1
सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर ढक्कन सीमेंट से जाम था। पिछले दस मिनट से वह छेनी और हथौड़े की मदद से इसे मेनहोल से हटाने में जुटा था। ढक्कन के कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे छेनी टिकाता और इसपर हथौड़े से चोट मारता। लेकिन ढक्कन था कि टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा था। पास में खड़ा ठेकेदार रमेसर चुपचाप उसके काम की निगरानी कर रहा था।
अचानक रमेसर के 'इस किनारे छेनी लगाओ’ कहने पर उसने दरार पर छेनी टिकाकर एक जोरदार हथौड़ा चला दिया।
छेनी छिटककर दूर दूब वाली घास में जा गिरी, इस झटके में उसकी कमीज की जेब से दो सिक्के भी घास में जा गिरे।
छेनीवाले को झुके हुए घास टटोलता देख उन्होंने हैरानी से पूँछा, 'छेनी नहीं मिल रही है क्या?' लेकिन छेनीवाले की बजाय रमेसर बोला उठा, “छेनी तो बड़ी चीज है वह मिल गई है, ये अपना सिक्का खोज रहे हैं।”
रमेसर के दो साथी वहां चुपचाप खड़े रहे, छेनीवाले की मदद के लिए आगे नहीं आए। 'वे' को यह कुछ अजीब लगा। उनकी ओर देखकर कहा, “इसके मेहनत के सिक्के होंगे, खोजना ही चाहिए।"
सिक्के मिलते ही छेनीवाला काम में जुट गया। रमेसर ने उसकी ओर इशारा करके मुस्कुराते हुए कहा, ‘बड़का दिमाग है इसके पास।’ इस मुस्कान में कुछ ऐसा था कि ‘वे’ को लगा, यह ‘बड़का दिमाग’ रमेसर के लिए तो मुफीद है ही स्वयं छेनीवाले के लिए भी मुफीद है। उनकी नजरें छेनीवाले पर गड़ गई।
मोटे कपड़े का मटमैली कमीज, ऊपर धूसर-सी फटी सदरी, ढीली-ढाली पैंट, जैसे इन कपड़ों ने महीनों से पानी न देखा हो। पैरों में चप्पल नहीं, सिर पर घने उलझे बाल, जिन्हें शायद ही कभी कंघी ने छुआ हो।
लेकिन काम में उसकी तल्लीनता देख उसके हुलिए से मिजाज का अंदाजा वे नहीं लगा सके। इसके लिए रमेसर से कुछ पूछने को हुए, लेकिन वह भी छेनीवाले के काम पर ध्यान लगाए था।
छेनी पर पड़ते हथौड़े की चोट से ढक्कन हिल उठता। शायद यह ढीला हो चुका है, सोचकर रमेसर ट्रैक्टर के टूल बॉक्स से रम्मा भी निकाल लाया। लेकिन ढक्कन का एक सिरा अभी भी मेनहोल से जाम था। उसने छेनीवाले को उसे छेनी से अभी और काटने के लिए कहा।
कुछ देर बाद ढक्कन चारों ओर से ढीला पड़ गया। रमेसर ने तुरंत छेनीवाले से छेनी-हथौड़ा रोकने के लिए कहा। फिर रम्मे के सहारे ढक्कन का एक सिरा उठाते हुए इसे मेनहोल से हटाने के लिए बोला।
वे को अचरज-सा हुआ कि रमेसर रम्मे के सहारे ढक्कन संभाले खड़ा था, और उसके दोनों साथी पास खड़े होकर भी उसे छूने से कतराते थे। आखिर छेनीवाले ने ही ढक्कन दूसरी ओर उलट दिया। पूरा मेनहोल खुल चुका था। इसमें झांककर रमेसर ने कहा,
'अरे! इसमें कींचड़ तो कम है, पानी ज्यादा है।’
"तो सेप्टिक-टैंक में जमा मल ही रमेसर की व्यावसायिक भाषा में 'कीचड़' है!" 'वे' को यह नई बात पता चली।
उत्सुकतावश उन्होंने मेनहोल झाँककर देखा, तली पर जमा मल सचमुच कींचड़ जैसा ही दिखाई पड़ा।
इधर इस कींचड़ को देखकर रमेसर के सामने जैसे सेप्टिक-टैंक का मेनहोल नहीं; स्मृतियों की सुरंग खुल गई!
