लोकप्रिय पोस्ट

गुरुवार, 28 मई 2026

हिंदू होने की पहली शर्त

      सुबह गहरी नींद में था, जब लाउडस्पीकर का शोर कानों में पड़ा। मैं उठ गया‌, जिस आवाज से निद्रावस्था जैसी समाधि भंग हो निश्चित ही वह आवाज सुकूंन और शांतिदायक तो नहीं ही होगी!! 
       बाहर घना कुहरा छाया था, सड़क पर चलते हुए ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी धुंध में घुसे चले जा रहे हों! पीछे से कुछ लोगों की बातचीत की आवाज आती सुनाई पड़ी, किसी ने किसी को कहीं जाने के लिए कहा था लेकिन वह जाने के लिए तैयार नहीं था। बस इसी खुन्नस में वह "किसी" उस कहने वाले "किसी" को पुलिसिया शैली में गरियाये जा रहा था। उसकी गालियां मातृशक्ति को भी बीच में घसीट रही थी। 
     लौटते समय कुहरा छंटने लगा था। चाय पीते समय ध्यान लाउडस्पीकर पर गूँजती धार्मिक आवाजों पर गया, जिसके कारण सुबह-सुबह ही जाग उठा था। मैं विचार करने लगा…
 .... सभ्यता के प्रारंभ से जिज्ञासु मानव-मन ने अपने रहस्यात्मक-भाव वाले अनुत्तरित प्रश्नों को आध्यात्मिक भाव में बदले होंगे और फिर इसके बरक्स अपना जीवन-दर्शन गढ़ा होगा। मनीषियों ने कालान्तर में 'चाहिए' के भाव के साथ आचरण से सम्पृक्त करने के प्रयास में ही इसे "धर्म" कहा। यहाँ इस "चाहिए" में "बाँधने" का भाव नहीं, अपितु तार्किकता के आधार पर जीवन-दृष्टि का भाव समावेशित है, जो जीवन को सतत और सहज रूप से गतिशील बनाता है। यही "सनातन जीवनशैली" है, जिसे इधर 'हिन्दू धर्म' के नाम से संबोधित किया जा रहा है। यह सनातन जीवनशैली, आध्यात्मिकता और प्रकृति से तादात्म्य स्थापित कर हजारों वर्षों से अपना अस्तित्व बनाए हुए है तथा दुनियाँ की श्रेष्ठ सभ्यताओं में से एक है। 
          हम सदैव से जिज्ञासु रहे हैं; यह जिज्ञासा हमें तर्क के रास्ते वाह्य और अन्तर्जगत के चरम बिंदु अर्थात आध्यात्मिकता के धरातल पर ले जाकर खड़ा कर देती है, जहाँ से विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में ढलकर यह अपना उत्तर तलाशती है। इसप्रकार आध्यात्मिक-दृष्टि, जिसमें वैज्ञानिक और तार्किक दोनों दृष्टि अन्तर्वलित है, वैचारिक-सांस्कृतिक मान्यताओं को औदात्यपूर्ण बनाती है। हमारे इसी सनातन जीवन-शैली के औदात्यपूर्ण चिंतन से एक सर्वसमावेशी-सांस्कृतिक-सभ्यता निर्मित हुई और यही "हिंदू" होने की पहली शर्त भी है। 
     लेकिन आज "भक्ति-भाव" के बढ़ते आडंबर में यह हिंदू जीवन-दृष्टि धीरे-धीरे छीजते हुए कैसे हमें असहज बनाकर अपने ही मूल संदर्भ से विलग हो रही है, यह एक चिंतनीय विषय है। इसकी प्रक्रिया क्या और कैसे रही है, इसे समझने के लिए हम महाकाव्यों में वर्णित "राम" के चरित्र के भावबोध का सहारा ले सकते हैं, क्योंकि हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में राम एक ऐसे चरित्र रहे हैं, जिनसे यह समाज अनुप्राणित होता आया है। 
      हमारे रामायण-महाकाव्य अपने-अपने युगबोध के अनुसार राम के चरित्र को विभिन्न भाव-भूमि पर ग्रहण करते आए हैं। अतः इनमें राम का चरित्र अपने समय से संवाद करता हुआ प्रतीत होता है। इससे तत्कालीन समाज के उस सांस्कृतिक मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को भी समझा जा सकता है, जिससे धार्मिक मनोवृत्तियों में परिवर्तन के साथ समाज भी इससे प्रभावित हुआ। जैसे, ऐसा क्यों है कि जीवन-संघर्ष में जूझते बाल्मीकि के राम एक सामान्य मानवीय चरित्र हैं और वहीं तुलसी के राम 'ईश्वरत्व' की भावभूमि पर स्थापित हैं? यह अध्यात्म से भक्ति की ओर जाते समाज की अपने सांस्कृतिक संदर्भों के साथ प्रतिक्रिया रही होगी। समाज पर इसके प्रभाव का विश्लेषण एक विचारणीय बिंदु है ।...
      हाँ तो आज बस यहीं तक, कोशिश रहेगी इसपर फिर कभी गुफ्तगूँ करेंगे। हो सकता है आप मेरी बातों से इत्तेफाक न रखते हों, लेकिन कोई बात नहीं। 
#चलते_चलते
     धुंध के पार जाने के लिए चलते रहना चाहिए। 
#सुबहचर्या 
 (3.12.18)

