सेप्टिक टैंक का ढक्कन
सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर कंक्रीट का ढक्कन सीमेंट से जाम था। पिछले दस मिनट से छेनी और हथौड़े की मदद से इसे मेनहोल से हटाने में वह जुटा था। कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे छेनी टिकाता और हथौड़े से चोट मारता। लेकिन ढक्कन था कि टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा था। पास में खड़ा रमेसर ठेकेदार चुपचाप उसके काम की निगरानी कर रहा था।
अचानक रमेसर के 'इधर इस किनारे छेनी लगाओ’ कहने पर उसने दरार पर छेनी टिकाकर एक जोरदार हथौड़ा चला दिया।
छेनी दूर छिटककर दूब वाली घास में जा गिरी, इसी झटके में उसकी कमीज की जेब से दो सिक्के भी घास में जा गिरे।
छेनीवाला झुककर घास टटोल रहा है। ‘वे’ ने हलकी हैरानी से पूँछा, 'छेनी नहीं मिल रही है क्या?' लेकिन रमेसर बोला, “छेनी तो बड़ी चीज है वह मिल गई है, ये अपना सिक्का खोज रहे हैं।”
इनके दो अन्य साथी चुपचाप खड़े यह देखते रहे, छेनीवाले की मदद के लिए आगे नहीं आए। उनकी यह उदासीनता कुछ अजीब थी। उन्हें देखते हुए 'वे' ने कहा, “इसके मेहनत के सिक्के होंगे, खोजना ही चाहिए।"
सिक्के मिलते ही छेनीवाला काम में जुट गया। रमेसर ने मुस्कुराकर ‘वे’ से कहा, बड़का दिमाग है इसके पास।' इस मुस्कुराहट में ‘वे’ को “बड़का दिमाग” अर्थपूर्ण लगा। ऐसा दिमाग जो रमेसर को मुफीद हो!
रमेसर को 'वे' का चेहरा किंचित जाना पहचाना लगा। वह यादों में उतर पड़ा,
"चालीस वर्ष पहले, जब वह बमुश्किल पाँच-छह साल का था। आज जहां खड़ा है, तब ये घर कच्चे हुआ करते थे। बाबा इन्हीं घरों से त्यौहारी लेने आते। वह भी कभी-कभी बाबा के साथ चला आता। शायद उसी बचपन में 'वे' को कभी यहीं पर देखा हो।
आज इनकी बराबरी में खड़ा इनसे सौदेबाजी कर रहा है। गर्व से ट्रैक्टर-टैंकर की ओर देखा। इस सेप्टिक-टैंक सक्शन मशीन का मालिक भी वही है! उसका खुद का सेप्टिक-टैंक सफाई का व्यवसाय है।
वर्षों पुरानी स्मृतियां जीवंत हो उठी-
"नगरपालिका में स्वीपर बनने गया। इसके लिए प्रैक्टिकल की परीक्षा हुई थी। सीवर वाले काले गंधाते पानी के नाले में वह झम्म से कूद पड़ा था! वहीं सात जने,जो ऊँची जात के थे उसमें नहीं कूदे,..अन्य दो जने जैसे-तैसे उस नाले में उतरे भी तो तुरंत बाहर निकल आए थे...
अफसरानों ने उसे ही इस नौकरी के योग्य माना था। आखिर मानते भी क्यों न? उसने जन्म भी उसी जात में लिया था जिनकी रोजी-रोटी ही सिर पर मैला ढोने से चलती हो। फिर क्यों न मिलती यह नौकरी उसे!"
अब छेनी पर हथौड़ा पड़ता तो ढक्कन हिल जाता। शायद ढक्कन अब मेनहोल से उठ सकता है, सोचकर रमेसर ने ट्रैक्टर के टूल बॉक्स से रम्मा निकाल लाया। लेकिन ढक्कन का एक किनारा अभी भी मेनहोल से जाम था। इसे छेनी से काटने के लिए कहा।
पागलों जैसा था छेनीवाले का पहनावा। मोटे कपड़े का मटमैले रंग की कमीज इसके ऊपर धूसरित रंग की फटी-सी सदरी और पैंट भी मटमैला ढीला-ढाला। ये कपड़े भी जैसे महीनों से न धुले गए हों।
यही नहीं, पैरों में चप्पल नहीं और सिर पर घने बिखरे बाल, जिसे शायद ही कभी कंघी से संवारा गया हो, शक्ल से भी उसे पागल बताने के लिए काफी था।
'वे' को संदेह हुआ कि कहीं इसीलिए रमेसर ने इसे "बडका दिमाग" वाला तो नहीं कहा? 'वे' ने रमेसर की ओर देखा, जैसे उससे कुछ पूँछना हो, लेकिन वह किन्हीं विचारों में खोया दिखाई पड़ा।"
उत्कंठा
"स्वीपर की नौकरी मिलने पर वह खुश नहीं हुआ। अम्मा अकसर कहतीं, 'तुम्हारे दद्दा और पप्पा तो करिया अक्षर हैं, इसीलिए वे मैला ढोते हैं मुला तुम यह काम मत करना, खूब पढ़ना।' और जबर्दस्ती स्कूल भेजतीं।
उसका स्कूल और घर, दोनों एक ब्लॉक के कैंपस में था।
बीडीओ ऑफिस के पीछे आठ बाई दस की कोठरी ही उसका घर था। समय के प्रवाह में कोठरी भी जर्जर होती गई। फिर दद्दा ने इसके सामने छोटी सी जगह पर टटिया खड़ी कर घेर बना लिया। इसी घेर में उन्होंने एक झोपड़ी भी बनाया। जिसमें वे अपनी गैया के साथ रहते थे।
त्योंहारों की छुट्टी में ब्लाक-कैंपस में सन्नटा पसर जाता। यहां रहने वाले अपने घर चले जाते। 'दद्दा, क्यों नहीं चलते घर?' पूँछने पर अम्मा कहती, 'यही तो हमारा घर है।' लेकिन घर को लेकर उसकी यह उत्कंठा शांत नहीं हुई बल्कि उसके मन के किसी कोने में अनकही गाँठ बनकर दबी रह गई! यह गाँठ कक्षा पांच में जाकर खुली।"
दद्दा से पूँछना
"रोज की तरह उस दिन भी कक्षा में वह सबसे अलग-थलग पीछे बैठा था। पंडी जी पढ़ा रहे थे कि -
'आजादी के बाद पहले विकास खंड बना और फिर बाद में यह स्कूल बना।'
यही सुना था जब मन के कोने में दबी घर वाली पुरानी उत्कंठा जाग उठी थी, पंडी जी से पूँछ लिया था,
'पंडी जी, तब मेरा घर भी यहाँ नहीं था न?'
इस प्रश्न पर कक्षा के सारे बच्चे खिलखिला पड़े थे। और पंडी जी भी उसे घूर रहे थे। जैसे कोई गलत बात कह दिया हो, फिर सहम गया था।
'प्रश्न पूँछने का यह संस्कार कहां से आया' पंडी जी का उसे घूरना जैसे इसी बात का संकेत था।
वैसे भी जिस जाति में वह जन्मा था, वहां जीवन के प्रति आशा और आकांक्षा पनपने की कोई गुंजाइश नहीं! वहां तो बदलाव की इच्छा भी मर जाती है, फिर प्रश्न पूंछने का संस्कार और चेतना कहां से आती?
