उसकी मदद करने पहुँच गया!   
           मुझे पेंच पर गुस्सा आया कि अनायास यह दस मिनट से इस बेचारे को फंसाए है! उससे पेचकस लेकर मैंने प्रयास किया, लेकिन मुझे भी सफलता मिलते न देख, थक-हारकर उसने मुझसे कह ही दिया कि, इस पेंच से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा, न हो तो ले जाइए कार। लेकिन बिना पेंच कसे स्टेयरिंग-कवर ढीला दिखाई दे रहा था, जो मुझे नागवर लगा। मैंने उससे थोड़ा और प्रयास कर लेने के लिए कहा। प्रतिउत्तर में 'अच्छा आते हैं' कहकर वह गैराज में चला गया। उसके जाते ही पूर्ण मनोयोग से मैं पेंच के होलसेंटर को समझने का प्रयास करते हुए पेचकस से पेंच को घुमाने लगा, लेकिन यह क्या? पेंच पर बल पड़ने लगा था! मतलब यह कसाव ले रहा था। इसी बीच लड़का भी आ गया। हम दोनों ने मिलकर अंततः पेंच की पेंचीदगी दूर कर दिए। इस सफलता पर दोनो के चेहरे जैसे प्रसन्नता से खिल उठे थे! 
       खैर, काम पूर्ण हो चुका था, उसे पाँच सौ रूपए देकर मैं गंतव्य के लिए निकला। स्टेयरिंग को देखकर संतोष हो रहा था, जैसे इसमें कुछ हुआ ही न हो। लेकिन मन में एक कसक रह गई थी कि कार की एक चाभी गुम हो चुकी है! अभी कुछ दूर ही आए थे कि मुझे फिर लौटना पड़ा। उसके पेचकस का एक महत्वपूर्ण भाग कार में ही छूट गया था, उसी को लौटाना था। इसके लिए गैराज के लड़के जैसे मेरा ही इंतजार कर रहे थे! मुझे देखकर वह मैकेनिक लड़का कुछ ज्यादा ही खुश हुआ, क्योंकि उसे लापरवाह कहा गया था। कार में छूटा हुआ पेचकस का हिस्सा उसे सौंपकर मैं सीधे संस्थान के लिए पुनः चल पड़ा।