ये आवाजें धर्म की नहीं!

        आज रविवार है..टहलने नहीं जाना था, रविवार का दिन निरुद्देश्य बिताने की इच्छा रहती है। लेकिन सुबह की अजान कानों में पड़ी तो नींद खुल गई। दुबारा सोने की कोशिश किया तो भजन की आवाज सुनाई पड़ने लगा। जैसे दो "धर्मानुयायियों" के बीच "राइवलरी" हो! इधर ध्यान दे रहा हूं तो यह प्रवृत्ति कुछ बढ़ती जान पड़ती है। जैसे आज ही लाउडस्पीकर पर सुनाई देने वाली ये आवाजें शोर की हद तक परस्पर गड्डमड्ड हुए जा रही थीं!
     अब तो 'धर्मों' का लाउडस्पीकरीकरण हो चुका है। इससे धर्मों की शान्त..स्निग्ध..कोमल भावना कर्कश ध्वनि में बदलती जा रही है! खैर, 
       यह "धर्मों" में आया यह नया "भक्ति-वाद" हमारे "ज्ञान-तंतु" को धीरे-धीरे कमजोर करने लगा है। इस शोर के बीच मैंने स्वयं से गुफ्तगूं किया - जैसे कि…
       "हिन्दू जीवनशैली या भारतीय जीवन-दर्शन की आधारभूमि वेदः प्रसूत आध्यात्मिकता है, जो हमारी धार्मिक-सांस्कृतिक मनोवृत्तियों को साम्प्रदायिक-मनोवृत्ति में बदलने नहीं देती और व्यक्ति को अपने मान्यताओं के केंद्र में रखकर चलती है। इसकी पुष्टि "बिंब प्रतिबिंब" उपन्यास में स्वामी विवेकानंद के इस कथन से की जा सकती है- 
      "प्रत्येक व्यक्ति का विकास अपनी आन्तरिक शक्ति द्वारा ही होना चाहिए, अपने स्वभावानुसार ही उसका विकास होना चाहिए, उन्नति होनी चाहिए, अवनति होनी चाहिए।"
      यह कथन उस वैदिक संस्कृति की ओर संकेत है जिसमें निहित आध्यात्मिकता से व्यक्ति में स्वतंत्र चेतना के साथ आत्मिक विकास की भावना सुदृढ़ होती है और उसे किसी "सम्प्रदाय" का अंग बनने से रोकती है। 
        लेकिन यहीं पर एक प्रश्न उभरता है, क्या 'हिंदू-धर्म' के रूप में रूढ़ होते इस सनातन जीवनशैली को "धर्म" की संज्ञा देकर "रिलिजन" या "मजहब" की परिधि में लाकर उसकी मूलभावना "आध्यात्मिकता" से इसे अलग नहीं किया जा रहा? 'धर्म' के नाम पर ये आडंबर कहीं हमें अपनी जड़ से काटकर कटी पतंग की तरह भटकने के लिए तो नहीं छोड़ रहे? आखिर इसके लिए कौन सी धार्मिक-वैचारिक सांस्कृतिक परिस्थितियाँ उत्तरदायी है? 
       ये प्रश्न और इनके उत्तर भारतीय जीवन-दर्शन के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके पीछे का मनोविज्ञान किसी राष्ट्र-राज्य की सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक उन्नति के साथ उसे एक श्रेष्ठ समाज व्यवस्था में बदलने का कारण हो सकता है। इस मनोविज्ञान का सामान्य जनमानस पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, इसे समझने का प्रयास किया जा सकता है।"
       हाँ..आज बस इतना ही! इस बात पर फिर बात करने का मन हुआ आगे की बात करेंगे।
 #चलते_चलते
      किसी बात के कई पहलू हो सकते हैं, सार्थक और निरर्थक! लेकिन बात कुछ अर्थ छोड़ते हैं, बस इन अर्थों को पकड़ने कोशिश होनी चाहिए... 
  #सुबहचर्या 
    (2.12.18)
       विनय

