सेप्टिक टैंक का ढक्कन
सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर लगा कंक्रीट वाला ढक्कन सीमेंट से भी जाम था। पिछले दस मिनट से वह छेनी और हथौड़े की मदद से इसे मेनहोल से हटाने में जुटा था। कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे छेनी टिकाता और हथौड़े से चोट मारता। लेकिन ढक्कन था कि टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा था। पास में खड़ा रमेसर ठेकेदार चुपचाप उसके काम की निगरानी कर रहा था।
अचानक रमेसर को एक पतली दरार नजर आई। 'इधर इस किनारे छेनी लगाओ’ उसके कहने पर उसने छेनी वहां टिकाकर एक जोरदार हथौड़ा चलाया।
छेनी छिटककर दूब वाली घास के बीच जा गिरी और इसी झटके में उसकी कमीज की ऊपरी जेब से दो सिक्के भी वहीं घास में जा गिरे।
छेनीवाला अभी घास टटोल रहा था, ‘वे’ ने हलकी हैरानी के साथ पूँछा, 'छेनी नहीं मिल रही क्या?' लेकिन रमेसर बोला, “छेनी तो बड़ी चीज है वह मिल गई है, ये अपना सिक्का खोज रहे हैं।”
इनके दो अन्य साथी पास में खड़े चुपचाप यह सब देख रहे थे। छेनीवाले की मदद के लिए आगे नहीं आए। उनकी यह उदासीनता कुछ अजीब थी। उन्हें देखते हुए 'वे' ने कहा, “इसके मेहनत के सिक्के होंगे, खोजना ही चाहिए।"
सिक्के मिलते ही छेनीवाला काम में जुट गया। मुस्कुराकर रमेसर ने ‘वे’ से कहा, बड़का दिमाग है इसके पास।' इस मुस्कुराहट में ‘वे’ को “बड़का दिमाग” अर्थपूर्ण लगा। ऐसा दिमाग जो रमेसर को मुफीद हो!
रमेसर को 'वे' का चेहरा किंचित जाना पहचाना लगा। वह यादों में उतर पड़ा,
"चालीस वर्ष पहले, उसकी उम्र बमुश्किल पाँच-छह साल की रही होगी। आज जहां खड़ा है, बाबा इन्हीं घरों से त्यौहारी लेने आते। तब ये घर कच्चे हुआ करते थे। कभी-कभी वह भी उनके साथ आता। शायद 'वे' को उस बचपन में कभी देखा हो।
आज वह बराबरी में खड़ा इनसे सौदेबाजी कर रहा है। गर्व से ट्रैक्टर-टैंकर की ओर देखा। उसका स्वयं का सेप्टिक-टैंक सफाई का व्यवसाय है। इस सेप्टिक टैंक सक्शन मशीन का मालिक भी वही है!
वर्षों पुरानी स्मृतियां जीवंत हो उठी-
"नगरपालिका में स्वीपर बनने के लिए प्रैक्टिकल परीक्षा देने गया। उस दिन सीवर के काले गंधाते पानी वाले नाले में झम्म से कूद पड़ा था! वहीं सात जने उसमें नहीं कूदे, दो जने जैसे-तैसे नाले में उतरे भी तो तुरंत बाहर निकल आए थे...
जो नाले में नहीं उतरे वे ऊँची जात के थे, उन्हें नौकरी नहीं दी गई। अफसरानों ने उसको ही इस नौकरी के योग्य माना। आखिर मानते भी क्यों न, जिसका जन्म ही उस जात में हुआ था जिनकी रोजी-रोटी ही सिर पर मैला ढोने से चलती हो! उनका इस नौकरी पर जन्मसिद्ध अधिकार तो बनता ही है।"
अब छेनी पर हथौड़ा पड़ता तो ढक्कन हिल जाता। इसे देख रमेसर ने ट्रैक्टर के टूल बॉक्स से रम्मा निकालकर लाया। लेकिन ढक्कन का एक किनारा अभी भी मेनहोल से जाम था। इसे छेनी से काटने के लिए कहा।
पागलों जैसी थी छेनीवाले की वेशभूषा। मटमैले रंग की उसकी कमीज मोटे कपड़े की थी, जिसके ऊपर धूसरित रंग की फटी सी सदरी पहने था। पैंट भी मटमैला और ढीला-ढाला सा था। ये कपड़े भी जैसे महीनों से न धुले हों।
यही नहीं, उसके पैरों में चप्पल नहीं और सिर पर घने बिखरे बाल थे जिसे शायद ही कभी कंघी से संवारा गया हो, जो शक्ल से भी उसे पागल बताने के लिए काफी था।
बिना किसी से बोले चुपचाप अपने काम में जुटा है। उसकी मन: स्थिति और वेशभूषा से 'वे' को संदेह हुआ कि कहीं इसीलिए तो रमेसर ने इसे "बडका दिमाग" वाला तो नहीं कहा? 'वे' ने जैसे इसका मतलब जानने के लिए रमेसर की ओर देखा, लेकिन वह कहीं खोया हुआ दिखाई पड़ा।"
उत्कंठा
"स्वीपर की नौकरी मिलने पर भी खुश नहीं था। अम्मा अकसर कहतीं, 'तुम्हारे दद्दा और पप्पा तो करिया अक्षर हैं, इसीलिए वे मैला ढोते हैं मुला तुम यह काम मत करना, खूब पढ़ना।' और जबर्दस्ती स्कूल भेजतीं। स्कूल और घर एक ब्लॉक के कैंपस में था।
दद्दा ब्लॉक में मेहतर थे, रहने के लिए उन्हें कैंपस में ही उन्हें आठ बाई दस की कोठरी मिली थी, वही उसका घर था। समय के प्रवाह में वह कोठरी भी जर्जर होती गई। दद्दा ने इस कोठरी के सामने थोड़ी सी जगह घेर कर एक झोपड़ी बनाया था। जिसमें वे अपनी गैया के साथ रहने लगे थे।
त्योंहारों की छुट्टी पड़ती तो ब्लाक-कैंपस में सन्नटा छा जाता। लोग अपने घर चले जाते। 'दद्दा, क्यों नहीं चलते घर?' इस पर अम्मा यही कहती, 'यही तो हमारा घर है।' लेकिन यह कैसे हो सकता है?" यह उत्कंठा उसके मन में एक गाँठ बन गई! जो कक्षा पांच में जाने के दौरान खुली।"
दद्दा से पूँछना
"रोज की तरह उस दिन भी कक्षा में वह सबसे अलग-थलग पीछे बैठा था। पंडी जी पढ़ा रहे थे कि -
'आजादी के बाद पहले विकास खंड बना और फिर बाद में यह स्कूल बना।'
यही सुना था जब मन के कोने में दबी घर वाली पुरानी उत्कंठा जाग उठी थी, पंडी जी से पूँछ लिया था,
'पंडी जी, तब मेरा घर भी यहाँ नहीं था न?'
इस प्रश्न पर कक्षा के सारे बच्चे खिलखिला पड़े थे। और पंडी जी भी उसे घूर रहे थे। जैसे कोई गलत बात कह दिया हो, फिर सहम गया था।
'प्रश्न पूँछने का यह संस्कार कहां से आया' पंडी जी का उसे घूरना जैसे इसी बात का संकेत था।
वैसे भी जिस जाति में वह जन्मा था, वहां जीवन के प्रति आशा और आकांक्षा पनपने की कोई गुंजाइश नहीं! तो प्रश्न पूंछने का संस्कार कहां से आता? उसकी जाति की जैसी परिस्थितियों में, जहां बदलाव की इच्छा भी मर जाती हो, उसमें रहकर प्रश्न पूँछने की चेतना कैसे जागती?
फिर पंडी जी ने ही बताया था
नहीं, तब तुम्हारा घर भी यहाँ नहीं था!
यह सुनते ही कक्षा की सब बातें भूलकर गहरे उधेड़बुन में फंस गया कि आजादी से पहले उसका घर कहां था।
छुट्टी होते ही सीधे घर भागा था कि दद्दा से जाकर पूँछें।
बस्ता फेंककर दद्दा को ढूंढने लगा। झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा ने बताया कि, "बिलाक कालोनी गए हैं, आते होंगे।"
थोड़ी देर बाद दद्दा आते दिखाई पड़े थे। उनकी ओर लपका, तभी उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देख ठिठक पड़ा था। 'दद्दा, यह काम दोपहर से पहले ही कर लेते हैं!' सोचकर धीरे कदमों से हैंडपंप की ओर मुड़ आया था। दद्दा वहीं आए। झाड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन नल के नीचे रखा। हैंडपंप चलाते-चलाते अधीर होकर दद्दा से पूँछा लिया था -
'दद्दा, जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे?'
दस साल के बच्चे से इस प्रश्न की उम्मीद नहीं थी दद्दा को। बाल्टी धोते-धोते वे रुक गए। चकित भाव से मेरी ओर देखा था। हैंडपंप चलाना रोक मैंने दृढ़ता से कहा था,
'हाँ दद्दा, पंडी जी ही तो कह रहे थे कि बिलाक आजादी के बाद बना, तब तो हमारा यह घर भी यहां नहीं था?'
“पाकिस्तान..हाँ हमारा घर पाकिस्तान में था।”
बिना लाग-लपेट के दद्दा ने कहा। उसे उत्तर तो मिला लेकिन मन में एक दूसरी जिज्ञासा भी जन्म ले चुकी थी।"
अचानक हथौड़े की आवाज आई!
‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा।’
‘वे’ ने देखा, रमेसर रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है।
लेकिन रमेसर के अन्य दोनों साथी ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे जैसे, ढक्कन को न छूना चाहते हों! तब तक छेनीवाले ने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। पूरा मेनहोल खुला था। इसमें झांककर रमेसर ने अंदाजा लगाकर बोला, इसकी गहराई लगभग आठ फीट है। ‘वे’ को गहराई पता थी, तुरंत ‘हाँ’ बोल दिया।
कीचड़
'इसमें तो पानी है, कीचड़ नहीं है’ मेनहोल में झाँकने हुए रमेसर ने कहा।
"‘वे’ को सहसा बोध हुआ कि सेप्टिक टैंक की तली पर बैठा मल ही रमेसर की व्यावसायिक भाषा में ‘कीचड़’ है।" इस नए ज्ञान के साथ 'वे' ने रमेसर की ओर देखा-
लेकिन इस कीचड़ को देख वह न जाने किन विचारों में खो चुका था!
"दद्दा की बाल्टी में इसका रंग कुछ और होता। दद्दा रोज सुबह नौ बजे हाथ में बाल्टी, झाड़ू और टिन लिए ब्लॉक की कालोनी में जाते। एक दिन जिद करके वह भी उनके साथ हो लिया था। हालांकि उसका साथ में जाना दद्दा को अच्छा नहीं लगा था। साथ न चले इसके लिए, उसे पुचकारा भी। पर नहीं माना था वह। तब चार-पांच साल की उम्र थी उसकी।
...उस दिन दद्दा एक बड़े क्वार्टर के पीछे की ओर गए। उस क्वार्टर के नींव के ऊपर दीवाल पर लोहे का एक ढक्कन लटका था। दद्दा ने इसे उठाया। यहां आले जैसा एक चौकोर गड्ढा था। उसमें यही 'कींचड़' पीले रंग के ढेर में जमा था।
....दद्दा ने मुड़े हुए टिन से उस पीले मैले के ढेर को बाल्टी में भर लिया फिर आले कोइ झाड़ू से साफ भी किया। यह सब उसे बेहद अजीब लगा, लेकिन दद्दा एक-एक कर सभी क्वार्टरों पर जाते गए। धीरे-धीरे उनकी बाल्टी उसी पीले मैले से भर गई, जिसे वे दूर झाड़ियों में जाकर खाली कर आए थे।
....इस काम के दरमियान न दद्दा बोले, न उसने कुछ पूँछा; वह बस चुपचाप उन्हें यह काम करते देखता रहा। लेकिन बाल्टी खाली करके लौटे तो एक पल के लिए उसे घूरा था। उनका वह घूरना उसे आज भी याद है। उस दिन दद्दा की आँखों में नाराजगी थी। वहां से वे सीधे हैंडपंप पर आए। अपने सभी सामान धोए फिर नहाए। और उसे भी नहलाए। इसके बाद वह कभी दद्दा के साथ कॉलोनी की ओर नहीं गया।"
रमेसर के परदादा
दद्दा तब तेरह या चौदह साल के थे, पिता बद्दन, जिन्हें वे बप्पा कहते थे, के साथ पाकिस्तान से सन पचास में भारत आए! उनका घर सिंध में कराची के पास था। सफाई करना उनका पेशा था। बटवारे के समय उन्हें हिंदू बताकर पाकिस्तान छोड़ने के लिए कहा गया लेकिन जब मुसलमानों ने मल उठाने और सीवर की सफाई करने से इनकार कर दिया तो इस कार्य को आवश्यक सेवा मानकर वहां की सरकार ने बद्दन को जाने नहीं दिया था।
फिर बद्दन भारत क्यों आए? दद्दा ने बताया था-
बँटवारे के समय उँची जात वाले भारत चले गए। इससे बप्पा भी खुश थे कि अब अछूत होने का अपमान नहीं सहना पड़ेगा। लेकिन मुसलमानों ने उनकी जात वालों से वही भेदभाव वाला सुलूक करना शुरू कर दिया जो ऊँची जात वाले हिंदू करते थे। इससे आजिज उनकी बस्ती के लोगों में इसाई बनने की जैसे होड़-सी लग गई थी।
बप्पा की खुशफहमी जैसे टूट गई। अब परंपरा और रीति-रिवाज मानाना भी जैसे मुश्किल हो चला था। बप्पा कहते, स्वर्ग में गुलामी से अच्छा है नरक की आजादी! और एक दिन परिवार के साथ किसी तरह सीमा पारकर वे भारत में आ गए थे।
फिर चार साल परिवार को लेकर दिल्ली में एक शिविर में रहे। उसी समय यह ब्लॉक बना सरकार ने बद्दन को यहां सफाई की नौकरी पर भेज दिया और रहने के लिए यह कोठरी मिली।
अंत में दद्दा ने कहा था, 'तबसे यही हमारा घर है।'
दद्दा ने जिज्ञासा शांत कर दिया था। लेकिन ‘पाकिस्तान’ सुनकर उसे कुछ याद आया! दद्दा से पूँछा था,
“बाल्टी वहाँ क्यों खाली किए दद्दा, वहाँ तो सब लड़िकन खेलने जाते हैं…जानते हो! हमारी गेंद चली गई थी वहाँ, विज्जू उसे लाने गया तो उसका पैर उसमें छपाक से पड़ गया, इसे वहाँ न फेंका करिए।”
दद्दा एक पल रुककर बोले थे -
“बचवा, इसे कहां गिराऊँ? कोई ऐसी जगह भी नहीं यहां। एक दिन उस खेत के कोने में बाल्टी उलट दिया तो खेत-मालिक ने बहुत गरियाया था।"
उस दिन दद्दा की बात सुनकर उसके मन में एक चिनगारी सी उठी थी। फिर उसने दद्दा की ओर देखा था।
दद्दा के बूढ़ाते शरीर पर पीढ़ियों से हो रहे अपमान का दंश था। वे 'वीतरागी‘ से जान पड़ते!
एक बार दद्दा से जब कहा,
“दद्दा मुझे घिन आती है, मत करो यह काम।”
तो यह बोलकर कि “इससे क्या घिनाना! यह तो हमारा कर है यही रोजी है” दद्दा ने उसे चुप करा दिया था। जैसे वे कहना चाह रहे थे कि 'अपमान-तिरस्कार की पीड़ा से मुक्ति इसे सहने की आदत में है।"
रमेसर की मुट्ठियां भिंच गईं, उसने देखा-
छेनीवाला टैंकर का पाइप खींचकर सेप्टिक टैंक के मेनहोल की ओर ले जा रहा है और एक साथी वैक्यूम पंखा चलाने के लिए ट्रैक्टर पर चढ़ रहा है।
सीवर का गाढ़ापन !
रमेसर ने छेनीवाले से सक्शन-पाइप अपने हाथ में ले लिया और पाइप खींचकर सेप्टिक टैंक की गहराई में उतार दिया। उधर वैक्यूम फैन भी चलने लगा था। इसके साथ ही सेप्टिक टैंक से पानी सुड़कना शुरू हो गया था।
रमेसर मेनहोल में झांक रहा था। यह उसकी व्यवसायगत ईमानदारी ही थी कि वह टैंक की सफाई अच्छे से होते देखना चाहता था।
अब तक सांझ भी स्याह हो चली थी। बल्ब भी जलने लगा था। इसकी रोशनी में उसका चेहरा साफ दिखाई पड़ रहा था। इस चेहरे पर शांति और गंभीरता की खामोशी थी। ‘वे’ ने सोचा कि चार लोगों की टीम होते हुए भी सीवर का वैक्यूम-पाइप रमेसर स्वयं अपने हाथ में लिए है जबकि वह किसी को भी यह पाइप दे सकता था! आखिर अपनी टीम का स्वयं लीडर भी है वह। लेकिन नहीं जैसे किसी इबादत में हो किसी को यह पाइप नहीं देगा वह!! इधर सेप्टिक टैंक में धीरे-धीरे पानी कम होने से ‘सीवर’ का गाढ़ापन भी झलकने लगा था।
लेकिन रमेसर की आँखों में ‘वे’ झाँक नहीं पाए। जबकि सेप्टिक टैंक में देख रहीं उसकी ये आँखें सजल थीं! कैसे इस पाइप को छोड़ दे वह! नहीं छोड़ेगा इसे। चाहे सेप्टिक टैंक हो या गटर, सीवर को खाली करते समय वह ऐसे ही पाइप अपने हाथ में पकड़ लेता है, इसे किसी को तब तक नहीं छूने देता जब-तक ‘कीचड़’ भी पूरी तरह से न निकल जाए! सेप्टिक टैंक में ‘सीवर’ की ओर झांंकती उसकी इन सजल आँखों को किसी ने नहीं देखा, ‘वे’ ने भी नहीं। अपने पप्पा के लिए उसका यह काम इबादत ही तो है, यह काम ही पप्पा के प्रति उसकी सच्ची श्रद्धांजलि है! उसने पाइप पर अपने हाथों का पकड़ और भी मजबूत किया जिससे कि यह पाइप उससे कोई और न लेने पाए!!! ।।६।।
“यह भिखमंगई ठीक नहीं बाबा, इससे अच्छा तो फिर यह मैला ढोने का काम है..कम से कम इसमें कुछ करके तो कमाना है” दद्दा से यही कहा था पप्पा ने उस दिन। दद्दा की इच्छा थी कि पप्पा शहर में स्वीपर की नौकरी कर लें लेकिन पप्पा इसके लिए तैयार नहीं हो रहे थे जबकि दद्दा इसे अपनी जाति का पुश्तैनी काम बताते। इससे पप्पा चिढ़ उठते। जाति का पुश्तैनी काम को लेकर उनमें एक अजीब सी छटपटाहट थी। इस छटपटाहट से मुक्ति पाने वह शहर में दिहाड़ी खोजने चले जाते। लेकिन वहाँ भी न टिकते। वापस आकर घर में पड़े रहते। एक बार उन्हें अम्मा से कहते सुना था, “क्या कींचड़ में लिथड़ी इस जाति को उतारकर हम फेंक नहीं सकते?” उस दिन पप्पा की बात वह समझ नहीं पाया था। लेकिन वर्षों बाद उसे यह समझ में आया था कि जाति भविष्य निर्धारित करती है! पप्पा निरक्षर थे, सोचते और केवल घुटते।
त्योहार के दिन दद्दा पास के गाँव में जाते और त्योहारी लेकर लौटते। उस दिन उनकी गठरी में ढेर सारी पूरियां कचौरियां और अन्य खाने की चीजें होती। ऐसे ही एक दिन कोई बड़ा त्योहार था। ब्लाक कालोनी में सन्नाटा था। वह भी उनके साथ गाँव में गया था। लौटकर दद्दा घर आए तो पप्पा गुस्से में उनसे बोले थे कि, यह अच्छी बात नहीं कि घरों के सामने हाथ पसार खड़े हो जाओ। यह भिखमंगई ठीक नहीं बाबा! इससे अच्छा तो फिर यह मैला ढोने का काम है कम से कम इसमें कुछ करके तो कमाना है!