ड्राइविंग, बिकास-उकास और फोन!
         कुल मिलाकर ‌कार ठीक होने में एक घंटा लग गया था। यहाँ से संस्थान तक पहुँचने में दो-तीन जगह जाम मिलने की संभावना थी आलमबाग और दुबग्गा में! आगे सीतापुर बाईपास पर तो दनदनाते हुए निकल लेंगे, इसके बाद सीतापुर रोड पर बख्शी के तालाब के आसपास थोड़ा-बहुत जाम मिल सकता है, उसका देखा जाएगा! लेकिन अगर इन चौराहों पर जाम नहीं मिला तो चालिस-पैंतालिस मिनट में तो पहुँच ही जाएंगे, नहीं तो एक घंटा लग सकता है। इस समय इग्यारह बज रहे हैं, मतलब बारह बजे तक तो अवश्य ही पहुँच लेंगे। देर हुई भी तो कोई बात नहीं, कम से कम स्टेयरिंग तो ठीक हो ही गया ! लेकिन रह-रहकर खोई चाभी की याद आ रही थी। स्वयं के ऊपर एक हलकी सी झुंझलाहट हुई कि यह सब मेरी ही बेवकूफियों का नतीजा था। खैर, दिमाग जी से झिड़की खाया हुआ मैं, जो काम जिस समय कर रहा हूँ, उसी पर ध्यान देना शुरू किया। सामने आलमबाग चौराहा दिखाई दिया। जाम में फंसे बिना इसे पार कर लें तो समझिए एक ग्रह कटा! लेकिन कारों- बसों का वहाँ ज्यादा जमघट नहीं मिला और दायें-बायें करते हुए कार निकाल लिया। एक चौराहा तो पार हुआ, सोचकर राहत मिली।
         अपने दिमाग जी को फॉलो कर रहा था, इसलिए सड़क पर निगाह जमाए था। सामने जा रही एक कार को ओवरटेक करना चाहा, लेकिन वह कार न बांए थी और न ही दांए, सड़क के बीच में भी नहीं चल रही थी। इसलिए उसे ओवरटेक करना मुश्किल हो रहा था और उसकी गति भी ऐसी नहीं कि उसके पीछे-पीछे ही चला जाय। उसके ड्राइवर के ड्राइविंग सेंस पर मुझे संदेह हुआ, खैर कुछ देर तक उसके पीछे-पीछे रहा। एक जगह मौका देखकर अपनी कार को उससे आगे ले आया। यह बुद्धेश्वर का फ्लाईओर था जिस पर से मैं गुजर रहा था। वाकई! आज से पंद्रह-बीस साल पहले मैं इस रास्ते से खूब गया-आया हूँ। तब यहाँ फलाई-वलाई ओवर जैसा कुछ भी नहीं हुआ करता था, केवल काकोरी से आलमनगर की ओर जाने वाली रेल लाईन के ऊपर सड़क का पुल भर था!! और इसके अगल-बगल खेत होते, जिनमें से कुछ में फूलों की खेती होती दिखाई पड़ जाती। फिर धीरे-धीरे बिकास हुआ और वे खेत ढक गए तथा आलमबाग से दुबग्गा के बीच ऐसे कई पुल भी बने। हूँह, यह बिकास! न जाने क्यों इसी बिकास की सुविधा उठाते हुए भी इससे चिढ़ सी हुई!! यह बिकास मात्र आर्थिक गतिविधि बनकर रह गई है! यह बिकास-उकास मुझे आदमी का मुँह चिढ़ाती प्रतीत हुई..!!
          अब तक बुद्धेश्वर से थोड़ा आगे काकोरी और आलमनगर के बीच रेल लाईन के ऊपर बने पुल पर मैं पहुँच गया था। यहाँ से दुबग्गा मुश्किल से चार किलोमीटर दूर होगा। मैं इस पुल के ढलान पर था। इसी समय बगल की सीट पर रखे मोबाईल फोन की घंटी अचानक बजने लगी! फोन उठाने का मन नहीं हुआ। वैसे भी ड्राइविंग के समय फोन-वोन पर नहीं बतियाना चाहिए। लेकिन इस समय फोन आने का भी कोई औचित्य नहीं था, अतः इसके महत्त्वपूर्ण काल होने का संदेह हुआ। सामने सड़क पर दृष्टि फेंकी, इसे निरापद देख फोन उठा लिया।
फ़ितूर
        फोन 'घर' से था। लेकिन इस समय! इस समय श्रीमती जी को फोन करने की कौन सी जरूरत आन पड़ी? वैसे आफिस के बाद शाम को ही बात होती है, बाकी उन्हें पता रहता है कि दिनभर मेरी व्यस्तता रहती है। जरूर कोई विशेष बात होगी तभी फोन किया है! मैंने फोन रिसीव कर लिया। 
        "हलो, हाँ क्या बात है।" मैंने पूँछा।
        "वो चाभी न.." दूसरी ओर से पत्नी की आवाज।
         "कौन सी चाभी..!" मेरी अचकचाहट भरी आवाज।
     "वही कार की और कौन...तुम्हें कुछ चेत-वेत तो रहता नहीं..ऐसे हड़बड़ा जाते हो की…" पत्नी की उलाहना देने जैसी आवाज।
         "अरे भाई चाभी मेरे पास है, मैं लिए हूँ..और लॉक भी ठीक करा लिया है…" मैंने डुप्लीकेट चाभी के बारे में कहा।
       " ..दूसरी चाभी की बात मैं नहीं कर रही..उसकी बात कर रही हूँ जो खो गई थी...मिल गई है वह…!" पत्नी की रूखी आवाज। 
        "मिल गई..!! कहाँ थी..?"  मुझे आश्चर्य हुआ। कार की चाभी उड़कर घर पहुँच गई है क्या..? कैसे मिल जाएगी! उसे तो अब मिलना ही नहीं चाहिए !     
        "और कहाँ थी…तुम्हारे उसी पैंट की जेब में थी..अभी वाशिंग मशीन में डालने से पहले तलाशी में मिली..एक छोटी सी जेब में थी!" रूखेपन के साथ पत्नी की यह सपाट आवाज थी।
       "वही तो मैं सोच रहा था कि कैसे गायब हो जाएगी…" अपनी गलती पर पर्दा डालने की कोशिश में मैं बोला था, जैसे मैं कहना चाह रहा होऊँ कि मैं ऐसा लापरवाह नहीं कि जरूरी चीज का ख़याल न रख सकूँ।
      "वही तो क्या..तुम्हारा दिमाग ठिकाने तो रहता नहीं...अच्छा चलो रखो फोन…" लगभग डाटने के अंदाज बोलकर पत्नी ने फोन काट दिया।
        अपना सा मुँह लिए मुझे अपने ही ऊपर बेहद झुंझलाहट हुई...मन हुआ यहीं सड़क किनारे कार रोककर पहले जी भरकर अपना सिर पीट लें, फिर चलें। पता नहीं कौन सी जेब रह गई थी, जिसमें नहीं खोजा! कुछ कुछ याद हुआ, उस पैंट की जेब के ठीक बगल में एक और छोटी सी जेब थी..शायद उसी में चाभी रही होगी! दरअसल जींसनुमा पैंट की उस तंग जेब में चाभी होने का मुझे अहसास ही नहीं हुआ! और न उस जेब पर ध्यान गया। हलांकि मेरा अवचेतन मस्तिष्क कई बार "सँकरे स्थान" का संकेत दिया भी..लेकिन पूर्वाग्रह के वशीभूत कि लड़के ने शरारतन चाभी गायब की है, मैंने उन संकेतों को समझने की कोशिश नही किया। वैसे अब चाभी का मिलना मुझे नहीं सुहाया, क्योंकि इससे मेरे दिमाग की कमजोरी भी उजागर हो गई। हाँ स्वयं पर थोड़ी लज्जा भी आई, कि नाहक ही एक निर्दोष लड़के पर मैंने संदेह किया।
           इधर मेरे दिमाग जी, जैसे मेरे सामने खड़े होकर साक्षात मुस्कुरा रहे थे ! मेरी हालत उनसे आँख चुराने वाले की जैसी हो चुकी थी। जैसे कह रहे हों कि...बेट्टा ऐसेई होता है! दिमाग हूँ तो क्या हुआ..! फालतू की फ़ितूर पालने से उलझ तो जाता ही हूँ...और देख लिए न, फिर क्या से क्या हो सकता है! चलो तुम थोड़ा ही परेशान हुए और साढ़े सात सौ रूपए खरच कर अब शांति फील करो..! लेकिन आइंदा ध्यान रहे, इस फ़ितूर में लोग, न जाने क्या-क्या खो देते हैं और कर बैठते हैं..चलो अब कुछ मत सोचो कार सावधानी से ड्राइव करो..
            सामने दुबग्गा तिराहे पर ट्रैफिक की भीड़ दिखाई पड़ रही थी।