ज्ञान का विरोधी ज्ञान

      आज सुबह छह बजे टहलने के लिए निकला‌। बाहर वातावरण में धुँधलका छाया हुआ था, एकदम कुहरा के माफिक! सड़क पर मोटरसाइकिलों एवं अन्य वाहनों का आना-जाना शुरू हो चुका था। मन में खीझ-सी उठी कि इनसे सबेरे की शान्ति भंग हो रही थी। सोचा, इन्हें सुबह-सुबह निकलने की ऐसी क्या जल्दी पड़ी है?
      इस बीच एक मोटरसाइकिल तो धुँएं का गुबार छोड़ते हुए ऐसे निकली कि उसके धुएँ और गंध से मेरे नथुने भर गए! एक अजीब से गुस्से और खीझ लिए मैं वापस लौटने को हुआ, फिर यह सोचकर कि इधर टहलने का रुटीन सही नहीं चल रहा, कम से कम टहलने का कोटा भी तो पूरा होना चाहिए, लौटने का विचार त्याग दिया। खैर..
       टहलाई पूरी कर आवास पर आया। वही रोज़ की भांति अखबार उठाया। पहली निगाह ही "वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का निधन" की हेडिंग पर पड़ी..
         ....हाँ.. अखबार पढ़ने का चाव मुझे बचपन से ही था, लेकिन जैसे-जैसे देश-काल की समझ विकसित होती गई, मैं सम्पादकीय पृष्ठों के लेख भी पढ़ने लगा। जिन लेखकों को मैं विशेष रूचि से पढ़ता था उनमें कुलदीप नैयर भी शामिल थे! 
       उन दिनों इंटर कालेज में पढ़ता था..किसी समसामयिक विषय पर कुलदीप नैयर का एक लेख छपा था। उस दिन घर पर दादा जी समेत कई लोग उसी लेख को लेकर बतिया रहे थे। तब, आज से तीस-पैंतीस वर्ष पहले, लोगों के पास आपस में बिना लाग-लपेट के और बिना जल्दबाजी के बैठकर बतियाने का समय भी हुआ करता था। मैं कुलदीप नैयर का वही लेख पढ़ते हुए उनकी यह बातचीत सुनने लगा। 
     तभी किसी ने मुझसे कहा, "अरे यह कुलदीप नैयरवा तअ.. वामपंथी..है एकर लेख तअ ऐसई ऊटपटांग रहथअ.." लेकिन उसके बाद कुलदीप नैयर के लेख पढ़ने को लेकर मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई.. वह जिज्ञासा आज तक बनी रही..
      यही नहीं किसी विषय पर अपनी बनायी धारणा के विपरीत वाली धारणा को जानने की जिज्ञासा भी धीरे-धीरे बढ़ती गई थी…
       असल में घटनाओं और बातों पर नैयर जी का बौद्धिक विश्लेषण तार्किक हुआ करते थे.. उनके लेख पढ़ते हुए ऐसा लगता जैसे सोचने की एक और न‌ई दृष्टि खुल रही हो!
#चलते_चलते 
      अगर हम अपने ज्ञान के विरोधी ज्ञान को नहीं जानते तो कुछ नहीं जानते...
#सुबहचर्या 
 (24.8.2018)
    श्रावस्ती

बुधवार, 27 मई 2026

इंसानी फितरत को समझने वाले जानवर!