उसने देखा था, दद्दा गांव के कुछ ‘बड़े’ लोगों के घर बारी-बारी गए थे। वह इनके दरवाजे पर जाकर खड़े हो जाते। कुछ देर प्रतीक्षा के बाद घर में से कोई निकलता और उनकी चादर में ऊपर से त्योहारी डाल देता। धीरे-धीरे यह चादर गठरी में बदल गई थी। उसने यह भी गौर किया था कि इस दौरान लोग दद्दा को छूने से परहेज करते। उन्हें दूर बैठाते थे। फिर भी दद्दा को देखते ही गाँव के लोग उनका हालचाल पूँछते।
पप्पा की बात पर दद्दा ने कोई ऐतराज नहीं जताया। लेकिन बोले थे, “देख दिन्ने, यह भिखमंगाई नहीं, इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना भी होता है। यदि किसी त्योहार पर नहीं गया तो बाद में गांव के ये लोग मुझसे पूँछते हैं कि त्योहार के दिन मैं क्यों नहीं दिखाई दिया। दिन्ने! एक बात और! गाँव में आज तक किसी ने मेरा अपमान नहीं किया है। इन लोगों के यहाँ शादी विवाह में सूप देने की परिपाटी मैं ही निभाता हूँ उस समय ये मुझे नेग-चार देना नहीं भूलते…दिन्ने!”
“उसके दद्दा और पप्पा दो छोर पर खड़े थे। एक की जीवन के प्रति संवेदनशीलता परंपरा और संस्कार के खांचे की बंदी है तो दूसरा इस खांचे की जकड़न से बाहर आने के लिए छटपटा रहा है। यह पीढ़ी के अंतर का लक्षण नहीं बल्कि अस्तित्व के अनुभूति की स्वत:स्फूर्त चेतना है, जो किसी परंपरा या संस्कार की मोहताज नहीं। इन दोनों के द्वंद्व के बीच रमेसर खड़ा है।” यह ऑब्जर्वेशन लेखक का है।
सेप्टिक टैंक में पानी चार फीट नीचे जा चुका था। इसे दिखाकर रमेसर ने ‘वे’ से कहा, इसमें दो टैंकर सीवर था..एक हो गया है दूसरा चक्कर भी होगा?” उसने ‘वे’ को टैंकर में लगा पारदर्शी नली का वह संकेतक दिखाया जिसमें पानी ऊपर तक चढ़ा था। इसे देखकर ‘वे’ ने टैंकर फुल होने पर अपनी भी सहमति जता दिया। रमेसर ने ‘दूसरा चक्कर’ इस अंदाज में कहा था जैसे वह इसकी अनुमति लेना चाहता था। ‘वे’ ने भी कह दिया कि, पूरा सेप्टिक टैंक खाली होना चाहिए। ।।७।।
‘वे’ की प्रेषित रिपोर्ट
रमेसर से इशारा पाकर छेनीवाले ने टैंकर का नोजल बंद किया और पाइप हटाया। स्वयं रमेसर ने भी सेप्टिक टैंक से पाइप बाहर निकाला। अब उसे टैंकर खाली करना था। पास में खेत थे। ज्यादा दूर न जाना पड़े इसलिए इन खेतों में ही टैंकर का सीवर गिराने की सोचा। लेकिन खेत मालिक नाराज होंगे, कहकर ‘वे’ ने इसे कहीं और गिराने का सुझाव दिया। लेकिन खेत के लिए यह खाद होता, बोलकर रमेसर इसे अँधेरे में कहीं और गिराने पर तैयार हो गया। वह भी ट्रैक्टर के साथ गया। गाँव से बाहर एक सूनसान जगह पर, जहां लोगों की आवाजाही लगभग न के बराबर थी, घुप अँधेरे में उसने वहीं टैंकर खाली करा दिया।
‘वे’ का अंदाजा था कि टैंकर खाली होकर आधे घंटे में लौटेगा लेकिन पंद्रह मिनट में ही ट्रैक्टर लौट आया। एक बार फिर रमेसर के सभी साथी काम में जुट गए। एक ने पाइप टैंकर के नोजल में लगाया तो छेनीवाला इसके दूसरे छोर को सेप्टिक टैंक के मेनहोल में लटकाने लगा। इस बीच दूसरे साथी ने ट्रैक्टर स्टार्ट कर वैक्यूम फैन चालू कर दिया। रमेसर ने सक्शन पाइप अपने हाथ में ले इसे सेप्टिक टैंक की गहराई में उतार दिया। टैंकर द्वारा सीवर सुड़कना शुरू हो गया था।
‘वे’ सेप्टिक टैंक के इस सफाई कार्य पर अपनी नज़र क्यों गड़ाए हैं? लेखक इस प्रश्न पर पाठकों को कुछ बताना चाहता है! दरअसल ‘वे’ एक सामाजिक संस्था से जुड़े हैं जो मैनुअल स्केवैंजिंग पर काम करती है। कुछ दिन पहले इन्होंने अपनी इस संस्था को एक रिपोर्ट में बताया था कि मैनुअल स्केवैंजरों की संख्या शून्य है अर्थात अब कोई हाथ से मैला नहीं ढोता। यही नहीं, हाल ही में एक गोष्ठी में शासन के नुमाइंदों से भी इन्होंने यही कहा था। लेकिन आज सेप्टिक टैंक का यह सफाई कार्य देख ‘वे’ थोड़ा कन्फ्यूज़ हैं कि वह रिपोर्ट सही है या नहीं!
फिर यह याद करके कि इन्स्ट्रूमेंट की सहायता से सीवर सफाई करने वाला मैनुअल स्कैवेंजर नहीं माना जाता। उनका संदेह दूर हो गया। मतलब रमेसर और उसके साथी मैनुअल स्केवैंजर नहीं है। क्योंकि ये लोग बाकायदे मशीन से सेप्टिक टैंक की सफाई कर रहे हैं। लेकिन उनकी दृष्टि में सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले ‘असाधारण’ लोग होते हैं। लेकिन उन्हें चिंता हुई कि कहीं यह ‘असाधरणता’ भी किसी ‘खांचे’ की शक्ल न अख्तियार कर ले! जाति और पेशे का!!