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

निर्णय लेने की क्षमता!

आज उठा तो सुबह के छह बजकर आठ मिनट हो चुका था। बिस्तर छोड़ा तब जाकर मन हुआ कि टहलने निकला जाए। दरवाजा खोला, आसमान साफ था। बाहर निर्मल चाँदनी छिटकी हुई थी। दिसंबर का महीना है, इस मौसम में आसमान इतना साफ! थोड़ा आश्चर्यजनक लगा! लेकिन मौसम है, पल-पल बदलता भी है। वैसे बुंदेलखंड क्षेत्र में कुहरे का प्रकोप उत्तर की अपेक्षा कम ही रहता है, यही हाल बादलों का भी है।
       
चलते-चलते ख़्याल आया आज पच्चीस दिसंबर है, प्रभु ईशु का जन्मदिन! इस उपलक्ष में आज छुट्टी भी है। फील्ड स्तर पर तैनात सरकारी अधिकारी के लिए छुट्टी !! ना बाबा ना, छुट्टी मनाने के लिए छुट्टी लेनी पड़े तो भी हमारे वश में नहीं, सरकार के बंधक हैं हम! खैर सेत-मेत में बंधक भी नहीं, इसकी पूरी कीमत वसूलते हैं। 
       
एक बात है, इस जहां में किसी व्यक्ति की कोई उपलब्धि नहीं, सिवाय उसके निर्णय लेने की क्षमता के! उसके निर्णय ही वास्तव में उसकी उपलब्धियां हैं। इन्हीं निर्णयों के आधार पर मनुष्य अपने लिए परिस्थितियां गढ़ता है। और वही परिस्थितियां उसकी प्रकृति तथा समाज में उसके स्थान को निर्धारित करती हैं। 
 
दरअसल महत्वाकांक्षी व्यक्ति केवल अवसरों की प्रतीक्षा नहीं करता वह अपने लिए परिस्थितियां भी निर्मित करता है जिनमें उसको निर्णय लेने का अवसर और अधिकार मिल सके! एक तरह से वह अपने अस्तित्व की पुष्टि करता है। इसलिए यदि उन्हें यह अवसर न मिले तो उनके अंदर कुंठा और अवसाद जन्म लेने लगता है।

लौटते हुए बैलगाड़ी में जुते बैलों को देखा। गाड़ीवान इन्हें हाँके चला जा रहा था। 
        
चाय पीते हुए बीती सुबहचर्या में हुए दार्शनिक-चिंतन याद आया। 
        
सच तो यह है कि "भक्ति-भाव" जैसी भावना से हमारे निर्णय लेने की क्षमता में ह्रास होता है! खैर।

 ..... हो सकता है इस्लाम में "समानता" का तत्व इसके अनुयायियों के बीच सहजता का कारण रहा हो, जो जाति-भेद और ऊँच-नीच में बटे शेष भारतीय समाज के लिए आकर्षक जान पड़ा हो। 
       
लेकिन हिंदू हों या मुस्लिम या फिर कोई अन्य मतावलंबी, "भक्ति" उनकी अतार्किक मान्यताओं को भी सहेजती आ रही है। धार्मिकों ने अपने धर्म की 'निगरानी' न कर स्वयं को 'धर्म' के हवाले कर दिया, अर्थात 'धर्म' ने व्यक्ति को नियंत्रित किया। कुछ लोग इसे 'धर्म' की उपलब्धि के रूप में देखते हैं, लेकिन इस उपलब्धि के चक्कर में व्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित हुई। इस प्रवृत्ति के कारण जहाँ इस्लाम में उसकी "समानता" की देन खंडित हुई, तो वहीं हिंदू विचारधारा जाति-भेद और ऊँच-नीच के दंश से पीड़ित हुई। 
            
 यहाँ "भक्ति" का आशय केवल 'उपासना पद्धतियों' से ही नहीं, बल्कि धर्म में निहित "नैतिक-चेतना" से इतर उन सभी विचारों, कार्य-व्यवहारों से है, जो धर्म के नाम पर व्यवहृत होते हैं और जिनका समाज के लिए कोई मूल्य नहीं होता।...

