आज अलसुबह नींद खुली। चिड़ियों का मधुर कलरव हवाओं में तैर रहा था। वह चहचहाहट ऐसी थी, मानो सुबह की कोमलता दिन के द्वार पर दस्तक दे रही हो! सच कहें तो, सुबह-सुबह चिड़ियों की यह स्वर-लहरियाँ मन मैं अनाम-सी ताजगी भर देती हैं। शायद आपको भी पक्षियों के ऐसे ही मनभावन अहसास जरूर हुआ होगा।
चिड़ियों की बात चली है तो पत्नी की वह बात स्मृति में कौंध गई। वे बड़े विश्वास से बता रहीं थीं कि एक दिन एक गौरैया उनसे लड़ने चली आई थी, और उस दिन वह नन्हीं सी गौरैया उनसे देर तक झगड़ती रही थी। उनकी यह बात सुनकर फहले तो मुझे हँसी-सी आई। सोचा, भला एक छोटी-सी गौरैया किसी इंसान से क्या लड़ाई करेगी?
फिर वे बिस्तार से बताने लगीं। एक सुबह वे ड्राइंगरुम में बैठी अखबार पढ़ रहीं थीं। और कमरे का दरवाजा खुला हुआ था, जिसका पल्ला भीतर की ओर खुलता है। तभी अचानक न जाने कहां से एक गौरैया फुदकती हुई आई और आकर उसी खुले पल्ले पर बैठ गई। बैठते ही उसने उनकी ओर गर्दन तानी और जैसे उलाहना देती हुई तीखे स्वर में चीं-चीं करने लगी।
यह कोई क्षणिक चहचहाहट नहीं थी। वह नन्हीं-सी गौरैया उनकी ओर चोंच किए लगातार तीन-चार मिनट तक चीं-चीं करती रही, जैसे कुछ कहना चाहती हो, कोई शिकायत दर्ज करा रही हो या फिर उनसे अपने छोटे से हृदय का रोष प्रकट कर रही हो। पहले तो पत्नी भी उसकी यह हरकत का अर्थ नहीं समझ पाईं। लेकिन कुछ ही पल बाद उनका ध्यान कुछ दिन पहले घटी एक घटना की ओर गया, तभी उन्हें उस गौरैया की बेचैनी का रहस्य समझ में आई।
दरअसल, घर के पोर्टिको की छत में पंखा टांगने के लिए एक विद्युत बॉक्स बना हुआ है। जिसे ढक्कन लगाकर वर्षों पहले बंद कर किया गया था। वहां कभी पंखा लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। लेकिन समय के साथ इस ढक्कन का एक पेंच ढीला होकर गिर गया था, जिससे वह बॉक्स अधखुला-सा रहने लगा।
धीरे-धीरे गौरैया का जोड़ा उस छोटे-से सुरक्षित कोने को अपना आश्रय समझ बैठा। वे तिनके लाकर उसमें घोंसला बनाने लगे। प्रकृति कितनी संभावना से भरी होती है, अधखुले लोहे के उस छोटे से बॉक्स में भी उन्हें अपना संसार बसाने की संभावना दिखाई दे गई थी। वे वहीं अंडे देते, लेकिन ये अंडे अकसर लुढ़ककर नीचे गिर जाते।
एक बार तो उनके दो नन्हें बच्चे भी उसी बॉक्स से नीचे आ गिरे थे। उन मासूम बच्चों के पंखों में अभी जान भी नहीं आ पाई थी, उन्हें देखकर मन द्रवित हो उठा। उन्कीहें सावधानी से उठाकर घर की लॉबी में एक जालीदार बरतन में सुरक्षित रख दिया गया।
शायद पक्षियों की दुनियां में भी ममता की कोई अदृश्य भाषा होती है। गौरैया के उस जोड़े को जल्द ही अपने बच्चों का पता चल गया। फिर तो रोज सुबह-सुबह वे लॉबी के दरवाजे पर आकर बेचैनी से चीं-चीं करने लगते, मानो अपने बच्चों तक पहुँचने की गुहार लगा रहे हों। उनकी उस व्याकुल पुकार को समझते हुए पत्नी उन बच्चों को बरामदे में रख देती। वहां वे दोनों गौरैया बारी-बारी से आकर अपने बच्चों को चुगाते, उनके पास फुदकते, उन्हें पुकारते।
यह क्रम लगातार तीन दिनों तक चला था। गौरैया के उस जोड़े को जैसे पत्नी पर भी अटूट विश्वास हो आया था। आखिर में तीसरे दिन, जब उन बच्चों के पंखों में थोड़ी शक्ति आ गई, वे फुदकते-फुदकते उड़ गए.. उनके माता-पिता ने जैसे अपने उन बच्चों को उड़ना भी सिखा दिया था।
छत में लगा वह बॉक्स गौरैय्यों के घोंसले के लिए सुरक्षित जगह नहीं था, यही सोचकर पत्नी ने उसका ढक्कन पेंच से कसवा दिया था। अब गौरैया वहाँ घोंसला नहीं बना पा रही थी। वह अकसर बॉक्स के आसपास आकर मँडराती, और फिर लौट जाती। शायद उसे घोंसला बनाने की कोई और जगह नहीं मिल रही थी। इसी बात से वह पत्नी से रूठी हुई थी। शायद अपनी शिकायत दर्ज कराने ही उस दिन वह ड्राइंगरुम में चली आई थी। उस दिन उसने पत्नी से जैसे खुलकर उलाहना दिया था।
फिर हम गौरैया के उस लड़ने को सच क्यों न मानें! जिसे अपने अंडे और बच्चों की चिंता हो, जो उनके लिए तिनका-तिनका जोड़कर घोंसला बनाती हो, उसके भीतर भी तो कोई मन जरूर होगा। और जब मन है, तो उसमें सोचने-समझने और भाव प्रकट करने की शक्ति भी होगी। तभी तो उस दिन वह नन्हीं-सी गौरैया बिना डरे ड्राइंगरूम तक चली आई थी, मानो पत्नी से लड़कर अपना विरोध जता रही थी।
पत्नी ने भी उसके मन की उस मूक भाषा को पढ़ लिया था। आखिर संवेदनाओं की भाषा शब्दों की मोहताज कहाँ होती है!
खैर, इसके बाद ही पत्नी ने गौरैयों के लिए एक घोंसला मंगवाया। इसे पोर्टिको में ही सहेजकर रखवा दिया था। अब गौरैया का जोड़ा उसी में अपना घर बसाने लगा था। इन दिनों अकसर उस घोसले से उनके नन्हें बच्चों की चीं-चीं की सुनाई पड़ जाती है। वह स्वर जैसे घर के वातावरण में एक जीवंत अपनापन घोल देता है।
चलते-चलते एक बात और, जो मूक है उसमें भी वेदना है उसकी भी अपनी एक भाषा होती है। भले ही उस भाषा में शब्द न हों, फिर भी उसे समझा जा सकता है। उसे पढ़ने के लिए बस एक आवरणहीन, पारदर्शी और संवेदनशील मन होना चाहिए। लेकिन इस भी समझा जा सकता है! इसे पढ़ने के लिए बस एक आवरणहीन पारदर्शी मन होना चाहिए।
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