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यह अकथ-मन ! यहाँ प्रश्नों और उत्तरों की टकराहटों में एक सार्थक दुनियाँ तलाशनें की आकुलता है...
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गुरुवार, 11 जून 2026
परसेप्शन बनाएं लेकिन…
भारत को तो बख्श दीजिए!
साढ़े पांच बज रहे होंगे जब मैं आवास की छत पर आया। इस भोर की एक तस्वीर भी ली। तस्वीर लेते समय मुझे कामायनी की यह पंक्ति याद आई,
'दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात'
स्टेडियम पहुंचते ही शुक्ला जी इनडोर बैडमिंटन कोर्ट की ओर चले गए और मैं खुले ग्राउंड की ओर। दौड़ते हुए इस मैदान का मैंने दो चक्कर लगाया। और फिर सामान्य चाल से एक चक्कर और पूरा किया। ग्राउंड का एक चक्कर लगभग पांच सौ कदम का है।
बालीबाल टीम के सदस्य दृष्टिगोचर हुए। तो उनके ग्राउंड की ओर चला गया। चूंकि मैं बालीबाल खेलना सीख ही रहा हूँ, इसलिए कौन कैसे बाल हैंडल करता है, ध्यान से देखता हूँ। आज भी ध्यान इसी पर था।
उन्हें मैं मझा खिलाड़ी समझता था, लेकिन साथी खिलाड़ी को बॉल पास करने में उनसे चूक हो गई। वह गलत दिशा में चली गई। मुझे लगा बॉल को नहीं छूना चाहिए था। लेकिन फिर मन में कौंधा कि यदि बाल को हैंडल करने में कोई गलती हुई है तो उससे सीख ही मिलेगा।
स्टेडियम से लौटते समय शुक्ला जी साथ थे। उन्होंने कहा, "जो विजेता होता है, वही इतिहास लिखता है और विजेता वही होता है जो लड़ता है।" उनकी यह बात सही लगी।
कश्मीर से धारा 370 हटाने पर विवाद और संघर्ष की आशंका थी। लेकिन यह भी एक प्रयास है, समस्या से लड़ने का।
एक बात अनुभव से भी सीखता आया हूँ, सही मन से लिए गए निर्णयों के परिणाम अच्छे होते हैं। यहाँ हार में भी जीत होती है।
लोग कश्मीर पर दिल जीतने का तर्क देते हैं। लेकिन हँसी आती है इसपर। क्या दिल जीतना इतना आसान है? वैसे 'राज्य' के सारे कानून दिल जीतने के लिए ही तो हैं फिर भी दिल हैं कि मानता नहीं और समस्या ज्यों की त्यों!
भाई मेरे! राज्य अपने नागरिकों का दिल जीतने वाला कानून तो बनाता ही है लेकिन दूसरी ओर उसे ऐसे कानून भी गढ़ने होते हैं जो स्वयं राज्य को भी संरक्षित करे। इसलिए इन बातों पर ज्यादा हाय-तौबा मचाने और बौद्धिक विश्लेषण की जरूरत नहीं।
मैं देख रहा हूं, धारा 370 हटाए जाने की व्याख्या तमाम नजरिए से हो रही है। जैसे, राष्ट्रवादी, संम्प्रदायवादी, वामपंथी, बुद्धिवादी, संविधानवादी और राजनीतिक; सबकी अपनी-अपनी व्याख्या।
लेकिन सबसे अधिक घातक साम्प्रदायवादी व्याख्या है। ऐसा करने वालों को मैं "नान-स्टेट-ऐक्टर" मान सकता हूँ। ये राज्य की अवधारणा को फालो नहीं करते। यह उर्वर जमींन में ज़हर बोने जैसी व्याख्या है।
खैर यह तो हमारे संविधान की खुबसूरती है कि यहाँ ज़हर बोने की भी स्वतंन्त्रता है!