पंडित जी ने सहज ही कह दिया—
‘नहीं, तब तुम्हारा घर भी यहाँ नहीं था।’
इस वाक्य ने मुझे विचलित कर दिया। कक्षा, पाठ, और वह हँसी सब कुछ जैसे धुँधला गया। मैं एक गहरे उधेड़बुन में फंस गया—
"आख़िर आज़ादी से पहले मेरा घर कहाँ रहा होगा?”
छुट्टी होते ही सीधे घर भागा था कि दद्दा से जाकर पूँछेंगे।
बस्ता फेंककर दद्दा को ढूंढने लगा। झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा ने बताया कि, "बिलाक कालोनी गए हैं, आते होंगे।"
थोड़ी देर बाद दद्दा आते दिखाई पड़े थे। उनकी ओर लपका, तभी उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देख ठिठक पड़ा था। 'दद्दा, यह काम दोपहर से पहले ही कर लेते हैं!' सोचकर धीरे कदमों से हैंडपंप की ओर मुड़ आया था। दद्दा वहीं आए। झाड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन नल के नीचे रखा। हैंडपंप चलाते-चलाते अधीर होकर दद्दा से पूँछा लिया था -
'दद्दा, जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे?'
दस साल के बच्चे से इस प्रश्न की उम्मीद नहीं थी दद्दा को। बाल्टी धोते-धोते वे रुक गए। चकित भाव से मेरी ओर देखा था। हैंडपंप चलाना रोक मैंने दृढ़ता से कहा था,
'हाँ दद्दा, पंडी जी ही तो कह रहे थे कि बिलाक आजादी के बाद बना, तब तो हमारा यह घर भी यहां नहीं था?'
“पाकिस्तान..हाँ हमारा घर पाकिस्तान में था।”
बिना लाग-लपेट के दद्दा ने कहा। उसे उत्तर तो मिला लेकिन मन में एक दूसरी जिज्ञासा भी जन्म ले चुकी थी।"
अचानक हथौड़े की आवाज आई!
‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा।’
‘वे’ ने देखा, रमेसर रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है।
रमेसर के दो अन्य साथी वहां खड़े थे लेकिन दोनों को जैसे ढक्कन छूने से परहेज हो! इसे हाथ नहीं लगाया। तब तक छेनीवाले ने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। पूरा मेनहोल खुल गया। इसमें झांककर रमेसर ने कहा, 'इसकी गहराई लगभग आठ फीट है।' उसका अंदाजा सही था ‘वे’ ने भी तुरंत ‘हाँ’ बोल दिया।
कीचड़
'इसमें तो पानी है, कीचड़ नहीं है’ मेनहोल में झाँकने हुए रमेसर ने कहा।
"‘वे’ को सहसा बोध हुआ कि सेप्टिक टैंक की तली पर बैठा मल ही रमेसर की व्यावसायिक भाषा में ‘कीचड़’ है।" इस नए ज्ञान के साथ 'वे' ने रमेसर की ओर देखा-
लेकिन इस कीचड़ को देख वह न जाने किन विचारों में खो चुका था!
"दद्दा की बाल्टी में 'कींचड़' का रंग कुछ और होता। वे रोज सुबह नौ बजे हाथ में बाल्टी, झाड़ू और टिन लिए ब्लॉक की कालोनी में जाते। एक दिन जिद करके वह भी उनके साथ हो लिया था। हालांकि उसका साथ में जाना दद्दा को अच्छा नहीं लगा था। वह साथ न चले इसके लिए,उसे पुचकारा भी था। पर वह नहीं माना था। तब चार-पांच साल की उम्र थी उसकी।
...उस दिन दद्दा एक बड़े क्वार्टर के पीछे की ओर गए। उस क्वार्टर के नींव के ऊपर दीवाल पर लोहे का एक ढक्कन लटका था। दद्दा ने इसे उठाया। यहां आले जैसा एक चौकोर गड्ढा था। उसमें यही 'कींचड़' पीले रंग के ढेर में जमा था।
....दद्दा ने मुड़े हुए टिन से उस पीले मैले के ढेर को बाल्टी में भर लिया फिर आले कोइ झाड़ू से साफ भी किया। यह सब उसे बेहद अजीब लगा, लेकिन दद्दा एक-एक कर सभी क्वार्टरों पर जाते गए। धीरे-धीरे उनकी बाल्टी उसी पीले मैले से भर गई, जिसे वे दूर झाड़ियों में जाकर खाली कर आए थे।
....इस काम के दरमियान न दद्दा बोले, न उसने कुछ पूँछा; वह बस चुपचाप उन्हें यह काम करते देखता रहा। लेकिन बाल्टी खाली करके लौटे तो एक पल के लिए उसे घूरा था। उनका वह घूरना उसे आज भी याद है। उस दिन दद्दा की आँखों में नाराजगी थी। वहां से वे सीधे हैंडपंप पर आए। अपने सभी सामान धोए फिर नहाए। और उसे भी नहलाए। इसके बाद वह कभी दद्दा के साथ कॉलोनी की ओर नहीं गया।"
रमेसर के परदादा
दद्दा तब तेरह या चौदह साल के थे, पिता बद्दन, जिन्हें वे बप्पा कहते थे, के साथ पाकिस्तान से सन पचास में भारत आए! उनका घर सिंध में कराची के पास था। सफाई करना उनका पेशा था। बटवारे के समय उन्हें हिंदू बताकर पाकिस्तान छोड़ने के लिए कहा गया लेकिन जब मुसलमानों ने मल उठाने और सीवर की सफाई करने से इनकार कर दिया तो इस कार्य को आवश्यक सेवा मानकर वहां की सरकार ने बद्दन को जाने नहीं दिया था।
फिर बद्दन भारत क्यों आए? दद्दा ने बताया था-
बँटवारे के समय उँची जात वाले भारत चले गए तो बप्पा खुश हुए थे कि अब अछूत होने का अपमान नहीं सहना पड़ेगा। लेकिन मुसलमानों ने उनसे भेदभाव वाला वही सुलूक शुरू कर दिया जो ऊँची जात वाले हिंदू करते। इससे आजिज बस्ती के लोगों में इसाई बनने की होड़-सी लग गई थी।
धीरे-धीरे परंपरा और रीति-रिवाज मनाने पर भी पाबंदी-सी लगने लगा। बप्पा की खुशफहमी टूट गई, वे कहते, स्वर्ग में गुलामी से अच्छा है नरक की आजादी! एक दिन परिवार के साथ किसी तरह सीमा पारकर भारत में आ गए।
फिर चार साल परिवार को लेकर दिल्ली में एक शिविर में रहे। उसी समय जब यह ब्लॉक बना तो सरकार ने बद्दन को यहां सफाई की नौकरी पर भेज दिया। रहने के लिए यह कोठरी तभी मिली थी।
अंत में दद्दा ने कहा, 'और तबसे यही हमारा घर है।'
दद्दा ने जिज्ञासा शांत कर दिया था। लेकिन ‘पाकिस्तान’ सुनकर उसे कुछ याद आया! दद्दा से पूँछा था,
“बाल्टी वहाँ क्यों खाली किए दद्दा, वहाँ तो सब लड़िकन खेलने जाते हैं…जानते हो! हमारी गेंद चली गई थी वहाँ, विज्जू उसे लाने गया तो उसका पैर उसमें छपाक से पड़ गया, इसे वहाँ न फेंका करिए।”
दद्दा एक पल रुककर बोले थे -
“बचवा, इसे कहां गिराऊँ? कोई ऐसी जगह भी नहीं यहां। एक दिन उस खेत के कोने में बाल्टी उलट दिया तो खेत-मालिक ने बहुत गरियाया था।"
उस दिन दद्दा की बात सुनकर उसके मन में एक चिनगारी सी उठी थी। फिर उसने दद्दा की ओर देखा था।
दद्दा के बूढ़ाते शरीर पर पीढ़ियों से हो रहे अपमान का दंश था। वे 'वीतरागी‘ से जान पड़ते!
