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रविवार, 29 मार्च 2026

शीशे के उस पार

       शीशे के पार से नाई की दुकान में झांका। दो कुर्सियों पर दो लोग बैठे थे। शायद दोनों गपशप में मशगूल थे। उधर बेंच पर कोई अन्य व्यक्ति नहीं दिखाई पड़ा। इससे तसल्ली हुई कि समय बचा, नंबर नहीं लगाना पड़ेगा। दुकान में दाखिल हो रहा था कि ‘नमस्ते साहब’ सुनाई दिया। यह सोचकर कि इस दुकान का मालिक जो स्वयं एक कुर्सी संभालता है, उसने मुझे नमस्कार किया है, मैंने भी प्रतिउत्तर में तुरंत उसे ‘नमस्कार’ बोला और फिर उसकी ओर देखा। लेकिन यह मालिक-नाई नहीं था। फिर भी इसका चेहरा खूब जाना-पहचाना लगा। मैं दूकान के अंदर आया। दूसरी कुर्सी पर बैठा नाई उठ खड़ा हुआ। उसने कटिंग के लिए मुझे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। कुर्सी पर बैठने के बाद मैंने नमस्कार करने वाले व्यक्ति के चेहरे को ध्यान से देखकर अपनी यादों को खंगालने लगा कि आखिर यह शख्स कौन है जो मुझे जानता है। तभी अचानक उसने मुझसे कहा, “साहब, जबसे मैं देख रहा हूँ आप बाहर-ही-बाहर नौकरी कर रहे हैं कभी आप लखनऊ नहीं आए।” मैं कुछ बोला नहीं लेकिन मन ही मन उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था। उसने फिर कहा, “साहब, एक फार्म भर कर दे दीजिए जहां चाहें वहां मैं आपका ट्रांसफर करवा दुंगा।” उसकी बात पर मैं मुस्कुराया। यह सोचकर कि यह व्यक्ति मेरा इतना हितैषी है अपने पूरे मन-मस्तिष्क को उसे पहचानने पर लगाकर मैंने उससे कहा, “यह नौकरी है जब तक इसमें हम हैं क्या दूर क्या पास।” उसने नाई से मेरा मकान नंबर बोलकर बताया कि मेरा घर यहाँ है। उसकी इस आवाज ने जैसे मुझे जगा दिया हो! अचानक मुझे याद आ गया कि यह तो मेरा अख़बार वाला है, जो सुबह घर पर अखबार फेंक कर जाता है। दरअसल मेरी एक कमजोरी है, किसी चेहरे को तत्काल ‘रिकग्नाइज’ न कर पाना। इसमें कभी-कभी मुझे कुछ क्षण लग जाता है। दूसरे, वह इस नाई की दुकान पर मिलेगा इसकी मुझे कल्पना नहीं थी, इसलिए भी उसे पहचानने में मुझसे देरी हुई। यह व्यक्ति पिछले 19 वर्षों से मेरे घर पर अखबार देता आ रहा है। गाहे-बगाहे इससे मुलाकात हो जाती है। लेकिन इन बीस वर्षों में भी इस व्यक्ति में कोई खास बदलाव मुझे नहीं दिखाई पड़ा। नाई से बतियाते हुए वह मेरे घर के आस-पास के घरों का परिचय देने लगा। 

      नाई मेरे बालों की कटिंग शुरू कर चुका था। इस बीच उन दोनों को आपस में घुल-मिलकर बातें करते देख मैंने नाई से उसके गांव के बारे में पूँछ लिया। उसका घर लखनऊ और अमेठी जिले की सीमा पर स्थित किसी गाँव में था। उसने कहा कि बच्चों की पढ़ाई के लिए वह शहर आ गया है क्योंकि शहर में बच्चों के पढ़ाई की सुविधा है। यहाँ वह पचास प्रतिशत प्रति कटिंग मालिक को देता है। जबकि गाँव में उसकी खुद की दुकान थी। बीस वर्षों तक उसने यह दुकान चलाया था, बल्कि उस दुकान में उसका भाई भी काम करता था। लेकिन गाँव में यह दुकानदारी उसे रास नहीं आई। गाँव में किसी एक बिरादरी का बोलबाला था जबकि वहाँ पर उसकी बिरादरी के मात्र दस प्रतिशत घर थे। उसकी दुकान पर लोग कटिंग या दाढ़ी बनवाने के बाद उधारी करके चले जाते थे। धीरे-धीरे यह उधारी एक लाख रुपए से अधिक की हो चुकी थी। मैंने उससे पूँछा, यह उधारी क्यों मान जाते थे? उसका कहना कि क्या करें, लोग पहले दाढ़ी-बाल बनवाते और पैसा मांगने पर कह देते खेत से सीधे चले आए हैं, पर्स पैंट में छूट गया है या पर्स उस वाले पैंट में रह गया या भूल ग‌ए, बाद में पैसा दे देंगे। गाँव का मामला होता तो पैसा लेने के लिए जोर भी न दे पाते। फिर नाई ने कहा ऐसा व्यवहार और उधारी कब तक चलता, दिन भर की मेहनत उधारी में चली जाती थी। इसलिए भी मैंने शहर का रुख कर लिया।

       उसकी बात सुनकर जब मैं अफसोस जताने लगा तो उसने कहा,

      "ऐसी बात मेरे ही साथ नहीं थी। वहाँ क‌ई अन्य नाई की दुकानें और भी थी जो बेचारे उधारी पर दुकान चलाते थे। एक दुकानदार बेचारा ऐसा था कि उसके दुकान पर यह उधारी डेढ़ लाख रुपए तक पहुँच गई थी। इस उधारी को उसने एक कापी पर लिख रखा था, एक दिन मैंने उसे वह कापी जलाते हुए देखा। ऐसा करने से उसे रोकते हुए मैंने उससे पूँछा कि इसे क्यों जला रहे हो, इससे तो तुम्हारा पैसा डूब जाएगा…तो वह कहने लगा, नहीं इस उधारी की कापी को जला देना ही मेरे लिए ठीक है, क्योंकि इसे देखकर मेरा टेंशन बढ़ता है।” 

          कटिंग पूरी हुई मैंने पैसे दिए और घर की ओर पैदल चल पड़ा। मुझे गाँव की इस तस्वीर में एक स्याहपन नजर आया‌। इस देश के गाँव भारत को विकसित बनाने के लिए अभी तैयार नहीं हैं, अभी बहुत कुछ बदला जाना बाकी है।

जब बादल घिर-घिर आएंगे, बीते दिन याद दिलाएंगे।”

       सुबह टहल रहा था तभी बीती रात किसी का भविष्यवक्ता की तरह कहा कथन याद आया कि कल पानी बरसेगा‌। आसमान की ओर देखा। सूरज महोदय नभारोहण के अंदाज में बादलों की फांफी के पीछे से झांक रहे थे, जैसे वहीं से हड़का रहे हों कि तुम लोग इस लायक नहीं हो कि मैं बादलों को बरसने दूँ। वे बूँद बनने से बादलों को रोकते जान पड़े‌ और सूरज की गर्मी बढ़ाने में बादल भी उनका साथ देते प्रतीत हुए। यही नहीं ये बादल जैसे सूरज को उकसा रहे थे कि हे सूरज देव महाराज, मुझ बादल को पानी न बनने दें मुझे ताप से विलीन कर दें जिससे भारतनाम्ना भूमि के रहवासी मेरी बूँद-बूँद के लिए तरसें! 

       दरअसल मामला यह है कि बादल का कोई आवारा टुकड़ा गलती से एक पहाड़ी गाँव के किसी घर में उड़ता हुआ चला आया वहाँ उसकी नजर टी.वी समाचार चैनल पर प्रसारित हो रहे बाढ़ की खबरों पर अटक गई थी। इसी खबर की एक हेडिंग को बादल के इस टुकड़े ने पढ़ लिया। हेडिंग थी, “बादल कहर ढाए” “उमड़ा सैलाब, शहर के शहर मचा कोहराम” या “पानी की मनमानी !” इन खबरों के बीच रह-रहकर विज्ञापन भी चल पड़ते! टी वी पर खबरों की ऐसी हेडिंग और रिपोर्टिंग देख बादल का वह टुकड़ा दुखी हो उठा। उसने दो बूंद आँसू टपकाए और रूठकर वहाँ से हवा के एक झोंके की तरह बाहर निकल आया। बादल का वह टुकड़ा फिर घटाओं से आ मिला था। बादल के उस टुकड़े और बादल की घटाओं के बीच मीडिया पर चल रही इन खबरों को लेकर कुछ कानाफूसी हुई। दोनों एकाकार हुए और फिर आसमान में छायी घटा धीरे-धीरे छंट चुकी थी। 

        बादल नाराज हो ग‌ए होंगे! क्योंकि बादल अभी तक यह सोचकर ही बरसते आए थे कि उसकी बूँदों से धरती हरी-भरी होकर खिलखिलाएगी! इसीलिए ये बादल बूँद बनकर बिना भेदभाव के खेत-खलिहान, पोखर, ताल-तलैया, नदी-नाले सबको सराबोर कर उफना देते थे। लेकिन आज का आदमी बादल और उसकी बूँदों को आफत बताने लगा है और जिस पानी के बिन जीवन सून उसी “पानी की मनमानी” से बादल को उसके बरसने पर ही उलाहना देने लगा है! बादल और उसकी बारिश को लेकर पैदा हुई इधर इस न‌ई इंसानी सोच पर बादलों के फोरम पर खूब माथापच्ची हुआ होगा। इस चर्चा से बादलों ने निष्कर्ष निकाला होगा कि "पानी की मनमानी बोलने वालों को अब पानी की जरूरत नहीं, तभी तो इन लोगों ने ताल-तलैया नदी-नालों पर अपने आलीशान बंगले खड़े कर लिए हैं! ये अपनी इस कारस्तानी को भूल उल्टे हमारी बूँदों को दोष देते हैं! जबकि हमारे बरसने के समाचार से अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाकर कमाई करते हैं। मीडिया तो मीडिया! हमारे बरसने पर जैसे राजनीति भी बरस पड़ती है और राजनैतिक लोग अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने लगते हैं।" अंततः बादलों ने, इस विचार मंथन के बरक्स ही, आपस में तय किया होगा कि आसमान में घूमो टहलो खूब, लेकिन बूँद बनकर भारत नाम्ना धरती पर मत टपको। तो, शायद बादल अब इसीलिए नहीं बरसते। 

       बेचारे ये बादल! धरती और इनके बीच अन्योन्याश्रित संबंध ऐसा था कि बादलों को देखने मात्र से धरती जैसे झूमने लगती और बादल भी बरबस बरस पड़ते थे। धरती ऐसी हरी-भरी हो उठती थी कि संवेदनाओं के गीत गाए जाने लगते।टहलते-टहलते मुझे यूँ ही पुराने जमाने का यह गीत “जब बादल घिर-घिर आएंगे, बीते दिन याद दिलाएंगे” याद आया। शायद वर्ष 1985 का जुलाई माह का कोई दिन था जब पहली बार मैंने यह गाना सुना था। मैं उन दिनों सीएमपी डिग्री कॉलेज में बी ए का छात्र था। इलाहाबाद के मध्य चौक घंटाघर के पास रहता था। वहीं से पैदल डिग्री कॉलेज आया-जाया करता था। उस दिन भी पैदल ही कॉलेज से लौट रहा था। आसमान में बादल घिरे हुए थे और बूंदा-बांदी हो रही थी। हीवेट रोड से जीरो रोड की ओर मैं मुड़ चुका था। इस बूँदाबादी में भविष्य के प्रति बेपरवाह और निश्चिंत पैदल चलते जाना उस दिन न जाने क्यों मुझे अच्छा लग रहा था‌। इसी समय किसी के घर में विविध भारती पर बज रहे इस गाने की आवाज मेरे कानों में पड़ी थी। तब से आज तक बारिश में भीगते हुए वह चलना और इस गाने को मैं नहीं भूल पाया हूँ। ये बादल मेरे मन की उस बेपरवाही और निश्चिंतता की मुझे याद दिलाते हैं। इसीलिए बारिश के इन दिनों में, जब भी मैं आसमान की ओर नजरें उठाता हूँ, तो उन्हीं बादलों को खोजता हूँ!!

