आज पाँच बजे ही आँख खुल गई। सोमनाथ से निकलना था। कुछ देर तक यूं ही चहल-कदमी करता रहा। फिर नहाने का विचार आया, लेकिन यहाँ यह भी कठिन काम लगा। दरअसल पानी इतना खारा था कि जैसे सीधे समुद्र का पानी हो! मैंने होटल वाले से पूँछा भी था, *क्या सीधे समुद्र का पानी सप्लाई करते हो?” वह हँसकर बोला था, “नहीं, बोरिंग का पानी है।”
गुजराती भोजन में मीठे का प्रयोग होता है। साथ में छाछ भी होता है? मैं इसपर सोचने लगा कि ऐसा क्यों? मुझे लगता है पूरे काठियावाड़ के भोजन में एक अलग तरह का स्वाद संतुलन दिखाई देता है। यहाँ दाल-सब्जियों में हलकी मिठास, साथ में छाए, और कई व्यंजनों में दूध-घी या खोए का प्रयोग सामान्य बात है। यह पहले तो मुझे थोड़ा अजीब लगा लेकिन फिर मुझे भी ऐसे भोजन का स्वाद अच्छा लगने लगा। दरअसल इसके पीछे केवल स्वाद नहीं, बल्कि वहां की जलवायु और जीवन स्थितियों का बड़ा हाथ है।
काठियावाड़ क्षेत्र में पानी स्वभावत: कुछ खारा या क्षारीय है। संभव है भोजन में मिठास और छाछ का प्रचलन इसी खारेपन को संतुलित करने से जुड़ा हो। वैसे भी गर्म जलवायु में छाछ भोजन को सुपाच्य रखता है।
गुजरात व्यापारिक प्रदेश है। यहां यात्राएं भी लोग करते रहे होंगे, लंबी यात्राओं में भोजन खराब न हो इसलिए भोजन को मधुर और सुपाच्य रखने की परंपरा रही होगी। यही बात यहां की भोजन-संस्कृति का हिस्सा बन गई हो।
खैर जो भी हो, यहां बाटी भी खोया डालकर बनाते हैं, यह बहुत स्वादिष्ट होता है। घी और खोए की वह मिली-जुली सुगंध साधारण बाटी को भी एक अलग ही व्यंजन बना देती है। पहली बार खाने पर लगता है जैसे राजस्थानी बाटी और किसी मिठाई का स्वाद एक साथ मिल गया हो।
यहां काठियावाड़ में नारियल की खेती तो खूब होती ही है, मूँगफली की भी होती है। फिर बीच-बीच में फैले छोटे-बड़े उद्योग और समुद्र से जुड़े बंदरगाह, सब मिलकर यहां की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं।
लगता है भारत के उद्योगपतियों के लिए गुजरात मुफीद जगह प्रतीत हुई। समुद्री बंदरगाहों की उपलब्धता, अपेक्षाकृत कम आबादी वाले विस्तृत भू-भाग, और व्यापारिक दृष्टि से अनुकूल वातावरण ने यहाँ औद्योगिक इकाइयों को तेजी से विकसित होने का अवसर दिया होगा। छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक कहीं न कहीं कोई फैक्ट्री, प्रोसेसिंग यूनिट या औद्योगिक परिसर दिखाई पड़ ही जाता है।
इन्हें देखकर सहज ही समझ में आता है कि उत्तर भारत के इतने मजदूर रोज़गार की तलाश में यहाँ क्यों आते हैं। दरअसल उद्योग केवल पूँजी को नहीं बुलाते, वे श्रम को भी आकर्षित करते हैं। शायद यही कारण है कि गुजरात के शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में आपको उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान तक के लोग काम करते दिखाई पड़ जाते हैं। यहाँ की आर्थिक सक्रियता ने अलग-अलग प्रदेशों के लोगों को एक साझा श्रम-संस्कृति में जोड़ दिया है।
इस समय हम सोमनाथ-अहमदाबाद हाईवे पर चल रहे थे। ऐसे मार्गों का प्रभाव गुजरात की आर्थिक गतिविधियों पर ही नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी अच्छा प्रभाव पड़ा है।
#चलते_चलते
देश में हो रहे विकास के बावजूद भारतीय नागरिक एक जिम्मेदार नागरिक नहीं बन पा रहे हैं।
#सुबहचर्या
(2.07.19)