"दद्दा की बाल्टी में यह ‘कींचड़’ कुछ और ही रंग में होता। वे रोज़ सुबह नौ बजे बाल्टी, झाड़ू और टिन लेकर ब्लॉक की कॉलोनी निकल पड़ते। एक दिन जिद करके मैं भी उनके साथ हो लिया। मेरा साथ चलना दद्दा को अखर रहा था; उन्होंने मुझे पुचकारकर रोकना भी चाहा, पर मैं नहीं माना था। तब मेरी उम्र कोई चार–पाँच साल रही होगी।"
...उस दिन पहले दद्दा एक बड़े क्वार्टर के पीछे की ओर गए। उस क्वार्टर के नींव के ऊपर दीवाल पर लोहे का एक ढक्कन लटक रहा था। दद्दा ने इसे उठाया। यहां आले जैसा एक चौकोर गड्ढा था। उसमें यही 'कींचड़' पीले रंग के ढेर में जमा था।
....दद्दा ने मुड़े हुए टिन से उस पीले मैले के ढेर को बाल्टी में भर लिया फिर आले को झाड़ू से साफ भी किया। यह सब मुझे बेहद अजीब लगा, लेकिन दद्दा एक-एक कर सभी क्वार्टरों पर जाते गए। धीरे-धीरे उनकी बाल्टी उसी पीले मैले से भर गई, जिसे दूर झाड़ियों में जाकर खाली कर आए थे।
....इस काम के दरमियान न दद्दा बोले, न मैंने कुछ पूँछा; मैं बस चुपचाप उन्हें यह काम करते देखता रहा। लेकिन बाल्टी खाली करके लौटे तो एक पल के लिए दद्दा ने मुझे घूरा भी था। उनका वह घूरना मुझे आज भी याद है। दद्दा की आँखों में जैसे नाराजगी थी। वे मुझे भी लेकर सीधे हैंडपंप पर आए। अपने सभी सामान धोए फिर नहाए और मुझे भी नहलाए थे। इसके बाद मैं कभी दद्दा के साथ कॉलोनी की ओर नहीं गया।"
हालांकि काफी दिनों बाद मैंने दद्दा से कहा भी था,
“दद्दा मुझे घिन आती है, मत करो यह काम।”
“इससे क्या घिनाना! यह तो हमारा कर है यही रोजी है” दद्दा ने यही बोलकर तब मुझे चुप करा दिया था।
रोजी तो मैंने भी सीवर में कूदने वाला ही चुना था बल्कि यह नौकरी पाने के लिए नगरपालिका के सीवर के काले गंधाते पानी वाले नाले में झम्म से कूद भी पड़ा था! जबकि सात जने, जो ऊँची जात के थे उसमें नहीं कूदे,..अन्य दो जने जैसे-तैसे नाले में उतरे भी तो तुरंत बाहर निकल आए…शायद तब के अफसरानों ने भी दद्दा की वह बात कि ‘यही हमारा कर है यही रोजी है’ मानकर मुझे इस नौकरी के लिए चुना था।
इन ख्यालों के साथ रमेसर ने गर्व से अपने ट्रैक्टर-टैंकर की ओर देखकर सोचा, अब यही अपना काम..अपनी मशीन और अपना धंधा.. जैसे दद्दा की ‘रोजी’ से अपनी ‘रोजी’ की तुलना कर रहा हो!
उसे ‘वे’ का चेहरा कुछ जाना-पहचाना-सा लगा। मन में चालीस वर्ष पुरानी कोई धुँधली स्मृति उभरी -
“तब मैं मुश्किल से पाँच-छह साल का रहा होऊंगा। यहां के घर कच्चे होते। बाबा इन्हीं घरों से त्योहारी लेने आते। कभी-कभी मैं भी उनके साथ चला आता। शायद तब इनको यहीं कहीं देखा रहा हो। लेकिन आज इनके बराबर खड़ा होकर इनसे सौदेबाजी भी कर रहा हूँ, तो इसी अपने ‘रोजी’ के बल पर; आज मैं खुद के सेप्टिक-टैंक सफाई-व्यवसाय का मालिक हूँ!”
अम्मा की याद आई। अगर अम्मा मुझे जबर्दस्ती स्कूल न भेजतीं तो मैं आज भी नगरपालिका में वही सफाई कर्मचारी होता। अम्मा यही तो कहतीं कि 'तुम्हारे दद्दा और पप्पा तो करिया अक्षर हैं, इसीलिए वे मैला ढोते हैं मुला तुम यह काम मत करना, खूब पढ़ना। इसीलिए मैं कक्षा आठ तक पढ़ भी गया था।'
मेरा स्कूल और घर, दोनों एक ब्लॉक के कैंपस में था।
बीडीओ ऑफिस के पीछे आठ बाई दस की कोठरी ही मेरा घर था। कोठरी भी जर्जर हो चली थी। दद्दा ने उसके सामने छोटी सी जगह में टटिया खड़ी कर घेर बना लिया था, इसी घेर में उनकी झोपड़ी थी, जिसमें वे अपनी गैया के साथ रहते।
अच्छी तरह याद है, त्योहारों की छुट्टियां आती तो ब्लाक कैंपस में सन्नाटा पसर जाता! सब अपने-अपने घर लौट जाते। मैं भी घर चलने की जिद्द करता, पर अम्मा कहतीं, 'यही तो हमारा घर है।'
लेकिन घर को लेकर मेरी बेचैनी शांत नहीं हुई, मन के किसी कोने में गाँठ बनकर दबी रह गई, जो कक्षा पांच में जाने पर खुली।"
उस दिन भी मैं कक्षा में पीछे, सबसे अलग-थलग बैठा था। पंडी जी पढ़ा रहे थे - आजादी के बाद पहले यह विकास खंड बना, फिर यह स्कूल, तो मैं चौंक पड़ा।
अचानक पूछ लिया - पंडी जी, तब मेरा घर भी यहाँ नहीं था न?