‘वे’ के इस चिंतातुर मन से बेखबर रमेसर ने मेनहोल में झाँकना चाहा। लेकिन उसके ठीक ऊपर जलते बल्ब की रोशनी मेनहोल से सेप्टिक टैंक के भीतर नहीं पहुँच रही थी। उसने मोबाइल फोन का टार्च ऑन कर इसमें देखा। टैंक में सीवर गाढ़ा दिखाई पड़ा। इसकी सकिंग मुश्किल है सोचकर, उसने ‘वे’ से एक बांस लाने के लिए कहा। ‘वे’ बांस लेने चले गए। उन्हें बारह से पंद्रह फीट की लंबाई का बांस चाहिए था जिससे रमेसर टैंक में सीवर को हड़होरा सके। यह बांस खोजने पर भी नहीं मिल रहा था जबकि पंद्रह-बीस वर्ष पहले घर के इधर-उधर पड़े ऐसे बांस आसानी से मिल जाते थे। इधर रमेसर पास के चबूतरे पर बैठकर उनके लौटने की प्रतीक्षा करने लगा था। ऐसे गाढ़े सीवर में तो पप्पा बेहिचक उतर जाते थे! उसे पप्पा याद आए। ।।८।।
पप्पा और एरिक
उस दिन पप्पा नहीं उनका शरीर आया था घर। बीडीओ ऑफिस के ठीक पीछे ब्लॉक परिसर में वह क्वार्टर था। सबसे अलग-थलग अकेले में बनी उपेक्षित सी एक कमरे की यह कोठरी दद्दा को रहने के लिए मिली थी। दद्दा ने इसके सामने टटिया की बाउंड्री से घेर बना लिया था। तब कक्षा सात में था वह। यहाँ से उसका स्कूल दो किमी दूर था। उस दिन स्कूल से लौट रहा था। जैसे ही ऑफिस के पीछे पहुँचा उसे घेर के सामने कुछ लोग खड़े दिखाई दिए थे। सब मौन थे, सबके चेहरे पर एक अजीब खामोशी थी! लोग हों और फिर भी खामोशी हो! तो अनहोनी घटित होने की आशंका प्रबल हो उठती है! उसे घबराहट हुई। भागते हुए वह इस घेर में पहुँचा था। वहाँ पप्पा जमीन पर लेटे थे और अम्मा उनके सिरहाने बैठी थीं। पप्पा सुबह उसके स्कूल जाने के पहले ही काम पर निकल गए थे। वे अम्मा से कह भी रहे थे कि आज तबियत कुछ नासाज है। फिर भी काम पर चले गए थे। वह कुछ समझ पाता कि दद्दा ने उसे अँकवार में भर लिया था, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। अम्मा दहाड़ें मारकर रो पड़ीं थीं।
पप्पा के मन में क्या चलता था दद्दा अनजान रहते। पप्पा स्वीपर नहीं बनना चाहते थे। इसे जाति से जोड़ा जाता है, यह रंज था उन्हें। वे कहते मैं स्वीपर नहीं मजदूर बनना चाहता हूं क्योंकि मजदूर की कोई जाति नहीं होती। इसीलिए वे शहर में मजदूरी करने निकल जाते। लेकिन मजदूर भी नहीं बन पाए थे। मजदूर बनने की कोशिश में जाति और पुश्तैनी पेशा आड़े आ जाता। एक बार गुस्से में भर कर उन्होंने अम्मा से कहा था, मेरी जाति मेरे माथे पर कलंक है। यह बोझ लेकर मैं नहीं घूम सकता। आखिर में विवश होकर उन्होंने शहर जाना छोड़ दिया था। ऐसे ही साल दर साल गुजरे थे। दद्दा उन्हें निठल्ला कहने लगे। अचानक एक दिन इस निठल्लई से ऊबकर पप्पा स्वीपर बनने के लिए तैयार हो गए थे। क्या करते! जीवन की उस अँधेरी सुरंग से निकलने के लिए जब किरण नहीं मिली तो उसी सुरंग में रहना उन्होंने अपनी नियति मान लिया। वे शहर गए और नगरपालिका के एक सफाई ठेकेदार ने उन्हें अपनी टीम में रख लिया था।
‘वे’ को बांस लेकर लौटने में देर हो रहा है। वह अपने अतीत में चला गया। पप्पा की मौत के बाद उसका मन पढ़ने में न लगता। किसी तरह एक साल और पढ़ पाया था। कक्षा आठ के बाद तो स्कूल जाने से ही उसका मन उचट गया था। इसके कई कारण थे। अम्मा दुखी दिखाई देती, घर में हमेशा मनहूसियत छाई रहती। दूसरी सबसे बड़ी बात यह भी थी कि स्कूल में भी उसे सबसे अलग-थलग रहना पड़ता, वह चाहकर भी अन्य छात्रों से घुल-मिल नहीं पाता था। उसे पप्पा की यह बात कि जाति माथे पर कलंक है, एकदम सही लगता। फिर भी कक्षा आठ तक पढ़े होने के कारण उसके अंदर पढ़ने की प्रवृत्ति आ गई थी। वह अकसर देश-दुनिया में उसके इस व्यवसाय पर क्या बातें हो रहीं है, इसपर खबर जरूर पढ़ता।
अचानक उसे एरिक की याद आई इसके बारे में कभी अखबारों में पढ़ा था। एरिक पाकिस्तान के सिंध में परदादा की जन्मभूमि का निवासी था। एरिक के पूर्वज उसकी ही जाति के थे जो कई पीढ़ियों पहले ईसाई बन गए थे। लेकिन धर्म बदल लेने बाद भी वहाँ वह भेदभाव का शिकार है। आज भी एरिक को गटर और सीवर में घुसना पड़ता है। जबकि अपने देश भारत में आज उसका सक्शन मशीन वाला सफाई व्यवसाय है। उसे याद है उस एरिक की तरह कभी पप्पा भी शहर से लौटने के बाद अम्मा से यही बताते कि “जब सीवर में घुसता हूँ तो तिलचट्टों से घिर जाता हूँ ये मेरे शरीर पर दौड़ने लगते हैं!” शायद स्वप्न में भी ये तिलचट्टे उन्हें अपने शरीर पर रेंगते दिखाई पड़ते इसीलिए कभी-कभी रात में सोते से अचानक उठकर वे अपना शरीर झाड़ने लगते!! यही नहीं उसने स्वयं देखा था कि शहर से लौटने के बाद पप्पा बार-बार अपना हाथ धोते, उनकी इस आदत से परेशान होकर एक बार अम्मा ने उन्हें कुछ कह दिया तो वे कहने लगे थे कि “क्या करूँ..मेरे हाथों में जैसे मैले की बदबू आती रहती है, इसीलिए बार-बार हाथ धोना पड़ता है!” ।।९।।
मौत का कुंआ
रमेसर के मोबाइल की रिंगटोन बजी। वह फोन पर बात करने में मशगूल हो गया। इसी समय ‘वे’ भी बाँस लेकर आए थे। उन्हें फोन पर रमेसर किसी को अगले दिन साँझ का समय देते सुनाई पड़ा। इससे ‘वे’ ने अनुमान लगाया कि साफई व्यवसाय में रमेसर को काम मिलने की कमी नहीं है। यह बातचीत खतम कर रमेसर ने छेनीवाले से समरसेबल चलाने के लिए कहा। उसने पंप चलाया और इसका पाइप मेनहोल पर रख दिया। पानी टैंक में गिरने लगा। ‘अब वैक्यूम सक्शन पाइप सीवर को अच्छे से सुड़क लेगा’, बोलकर रमेसर ने ‘वे’ से बाँस ले लिया।
उत्सुकतावश ‘वे’ ने भी मेनहोल में झांका। सेप्टिक टैंक की तली पर मल वाला गाढ़ा ‘कीचड़’ जमा था। वे समझ गए कि रमेसर बाँस की मदद से इस कीचड़ को पानी में मिलाकर पतला करना चाहता है, जिससे सक्शन पाइप इसे आसानी से सुड़क पाए। लेकिन ‘वे’ ने यह सोचकर ‘यदि कोई टैंक में उतर कर यह काम कर दे तो इसकी साफई और अच्छे से हो जाएगी,’ रमेसर को देखने लगे। रमेसर हाथ में बाँस लिए अपने पप्पा को याद कर रहा था। पप्पा के जमाने में सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए आज के जैसा वैक्यूम सक्शन टैंकर वाली यह मशीन नहीं थी, जो उसके पास है। पप्पा सेप्टिक टैंक में उतर जाते थे। वे सेप्टिक टैंक से इस गाढ़े कीचड़ को बाल्टी में भर-भरकर बाहर निकालते थे। तब उनका पूरा शरीर सीवर के कीचड़ में लथपथ हो उठता! लेकिन उसे आश्चर्य होता कि जाति और इस पेशे को माथे पर कलंक कहने वाले पप्पा कैसे नि:संकोच सेप्टिक टैंक में डूबकर सफाई कर पाते थे!
लेकिन सन तिरानबे या चौरानबे के आसपास की बात होगी। अचानक कुछ दिन से उनका शहर जाना बंद हो गया था। फिर एक दिन पप्पा को दद्दा से यह कहते सुना कि सरकार के डर से ठेकेदार काम पर नहीं बुलाता। उस दिन उन्होंने दद्दा से यह भी कहा था कि सरकार ने हाथ से मैला ढोने और आदमी के सीवर में घुसने पर रोक लगा दिया है। अब कोई दूसरा काम करेंगे। लेकिन दो-चार महीने बीते होंगे कि पप्पा फिर से सीवर सफाई के काम से शहर जाने लगे थे।
उसे याद है, उन दिनों पप्पा अकसर बीमार रहते। डाक्टर साहब ने उनकी बीमारी का कारण सीवर में घुसना बताकर उन्हें सेप्टिक टैंक में उतरने से मना किया था। लेकिन वे नहीं मानते थे। अम्मा के टोकने पर कहते, ‘बप्पा भी अब रिटायर हो गए हैं, काम पर जाना जरूरी है और इस काम के सिवा उनके लिए कोई दूसरा काम भी तो नहीं।’ उस दिन उनकी तबियत कुछ ज्यादा खराब थी। अम्मा ने उन्हें काम पर जाने से रोका था। दद्दा भी समझाए थे। लेकिन यह कहकर कि “आज एक बड़े सेप्टिक टैंक की सफाई होना है, न जाने से ठेकेदार नाराज होगा” वे सुबह-सुबह शहर चले गए थे। उस दिन वह सेप्टिक टैंक उनके लिए मौत का कुंआ बन गया था। सबसे पहले वही उतरे थे उसमें!