       आज सुबह टहलने निकले, वही पाँच पैंतालीस पर! पहले तो मन ही नहीं हो रहा था कि टहलने निकलें.. लेकिन मन का क्या! वह तो ऐसा ही है। उसके हिसाब से चलें तो फिर हो चुका! यह चीजों को चौपट करके ही माने। इसीलिए कभी-कभी मन के विरुद्ध चलने में भी भलाई छिपा होता है… बशर्ते यह इस बात पर निर्भर है कि हम ऐसा करके चाहते क्या हैं? खैर।
       मैं स्वयं का स्वास्थ्य-शुभेक्षु हुआ सड़क पर पग-चालन करने लगा.. चलते-चलते विकास भवन की एक तस्वीर ली.. सोचा, यदि तस्वीर लेते हुए कोई मुझे देखता है तो वह यही अनुमान लगा सकता है कि हो न हो इस बिल्डिंग में जरूर कोई खास बात है। वैसे यह बिल्डिंग मेरे लिए खास तो है ही! फिलहाल इन विचारों को परे हटाकर मैंने विकास भवन की तस्वीर मोबाइल में कैद कर लिया।
      इधर सड़क पर झुंड में गौ-पशु ऐसे खड़े दिखाई पड़े, मानो आदमियों के काम में व्यवधान डालने की ठान कर आए हों..! मेरे सामने एक ट्रक और एक बस इन्हें बचाते हुए साइड से निकले। 
      थोड़ा आगे बढ़ा तो गायों की देखा-देखी घोड़े भी सड़क पर साधिकार खड़े दिखाई दिए… शायद गायों को देखकर घोड़ों को भी अस्तित्व-बोध हुआ हो कि नहीं हमारे भी कुछ जीवनाधिकार हैं हम भी सड़क पर गायों की तरह खड़े हो सकते हैं, वैसे भी मार्गों पर सदियों से हमारा जन्मसिद्ध अधिकार रहा है! 
       सड़क पर गाय और घोड़े बेफिक्र खड़े थे, मैंने मन ही मन सोचा, अन्य जानवरों को भी इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। सभी जानवर इकट्ठे होकर समझदारी दिखाते हुए एक जानवर-संघ बनाकर सड़क पर आकर खड़े हो जाएं और इंसानों को चेता दें कि हमारे भी मूलाधिकार की चिंता की जाए! 
        वैसे एक बात है, यह जानवर-संघ इंसानों पर अवश्य भारी पड़ेगा, क्योंकि यहाँ प्रत्येक इंसानों में एक दूसरे को इंसान न मानने की प्रजातीय बिमारी है, पशु-संघ इंसानों के बीच की इस बिमारी का लाभ उठा सकते हैं! क्यों है न? खैर। 
     फिर नजर ग‌ई सड़क के ऊपर आर-पार लगे साइन-बोर्ड पर, जिसपर लखनऊ, बहराइच, श्रावस्ती की दूरी लिखा था, उस बोर्ड पर लंगूर परिवार अपने बाल-बच्चों समेत चहलकदमी कर रहे थे! शायद इन्हें इंसानी फितरत की अच्छी समझ है, इन्हें जानवर-संघ का सदस्य बनने की जरूरत नहीं, इसलिए ये सड़क पर नहीं उतरे! 
     यहां सेथोड़ा आगे बढ़ा, एक कुत्ता महाशय जानवर-महासंघ का विद्रोही टाइप बने आदमियों का सहयोग करते प्रतीत हुए..! ये महाशय अकेले ही सड़क के नियमों का पालन करते हुए चले जा रहे थे। इन्हें ऐसे चलते देख मैंने सोचा, "ये महाशय भी आदमगीरी को बखूबी जानते इसके बरक्स इन्हें अपने कुत्तागीरी में ही मज़ा है, इसलिए इन्हें भी जानवर-महासंघ में सम्मिलित होने की क्या जरूरत? शायद इसीलिए निश्चिंत हैं! खैर..
      रात में बारिश हुई थी। अभी तक सुबह के वातावरण में उससे ठंडकपन बनी हुई थी। हवाओं में घुली यह ठंडकपन मेरे विचारों को गर्मी प्रदान कर रही थी। इस मौसम में मुझे अपने विचारों के साथ चलने में मजा आ रहा था। 
     तभी देखा! सामने कुछ दूर एक इंसान सड़क पर ही (पटरी नहीं) अपनी साइकिल छोड़ वहीं खंती की ओर बढ़ गया। वहां बैठा वह प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान को धता बताने लगा! खैर इस सार्वजनिक स्थान पर भी किसी की निजता भंग न हो मैंने उससे नजरें फेर लिया उसकी गिरी-पड़ी साइकिल की तस्वीर भी नहीं लिया‌। 
      इसके लिए कुछ लोग बेचारे प्रधानमंत्री को दोष दे सकते हैं कि उनका स्वच्छता अभियान मात्र दिखावा है! फिर मैंने मन ही मन सोचा, "काश! प्रधानमंत्री यहाँ लट्ठ लेकर खड़े होते, तो उनका स्वच्छता अभियान अवश्य सफल होता!! लेकिन खैर यह देश ही ऐसा है, यहाँ सब को जोर की लगी है..महान से महान प्रधानमंत्री के पुरखे भी इसे नहीं रोक सकते!!!
     अब मैं वापस अपने आवास के पास पहुँचा ही था कि बकरियों की आर्त्र स्वर में मिमियाहट सुनाई पड़ी, मेरे सामने से गुजरती मोटरसाइकिल पर एक आदमी दो बकरियों को अपनी गोद में बेरहमी से दबाए था। उस मोटरसाइकिल के दोनों ओर दो बोरे भी टंगे थे, उसमें भी एक-एक बकरियां बँधी थी! मतलब मोटरसाइकिल पर कुल चार बकरियां और दो आदमी थे! इन्हें इस तरह जाते देख मैंने सोचा, "पता नहीं इन बकरियों की अम्मा इनका खैर मनाने के लिए बची भी होगी या नहीं..."
#चलते_चलते 
      जिसे केवल अपनी पड़ी है, उसे ऊँच-नीच कुछ भी नहीं सूझता..
#सुबहचर्या 
   (26.7.18)