मन का आलसी होना

       आजकल सुबह देर से सोकर उठते हैं यदि जल्दी उठ भी ग‌ए तो अजीब सी खुमारी मन पर छायी रहती है। इस आलसाये मन को शरीर का शिथिल पड़े रहना अच्छा लगता है। तो, मैं मन का ही साथ देना पसंद करता हूँ। इस बीच चाय-वाय पीते हुए दो अखबार निपटा देता हूँ। तब कहीं जाकर यह खुमारी छंटती है और मन बिस्तर छुड़वाता है। आजकल इनडोर टहलाई की वजह से सिवा दीवालों के कोई विशेष बात नहीं देख पाता कि ढंग की ‘सुबहचर्या’ हो! खैर मन की आज्ञा से सुबह बिस्तर से उठा, ऐप से कदम भी गिनता हूं, इसलिए मोबाईल भी जेब में रखकर टहलाई के कदम बढ़ाने ही जा रहा था कि पत्नी का फोन आया। उन्होंने पूँछा कि टहल-वहल लिए? मैंने कहा, नहीं, अभी इसकी ही तैयारी में हूँ। विजय भाव में वे बोली कि मैं तो टहल चुकी हूँ और पार्क में बेंच पर बैठी हूँ। दरअसल जब हम दोनों में से कोई एक पहले टहल लेता है तो एक दूसरे को ऐसे ही बताता है कि देखो तुम तो बैठे ही रह ग‌ए हम टहल लिए। खैर मैंने भी अपनी सफाई में मन को दोष दे छुट्टी पाया तो वे मुझे उस पार्क का आँखों देखा हाल सुनाने लगीं।

         इस पार्क में प्रायः रिटायर्ड लोगों का ही कब्जा रहता है वे ही आते हैं यहां। इस पार्क में पक्का स्ट्रक्चर कम है इसलिए यह एक सघन हरियाली वाला पार्क है जिसमें पेड़ो की घनी छाया भी रहती है। इसमें बैडमिंटन कोर्ट होने से पैंतालीस पचास वय के नौकरी-पेशा लोग भी यहां आकर रिटायर्ड लोगों के साथ वर्जिशन बैडमिंटन में हाथ अजमाते हैं। बैडमिंटन के खिलाड़ी रिटायर्ड बूढ़े हों या पचास के जवान, सभी पूरे सज-धज के साथ जैसे कि स्पोर्ट्स-शू, हाफ-पैंट और टी-शर्ट पहन पीठ पर रैकेट टांगकर खेलने आते हैं। बाकी रिटायर्ड लोगों में से अधिकांश इधर-उधर ग्रुप में बैठे हुए आपस में गप्प लड़ाते देखे जा सकते हैं या इनमें से कुछ बाबा रामदेव का योगाभ्यास कर रहे होते हैं। इसमें जो ज्यादा बूढ़े हो चले हैं वे इधर-उधर लेटे हुए कनखियों से पार्क में आने-जाने वाले लोगों की गतिविधियों को निहारते रहते हैं। एक जन तो प्रतिदिन घर से केतली भर चाय बनवाकर लाते हैं और साथ में कागज का गिलास भी, वे यह चाय अपने साथी वृद्ध-वृंदो को पिलाते हैं। इनमें एकाध ऐसे भी हैं जो सब कुछ छोड़कर समरसेबल का पाइप पकड़े पार्क में लगे पेड़ों-झाड़ियों में वाटरिंग करते देखे जा सकते हैं। इस प्रकार ये रिटायर्ड वृद्धजन सुबह-सुबह यहां काफी वक्त गुजारते हैं जैसे कि घर वालों के लिए खाली स्पेस छोड़ने की नीयत से पार्क में आए हों। इनके बीच खूब हँसी-ठट्ठा भी चलता है। यहां पार्क में महिलाओं की उपस्थिति लगभग नगण्य रहती है वे इसलिए भी इस पार्क में जाने से संकोच करती हैं कि उनकी उपस्थिति में ये बूढ़े खुलकर हँस-बोल नहीं पाएंगे।

        पत्नी ने यह विवरण देने के बाद कहा कि मेरा मतलब यह सब कुछ बताने का नहीं था आज मेरे सामने एक मजेदार वाकया हुआ। फिर वे उस वाकये को सुनाने लगीं। बैडमिंटन का खेल चल रहा था कि इस खेल में विवाद शुरू हो गया। एक बुजुर्ग जो लगभग पैंसठ साल की उम्र के होंगे इस बात पर अड़े थे कि उनकी चिड़िया अंदर गिरी है, तो दूसरी तरफ दो-तीन लोग थे, जो कह रहे थे कि नहीं, चिड़िया बाहर गिरी है! ये मिलकर बुजुर्ग को सम‌झाते कि मान जाओ चिड़िया बाहर गिरी है तो बुजुर्ग और भड़क उठते। वे इस बात पर अड़े हुए थे कि उनकी आँखें धोखा नहीं खाती, चिड़िया अंदर ही गिरी है। उधर दूसरी ओर बहुमत का आंकड़ा तीन लोगों का था वे किसी कीमत पर मानने को तैयार नहीं थे कि चिड़िया अंदर गिरी है उनके अनुसार चिड़िया बाहर गिरी थी। इस बात पर विवाद बढ़ता ही जा रहा था। उन तीनों में एक पैंतालीस-पचास का युवा उन बुजुर्ग से बहस में काफी मुखर था। वह बाकियों से कुछ ज्यादा ही उनसे उलझा था। उसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं था कि चिड़िया अंदर गिरी है। इन दोनों के बीच खूब गलगर्दन हो रही थी कि अचानक बुजुर्ग जी तैश में आ गए और उस युवा जैसे दिख रहे व्यक्ति को गाली देते हुए बोल बैठे, “...के कल के लौंडे हमें सिखाने निकले हैं कि चिड़िया कहाँ गिरी है..(गाली) मैं अंधा हूँ?” बस फिर क्या था गाली सुनते ही पैंतालीस साल के शख्स ने अपना आपा खो दिया और बुजुर्ग को मारने दौड़ा। उनका गिरेबान पकड़ कर उन्हें झकझोरते उनके साथ धक्का-मुक्की करने लगा। किसी तरह अन्य लोगों ने बीच-बचाव करते हुए उन्हें अलग किया। इधर बुजुर्ग गुस्से में कांपते हुए उससे कह रहे थे कि तुम हमको नहीं जानते हम तुम्हारा वो हाल कराएंगे कि तुम्हारे टुकड़े भी नहीं मिलेंगे! 

        खैर श्रीमती जी पूरी घटना हँसते हुए ऐसे सुनाया जैसे कि रिटायरमेंट के बाद मैं भी इसी दशा को प्राप्त होऊंगा! लेकिन मैंने तपाक से कहा कि मैं तो इस तरह पार्क में जाने से रहा। बहुत जी लिया प्रतिस्पर्धी मन के साथ।अब तो खुरपी लेकर क्यारियों से घास निकालुंगा और पेड़-पौधों को सींचुंगा बस! ऐसे प्रतिस्पर्धी मन का क्या फायदा जो खेल-कूद, योग-ध्यान के बाद भी लोगों का तनाव दूर नहीं होने देता? इससे अच्छा है मन का आलसी होना!! मैंने हँसकर कहा।

#चलते_चलते

         आलसी मन के अपने नफा-नुकसान है, इसका सबसे बड़ा फायदा यही है ऐसों को तनाव नहीं व्यापता और वह स्वस्थ रहता है। और साथ में यह भी कि ऐसे लोग ईर्ष्या-द्वेष और लालचादि दोषों से भी दूर रहते हैं। लेकिन पता नहीं क्या सच है?

#सुबहचर्या

(26.05.2024)

दीवाल पर टंगा सूखा गुलाब

       उस जलप्रवाह के कूल पर गुम्फित झाड़ियों पर फूल खिले दिखाई पड़े तो मैंने सोचा ये फूल भी तो सुंदर हैं कोई वनमाली पूजा या श्रृंगार के लिए इन्हें क्यों नहीं चुनता? क्या शायद इसलिए कि उद्भिज के ये वनफूल सुगंधहीन तृणपुष्प हैं? या फिर वनमाली के सौन्दर्य बोध के प्रतिमान में ये तृणपुष्प अरूप और अनुपयोगी है, इसलिए वह इन्हें नहीं चुनता? 
            
          इन पुष्पित झाड़ियों की परछाइयां जलप्रवाह में निष्पाप शिशु सी अठखेलियां कर रही हैं! इसे देख मेरे अंतस में एक प्रश्न उठा कि वनमाली के मन में सुंदर और असुंदर का भेद क्यों पनपा?
        
        मुझे इस जलतरंग में तरंगायित प्रतिबिम्ब में सब कुछ सुंदर जान पड़ा वहाँ असुंदर कुछ भी नहीं था, तृण-मात्र भी नहीं! आखिर मैं किसको असुंदर कह दूँ उस पीत पर्ण को कहूँ, जो उस पुष्प को जीवन देकर समय-चक्र से बिंध अब झरने वाला है और जिसने मार्ग प्रशस्त किया है नव-पल्लव का!! या फिर उस सूखे तृण को कैसे असुंदर कह दूं, जो सड़कर खाद बना है जिसके पोषण से गुम्फित इस झाड़ी पर ये सुंदर पुष्प खिले!! और तो और, वह जलकौवा, जो अभी-अभी इन्हीं तृण गुंफनो से निकल जलक्रीड़ा करने लगा है, समवेत सभी, इन्हें मैं कैसे असुंदर कह दूं? 
          
           किसी मनचले ने तृण को जलाकर राख बनाई है। राह में पड़ी उस राख को मैं कैसे असुंदर कह दूँ! फिर तो आग भी असुंदर होगी जिसकी कोख से यह धरती जनमी होगी। और यदि धरती असुंदर है तो, हम न होते, ये गुम्फित तृण न होते, और ये पुष्प भी न होते, फिर तो जलप्रवाह की जलतरंगों पर ये परछाइयाँ भी किसी निर्दोष शिशु सी किल्लोल करती न दिखाई पड़ती.! तो फिर, जब धरती असुंदर नहीं तो ऐसी धरती से उपजा कुछ भी असुंदर नहीं!!
        
           वनमाली के होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान थिरक उठी। उसने फूलों की टोकरी से गुलाब के दो फूल उठाए; एक ताजा एक बासी। इनको मेरी अँजुरियों में रखकर बोला इसमें से कोई भी एक फूल मुझे वापस दे दो उसे इस पुष्पमाला में गूँथना है। उस पुष्पमाला को मैंने पलक भर निहारा। फिर अँजुरी में लिए उन गुलाब के दो फूलों में से एक ताजा गुलाब उसे वापस कर दिया था क्योंकि बेचारा बासी गुलाब ताजे फूलों वाली उस पुष्पमाला में गूँथे जाने के लिए अयोग्य था। वनमाली का चेहरा खिल उठा जैसे वह कह रहा हो, यह अयोग्यता ही तो असुंदर होना है! विजय भाव में उसके चेहरे की मुस्कान अब और गहरी हो उठी थी। मुझे वह अब जय-पराजय के भाव में उलझा दिखाई पड़ा।         
        
          सहसा मुझे उस पल की याद आई! मेरी कर्मस्थली किसी दूर शहर में है। उस समय पत्नी मेरे साथ थीं।  एक दिन प्रफुल्लित पंखुड़ियों वाला एक गुलाब उन्हें भा गया इसे उन्होंने मेरे कमरे की दीवाल पर टांग दिया था। जब तक वे मेरे साथ थीं मेरा ध्यान उस गुलाब की ओर नहीं गया। उनके जाने के क‌ई दिन बाद मेरी दृष्टि दीवाल पर टंगे उस गुलाब पर पड़ी! उसकी पंखुड़ियां सूखकर अब काली पड़ चुकी थी। उस सूखे गुलाब को मैंने वहां से निकालकर फेंकना चाहा। लेकिन उस तक मेरा हाथ पहुँचता मुझे वहां ओस से भींगी पंखुड़ियों वाला ताजा गुलाब लगाते पत्नी दिखाई पड़ी! उस पल की स्मृति मेरे हृदय पटल पर जीवंत हो उठी थी। दीवाल पर टंगे इस सूखे गुलाब के फूल को मैं कैसे असुंदर कह दूं? 
         
            मैंने वनमाली से कहा, वनमाली! तू व्यापारी है पुष्पमाला में गूँथे जाने के लिए तुझे बासी फूल देकर तेरा अहित नहीं करना चाहा, बस इतनी सी बात थी। और सुनो! सच में इस धरती पर कुछ भी असुंदर नहीं, इस बासी गुलाब की छोड़ो, सूखे पंखुड़ियों वाला वह गुलाब भी नही, क्योंकि सूखकर भी ये पंखुड़ियां किसी के लिए मधुर स्मृतियों का खजाना बन जाती हैं!
       
              वनमाली सकपका उठा! लेकिन उसकी भौहें तनी थी। जैसे मुझसे चिढ़कर बोला हो, अच्छा! तो तुम्हारे लिए कुछ भी असुंदर नहीं? तुम गरीबी, बेरोजगारी, लाचारी से नहीं गुजरे होगे इसलिए ये भी तुम्हारे लिए असुंदर नहीं और यदि बहुत हुआ तो तुम इन्हें कर्मों का फल बता दोगे, क्यों है न?  और तो और, ईर्ष्या-द्वेष और घृणा जैसे भाव की अनुभूति तो तुम्हें होगी ही ऐसे ही रोग-शोक को भी देखा होगा। तो क्या तुम्हारी दृष्टि में ये भी असुंदर नहीं? 
         
            मैंने सोचा। यह वनमाली व्यापार में संलिप्त है उसकी भेदबुद्धि मेरी बात नहीं समझ पाएगी। इसलिए उससे केवल इतना ही कह पाया मैं, ये बातें धरती से नहीं, धरती पर उपजी हैं। इसे समझो वनमाली! धरती व्यापार नहीं करती यह सौदाई नहीं है! इसलिए जो कुछ धरती ने उपजाया है उसे मैं कैसे असुंदर कह दूँ?
        
           वनमाली के मर्मस्थल को बेध गई थी मेरी यह बात। मुझे उलाहना देकर वह रोषपूर्ण आवाज में बोला, तुम्हारे मन में यह व्यापार से इतनी घृणा क्यों है? तुम किसी का भला क्यों नहीं चाहते? 
        
           पहली बार मैं मुस्कुराया था। मैंने कहा, वनमाली! यदि मैं तेरे व्यापार से घृणा करता तो पुष्पमाला में गूंथे जाने के लिए तुझे वह ताजा गुलाब न दिया होता! इसे समझो, यहां कोई असुंदर नहीं, यह सोचना ही तो दूसरों का भला चाहना है वनमाली।
      
           लेकिन जय और पराजय की द्वंद्वासक्ति में उलझी वनमाली की मन:स्थिति दुस्साध्य प्रतीत हुई। मेरी कोई बात समझने के लिए वह तैयार नहीं था। बोल पड़ा। अच्छा! धरती व्यापार नहीं करती, लेकिन यह विप्लव और विध्वंस क्या है? इसके उत्तर में मुझे किसी कवि या साहित्यकार की क्रांतिकारी कविता नहीं सुननी, कि इनपर सौन्दर्य का उपमान मढ़ तुम कोई बादल राग गाकर इसे सुंदर बता दो! मैं तुम्हारे ऐसे किसी राग के झाँसे में आने वाला नहीं, मुझे मेरे प्रश्न के अर्थ में ही उत्तर चाहिए! तुम्हें यह भी बताना होगा कि क्या प्रलय भी तुम्हारे लिए असुंदर नहीं?
        