लोग बताते थे कि उस दिन सेप्टिक टैंक में उतरते ही पप्पा बेहोश हो गए थे। अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो घबड़ाहट में उनके एक साथी उन्हें देखने सेप्टिक टैंक में उतर गए थे। लेकिन अंदर जाते ही वे भी बेहोश हो गए थे। लोगों ने शोर मचाया तो भीड़ इकट्ठी हो गई थी। ठेकेदार तो वहाँ से भाग निकला था। जैसे-तैसे लोगों ने उन्हें सेप्टिक टैंक से बाहर निकाला था और अस्पताल पहुँचाया। लेकिन पप्पा और उनके वे साथी, दोनों नहीं बच पाए थे। कहते हैं कि उनकी मौत सेप्टिक टैंक में ही हो गई थी। बहुत दिनों तक दद्दा और अम्मा थाना से लेकर कचहरी तक अधिकारियों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन मुआवजा नहीं मिला। बाद में पता चला कि पप्पा की इस मौत के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं माना गया।
उस दिन वह घेर में पहुँचा तो वहाँ के दृश्य देखकर जैसे उसे काठ मार गया था! वह जड़वत अम्मा का रोना और दद्दा के आँसू देखता रहा। फिर अचानक उसका ध्यान पप्पा के पहने कपड़े पर चला गया था। सीवर के कीचड़ से लिथड़े वे कपड़े उनके मृत शरीर से चिपके पड़े थे! इसे देख उसकी आँखें डबडबा आई थीं!! फिर न जाने क्यों उसने अपनी बाँह से वे आँसू पोंछ डाले थे!! वह नहीं रोया। ।।१०।।
पुनर्वास
सक्शन पाइप के मुहाने के पास कपड़ेनुमा चीज देख रमेसर की तंन्द्रा टूटी! यह पाइप में न फंसे, इसे बाँस से दूर किया। छेनीवाला यह देख रहा था। उसने रमेसर से बाँस ले लिया और इसमें फंसाकर इस कपड़े को सेप्टिक टैंक से बाहर निकाल दिया। और बाँस को सेप्टिक टैंक में इधर-उधर घुमाने लगा। जिससे गाढ़ा सीवर पानी में घुले और सक्शन पाइप इसे पूरी तरह खींच ले। सीवर अब पतला हो गया था। बीच-बीच में वह सक्शन पाइप को भी सेप्टिक टैंक की तली पर इधर-उधर रखने लगा जिससे पाइप अब टैंक में बचा सीवर आसानी से सुड़क ले।
इस रमेसर की थोड़ी कहानी लेखक उसकी स्मृतियों में जाकर कहना चाहता है। सन ९३ में हाथ से मैला ढोने और सेप्टिक टैंक में घुसकर सफाई करने जैसे रोजगार पर सरकारी रोक तो थी लेकिन सन २०१३-१४ में इस रोक के साथ साथ सफाई कर्मियों के लिए पुनर्वास योजना भी लागू हुई। जाति और पेशा से मिले कर्म-संस्कार की बाड़बंदी में कैद दद्दा हाथ से मैला ढोने को अपनी नियति मान बैठे थे। वहीं पप्पा के मन में इस नियति के प्रति जबरदस्त आक्रोश था। गरिमाहीन इस बाड़बंदी से मुक्ति के लिए वे छटपटाते रह गए! दद्दा और पप्पा की पीड़ा का अहसास उसे बाद में हुआ। इससे उबरने के उपायों पर वह हमेशा ठंडे मन से विचार करने लगा था। उसे सेप्टिक टैंक सफाई के लिए नई तकनीक भी दिखाई पड़ने लगी थी। इसी बीच सरकार की पुनर्वास योजना से उसके लिए एक नए विकल्प का द्वार खुल गया। जैसे-तैसे करके उसने हाथ से मैला ढोने या सीवर साफ करने वालों के पुनर्वास की बन रही सूची में अपना भी नाम शामिल कराया। इस योजना में उसे चालीस हजार रुपए मिले थे। इसके बाद उसने सेप्टिक टैंक सफाई व्यवसाय के लिए कौशल प्रशिक्षण भी लिया। इस प्रशिक्षण लेने के भी उसे तीन हजार रुपए मिले। फिर बैंक से पाँच लाख का कर्ज लेकर उसने खुद का सफाई व्यवसाय शुरू किया। आज वह ट्रैक्टर के साथ इस वैक्यूम सक्शन टैंकर वाली मशीन का मालिक है।
शुरुआत में सीवर टैंकर के ट्रैक्टर की ड्राइवरी के लिए कोई तैयार न होता। एक आदिवासी लड़का ड्राइवरी के लिए तैयार हुआ, लेकिन उसकी शर्त सक्शन पाइप को न छूने की थी! अन्य काम जैसे सक्शन पाइप फैलाना, इसे टैंक में ले जाना और धोकर पाइप को समेटना वह स्वयं करता। आरंभ में ज्यादा काम नहीं था, जो कमाई होती उसका ज्यादातर हिस्सा लोन चुकाने और ड्राइवर पर खर्च हो जाता। लेकिन शुष्क शौचालय के निर्माण पर पूर्ण रोक होने से सेप्टिक टैंक के साथ फ्लश वाले शौचालय बनने लगे थे। क्या नगर और क्या गाँव! शौचालय निर्माण में जैसे क्रांति आ गई थी क्योंकि सरकार ने भी खुले में शौच जाने के विरूद्ध जागरूकता अभियान छेड़ा हुआ था। धीरे-धीरे यह सफाई का काम बढ़ने लगा था। अब एक ऐसा आदमी चाहिए था जो सक्शन पाइप को टैंकर से जोड़े, फैलाए और समेटे। मुश्किल से एक लड़का ‘कींचड़’ न छूने और सामान्य से कुछ ज्यादा मजदूरी पर तैयार हुआ। लेकिन अभी भी सीवर टैंक से ‘कीचड़’ की सफाई उसे ही करना होता और ‘कीचड़’ से लथपथ सक्शन पाइप भी धोता। जबकि उसके अन्य दो साथी तमाशबीन बने रहते! बावजूद इसके कि वह अपनी इस सफाई टीम का मालिक भी था। इससे उसके स्वत्व-बोध को ठेस पहुँचता! अब उसमें श्रेष्ठता-बोध भी जाग रहा था। इस बदली मन:स्थिति में अकसर मिलते काम को भी वह ठुकरा देता। उसने एक तीसरे आदमी को तलाशना शुरू किया जो सीवर का ढक्कन खोलने से लेकर टैंक के अंदर के सीवर को साफ करने में उसका सहयोग करे तथा सीवर ‘छूने’ से भी उसे परहेज़ न हो!
रमेसर अपनी ही कहानी अपनी स्मृतियों में देख रहा है। वह वर्तमान में आया। छेनीवाले को तन्मय होकर सेप्टिक टैंक में इधर-उधर पाइप घुमाते देख उसने सोचा, यदि यह न मिला होता तो सेप्टिक टैंक सफाई वाला यह बिजनेस परवान न चढ़ पाता। फिर उसकी ओर देखते हुए रमेसर उसके ‘बड़के दिमाग’ पर मुस्कुरा उठा! ।।११।।
छेनीवाला आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है!
पहली नजर में पागल ही समझ लिया था इसे! चेहरे और हाव-भाव से यह कुछ ऐसा ही था। इसके पहले जिन दो लोगों को अपनी टीम में शामिल किया उनकी जाति पूँछकर किया था। लेकिन इसकी जाति पूँछने की नौबत ही नहीं आई। गाँव की बस्ती से दूर सेवार में एक कमरे का इसका घर देखकर पहले यही पूँछा लिया था कि बस्ती से दूर यहाँ घर क्यों बनाया, तो इसने छूटते ही कहा था “मेरी कोई जाति नहीं है मैं जाति से बाहर हूँ इसलिए।” इस जवाब पर इससे फिर सीधे सेप्टिक टैंक सफाई टीम में शामिल होने के लिए पूँछ लिया था। इसके लिए यह सहर्ष तैयार भी हो गया था!
इधर ‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा’ सुनकर ‘वे’ ने रमेसर की ओर देखा। वह रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है। लेकिन ‘वे’ को यह देखकर कुछ अजीब लगा कि रमेसर के दो अन्य साथी भी वहाँ थे जो इस ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे और वह भी इनसे ढक्कन नहीं हटवा रहा था जैसे ये इस ढक्कन को छूना नहीं चाहते हों! छेनीवाले ने यंत्रवत वही किया जो रमेसर ने कहा। उसने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। अब पूरा मेनहोल खुल गया था। रमेसर ने इसमें झांककर अंदाजे से बोला कि इसकी गहराई लगभग आठ फीट। ‘वे’ इसकी गहराई जानते थे इसलिए ‘हाँ’ कह दिया था।
‘घर’ को लेकर इसकी जिज्ञासा कैसे शांत हुई होगी! इसका उत्तर इसके बचपन की कहानी में है। सेप्टिक टैंक में झाँक रहे रमेसर को देखकर ‘वे’ ने सोचा।
घर पहुँचते ही बस्ता फेंककर वह दद्दा को ढूंढने लगा। उन्हें झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा से पूँछा। पता चला बिलाक कालोनी गए हैं आते होंगे। वह घर के बाहर खड़ा उनका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद दद्दा उसे आते दिखाई पड़े तो वह उनकी ओर लपका लेकिन उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक पड़ा। दद्दा यह काम दोपहर से पहले कर लेते हैं! सोचकर वह मुड़ गया और धीमें कदमों से हैंडपंप पर चला गया। वह जानता था कि दद्दा सीधे यहीं आएंगे। दद्दा हैंडपंप पर ही गए। नल के नीचे उन्होंने झाड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन रखा वह हैंडपंप चलाने लगा। लेकिन उत्कंठा में वह बेचैन था। हैंडपंप चलाते-चलाते उसने पूँछा, दद्दा, पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे!
दस साल के बच्चे रमेसर से दद्दा को ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी। बाल्टी धोते-धोते उनके हाथ रुक गए। विस्फारित आँखों से उसे देखने लगे। उसने भी हैंडपंप चलाना रोक दिया और अपना प्रश्न दोहराया। दद्दा, पंडी जी कह रहे थे कि बिलाक आजादी के बाद बना तो बिलाक बनने से पहले हमारा घर कहाँ था।
“पाकिस्तान..हाँ हमारा घर पाकिस्तान में था।” बिना लाग-लपेट के दद्दा ने बोल दिया। यह सुनते ही रमेसर ने फिर हैंडपंप चलाना शुरू कर दिया और दद्दा ने बाल्टी धोना।
उस स्त्री को देखते ही उसने समझ लिया था कि सामने खड़ा यह व्यक्ति (छेनीवाला) सूरत और सीरत से एक जैसा नहीं है। तभी इससे उस बियाबान में घर बनाने का कारण पूँछा था।
उस दिन यह छेनीवाला खुशी-खुशी उसके साथ हो लिया था। कितनी मजदूरी मिलेगी, यह भी नहीं पूँछा था इसने। इसे छेनी-हथौड़ा देकर सबसे पहले मेनहोल का ढक्कन खुलवाया था और बिना हिचक के इसने वे सारे कार्य किए थे जिसे आज यहाँ कर रहा है। उस दिन जब काम पूरा होने के बाद घर के मालिक से इसने बख्शीश मांगा तो पहली बार इसके ‘बड़के दिमाग’ से परिचय हो गया था। यह बख्शीश मांगने की बात स्वयं उसके दिमाग में कभी नहीं आई थी। बख्शीश में इसे सौ रुपए मिले थे। इसे मिलाकर एक घंटे की मेहनत के उस दिन इसे साढ़े तीन सौ रूपए मिले तो यह बहुत खुश हुआ था। और पहले दिन से ही यह छेनीवाला बन गया था। तभी से सफाई का उसका यह बिजनेस भी दौड़ पड़ा है।
जाति या कूबड़वाली स्त्री के बारे में बात कर पाने की मनोदशा में छेनीवाला कभी नहीं मिला। उसे संदेह था कि ऐसी बातचीत से नाराज़ होकर यह काम भी छोड़ सकता है। लेकिन एक दिन जब इसने कहा कि उसकी औरत एक अनाथ बच्चा पालना चाहती है तो उसे विस्मय हुआ था। आगे फिर छेनीवाले ने यह भी कहा था कि “उसकी औरत को विकलांग पेंशन के पंद्रह सौ रूपए हर महीने मिलते हैं और सफाई के काम की उसे मजदूरी भी मिल जाती है इन पैसों को जोड़कर दोनों आसानी से एक बच्चा पाल लेंगे।” इस बात से वह किंचित आश्चर्य से भर उठा था छेनीवाले की ओर देखकर उसने सोचा था, यह छेनीवाला आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है, इसीलिए इसे आदमियों की बस्ती से दूर रहना पड़ता है! सच में इंसानी जीवन की यह विद्रूपता ही तो है कि लोग अपने ही जैसे इंसान को कितना कमतर आंकने लगते हैं, शायद स्वार्थ-लिप्सा और अहंकार के छल-छद्म में डूबे ये लोग छेनीवाले जैसों को आदमी मानने से भी इनकार कर देते हैं! दद्दा की बात छोड़ भी दें तो स्वयं उसके पप्पा ने भी इन आदमियों के दंश खूब सहे थे!!