इसे सुनकर कक्षा में सब ऐसे हँसे मानो मैंने कोई ऊल-जलूल बात कह दिया था। पंडी जी भी घूरने लगे तो मैं सहम गया था।
आज सोचता हूँ, मैंने यह सवाल आखिर किस हिम्मत से पूछ लिया था! जबकि हमारी जाति में जन्मा कोई बच्चा परली बात सोच ही नहीं सकता था! बस जो है, उसे ही सच मानकर जीना सिखा दिया जाता था।
फिर उस दिन पंडी जी का कहना कि ‘नहीं, तब तुम्हारा घर भी यहाँ नहीं था’ सुनकर मेरा दिमाग चकरा गया था। उस वक्त कक्षा, पाठ, और हँसी सबसे ध्यान हटकर, मन उस सवाल पर जा अटका कि ब्लॉक बनने से पहले हम कहां रहते थे। यह बात दद्दा से पूछने की बेचैनी में, छुट्टी होते ही मैं सीधे घर की ओर भागा था।
बस्ता फेंका और उनकी झोपड़ी में गया। वे वहां नहीं थे। अम्मा ने बताया कि वे बिलाक कालोनी गए हैं, आते होंगे। फिर बाहर आकर मैं उनकी बाट जोहने लगा था।
दद्दा आते दिखाई पड़े। मैं उनकी ओर लपका। पर उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक गया। दद्दा यह काम दोपहर से पहले ही निपटा लेते हैं, सोचते हुए मैं धीमे-धीमे लौटकर हैंडपंप के पास आ खड़ा हुआ।
दद्दा भी वहीं आ गए। सारा सामान नल के नीचे रख दिया। मैं चुपचाप हैंडपंप चलाने लगा। वे एक-एक करके उन्हें धोने लगे। मैंने उनके चेहरे पर बेचारगी-सी मायूसी देखा। यह कुछ अजीब-सा लगा। उनकी बड़बड़ाहट से ही मैं समझ गया वे किसी कारण सुबह यह काम नहीं कर पाए थे इसके लिए ब्लाक के साहब ने उन्हें तिरस्कृत कर डांटा था। इसलिए इसे दूसरी बेला में किया। अब उनसे कुछ पूछने का मन नहीं हुआ।
उनका सारा सामान धुलवाया। इसके बाद मैं भी उनके साथ झोपड़ी के भीतर आया। अचानक मुझसे घेर के बाहर खड़े होने का कारण पूछ लिया, मेरे मन की मुराद जैसे पूरी हो गई, उनसे पूछ बैठा था,
“दद्दा, जब यहाँ बिलाक नहीं था… तब हम कहाँ रहते थे?”
इस सवाल पर मेरी ओर अचरज से देखा तो मैंने उन्हें अपनी बात समझाकर बोला था,
“पंडी जी कह रहे थे न… कि बिलाक आज़ादी के बाद बना। तब तो हमारा घर भी यहाँ नहीं रहा होगा?”