            मैं वनमाली के प्रति दयार्द्र हो उठा! वह इस जलप्रवाह की जलतरंगों को नहीं देख रहा। नहीं तो उसे मेरी बात समझ में आती कि इस धरती पर कुछ भी असुंदर नहीं। वह इस भ्रम में है कि जो सुंदर नहीं वह असुंदर है। इस भ्रम पर ही उसका सारा कारोबार संचालित है। मैंने मुस्कुराकर उससे कहा, ठीक है वनमाली! तुम्हारी बातों का उत्तर मैं तब दे पाउंगा जब चारों ओर घोर अँधियारा छाया हो, ऐसी रात्रि प्रहर में तुम मेरे पास आना! मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करुंगा। 
            
        इस समय मुझे निरुत्तर देख वनमाली का मुखमंडल चमक उठा! मैंने देखा, उसके विभाजित मन की खाईं और भी गहरी होकर चौड़ी हो चुकी थी। जैसे इस क्षण को वह जी लेना चाहता हो और बिना कुछ कहे चला गया था। मैं उससे निराश नहीं था। उसे जाते हुए देख मैं यही सोच रहा था कि उसकी यह क्षणजीविता उसे जीवन के रहस्य को नहीं समझने दे रही! फिर भी मैं आशान्वित था कि अपने प्रश्नों का उत्तर पाने वह अवश्य आएगा।
         
         धीरे-धीरे अंधेरे की कालिमा धरती पर छा रही थी। आकाश में तारों ने भी टिमटिमाना शुरू कर दिया था। मुझे वनमाली के आने की प्रतीक्षा थी। पल-प्रतिपल बीत रहा था, काली निशा और भी काली हुई जा रही थी। इस तारांगन में आकाशगंगा की धूमिल रेखा तारागणों का मशाल लेकर निकल पड़ी थी‌। लेकिन वनमाली अभी तक नहीं आया था। यदि वह आता तो इस घनेरी रात में ऊपर आकाश की काली चादर में विखरे इन सितारों को दिखाकर मैं उसे बताता कि देख वनमाली देख! इसे देख! तुम जिस विप्लव, विध्वंस और प्रलय की बात कर रहे हो न, समय की अनंत काली चादर में जड़े इन सितारों की यह पल-प्रतिपल की कहानी है! यह गति मात्र है। जरा ध्यान से देखो इस गति को! यह उस जलप्रवाह के सदृश्य है जिसकी जलतरंगों में हमारी यह धरती भी झिलमिला रही है! अपने अन्तर्मन की गहराई से इसे देखो और बताओ मुझे इस झिलमिल में क्या असुंदर है? 
        
          लेकिन वनमाली नहीं आया। उसकी प्रतीक्षा करते-करते न जाने कब मैं नींद की गोद में चला गया था। 
      
          अचानक एक व्यक्ति मुझे दिखाई दिया। लोगों को धमकाते हुए वह मेरी ओर आ रहा था! उससे लोग भयभीत दिखाई पड़ रहे थे। वह मेरे पास आया। उसके मनोभाव में आक्रामकता थी। उसने किसी हथियार सी चीज को पूरी ताकत से मेरी ओर फेंका जैसे मुझे मारना हो। मैं सहम गया। लेकिन वह वस्तु बगल से होकर मेरे पीछे की ओर चली गई। मैंने पीछे मुड़कर देखा। वहाँ फूलों वाली क्यारी के बगल में एक गिलहरी पीठ के बल गिरी थी। उसके चारों पैर ऊपर आसमान की ओर उठे हुए कांप रहे थे, उसका पूरा शरीर कांप रहा था। यह गिलहरी क्यारी में खिले फूलों पर सरसराते हुए दौड़ लगा रही थी। उस आदमी ने इस गिलहरी को ही लक्ष्यित कर वह वस्तु फेंका था। मैंने देखा गिलहरी को मारने वाला और कोई नहीं वनमाली है! क्रोध से मैं चिल्ला उठा! वनमाली तूने यह क्या किया? इस गिलहरी को तूने क्यों मारा?वनमाली!वनमाली..बोलो वनमाली क्यों मारा इस मासूम गिलहरी को? 
          
       मैं अपनी पूरी शक्ति से चिल्ला रहा था! 
       
        मेरी नींद खुल गई! किसी स्वप्न के बीच से होकर मैं आया था। संयत हुआ तो खिड़की की ओर देखा। खिड़की खुली हुई थी। सूरज वृक्ष की शाखाओं के बीच तक आ ग‌ए थे। पत्तियों से छनकर आती इनकी झिलमिल अरुणिम किरणें बाहर फैल चुके उजाले का संदेश दे रहीं थीं। कानों में पक्षियों की चहचहाहट भी किसी सुमधुर संगीत की तरह गूँज उठी। एक अव्यक्त  सी आनन्दानुभूति के साथ मैंने उस दीवाल की ओर देखा, जिस पर गुलाब का वह फूल टंगा है! दीवाल पर टंगे उस सूखे गुलाब को मैं एकटक निहारने लगा।
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बुधवार, 25 मार्च 2026

अम्मा : स्मृति की अनंत परिधि


         मेरी गाड़ी घर के सामने आकर रुक गई थी, पर दरवाज़े पर अम्मा दिखाई नहीं पड़ीं। पहले ऐसा कभी नहीं होता था। मेरी गाड़ी की आवाज़ सुनते ही वे दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जातीं, जैसे मेरी राह देख रही हों। आज दरवाज़ा वैसा ही था, पर अम्मा नहीं थीं।

     मैं जानता था..अब गाड़ी की आवाज़ सुनकर अम्मा कभी दरवाज़े पर नहीं आएँगी।

     भारी मन से मैं गाड़ी से उतरा और दरवाज़े की ओर बढ़ा, पर कुछ कदम चलकर ही ठिठक गया। भीतर कहीं एक हूक-सी उठी। पहले होता तो सीधे जाकर दरवाज़े पर खड़ी अम्मा के पैर छूता और सामने पड़े तख़्त पर जा बैठता। पीछे-पीछे अम्मा भी अपनी प्लास्टिक की कुर्सी खींचकर तख़्त के पास ले आतीं। उसी कुर्सी पर बैठी वे मेरा हाल-चाल पूछती रहतीं।

       आज तखत भी वहीं था, कुर्सी भी वहीं रखी थी..पर न जाने क्यों उन्हें देखते ही एक अजीब-सा उजाड़ मन में उतर आया। मैंने ध्यान से देखा…तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी।

     यही वह तखत था, जिस पर अम्मा तह किए हुए कपड़े रखती थीं। उनकी छोटी-सी डोलची भी यहीं रहती थी। रोज़मर्रा की कई चीज़ें वे इसी तख़्त पर सहेजकर रख देतीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें ढूँढना न पड़े।

        मैं भी जब नहाने जाता तो अम्मा से ही कह देता, ‘अम्मा, नहाने जा रहा हूँ।’ और वे वहीं से बता देतीं, ‘तौलिया तख़्त पर रखा है, कंघी और तेल की शीशी डोलची में है…शीशा भी उसी में मिल जाएगा।’

      लेकिन आज उस तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी..सिवा एक गहरी उदासी से भरे खालीपन के।

    मैंने दरवाज़े से नज़रें फेर लीं। ठिठके हुए मेरे कदम अनायास ही पापा के कमरे की ओर मुड़ गए। 

       मेरी पहली तैनाती एक सुदूर जिले में हुई थी। पत्नी और बच्चे भी मेरे साथ जा रहे थे। उस दिन घर के इसी दरवाज़े पर अम्मा खड़ी थीं। वे चुपचाप हमें जाते हुए देख रही थीं। उनके चेहरे पर कोई शब्द नहीं था, लेकिन आँखों में एक ऐसी नमी थी जो बहुत कुछ कह रही थी। जैसे मन का सारा स्नेह उस क्षण पलकों तक आकर ठहर गया हो।

       अम्मा हमेशा चाहती थीं कि घर का कोई भी सदस्य उनसे दूर न जाए। परिवार को एक साथ बाँधे रखना जैसे उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प था। शायद इसी जिद में कभी उन्होंने पापा का तबादला बम्बई से इलाहाबाद कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। पापा केन्द्र सरकार की नौकरी में थे, पर अम्मा के लिए नौकरी की चमक-दमक से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि परिवार बिखरे नहीं। वे चाहती थीं कि सब उनकी आँखों के सामने रहें..एक ही आँगन, एक ही छत के नीचे।

      लेकिन उस दिन शायद परिवार के साथ रहने का सुख उनसे दूर जा रहा था।

       बच्चे रिक्शे पर बैठे थे। रिक्शा धीरे-धीरे घर से कच्चे रास्ते से गाँव से बाहर निकलने लगा। पापा उस रिक्शे के साथ-साथ चल पड़े। वे पक्की सड़क के मोड़ तक आए, फिर उससे आगे सड़क पर चलने लगे थे। वे बिना कुछ कहे चलते रहे..जैसे लौटने का मन ही न हो। अंततः जब वे वापस होने को हुए, तो उनकी चाल में एक अनकही थकान उतर आई थी।

       उसी क्षण मेरी आँखें भी भर आई थीं, पर मैंने उन्हें छिपा लिया। उस समय पहली बार लगा, जैसे मैं किसी नौकरी पर नहीं, अपने ही घर से विदा ले रहा हूँ।

        बच्चों का घर से चले जाना अम्मा को भीतर तक दुःखी कर गया था। वही दुःख धीरे-धीरे उनकी चुप रहने वाली सी नाराज़गी में बदलने लगा। इसके बाद वे मुझसे भी कुछ खिंची-खिंची सी रहने लगीं। अम्मा बहुत भावुक थीं, पर उतनी ही स्वाभिमानी भी। अपने मन की पीड़ा वे किसी से कहती नहीं थीं; उसे भीतर ही भीतर जज़्ब कर लेती थीं।

         और मैं, उनके इतने निकट होकर भी, उनके मन की उन हलचलों को समझने की फुर्सत नहीं निकाल पाया।

       अब जब उस दिन को याद करता हूँ, तो लगता है..दरवाज़े पर खड़ी अम्मा की नम आँखें केवल विदा की नहीं थीं; वे एक ऐसे खालीपन की शुरुआत थीं, जिसे समझने में मुझे बहुत हो गई।

          शायद उस दिन घर से केवल मैं ही नहीं गया था, अम्मा के जीवन का एक हिस्सा भी चुपचाप मेरे साथ चला गया था।

          मैं अपनी नौकरी की व्यस्तताओं में इस कदर उलझता चला गया था कि समय जैसे अनजाने ही हाथ से फिसलता जा रहा था, और इधर अम्मा धीरे-धीरे उम्र की ढलान की ओर बढ़ रही थीं। मेरे मोबाइल में ‘अम्मा’ तो दर्ज था, पर विडंबना यह थी कि उस नाम पर उँगली बहुत कम जाती थी। अक्सर मैं पापा के ही मोबाइल पर फोन कर देता। मन में यह सहज-सा विचार आ जाता कि अम्मा भी तो वहीं पास ही होंगी; यदि इच्छा होगी तो पापा से फोन लेकर मुझसे बात कर लेंगी। पर ऐसा शायद ही कभी हुआ।

     वैसे भी, जब कभी फोन पर अम्मा से बात होती, तो वह दो-तीन वाक्यों से आगे बढ़ ही नहीं पाती। वे पूछतीं—‘सब ठीक है?’

        मैं कहता, ‘हाँ, सब ठीक है।’

        फिर वे दुबारा पूछ लेतीं, ‘खूब ठीक है न?’

      और मैं उतने ही संक्षिप्त स्वर में कह देता, ‘हाँ, खूब ठीक है।’

      बस, इस ‘खूब’ के बाद जैसे शब्दों की डोर टूट जाती और बातचीत वहीं समाप्त हो जाती।

      पर एक दिन उनके सब्र का बाँध जैसे चुपचाप टूट गया। बड़ी करुण आवाज़ में वे बोली थीं, ‘तुम्हारे मुँह से “अम्मा” सुनने को तरस जाती हूँ।’

     उनके स्वर में जो पीड़ा थी, वह आज भी मेरे भीतर कहीं गूंजती है। पर उस समय मैं था कि उनकी इस बात को भी हँसकर टाल गया। कभी-कभी तो वे मुझे आधे उलाहने, आधे स्नेह में ‘निर्मोही’ भी कह देतीं।

      अम्मा चाहती थीं कि मैं उनसे हुलसकर बातें करूँ, जैसे बेटा अपनी माँ से करता है। पर न जाने क्यों, मेरे हिस्से में मौन ही अधिक था। और अम्मा कभी-कभी हल्की-सी शिकायत के साथ पूछ बैठतीं, ‘तुम इतना चुप क्यों रहते हो?’     

