सुबह जल्दी उठे। कल द्वारिकाधीश के दर्शन हो गए थे। आज का प्लान सोमनाथ जाने का था। कल मैं द्वारिकाधीश में एक साधू के बगल में बैठा था। जिसकी तस्वीर मैंने फेसबुक पर शेयर की थी।
वैसे किसी भी धर्म के विषय में टिप्पणी करना अत्यंत संवेदनशील मसला है, क्योंकि धार्मिक विचार सीधे आस्था से जुड़े होते हैं। जिसकी जैसी आस्था होती है, उसका धर्म बोध भी वैसा ही आकार लेता है। मनुष्य अपनी आस्थाओं के ताने-बाने से ही अपनी जीवन-शैली, व्यवहार और दृष्टिकोण का निर्माण करता है।
लेकिन धार्मिकों को भी चाहिए कि अपने विचारों को लेकर आक्रांता न बनें। धार्मिक विचार बिल्कुल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित होने चाहिए।
खैर, कल किसी बात पर क्षण भर के लिए मन उदास हो आया था। एक पीतवस्त्रधारी साधू बाबा के बगल में आकर बैठ गया। उनसे अपनी तुलना कर बैठा। उनकी निश्चिंतता से मुझे रश्क-सा हुआ!
वैसे धार्मिक परम्पराओं में संसार को अक्सर ‘भवसागर’ कहा गया है। यहाँ ‘भव’ का अर्थ है जन्म-मरण और उससे जुड़ा यह नश्वर संसार, जबकि ‘सागर’ उसकी अथाह और दुस्तर प्रकृति का प्रतीक है। मनुष्य इस भवसागर में मोह, माया, दुःख, भय, रोग, जरा और मृत्यु जैसी अनगिनत लहरों के बीच डगमगाती जीवन-नौका लेकर भटकता रहता है। अपनी-अपनी चिंताओं, इच्छाओं और अस्तित्व के संकटों से जूझते हुए वह किसी स्थिर तट की तलाश करता है।
तो क्या साधु हो जाने मात्र से कोई इस भवसागर के उस स्थिर तट को पा लेता है? संभवतः नहीं। अनेक साधु-संत इससे मुक्ति का उपाय संसार से कुछ दूरी बनाकर अपनी एक अलग दुनिया रच लेने में देखते हैं। किन्तु वे भी अंततः इसी संसार, इसी भवसागर पर आश्रित रहते हैं। उनकी साधना, उनका वैराग्य, यहाँ तक कि उनका अस्तित्व भी उसी समाज और जीवन-व्यवस्था से जुड़ा होता है, जिससे वे स्वयं को अलग मानते हैं। बस वे जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते।
वैसे, आम भारतीय अपने व्यक्तिगत अस्तित्व को लेकर बहुत अधिक फ़िक्रमंद नहीं रहा, वह अपने होने की निरंतरता को पारिवार और आने वाली पीढ़ियों में अवश्य देखता है, किंतु भारतीय चिंतन ने वानप्रस्थ जैसी अवधारणा के माध्यम से इस भाव को भी संतुलित किया, ताकि पारिवार जैसी संस्था की निरंतरता पर व्यक्ति का अहं न टिक जाए। शायद इसी कारण यहाँ जीवन और जगत की वस्तुओं को क्षणभंगुर माना गया, और वैराग्य तथा अनासक्ति को भी जीवन-दृष्टि का हिस्सा बनाया गया।
लेकिन चतुर और लोभी मन प्रायः अपने अस्तित्व-बोध को ही केंद्र में रखकर जीता है। यही कारण है कि वह परिवार और सामाजिक संस्थाओं को भी अपने अहं तथा वर्चस्व का माध्यम बना देता है। जब व्यक्ति निरंतरता को साधना के बजाय स्वामित्व की दृष्टि से देखने लगता है, तब वही प्रवृत्ति परिवारों और संस्थाओं में विकृतियाँ उत्पन्न कर देती है। जिससे इन संस्थाओं के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो जाता है। सामंती मानसिकता का मूल भी कहीं न कहीं इसी आग्रह में दिखाई देता है।”
भारतीय संदर्भों में धार्मिक विचार एक बहती नदी की तरह रहा है, जिसमें निषेध या बहिष्कार का आग्रह कम, और विविध धाराओं को आत्मसात कर उन्हें अपने प्रवाह का हिस्सा बना लेने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। शायद इसी कारण यहाँ अस्तित्व को स्थिर रूप में बचाए रखने की चिंता से अधिक, जीवन-प्रवाह को सतत और जीवंत बनाए रखने पर बल दिया गया।