#चलते_चलते 
        
       निर्णय लेने की क्षमता न होनेे से, इसका खामियाजा बैलगाड़ी के बैल की तरह भुगतना पड़ता है। 

#सुबहचर्या 
(25.12.18)

छोटी-छोटी बातें

आज अलसुबह जैसे ही नींद टूटी मन में पहला विचार यही आया कि "चलो सुबह हो गई"। मतलब, रात बीतने पर संतोष हुआ। लेकिन जब तक जीवन है, यह साँझ और सुबह होती रहेगी! फिर तो अंधेरों आए या उजाला इससे क्या चिंतित होना!! 

दरअसल सोने के पहले बीती रात दिमाग में चिंता की आड़ी-तिरछी रेखाएं उभर आयी थी, इन्हीं रेखाओं के मिटने का अहसास सुबह उठते ही हुआ, मने 'रात बीती, बात बीती' टाइप से मन को फीलगुड हुआ कि चलो सुबह हो गई! सच तो यह है, यह जीवन अपने ही हिसाब से चलता है, यदि इसके साथ दाँव-पेंच खेलें तो इसमें उलझना तय है।

हाँ, आज छह तेईस बजे हम टहलने निकले। बाहर बेहद गलन थी, हाथ जैसे सुन्न हुआ जा रहा था। दूर सड़क के किनारे आग की ऊँची उठती लौ दिखाई पड़ी, मन हुआ चलकर वहां हाथ सेंक लें। लेकिन पास पहुंचने पर आग की वह लपट अब शांत हो चुकी थी। दो लोग गत्ते जलाकर, उसे ताप रहे थे, भला गत्ते की लौ कितनी देर ठहरती? मुझे गत्ता जलने की गंध पसंद नहीं आया। आगे बढ़ लिया। खैर, चलते हुए हथेलियों को आपस में रगड़ कर गर्मी पैदा करने लगा।

लौटते समय जिला अस्पताल की ओर निगाह गई तो उसकी तस्वीर ले लिया।

घर पहुँचा। चाय बनाने किचन में चला आया। यहां डस्टबिन में पड़े कूड़े की गंध नथुनों में पड़ी, शायद डस्टबिन में क‌ई दिन से कूड़ा पड़ा था। इसे बाहर ले जाकर फेंक आया और डस्टबिन को धुलकर फिर उसी स्थान पर रख दिया।


चाय पीते हुए अखबार भी पढ़ना शुरू कर दिया। प्रमुख खबर थी, किसी "आतंकी माड्यूल का पर्दाफाश"। "भक्ति" को लेकर मन में खिन्नता उठी कि इसके कारण हम मरने-मारने पर उतारू हैं! 

दरअसल, जि समाज के बीच से हिंसक लोग पैदा होते हों, वह "बीमारू-समाज" है। आज इक्कीसवीं शताब्दी में हम ब्रहमांड में जीवन के रहस्यों को जानने की ओर अग्रसर हैं, तो इस मध्ययुगीन-मानसिकता का औचित्य क्या है? खैर..

ऐसा इसलिए है कि, छोटी-छोटी बातों पर हमारा ध्यान नहीं जाता। उन बातों की ओर से मुँह फेर हम केवल "ऊँह" करके रह जाते हैं।

#चलते_चलते

जब कुछ समझ में न आए कि क्या करें तो अपने आसपास की छोटी से छोटी बातों पर ध्यान देना शुरू कर दें, कुछ नहीं तो डस्टबिन में पड़े कूड़े को ही फेंक आएं।

#सुबहचर्या
(27.12.18)