रही बात कुछ साहित्यकार टाइप के बुद्धिजीवियों की, तो उनकी बात ही निराली है।
प्रकाशकों की कृपा से साहित्यकार बने इन बेचारों को, बस बात को घुमाफिरा कहने की कला भर आती है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। दिल्ली में बैठकर साहित्य नहीं रचा जा सकता। ये अपनी बातों में जबर्दस्ती का साहित्य ठूँसते हैं। जनसरोकार के नाम पर जन से कटे हुए लोग हैं ये।
जहाँ तक ‘लोकतंत्र विरोधी’ जैसी राजनीतिक व्याख्या की बात है, तो उन्हें भी समझना चाहिए कि सत्ता को ताकत भी लोकतंत्र से ही मिलती है।
एक बात और, संविधानवादी व्याख्या की बात है, तो संसद की बात माननी ही पड़ेगी, बाकी सर्वोच्च न्यायालय है ही इस बात की व्याख्या करने के लिए।
अंत में एक बात, प्रकृति ने ही भारत की सीमा को निर्धारित किया था। शायद यही कारण रहा होगा कि इसके एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक हजारों वर्षों से निर्बाध आवागमन चला। अगर ऐसा न होता तो अफगानिस्तान में बामियान न होता, या फिर एक ही संस्कृति के प्रमाण न मिलते।
भाई मेरे, यह भारतभूमि यूरोपियन देशों की तरह किसी राजनीतिक एकता का परिणाम नहीं, एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण का परिणाम था, और आप इसकी तुलना सोवियत या यूरोपियन यूनियन के देशों से करते हो!!
कामरेड, इसे समझिए, आप जैसे लोग धर्म को धर्म नहीं, किसी खास राजनीतिक विचारधारा को ही धर्म मानते हो, या फिर धर्म को संम्प्रदाय बना देते हो, अन्यथा धर्म के नाम पर देश का विभाजन न हुआ होता।
अब तो भारत को बख्श दीजिए और इसे तोड़ने वाले प्राविधानों को ही तोड़िए!
मित्रों, इस सुबहचर्या को मैंने थोड़ी तल्खी में लिख डाला है, क्षमा करें।
#चलते_चलते
किसी चीज के लिए किया गया हमारा सद्प्रयास ही अपने आप में विजय के समान होता है।
#सुबहचर्या
(८.८.१९)
बुधवार, 10 जून 2026
अरे साहब, आपने इन्हें..!
घड़ी में अभी सात भी नहीं बजे थे। दसेक मिनट बाकी था सात बजने में। यूँ ही घर के अंदर-बाहर चहलकदमी करने लगा।
दरअसल आज नींद पांच-बीस पर खुल गई। मोबाइल देखा। शुक्ला जी का एक मिसकाल था। पाँच उन्नीस पर आया था यह काल। उन्हें फोन मिलाया। उनींदी-सी आवाज में वे बोल रहे थे कि तैयार हो लीजिए।
खैर रात में तीन-चार बार नींद खुली थी। कारण कि मेरे कंधे का दर्द मुझे बेचैन किए था। यह दर्द चार-पांच महीने से है। तो ठीक से सो न पाने के कारण मन में आलसपन भी था। बिस्तर छोड़ते ही चाय पीने का मन हुआ। चाय बनाने चला गया।
चाय बनी। चाय पीते हुए व्हाट्सअप पर मित्रों के गुडमॉर्निंग संदेश देखने लगा। इधर यहाँ श्रावस्ती में दो-तीन महीने से नेटवर्क की जबर्दस्त प्रॉब्लम है। पता नहीं क्यों? न संदेश खुल रहे थे और न भेज पा रहा था। बात केवल गोल-गोल घूमकर ट्राई अगेन पर रुक जाती। दिन में सिंग्नल मिलता भी है तो सुबह की "सुप्रभात" दोपहर बाद कहने में संकोच होता है। खैर चाय पीते हुए मैंने फटाफट good morning वाला संदेश छोड़ दिया कि नेटवर्क आते ही यह चला जाए।