एक बार दद्दा से जब कहा,
“दद्दा मुझे घिन आती है, मत करो यह काम।”
तो यह बोलकर कि “इससे क्या घिनाना! यह तो हमारा कर है यही रोजी है” दद्दा ने उसे चुप करा दिया था। जैसे वे कहना चाह रहे थे कि 'अपमान-तिरस्कार की पीड़ा से मुक्ति इसे सहने की आदत में है।"
रमेसर की मुट्ठियां भिंच गईं, उसने देखा-
छेनीवाला टैंकर का पाइप खींचकर सेप्टिक टैंक के मेनहोल की ओर ले जा रहा है और एक साथी वैक्यूम पंखा चलाने के लिए ट्रैक्टर पर चढ़ा है।
सीवर का गाढ़ापन !
रमेसर ने सक्शन-पाइप अपने हाथ में लिया। खींचकर इसे सेप्टिक टैंक की गहराई में उतारा। उधर वैक्यूम फैन भी चलने लगा था। सेप्टिक टैंक से पानी सुड़कना शुरू हो गया था।
रमेसर मेनहोल में झांक रहा था।
अब तक सांझ भी स्याह हो चली थी। बल्ब की रोशनी में उसका चेहरा साफ पढ़ा जा सकता है। उसकी शांत और गंभीर मुखाकृति देखकर ‘वे’ ने सोचा -
'चार लोगों की टीम है उसकी, फिर भी रमेसर ने ही सक्शन-पाइप अपने हाथ में ले रखा है! जबकि वह टीम का लीडर है, पाइप किसी को भी दे सकता है, हो सकता है यह उसकी व्यवसायगत ईमानदारी हो कि काम अच्छे से हो।"
सेप्टिक टैंक में पानी कम होते जाने से ‘सीवर’ का गाढ़ापन झलकने लगा। इसे देखकर रमेसर की आँखें सजल हो आईं!
सक्शन-पाइप हाथ में लेते ही उसके अंदर जैसे कोई पुरानी टीस जाग उठती है पप्पा की यादें मन में जीवंत हो उठती है! वह पाइप तब तक नहीं छोड़ता, जब-तक सेप्टिक-टैंक का ‘कीचड़’ पूरी तरह बाहर न आ जाए..उस क्षण पाइप पर उसके हाथ की पकड़ और कस उठती है- मानो वह केवल काम नहीं, पप्पा की अधूरी लड़ाई पूरी कर रहा हो।
"दद्दा चाहते थे कि पप्पा शहर में स्वीपर की नौकरी कर ले, इसे वे पुश्तैनी काम मानते। पप्पा इससे चिढ़ उठते। उनके भीतर एक बेचैन छटपटाहट भर जाती। वे शहर में दिहाड़ी की तलाश में निकल जाते, पर वहां भी न टिक पाते; वापस आकर घर पर ही चुपचाप पड़े रहते।
एक बार अम्मा से कहते सुना था -
“क्या कींचड़ में लिथड़ी इस जाति को उतारकर हम फेंक नहीं सकते?”
उस दिन पप्पा की बात का अर्थ वह नहीं समझ सका था। लेकिन वर्षों बाद जाना, जाति सचमुच में भविष्य लिखती है! पप्पा निरक्षर थे - सोचते रहते, बस घुटते रहते।
त्योहारों पर दद्दा गाँव में चले जाते, त्योहारी लेकर लौटते। उस दिन उनकी गठरी में ढेर सारी पूरियां कचौरियां और खाने की चीजें होती। ऐसे ही किसी त्यौहार पर दद्दा घर लौटे तो यह गठरी देखक पप्पा गुस्से में बोले थे -
'यह अच्छी बात नहीं कि घरों के सामने हाथ पसार जाकर खड़े हो जाओ, यह भिखमंगई ठीक नहीं बाबा, इससे अच्छा तो फिर मैला ढोने का काम है.. इसमें कम से कम कुछ करके तो कमाना है।'
हाँ पप्पा ने दद्दा से यही कहा था उस दिन।
उसने स्वयं देखा था—दद्दा गाँव के ‘बड़े’ घरों की देहरी पर बारी-बारी जाकर खड़े होते; भीतर से कोई निकलता और दूरी बनाकर उनकी चादर में ऊपर से ही त्योहारी डाल देता। उनकी चादर छूने से लोग कतराते, और उन्हें हमेशा दूर ही बिठाया जाता।
पप्पा की बात पर दद्दा ने ऐतराज नहीं जताया। लेकिन बोले थे -
“देख दिन्ने, यह भिखमंगाई नहीं, इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना हो जाता है। यदि दिखाई न पड़ूं तो लोग पूँछने लगते हैं.. दिन्ने! एक बात और! गाँव के लोग शादी-ब्याह पर मुझे नेग-चार देना नहीं भूलते!”
दद्दा और पप्पा, दोनों की बातें दो छोर की बातें थीं। वह जैसे इन दोनों के बीच में खड़ा स्वयं को एक अजीब से द्वन्द्व में उलझ जाता। समझ नहीं पाता किसे सही माने।"
अचानक 'वे' ने देखा रमेसर इशारे से मेनहोल के पास बुला रहा है। इसमें झांकते हुए कहा, 'देखो पानी चार फीट नीचे जा चुका है। एक टैंकर फुल हो गया दूसरा चक्कर भी होगा..दो टैंकर सीवर था इसमें।' फिर विश्वास दिलाने के लिए कि टैंकर भर गया है पारदर्शी संकेतक भी दिखाया।
‘वे’ की प्रेषित रिपोर्ट
रमेसर के इशारे पर छेनीवाले ने टैंकर का नोजल बंद दिया और उसी क्षण रमेसर ने सेप्टिक टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाल लिया। पास के खेत में टैंकर खाली करने की बात पर 'वे' ने यह कहकर रोक दिया कि "खेत मालिक नाराज होंगे।"
दद्दा की कही बात 'एक दिन उस खेत के कोने में बाल्टी उलट दिया तो खेत-मालिक ने बहुत गरियाया था' रमेसर के मन में कौंध गई। 'खेत के लिए यह खाद ही तो होता' बोलकर वह टैंकर लेकर अँधेरे में दूसरी दिशा की ओर बढ़ गया।
सीवर गिराकर टैंकर लौट आया। उसके नोजल में छेनीवाले ने सक्शन-पाइप जोड़ दिया। जैसे ही वह पाइप को मेनहोल में उतारने बढ़ा रमेसर ने उसे थाम लिया और स्वयं उसे सेप्टिक-टैंक की गहराई में उतारा। वैक्यूम चालू होते ही पाइप ने सीवर सुड़कना शुरू कर दिया।
रमेसर ने मेनहोल में झाँका। सेप्टिक-टैंक के भीतर बल्ब की रोशनी नहीं पहुँच रही थी, कुछ दिखाई नहीं पड़ा। फिर उसने मोबाइल फोन का टार्च ऑन किया। टैंक में भीतर सीवर गाढ़ा हो चुका था। इसकी सकिंग मुश्किल है, सोचकर उसने ‘वे’ से एक बांस लाने के लिए कहा।
वे बाँस लेने चले गए।
रमेसर सेप्टिक-टैंक के पास एक चबूतरे पर जा बैठा। उसे पप्पा याद आए।
"ऐसे गाढ़े सीवर में तो पप्पा बेहिचक उतर जाते थे! ।।८।।
पप्पा और एरिक
उस दिन पप्पा नहीं उनका शरीर आया था घर। तब कक्षा सात में था वह। स्कूल से लौट रहा था। घेर के सामने कुछ लोग खड़े दिखाई दिए। सबके चेहरों पर एक अजीब-सी खामोशी देख उसे अनहोनी की आशंका हुई। घबड़ाहट में भागते हुए घेर में पहुँचा। पप्पा जमीन पर लेटे थे और अम्मा उनके सिरहाने बैठी थीं..