छेनीवाले को लेकर उसकी (रमेसर की) जिज्ञासा अभी शांत नहीं हुई थी लेकिन उसके (छेनीवाले के) प्रति अब उसके (रमेसर के) भाव बदल चुके थे। वह छेनीवाले की किसी भी दुखती रग को नहीं छेड़ना चाहता था। लेकिन यह स्वाभाविक है कि पाठक जिज्ञासु होता है! उसकी जिज्ञासा शांत करने के लिए लेखक को अब कहानीकार की भूमिका में उपस्थित होना होगा। ।।१२।।
बऊकपन और छेनीवाला!
पाँच भाइयों-बहनों में सबसे छोटा था छेनीवाला। माँ-बाप के अतिशय लाड़-प्यार और देखभाल के तरीके से इसके मानसिक विकास में बाधा आई। इसे कभी स्कूल भी नहीं भेजा गया। यह मंद-बुद्धि तो नहीं, लेकिन धीरे-धीरे लोग इसे ‘बऊक’ समझने लगे थे। विवाह की उम्र तक आते-आते माँ-बाप भी दुनियां से कूँच कर गए थे और भाई अपने परिवारों में रम गए। अब यह उपेक्षित रह गया था। ‘एक बऊक से कौन अपनी लड़की ब्याहेगा’ जैसी बातें इसके विवाह में बाधक बनी। लोग इसका उपहास भी उड़ाते! कोई इसे बरगलाकर जमीन अपने नाम न करा ले, इस डर से भाईयों ने इसे मृतक बताकर इसके हिस्से की जमीन अपने नाम करा लिया था। बाद में भाई भी गाँव छोड़कर शहरों में रहने लगे थे। इसके समक्ष अब जीवन-यापन की समस्या थी।
इधर ‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा’ सुनकर ‘वे’ ने रमेसर की ओर देखा। वह रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है। लेकिन ‘वे’ को यह देखकर कुछ अजीब लगा कि रमेसर के दो अन्य साथी भी वहाँ थे जो इस ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे और वह भी इनसे ढक्कन नहीं हटवा रहा था जैसे ये इस ढक्कन को छूना नहीं चाहते हों! छेनीवाले ने यंत्रवत वही किया जो रमेसर ने कहा। उसने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। अब पूरा मेनहोल खुल गया था। रमेसर ने इसमें झांककर अंदाजे से बोला कि इसकी गहराई लगभग आठ फीट। ‘वे’ इसकी गहराई जानते थे इसलिए ‘हाँ’ कह दिया था।
‘घर’ को लेकर इसकी जिज्ञासा कैसे शांत हुई होगी! इसका उत्तर इसके बचपन की कहानी में है। सेप्टिक टैंक में झाँक रहे रमेसर को देखकर ‘वे’ ने सोचा।
घर पहुँचते ही बस्ता फेंककर वह दद्दा को ढूंढने लगा। उन्हें झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा से पूँछा। पता चला बिलाक कालोनी गए हैं आते होंगे। वह घर के बाहर खड़ा उनका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद दद्दा उसे आते दिखाई पड़े तो वह उनकी ओर लपका लेकिन उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक पड़ा। दद्दा यह काम दोपहर से पहले कर लेते हैं! सोचकर वह मुड़ गया और धीमें कदमों से हैंडपंप पर चला गया। वह जानता था कि दद्दा सीधे यहीं आएंगे। दद्दा हैंडपंप पर ही गए। नल के नीचे उन्होंने झाड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन रखा वह हैंडपंप चलाने लगा। लेकिन उत्कंठा में वह बेचैन था। हैंडपंप चलाते-चलाते उसने पूँछा, दद्दा, पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे!
इधर ‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा’ सुनकर ‘वे’ ने रमेसर की ओर देखा। वह रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है। लेकिन ‘वे’ को यह देखकर कुछ अजीब लगा कि रमेसर के दो अन्य साथी भी वहाँ थे जो इस ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे और वह भी इनसे ढक्कन नहीं हटवा रहा था जैसे ये इस ढक्कन को छूना नहीं चाहते हों! छेनीवाले ने यंत्रवत वही किया जो रमेसर ने कहा। उसने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। अब पूरा मेनहोल खुल गया था। रमेसर ने इसमें झांककर अंदाजे से बोला कि इसकी गहराई लगभग आठ फीट। ‘वे’ इसकी गहराई जानते थे इसलिए ‘हाँ’ कह दिया था।
‘घर’ को लेकर इसकी जिज्ञासा कैसे शांत हुई होगी! इसका उत्तर इसके बचपन की कहानी में है। सेप्टिक टैंक में झाँक रहे रमेसर को देखकर ‘वे’ ने सोचा।
घर पहुँचते ही बस्ता फेंककर वह दद्दा को ढूंढने लगा। उन्हें झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा से पूँछा। पता चला बिलाक कालोनी गए हैं आते होंगे। वह घर के बाहर खड़ा उनका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद दद्दा उसे आते दिखाई पड़े तो वह उनकी ओर लपका लेकिन उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक पड़ा। दद्दा यह काम दोपहर से पहले कर लेते हैं! सोचकर वह मुड़ गया और धीमें कदमों से हैंडपंप पर चला गया। वह जानता था कि दद्दा सीधे यहीं आएंगे। दद्दा हैंडपंप पर ही गए। नल के नीचे उन्होंने झाड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन रखा वह हैंडपंप चलाने लगा। लेकिन उत्कंठा में वह बेचैन था। हैंडपंप चलाते-चलाते उसने पूँछा, दद्दा, पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे!
इधर ‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा’ सुनकर ‘वे’ ने रमेसर की ओर देखा। वह रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है। लेकिन ‘वे’ को यह देखकर कुछ अजीब लगा कि रमेसर के दो अन्य साथी भी वहाँ थे जो इस ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे और वह भी इनसे ढक्कन नहीं हटवा रहा था जैसे ये इस ढक्कन को छूना नहीं चाहते हों! छेनीवाले ने यंत्रवत वही किया जो रमेसर ने कहा। उसने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। अब पूरा मेनहोल खुल गया था। रमेसर ने इसमें झांककर अंदाजे से बोला कि इसकी गहराई लगभग आठ फीट। ‘वे’ इसकी गहराई जानते थे इसलिए ‘हाँ’ कह दिया था।
‘घर’ को लेकर इसकी जिज्ञासा कैसे शांत हुई होगी! इसका उत्तर इसके बचपन की कहानी में है। सेप्टिक टैंक में झाँक रहे रमेसर को देखकर ‘वे’ ने सोचा।
घर पहुँचते ही बस्ता फेंककर वह दद्दा को ढूंढने लगा। उन्हें झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा से पूँछा। पता चला बिलाक कालोनी गए हैं आते होंगे। वह घर के बाहर खड़ा उनका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद दद्दा उसे आते दिखाई पड़े तो वह उनकी ओर लपका लेकिन उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक पड़ा। दद्दा यह काम दोपहर से पहले कर लेते हैं! सोचकर वह मुड़ गया और धीमें कदमों से हैंडपंप पर चला गया। वह जानता था कि दद्दा सीधे यहीं आएंगे। दद्दा हैंडपंप पर ही गए। नल के नीचे उन्होंने झाड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन रखा वह हैंडपंप चलाने लगा। लेकिन उत्कंठा में वह बेचैन था। हैंडपंप चलाते-चलाते उसने पूँछा, दद्दा, पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे!
दस साल के बच्चे रमेसर से दद्दा को ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी। बाल्टी धोते-धोते उनके हाथ रुक गए। विस्फारित आँखों से उसे देखने लगे। उसने भी हैंडपंप चलाना रोक दिया और अपना प्रश्न दोहराया। दद्दा, पंडी जी कह रहे थे कि बिलाक आजादी के बाद बना तो बिलाक बनने से पहले हमारा घर कहाँ था।
“पाकिस्तान..हाँ हमारा घर पाकिस्तान में था।” बिना लाग-लपेट के दद्दा ने बोल दिया। यह सुनते ही रमेसर ने फिर हैंडपंप चलाना शुरू कर दिया और दद्दा ने बाल्टी धोना।
रमेसर छेनीवाले की इस कहानी से अनजान हो सकता है लेकिन इसकी जाति से अनजान नहीं रह सका! कहीं-कहीं किसी इलाके में सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय छेनीवाले को जानने वाले लोग मिल जाते हैं। ऐसे समय जब रमेसर और छेनीवाले, दोनों के हाथ सक्शन पाइप के ‘कीचड़’ से सने होते हैं तब इन लोगों की छेनीवाले के लिए बातें और व्यवहार इसकी ऊँची जाति बताने के लिए काफी होता है।
वैसे यह कहानी छेनीवाले की नहीं रमेसर की है। रमेसर और छेनीवाला, दोनों के जीवन के शेड भिन्न हैं लेकिन क्या इसपर लिखी इबारत का अर्थ एक है? शायद इस इबारत का अर्थ ‘वे’ को पता हो!! ।।१३।।
रमेसर अपनी अनुभूतियों से अपना चरित्र गढ़ता है !