जीवन तो जीवन है!

        इधर सुबह नींद तो खुलती है लेकिन मन अलसाया रहता है। मन को समझाते-समझाते लगभग पौने छः बज गये थे, तब उठा। एक बात और है हो सकता है वाकिंग के लिए कोई उचित स्थान न पाकर मन टहलने जाने से आनाकानी करता हो? वैसे यहां नया-नया हूँ अभी सामने से गुजरती सड़क पर टहल लेता हूँ। यहाँ एक स्टेडियम भी है; लेकिन वहाँ तक जाने में ही सुबह की टहलाई का कोटा खर्च हो जाता है, वहां टहलने को कुछ नहीं बचता। लेकिन सड़क पर टहलना भी आजकल कम खतरनाक नहीं। सड़क के नियम को लोग नियम-फियम मानकर हवा में उड़ा देते हैं! और अपनी जान के साथ-साथ दूसरे की जान भी खतरे में डाल देते हैं। खैर यह सब जानते-फानते हुए भी हम इसी सड़क पर टहल लेते हैं। 
        आज जिज्ञासावश पहली बार स्टेडियम चलने की सूझी। उधर चलते हुए मैं अपने कदम गिन रहा था। सड़क से स्टेडियम की ओर एक खड़जा-मार्ग जा रहा था। मैं इस रास्ते पर मुड़ गया। इस रास्ते में एक मैदान में कुछ खच्चर नुमा घोड़े घास चरते नजर आए। 
        घर से स्टेडियम के गेट तक पहुँचने में लगभग सोलह सौ कदम हो चुका था। इसके मैदान में चार-छह लोग क्रिकेट खेल रहे थे... एक बच्चा था, वह हाथ में हाकी थामे था। उसके सामने एक सयाना शख्स भी हाकी लिए खड़ा था.. दोनों के बीच नीचे जमीन पर गेंद पड़ी थी। 
       कुछ ही क्षण बाद बच्चा डिबलिंग की कोशिश करने लगा। 
       एक अन्य व्यक्ति मेरी ही तरह स्टेडियम के मैदान को भर-आँख निहार रहा था। मैं इस मैदान का चक्कर लगाने की सोचने लगा। महोबा जैसा यहां मैदान के चारों ओर कंक्रीट-पथ नहीं बना है। 
     "आज पहला दिन है, बाद में टहलने की सोचेंगे" सोचकर मैं वापस होने को हुआ कि तभी दूर एक लंबे-चौड़े सीमेंटेड जमीन के कोने पर आराम से सोए एक कुत्ते पर निगाह पड़ी, वह तो जैसे घोड़ा बेचकर सो रहा था। उसके सोने के अंदाज से मुझे ईर्ष्या हुई कि मैं ही बेवकूफ हूँ जो टहलने आ गया। 
        खैर लौट पड़ा। आवास तक आने में यूँ ही लगभग चौंतीस-पैंतिस सौ कदम चल चुका था।
       अखबार आया था। इसे लेकर पढ़ने बैठ गया। सोचा जब तक चाय बनेगी तबतक मैं अखबार पढ़ चुका होऊंगा। 
      अखबार में मलिक मुहम्मद जायसी की मृत्यु के बारे में एक खबर छपी थी। वे सिंह के धोखे में अमेठी नरेश के बाण का शिकार हो गए थे और जायस कस्बे में उसी स्थल पर उनकी समाधि है…
       इस खबर को पढ़कर मैंने सोचा... उस जमाने में गंगा के इस विशाल मैदान में सिंह गर्जना करते रहे होंगे!  
       अभी कुछ ही दिन पहले आवारा कुत्तों को पकड़ने या उन्हें मारने के विरोध पर सुनवाई करते हुए किसी हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि कुत्तों के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण मानव जीवन है.. 
       ...लेकिन एक बात है, जीवन तो जीवन है चाहे जिसका हो। यह धरती केवल मनुष्यों के लिए ही तो नहीं बनी है? सोचता हूँ क्या मानव जीवन इतना महत्वपूर्ण है वह अपने लिए जल..जंगल...जानवर...जमीन..सबकी बलि लेकर जिंदा रहना चाहता है?? फिर तो ऐसे बियाबान धरती पर जीना भी क्या जीना…!!!
 #चलते-चलते 
        जैसे-जैसे हम स्वार्थी होते चले जाते हैं, वैसे-वैसे स्वयं को ही नष्ट करते जाते हैं..
#सुबहचर्या 
    (6.7.18)