“हाँ.. हमारा घर पाकिस्तान में था।”
दद्दा तब तेरह-चौदह साल के थे अपने बप्पा बद्दन के साथ भारत आए। बप्पा को लगा था कि बँटवारे के बाद ऊँची जात वालों के चले जाने से अछूत होने का दर्द नहीं रहेगा। लेकिन जल्दी ही अहसास हुआ कि वहां अपने रस्मोरिवाज भी खुलकर नहीं निभा पाएंगे - नाली-सीवर ही साफ करना पड़ेगा। तब एक दिन वे चुपचाप परिवार समेत सीमा पार कर गए।
चार साल परिवार सहित दिल्ली के एक तंबू में बिताए। फिर सरकार ने इसी ब्लॉक में सफाई की नौकरी पर भेज दिया।
अंत में दद्दा ने कोठरी की ओर इशारा करके कहा था - 'तबसे यही हमारा घर है।’
अकस्मात रमेसर की नजर छेनीवाले पर पड़ी। वह टैंकर का सक्शन-पाइप मेनहोल की ओर खींचकर ले आ रहा है। दूसरा साथी वैक्यूम पंखा स्टार्ट करने के लिए ट्रैक्टर पर चढ़ा था।
रमेसर ने बढ़कर छेनीवाले से यह पाइप अपने हाथ में ले लिया। इसे सेप्टिक-टैंक में उतारा। उधर वैक्यूम फैन चालू होते ही पाइप से पानी सुड़कना शुरू हो गया।
अब तक सांझ भी स्याह हो चली थी। बल्ब की रोशनी में रमेसर का चेहरा साफ पढ़ा जा सकता था। वह मेनहोल पर झुका था। उसकी शांत और गंभीर मुखाकृति देखकर ‘वे’ ने सोचा -
'चार लोगों की टीम है इसकी, लेकिन छेनीवाले के अलावा एक रमेसर ही है जिसने सक्शन-पाइप छुआ! जबकि वह टीम लीडर है, पाइप किसी को भी पकड़ा सकता है। हो सकता है स्वयं इसलिए करता हो कि यह काम अच्छे से हो।"
2
धीरे-धीरे पानी घटने पर सेप्टिक-टैंक में 'सीवर' का गाढ़ापन उभर आया। ऐसे ही गाढ़े सीवर में पप्पा बेहिचक उतर जाया करते थे! यह स्मरण होते ही रमेसर की आँखें सजल हो आईं।
सक्शन-पाइप हाथ में लेते ही भीतर टीस उठती है, पप्पा सामने आ खड़े होते हैं! फ़िर वह पाइप तब तक नहीं छोड़ता, जब-तक ‘कीचड़’ पूरी तरह बाहर न आ जाए। उस क्षण पाइप पर हाथ की पकड़ और भी कस उठती है- मानो वह पप्पा की अधूरी लड़ाई पूरी कर रहा हो।
"दद्दा चाहते थे कि पप्पा स्वीपर की नौकरी कर ले, इसे वे पुश्तैनी काम मानते। पप्पा चिढ़ उठते। उनमें एक बेचैन छटपटाहट भर जाती। वे शहर में दिहाड़ी की तलाश में निकल जाते, पर वहां भी न टिकते; वापस आकर घर पर ही चुपचाप पड़े रहते।
एक बार अम्मा से पप्पा को कहते सुना था -
“क्या कींचड़ में लिथड़ी इस जाति को उतारकर हम फेंक नहीं सकते?”
उस दिन पप्पा की बात का अर्थ नहीं समझ सका था। लेकिन वर्षों बाद जाना, जाति सचमुच में भविष्य लिखती है! पप्पा निरक्षर थे - सोचते रहते, बस घुटते रहते।
एक दिन दद्दा गाँव में से त्योहारी लेकर लौटे थे। उनकी गठरी में ढेर सारी पूरियां-कचौरियां और खाने की चीजें थीं। गठरी देखकर पप्पा गुस्से में बोले थे -
'यह अच्छी बात नहीं कि घरों के सामने हाथ पसार जाकर खड़े हो जाओ, यह भिखमंगई ठीक नहीं बाबा, इससे अच्छा तो फिर मैला ढोने का काम है.. इसमें कम से कम कुछ करके तो कमाना है।'
उसने स्वयं देखा था—दद्दा गाँव के ‘बड़े’ घरों की देहरी पर बारी-बारी जाकर खड़े होते; भीतर से कोई निकलता और दूरी बनाकर उनकी चादर में ऊपर से ही त्योहारी डाल देता। उनकी चादर छूने से लोग कतराते, और उन्हें हमेशा दूर ही बिठाया जाता।
पप्पा की बात पर दद्दा ने ऐतराज नहीं जताया। लेकिन बोले थे -
“देख दिन्ने, यह भिखमंगाई नहीं, इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना हो जाता है। यदि दिखाई न पड़ूं तो लोग पूँछने लगते हैं.. दिन्ने! एक बात और! गाँव के लोग शादी-ब्याह पर मुझे नेग-चार देना नहीं भूलते!”
दद्दा और पप्पा, दोनों की बातें दो छोर की होती। इनके बीच वह एक अजीब द्वन्द्व में फंस जाता। समझ नहीं पाता किसे सही माने। यह उलझन उसके भीतर बैठ गई।
और उस दिन पप्पा नहीं उनका शरीर आया था घर। तब कक्षा सात में था वह। स्कूल से लौट रहा था। घेर के सामने कुछ लोग खड़े दिखाई दिए। सबके चेहरों पर एक अजीब-सी खामोशी थी। उसे अनहोनी की आशंका हुई। घबड़ाहट में भागते हुए घेर में पहुँचा। वहां पप्पा जमीन पर लेटे थे और अम्मा उनके सिरहाने बैठी थीं..
