आज उठा तो सुबह के छह बजकर आठ मिनट हो चुका था। बिस्तर छोड़ा तब जाकर मन हुआ कि टहलने निकला जाए। दरवाजा खोला, आसमान साफ था। बाहर निर्मल चाँदनी छिटकी हुई थी। दिसंबर का महीना है, इस मौसम में आसमान इतना साफ! थोड़ा आश्चर्यजनक लगा! लेकिन मौसम है, पल-पल बदलता भी है। वैसे बुंदेलखंड क्षेत्र में कुहरे का प्रकोप उत्तर की अपेक्षा कम ही रहता है, यही हाल बादलों का भी है।
चलते-चलते ख़्याल आया आज पच्चीस दिसंबर है, प्रभु ईशु का जन्मदिन! इस उपलक्ष में आज छुट्टी भी है। फील्ड स्तर पर तैनात सरकारी अधिकारी के लिए छुट्टी !! ना बाबा ना, छुट्टी मनाने के लिए छुट्टी लेनी पड़े तो भी हमारे वश में नहीं, सरकार के बंधक हैं हम! खैर सेत-मेत में बंधक भी नहीं, इसकी पूरी कीमत वसूलते हैं।
एक बात है, इस जहां में किसी व्यक्ति की कोई उपलब्धि नहीं, सिवाय उसके निर्णय लेने की क्षमता के! उसके निर्णय ही वास्तव में उसकी उपलब्धियां हैं। इन्हीं निर्णयों के आधार पर मनुष्य अपने लिए परिस्थितियां गढ़ता है। और वही परिस्थितियां उसकी प्रकृति तथा समाज में उसके स्थान को निर्धारित करती हैं।
दरअसल महत्वाकांक्षी व्यक्ति केवल अवसरों की प्रतीक्षा नहीं करता वह अपने लिए परिस्थितियां भी निर्मित करता है जिनमें उसको निर्णय लेने का अवसर और अधिकार मिल सके! एक तरह से वह अपने अस्तित्व की पुष्टि करता है। इसलिए यदि उन्हें यह अवसर न मिले तो उनके अंदर कुंठा और अवसाद जन्म लेने लगता है।
लौटते हुए बैलगाड़ी में जुते बैलों को देखा। गाड़ीवान इन्हें हाँके चला जा रहा था।
चाय पीते हुए बीती सुबहचर्या में हुए दार्शनिक-चिंतन याद आया।
सच तो यह है कि "भक्ति-भाव" जैसी भावना से हमारे निर्णय लेने की क्षमता में ह्रास होता है! खैर।
..... हो सकता है इस्लाम में "समानता" का तत्व इसके अनुयायियों के बीच सहजता का कारण रहा हो, जो जाति-भेद और ऊँच-नीच में बटे शेष भारतीय समाज के लिए आकर्षक जान पड़ा हो।
लेकिन हिंदू हों या मुस्लिम या फिर कोई अन्य मतावलंबी, "भक्ति" उनकी अतार्किक मान्यताओं को भी सहेजती आ रही है। धार्मिकों ने अपने धर्म की 'निगरानी' न कर स्वयं को 'धर्म' के हवाले कर दिया, अर्थात 'धर्म' ने व्यक्ति को नियंत्रित किया। कुछ लोग इसे 'धर्म' की उपलब्धि के रूप में देखते हैं, लेकिन इस उपलब्धि के चक्कर में व्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित हुई। इस प्रवृत्ति के कारण जहाँ इस्लाम में उसकी "समानता" की देन खंडित हुई, तो वहीं हिंदू विचारधारा जाति-भेद और ऊँच-नीच के दंश से पीड़ित हुई।
यहाँ "भक्ति" का आशय केवल 'उपासना पद्धतियों' से ही नहीं, बल्कि धर्म में निहित "नैतिक-चेतना" से इतर उन सभी विचारों, कार्य-व्यवहारों से है, जो धर्म के नाम पर व्यवहृत होते हैं और जिनका समाज के लिए कोई मूल्य नहीं होता।...
#चलते_चलते
निर्णय लेने की क्षमता न होनेे से, इसका खामियाजा बैलगाड़ी के बैल की तरह भुगतना पड़ता है।
#सुबहचर्या
(25.12.18)
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