वह कुछ समझ पाता कि दद्दा ने उसे कसकर अँकवार में भर लिया था, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। उधर अम्मा की अचानक रुलाई फूट पड़ी, वे दहाड़ें मारकर रो उठीं थीं,।
पप्पा के मन से दद्दा अनजान रहते। पप्पा स्वीपर नहीं मजदूर बनना चाहते थे। लेकिन जाति और पुश्तैनी पेशा इसके आड़े आ जाता। 'जाति माथे पर कलंक है' यही सुना था अम्मा से कहते हुए उन्हें। शायद विवशता में ही उन्होंने शहर जाना छोड़ दिया था।
दद्दा उन्हें निठल्ला कहते। फिर अचानक एक दिन इन बातों से आजिज आकर पप्पा स्वीपर बनने के लिए तैयार हो गए। वे शहर गए। नगरपालिका का एक सफाई ठेकेदार उन्हें अपनी टीम में रख लिया।"
'जाति माथे पर लगा कलंक है' पप्पा के इस कहे को वह भी एकदम सच मानता। उनकी मौत और अपनी जाति के कारण साथी छात्रों के बीच घुल-मिल न पाने से उसका मन स्कूल जाने से उचट गया। इधर अम्मा भी दुःखी रहतीं। किसी तरह कक्षा आठ तक ही वह पढ़ पाया। लेकिन देश-दुनियां की बातें जानने में उसकी रुचि बनी रही।
उसने एरिक के बारे में कभी अखबारों में पढ़ा था। एरिक पाकिस्तान के सिंध में परदादा बद्दन की जन्मभूमि का निवासी था। उसकी ही जाति के एरिक के पूर्वज कई पीढ़ियों पहले ईसाई बन गए थे। लेकिन आज भी एरिक को गटर और सीवर में घुसना पड़ता है।
उस एरिक की तरह पप्पा भी शहर से लौटने के बाद अम्मा से यही बताते कि-
“जब सीवर में घुसता हूँ तो तिलचट्टों से घिर जाता हूँ ये मेरे शरीर पर दौड़ने लगते हैं!”
शायद स्वप्न में भी ये तिलचट्टे उन्हें अपने शरीर पर रेंगते दिखाई पड़ते इसीलिए कभी-कभी रात में सोते से अचानक उठकर वे अपना शरीर झाड़ने लगते!!
यही नहीं पप्पा शहर से लौटते तो बार-बार अपना हाथ धोते, टोंकने पर अम्मा से कहते -
“क्या करूँ..मेरे हाथों में जैसे मैले की बदबू आती रहती है, इसीलिए बार-बार हाथ धोना पड़ता है!”
मौत का कुंआ
रमेसर के मोबाइल की रिंगटोन बजी। वह फोन पर बात करने लगा। तभी ‘वे’ बाँस लेकर लौटे थे। बातचीत के बीच रमेसर किसी को अगले दिन की साँझ का समय तय करते सुनाई पड़े। यह सुनकर 'वे' के मन में कौंधा - तो इस काम में भी काम मिलने की कमी नहीं है।'
बातचीत खत्म होते ही रमेसर ने समरसेबल पंप का पाइप मेनहोल पर टिकाया और छेनीवाले को पंप चालू करने का इशारा किया। पंप चलते ही पानी टैंक में गिरने लगा। रमेसर ने ‘वे’ के हाथ से बाँस लेकर उसे टैंक के भीतर उतारा और इससे जमे हुए गाढ़े कीचड़ को पानी में घोलने लगा। फिर उसने संतोष भरे स्वर में कहा—“अब वैक्यूम का सक्शन पाइप सीवर को ठीक से खींच लेगा।”
उत्सुकतावश ‘वे’ ने भी मेनहोल में झांककर देखा। सेप्टिक टैंक की तली पर मल का गाढ़ा ‘कीचड़’ पसरा था। रमेसर बांस से इसे कुरेदे जा रहा है, पर उसका मन कहीं और भटकता हुआ प्रतीत हुआ- जैसे वह अपने किसी विचार में डूबा हो।
"पप्पा के जमाने में सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए ,यह वैक्यूम-सक्शन टैंकर वाली मशीन नहीं था। पप्पा को तो सेप्टिक टैंक में उतरना पड़ता और इस गाढ़े 'कीचड़' को बाल्टी में भर-भरकर बाहर निकालना होता। तब उनका पूरा शरीर सीवर के कीचड़ में लथपथ हो उठता!