चाय और गुड मॉर्निंग से निवृत्त हुआ तो शुक्ला जी के यहां चल पड़ा। लेकिन वे स्टेडियम के लिए निकल गए थे। मैं भी खरामा-खरामा उसी ओर चल पड़ा।
स्टेडियम के मोड़ पर पहुँचा तो कल की सुबहचर्या पर भाई यशवंत सिंह जी की टिप्पणी याद आ गई। उनकी टिप्पणी थी, "बुढ़ौती में खेल मत खेला।" हालांकि इसी पर भाई रनवीर सिंह चौहान जी ने भी शायराना अंदाज में टिप्पणी किया था कि "दाढ़ी की सफ़ेदी पे न जाओ/सालों की बटोरी हुई चाँदी है वो।" ये दोनों टिप्पणियां जैसे एक-दूसरे को संतुलित कर रहीं हों, सोचकर मुस्कुरा उठा।
लौटते समय एक खच्चर जैसा घोड़ा सड़क के किनारे गिरा पड़ा था। उसके शरीर एक-दो कौवे बैठे उस पर चोंच मारते दिखाई पड़े। वहां किसी वाहन के शीशे के छोटे-छोटे टुकड़े भी बिखरे पड़े थे। इस घोड़े को रात में जरूर किसी वाहन ने टक्कर मारा होगा। एक दूसरा खच्चर उस मृत खच्चर के पास खड़ा था। उसकी आंखों से आंसू बहता प्रतीत हुआ। मैं भी उस खच्चर के दुख से दुखी-सा हो उठा। मुझे लगा दुख या कष्ट प्राकृतिक है किस प्राणी को नहीं होता? चाहे वह मनुष्य हो या फिर जानवर, संवेदना की अनुभूति तो सभी को होती है।
जब मैं घर के अंदर-बाहर चहल-कदमी कर रहा था, तो निगाह बड़े होते उस पाकड़ के पेड़ पर पड़ी, जिसे काटने के लिए मैं कई बार मंगलेश्वर से कह चुका था। एक बार तो वह कुल्हाड़ी भी लाया था, लेकिन फिर उसे वापस लेकर चला गया।
असल में वह उसे काटना नहीं चाहता था, यही नहीं घर की दीवारों के एकदम किनारे बड़े होते पीपल के पौधों को काटने से उसने यह कहकर मना कर दिया था कि किसी अन्य संम्प्रदाय के व्यक्ति को बुलवाकर इन्हें हटवा देंगे।
इस बीच ये पौधे बड़े हो चुके थे, इनसे दीवारों को नुक़सान पहुंचने का डर हो आया था। यही नहीं, उन पौधों के बीच सांप वगैरह के छिपने का भी डर था।
आज मैंने स्वयं इन पौधों को वहां से हटाया। मंगलेश्वर महोदय अभी जब सुबह आए तो आश्चर्य से पूंछा,
'अरे साहब, आपने इन्हें..!"
मैंने उसे समझाया - “इनसे दीवारों को नुकसान होता और फिर उसकी झाड़ में कोई सांप-वांप भी तो छिप सकता था, वैसे भी अपने रहने के आसपास की जगह को साफ-सुथरा तो रखना ही चाहिए।”
वाकई! कितनी चिंता रहती है हमें एक कण से लेकर पेड़ पौधे और सभी प्राणियों तक की!!
हाँ, टहलकर लौटते समय अखबार देने वाला बच्चा मिल गया था, आज अखबार की वैन देर से आई थी। बच्चे ने रास्ते में ही मुझे अखबार पकड़ा दिया था।
अखबार के पन्नों पर छपी खबरें पढ़ने लगा, अगर मीडिया या अखबार न होते तो क्या होता?