         मैं अकसर सोच में पड़ जाता कि आख़िर मेरी मानसिक बनावट कैसी है? और क्यों अम्मा मेरे बारे में इस तरह की धारणाएँ बना लेती हैं? इन प्रश्नों के साथ मैं अपनी स्मृतियों की तहों में उतरने लगता।  

      मेरे बालमन पर अंकित सबसे पहली स्मृति कुछ धुँधली-सी, पर गहरी है। मैं घुटनों के बल सरकता हुआ घर की ऊँची डेहरी लाँघने की कोशिश कर रहा हूँ। डेहरी मेरे छोटे कद के लिए बहुत ऊँची है। घर के दूसरे सदस्य वहीं मौजूद हैं, पर जैसे मेरी ओर उनका ध्यान ही नहीं है। कोई मुझे गोद में उठाकर पार नहीं करा रहा, कोई हाथ बढ़ाकर सहारा नहीं देता। उस क्षण मेरे भीतर पहली बार उपेक्षित होने की एक अनजानी अनुभूति जन्म लेती है।

       इस स्मृति का ज़िक्र बाद में मैंने अम्मा से किया, तो उन्होंने मुझे समझाने के अंदाज में बताया था कि उस समय मेरी उम्र मुश्किल से एक वर्ष रही होगी। तब वे बीटीसी की ट्रेनिंग के लिए इलाहाबाद गई हुई थीं और कभी-कभार मुझे भी अपने साथ वहाँ ले जाती थीं। मेरी स्मृतियों में कर्नलगंज का वह कच्चा दोमंज़िला मकान आज भी धुँधली-सी तस्वीर की तरह बसा हुआ है; वही मकान, जहाँ अम्मा अपनी बीटीसी की ट्रेनिंग कर रही थीं।

       एक बार अम्मा क‌ई महीनों की ट्रेनिंग के बाद घर लौटी थीं। इतने लंबे समय बाद उनका लौटना मेरे बालमन को खल गया था। भीतर कहीं रूठा हुआ गुस्सा जमा था। मैं एक डंडा उठाकर उनके पास पहुँचा और उसे उनके सिर पर चला दिया। पर अम्मा ने न तो डाँटा, न ही क्रोध किया, उन्होंने मुझे तुरंत अपनी गोद में खींच लिया। उस क्षण उनके स्नेह ने मेरे बाल-क्रोध को जैसे पिघला दिया।

       अम्मा यह जानतीं थीं कि मैं बचपन से ही उनसे रूठता आया हूँ..कभी-कभी रूठकर मैं अम्मा से बोलना बंद कर देता तब अम्मा भी मुझसे न बोलतीं‌। मैं सोचता रहता कि अम्मा मुझे मनाए तब मैं बोलूँ। लेकिन अम्मा मुझे सुनाते हुए कहतीं कि देखो यह अपने अम्मा से भी नहीं बोलता, इससे मेरे बालमन को ठेस लगता और अचानक मैं ‘अम्मा’ बोल देता। 

         कभी-कभी इन प्रसंगों को यादकर मैं अम्मा से इसकी चर्चा छेड़ देता। तब अम्मा कहतीं, हाँ बाबा बहुत छोटे थे जब आपको छोड़कर मैं बीटीसी की ट्रेनिंग करने गई थीं। इसके बाद वे मेरा बचपन याद कर भावुक हो उठतीं। इन दिनों अम्मा को मेरा बचपन कुछ ज़्यादा ही याद आने लगा था। अक्सर मुझसे बात करते-करते वे एक घटना का ज़िक्र छेड़ देतीं कि… “बाबा, आप साल भर के हो रहे थे जब पहली बार आप खड़े होकर चले थे। आँगन में तुलसी के चौरा के पास खड़े होकर आपका यह चलना देख मैंने खुशी से चिल्लाकर माई (मेरी नानी) को पुकारा था कि माई देख बाबा चलने लगे..!!”  यह बात पूरी होते-होते अम्मा की आँखें छलछला उठती। इधर दो-एक वर्षों से मैं यह भी देख रहा था अम्मा मेरे बचपन की बातें यादकर बेचैन हो उठतीं थीं जैसे उन्हें कोई बात कचोटती हो! जब भी मैं घर आता अम्मा मुझसे पूँछती, बाबा नजदीक ट्रांसफर नहीं होगा! जब मैं कहता, नहीं, इधर नहीं होगा, तो उनकी यह बेचैनी और भी बढ़ जाती। लेकिन अम्मा की यह बेचैनी मैं नहीं समझ सका। 

         जब अम्मा अध्यापिका बनीं तो एक दिन मुझे भी अपने साथ पहली बार स्कूल ले ग‌ईं। अम्मा ने मुझे अन्य बच्चों के बीच बैठा दिया। कक्षा में अन्य बच्चे अपनी-अपनी पुस्तकें पढ़ रहे थे अम्मा ने मुझे भी पढ़ने के लिए एक पुस्तक दिया और किसी शब्द को पढ़ने के लिए कहा‌। उस समय मैं पढ़ना सीख ही रहा था। किसी अनपहचानी सी शब्दाकृति पर मैं अटक गया। इसे पहचानने की कोशिश कर रहा था कि तभी अम्मा का एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गालों पर पड़ा। उस तमाचे की स्मृति आज भी मेरे गालों पर उभर आती है। एक शिक्षिका होने से इतर अम्मा के व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी था जैसे कि वे सत्य के प्रति आग्रहशील और अपने आदर्शों से समझौता न करने वाली महिला थीं। वे साहसी भी थीं। उस जमाने में साइकिल चलाकर अम्मा स्कूल में पढ़ाने जातीं। इसके लिए उन्हें चार से पाँच किलोमीटर तक साइकिल चलाना पड़ता। कभी-कभी अम्मा मुझे भी साइकिल के पीछे कैरियर पर बैठाकर अपने स्कूल लिवा जातीं। वे मुझे घर पर भी पढ़ने के लिए प्रेरित करतीं।        

     पापा, दादा जी की अकेली संतान थे और मैं तीन बहनों में अकेला भाई। इसलिए दादा जी मुझे ‘तुरुक का दातुन’ कहते, यानी सबके लिए प्रिय अकेली चीज। दादा जी का स्वभाव बड़ा अनुशासनप्रिय था। वे जीवन को नियम और संयम की डोरी से बाँधकर जीने में विश्वास रखते थे। बचपन में उन्होंने मुझे अनुशासन का ऐसा कठोर पाठ पढ़ाया कि उसकी छाप मेरे स्वभाव पर गहराई से अंकित हो गई—आज भी उनकी वह सीख जीवन की राह में मेरा मार्गदर्शन करती है। अम्मा भी तो ऐसी ही थीं। कहते हैं कभी-कभी बहुत दुलार से बच्चों के बिगड़ने का डर होता है, यह बात अम्मा को भी पता थी। अम्मा सदैव मुझे अपने आदर्शों पर कसती रहीं-गढ़ती रहीं। एक दिन रसोईं के पास बैठाकर अम्मा ने मुझे एक पाठ बहुत समझाकर पढ़ाया था: सच्चा बालक! किसी कहानी का यह मेरा पहला पाठ था। इस पाठ के बहाने अम्मा ने मुझे जैसे जीवन का पाठ पढ़ाया था‌। इस तरह अनजाने में ही सही अम्मा मुझे अपने तरीके से गढ़ रही थी।

      पर न जाने क्यों, अम्मा के साथ मेरे संबंधों में एक अदृश्य-सा भावनात्मक शीतयुद्ध भी चलता रहा। शायद ऐसा इसलिए होता है कि जो व्यक्ति हमारे जीवन में सबसे अधिक प्रिय और सबसे अधिक निकट होता है, उसके खो जाने का भय भी उतना ही गहरा होता है। संभव है, माँ-बेटे के बीच यह मौन खिंचाव उसी भीतरी आशंका की उपज रहा हो।

       लेकिन इसके पीछे एक और कारण भी रहा होगा। उम्र चाहे जितनी बीत गई हो, अम्मा के सामने जाते ही मैं अनायास वही छोटा-सा बच्चा बन जाता था…हाँ, वही बच्चा, जो शैशव से ही उनसे रूठता-मनाता चला आया था।

      शायद इसी भावनात्मक शीतयुद्ध का परिणाम था कि न तो अम्मा ने मुझ पर अपना अधिकार जताया, न ही मैं उन पर। और जब जीवन के किसी मोड़ पर मुझे लगा कि अब मुझे अम्मा पर अपना अधिकार जताना चाहिए तभी वे इस दुनिया से विदा हो गईं।

        अम्मा ने अपना पूरा जीवन अपनी ही शर्तों पर जिया… स्वाभिमान और संतोष के साथ। उन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं थी; जो मिला, उसे उन्होंने सहज भाव से स्वीकार किया और उसी में प्रसन्न रहना सीखा। शायद वे मुझसे यही चाहती थीं कि मैं उनके पास बैठूँ, उनसे खुलकर, हुलस-हुलसकर बातें करूँ। पर न जाने क्यों, यह छोटी-सी खुशी भी मैं उन्हें नहीं दे पाया।

        मैं मन ही मन सोचता था, नौकरी से निवृत्त होने के बाद फिर एक बच्चे की तरह अम्मा के पास रहूँगा। उनके साथ समय बिताऊँगा, उनसे जी भरकर बातें करूँगा। बरसों से मन में जो कुछ दबा है, उसे उनके सामने उँडेल दूँगा। और जब मेरी बातों से अम्मा के चेहरे पर वह तृप्त मुस्कान लौट आएगी, तब शायद पहली बार मैं उन पर अपना वह सहज अधिकार भी जता सकूँगा, जो एक बेटे को अपनी माँ पर होना चाहिए।

       लेकिन जीवन हमेशा हमारी प्रतीक्षा नहीं करता। मन की वह इच्छा मन में ही रह गई। जब तक मैं उस अधूरे स्नेह को शब्द दे पाता, अम्मा चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गईं…और मेरे हिस्से में रह गईं बस उनकी स्मृतियाँ, और एक ऐसी रिक्तता, जिसे अब कोई भर नहीं सकता।

         अम्मा के भावनात्मक संसार में यदि कोई सबसे अधिक निकट था, तो शायद वह मैं ही था। यह बात मुझे बचपन में उनके साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों से धीरे-धीरे समझ में आई। पर अम्मा का स्वभाव ऐसा था कि वे इस स्नेह को कभी खुलकर दिखने नहीं देती थीं। शायद उन्हें डर रहता कि कहीं ऐसा न लगे कि मैं ही उनका सबसे प्रिय हूँ और बाकी लोग अपने को उपेक्षित समझ बैठें। इसलिए कई बार सबके सामने वे मेरी उपेक्षा भी कर देतीं।

      लेकिन जब मैं घर आता और घर में बस हम दोनों ही होते, तब अम्मा का वह दबा हुआ स्नेह जैसे अपने आप बाहर आ जाता। वे मेरे आसपास ही मँडराती रहतीं…कभी मेरे बचपन की कोई भूली-बिसरी घटना सुनाने लगतीं, कभी तेल की छोटी-सी शीशी उठा लातीं और बड़े स्नेह से मेरे सिर पर मालिश करने बैठ जातीं।

      एक बार उन्हें लगा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। उन्होंने पूछा, ‘डॉक्टर को दिखाया कि नहीं?’ जब मैंने सहज ही ‘नहीं’ कह दिया, तो वे हल्की-सी चिंता में डूबकर बोलीं थीं कि ‘जब अपने को ही नहीं दिखा रहे हो, तो बीमार पड़ने पर अम्मा को डॉक्टर को क्या दिखाओगे?’

     अम्मा की वह साधारण-सी बात आज भीतर कहीं गहरी टीस की तरह चुभ जाती है।

       पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से अम्मा की स्मरण-शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी थी। कभी उन्हें समय का ठीक-ठीक बोध नहीं रहता, कभी स्थान का, तो कभी अभी-अभी घटित कोई छोटी-सी घटना भी उनकी स्मृति से फिसल जाती। उस समय यह सब उम्र के स्वाभाविक ढलान जैसा ही लगा।

       जब मैं गाँव गया, तब भी इन संकेतों को मैंने संकेत की तरह नहीं देखा। अम्मा की लगातार बनी रहने वाली खाँसी को भी साधारण समझकर टाल गया। कई महीनों से उनसे ठीक से कुछ खाया भी नहीं जा रहा था…मैंने इसे भी कोई गंभीर बात नहीं माना। कस्बे के डॉक्टर ने भी सहज स्वर में कह दिया था, “कोई बड़ी बीमारी नहीं है।” 

        शायद उसी एक वाक्य ने मेरी लापरवाही को जैसे एक तर्क दे दिया।

       आज सोचता हूँ…कभी-कभी मनुष्य अपने आश्वस्त रहने की सुविधा के लिए भी सच से आँख चुरा लेता है।

      अम्मा भीतर से बहुत मजबूत थीं। वे अपनी पीड़ा को सहजता के आवरण में छिपाकर जीने की आदी थीं। उनके चेहरे को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन था कि भीतर कोई बीमारी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है।

        और सच तो यह भी है कि अम्मा ने स्वयं भी कभी नहीं कहा, “मैं बीमार हूँ।”

        वे हमेशा यही कहतीं,

        “मैं ठीक हूँ।”

       शायद उन्हें लगता था कि उनकी बीमारी की बात सुनकर मैं व्यर्थ ही व्याकुल हो जाऊँगा।

       एक दिन पहले ही मैंने पापा के फोन पर उनसे बात की थी।

        “हलो अम्मा… अम्मा…!”