जीवन के यूँ ही पल

आज सुबह टहलते हुए मेरे पदचाप खरामा-खरामा जमीन पर पड़ रहे थे, जैसे किसी अबूझ पहेली को समझने का प्रयास कर रहे हों। 
वाकई, जैसे-जैसे हम बुद्धिमान होते जा रहे हैं वैसे-वैसे हमारा जीवन एक अजीब-सी अफरा-तफरी में फँसता जा रहा है। जीवन के बहुत सारे पल हम यूँ ही गंवा देते हैं! 
आखिर हम अपने इन पलों को क्यों नहीं पहचान पाते? 
सोचता हूँ, क्या बुद्धिमत्ता हमें एक अज्ञात भय की ओर भी ढकेलती है? वैसे मान्यता तो यह है कि बुद्धि समस्याओं का हल खोज लेती है। खैर चलिए जो भी हो, आज इस बुद्धिमान प्राणी की बुद्धि इतनी बातों में उलझी हुई है कि वह अपने ही आदमी का पता नहीं ढूँढ़ पा रही है! हाँ, यह आदमी कहाँ जा रहा है यह बताने में बुद्धि जैसे असमर्थ हो चुकी है। 
इस तरह टहलते हुए सुबह-सुबह मैं भी अपनी मंजिल के बारे में सोच रहा था मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था इस नासमझी में मेरे पैर जमीन पर खरामा-खरामा पड़ रहे थे। 
यूँ ही मेरी दृष्टि पेड़ों और घरों के ऊपर उठ आए सूरज पर पड़ी..सोचा..यही सूरज ढलते हुए साँझ का सूरज भी बन जाएगा। वैसे मुझे अस्त होते हुए सूरज में उदयमान सूरज से कहीं अधिक सौन्दर्य नजर आता है..हाँ एकदम रहस्यमयी दुनियाँ में खोने जैसा..!
खैर.. देखिए न, मैं आज आप से कितनी निरर्थक बातें कर रहा हूँ… 
एक दिन मैंने देखा, रोजमर्रा के कामों में व्यस्त एक व्यक्ति जो उम्र की ढलान पर भी था, मेरे साथ कार में बैठा था। हमारी कार उस खूबसूरत रास्ते से गुजर रही थी, जिसके दोनों ओर हरे-भरे वृक्षों की कतार थी। उस व्यक्ति ने अचानक अपना मोबाइल निकाला और उस हरियाली से भरे रास्ते की तस्वीर यूँ ही कैद कर लिया… शायद यही वह पल रहा होगा, जब वह अपने स्वयं के साथ था। ऐसे क्षण चिरस्थाई और जीवन के लिए मूल्यवान होते हैं! जबकि बाकी चीजें तो धीरे-धीरे हमें ही खत्म कर रही होती हैं। 
         एक बात है, कोई भी "बौद्धिक दृष्टिकोण" हमें किसी अन्तिम सत्य तक नहीं पहुँचा पाता। बुद्धि ऐसी बातों के लिए नहीं उकसाती। वह तर्क तो देती है, पर सौंदर्य का अनुभव केवल तर्क से नहीं आता। मुझे अस्ताचलगामी सूरज और पहाड़ों के दृश्य में जो सौन्दर्य दिखाई देता है, उसे मैं बुद्धि से नहीं, हृदय के भीतर उठती भावनाओं के सहारे ही महसूस कर पाता हूं! 
सच तो यह है, बुद्धि हमें जबर्दस्त ढंग से दुनियादार बनाती है.. बुद्धि से उपजी हमारी तार्किकता भी एक सीमा के पश्चात "बौद्धिक धूर्तता" में बदल जाती है। आज सुबह एक खबर पढ़कर इसे जाना। 
खबर यही थी कि एक बड़े अधिकारी के घर से अकूत सम्पत्ति बरामद हुई। यह बुद्धि का ही तो कमाल है!! लेकिन बुद्धि के चंगुल में फंसे लोग "यूँ ही पलों" से महरूम हुए होते हैं। 
इसी समाचार के ठीक नीचे एक और हेडिंग थी "इलाज के लिए भटक रही पुलवामा शहीद की माँ"! 
खैर, इन दोनों समाचारों से 'बुद्धि' और 'भावना' में अंतर का पता चलता है!
बुद्धि किसी को अकूत संपत्तियों का मालिक बना देती है तो कोई भावना में बलिदान होने के लिए तत्पर हो उठता है!! यह भावना पर बुद्घि का जबर्दस्त व्यंग्य है।
फिर भी, एक ओर होता है आशांति और कोलाहल, तो दूसरी ओर नीरव शांति का सौन्दर्य! 
#चलते_चलते 
     देखिए तो जरा अपने जीवन के "यूँ ही पलों" को! इन्हें पहचानिए, ये कभी खत्म नहीं होते!!
#सुबहचर्या 
 (14.3.18)

सभ्यता तो जीवन की जीवंतता में है!

सुबह टहलने निकला तो मन शान्त था। हृदय में कहीं कोई हलचल नहीं। एकदम भावहीनता की सी स्थिति। इसी मन:स्थिति में मैं मेरे डग सुबह को नाप रहे थे। तभी दृष्टि एक छोटे से तालाब पर जाकर अटक ग‌ई। 

हाँ, यह वही तालाब था, जिसमें मैंने कमल के पुष्प खिले देखे थे। तब यह तालाब ऐसा लगता था, मानो साहित्य में वर्णित कोई सरोवर जीवंत हो उठा हो, जल के बीच तैरते हरे पत्रों के बीच मुस्कुराते कमल! 