वह कुछ समझ पाता कि दद्दा ने उसे कसकर अँकवार में भर लिया था, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। उधर अम्मा की अचानक रुलाई फूट पड़ी, वे दहाड़ें मारकर रो उठीं थीं।
पप्पा के मन से अनजान रहते दद्दा..। पप्पा स्वीपर नहीं मजदूर बनना चाहते थे लेकिन जाति और पुश्तैनी पेशा आड़े आ जाता। 'जाति माथे पर कलंक है' यही सुना था अम्मा से कहते हुए उन्हें। शायद विवशता में ही उन्होंने शहर जाना छोड़ दिया था।
दद्दा के निठल्ला कहने से आजिज आकर एक दिन पप्पा स्वीपर बनने को तैयार हो गए। शहर गए तो नगरपालिका के एक सफाई ठेकेदार ने उन्हें अपनी टीम में रख लिया।”
उस जमाने में वैक्यूम-सक्शन टैंकर जैसी कोई मशीन नहीं थी। उन्हें खुद सेप्टिक टैंक में उतरना पड़ता और गाढ़ा ‘कीचड़’ बाल्टियों में भर-भरकर बाहर निकालते। तब उनका पूरा शरीर उसी कीचड़ में लथपथ हो जाता।
सीवर में उतरने का अपना अनुभव पप्पा कुछ ऐसा ही अम्मा को बताते -
“जब सीवर में घुसता हूँ तो तिलचट्टों से घिर जाता हूँ ये मेरे शरीर पर दौड़ने लगते हैं!”
शायद स्वप्न में भी ये तिलचट्टे उन्हें अपने शरीर पर रेंगते दिखाई पड़ते इसीलिए कभी-कभी रात में सोते से अचानक उठकर वे अपना शरीर झाड़ने लगते!!
यही नहीं वे बार-बार अपना हाथ धोते, टोकने पर अम्मा से कहते -
“क्या करूँ..मेरे हाथों में जैसे मैले की बदबू आती रहती है, इसीलिए बार-बार हाथ धोना पड़ता है!”
फिर अचानक उनका शहर जाना बंद हो गया। दद्दा के पूछने पप्पा ने बताया था - 'सरकार के डर से ठेकेदार अब काम पर नहीं बुलाता... आदमी को सीवर में घुसने पर रोक लगा दी गई है।'
लेकिन दो-चार महीने बीतते-बीतते पप्पा फिर शहर जाने लगे थे।
उन दिनों वे बीमार भी रहते। डाक्टर ने उन्हें सीवर में उतरने से मना कर दिया था। पर वे कहाँ मानने वाले थे। अम्मा के टोकने पर कहते, ‘बप्पा अब रिटायर हैं, मेरा काम पर जाना जरूरी है।
उस दिन भी उनकी तबियत खराब थी। लेकिन “आज एक बड़े सेप्टिक टैंक की सफाई होना है, न जाने से ठेकेदार नाराज होगा” कहकर सुबह-सुबह वे शहर चले गए थे।
लोग बताते थे कि सेप्टिक-टैंक में उतरते ही पप्पा बेहोश हो गए। अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्हें देखने उनके एक साथी सेप्टिक-टैंक में उतरे। लेकिन वे भी बेहोश हो गए।
फिर शोर-शराबे पर भीड़ इकट्ठी हुई। तब तक ठेकेदार भाग चुका था। जैसे-तैसे सेप्टिक-टैंक से बाहर निकालकर उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। लेकिन दोनों नहीं बच पाए।
कहते हैं कि पप्पा की मौत सेप्टिक-टैंक में ही हो गई थी। दद्दा और अम्मा बहुत दिनों तक थाना-से-कचहरी घूमते रहे, मुआवजा भी नहीं मिला। बाद में पता चला कि इस घटना के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं माना गया।
....घेर का दृश्य देख मैं जड़वत खड़ा रह गया। अम्मा का रोना और दद्दा के आँसू, सब देखता रहा। पप्पा के पहने हुए कपड़े सीवर के कीचड़ में सने उनके निर्जीव शरीर से अब भी चिपके थे। मेरी आँखें डबडबा आईं, पर मैंने उन्हें बाँह से पोंछ लिया। रोया नहीं।
ख्यालों की वह परत अचानक हट गई जब टैंक से आती 'सुड़-सुड़' की आवाज कानों में पड़ी। रमेसर ने देखा, टैंक में सक्शन-पाइप के मुहाने के नीचे पानी उतर चुका था ।
3
रमेसर ने ‘वे’ को मेनहोल में दिखाकर कहा कि “टैंक में पानी चार फीट उतर चुका है। एक टैंकर फुल हो गया दूसरा चक्कर भी लगाना होगा..दो टैंकर सीवर था इसमें।” फिर विश्वास दिलाने के लिए 'वे' को टैंकर का पारदर्शी संकेतक भी दिखाया।
इशारा पाकर छेनीवाले ने टैंकर का नोजल बंद किया और रमेसर ने सेप्टिक-टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाला। वह टैंकर खाली करने पास के खेत की ओर बढ़ा ही था कि 'वे' ने टोक दिया कि "इसमें मत गिराना, खेत मालिक नाराज होंगे।"
अचानक रमेसर को बचपन की एक घटना याद आ गई जब उसने दद्दा से पूछ लिया था,
“दद्दा, बाल्टी वहाँ क्यों खाली किए, वहाँ तो सब लड़िकन खेलने जाते हैं… जानते हैं, हमारी गेंद भी वहाँ चली गई थी, विज्जू उसे लाने गया तो उसका पैर छपाक से उसमें पड़ गया, इसे वहाँ न डाला करिए।”
दद्दा पल भर ठहरकर बोले थे -
“बचवा, इसे कहां गिराऊँ? यहाँ कोई जगह भी नहीं है। एक बार उस खेत के कोने में बाल्टी उलट दिया तो खेत-मालिक ने खूब गरियाया था।"
दद्दा के गरियाए जाने की बात सुनते ही मेरा रोयां-रोयां सुलग उठा था.. उनकी ओर देखा था।
उनके बूढ़ाते शरीर पर पीढ़ियों की बेइज्जती का बोझ साफ झलकता था। जैसे अब उनका मन हर बात से उचट गया हो। उन्हें देखकर मुझे यह भी लगा था जैसे वे कहना चाह रहे थे - "जिंदगी ने सब सहना सिखा दिया है।"
इसे यादकर रमेसर की मुट्ठियां भिंच गईं। मन में गुस्से से भरी एक टीस उभरी..