यह सन तिरानबे या चौरानबे के आसपास की बात होगी। अचानक उनका शहर जाना बंद हो गया था। पूँछने पर उन्होंने दद्दा से कहा था - 'सरकार के डर से ठेकेदार काम पर नहीं बुलाता। सरकार ने आदमी को सीवर में घुसने पर रोक लगा दिया है।'
लेकिन दो-चार महीने बीते होंगे, पप्पा फिर शहर जाने लगे थे।
उन दिनों पप्पा अकसर बीमार भी हो जाते। डाक्टर साहब ने उन्हें सीवर में घुसने से मना किया था। लेकिन कहाँ मानने वाले थे वे। अम्मा के टोकने पर कहते, ‘बप्पा अब रिटायर हैं, मेरा काम पर जाना जरूरी है।
उस दिन तबियत खराब होना बताया था लेकिन “आज एक बड़े सेप्टिक टैंक की सफाई होना है, न जाने से ठेकेदार नाराज होगा” कहकर वे सुबह-सुबह ही शहर चले गए थे।
लोग बताते थे कि सेप्टिक-टैंक में उतरते ही पप्पा बेहोश हो गए थे। अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्हें देखने उनके एक साथी भी सेप्टिक-टैंक में उतरे। लेकिन अंदर जाते ही वे भी बेहोश हो गए। फिर शोर मचा। भीड़ इकट्ठी हुई। लेकिन तब तक ठेकेदार वहाँ से भाग निकला था। जैसे-तैसे पप्पा और उनके साथी को सेप्टिक-टैंक से बाहर निकालकर अस्गपताल पहुँचाया गया। लेकिन वे दोनों नहीं बच पाए।
कहते हैं कि पप्पा की मौत सेप्टिक टैंक में ही हो गई थी। बहुत दिनों तक दद्दा और अम्मा थाना-से-कचहरी अधिकारियों के चक्कर लगाए, लेकिन कोई मुआवजा नहीं मिला। बाद में पता चला कि पप्पा की मौत के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं माना गया।
....घेर का दृश्य देख उसे काठ मार गया था! वह जड़वत अम्मा का रोना और दद्दा के आँसू देखता रहा। उसने देखा, सीवर के कीचड़ में लिथड़े कपड़े पप्पा के मृत शरीर से अभी भी चिपके थे! उसकी आँखें डबडबा आईं थीं लेकिन इन आँसूं भरी आँखों को अपनी बाँह से उसने पोंछ डाला था! नहीं रोया। ।।१०।।
पुनर्वास
सक्शन पाइप के मुहाने के पास कपड़ेनुमा चीज देख रमेसर की तंन्द्रा टूटी! पाइप में न फंसने पाए, उसे बाँस से दूर हटाया।
इसे देख छेनीवाले ने रमेसर से बाँस ले लिया। इसमें फंसाकर कपड़े को बाहर निकाला। अब तक सीवर काफी पतला हो चला था। बीच-बीच मे वह पाइप को भी सेप्टिक टैंक में इधर-उधर घुमा देता जिससे टैंक में बचा-खुचा सीवर आसानी से सुड़क उठे। इस बीच छेनीवाले के हाथ और पैर सीवर की कींचड़ से लथपथ हो गए थे।
इस काम पर नजरें गड़ाए 'वे’ को याद आया -
कुछ दिन पहले ही मैन्युअल स्केवैंजिंग पर काम करने वाली उनकी संस्था ने मैनुअल स्केवैंजरों की संख्या शून्य बताकर रिपोर्ट भेजा था। स्वयं उन्होंने भी एक गोष्ठी में बोला था कि अब हाथ से कोई मैला नहीं ढोता।
लेकिन रमेसर और छेनीवाले का कम देख अब उन्हें उस रिपोर्ट और अपने वक्तव्य पर पछतावा होने लगा।
उनके मन में आशंका उठी -
"सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले ये ‘असाधारण’ लोग हैं। लेकिन कहीं यह ‘असाधरणता’ भी किसी जाति के ‘खांचे' में न तब्दील हो जाए? अन्यथा इसे भी इनकी नियति मानकर इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया जाएगा!"
वे रमेसर से पूँछ बैठे कि उसने यह व्यवसाय कैसे खड़ा किया?
सन ९३ में हाथ से मैला ढोने और सेप्टिक टैंक में घुसकर सफाई करने जैसे रोजगार पर सरकारी रोक तो थी लेकिन सन २०१३-१४ में इस रोक के साथ साथ सफाई कर्मियों के लिए पुनर्वास योजना भी लागू हुई।
जाति और पेशा से मिले कर्म-संस्कार की बाड़बंदी में कैद दद्दा ने हाथ से मैला ढोने को अपनी नियति मान लिया था। वहीं पप्पा के मन में इस नियति के प्रति जबरदस्त आक्रोश था। लेकिन इस गरिमाहीन बाड़बंदी से मुक्ति के लिए वे छटपटाते रह गए!
लेकिन दद्दा और पप्पा के अन्तर्द्वन्द्व से उसे इस नियति से उबरने की प्रेरणा मिली। इसपर वह हमेशा ठंडे मन से विचार करता रहा। नई तकनीक आने और सरकार की पुनर्वास योजना से एक नए विकल्प का द्वार खुला।
जैसे-तैसे करके पुनर्वास की सूची में अपना भी नाम शामिल कराया। सरकार से उसे चालीस हजार रुपए और कौशल प्रशिक्षण मिला। फिर बैंक से पाँच लाख का कर्ज लेकर खुद का यह सफाई-व्यवसाय शुरू किया। और आज ट्रैक्टर के साथ इस वैक्यूम सक्शन टैंकर वाली मशीन का वह मालिक है।
शुरुआत में ट्रैक्टर चलाने के लिए कोई तैयार न होता।एक आदिवासी लड़का तैयार भी हुआ तो सक्शन पाइप न छूने की शर्त पर!
सक्शन-पाइप को टैंकर के नोजल से जोड़ना, उसे सेप्टिक-टैंक के सीवर में उतारना, काम पूरा होने पर उसे धो-पोंछकर समेटने का काम वह स्वयं करता।
पहले तो नहीं, लेकिन बाद में शुष्क शौचालय पर रोक लग जाने से, क्या गाँव और क्या शहर, सभी जगह फ्लश-सिस्टम वाले शौचालय बनने लगे तो काम भी ज्यादा आने लगा।
अब उसे एक ऐसे आदमी की जरूरत थी जिसे सीवर ‘छूने’ से परहेज़ न हो! और जो सेप्टिक-टैंक की सफाई के कार्य में पूरा सहयोग भी करे।
'वे' ने रमेसर की बातें तल्लीन होकर सुना। फिर छेनीवाले को देखकर, जो सक्शन-पाइप को थामे सेप्टिक टैंक में इधर-उधर घुमा रहा है, सोचा -
'शायद यही वह आदमी है जिसकी तलाश रमेसर को थी।'
फिर रमेसर को कहते सुना-
"यदि यह न मिला होता तो सेप्टिक टैंक सफाई वाला बिजनेस परवान न चढ़ता।"
यह कहकर रमेसर मुस्कुरा उठा! ११।।
छेनीवाला आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है!
छेनीवाले के प्रति 'वे' की जिज्ञासा देख रमेसर ने उसकी कहानी 'वे' को सुनाने लगा -
"पहली नजर में तो मुझे यह पागल ही लगा था!
जिसे अपनी टीम में शामिल करना होता है पहले उसकी जाति पूँछता हूँ। लेकिन इसकी तो जाति पूँछने की नौबत ही नहीं आई।
गाँव की बस्ती से दूर सीवान में एक कमरे की, झोपड़ीनुमा इसकी कोठरी देख, मैंने इस आदमी से केवल यही पूँछा था-
"यहाँ बस्ती से दूर अकेले में घर क्यों बनाया?"
यह छूटते ही बोला था -
“मेरी कोई जाति नहीं इसलिए।”
"फिर जैसे ही मैंने इससे साथ में काम करने के लिए पूँछा तो यह आदमी सहर्ष तैयार हो गया था! मजदूरी भी नहीं पूँछा।
उस दिन कस्बे में सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए जाना था। लेकिन टीम में ट्रैक्टर-ड्राइवर और मैं, केवल दो जने ही थे, एक आदमी की और जरूरत थी। किसी ने इसके बारे में बताया। इसका घर उस कस्बे से सटे गाँव में था। इसका घर बस्ती से काफी दूर खेतों में बना था। ट्रैक्टर बाग में खड़ा कर इसके घर तक पैदल गया था।
पुकारने पर यह कोठरी से निकला। इसे देखते ही मुझे आश्चर्य हुआ कि यह पागल इस बियाबान में अकेले कैसे रह लेता है। फिर दरवाजे पर मेरी नजर गई, वहाँ कीवाड़ की ओट में एक स्त्री खड़ी दिखाई पड़ी, उसके माथे पर सिंदूर की मोटी रेखा थी ठिगनी भी वह ऐसी कि जैसे उसकी पीठ में कूबड़ हो!