लेकिन राज्य हो या यह मीडिया, सबको देर से जागने की आदत हो चली है। मतलब तब तक घटनाएं घटकर खबर बन चुकी होतीं हैं।
आज यह सब लिखने का मन नहीं था। लेकिन सुबह की टहलाई के बाद लौटा तो मन भीतर तक निश्चल और शांत हो चुका था। सुबह जो भी देखा सुना उसे लेकर मन के भाव, व्यक्त होने के लिए भीतर ही भीतर कुलांचें मार रहा था। सो लिखना पड़ा।
#चलते_चलते
देर से जागने पर केवल लकीर पीटना भर रह जाता है।
#सुबहचर्या
(२.८.१९)
यूँ ही में अच्छा लगना
सुबह उठे तो मन ने यूँ ही टहलने न जाने का इरादा जता दिया। पीछे वाला दरवाजा खोलकर पूरब दिशा की ओर निहारा। मखमली-से बाल सूरज के दर्शन हुए। लेकिन मैं इनके इस भोले रूप के भुलावे में नहीं आया। जानता था, अभी दो-चार घंटे बाद यही अपने उग्र स्वरूप में दिखाई पड़ेंगे। उस आने वाली तीखी तपन की कल्पना भर से इनके इस बाल रूप की भृकुटी मुझे टेढ़ी नजर आने लगी। अभी से मुझे गर्मी का एहसास होने लगा।
मैं बाहर आया। पौधों पर निगाह गई। पत्तियों पर धूल-गुबार की परत जमी हुई थी। इससे इन पौधों का दम घुटता नजर आया। मैं कमरे से झाड़ू लेकर आया। इन पौधों के आस-पास सफाई किया। फिर बाथरूम में गया। नल की टोंटी खोली। बाल्टी भर गई, तो उसे लेकर फिर इन पौधों के पास आया। उस पानी से इन्हें नहलाया। धूल हटते ही पत्तियाँ चमक उठी, जैसे पौधे खिलखिलाकर मुस्कुरा उठे हों।
अब कमरे की ओर लौटा। देखा, कमरों के फर्श पर भी धूल की महीन-सी परत जमी थी। तीन-चार बाल्टी पानी कमरों में फैलाया। फिर वायपर से उसे खींचकर बाहर कर दिया।
घर के आसपास यदि थोड़ी नमी बनी रहे तो मुझे अच्छा लगता है। वैसे भी हमारा देश धूल-धक्कड़ और गर्मी-सूखे से प्रभावित भू-भाग माना जाता है। शायद बाबर ने अपनी किताब बाबरनामा में इसका ज़िक्र किया है।
खैर, यह सब करके मैंने मन के इरादे को ही चकमा दे दिया था, “बच्चू! मत ले चलो मुझे टहलाने, मैंने भी यूँ ही में काम भर का एक्सरसाइज तो कर ही लिया।
इसके बाद चाय बनानी शुरू की। आज दूध कुछ गड़बड़-सा लगा। फटा तो नहीं था, फ्रिज में ही रखा था और रात भर बिजली भी रही थी। दूध सीधे फ्रिज से ही निकाला था। लेकिन उसमें चिकनाई कुछ जियादा ही प्रतीत हो रही थी।
चाय पीते हुए देखा, गिलास की सतह पर कुछ महीन कण जैसे जमा हो गए थे। मन में आशंका उठी, कहीं दूध मिलावटी या बनावटी तो नहीं? यह सोचकर दूधिए पर मन ही मन गुस्सा भी हुआ। फिर मन को यह कहकर शांत किया कि कल उससे इस बारे में जरूर पूछूँगा। आखिर पूरी चाय भी नहीं पी पाया। गिलास वैसे ही रख दिया।
इधर आज ईद है। सोशल मीडिया पर इस पर कोई बढ़िया सा शुभकामनाओं वाला संदेश खोजा। इसे फेसबुक के टाइमलाइन पर पोस्ट कर दिया। सोशल मीडिया से ही पता चला कि आज विश्व पर्यावरण दिवस भी है। इसपर शुभकामना संदेश देने की इच्छा ही नहीं हुई। क्योंकि सोशल मीडिया पर दिए संदेश से धरती हरी-भरी नहीं होने वाली!
ठीक इसी समय दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज हुई। दरवाज़ा खोलकर देखा, दो नन्हें-मुन्नें-से बच्चे अपने नन्हें हाथ में दूध का डिब्बा लिए खड़े थे। उन्हें घूरते हुए मैंने दूध का डिब्बा ले लिया। भगोने में उड़ेला। दूध ठीक दिखाई पड़ा। बच्चों को खाली डिब्बा लौटाते हुए सोचा, दूध के लिए इन्हें क्या बोलें! ये बच्चे क्या समझेंगे।
दूध को लेकर बच्चों से कुछ नहीं कहा बल्कि उनसे इतना भर पूंछा, "तुम्हारे यहां भैंस दूध देती है?"
इस प्रश्न पर बच्चे ने सहमति में सिर हिलाया कि भैंस है वह दूध देती है। बच्चे झूँठ नहीं बोलेंगे। तो दूध बनावटी या नकली नहीं रहा होगा। मैंने निष्कर्ष निकाला। लेकिन साथ में यह भी मन में आया कि इस जमाने में "आदमी के लालच का कोउनऊ भरोसा नाहीं!"