"हूँ... खेत मालिक नाराज होंगे!" बुदबुदाकर मन में उठे गुस्से को जज्ब किया।फिर कठोर स्वर में यह बोलकर कि - 'खेत के लिए यह खाद ही तो होता' टैंकर लेकर अँधेरे में दूसरी दिशा में बढ़ गया।
सीवर गिराकर टैंकर लौटा तो इसके नोजल में छेनीवाले ने सक्शन-पाइप फिर जोड़ दिया। इस पाइप को हाथ में लेकर रमेसर ने मेनहोल में झाँका। बल्ब की रोशनी उसमें नहीं पहुँच रही थी। मोबाइल फोन का टार्च ऑनकर देखा।
टैंक में भीतर सीवर गाढ़ा दिखाई दिया। इसका सुड़कना अब मुश्किल है, सोचकर उसने ‘वे’ से एक बाँस मंगाया।
रमेसर ने बाँस हाथ में लिया। उसने छेनीवाले को पंप चालू करने का इशारा किया और पाइप मेनहोल पर टिका दिया। पंप चालू होते ही पानी टैंक में गिरने लगा।
रमेसर ने बांस से टैंक के भीतर जमे हुए गाढ़े कीचड़ को हिलाना शुरू कर दिया। ताकि पानी में घुलकर यह आसानी से खिंच सके।
तभी सक्शन-पाइप के मुहाने के पास कपड़ेनुमा कोई चीज दिखाई पड़ी। वह पाइप में न फँसे, इसलिए रमेसर ने उसे बाँस से दूर हटा दिया। छेनीवाले ने उसके हाथ से बाँस ले लिया। और उसके सहारे उस कपड़े को बाहर निकाल दिया।
‘वे’ ने देखा, छेनीवाले के हाथ और पैर सीवर की कींचड़ से लथपथ थे। रमेसर से बोले, “यह छेनीवाला तो बहुत कामकाजी है?
कुछ पल सोचने के बाद स्थिर और संयत आवाज में रमेसर बोला,
यह काम और मेरी यह जाति, जैसे एक ही रस्सी में बँधे हों। शुरुआत में ट्रैक्टर चलाने के लिए कोई ड्राइवर न मिलता। एक आदिवासी लड़का मिला भी तो सक्शन पाइप न छूने की शर्त पर!
ऐसे में, सक्शन-पाइप को जोड़ने से लेकर सेप्टिक-टैंक में उतारने और काम के बाद उसे धो-पोंछकर समेटने तक ये सारे काम मुझे ही करना पड़ता।
फिर छेनीवाले की ओर देखकर रमेसर ने मुस्कुराकर कहा-
"यदि यह न मिला होता तो सेप्टिक टैंक सफाई वाला मेरा यह धंधा परवान न चढ़ता… पहली नजर में तो मुझे यह पागल ही लगा था।
गाँव की बस्ती से दूर सीवान में एक कमरे की, झोपड़ीनुमा इसकी कोठरी देख, मैंने इससे केवल यही पूँछा था-
"यहाँ बस्ती से दूर अकेले में घर क्यों बनाया?"