उस स्त्री को देखते ही समझ गया था कि सामने खड़ा यह आदमी सूरत और सीरत से एक जैसा नहीं है।
पहले ही दिन इसे छेनी-हथौड़ी देकर मेनहोल का ढक्कन खुलवाया था। बिना किसी हिचक के इसने वे सारे कार्य किए थे जिसे आज यहाँ कर रहा है।
काम पूरा होने के बाद सब चलने को हुए तो घर के मालिक से इसने बख्शीश मांग लिया। तभी मुझे इसके ‘बड़के दिमाग’ से परिचय हुआ। बख्शीश मांगने वाली बात तो कभी मेरे दिमाग में आई ही नहीं थी। उस दिन कुल साढ़े तीन सौ रूपए यह पाया था। उस पहले दिन से ही यह 'छेनीवाला' बन गया।
एक दिन तो हद ही हो गई, जब इसने कहा कि उसकी औरत एक अनाथ बच्चा पालना चाहती है। यह सुनकर बहुत विस्मय हुआ था। फिर इसने ही बताया था कि “उसकी औरत को विकलांग पेंशन के पंद्रह सौ रूपए महीने मिलते हैं, वह भी मजदूरी कमा लेता है, दोनों आसानी से बच्चा पाल लेंगे।”
बात पूरी होते ही रमेसर ने 'वे' से कहा -
"यह छेनीवाला न, आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है, इसीलिए इसे आदमियों की बस्ती से दूर घर बनाकर रहना पड़ता है!"
रमेसर के मुँह से छेनीवाले की कहानी सुनकर 'वे' ने किंचित आश्चर्य में पड़कर कभी छेनीवाले तो कभी रमेसर की ओर देखते! छेनीवाले के बारे में जानने की जिज्ञासा उनके चेहरे पर साफ झलक उठी।
वह छेनीवाले की किसी भी दुखती रग को नहीं छेड़ना चाहता था। लेकिन यह स्वाभाविक है कि पाठक जिज्ञासु होता है! उसकी जिज्ञासा शांत करने के लिए लेखक को अब कहानीकार की भूमिका में उपस्थित होना होगा। ।।१२।।
बऊकपन और छेनीवाला!
छेनीवाले की कहानी पर 'वे' भौंचक्का थे, इसे रमेसर ने ताड़ लिया, बोला -
छेनीवाले की दुखती रग को वह नहीं छेड़ना चाहता। लेकिन लोगों से ही धीरे-धीरे इसकी कहानी पता चली -
पाँच भाइयों-बहनों में सबसे छोटा था छेनीवाला। माँ-बाप के अतिशय लाड़-प्यार और देखभाल के तरीके से इसके मानसिक विकास में बाधा आई। कभी स्कूल का मुँह भी नहीं देख पाया। धीरे-धीरे लोग इसे ‘बऊक’ समझ बैठे। विवाह की उम्र तक आते-आते इसके माँ-बाप दुनियां से कूँच कर गए। परिवार में अब यह उपेक्षित रह गया।
‘एक बऊक से कौन अपनी लड़की ब्याहेगा’ जैसी बातें इसके विवाह में बाधक बनी। लोग इसका उपहास उड़ाते! इसे कोई बरगलाकर जमीन अपने नाम न करा ले, इस डर से भाईयों ने मृतक बताकर इसके हिस्से की जमीन अपने नाम करा लिया। भाई भी गाँव छोड़कर शहरों में रहने लगे तो इसके सामने जीवन-यापन की समस्या उठ खड़ी हुई।
एक दिन यह उड़ीसा चला गया। कई वर्षों तक नहीं लौटा तो लोग इसे मृतक मान बैठे। भाई भी इसे भूल चुके थे। फिर अचानक एक दिन गाँव में प्रगट हो गया था। इसके साथ वह कूबड़वाली स्त्री थी। जिसे इसने अपनी पत्नी बताया। लेकिन गाँव में इसके ही घर का दरवाजा इसके लिए नहीं खुला। बल्कि भाईयों ने इसे जाति बहिष्कृत मानकर परिवार का सदस्य मानने से भी इन्कार कर दिया।
छेनीवाला इस विकलांग औरत के साथ गाँव में कई दिनों तक भटकता रहा। उपहास का विषय बन गया। लेकिन इसका यह ‘बऊकपन’ ही इसकी जीवटता थी। जो इसके लिए ढाल बनी।
अंततः भाईयों ने जमीन का एक छोटा टुकड़ा इसे एक कमरा बनाने के लिए दिया। उसी जमीन पर वह कोठरी थी जिसमें कूबड़वाली स्त्री के साथ यह रहता है।
उड़ीसा में यह घरेलू नौकर बनकर रहता था। कूबड़वाली स्त्री उसके मालिक की लड़की थी। उसी को पत्नी बनाकर यह गाँव ले आया था। इसके पिता को भी जैसे अपनी विकलांग बेटी से मुक्ति मिल चुकी थी। ।।१३।।
रमेसर अपनी अनुभूतियों से अपना चरित्र गढ़ता है !
छेनीवाले की कहानी कह चुका तो अचानक रमेसर के मुँह से निकला,
"अच्छा है कि यह आदमियों की बस्ती में नहीं रहता।"
इसे सुनकर 'वे' चौंक उठे, थोड़े विस्मय से भर रमेसर की ओर देखने लगे। 'वे' की इस दृष्टि से रमेसर भी थोड़ा असहज सा हो उठा। फिर बात को मोड़ते हुए बोला,
"बात यह कि यह भी सौदेबाजी सीख जाता..आदमियों के बहकावे में आ जाता!"
बीच सेप्टिक-टैंक की सफाई करते हुए डेढ़ घंटे बीत चुके हैं। ‘वे’ उत्सुक रमेसर और छेनीवाला दो नहीं जैसे एक व्यक्ति हों। दोनों का व्यक्तित्व गड्ड-मड्ड दिखाई पड़ रहा था एक दूसरे के काम में सहयोग करते हुए! बल्कि रमेसर के टीम के दो अन्य साथी इस परिदृश्य में अब तक ओझल ही रहे। इसीलिए ‘वे’ की नोटिस में दोनों नहीं हैं। इधर ‘वे’ देख रहे हैं कि रमेसर और छेनीवाला दोनों मेनहोल पर कई मिनट से झुके हैं। दोनों बारी-बारी एक-दूसरे से सक्शन पाइप अपने हाथ में लेकर मेनहोल में झांक-झांककर इसे सेप्टिक टैंक में घुमाते हुए बचा-खुचा सीवर सुड़कवा रहे हैं! शायद सेप्टिक टैंक का यह सफाई कार्य अब अपने अंतिम क्षणों में है। इस बीच ‘वे’ ने छेनीवाले को लापरवाही से सक्शन पाइप हाथ में पकड़ते हुए देखा! वह पाइप के उस हिस्से पर हाथ लगा रहा है जो टैंक के सीवर में जाता है। इसलिए उसका हाथ सीवर के ‘कीचड़’ से सने हैं। लेकिन रमेसर इस मामले में सजग है वह पाइप के ऊपरी हिस्से को ही पकड़ता है।
अचानक ‘वे’ से मुखातिब होकर रमेसर ने उनसे मेनहोल में देखने के लिए कहा। 'वे' ने जाकर सेप्टिक टैंक में झांका, तली में कीचड़ नहीं केवल पानी था। उनका अनुमान था कि टैंक का गाढ़ा कीचड़ समरसेबल के पानी में पतला होकर सक्शन पाइप द्वारा सुड़का जा चुका है और अब तीन इंच से भी कम पानी बचा है। रमेसर के जब यह कहा कि पाइप अब पानी नहीं खींच पाएगा तो उन्होंने भी इस पर सहमति जताया। क्योंकि वे देख चुके थे कि सक्शन पाइप के आधे मुहाने से भी नीचे पानी है। अब रमेसर ने टैंक में गिरते पानी को बंद कराने के लिए छेनीवाले से समरसेबल का पाइप टैंक से बाहर कराया। फिर वह रमेसर के कहने पर सक्शन पाइप को भी सेप्टिक टैंक से निकालकर धोने लगा। इस सक्शन पाइप का एक सिरा टैंकर के नोजल से जुड़ा था। जिसे एक अन्य साथी ने हटाया। छेनीवाले के अन्य साथियों को देखकर ‘वे’ को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे पाइपें धुलने के बाद ही उसके साथी इसे छुएंगे! उनके मन में आया कि रमेसर से इन साथियों के बारे में कुछ पूँछे। लेकिन रमेसर उन्हें कोई चीज दिखाने के लिए सेप्टिक टैंक के किनारे सबसे ओझल रहने वाले स्थान की तरफ ले गया। उस स्थान की ओर इशारा कर उनसे धीरे से बोला,
“देखिए इसे मैंने यहां किनारे रखवा दिया हूँ, सोचा आपको बता दूँ कि कहीं गलती से कोई इसे हाथ न लगा दे, सुबह किसी से कहकर इसे आप फेंकवा देना।”
‘अरे! यह तो सीवर के कीचड़ में लिथड़ा हुआ वही कपड़ा है जिसे इस रमेसर ने सेप्टिक टैंक से निकलवाया था..तो इसे यहाँ रखवा दिया इसने! अपने आदमियों से कहकर इसे कहीं भी फेंकवा सकता था यह!!’ ‘वे’ ने तनिक विस्मय से सोचा। फिर भी रमेसर से कुछ नहीं कहा।
बदला नहीं वह बदलाव का आकांक्षी है!