मंगलवार, 26 मई 2026

लगाम

 
      मित्रों! आज सुबह जब टहलने के लिए निकला तो पाँच बजकर अड़तीस मिनट हो चुके थे… यह टाइम यहां इसलिए बता रहा हूँ कि इत्ती सुबह मेरे उठ जाने की सोच आप भी इसके लिए प्रेरित होंगे! वैसे जो सुबह की नींद खराब नहीं करना चाहते पक्का है कि मुझे बेवकूफ समझकर इस नींद का मजा लेते होंगे… चलिए कोई बात नहीं।

        मैं सड़क पर चढ़ चुका था.. चलते हुए अपने आसपास के प्रति थोड़ा इसलिए सजग था कि #सुबहचर्या में लिखने के लिए कोई मसाला मिले! लेकिन सच बताएँ.. ऐसी कोई चीज नजर नहीं आ रही थी कि मतलब की चीज हो और उसका कोई अर्थ निकालें.! 
        तभी एक मोटरसाइकिल भड़-भड़ करती हुई मेरे पीछे आकर रुक गई.. इसके साथ ही कोई कहते सुनाई दिया.. "शायद तेल खतम हो गया..!" 
       पीछे मुड़कर देखा, वह व्यक्ति मोटरसाइकिल स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा था... उसके दो बुर्काधारी महिलाएँ भी थीं.. मन ही मन सोचा, इसे कम से कम मोटरसाइकिल की टंकी में तेल का पता करके चलना चाहिए। 
     इन बातों के बीच मैं अपनी टहलाई का आधा भाग पूरा कर चुका था..मोबाइल से सड़क की तस्वीर ली..सोचा फेसबुक पर इस लेख के साथ यह तस्वीर चेंप कर आपको दिखा दूँ कि मैं इसी सड़क पर टहलता हूँ.. 


      इसी समय सड़क के किनारे खुरचाली करते हुए एक घोड़े पर नजर पड़ी.. जैसे जमीन पर टाप धरने में आनाकानी कर रहा हो, एक आदमी उसकी लगाम पकड़े हुए था। घोड़ा तो हृष्ट-पुष्ट था लेकिन भारतीय मानक वाला था। मेरी नजर अभी घोड़े पर ही थी एक बंदर उछलते हुए सड़क पार करता दिखाई पड़ा! 
       खैर, इन बातों को पीछे छोड़ मैं आगे बढ़ आया। पीछे से घोड़े के टाप की टप-टप सुनाई पड़ा… मुड़कर कर देखा, वही आदमी जो घोड़े का लगाम पकड़े खड़ा था अब साइकिल लगाम को पकड़े मेरे पास से गुजर गया… घोड़ा भी उसी गति से दौड़ते हुए चला जा रहा था। शायद वह आदमी घोड़े को दौड़ना सिखा रहा था।
      अब तक मेरे टहलाई का द एंड होने वाला था... अचानक फिर घोड़े पर निगाह पड़ गई.. अबकी बार साइकिल सवार घोड़े की नाक से कसी लगाम अपनी ओर खींचे, उससे झुंझलाहट में कुछ बड़बड़ा रहा था... लेकिन मैं चौंक तब उठा, जब घोड़े ने भी अपनी गर्दन मोड़कर उसे ऐसी नाराज निगाहों से देखा, जैसे उससे कह रहा हो...कि..
    "अमां यार..तुम इंसान हो, या पायजामा..? सिखाना भी नहीं आता और खींचे जा रहे हो लगाम!" 