यह छूटते ही बोला था -
“मेरी कोई जाति नहीं इसलिए... और खुशी-खुशी मेरे साथ काम करने के लिए तैयार हो गया था।
पहले ही दिन मैंने इसे छेनी-हथौड़ी देकर मेनहोल का ढक्कन खुलवाया। बिना झिझके इसने वे सारे कार्य किए जिसे आज यहाँ कर रहा है।
काम समाप्त होने के बाद इसने बख्शीश मांगा। तभी मुझे लगा कि इसके पास ‘बड़का दिमाग’ है। यह बात तो मेरे मन में कभी आई ही नहीं थी। पैसे को लेकर यह बहुत चैतन्य रहता है उसी दिन से यह 'छेनीवाला' बन गया।
बात पूरी होते ही रमेसर ने 'वे' से कहा -
"यह छेनीवाला न, आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है, इसीलिए इसे आदमियों की बस्ती से दूर घर बनाकर रहना पड़ता है!"
4
रमेसर ने छेनीवाले को लेकर जैसे कोई गूढ़ बात कहा हो, ‘वे’ उसे गौर से देखने लगे, जैसे वे उसके जीवन की कहानी जानना चाहते हों-
वही बिखरे बाल और ढीले-ढाले कपड़े… चेहरे पर एक अजीब-सी निस्पृहता… हाथ कीचड़ में सने हुए !
अचानक रमेसर बोला,
“यह बऊक नहीं.. वही मैंने जो पहले कहा था... बड़का दिमाग है इसके पास..”
कुछ पल रुककर रमेसर ने फिर कहा -
“मैं इसकी दुखती रग को ज्यादा कुरेदता तो नहीं हूं.. पर लोगों से सुनी-सुनाई बात है…”
पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटा था.. माँ-बाप के अतिशय लाड़-प्यार के तरीके ने इसे बिगाड़ दिया.. स्कूल-उस्कूल का मुँह नहीं देखा। दिमाग का खुलना बाकी रह गया…
छेनीवाला बाँस हिला-हिलाकर सेप्टिक-टैंक में कींचड़ घोलने में जुटा था। उसकी ओर देखकर रमेसर ने फिर कहा,
“लोग इसे ‘बऊक’ समझते, इसकी हँसी उड़ाते; विवाह भी न हो सका। माँ-बाप भी दुनियां से कूच कर गए.. फिर यह अपने ही घर में पराया हो गया.. उपेक्षित-सा.. भाइयों ने तो इसके हिस्से की जमीन भी अपने नाम करा लिया।”
तभी सेप्टिक-टैंक से सर्र-सर्र की आवाज आई। छेनीवाले ने बाँस एक किनारे रखा और सक्शन-पाइप हाथ में लिया। वह मेनहोल पर झुका हुआ यह पाइप अंदर इधर-उधर चलाने लगा। रमेसर भी उसके पास चला गया।
दोनों बारी-बारी एक-दूसरे से पाइप अपने हाथ में लेते और सेप्टिक टैंक में घुमाते हुए बचा-खुचा सीवर सुड़कवाने लगे!
‘वे’ भी उसी ओर देखने लगे।
छेनीवाला बिना झिझक पाइप के सीवर की कीचड़ से सने हिस्से पर भी हाथ लगा देता; रमेसर ऊपर के हिस्से को ही पकड़ता, मानो कीचड़ से बचना चाहता हो। फिर भी दोनों का तालमेल ऐसा था, जैसे एक ही देह के दो हाथ हों।
रमेसर, छेनीवाले को कुछ समझाने लगा था। इधर 'वे' भी मेनहोल के थोड़ा और करीब चले गए।
छेनीवाले के हाथ में पाइप देकर रमसेर फिर 'वे' से मुखातिब होकर बोला -
“एक दिन यह कहीं चला गया.. किसी ने कोई खोज-खबर नहीं ली… और जब वर्षों बाद लौटा तो एक कूबड़ वाली स्त्री को साथ लेकर…”
इन बातों के बीच छेनीवाला चुपचाप पाइप को टैंक में घुमाता रहा, उसकी नहीं, जैसे किसी और की बात चल रही हो..
.. अपने ही घर के दरवाजे नहीं खुले इसके लिए.. लोग हँसते..कई दिन गाँव में भटकता रहा… जाति निकाला हो गया इसका.. किसी तरह गाँव के बाहर कोठरी भर की जमीन का टुकड़ा मिला तो वहीं उस स्त्री के साथ रहने लगा….