एक बच्चे ने मुझसे अखबार मांगा। असल में बच्चे जब भी दूध लेकर आते हैं तो मुझसे पुराना अखबार जरूर मांगते हैं। एक दिन मैंने इनसे पूंछा था कि "अखबार का क्या करोगे?" "किताबों पर जिल्द चढ़ाएंगे।" उनकी उस बात से मुझे भी अपना बचपन याद आ गया था। मैंने बच्चों को अखबार दिया और वे चले गए।
उनके जाने के बाद मैं कमरे में आ गया। बिस्तर पर नजर गई। चादर और तकिए के खोल कुछ मैले-से दिखाई पड़े। उन्हें समेटकर बाथरूम में ले आया। बाल्टी में सर्फ घोला और चादर तकिए के खोल उसमें भिगो दिए।उन्हें बाल्टी में डाल दिया।
इतने में मंगलेश्वर भी आ गए थे। जो मेरा खाना बनाते हैं। लेकिन मैं चुपचाप चादर और तकिए के खोल धोता रहा। फिर उन्हें सूखने के लिए धूप में फैलाने बाहर आया। यह देखते ही मंगलेश्वर बोले,
अरे साहब, आप क्यों धोए? मैं धो देता..!"
मैंने जैसे अपनी सफाई देते हुए कहा,
“नहीं यार, इसी बहाने थोड़ी मेहनत भी हो जाती है।”
वह चुप हो गया और हमारे हाथ से कपड़े लेकर रस्सी पर फैलाने लगा। खैर..
#चलते_चलते
कभी-कभी मन, अपने अरयें ही मस्त-सा हो उठता है! फिर उसी मन:स्थति में जो भी हम करते या सोचते हैं, हमें अच्छा लगता है। मतलब छोटी-छोटी बातें भीतर एक संतुष्टि और अपनापन भर जाती हैं।
#सुबहचर्या
5.6.19
विनय
सोमवार, 8 जून 2026
खैर, हम ऐसे ही हैं!
शनिवार, 6 जून 2026
दरिया से लौटती नेकी
उस दिन मैंने कोई नेकी नहीं की थी
बस इतना हुआ था कि
किसी बड़े शो में,
बड़े लोगों के बीच पहुँचकर
इतराने की बजाय
किसी की नेकी में शामिल हो गया था
शायद वही मेरी नेकी थी।
तभी किसी पुराने जमाने की कही बात
याद आ गई -
“नेकी कर, दरिया में डाल।”
मैं अपनी नेकी पर दयावान हो उठा।
सोचा,
बेचारी को दरिया ही पसंद होगा।
इसीलिए नेकी को कंधे पर लादे
उदास मन से
मैं दरिया की तलाश में निकल पड़ा।
शायद उस जमाने में
नेकी कोई अजूबा नहीं रही होगी,
कोई ऐसी चीज नहीं
जिसे दिखाकर इतराया जाए।
तभी तो,
उसे दरिया में बहा देने का चलन रहा होगा!
लेकिन अब
कोई ऐसी दरिया नहीं
जिसके झिलमिल, कल-कल पानी में
मेरी नहीं, नेकी ही सही,
यह कह सके -
“देखो, मैं अब भी जिंदा हूँ!
मैंने दरिया को देखा,
अब समझ गया -
इसके काले पड़ चुके जलों में
नेकी का दम घुट जाएगा,
वह मर जाएगी।
फिर कौन मानेगा
कि दुनियां में
कभी नेकी जैसी कोई चीज भी थी।
मैं लौट पड़ा
उसे फिर अपने कंधे पर लादे।
मगर अब
उसके बोझ से
मेरे कंधे दुखने लगे थे।
तभी नेकी तडफड़ाई,
और मुझपर दया करके बोली,
तू क्यों दबता है
मेरे बोझ तले?
ले चल मुझे
सोशल मीडिया पर डाल दे।
वहाँ लोग देखेंगे मुझे!