आज उसी तालाब में मिट्टी भराई का काम चल रहा था। उसके आधे भाग में मिट्टी भरी भी जा चुकी थी। शायद इस तालाब के स्थान पर अब प्लाटिंग होगा। यहां मकान बनेंगे। 

खिन्न मन से मैंने उधर से निगाहें फेर लिया।

इधर सामने सड़क पर किसी वाहन से सांप कुचला हुआ पड़ा था। लेकिन उसकी पूंछ अभी भी ऐंठ रही थी। शायद पूंछ में जान बाकी था। इसे नजरअंदाज कर मैं आगे बढ़ा गया। 

थोड़ा आगे बढ़ा तो वह छिछला और चौड़ा नाला दिखाई पड़ा। बरसात में यह पानी से लबालब भर जाता है। फिर वर्षा-ऋतु बीतते-बीतते इसकी सतह पर असंख्य धवल कुमुदिनियाँ खिल उठती थीं। पर अब उस नाले में भी मकान उगने लगे थे। शायद अब न वहाँ बरसाती जल ठहरेगा और न ही कुमुदिनियों का वह उजला सौंदर्य दिखाई पड़ेगा! खैर। 

आज की टहलाई पूरी करके वापस आवास आ गया। चाय-वाय पिया। फिर "संस्कृति और सभ्यता" शीर्षक किताब, जिसे हाल के दिनों में खरीदकर लाया था, उसके भी दो चार पन्ने पलटे। 

इस किताब में एक जगह नंदकिशोर आचार्य, अज्ञेय की एक टीप "मैं अकेलापन चुनता नहीं, स्वीकार करता हूँ" उद्धृत करते हुए गाँधी जी के अन्तिम दिनों के बारे में सोचते हैं -

 "लेकिन अकेलापन शायद गाँधी जी की स्वाभाविक नियति है। सत्य की राह पर चलने वाले अकेले हो जाने को मानो अभिशप्त होते हैं। यह कितना विडंबनापूर्ण है कि हिन्दुत्ववादी उनसे इसलिए नाराज थे कि वे दलितों और मुसलमानों की उन्नति और सुरक्षा की बात करते थे। मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग उनसे नाराज था कि वे पाकिस्तान की अवधारणा के विरोधी थे। और अब दलित उनसे इसलिए नाराज हैं कि उनकी राय में वे सवर्णवादी हैं। धर्मनिरपेक्षतावादी नाराज हैं क्योंकि वह धर्म की भाषा में बात करते हैं। धर्मवादी नाराज हैं क्योंकि वह राज्य को धर्मनिरपेक्ष रखना चाहते हैं। दरअसल, गाँधी तब भी अकेले थे और आज भी अकेले हैं। ऐसा व्यक्ति सदैव अकेला ही रहेगा जिसे दूसरे केवल अपने लिए इस्तेमाल नहीं कर सकें। वह जिस हद तक हमारे लिए सुविधाजनक है, उस हद तक आदरणीय है - लेकिन जब उसके विचार या व्यक्तित्व हमारे लिए असुविधाजनक होने लगे तब उसे अकेला छोड़ देने में ही सुरक्षा है - यदि मिटाया न जा सके। अकेला छोड़ देना भी प्रकारांतर से मिटाना ही है। प्रसाद ने कहीं लिखा भी है कि "उपेक्षा घोर शत्रुता है।"

वैसे इस अंश का कमल, सरोवर, बरसात में लबालब हुआ नाला या कुमुदिनियों से कोई संबंध नहीं है, लेकिन मामला गांधी जी की संवेदनशीलता से जुड़ता है। संवेदनशील-जीवन सभी का अस्तित्व स्वीकार करके चलता है, जो इसे स्वीकार नहीं करता कालांतर में उसे नष्ट होना है, चाहे सभ्यता ही क्यों न हो!!

#चलते_चलते

जीवन तो गतिमान होता ही है, लेकिन जो इस गति में इस्तेमाल होने लगता है वह खतम हो जाता है, और जो नहीं वह अकेला।

#सुबहचर्या

 (19.3.19)

वह रिटेल स्टोर वाला लड़का

आज सुबह नींद खुली तो कुछ-कुछ मानसिक और शारीरिक टाइप के आलस्य की अनुभूति हुई, लेकिन मन को समझा करके निकल लिया, माने मार्निंग वाक हेतु। वैसे भी शरीर हो या मन, उसपर सतत विजय प्राप्त करने की कोशिश करते रहना चाहिए। 

यह समझना भी जरूरी है कि हमें जब अपने शरीर की अनुभूति होने लगे तो मान लेना चाहिए कि हमारा शरीर अस्वस्थ है तब हमें अपने स्वास्थ्य की चिंता शुरू कर देनी चाहिए। 

लेकिन मन का तरीका कुछ दूसरा भी है, जब वह अपना अहसास 'मैं' के रूप में कराने लगे तो यह मन, शरीर और बुद्धि दोनों को निष्कृय बनाता है। फिर तो आदमी 'अकर्मी' यानी आलसी बन जाता है। फिर तो ऐसा आदमी अपने मन को पहचानने की शक्ति भी खो देता है, यह स्पथिति मानसिक रुग्णावस्था की हो सकती है। खैर..