थोड़ी देर चुप्पी छाई रही।
फिर रमेसर ही बोला,
लेकिन इसका यह ‘बऊकपन’ न, इसके लिए ढाल बन गया.. इसे टूटने नहीं दिया…
उधर छेनीवाला अपने ही धुन में था। वह टैंक से सक्शन-पाइप निकालने लगा।
रमेसर ने उसकी ओर देखकर फिर ‘वे’ से कहा -
"अच्छा ही है कि यह आदमियों की बस्ती में नहीं रहता।"
'वे' थोड़ा चौंके। उनकी निगाहें रमेसर पर ठहर गई- मानो इन शब्दों के मर्म टटोल रही हों।
वह भी थोड़ा असहज हुआ। क्षण भर के लिए यह सोचकर झिझका कि कहीं वे छेनीवाले की जाति न पूछने लगें, इस आशंका में बात को मोड़ता हुआ बोला,
"बात यह कि बस्ती में रहकर यह आदमियों के बहकावे में आ जाता...सौदेबाजी सीख जाता।"
अब तक छेनीवाले ने सक्शन-पाइप बाहर खींच लिया था और उसे किनारे रखकर धोने लगा था।
'वे' मेनहोल में झांकने लगे कि सीवर पूरी तरह निकला या नहीं, छेनीवाले पर बात यहीं थम गई थी।
लेकिन रमेसर मन ही मन बुदबुदाया -
“यह कितना अजीब है..छेनीवाले की ऊँची जाति जानकर लोग उसके साथ सहज हो जाते हैं और एक हम हैं, हमारे लिए वही ऊँच-नीच का पुराना भाव, चाहे यह दबा हुआ ही हो, पर उभर तो आता ही है…हाँ…पप्पा! उस जमाने में कितना झेले होंगे….”
'वे' ने देखा, गाढ़ा कीचड़ पानी में घुलकर लगभग खिंच चुका था; तली में बचा पानी पाइप की पकड़ में अब नहीं आने वाला।
उधर रमेसर के वे दोनों साथी जो पूरे समय वहीं आसपास मँडराते रहे थे, न पाइप को हाथ लगाए और न ही इसे धोने में छेनीवाले का हाथ बंटाया।
उनकी ओर ध्यान जाते ही उनके मन में प्रश्न उभरा -
यह काम की या फिर जाति की, क्या कोई एक अदृश्य रेखा है जो उन्हें एक-दूसरे से अलग किए हुए है?
5
अचानक रमेसर ने ‘वे’ से एक तरफ चलने के लिए कहा, वह उन्हें एक अँधेरे कोने में ले गया। वहां जमीन की ओर इशारा करके उन्हें कुछ दिखाते हुए वह धीरे से बोला,
देखिए, इसे मैंने यहाँ एक किनारे रखवा दिया है। सोचा, आपको बता दूँ, नहीं तो अनजाने में कोई इसे हाथ लगा देता। सुबह किसी से कहकर इसे फिंकवा दीजिएगा।”
‘अरे! यह तो वही कपड़ा है...सेप्टिक-टैक से निकला, सीवर में लिथड़ा हुआ...तो इसे यहाँ रखवाया था रमेसर ने! छेनीवाले से इसे कहीं दूर भी तो फेंकवा सकता था!’
सीवर में सने उस कपड़े को लेकर रमेसर का यह वर्ताव ‘वे’ को कुछ विचित्र लगा। वे उस कपड़े को देखते हुए मौन रहे।
रमेसर ने ‘वे’ को नजर भर देखा! वे अभी भी किसी विचार में डूबे उसी कपड़े को देख रहे थे।
फिर अचानक वह पोर्टिको की ओर चला गया जहां बाबू जी कुर्सी पर बैठे थे। उनसे काम का हिसाब किया। छेनीवाला भी अपने हाथ पैर धोकर वहीं आया। उसे बख्शीश लेना था। यह उसे मिला, जो उसकी अपेक्षा से ज्यादा था। इससे रमेसर और वह, दोनों खुश हो गए थे।
यकायक रमेसर ने छेनीवाले को सीवर में लिथड़े उस कपड़े को फेंक आने के लिए कहा। शायद यहां किसी की कोई जाति नहीं थी; प्रतिमूल्य था अतिरिक्त बक्शीश मिलने का और इसमें रमेसर की खुद्दारी भी छिपी थी।
‘वे’ को समझ में आ गया कि छेनीवाले के लिए रमेसर ने ‘बड़का दिमाग’ वाली बात यूँ ही नहीं कहा था। यह उस भाव की पहचान थी, जहाँ आदमी अपने मूल्य को जानता है।
और वह केवल अपना ही नहीं, उसके हिस्से की गरिमा की भी रक्षा कर रहा था। अन्यथा, उस सीवर में लिथड़े कपड़े को वह पहले भी उससे फिंकवा सकता था। लेकिन तब रमेसर का ठहर जाना उस अदृश्य हीनता के विरुद्ध एक छोटा-सा प्रतिरोध था, जो खुलकर नहीं… भीतर ही भीतर लड़ा जाता है।
रमेसर काम समाप्त करके जाने को हुआ तो अचानक घूमकर नमस्ते बोला, प्रतिउत्तर में 'वे' ने भी उसे नमस्ते कहा। लेकिन उनके जेहन में वही कपड़ा अब भी घूम रहा था।
अँधेरे में, ज़मीन पर पड़ा वह कपड़ा उन्हें मात्र एक परित्यक्त वस्तु नहीं लगा..वह जैसे एक अनकहा विचार बनकर उनकी आँखों में ठहर चुका था।
*******