        उधर से हल्की-सी आवाज आई…

        “बाबा…”

         “हाँ अम्मा…”

          अम्मा बोलीं,

        “बाबा… घबड़ा जिन। काहे एतना घबड़ात हउ तू सभे? बीमारी-उमारी त होए जाथ है… हम ठीक होइ जाब…एतना परेशान जिन होत जा…”

         इतना कहते-कहते उन्हें खाँसी आ गई।

       मैंने उस खाँसी को भी एक सामान्य खाँसी की तरह ही लिया।

        किसे पता था कि यह हमारे बीच अंतिम संवाद होगा।

       अगले ही दिन अस्पताल में मैंने अम्मा को एक-एक साँस के लिए संघर्ष करते देखा।

        डॉक्टर ने धीमे और लगभग निर्विकार स्वर में कहा…

      “अब बहुत देर हो चुकी है। इन्फेक्शन पूरे फेफड़ों में फैल चुका है। लगभग पूरा फेफड़ा नष्ट हो चुका है। अभी जो ये साँस ले रही हैं, उसमें भी इन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ रही है.. कुछ देर में ये थक जाएंगी फिर इनकी सांसें थम जाएगी..अगर समय रहते इलाज मिल जाता तो शायद स्थिति अलग होती…”

       डॉक्टर की बात सुनते ही जैसे भीतर कहीं गहराई में टूट गया।

       उस क्षण पहली बार अपनी लापरवाही का पूरा आकार दिखाई दिया।

      अम्मा के जीवन और स्वास्थ्य के प्रति मैंने स्वयं घोर उपेक्षा बरती थी। और फिर एक दिन अम्मा नहीं रहीं।

        अम्मा और उनके बेटे के बीच की इस कहानी का वहीं अंत हो गया….या इस कहानी की वहीं से एक दूसरी शुरुआत हुई। 

           उस दिन अम्मा की चिता जल रही थी। चिता से कुछ दूर बैठा मैं अग्नि की लपटों को देर तक देखता रहा। धीरे-धीरे लकड़ियाँ अंगारों में बदल रही थीं, और मेरे भीतर स्मृतियों का एक लंबा सिलसिला खुलता जा रहा था।

तभी पहली बार यह विचार मन में आया…

        समय वास्तव में कितना अमूल्य होता है। हम अक्सर उसे पहचानने में देर कर देते हैं। और जब तक उसकी महत्ता समझ में आती है, तब तक बहुत कुछ हमारे हाथों से छूट चुका होता है।

       उस दिन लगा..अम्मा की चेतना इस दृश्य जगत से उठकर कहीं उस अनंत ब्रह्मांड में विलीन हो गई है। लेकिन धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगा कि अम्मा कहीं गई नहीं हैं। वे अब भी हमारे भीतर हैं…हमारी स्मृतियों में, हमारे व्यवहार में, हमारे निर्णयों में।

       अम्मा चुपचाप हमें गढ़ती रही थीं…मुझे ही नहीं, पूरे परिवार को, अपने आसपास के संसार को भी। उन्होंने अपने एक साधारण-से बेटे को भी ऐसा आत्मविश्वास दिया कि वह अपने दम पर अपना संसार रच सके।

तेरहवीं के दिन किसी ने सुझाव दिया—

       “अम्मा की एक तस्वीर रख दी जाए, ताकि आने वाले लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें।”

        पापा ने मना कर दिया। मुझे भी वही ठीक लगा। क्योंकि उस समय लगा…अम्मा अब किसी एक तस्वीर में समा जाने वाली उपस्थिति नहीं रहीं। वे स्मृति बनकर हमारे भीतर फैल गई हैं….

      एक ऐसी अदृश्य चेतना की तरह, जो शायद अब कभी हमसे दूर नहीं होगी।


शनिवार, 4 जनवरी 2025

नमस्ते

सेप्टिक टैंक का ढक्कन 

                                               सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर कंक्रीट का ढक्कन सीमेंट से जाम था। और वह पिछले दस मिनट से इसे हटाने का प्रयास कर रहा था। ढक्कन के कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे छेनी रख वह इसपर हथौड़े मारता। लेकिन ढक्कन को सिमेंट से ऐसा पक्का किया गया था कि यह हिलस नहीं था। रमेसर ढक्कन खोलने के इस प्रयास को देख रहा था। 'इधर इस किनारे छेनी लगाओ’ कहकर रमेसर ने उसे दरार दिखाया। उसने उस जगह छेनी रखकर जोरदार हथौड़ा मारा। छेनी छिटकर दूर घासों के बीच जा गिरी। इसके साथ ही उसके कमीज की जेब से दो सिक्के भी गिर पड़े। वह इन्हें ढूंढ़ने लगा। दूर खड़े ‘वे’ यह देख रहे थे। अब छेनी छोटी चीज नहीं कि खोजने में समय लगे सोचकर उन्होंने छेनीवाले से पूँछा, छेनी नहीं मिल रही क्या! लेकिन उसकी जगह रमेसर बोल पड़ा, “छेनी तो मिल गई है, अब यह अपना सिक्का खोज रहा है।” वहाँ रमेसर के दो अन्य साथी भी खड़े थे लेकिन जैसे उन्हें छेनीवाले की मदद करने से परहेज था। इन्हें देखते हुए ‘वे’ ने कहा, “बेचारे को खोजना ही चाहिए, मेहनत से जो कमाया है।

       सिक्का मिलते ही छेनीवाला फिर से अपने काम में जुट गया। इसे देख रमेसर ने इशारा करके ‘वे’ से मुस्कुराकर कहा, बड़का दिमाग है इसके पास। रमेसर की इस मुस्कुराहट में ‘वे’ को “बड़का दिमाग” का अर्थ छिपा मिला जैसे कि यह ‘बड़का दिमाग’ रमेसर के लिए मुफीद है!

         ‘वे’ को देख रमेसर कुछ याद करने लगा। उसकी स्मृतियों में चालीस वर्ष पहले की बात उभरी। तब यहां कच्चे घर थे और वह भी तब बमुश्किल पाँच-छह साल का रहा होगा। जब बाबा यहाँ इन घरों से त्यौहारी लेने आते थे। कभी-कभी वह भी उनके साथ होता। अब तो सभी घर पक्के हो चुके हैं। वह भी तो आज किसी से कम नहीं उसका भी तो स्वयं का सेप्टिक टैंक सफाई का व्यवसाय है! अब वह सबके साथ खड़े होकर बराबरी की सौदेबाजी करता है। उसे अपने ट्रैक्ट टैंकर को देखकर गर्व हुआ। आखिर गर्व क्यों न हो उसे! इस सेप्टिक टैंक सक्शन मशीन का मालिक भी तो वही है! जबकि एक समय वह भी था जब नगरपालिका में संविदा पर स्वीपर बनने गया था। बीस-बाइस साल पहले की बात है। इस नौकरी के लिए काफी लोग इंटरव्यू देने आए थे उस दिन! जिसमें से दस लोग ही प्रैक्टिकल के लिए तैयार हुए थे। इनमें से एक वह भी था‌। प्रैक्टिकल लेने के लिए नाले का वह स्थान चुना गया जहाँ पूरे कस्बे का सीवर बहकर आता था। यहाँ नाले का पानी गटर जैसा काला और दुर्गंधयुक्त हो चला था। नौकरी पक्की करने के लिए नाले में इसी जगह उतरना था‌। यह रमेसर ही था कि बिना देर किए झम्म से नाले में कूद पड़ा था। बाकी सात ने तो एकदम से मना ही कर दिया था‌। अन्य दो लोग जैसे-तैसे नाले में उतरे भी तो तुरंत बाहर भी निकल आए थे। लेकिन एक वह था कि प्रैक्टिकल ले रहे अफसर को दिखाने के लिए इसमें बेहिचक डुबकी भी लगाया था।।१।।

 उत्कंठा       

        नाले में वह बेझिझक कूदा था। किस बात की झिझक होती उसे! जब जन्म ही ऐसी जाति में हुआ हो जिसमें रोजी-रोटी हाथ से मैला ढोने पर ही चलती हो! यह तो उसका घोषित जन्म सिद्ध अधिकार था!! उस नाले में कूदकर उसने अपना यह अधिकार ही सिद्ध किया था। अफसरानों ने भी उसे नगरपालिका में सफाई कर्मी की नौकरी देकर उसके इस अधिकार पर ही मुहर लगाया था। भर्ती वाली सूची में कुल जमा तीन नाम थे जिसमें पहला नाम उसी का था। जो नाले में नहीं कूदे उन्हें नौकरी नहीं दी गई थी। इनके बारे में कहा गया कि ये सब ऊँची जात वाले हैं इन्हें सफाई कर्मी की नौकरी देने का क्या फ़ायदा, ये केवल तनख्वाह लेंगे सफाई का काम नहीं करेंगे। 

         छेनी पर हथौड़ा पड़ता तो ढक्कन हिलने लगता। जैसे यह ढक्कन अब आसानी से खुल जाएगा। रमेसर ने ट्रैक्टर के टूल बॉक्स से रम्मा निकाला और इससे ढक्कन हिलसाने लगा। लेकिन मेनहोल के एक किनारे पर ढक्कन अभी भी सीमेंट से जाम था। जिसे छेनी से ही काटा जा सकता था। रमेसर ने छेनीवाले को उस किनारे पर छेनी लगाने के लिए कहा। 

         ‘वे’ को छेनीवाले की वेशभूषा पागलों जैसी दिखी। उसके कपड़े जैसे क‌ई महीनों से न धुले हों। मटमैले रंग की कमीज मोटे कपड़े की थी जिसके ऊपर वह धूसरित रंग की फटी सी सदरी पहने है। पैंट भी मटमैले रंग का और ढीला-ढाला है। पैरों में चप्पल भी नहीं है। उसके सिर पर बिखरे घने लंबे बाल जिसे शायद ही कभी कंघी से संवारा गया हो! उसे शक्ल से भी पागल बताने के लिए काफी है। । वह किसी से बोल-चाल भी नहीं रहा केवल अपने काम में लगा है इससे ‘वे’ को उसकी मन:स्थिति पर भी संदेह होने लगा है। तो क्या रमेसर ने इसी वजह से इसे ‘बड़का दिमाग’ वाला कहा!  ‘वे’ ने फिर यही सोचा।

        रमेसर को नगरपालिका में स्वीपर की नौकरी तो मिल गई थी लेकिन यह नौकरी पाकर भी वह खुश नहीं था। अम्मा कहती ब‌ऊ तुम्हारे दद्दा और पप्पा तो करिया अक्षर हैं लेकिन तुम हाथ से मैला ढोने का काम मत करना, खूब पढ़ना। अम्मा उसे जबर्दस्ती स्कूल भी भेजती। यह स्कूल ब्लाक कैंम्पस में ही था। इस ब्लॉक कैंपस में दद्दा को रहने के लिए मिली आठ बाई दस की पक्की कोठरी जर्जर हो चली थी जिसकी छत भी बारिश के दिनों में टपकती! इसके आगे की खाली जगह घेरकर दद्दा ने उसमें एक झोपड़ी बना लिया था जिसमें अपनी गैया के साथ वे रहते थे। कुलमिलाकर इसे ही वह अपना घर मानता। लेकिन त्योहारों के दिन जब ब्लॉक परिसर में सन्नाटा छा जाता तो वह बेचैन हो उठता‌। सोचता, सबकी तरह दद्दा और पप्पा भी त्यौहारों पर अपने घर क्यों नहीं चलते। अम्मा से भी पूँछा था। उसे याद है तब अम्मा ने उससे यही कहा था, ‘छुट्टी में कहाँ जाएं, हमारा कहीं कोई दूसरा घर तो है नहीं यही घर है।’ अम्मा की यह बात उसके लिए कुछ अजीब थी। तभी से घर को लेकर उसकी यह उत्कंठा उसके बालमन के कोने में एक गाँठ बनकर दुबक ग‌ई थी। 

       रमेसर कक्षा पाँच में आया तब उसके उत्कंठा की वह गाँठ खुलनी शुरू हुई! उसने दद्दा से यह पूँछा था कि दद्दा पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे। ।।२।।

दद्दा से पूँछना     

          रमेसर बच्चा था। उसके मन की यह जिज्ञासा कि जब ब्लाक कार्यालय नहीं था तो हम कहाँ रहते थे, मामूली बात नहीं थी। उस बच्चे के दिमाग में यह बात आई कैसे? इसकी भी एक कहानी है। रमेसर अकसर इस घटना को याद करता है।

       कक्षा में वह सबसे पीछे अलग-थलग बैठा था। उस दिन पंडी जी पढ़ाते-पढ़ाते बताने लगे थे कि आजादी के बाद पहले विकास खंड और फिर बाद में यह स्कूल बना था। इसे सुनकर उसे अम्मा की यह बात कि छुट्टी में कहाँ जाएं, हमारा कहीं और कोई घर नहीं यही घर है, उसके एक प्रश्न बन गया। तो क्या आजादी से पहले ब्लॉक में उसकी यह कोठरी भी नहीं थी! फिर उसका घर कहाँ था! उत्कंठा में अचानक वह उठ खड़ा हुआ था और डरते-डरते पंडी जी (वह भी सब बच्चों की तरह मास्टर साहब को पंडी जी ही कहता था) से पूँछ लिया था, “पंडी जी, मेरा घर भी तब यहाँ नहीं था?” उसकी बात पर कक्षा में बच्चे खिलखिला पड़े। पंडी जी भी उसे घूरने लगे थे। वह सहम गया जैसे कुछ गलत पूँछ लिया हो। वैसे भी जिस जाति में वह जन्मा है उसमें जीवन के प्रति आशा और आकांक्षा पनपने की कोई गुंजाइश नहीं है!! ऐसी परिस्थिति में उसे प्रश्न पूँछने वाला संस्कार कहाँ से मिलता? प्रश्न भी केवल और केवल बदलाव की आकांक्षा वाली मन:स्थिति में ही सूझता है। लेकिन जब पंडी जी ने उससे कहा, नहीं, तुम्हारा घर भी यहाँ नहीं था तो साथियों का खिलखिलाहट भूल वह इस उधेड़बुन में फंस गया कि आजादी से पहले उसका घर कहां था। मन ही मन उसने निश्चय किया कि यह बात वह दद्दा से पूँछेगा। छुट्टी होते ही वह सीधे घर की ओर भागा।