कीचड में लिथड़े इस कपड़े को वे फेकवाएंगे रमेसर की इस बात से जैसे उनके (वे) अहं को ठेस पहुँचा था। उनके खयाल में आया कि इन महोदय (रमेसर) के दद्दा और पप्पा हाथ से मैला उठाते रहे लेकिन आज इन्हें सीवर में लिथड़े इस कपड़े को फेंकने से परहेज है इसे ये छूना नहीं चाहते! और तो और, छेनीवाले से भी इसे फेंकने के लिए नहीं कहा, आखिर क्यों? लेकिन अगले ही पल वे मन को सांत्वना देने लगे कि रमेसर सेप्टिक टैंक में पड़ी ऊल-जुलूल कूड़े जैसी चीजों की सफाई करने नहीं आया है, यह ‘कपड़ा’ सीवर का हिस्सा तो नहीं। वह तो केवल ‘कीचड़’ की सफाई करने आया है। पैसा भी उसे ‘कीचड़’ सफाई का ही मिलना है। तो फिर क्यों इस कपड़े को फेंके यही क्या कम है कि उसने इसके बारे में बता दिया नहीं तो अनजाने कोई इसे हाथ लगा देता!! ‘वे’ अपने अहं को कुछ यही सांत्वना दिए। इससे वे सहज हुए तो “अच्छा ठीक है” कहकर रमेसर की ओर देखा जहाँ उन्हें एक सपाट चेहरा मिला!
बल्ब की मद्धिम रोशनी में रमेसर के इस सपाट चेहरे के पीछे के भाव से ‘वे’ अनजान रह गए। रमेसर को एक बात हमेशा कचोटती रही है। जब एक साँझ को दद्दा हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा टिन लिए हुए आते दिखाई पड़े थे तो उसे बहुत अजीब लगा था क्योंकि दद्दा यह काम दोपहर से पहले ही कर लेते हैं। लेकिन बाद में उसे पता चला था कि दद्दा को उस दिन किसी काम से बाहर जाना पड़ा था इसलिए सुबह ब्लॉक कॉलोनी में मैला उठाने नहीं पहुँचे थे। दोपहर बाद उनके लौटने पर साहब ने उन्हें बुलाकर बहुत डाटा था और तुरंत जाकर मैला उठाने के लिए कहा। फिर उस दिन सांझ को वे मैला उठाने गए। इसे वह आज तक नहीं भूला है। अहं की कौन कहे उस दिन उसके निरीह दद्दा की मानवीय गरिमा का भी ध्यान नहीं रखा गया था। उन दिनों यह सोचकर कि मैला तो साहबों का ही था, इसे उठाने के लिए दद्दा को क्यों डाटा गया, वह गुस्से से भर उठता और उसकी मुट्ठियां भिंच जाती। लेकिन किसी बदले की भावना का वह शिकार नहीं हुआ। बदला नहीं वह केवल बदलाव का आकांक्षी है! जिसके लिए उसकी पीढ़ियाँ गुजर गईं थीं। बदलाव की यह आकांक्षा जब उसमें तारी होता तो उसका चेहरा ऐसे ही सपाट हो जाता है।
रमेसर ने किंचित गर्व से ‘वे’ को नजर भर देखा! ‘वे’ सेप्टिक टैंक के बगल में पड़े सीवर के कीचड़ से सने उस कपड़े को देख रहे थे। उनके कंधे से कंधा मिलाए वह भी उनके बराबर खड़ा हुआ उनसे ही इस कपड़े को फेंकवाने की बात कह रहा है! यह बदला नहीं, बदलाव लाने का आग्रह था। इस आग्रह में उसके आत्मविश्वास का सामर्थ्य है! फिर न जाने क्यों उसने आसमान की ओर भर नजर देखा, जैसे अपने इस सामर्थ्य को वह दद्दा और पप्पा को दिखाना चाहता हो! उधर ऊपर आसमान में टिमटिमाते तारे भी उसके बात की गवाही दे रहे थे!! काफी समय हो गया कहकर अचानक वह मुड़ा और ‘वे’ को छोड़कर पोर्टिको की ओर चल दिया। जहाँ कुर्सी पर बैठे बाबू जी से उसे आज के काम का हिसाब करना है।
उसे पोर्टिको की ओर जाते देख ‘वे’ भी पीछे-पीछे चल पड़े। लेकिन तभी छेनीवाले ने उनसे हैंडपंप चलाने के लिए कहा। उसके हाथ और बिना चप्पलों के पैर सीवर के ‘कीचड़’ में सने थे। उसे देखते हुए ‘वे’ को ग्लानि हुई कि बिना दस्ताने और सुरक्षा पोशाक के सीवर सफाई करने वालों को मैन्युअल स्कैवेंजर क्यों नहीं माना जाता! उनका वश चले तो वे इन्हें भी मैन्युअल स्कैवेंजर मान लें! ‘वे’ ने जाकर हैंडपंप चलाया और छेनीवाले ने अपने हाथ-पैर धोए। ।।१५।।
NAMASTE
पोर्टिको में आते ही रमेसर ने बाबूजी को बताया कि टैंक की सफाई अच्छे से हो गई है ‘वे’ ने इसे देख लिया है। इसके बाद उनमें यह बातचीत हुई,
बाबूजी ने पूँछा, “तो कितना दे दें।”
“इसमें क्या बताना, साढ़े तीन हजार का एक चक्कर होता है।” रमेसर ने कहा।
“इस हिसाब से तो फिर सात हजार हो जाएगा, जबकि बात पाँच हजार में हुई थी।” बाबू जी ने हिसाब लगा कर बोला।
“दो चक्कर भी तो लगाना पड़ा..अच्छा ठीक है..आपस की बात है आप ढाई हजार प्रति चक्कर के हिसाब से दे दीजिए।” रमेसर ने मुस्कुराकर कहा।
बाबूजी ने गिनकर रमेसर को पाँच हजार रुपए दिए। उसको संतुष्ट देख ‘वे’ को पता चल गया कि एक टैंकर सीवर सफाई के कितने रूपए लगते हैं।