शायद कोई कह उठे,
इस चमकीली, भड़कीली दुनियाँ में
नेकी अब भी
किसी कोने में दुबकी मिल जाती है।”
- विनय
काठियावाड़ का खारा पानी
आज पाँच बजे ही आँख खुल गई। सोमनाथ से निकलना था। कुछ देर तक यूं ही चहल-कदमी करता रहा। फिर नहाने का विचार आया, लेकिन यहाँ यह भी कठिन काम लगा। दरअसल पानी इतना खारा था कि जैसे सीधे समुद्र का पानी हो! मैंने होटल वाले से पूँछा भी था, *क्या सीधे समुद्र का पानी सप्लाई करते हो?” वह हँसकर बोला था, “नहीं, बोरिंग का पानी है।”
गुजराती भोजन में मीठे का प्रयोग होता है। साथ में छाछ भी होता है? मैं इसपर सोचने लगा कि ऐसा क्यों? मुझे लगता है पूरे काठियावाड़ के भोजन में एक अलग तरह का स्वाद संतुलन दिखाई देता है। यहाँ दाल-सब्जियों में हलकी मिठास, साथ में छाए, और कई व्यंजनों में दूध-घी या खोए का प्रयोग सामान्य बात है। यह पहले तो मुझे थोड़ा अजीब लगा लेकिन फिर मुझे भी ऐसे भोजन का स्वाद अच्छा लगने लगा। दरअसल इसके पीछे केवल स्वाद नहीं, बल्कि वहां की जलवायु और जीवन स्थितियों का बड़ा हाथ है।
काठियावाड़ क्षेत्र में पानी स्वभावत: कुछ खारा या क्षारीय है। संभव है भोजन में मिठास और छाछ का प्रचलन इसी खारेपन को संतुलित करने से जुड़ा हो। वैसे भी गर्म जलवायु में छाछ भोजन को सुपाच्य रखता है।
गुजरात व्यापारिक प्रदेश है। यहां यात्राएं भी लोग करते रहे होंगे, लंबी यात्राओं में भोजन खराब न हो इसलिए भोजन को मधुर और सुपाच्य रखने की परंपरा रही होगी। यही बात यहां की भोजन-संस्कृति का हिस्सा बन गई हो।
खैर जो भी हो, यहां बाटी भी खोया डालकर बनाते हैं, यह बहुत स्वादिष्ट होता है। घी और खोए की वह मिली-जुली सुगंध साधारण बाटी को भी एक अलग ही व्यंजन बना देती है। पहली बार खाने पर लगता है जैसे राजस्थानी बाटी और किसी मिठाई का स्वाद एक साथ मिल गया हो।
यहां काठियावाड़ में नारियल की खेती तो खूब होती ही है, मूँगफली की भी होती है। फिर बीच-बीच में फैले छोटे-बड़े उद्योग और समुद्र से जुड़े बंदरगाह, सब मिलकर यहां की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं।
लगता है भारत के उद्योगपतियों के लिए गुजरात मुफीद जगह प्रतीत हुई। समुद्री बंदरगाहों की उपलब्धता, अपेक्षाकृत कम आबादी वाले विस्तृत भू-भाग, और व्यापारिक दृष्टि से अनुकूल वातावरण ने यहाँ औद्योगिक इकाइयों को तेजी से विकसित होने का अवसर दिया होगा। छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक कहीं न कहीं कोई फैक्ट्री, प्रोसेसिंग यूनिट या औद्योगिक परिसर दिखाई पड़ ही जाता है।
इन्हें देखकर सहज ही समझ में आता है कि उत्तर भारत के इतने मजदूर रोज़गार की तलाश में यहाँ क्यों आते हैं। दरअसल उद्योग केवल पूँजी को नहीं बुलाते, वे श्रम को भी आकर्षित करते हैं। शायद यही कारण है कि गुजरात के शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में आपको उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान तक के लोग काम करते दिखाई पड़ जाते हैं। यहाँ की आर्थिक सक्रियता ने अलग-अलग प्रदेशों के लोगों को एक साझा श्रम-संस्कृति में जोड़ दिया है।
इस समय हम सोमनाथ-अहमदाबाद हाईवे पर चल रहे थे। ऐसे मार्गों का प्रभाव गुजरात की आर्थिक गतिविधियों पर ही नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी अच्छा प्रभाव पड़ा है।
#चलते_चलते
देश में हो रहे विकास के बावजूद भारतीय नागरिक एक जिम्मेदार नागरिक नहीं बन पा रहे हैं।
#सुबहचर्या
(2.07.19)