            इधर ‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा’ सुनकर ‘वे’ ने रमेसर की ओर देखा। वह रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है। लेकिन ‘वे’ को यह देखकर कुछ अजीब लगा कि रमेसर के दो अन्य साथी भी वहाँ थे जो इस ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे और वह भी इनसे ढक्कन नहीं हटवा रहा था जैसे ये इस ढक्कन को छूना नहीं चाहते हों! छेनीवाले ने यंत्रवत वही किया जो रमेसर ने कहा। उसने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। अब पूरा मेनहोल खुल गया था। रमेसर ने इसमें झांककर अंदाजे से बोला कि इसकी गहराई लगभग आठ फीट। ‘वे’ इसकी गहराई जानते थे इसलिए ‘हाँ’ कह दिया था।
         ‘घर’ को लेकर इसकी जिज्ञासा कैसे शांत हुई होगी! इसका उत्तर इसके बचपन की कहानी में है। सेप्टिक टैंक में झाँक रहे रमेसर को देखकर ‘वे’ ने सोचा।
        घर पहुँचते ही बस्ता फेंककर वह दद्दा को ढूंढने लगा‌। उन्हें झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा से पूँछा। पता चला बिलाक कालोनी ग‌ए हैं आते होंगे। वह घर के बाहर खड़ा उनका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद दद्दा उसे आते दिखाई पड़े तो वह उनकी ओर लपका लेकिन उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक पड़ा। दद्दा यह काम दोपहर से पहले कर लेते हैं! सोचकर वह मुड़ गया और धीमें कदमों से हैंडपंप पर चला गया। वह जानता था कि दद्दा सीधे यहीं आएंगे। दद्दा हैंडपंप पर ही गए। नल के नीचे उन्होंने झा‌ड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन रखा वह हैंडपंप चलाने लगा। लेकिन उत्कंठा में वह बेचैन था। हैंडपंप चलाते-चलाते उसने पूँछा, दद्दा, पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे!
          दस साल के बच्चे रमेसर से दद्दा को ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी। बाल्टी धोते-धोते उनके हाथ रुक ग‌ए। विस्फारित आँखों से उसे देखने लगे। उसने भी हैंडपंप चलाना रोक दिया और अपना प्रश्न दोहराया। दद्दा, पंडी जी कह रहे थे कि बिलाक आजादी के बाद बना तो बिलाक बनने से पहले हमारा घर कहाँ था।
            “पाकिस्तान..हाँ हमारा घर पाकिस्तान में था।” बिना लाग-लपेट के दद्दा ने बोल दिया। यह सुनते ही रमेसर ने फिर हैंडपंप चलाना शुरू कर दिया और दद्दा ने बाल्टी धोना। ।।३।। 

कीचड़       

        ‘इसमें तो पानी ही है, कीचड़ नहीं है’ मेनहोल में झाँकने के बाद रमेसर ने ‘वे’ से कहा। तो वे ने सोचा, “आजकल के फ्लस-सिस्टम में मल सेप्टिक टैंक की तली पर बैठता जाता है, शायद इसे ही रमेसर ने अपने व्यवसाय की भाषा में ‘कीचड़’ कहा।” रमेसर ने अपने बचपन में बाल्टी में भरे इस ‘कीचड़’ का रंग कुछ और देखा है! 

           दद्दा प्रतिदिन सुबह नौ बजे ब्लॉक की रिहयशी कालोनी की ओर जाते थे। उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और टिन होता। एक दिन वह भी उनके साथ चलने की जिद कर बैठा। उसकी उम्र तब चार या पांच वर्ष रही होगी। दद्दा अपना काम उसे नहीं दिखाना चाहते थे इसलिए उसे पुचकारा कि साथ न चले। लेकिन वह जिद करके रोने लगा था तो दद्दा उसे अपने साथ ले गए थे। वे सबसे पहले एक बड़े क्वार्टर के पीछे ग‌ए थे। उस क्वार्टर के अहाते की नींव उँची थी। जिसकी बाहरी दीवार पर लोहे का एक ढकना लटका था। दद्दा ने इसे ऊपर उठाया। वहां आले की तरह एक चौकोर गड्ढा था। उसमें मानव-मल का ढेर था। तब शौचालय सूखे होते। उस अहाते में ऐसा ही एक शौचालय था जिसका मल इस गड्डे में गिरता था। दद्दा ने मुड़े टिन से इस ढेर को बाल्टी में भर लिया और झाड़ू से वहाँ सफाई किया। उस दिन उसने देखा, क्या छोटे क्या बड़े, सभी क्वार्टरों के पीछे दद्दा ग‌ए और शौचालय की सफाई किए। उनकी बाल्टी पीले मैले से भर गई थी। दद्दा ने इस बाल्टी को दूर झाड़ियों में जाकर खाली कर दिया था। 

       इस काम के दरमियान न दद्दा कुछ बोले और न ही उसने कुछ कहा था। दद्दा जैसे कुछ अजीब काम कर रहे थे। वह भी चहकना छोड़ उन्हें चुपचाप देखता रहा। लेकिन बाल्टी खाली करके लौटते समय दद्दा ने एक पल के लिए उसे घूरा था। उनका वह घूरना उसे आज भी याद है। शायद दद्दा उससे नाराज थे। उसकी बांह पकड़े वे सीधे हैंडपंप पर आए थे। हैंडपंप पर बाल्टी, टिन और झाड़ू धोने के बाद दद्दा स्वयं नहाए और उसे भी नहलाए। इस घटना के बाद उसने फिर कभी दद्दा के साथ ब्लॉक कॉलोनी का रुख नहीं किया।

        इधर ‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा’ सुनकर ‘वे’ ने रमेसर की ओर देखा। वह रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है। लेकिन ‘वे’ को यह देखकर कुछ अजीब लगा कि रमेसर के दो अन्य साथी भी वहाँ थे जो इस ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे और वह भी इनसे ढक्कन नहीं हटवा रहा था जैसे ये इस ढक्कन को छूना नहीं चाहते हों! छेनीवाले ने यंत्रवत वही किया जो रमेसर ने कहा। उसने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। अब पूरा मेनहोल खुल गया था। रमेसर ने इसमें झांककर अंदाजे से बोला कि इसकी गहराई लगभग आठ फीट। ‘वे’ इसकी गहराई जानते थे इसलिए ‘हाँ’ कह दिया था।

         ‘घर’ को लेकर इसकी जिज्ञासा कैसे शांत हुई होगी! इसका उत्तर इसके बचपन की कहानी में है। सेप्टिक टैंक में झाँक रहे रमेसर को देखकर ‘वे’ ने सोचा।

        घर पहुँचते ही बस्ता फेंककर वह दद्दा को ढूंढने लगा‌। उन्हें झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा से पूँछा। पता चला बिलाक कालोनी ग‌ए हैं आते होंगे। वह घर के बाहर खड़ा उनका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद दद्दा उसे आते दिखाई पड़े तो वह उनकी ओर लपका लेकिन उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक पड़ा। दद्दा यह काम दोपहर से पहले कर लेते हैं! सोचकर वह मुड़ गया और धीमें कदमों से हैंडपंप पर चला गया। वह जानता था कि दद्दा सीधे यहीं आएंगे। दद्दा हैंडपंप पर ही गए। नल के नीचे उन्होंने झा‌ड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन रखा वह हैंडपंप चलाने लगा। लेकिन उत्कंठा में वह बेचैन था। हैंडपंप चलाते-चलाते उसने पूँछा, दद्दा, पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे!

          दस साल के बच्चे रमेसर से दद्दा को ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी। बाल्टी धोते-धोते उनके हाथ रुक ग‌ए। विस्फारित आँखों से उसे देखने लगे। उसने भी हैंडपंप चलाना रोक दिया और अपना प्रश्न दोहराया। दद्दा, पंडी जी कह रहे थे कि बिलाक आजादी के बाद बना तो बिलाक बनने से पहले हमारा घर कहाँ था।

            “पाकिस्तान..हाँ हमारा घर पाकिस्तान में था।” बिना लाग-लपेट के दद्दा ने बोल दिया। यह सुनते ही रमेसर ने फिर हैंडपंप चलाना शुरू कर दिया और दद्दा ने बाल्टी धोना। 

        कहानी के बीच-बीच में लेखक अपने तरीके से उपस्थित हुआ है। लेकिन यहाँ एक छोटा सा हस्तक्षेप डिस्क्लेमर के रूप में है! हालांकि इसे कहानी के प्रारंभ में ही आना चाहिए था। दरअसल यह कहानी अभी तक अपने चार मुख्य पात्रों के कारण आगे बढ़ी है, जिनमें नंबर एक पर ‘रमेसर’ दूसरे पर ‘छेनीवाला’ और तीसरे स्थान पर ‘वे’ की स्थिति हैं। हाँ, चौथा पात्र स्वयं इस कहानी का ‘लेखक’ हो सकता है, जो गाहे-बगाहे कहानी में ‘कहन’ की दशा और दिशा में परिवर्तन हेतु उपस्थित हो जाता है। बाकी ‘दद्दा’ जैसे पात्र इस कहानी में मार्गदर्शक-मंडल के सदस्य के रूप में हैं। खैर, इस कहानी में आते-जाते पात्रों की स्थिति का निर्धारण पाठकगण स्वयं कर सकते हैं। दरअसल लेखक को भी यह नहीं पता कि इस कहानी में, अंत तक कितने पात्र प्रकट होंगे और वे किस क्रम पर प्रतिष्ठापित होंगे। वैसे इस कहानी के चौथे पात्र ‘लेखक’ का एक डिस्क्लेमर यह भी है कि स्वयं लेखक भी रमेसर, छेनीवाला और ‘वे’ के किसी न किसी अंश से निर्मित है! या फिर लेखक इस कहानी के पात्रों को अपना अंश देता चलता है। यह ‘अंश’ ही इस कहानी में यथार्थता की सीमा है। लेखक में पात्रों का, और पात्रों में लेखक का कितना ‘अंश’ है इससे पाठकों को अनजान ही रहना चाहिए। 

         अब ‘लेखक’ इस बात पर जिज्ञासु है कि आखिर रमेसर के ‘घर’ का पाकिस्तान कनेक्शन क्या है? जिसे वह हैंडपंप पर दद्दा से सुलझाना चाह रहा था। इसके लिए उस हैंडपंप पर चला जाए ।।४।। 

रमेसर के परदादा     

       बाल्टी और मुड़ा टिन धोने के बाद दद्दा ने झाड़ू धोया। इसके बाद वे नहाए भी। वह हैंडपंप चलाता रहा। दद्दा से उसे कुछ जानना भी तो था! फ़ुरसत पाकर दद्दा ने फिर उसे पूरी कहानी कह सुनाया था। परदादा यानि कि उनके पिता पाकिस्तान से आए थे। दद्दा उन्हें बप्पा कहते थे। उनका नाम बद्दन और घर सिंध में कराची के पास था‌। वहाँ भी पेशा सफाई वाले का ही था। देश के बँटवारे के लिए हिंदू-मुसलमान का खेल उनके समझ में कभी नहीं आया। परदादा को तो इस बँटवारे से पहले यह भी नहीं पता था कि वे हिंदू हैं या कि मुसलमान! केवल कुछ परंपराओं जैसे कि उनके रहन-सहन के कारण मुसलमानों ने उनकी बस्ती वालों को हिंदू घोषित कर पाकिस्तान छोड़ने के लिए कह दिया था। लेकिन फिर उठे इस प्रश्न पर कि इनके जाने के बाद मैला और गटर की सफाई कौन करेगा पाकिस्तान की सरकार ने सफाई-कार्य को आवश्यक सेवा घोषित कर उनकी बस्ती वालों को भारत जाने से रोक दिया था।

          बद्दन भारत क्यों आए? दद्दा से उसने पूँछा था। यह सोचकर कि जो काम दद्दा यहाँ करते हैं वही काम उसके परदादा पाकिस्तान में करते थे, तो फिर उन्हें भारत आने की आवश्यकता क्यों पड़ी, इसलिए उसने यह प्रश्न किया था‌। 

        देश के बँटवारे का कसक उन्हें आजीवन रहा। परदादा बद्दन बाद में सन पचास में भारत आए। दद्दा तब तेरह या चौदह साल के थे। बद्दन सफाई वाले काम को बुरा नहीं कहते थे। लेकिन उन्हें अछूत मानकर जब लोग उनसे दूरी बनाते तो उन्हें बहुत पीड़ा होती। इसी कारण उनकी बस्ती के आसपास रहने वाले ऊँची जात वालों के बँटवारे के समय भारत जाने से बप्पा मन ही मन खूब खुश भी हुए थे। उन्हें इस बात की खुशी थी कि अब उनके सामने ऊँची-नीची जाति का झंझट नहीं रहेगा। लेकिन यह दुख उन्हें जरूर था कि जातीय ऊँच-नीच की पीड़ा से बचने के लिए पिछले पचास बरस से उनकी बस्ती में लोग ईसाई बन रहे थे, आजादी के बाद तो यह सिलसिला और भी तेज हो गया था। 

          परदादा का भेदभाव से मुक्ति पाने की खुशफहमी का स्वप्न जैसे टूट गया था। जब उनकी जाति का काम बताकर मुसलमानों ने मानव-मल उठाने और सीवर की सफाई करने से इन्कार कर दिया। अब मुसलमानों से भी उन्हें वही जातिगत भेदभाव वाला अपमान झेलना था। वहां धीरे-धीरे परंपराओं और रीति-रिवाजों के मानने पर पाबंदी का जैसा वातावरण बन रहा था। इससे वे घुटन महसूस करते! एक बार उनकी ईसाई बनने की इच्छा हुई थी‌। लेकिन इससे भी भेदभाव से मुक्ति नहीं मिलेगी, सोचकर मुसलमान बनने पर तैयार हो ग‌ए थे। लेकिन किसी धार्मिक लबादे से बँधकर वे नहीं रहना चाहते थे। शीघ्र ही उन्हें समझ में आ गया कि धर्म परिवर्तन से भी ऊँच-नीच की समस्या से मुक्ति नहीं मिलने वाली। अब उन्हें उन्नीस सौ सैंतालीस वाली आजादी जैसे काटने दौड़ती। वे कहते स्वर्ग में रहकर गुलामी करने से अच्छा है नरक की स्वतंत्रता! और एक दिन अपने परिवार को लेकर किसी तरह सीमा पारकर वे भारत आ ग‌ए थे। 