दरअसल किसी व्यक्ति की चेतना-शक्ति ही अनुभूतियों की पहचान कर पाती है। वह इन्हें चिह्नित और वर्गीकृत कर मानसपटल पर अंकित करती चलती है। इसमें गहरी अनुभूति ही व्यक्ति के मानस पर जीवनपर्यंत अंकित रह पाती हैं। जो उस व्यक्ति की जीवन-दशा को दिशा देती है। यह चेतना-शक्ति अनुभूतियों के संयोजन से निर्मित मनोभाव द्वारा व्यक्ति का चरित्र गढ़ता है। साहित्य में यही ‘करेक्टर’ है। लेखक इन्हीं अनुभूतियों को उकेरकर ‘करेक्टर’ गढ़ता है। इस कहानी में रमेसर भी एक ‘करेक्टर’ है जो स्वयं की चेतना-शक्ति से पायी अपनी अनुभूतियों से अपना चरित्र गढ़ता है। और किसी का चरित्र या उसकी निर्मिति ही उसकी कहानी है, जिसमें मार्मिकता का ‘सूत्र’ होता है लेखक इस सूत्र को पकड़कर चलता है। ‘वे’ रमेसर या छेनीवाले के जिस वर्तमान क्षण के साक्षी हैं, वह रुक्ष है वर्णन है, इसमें ‘कहानी तत्व’ नहीं है। लेकिन जब रमेसर की मार्मिक स्मृतियाँ इस ‘दृश्य’ से संम्पृक्त होती हैं तो ‘वे’ का यह वीक्षण स्वयंमेव कहानी बन जाता है। आज जिस रमेसर को ‘वे’ देख रहे हैं उस ‘रमेसर’ की बनावट के पीछे चेतना-शक्ति प्रदत्त उसके मनोभाव हैं। ऐसे मनोभाव किसी को भी अँधेरे बियाबान से निकलने का रास्ता दिखाते हैं इसलिए रमेसर अपने वर्ग का प्रतिनिधि चरित्र है। अतः यह कहानी केवल उसकी ही कहानी नहीं है उसके वर्ग की कहानी है!
सेप्टिक टैंक की सफाई करते हुए डेढ़ घंटे बीत चुके हैं। इसपर ‘वे’ की नज़र निगरानी के लिए नहीं बल्कि उत्सुकतावश जमी है। रमेसर और छेनीवाला दो नहीं जैसे एक व्यक्ति हों। दोनों का व्यक्तित्व गड्ड-मड्ड दिखाई पड़ रहा था एक दूसरे के काम में सहयोग करते हुए! बल्कि रमेसर के टीम के दो अन्य साथी इस परिदृश्य में अब तक ओझल ही रहे। इसीलिए ‘वे’ की नोटिस में दोनों नहीं हैं। इधर ‘वे’ देख रहे हैं कि रमेसर और छेनीवाला दोनों मेनहोल पर कई मिनट से झुके हैं। दोनों बारी-बारी एक-दूसरे से सक्शन पाइप अपने हाथ में लेकर मेनहोल में झांक-झांककर इसे सेप्टिक टैंक में घुमाते हुए बचा-खुचा सीवर सुड़कवा रहे हैं! शायद सेप्टिक टैंक का यह सफाई कार्य अब अपने अंतिम क्षणों में है। इस बीच ‘वे’ ने छेनीवाले को लापरवाही से सक्शन पाइप हाथ में पकड़ते हुए देखा! वह पाइप के उस हिस्से पर हाथ लगा रहा है जो टैंक के सीवर में जाता है। इसलिए उसका हाथ सीवर के ‘कीचड़’ से सने हैं। लेकिन रमेसर इस मामले में सजग है वह पाइप के ऊपरी हिस्से को ही पकड़ता है।
अचानक ‘वे’ से मुखातिब होकर रमेसर ने उनसे मेनहोल में देखने के लिए कहा। 'वे' ने जाकर सेप्टिक टैंक में झांका, तली में कीचड़ नहीं केवल पानी था। उनका अनुमान था कि टैंक का गाढ़ा कीचड़ समरसेबल के पानी में पतला होकर सक्शन पाइप द्वारा सुड़का जा चुका है और अब तीन इंच से भी कम पानी बचा है। रमेसर के जब यह कहा कि पाइप अब पानी नहीं खींच पाएगा तो उन्होंने भी इस पर सहमति जताया। क्योंकि वे देख चुके थे कि सक्शन पाइप के आधे मुहाने से भी नीचे पानी है। अब रमेसर ने टैंक में गिरते पानी को बंद कराने के लिए छेनीवाले से समरसेबल का पाइप टैंक से बाहर कराया। फिर वह रमेसर के कहने पर सक्शन पाइप को भी सेप्टिक टैंक से निकालकर धोने लगा। इस सक्शन पाइप का एक सिरा टैंकर के नोजल से जुड़ा था। जिसे एक अन्य साथी ने हटाया। छेनीवाले के अन्य साथियों को देखकर ‘वे’ को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे पाइपें धुलने के बाद ही उसके साथी इसे छुएंगे! उनके मन में आया कि रमेसर से इन साथियों के बारे में कुछ पूँछे। लेकिन रमेसर उन्हें कोई चीज दिखाने के लिए सेप्टिक टैंक के किनारे सबसे ओझल रहने वाले स्थान की तरफ ले गया। उस स्थान की ओर इशारा कर उनसे धीरे से बोला,
“देखिए इसे मैंने यहां किनारे रखवा दिया हूँ, सोचा आपको बता दूँ कि कहीं गलती से कोई इसे हाथ न लगा दे, सुबह किसी से कहकर इसे आप फेंकवा देना।”
‘अरे! यह तो सीवर के कीचड़ में लिथड़ा हुआ वही कपड़ा है जिसे इस रमेसर ने सेप्टिक टैंक से निकलवाया था..तो इसे यहाँ रखवा दिया इसने! अपने आदमियों से कहकर इसे कहीं भी फेंकवा सकता था यह!!’ ‘वे’ ने तनिक विस्मय से सोचा। फिर भी रमेसर से कुछ नहीं कहा। ।।१४।।
बदला नहीं वह बदलाव का आकांक्षी है!
कीचड में लिथड़े इस कपड़े को वे फेकवाएंगे रमेसर की इस बात से जैसे उनके (वे) अहं को ठेस पहुँचा था। उनके खयाल में आया कि इन महोदय (रमेसर) के दद्दा और पप्पा हाथ से मैला उठाते रहे लेकिन आज इन्हें सीवर में लिथड़े इस कपड़े को फेंकने से परहेज है इसे ये छूना नहीं चाहते! और तो और, छेनीवाले से भी इसे फेंकने के लिए नहीं कहा, आखिर क्यों? लेकिन अगले ही पल वे मन को सांत्वना देने लगे कि रमेसर सेप्टिक टैंक में पड़ी ऊल-जुलूल कूड़े जैसी चीजों की सफाई करने नहीं आया है, यह ‘कपड़ा’ सीवर का हिस्सा तो नहीं। वह तो केवल ‘कीचड़’ की सफाई करने आया है। पैसा भी उसे ‘कीचड़’ सफाई का ही मिलना है। तो फिर क्यों इस कपड़े को फेंके यही क्या कम है कि उसने इसके बारे में बता दिया नहीं तो अनजाने कोई इसे हाथ लगा देता!! ‘वे’ अपने अहं को कुछ यही सांत्वना दिए। इससे वे सहज हुए तो “अच्छा ठीक है” कहकर रमेसर की ओर देखा जहाँ उन्हें एक सपाट चेहरा मिला!