अभी पिछले दिनों स्पेंसर के एक रिटेल स्टोर गया। पत्नी ही मुझे वहां लेकर ग‌ईं थीं। उन्हें वहां से कुछ घरेलू सामान लेना था। वे उस स्टोरी में चीजों को तलाश रहीं थीं। इधर मैं भी यूँ ही वहां किसी चीज को उलट-पलटकर देखने लगा। तभी अचानक एक लड़का मेरे पास आया वह उस चीज के बारे में मुझे जानकारी देने लगा। वह शक्लोसूरत से आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का प्रतीत हुआ। यूं ही मैं उससे पूंछ बैठा, 'तुम यहां काम करते हो?'

वह लड़का उस रिटेल स्टोर पर प्रतिदिन अपराह्न तीन बजे से रात आठ बजे तक काम करता है। इसके लिए उसे छह हजार रूपए मिलता है। इस जानकारी के बाद मैंने उससे पूंछा, 'इसके पहले क्या करते हो?'

उसे स्कूल जाना होता है। वह बारहवीं में पढ़ता है। जीव विज्ञान विषय है उसका।  अब मैं थोड़ा अचरज से उससे पूंछा, 'अच्छा..! तो..आगे तुम्हारा इरादा क्या है?'

डाक्टर बनना चाहता है। लखनऊ में किसी रिश्तेदार के यहां रहता है। 

मन ही मन मैंने उसके जज्ब़े को सलाम किया। निश्चित ही उस बच्चे का मन ही है जो उसे साकारात्मक सोच से लबरेज़ किये हुए है। कठिन परिस्थिति में भी वह अपनी राह तलाश रहा है। उससे पूंछकर मैंने उसकी एक तस्वीर ले ली थी। खैर..

मन में उस लड़के के बारे में सोचते हुए, मैं दो हजार कदम चल चुका था। वापस लौट पड़ा। 

लौटते हुए मेरी निगाह डिवाइडर के उस पार ग‌ई। उधर वाली सड़क पर सामने से एक कुत्ता चला आ रहा है।

वह कुत्ता जैसे सड़क पर चलने के नियम का पालन कर रहा था। अनजाने ही सही, उसका मन उसे सही ढंग से नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा था। वैसे मन यदि बेलाग हो तो सही दिशा में चलने के लिए प्रेरित करता है। आपके अनजाने में भी!!

#चलते_चलते

हमें सदैव अपने एहसासों पर ध्यान बनाए रखना चाहिए। किसी बात का एहसास न होना भी एक तरीके का एहसास ही है।

#सुबहचर्या

मूक संवाद

        आज अलसुबह नींद खुली। चिड़ियों का मधुर कलरव हवाओं में तैर रहा था। वह चहचहाहट ऐसी थी, मानो सुबह की कोमलता दिन के द्वार पर दस्तक दे रही हो! सच कहें तो, सुबह-सुबह चिड़ियों की यह स्वर-लहरियाँ मन मैं अनाम-सी ताजगी भर देती हैं। शायद आपको भी पक्षियों के ऐसे ही मनभावन अहसास जरूर हुआ होगा। 

चिड़ियों की बात चली है तो पत्नी की वह बात स्मृति में कौंध गई। वे बड़े विश्वास से बता रहीं थीं कि एक दिन एक गौरैया उनसे लड़ने चली आई थी, और उस दिन वह नन्हीं सी गौरैया उनसे देर तक झगड़ती रही थी। उनकी यह बात सुनकर फहले तो मुझे हँसी-सी आई। सोचा, भला एक छोटी-सी गौरैया किसी इंसान से क्या लड़ाई करेगी? 

फिर वे बिस्तार से बताने लगीं। एक सुबह वे ड्राइंगरुम में बैठी अखबार पढ़ रहीं थीं। और कमरे का दरवाजा खुला हुआ था, जिसका पल्ला भीतर की ओर खुलता है। तभी अचानक न जाने कहां से एक गौरैया फुदकती हुई आई और आकर उसी खुले पल्ले पर बैठ गई। बैठते ही उसने उनकी ओर गर्दन तानी और जैसे उलाहना देती हुई तीखे स्वर में चीं-चीं करने लगी। 

यह कोई क्षणिक चहचहाहट नहीं थी। वह नन्हीं-सी गौरैया उनकी ओर चोंच किए लगातार तीन-चार मिनट तक चीं-चीं करती रही, जैसे कुछ कहना चाहती हो, कोई शिकायत दर्ज करा रही हो या फिर उनसे अपने छोटे से हृदय का रोष प्रकट कर रही हो। पहले तो पत्नी भी उसकी यह हरकत का अर्थ नहीं समझ पाईं। लेकिन कुछ ही पल बाद उनका ध्यान कुछ दिन पहले घटी एक घटना की ओर गया, तभी उन्हें उस गौरैया की बेचैनी का रहस्य समझ में आई।