            बद्दन परिवार के साथ चार बरस तक दिल्ली के शिविर में रहे। यह वही समय था जब यह ब्लॉक बना था। फिर सरकार ने बप्पा को इसी ब्लॉक में सफाई की नौकरी पर भेजा था। यहाँ रहने के लिए उन्हें यह कोठरी मिली थी। तब से यही हमारा घर है।

         दद्दा सब बता चुके थे। लेकिन ‘पाकिस्तान’ सुनकर उसे कुछ याद आया! दद्दा से पूँछा, 

        “बाल्टी वहाँ क्यों खाली किए दद्दा, वहाँ तो सब लड़िकन खेलने जाते हैं…जानते हो! हमारी गेंद चली गई थी वहाँ, विज्जू उसे लाने गया तो उसका पैर उस ‘पाकिस्तान’ में छपाक से पड़ गया, इसे दूर दूसरी ओर फेंका करिए‌।” 

           रमेसर बच्चा है, दद्दा ने रुककर जैसे कुछ पल सोचा और फिर बोले थे, 

           “देख बचवा इस जगह कोई नाला-वाला तो है नहीं कि बाल्टी उसमें गिराएं, ले-देकर यहाँ ये खेत और झाड़ियों के बगल वाला वह मैदान‌ ही है। खेत में गिराने पर गाँव से खेत के मालिक आकर गरियाते हैं..उस दिन की भरी बाल्टी उस खेत के कोने में उलटा था। उसी दिन जुताई कराने आए खेत के मालिक ने बहुत गाली दिया कि उनके खेत में मैला क्यों गिराया! क्या करूं बचवा यही समस्या है यहाँ।”

         यहाँ ‘पाकिस्तान’ में छपाक से पैर पड़ने की बात पर लेखक को स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता है‌। दरअसल इस ‘पाकिस्तान’ में किसी देश या समुदाय के प्रति घृणा का भाव नहीं बल्कि इसमें धर्म के आधार पर विभाजन की विचारधारा या इस आधार पर देश के बँटवारे का दर्द और इसके विरोध का भाव है, जो ‘पाकिस्तान’ में रुढ़ हो गया।

         उस दिन दद्दा की बात पर वह गंभीर हो गया था! उसके मन में एक चिनगारी उठी थी। फिर उसने दद्दा की ओर देखा था। 

         उसे आज भी याद है, बूढ़े होते उनके शरीर पर पीढ़ियों से होते आए अपमान के दंश दिखाई पड़े थे। इस पीड़ा का वे अनुभव करते भी हैं या नहीं, उसे पता नहीं! लेकिन उनके चेहरे पर भावशून्य यह ‘स्थितिप्रज्ञता’ इसी पीड़ा की उसे अभिव्यक्ति जान पड़ती! तभी तो एक बार दद्दा से उसने कहा भी था, “दद्दा मुझे यह देखकर घिन आती है, मत करो यह काम।” लेकिन यह कहकर कि “इससे क्या घिनाना! यह तो हमारा कर है यही रोजी है” उन्होंने उसे चुप करा दिया था।

         दद्दा के इस कहे में कि “यह तो हमारा कर है” रमेसर को एक व्यंग्य जैसा लगा। जैसे वे कहना चाह रहे थे कि अपमान-तिरस्कार की पीड़ा से मुक्ति इसे सहने की आदत में है। गुस्से से भर रमेसर ने इस ‘आदत’ पर अपनी मुट्ठी भींच लिया। उसने देखा छेनीवाला टैंकर का पाइप खींचकर सेप्टिक टैंक के मेनहोल में डाल रहा है और एक साथी वैक्यूम पंखा चलाने के लिए ट्रैक्टर स्टार्ट करने लगा है। ।।५।। 

 सीवर का गाढ़ापन !        

          रमेसर ने छेनीवाले से सक्शन पाइप अपने हाथ में लिया। खींचकर इसे सेप्टिक टैंक की गहराई में उतारा। उधर वैक्यूम फैन के चलते ही इस पाइप से पानी सुड़कना शुरू हो गया। इस पाइप को लिए रमेसर मेनहोल पर ऐसे झुका है जैसे व्यवसायगत ईमानदारी में उससे कोई चूक न होने पाए और टैंक की सफाई अच्छे से हो। अब तक सांझ भी स्याह हो चुकी थी, लेकिन बल्ब की रोशनी में उसका चेहरा साफ दिखाई पड़ रहा था। इस चेहरे पर शांति और गंभीरता की खामोशी देखकर  ‘वे’ ने सोचा कि चार लोगों की टीम होते हुए भी सीवर का वैक्यूम-पाइप रमेसर स्वयं अपने हाथ में लिए है जबकि वह किसी को भी यह पाइप दे सकता था! आखिर अपनी टीम का स्वयं लीडर भी है वह। लेकिन नहीं जैसे किसी इबादत में हो किसी को यह पाइप नहीं देगा वह!! इधर सेप्टिक टैंक में धीरे-धीरे पानी कम होने से ‘सीवर’ का गाढ़ापन भी झलकने लगा था।

        लेकिन रमेसर की आँखों में ‘वे’ झाँक नहीं पाए। जबकि सेप्टिक टैंक में देख रहीं उसकी ये आँखें सजल थीं! कैसे इस पाइप को छोड़ दे वह! नहीं छोड़ेगा इसे। चाहे सेप्टिक टैंक हो या गटर, सीवर को खाली करते समय वह ऐसे ही पाइप अपने हाथ में पकड़ लेता है, इसे किसी को तब तक नहीं छूने देता जब-तक ‘कीचड़’ भी पूरी तरह से न निकल जाए! सेप्टिक टैंक में ‘सीवर’ की ओर झांंकती उसकी इन सजल आँखों को किसी ने नहीं देखा, ‘वे’ ने भी नहीं। अपने पप्पा के लिए उसका यह काम इबादत ही तो है, यह काम ही पप्पा के प्रति उसकी सच्ची श्रद्धांजलि है! उसने पाइप पर अपने हाथों का पकड़ और भी मजबूत किया जिससे कि यह पाइप उससे कोई और न लेने पाए!!! ।।६।।

       “यह भिखमंग‌ई ठीक नहीं बाबा, इससे अच्छा तो फिर यह मैला ढोने का काम है..कम से कम इसमें कुछ करके तो कमाना है” दद्दा से यही कहा था पप्पा ने उस दिन। दद्दा की इच्छा थी कि पप्पा शहर में स्वीपर की नौकरी कर लें लेकिन पप्पा इसके लिए तैयार नहीं हो रहे थे जबकि दद्दा इसे अपनी जाति का पुश्तैनी काम बताते। इससे पप्पा चिढ़ उठते। जाति का पुश्तैनी काम को लेकर उनमें एक अजीब सी छटपटाहट थी। इस छटपटाहट से मुक्ति पाने वह शहर में दिहाड़ी खोजने चले जाते। लेकिन वहाँ भी न टिकते। वापस आकर घर में पड़े रहते। एक बार उन्हें अम्मा से कहते सुना था, “क्या कींचड़ में लिथड़ी इस जाति को उतारकर हम फेंक नहीं सकते?” उस दिन पप्पा की बात वह समझ नहीं पाया था। लेकिन वर्षों बाद उसे यह समझ में आया था कि जाति भविष्य निर्धारित करती है! पप्पा निरक्षर थे, सोचते और केवल घुटते।  

      त्योहार के दिन दद्दा पास के गाँव में जाते और त्योहारी लेकर लौटते। उस दिन उनकी गठरी में ढेर सारी पूरियां कचौरियां और अन्य खाने की चीजें होती। ऐसे ही एक दिन कोई बड़ा त्योहार था। ब्लाक कालोनी में सन्नाटा था। वह भी उनके साथ गाँव में गया था। लौटकर दद्दा घर आए तो पप्पा गुस्से में उनसे बोले थे कि, यह अच्छी बात नहीं कि घरों के सामने हाथ पसार खड़े हो जाओ। यह भिखमंग‌ई ठीक नहीं बाबा! इससे अच्छा तो फिर यह मैला ढोने का काम है कम से कम इसमें कुछ करके तो कमाना है! 

         उसने देखा था, दद्दा गांव के कुछ ‘बड़े’ लोगों के घर बारी-बारी ग‌ए थे। वह इनके दरवाजे पर जाकर खड़े हो जाते। कुछ देर प्रतीक्षा के बाद घर में से कोई निकलता और उनकी चादर में ऊपर से त्योहारी डाल देता। धीरे-धीरे यह चादर गठरी में बदल गई थी। उसने यह भी गौर किया था कि इस दौरान लोग दद्दा को छूने से परहेज करते। उन्हें दूर बैठाते थे। फिर भी दद्दा को देखते ही गाँव के लोग उनका हालचाल पूँछते। 

        पप्पा की बात पर दद्दा ने कोई ऐतराज नहीं जताया। लेकिन बोले थे, “देख दिन्ने, यह भिखमंगाई नहीं, इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना भी होता है। यदि किसी त्योहार पर नहीं गया तो बाद में गांव के ये लोग मुझसे पूँछते हैं कि त्योहार के दिन मैं क्यों नहीं दिखाई दिया। दिन्ने! एक बात और! गाँव में आज तक किसी ने मेरा अपमान नहीं किया है। इन लोगों के यहाँ शादी विवाह में सूप देने की परिपाटी मैं ही निभाता हूँ उस समय ये मुझे नेग-चार देना नहीं भूलते…दिन्ने!” 

           “उसके दद्दा और पप्पा दो छोर पर खड़े थे। एक की जीवन के प्रति संवेदनशीलता परंपरा और संस्कार के खांचे की बंदी है तो दूसरा इस खांचे की जकड़न से बाहर आने के लिए छटपटा रहा है। यह पीढ़ी के अंतर का लक्षण नहीं बल्कि अस्तित्व के अनुभूति की स्वत:स्फूर्त चेतना है, जो किसी परंपरा या संस्कार की मोहताज नहीं।  इन दोनों के द्वंद्व के बीच रमेसर खड़ा है।”  यह ऑब्जर्वेशन लेखक का है।

         सेप्टिक टैंक में पानी चार फीट नीचे जा चुका था। इसे दिखाकर रमेसर ने ‘वे’ से कहा, इसमें दो टैंकर सीवर था..एक हो गया है दूसरा चक्कर भी होगा?” उसने ‘वे’ को टैंकर में लगा पारदर्शी नली का वह संकेतक दिखाया जिसमें पानी ऊपर तक चढ़ा था। इसे देखकर ‘वे’ ने टैंकर फुल होने पर अपनी भी सहमति जता दिया। रमेसर ने ‘दूसरा चक्कर’ इस अंदाज में कहा था जैसे वह इसकी अनुमति लेना चाहता था। ‘वे’ ने भी कह दिया कि, पूरा सेप्टिक टैंक खाली होना चाहिए। ।।७।। 

वे’ की प्रेषित रिपोर्ट  

     रमेसर से इशारा पाकर छेनीवाले ने टैंकर का नोजल बंद किया और पाइप हटाया‌। स्वयं रमेसर ने भी सेप्टिक टैंक से पाइप बाहर निकाला। अब उसे टैंकर खाली करना था। पास में खेत थे। ज्यादा दूर न जाना पड़े इसलिए इन खेतों में ही टैंकर का सीवर गिराने की सोचा। लेकिन खेत मालिक नाराज होंगे, कहकर ‘वे’ ने इसे कहीं और गिराने का सुझाव दिया। लेकिन खेत के लिए यह खाद होता, बोलकर रमेसर इसे अँधेरे में कहीं और गिराने पर तैयार हो गया। वह भी ट्रैक्टर के साथ गया। गाँव से बाहर एक सूनसान जगह पर, जहां लोगों की आवाजाही लगभग न के बराबर थी, घुप अँधेरे में उसने वहीं टैंकर खाली करा दिया। 

           ‘वे’ का अंदाजा था कि टैंकर खाली होकर आधे घंटे में लौटेगा लेकिन पंद्रह मिनट में ही ट्रैक्टर लौट आया। एक बार फिर रमेसर के सभी साथी काम में जुट गए। एक ने पाइप टैंकर के नोजल में लगाया तो छेनीवाला इसके दूसरे छोर को सेप्टिक टैंक के मेनहोल में लटकाने लगा। इस बीच दूसरे साथी ने ट्रैक्टर स्टार्ट कर वैक्यूम फैन चालू कर दिया। रमेसर ने सक्शन पाइप अपने हाथ में ले इसे सेप्टिक टैंक की गहराई में उतार दिया। टैंकर द्वारा सीवर सुड़कना शुरू हो गया था। 

         ‘वे’ सेप्टिक टैंक के इस सफाई कार्य पर अपनी नज़र क्यों गड़ाए हैं? लेखक इस प्रश्न पर पाठकों को कुछ बताना चाहता है! दरअसल ‘वे’ एक सामाजिक संस्था से जुड़े हैं जो मैनुअल स्केवैंजिंग पर काम करती है। कुछ दिन पहले इन्होंने अपनी इस संस्था को एक रिपोर्ट में बताया था कि मैनुअल स्केवैंजरों की संख्या शून्य है अर्थात अब कोई हाथ से मैला नहीं ढोता। यही नहीं, हाल ही में एक गोष्ठी में शासन के नुमाइंदों से भी इन्होंने यही कहा था। लेकिन आज सेप्टिक टैंक का यह सफाई कार्य देख ‘वे’ थोड़ा कन्फ्यूज़ हैं कि वह रिपोर्ट सही है या नहीं! 