बल्ब की मद्धिम रोशनी में रमेसर के इस सपाट चेहरे के पीछे के भाव से ‘वे’ अनजान रह गए। रमेसर को एक बात हमेशा कचोटती रही है। जब एक साँझ को दद्दा हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा टिन लिए हुए आते दिखाई पड़े थे तो उसे बहुत अजीब लगा था क्योंकि दद्दा यह काम दोपहर से पहले ही कर लेते हैं। लेकिन बाद में उसे पता चला था कि दद्दा को उस दिन किसी काम से बाहर जाना पड़ा था इसलिए सुबह ब्लॉक कॉलोनी में मैला उठाने नहीं पहुँचे थे। दोपहर बाद उनके लौटने पर साहब ने उन्हें बुलाकर बहुत डाटा था और तुरंत जाकर मैला उठाने के लिए कहा। फिर उस दिन सांझ को वे मैला उठाने गए। इसे वह आज तक नहीं भूला है। अहं की कौन कहे उस दिन उसके निरीह दद्दा की मानवीय गरिमा का भी ध्यान नहीं रखा गया था। उन दिनों यह सोचकर कि मैला तो साहबों का ही था, इसे उठाने के लिए दद्दा को क्यों डाटा गया, वह गुस्से से भर उठता और उसकी मुट्ठियां भिंच जाती। लेकिन किसी बदले की भावना का वह शिकार नहीं हुआ। बदला नहीं वह केवल बदलाव का आकांक्षी है! जिसके लिए उसकी पीढ़ियाँ गुजर गईं थीं। बदलाव की यह आकांक्षा जब उसमें तारी होता तो उसका चेहरा ऐसे ही सपाट हो जाता है।
रमेसर ने किंचित गर्व से ‘वे’ को नजर भर देखा! ‘वे’ सेप्टिक टैंक के बगल में पड़े सीवर के कीचड़ से सने उस कपड़े को देख रहे थे। उनके कंधे से कंधा मिलाए वह भी उनके बराबर खड़ा हुआ उनसे ही इस कपड़े को फेंकवाने की बात कह रहा है! यह बदला नहीं, बदलाव लाने का आग्रह था। इस आग्रह में उसके आत्मविश्वास का सामर्थ्य है! फिर न जाने क्यों उसने आसमान की ओर भर नजर देखा, जैसे अपने इस सामर्थ्य को वह दद्दा और पप्पा को दिखाना चाहता हो! उधर ऊपर आसमान में टिमटिमाते तारे भी उसके बात की गवाही दे रहे थे!! काफी समय हो गया कहकर अचानक वह मुड़ा और ‘वे’ को छोड़कर पोर्टिको की ओर चल दिया। जहाँ कुर्सी पर बैठे बाबू जी से उसे आज के काम का हिसाब करना है।
उसे पोर्टिको की ओर जाते देख ‘वे’ भी पीछे-पीछे चल पड़े। लेकिन तभी छेनीवाले ने उनसे हैंडपंप चलाने के लिए कहा। उसके हाथ और बिना चप्पलों के पैर सीवर के ‘कीचड़’ में सने थे। उसे देखते हुए ‘वे’ को ग्लानि हुई कि बिना दस्ताने और सुरक्षा पोशाक के सीवर सफाई करने वालों को मैन्युअल स्कैवेंजर क्यों नहीं माना जाता! उनका वश चले तो वे इन्हें भी मैन्युअल स्कैवेंजर मान लें! ‘वे’ ने जाकर हैंडपंप चलाया और छेनीवाले ने अपने हाथ-पैर धोए। ।।१५।।
NAMASTE
पोर्टिको में आते ही रमेसर ने बाबूजी को बताया कि टैंक की सफाई अच्छे से हो गई है ‘वे’ ने इसे देख लिया है। इसके बाद उनमें यह बातचीत हुई,
बाबूजी ने पूँछा, “तो कितना दे दें।”
“इसमें क्या बताना, साढ़े तीन हजार का एक चक्कर होता है।” रमेसर ने कहा।
“इस हिसाब से तो फिर सात हजार हो जाएगा, जबकि बात पाँच हजार में हुई थी।” बाबू जी ने हिसाब लगा कर बोला।
“दो चक्कर भी तो लगाना पड़ा..अच्छा ठीक है..आपस की बात है आप ढाई हजार प्रति चक्कर के हिसाब से दे दीजिए।” रमेसर ने मुस्कुराकर कहा।
बाबूजी ने गिनकर रमेसर को पाँच हजार रुपए दिए। उसको संतुष्ट देख ‘वे’ को पता चल गया कि एक टैंकर सीवर सफाई के कितने रूपए लगते हैं।
तब तक छेनीवाला अपना बख्शीश वहाँ लेने आ पहुँचा। बाबू जी ने उसे पचास रुपए दिए लेकिन उसने नाखुशी जाहिर कर दिया। उसकी नाखुशी पर रमेसर ने बाबूजी को बताया कि इसे सौ रूपए चाहिए। बाबूजी के पोटली में ढूँढ़ा। लेकिन उसमें सौ रुपया नहीं मिला तो छेनीवाला मायूस हो गया। रमेसर ने उसे समझाया कि चलो, अब नहीं है तो क्या करोगे। ‘वे’ देख रहे उन्होंने अपनी जेब से सौ रुपए का एक नोट निकालकर उसे पकड़ा दिया। मनचाहा बख्शीश पाते ही छेनीवाला और रमेसर दोनों खुश हो गए। फिर रमेसर ने बाबू जी का पहले दिया पचास रुपया छेनीवाले से वापस कराना चाहा। लेकिन वे ने इसे वापस लेने से मना कर दिया।
रमेसर की टीम अब जाने की तैयारी करने लगी। एक सदस्य ने सक्शन पाइप समेटकर टैंकर पर रखा तो दूसरा ट्रैक्टर की ड्राइविंग शीट पर बैठ गया। इधर रमेसर छेनीवाले से कुछ कहने को हुआ लेकिन अचानक से चुप हो गया और उसे वहाँ ले गया जहाँ सीवर में लिथड़ा वह कपड़ा पड़ा था। इसे दिखाकर किसी चीज में लपेटकर इसको दूर फेंक आने के लिए कहा। इसे लेकर अचानक रमेसर का मन कैसे बदल गया! वे सोचने लगे।
रमेसर की चेतना-शक्ति ने बचपन से ही उसे आत्मसम्मानी बनने के लिए प्रेरित किया। जन्म, जाति और कर्म के दुश्चक्र से बाहर निकलने के लिए उसे पहले नैतिक धरातल अपना व्यक्तित्व मजबूत रखना था। इसीलिए गरीबी और तमाम आर्थिक परेशानियों के क्षण में भी वह लालची और स्वार्थी नहीं बना क्योंकि ये गुण व्यक्ति को छोटा बनाते हैं। किसी के बराबर खड़े होकर सौदेबाजी करने का साहस भी वह इसलिए अर्जित कर पाया कि न तो किसी के एहसान तले दबकर उसे कमजोर और छोटा बनना था और न ही किसी को छोटा बनाना! दद्दा और पप्पा जैसे दो छोर के बीच खड़ा वह जीवन की स्थितियों को देख, सुन और समझ रहा था। उसके लिए कोई काम छोटा-बड़ा या ऊँच-नीच नहीं है उसे अपने काम का मेहनताना चाहिए बस! बख्शीश में छेनीवाले को सौ की जगह डेढ़ सौ रूपए मिले। वह ईमानदार और खुद्दार सौदेबाज और सेवा प्रदाता है और उसमें पेशागत ईमानदारी भी है इसीलिए अतिरिक्त बख्शीश से मिली खुशी के प्रतिमूल्य में उसने छेनीवाले से उस कपड़े को फेंकने के लिए कहा। छेनीवाला दूर कहीं उस कपड़े को फेंक भी आया था।
पुनः हैंडपंप पर छेनीवाले का हाथ धुलाते हुए ‘वे’ उसके और रमेसर के बारे में सोचने लगे। रमेसर एक दुश्चक्र से पार पाने की जद्दोजहद में अपनी चेतना-शक्ति और मार्मिक स्मृतियों से प्रेरणा पाता है तो वहीं छेनीवाले का यह चरित्र ‘परिस्थितिजन्य’ है उसके जीवन में कोई प्रेरणाश्रोत नहीं। बल्कि उसका बऊकपन, उसके भाई और उसका जाति निकाला उसकी आज की ‘परिस्थिति’ के कारक हैं। दोनों की पीड़ा की अनुभूति का धरातल भिन्न हैं! छेनीवाले में आंतरिक और वाह्य किसी प्रकार का कोई संघर्ष नहीं। ज्यादा से ज्यादा उसका संघर्ष ‘मार्मिक चालाकी’ तक सीमित है। लेकिन रमेसर आंतरिक और वाह्य और चेतना के प्रत्येक स्तर पर, संघर्षशील है! यह रमेसर के लिए कितनी मार्मिक बात है कि उसके और छेनीवाला दोनों के हाथ सीवर की कीचड़ में सने हैं फिर भी छेनीवाले के साथ वैसा भेदभाव नहीं होता जैसा रमेसर के साथ होता है! इससे समझा जा सकता है कौन नायक है और यह कहानी किसकी है!!
वे याद करते हैं एक स्वच्छकार विमुक्ति सम्मेलन में इसी नायकत्व के कारण रमेसर जैसे एक योद्धा को सम्मानित कराया जा रहा था। उस सम्मेलन में कुछ ऐसी ही कहानी उस व्यक्तित्व की वहाँ बताई जा रही थी। इसीलिए आज इस सेप्टिक टैंक के सफाई अभियान पर उनकी दृष्टि लगातार जमी रही। यहाँ स्वयं रमेसर उस स्वच्छकार विमुक्ति में सम्मानित होने वाले योद्धा की हू-ब-हू प्रतिमूर्ति है।
इसी बीच ट्रैक्टर स्टार्ट होने की आवाज सुन छेनीवाला ट्रैक्टर पर सवार होने चला गया। बाबूजी के पास खड़ा रमेसर उनसे नमस्ते किया और ट्रैक्टर की ओर मुड़ा। तभी ‘वे’ पर उसकी दृष्टि पड़ी, फिर वे को भी उसने हाथ जोड़कर नमस्ते कहा। प्रतिउत्तर में ‘वे’ ने भी हाथ जोड़े और नमस्ते बोला!! लेकिन अगले ही पल जब उनको अपने इस ‘नमस्ते’ का खोखलापन समझ में आया तब उनका ध्यान रमेसर और उसकी टीम के ईकोसिस्टम के लिए बने NAMASTE पर गया!! रमेसर हो या छेनीवाला या उसकी टीम के अन्य सदस्य, इनके लिए खड़े होकर यह NAMASTE बोलना चाहिए। जिसका अर्थ है National Action For Mechanised Sanitation Ecosystem. सरकार इनके लिए 2022 से ही यह NAMASTE बोल रही है! अब तो 2025 का आगाज हो चुका है ऐसे में यह NAMASTE अब इतनी जोर से बोला जाना चाहिए कि इसकी आवाज देश में सभी जगह सबको सुनाई पड़े और जिसकी प्रतिध्वनि बहुत समय तक गूँजती रहे। ।।१६।।
(जी हाँ अब NAMASTE…NAMASTE… )
- विनय कुमार तिवारी