        खैर, अब तक मैं एकदम घर के पास पहुँच चुका था, मेरी दृष्टि चचाजान के चाय की दुकान पर अटक गयी.. एकदम झक सफेद दाढ़ी में... सुबहई-सुबहई गोमती खोलकर चाय पिलाना शुरू कर देते हैं…इतने सबेरे अकसर वहां मजदूर ही दिखाई पड़ते हैं, चाय की चुस्की लेकर ये काम पर चले जाते हैं.... 

      अपना देश विचित्रताओं को समेटे है.. तहाँ सभी अपने में मगन! सोशल मीडिया पर एक तस्वीर देखा। एक बाबा की ठुकाई-पिटाई हुई थी। उन्हें देखकर लगा बाबाजी ढंग से साधना करना नहीं आता होगा नहीं तो ऐसी दुर्दशा न होती! हो सकता है लगे होंगे किसी बात पर टांग अड़ाने।

#चलते_चलते 

       वैसे, इस देश की संस्कृति किसी लगाम पर विश्वास नहीं करती..और सारी समस्या की जड़ में, लगाम हाथ में पकड़ने की अभिलाषा रखने वाले ही होते हैं..

#सुबहचर्या 
   (18.7.18)

रविवार, 24 मई 2026

यह तो मन ही है निवास सभी विपदों का

      दोस्तों! आज मन अलसाया था। अलसुबह उठकर  टहलने से आनाकानी करने लगा। मैंने भी करवट बदला और इसे विजयीभव का आशीर्वाद दे दिया कि बेटा तुम्हारी ही इच्छा सर्वोपरि, हम भी नहीं उठने वाले। लेकिन मन तो मन, पल में तोला पल में मासा! फिर कुछ ही पल बाद इसने दिमाग को झिंझोड़कर कहा, उठने दो, हम उठ बैठे।


      खैर, मन की बात चली तो "उर्वशी" में पढ़ी ये पंक्तियाँ याद आयीं -

"तन का क्या अपराध?
यंत्र वह तो
सुकुमार प्रकृति का,
सीमित उसकी शक्ति और सीमित
आवश्यकता है, यह तो मन ही है
निवास जिसमें समस्त
विपदों का ;
वही व्यग्र, व्याकुल असीम अपनी
काल्पनिक क्षुधा से
हाँक -हाँक तन को उस जल को मलिन
बना देता है,
बिम्बित होती किरण अगोचर की जिस
स्वच्छ सलिल में
जिस पवित्र जल में समाधि के सहस्रार
खिलते हैं।"

      तो मित्रों! इस आलसपन के लिए अपने तन को दोष क्यों दूँ! तन तो प्रकृति की तरह निर्मल होता है, असली अपराधी तो यह विषैला मन है, जो अपनी करने के लिए बहाने ढूंढता है,
           
"तन का काम अमृत, लेकिन
यह मन का
काम गरल है।"

      हाँ कवि के शब्दों में यह तन, मन के ही अधीन है... तन को सही राह दिखाने के लिए मन को जागृत होना पड़ता है,

"मन की लिप्सा के अधीन
उसको जगना
पड़ता है ;"
       
          खैर अलसाया मन जागा, मैं बिस्तर से उठा, जाकर मुँह पर पानी के छींटे मारे, चप्पल में पैर डाला और घर से बाहर निकल सड़क पर आ गया‌ ...
     
        बरबस एक लड़के पर ध्यान गया, वह जल्दी-जल्दी पैडल पैर मारते हुए साइकिल खैंचरते बढ़ा जा रहा था। उसके पैर भी अभी पूरी तरह पैडल पर नहीं पहुंचते थे। मुझे लगा शायद वह साइकिल चलाने का अभ्यास कर रहा है.. 

      इधर सड़क पर धीरे-धीरे आवाजाही शुरू होने लगी थी, लोग दिनचर्या के लिए गतिमान हो रहे थे... लड़के की साइकिल चलाने की हड़बड़ी में एक ज़िद थी, यह ज़िद भी काम की ही होती है तभी तो वह साइकिल चलाना सीख लेगा!
     