दरअसल, घर के पोर्टिको की छत में पंखा टांगने के लिए एक विद्युत बॉक्स बना हुआ है। जिसे ढक्कन लगाकर वर्षों पहले बंद कर किया गया था। वहां कभी पंखा लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। लेकिन समय के साथ इस ढक्कन का एक पेंच ढीला होकर गिर गया था, जिससे वह बॉक्स अधखुला-सा रहने लगा। 

धीरे-धीरे गौरैया का जोड़ा उस छोटे-से सुरक्षित कोने को अपना आश्रय समझ बैठा। वे तिनके लाकर उसमें घोंसला बनाने लगे। प्रकृति कितनी संभावना से भरी होती है, अधखुले लोहे के उस छोटे से बॉक्स में भी उन्हें अपना संसार बसाने की संभावना दिखाई दे ग‌ई थी। वे वहीं अंडे देते, लेकिन ये अंडे अकसर लुढ़ककर नीचे गिर जाते। 

एक बार तो उनके दो नन्हें बच्चे भी उसी बॉक्स से नीचे आ गिरे थे। उन मासूम बच्चों के पंखों में अभी जान भी नहीं आ पाई थी, उन्हें देखकर मन द्रवित हो उठा। उन्कीहें सावधानी से उठाकर घर की लॉबी में एक जालीदार बरतन में सुरक्षित रख दिया गया‌।

शायद पक्षियों की दुनियां में भी ममता की कोई अदृश्य भाषा होती है। गौरैया के उस जोड़े को जल्द ही अपने बच्चों का पता चल गया। फिर तो रोज सुबह-सुबह वे लॉबी के दरवाजे पर आकर बेचैनी से चीं-चीं करने लगते, मानो अपने बच्चों तक पहुँचने की गुहार लगा रहे हों। उनकी उस व्याकुल पुकार को समझते हुए पत्नी उन बच्चों को बरामदे में रख देती। वहां वे दोनों गौरैया बारी-बारी से आकर अपने बच्चों को चुगाते‌, उनके पास फुदकते, उन्हें पुकारते। 

यह क्रम लगातार तीन दिनों तक चला था। गौरैया के उस जोड़े को जैसे पत्नी पर भी अटूट विश्वास हो आया था। आखिर में तीसरे दिन, जब उन बच्चों के पंखों में थोड़ी शक्ति आ गई, वे फुदकते-फुदकते उड़ गए.. उनके माता-पिता ने जैसे अपने उन बच्चों को उड़ना भी सिखा दिया था।

छत में लगा वह बॉक्स गौरैय्यों के घोंसले के लिए सुरक्षित जगह नहीं था, यही सोचकर पत्नी ने उसका ढक्कन पेंच से कसवा दिया था। अब गौरैया वहाँ घोंसला नहीं बना पा रही थी। वह अकसर बॉक्स के आसपास आकर मँडराती, और फिर लौट जाती‌। शायद उसे घोंसला बनाने की कोई और जगह नहीं मिल रही थी। इसी बात से वह पत्नी से रूठी हुई थी। शायद अपनी शिकायत दर्ज कराने ही उस दिन वह ड्राइंगरुम में चली आई थी। उस दिन उसने पत्नी से जैसे खुलकर उलाहना दिया था।

 फिर हम गौरैया के उस लड़ने को सच क्यों न मानें! जिसे अपने अंडे और बच्चों की चिंता हो, जो उनके लिए तिनका-तिनका जोड़कर घोंसला बनाती हो, उसके भीतर भी तो कोई मन जरूर होगा। और जब मन है, तो उसमें सोचने-समझने और भाव प्रकट करने की शक्ति भी होगी। तभी तो उस दिन वह नन्हीं-सी गौरैया बिना डरे ड्राइंगरूम तक चली आई थी, मानो पत्नी से लड़कर अपना विरोध जता रही थी।

पत्नी ने भी उसके मन की उस मूक भाषा को पढ़ लिया था। आखिर संवेदनाओं की भाषा शब्दों की मोहताज कहाँ होती है!

खैर, इसके बाद ही पत्नी ने गौरैयों के लिए एक घोंसला मंगवाया। इसे पोर्टिको में ही सहेजकर रखवा दिया था‌। अब गौरैया का जोड़ा उसी में अपना घर बसाने लगा था। इन दिनों अकसर उस घोसले से उनके नन्हें बच्चों की चीं-चीं की सुनाई पड़ जाती है। वह स्वर जैसे घर के वातावरण में एक जीवंत अपनापन घोल देता है।

चलते-चलते एक बात और, जो मूक है उसमें भी वेदना है उसकी भी अपनी एक भाषा होती है। भले ही उस भाषा में शब्द न हों, फिर भी उसे समझा जा सकता है। उसे पढ़ने के लिए बस एक आवरणहीन, पारदर्शी और संवेदनशील मन होना चाहिए। लेकिन इस भी समझा जा सकता है! इसे पढ़ने के लिए बस एक आवरणहीन पारदर्शी मन होना चाहिए।