लेकिन जब धार्मिक-विचार किसी कठोर सम्प्रदाय में बदलने लगते हैं, तब उनकी यही जीवंतता क्षीण होने लगती है। प्रवाह की जगह आग्रह आ जाता है और समावेश की जगह सीमाएँ खिंचने लगती हैं। तभी अपने बगल में बैठे उस साधु को देखकर मन में यह विचार आया कि कोई भी बाना या पहचान, यदि अस्तित्व-बोध और अहं की चिंता से मुक्त होकर धारण की गई हो, तो वह न कभी दूसरों को भ्रमित करती है और न ही किसी अन्य के होने की अवहेलना करती है।
कल जब हम द्वारिकाधीश के दर्शन करने गए तो वहां के पुरोहित ने मुझसे मेरी जाति पूँछी, मैंने बता दिए! लेकिन अगले ही पल मैंने सोचा मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, एक ऊँच-नीच जातीय मानसिकता वाले समाज में यह किसी और के लिए अपमानजनक हो सकता है। बाद में पत्नी ने भी इसी बात को लक्षित कर मुझसे कहा, "यहाँ तो जाति पूँछते हैं! मुझे खराब लगा।" दरअसल ऐसी ही होती है, अस्तित्ववादी सोच! इसे हम एक अलगाववादी सोच मानते हैं, इसे क्यों न हम एक जिहादी सोच मानें? खैर..
मैंने ओखा में हजारों नावें खड़ी हुई देखी! पहले तो किसी ने बताया ये मरम्मत वगैरह के लिए खड़ी हैं, लेकिन बाद में एक स्थानीय व्यक्ति ने जानकारी दिया कि ये मछुआरों की नावें हैं, मौसम और तेज चलती हवाओं के कारण सरकार ने इन्हें अभी समुद्र में उतारने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है, प्रतिबंध हटते ही यहां एक भी नावें नहीं दिखाई पड़ेंगी!
वाकई, उन नावों और समुद्र को देखते-देखते मेरे भीतर सागर, भवसागर, नाविक, पुरोहित, संप्रदाय, धार्मिक रीति-कुरीतियाँ और जर्जर नावों की छवियाँ आपस में घुलने-मिलने लगीं। मन में प्रश्न उठा, क्या इन धार्मिक नावों के खेवैयों को यह स्मरण है कि नावों की भी समय-समय पर मरम्मत करनी पड़ती है? विचार जब जीवंत रहते हैं तभी वे पार ले जाते हैं, लेकिन जब वे जड़ होकर केवल सम्प्रदाय और मजहबी आग्रह में बदल जाते हैं, तब वे धीरे-धीरे जीर्ण नावों जैसे हो जाते हैं। विडम्बना यह है कि भवसागर से पार होने की आशा में हम आज भी उन्हीं पुरानी, मरम्मत-विहीन नावों पर चढ़े चले जा रहे हैं।
मैं इन नावों के नाविकों से कहता हूं कि- भइया! अपनी-अपनी नावों के रंग-रोगन का ही नहीं, इनके आधुनिकीकरण के बारे में भी सोचिए! खैर।
आइए, अब इन बेफालतू की उलझी हुई बातों से ध्यान हटाकर काठियावाड़ की ओर लौटें। सुबह सोमनाथ के रास्ते पर चलते हुए जगह-जगह दूर तक फैले पवन-ऊर्जा के ऊँचे टावर दिखाई पड़ रहे थे। रास्ते में एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि यहाँ पिछले पाँच वर्षों से ढंग की बारिश नहीं हुई है। फिर भी लोगों के चेहरों को देखकर लगा कि जीवन की जिजीविषा अब भी सूखी नहीं है। कठिन परिस्थितियों में भी यह उन्हें जीने की राह सुझा रही है।
#चलते_चलते
अपनी जिजीविषा के साथ प्रसन्न चित्त रहिए! यह किसी पंथ,संप्रदाय या मज़हब के ताने-बाने का मोहताज नहीं। खराब मौसम में तो नावें भी खड़ी हो जाती हैं! लेकिन जिजीविषा ही है जो आपको तैरना सिखा जाती है।
#सुबहचर्या
(१९.७.१९)