          ....टहलते-टहलते मैं यूँ ही काफी आगे निकल आया..देखा..एक छोटा-सा सरोवर (?) जिसमें कमल खिलने को तैयार हैं..

     एक दोपहर देखा था, इसमें खिले कमल बहुत खूबसूरत लगे थे..  असल में कमल सूरज की किरणों के साथ ही खिलना शुरू होते हैं... 

      इस नन्हें से सरोवर में, खिले बेचारे ये कमल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते प्रतीत हुए थे.. क्योंकि यह सरोवर अतिक्रमण ही नहीं, किसी प्लाटिंग का हिस्सा बनता दिखाई पड़ा था... आगे जब यहां यह तालाब ही नहीं रहेगा, तो ये कमल भी कहाँ खिलेंगे!!
         
          ...कहते हैं कमल कींचड़ में खिलता है, इस कथन में जैसे "कींचड़" को हेय माना गया है.. जबकि कमल कीचड़ में नहीं तो और कहां खिलेंगे? पथरीली जमीन में तो खिल नहीं सकते।
       
        ....लौटते समय सड़क के किनारे भरे जल में खिली कुमुदिनियों पर निगाह गड़ गयी.. कुमुदिनी एकदम से प्रात:बेला में ही खिलती है।

      वर्षा-ॠतु के तुरंत बाद प्रकृति बड़ी मनोहारी हो उठती है.. हरियाली के साथ सरोवर भी पुष्पित हो उठते हैं! वैरागी-मन ऐसी ही किसी प्राकृतिक अंचल में आश्रय खोजता है… प्रकृति में ही मुक्ति-मार्ग है, यही है वानप्रस्थ!

"जो भी अवसर निसर्ग के,
ईश्वर के भी
क्षण हैं ; धर्म साधना कहीं प्रकृति से भिन्न नहीं
चलती है"

        प्रकृति में रमने वालों के लिए मुक्ति की चाह व्यर्थ है -

"पर, खोजें क्यों मुक्ति?
प्रकृति के हम
प्रसन्न अवयव हैं;
जब तक शेष प्रकृति,
तब तक हम भी
बहते जाएँगे
लीलामय की सहज, शान्त, आनंदमयी
धारा में।"

      इस प्राकृतिक सौन्दर्य से युक्त धरती से...

"कितना कम स्वर्गीय स्वयं सुरपुर है इस
वसुधा से!"

      खैर प्रकृति में रमता हुआ जोगी टाइप की फीलिंग में पहुँचा ही था कि अचानक सड़क की पटरी पर गंदगी के बीच पड़े प्लास्टिक के एक छोटे तिरंगे पर निगाह पहुंची..

       इसे झटपट उठा लिया। लेकिन.. इस झंडे का सम्मानपूर्वक निस्तारण कैसे हो? ऊहापोह में पड़ गया! इसे सड़क पर फेंक नहीं सकता और घर से यह फिर कूड़े के साथ लौट आता…

       अचानक मूर्ति-विसर्जन का ध्यान हुआ... तुरंत राष्ट्रीय प्रतीक इस तिरंगे को मरोड़ा, गोला बनाया और पास में नाले में फेंक दिया..मने मूर्ति की तरह झंडे का विसर्जन कर दिया..

       वैसे ईश-मूर्ति के साथ एक लफड़ा भी है, कभी-कभी पूजा के बाद इसका विसर्जन करना पड़ता है… और विसर्जन के बाद इन मूर्तियों का हाल देखी नहीं जाती..

      खैर, लौट के बुद्धू घर को आए, हमारी भी दिनचर्या शुरू हुई.. चाय बनाया, फिर चाय की छोटी-सी गिलास हाथ में थामे अखबार खोलकर बैठ गया...

      "मुसलमानों के बिना हिंदुत्व भी नहीं बचेगा" यह कथन मन को भाया।

      एक बात है "हिंदुत्व" कोई धर्म नहीं है, भारतीय संविधान ही हिंदुत्व की परिभाषा है।

   खैर,  बातें  बहुत ज्यादा हो ली है, तो

#चलते_चलते
    

      कुल बात का लब्बोलुआब यह कि प्रत्येक हेय चीज में असीम संभावनाएं छिपी हैं।

#सुबहचर्या
(19.9.2018)
  विनय