तब तक छेनीवाला अपना बख्शीश वहाँ लेने आ पहुँचा। बाबू जी ने उसे पचास रुपए दिए लेकिन उसने नाखुशी जाहिर कर दिया। उसकी नाखुशी पर रमेसर ने बाबूजी को बताया कि इसे सौ रूपए चाहिए। बाबूजी के पोटली में ढूँढ़ा। लेकिन उसमें सौ रुपया नहीं मिला तो छेनीवाला मायूस हो गया। रमेसर ने उसे समझाया कि चलो, अब नहीं है तो क्या करोगे। ‘वे’ देख रहे उन्होंने अपनी जेब से सौ रुपए का एक नोट निकालकर उसे पकड़ा दिया। मनचाहा बख्शीश पाते ही छेनीवाला और रमेसर दोनों खुश हो गए। फिर रमेसर ने बाबू जी का पहले दिया पचास रुपया छेनीवाले से वापस कराना चाहा। लेकिन वे ने इसे वापस लेने से मना कर दिया।
रमेसर की टीम अब जाने की तैयारी करने लगी। एक सदस्य ने सक्शन पाइप समेटकर टैंकर पर रखा तो दूसरा ट्रैक्टर की ड्राइविंग शीट पर बैठ गया। इधर रमेसर छेनीवाले से कुछ कहने को हुआ लेकिन अचानक से चुप हो गया और उसे वहाँ ले गया जहाँ सीवर में लिथड़ा वह कपड़ा पड़ा था। इसे दिखाकर किसी चीज में लपेटकर इसको दूर फेंक आने के लिए कहा। इसे लेकर अचानक रमेसर का मन कैसे बदल गया! वे सोचने लगे।
रमेसर की चेतना-शक्ति ने बचपन से ही उसे आत्मसम्मानी बनने के लिए प्रेरित किया। जन्म, जाति और कर्म के दुश्चक्र से बाहर निकलने के लिए उसे पहले नैतिक धरातल अपना व्यक्तित्व मजबूत रखना था। इसीलिए गरीबी और तमाम आर्थिक परेशानियों के क्षण में भी वह लालची और स्वार्थी नहीं बना क्योंकि ये गुण व्यक्ति को छोटा बनाते हैं। किसी के बराबर खड़े होकर सौदेबाजी करने का साहस भी वह इसलिए अर्जित कर पाया कि न तो किसी के एहसान तले दबकर उसे कमजोर और छोटा बनना था और न ही किसी को छोटा बनाना! दद्दा और पप्पा जैसे दो छोर के बीच खड़ा वह जीवन की स्थितियों को देख, सुन और समझ रहा था। उसके लिए कोई काम छोटा-बड़ा या ऊँच-नीच नहीं है उसे अपने काम का मेहनताना चाहिए बस! बख्शीश में छेनीवाले को सौ की जगह डेढ़ सौ रूपए मिले। वह ईमानदार और खुद्दार सौदेबाज और सेवा प्रदाता है और उसमें पेशागत ईमानदारी भी है इसीलिए अतिरिक्त बख्शीश से मिली खुशी के प्रतिमूल्य में उसने छेनीवाले से उस कपड़े को फेंकने के लिए कहा। छेनीवाला दूर कहीं उस कपड़े को फेंक भी आया था।
पुनः हैंडपंप पर छेनीवाले का हाथ धुलाते हुए ‘वे’ उसके और रमेसर के बारे में सोचने लगे। रमेसर एक दुश्चक्र से पार पाने की जद्दोजहद में अपनी चेतना-शक्ति और मार्मिक स्मृतियों से प्रेरणा पाता है तो वहीं छेनीवाले का यह चरित्र ‘परिस्थितिजन्य’ है उसके जीवन में कोई प्रेरणाश्रोत नहीं। बल्कि उसका बऊकपन, उसके भाई और उसका जाति निकाला उसकी आज की ‘परिस्थिति’ के कारक हैं। दोनों की पीड़ा की अनुभूति का धरातल भिन्न हैं! छेनीवाले में आंतरिक और वाह्य किसी प्रकार का कोई संघर्ष नहीं। ज्यादा से ज्यादा उसका संघर्ष ‘मार्मिक चालाकी’ तक सीमित है। लेकिन रमेसर आंतरिक और वाह्य और चेतना के प्रत्येक स्तर पर, संघर्षशील है! यह रमेसर के लिए कितनी मार्मिक बात है कि उसके और छेनीवाला दोनों के हाथ सीवर की कीचड़ में सने हैं फिर भी छेनीवाले के साथ वैसा भेदभाव नहीं होता जैसा रमेसर के साथ होता है! इससे समझा जा सकता है कौन नायक है और यह कहानी किसकी है!!
वे याद करते हैं एक स्वच्छकार विमुक्ति सम्मेलन में इसी नायकत्व के कारण रमेसर जैसे एक योद्धा को सम्मानित कराया जा रहा था। उस सम्मेलन में कुछ ऐसी ही कहानी उस व्यक्तित्व की वहाँ बताई जा रही थी। इसीलिए आज इस सेप्टिक टैंक के सफाई अभियान पर उनकी दृष्टि लगातार जमी रही। यहाँ स्वयं रमेसर उस स्वच्छकार विमुक्ति में सम्मानित होने वाले योद्धा की हू-ब-हू प्रतिमूर्ति है।
इसी बीच ट्रैक्टर स्टार्ट होने की आवाज सुन छेनीवाला ट्रैक्टर पर सवार होने चला गया। बाबूजी के पास खड़ा रमेसर उनसे नमस्ते किया और ट्रैक्टर की ओर मुड़ा। तभी ‘वे’ पर उसकी दृष्टि पड़ी, फिर वे को भी उसने हाथ जोड़कर नमस्ते कहा। प्रतिउत्तर में ‘वे’ ने भी हाथ जोड़े और नमस्ते बोला!! लेकिन अगले ही पल जब उनको अपने इस ‘नमस्ते’ का खोखलापन समझ में आया तब उनका ध्यान रमेसर और उसकी टीम के ईकोसिस्टम के लिए बने NAMASTE पर गया!! रमेसर हो या छेनीवाला या उसकी टीम के अन्य सदस्य, इनके लिए खड़े होकर यह NAMASTE बोलना चाहिए। जिसका अर्थ है National Action For Mechanised Sanitation Ecosystem. सरकार इनके लिए 2022 से ही यह NAMASTE बोल रही है! अब तो 2025 का आगाज हो चुका है ऐसे में यह NAMASTE अब इतनी जोर से बोला जाना चाहिए कि इसकी आवाज देश में सभी जगह सबको सुनाई पड़े और जिसकी प्रतिध्वनि बहुत समय तक गूँजती रहे। ।।१६।।
(जी हाँ अब NAMASTE…NAMASTE… )
- विनय कुमार तिवारी