        फिर यह याद करके कि इन्स्ट्रूमेंट की सहायता से सीवर सफाई करने वाला मैनुअल स्कैवेंजर नहीं माना जाता। उनका संदेह दूर हो गया‌। मतलब रमेसर और उसके साथी मैनुअल स्केवैंजर नहीं है। क्योंकि ये लोग बाकायदे मशीन से सेप्टिक टैंक की सफाई कर रहे हैं। लेकिन उनकी दृष्टि में सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले ‘असाधारण’ लोग होते हैं। लेकिन उन्हें चिंता हुई कि कहीं यह ‘असाधरणता’ भी किसी ‘खांचे’ की शक्ल न अख्तियार कर ले! जाति और पेशे का!!

          ‘वे’ के इस चिंतातुर मन से बेखबर रमेसर ने मेनहोल में झाँकना चाहा। लेकिन उसके ठीक ऊपर जलते बल्ब की रोशनी मेनहोल से सेप्टिक टैंक के भीतर नहीं पहुँच रही थी। उसने मोबाइल फोन का टार्च ऑन कर इसमें देखा। टैंक में सीवर गाढ़ा दिखाई पड़ा। इसकी सकिंग मुश्किल है सोचकर, उसने ‘वे’ से एक बांस लाने के लिए कहा। ‘वे’ बांस लेने चले ग‌ए। उन्हें बारह से पंद्रह फीट की लंबाई का बांस चाहिए था जिससे रमेसर टैंक में सीवर को हड़होरा सके। यह बांस खोजने पर भी नहीं मिल रहा था जबकि पंद्रह-बीस वर्ष पहले घर के इधर-उधर पड़े ऐसे बांस आसानी से मिल जाते थे। इधर रमेसर पास के चबूतरे पर बैठकर उनके लौटने की प्रतीक्षा करने लगा‌ था। ऐसे गाढ़े सीवर में तो पप्पा बेहिचक उतर जाते थे! उसे पप्पा याद आए। ।।८।।

पप्पा और एरिक 

        उस दिन पप्पा नहीं उनका शरीर आया था घर। बीडीओ ऑफिस के ठीक पीछे ब्लॉक परिसर में वह क्वार्टर था। सबसे अलग-थलग अकेले में बनी उपेक्षित सी एक कमरे की यह कोठरी दद्दा को रहने के लिए मिली थी। दद्दा ने इसके सामने टटिया की बाउंड्री से घेर बना लिया था। तब कक्षा सात में था वह। यहाँ से उसका स्कूल दो किमी दूर था। उस दिन स्कूल से लौट रहा था। जैसे ही ऑफिस के पीछे पहुँचा उसे घेर के सामने कुछ लोग खड़े दिखाई दिए थे। सब मौन थे, सबके चेहरे पर एक अजीब खामोशी थी! लोग हों और फिर भी खामोशी हो! तो अनहोनी घटित होने की आशंका प्रबल हो उठती है! उसे घबराहट हुई। भागते हुए वह इस घेर में पहुँचा था। वहाँ पप्पा जमीन पर लेटे थे और अम्मा उनके सिरहाने बैठी थीं। पप्पा सुबह उसके स्कूल जाने के पहले ही काम पर निकल ग‌ए थे। वे अम्मा से कह भी रहे थे कि आज तबियत कुछ नासाज है। फिर भी काम पर चले ग‌ए थे। वह कुछ समझ पाता कि दद्दा ने उसे अँकवार में भर लिया था, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। अम्मा दहाड़ें मारकर रो पड़ीं थीं। 

        पप्पा के मन में क्या चलता था दद्दा अनजान रहते। पप्पा स्वीपर नहीं बनना चाहते थे। इसे जाति से जोड़ा जाता है, यह रंज था उन्हें। वे कहते मैं स्वीपर नहीं मजदूर बनना चाहता हूं क्योंकि मजदूर की कोई जाति नहीं होती। इसीलिए वे शहर में मजदूरी करने निकल जाते। लेकिन मजदूर भी नहीं बन पाए थे। मजदूर बनने की कोशिश में जाति और पुश्तैनी पेशा आड़े आ जाता। एक बार गुस्से में भर कर उन्होंने अम्मा से कहा था, मेरी जाति मेरे माथे पर कलंक है। यह बोझ लेकर मैं नहीं घूम सकता। आखिर में विवश होकर उन्होंने शहर जाना छोड़ दिया था। ऐसे ही साल दर साल गुजरे थे। दद्दा उन्हें निठल्ला कहने लगे। अचानक एक दिन इस निठल्ल‌ई से ऊबकर पप्पा स्वीपर बनने के लिए तैयार हो ग‌ए थे। क्या करते! जीवन की उस अँधेरी सुरंग से निकलने के लिए जब किरण नहीं मिली तो उसी सुरंग में रहना उन्होंने अपनी नियति मान लिया। वे शहर ग‌ए और नगरपालिका के एक सफाई ठेकेदार ने उन्हें अपनी टीम में रख लिया था।

          ‘वे’ को बांस लेकर लौटने में देर हो रहा है। वह अपने अतीत में चला गया। पप्पा की मौत के बाद उसका मन पढ़ने में न लगता। किसी तरह एक साल और पढ़ पाया था। कक्षा आठ के बाद तो स्कूल जाने से ही उसका मन उचट गया था। इसके क‌ई कारण थे। अम्मा दुखी दिखाई देती, घर में हमेशा मनहूसियत छाई रहती। दूसरी सबसे बड़ी बात यह भी थी कि स्कूल में भी उसे सबसे अलग-थलग रहना पड़ता, वह चाहकर भी अन्य छात्रों से घुल-मिल नहीं पाता था। उसे पप्पा की यह बात कि जाति माथे पर कलंक है, एकदम सही लगता। फिर भी कक्षा आठ तक पढ़े होने के कारण उसके अंदर पढ़ने की प्रवृत्ति आ गई थी। वह अकसर देश-दुनिया में उसके इस व्यवसाय पर क्या बातें हो रहीं है, इसपर खबर जरूर पढ़ता।

         अचानक उसे एरिक की याद आई इसके बारे में कभी अखबारों में पढ़ा था‌। एरिक पाकिस्तान के सिंध में परदादा की जन्मभूमि का निवासी था। एरिक के पूर्वज उसकी ही जाति के थे जो क‌ई पीढ़ियों पहले ईसाई बन ग‌ए थे‌। लेकिन धर्म बदल लेने बाद भी वहाँ वह भेदभाव का शिकार है। आज भी एरिक को गटर और सीवर में घुसना पड़ता है। जबकि अपने देश भारत में आज उसका सक्शन मशीन वाला सफाई व्यवसाय है। उसे याद है उस एरिक की तरह कभी पप्पा भी शहर से लौटने के बाद अम्मा से यही बताते कि “जब सीवर में घुसता हूँ तो तिलचट्टों से घिर जाता हूँ ये मेरे शरीर पर दौड़ने लगते हैं!” शायद स्वप्न में भी ये तिलचट्टे उन्हें अपने शरीर पर रेंगते दिखाई पड़ते इसीलिए कभी-कभी रात में सोते से अचानक उठकर वे अपना शरीर झाड़ने लगते!! यही नहीं उसने स्वयं देखा था कि शहर से लौटने के बाद पप्पा बार-बार अपना हाथ धोते, उनकी इस आदत से परेशान होकर एक बार अम्मा ने उन्हें कुछ कह दिया तो वे कहने लगे थे कि “क्या करूँ..मेरे हाथों में जैसे मैले की बदबू आती रहती है, इसीलिए बार-बार हाथ धोना पड़ता है!” ।।९।।

मौत का कुंआ     

      रमेसर के मोबाइल की रिंगटोन बजी। वह फोन पर बात करने में मशगूल हो गया। इसी समय ‘वे’ भी बाँस लेकर आए थे। उन्हें फोन पर रमेसर किसी को अगले दिन साँझ का समय देते सुनाई पड़ा। इससे ‘वे’ ने अनुमान लगाया कि साफ‌ई व्यवसाय में रमेसर को काम मिलने की कमी नहीं है। यह बातचीत खतम कर रमेसर ने छेनीवाले से समरसेबल चलाने के लिए कहा। उसने पंप चलाया और इसका पाइप मेनहोल पर रख दिया। पानी टैंक में गिरने लगा। ‘अब वैक्यूम सक्शन पाइप सीवर को अच्छे से सुड़क लेगा’, बोलकर रमेसर ने ‘वे’ से बाँस ले लिया। 

          उत्सुकतावश ‘वे’ ने भी मेनहोल में झांका। सेप्टिक टैंक की तली पर मल वाला गाढ़ा ‘कीचड़’ जमा था। वे सम‌झ ग‌ए कि रमेसर बाँस की मदद से इस कीचड़ को पानी में मिलाकर पतला करना चाहता है, जिससे सक्शन पाइप इसे आसानी से सुड़क पाए। लेकिन ‘वे’ ने यह सोचकर ‘यदि कोई टैंक में उतर कर यह काम कर दे तो इसकी साफ‌ई और अच्छे से हो जाएगी,’ रमेसर को देखने लगे। रमेसर हाथ में बाँस लिए अपने पप्पा को याद कर रहा था। पप्पा के जमाने में सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए आज के जैसा वैक्यूम सक्शन टैंकर वाली यह मशीन नहीं थी, जो उसके पास है। पप्पा सेप्टिक टैंक में उतर जाते थे। वे सेप्टिक टैंक से इस गाढ़े कीचड़ को बाल्टी में भर-भरकर बाहर निकालते थे। तब उनका पूरा शरीर सीवर के कीचड़ में लथपथ हो उठता! लेकिन उसे आश्चर्य होता कि जाति और इस पेशे को माथे पर कलंक कहने वाले पप्पा कैसे नि:संकोच सेप्टिक टैंक में डूबकर सफाई कर पाते थे!

           लेकिन सन तिरानबे या चौरानबे के आसपास की बात होगी। अचानक कुछ दिन से उनका शहर जाना बंद हो गया था। फिर एक दिन पप्पा को दद्दा से यह कहते सुना कि सरकार के डर से ठेकेदार काम पर नहीं बुलाता‌। उस दिन उन्होंने दद्दा से यह भी कहा था कि सरकार ने हाथ से मैला ढोने और आदमी के सीवर में घुसने पर रोक लगा दिया है। अब कोई दूसरा काम करेंगे। लेकिन दो-चार महीने बीते होंगे कि पप्पा फिर से सीवर सफाई के काम से शहर जाने लगे थे। 

      उसे याद है, उन दिनों पप्पा अकसर बीमार रहते। डाक्टर साहब ने उनकी बीमारी का कारण सीवर में घुसना बताकर उन्हें सेप्टिक टैंक में उतरने से मना किया था। लेकिन वे नहीं मानते थे। अम्मा के टोकने पर कहते, ‘बप्पा भी अब रिटायर हो गए हैं, काम पर जाना जरूरी है और इस काम के सिवा उनके लिए कोई दूसरा काम भी तो नहीं।’ उस दिन उनकी तबियत कुछ ज्यादा खराब थी। अम्मा ने उन्हें काम पर जाने से रोका था। दद्दा भी समझाए थे। लेकिन यह कहकर कि “आज एक बड़े सेप्टिक टैंक की सफाई होना है, न जाने से ठेकेदार नाराज होगा” वे सुबह-सुबह शहर चले ग‌ए थे। उस दिन वह सेप्टिक टैंक उनके लिए मौत का कुंआ बन गया था। सबसे पहले वही उतरे थे उसमें! 

         लोग बताते थे कि उस दिन सेप्टिक टैंक में उतरते ही पप्पा बेहोश हो ग‌ए थे। अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो घबड़ाहट में उनके एक साथी उन्हें देखने सेप्टिक टैंक में उतर ग‌ए थे। लेकिन अंदर जाते ही वे भी बेहोश हो ग‌ए थे। लोगों ने शोर मचाया तो भीड़ इकट्ठी हो गई थी। ठेकेदार तो वहाँ से भाग निकला था। जैसे-तैसे लोगों ने उन्हें सेप्टिक टैंक से बाहर निकाला था और अस्पताल पहुँचाया। लेकिन पप्पा और उनके वे साथी, दोनों नहीं बच पाए थे। कहते हैं कि उनकी मौत सेप्टिक टैंक में ही हो गई थी। बहुत दिनों तक दद्दा और अम्मा थाना से लेकर कचहरी तक अधिकारियों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन मुआवजा नहीं मिला। बाद में पता चला कि पप्पा की इस मौत के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं माना गया। 

       उस दिन वह घेर में पहुँचा तो वहाँ के दृश्य देखकर जैसे उसे काठ मार गया था! वह जड़वत अम्मा का रोना और दद्दा के आँसू देखता रहा। फिर अचानक उसका ध्यान पप्पा के पहने कपड़े पर चला गया था। सीवर के कीचड़ से लिथड़े वे कपड़े उनके मृत शरीर से चिपके पड़े थे! इसे देख उसकी आँखें डबडबा आई थीं!! फिर न जाने क्यों उसने अपनी बाँह से वे आँसू पोंछ डाले थे!! वह नहीं रोया। ।।१०।‌।

पुनर्वास 

       सक्शन पाइप के मुहाने के पास कपड़ेनुमा चीज देख रमेसर की तंन्द्रा टूटी! यह पाइप में न फंसे, इसे बाँस से दूर किया।  छेनीवाला यह देख रहा था। उसने रमेसर से बाँस ले लिया और इसमें फंसाकर इस कपड़े को सेप्टिक टैंक से बाहर निकाल दिया। और बाँस को सेप्टिक टैंक में इधर-उधर घुमाने लगा। जिससे गाढ़ा सीवर पानी में घुले और सक्शन पाइप इसे पूरी तरह खींच ले। सीवर अब पतला हो गया था। बीच-बीच में वह सक्शन पाइप को भी सेप्टिक टैंक की तली पर इधर-उधर रखने लगा जिससे पाइप अब टैंक में बचा सीवर आसानी से सुड़क ले।

       इस रमेसर की थोड़ी कहानी लेखक उसकी स्मृतियों में जाकर कहना चाहता है। सन ९३ में हाथ से मैला ढोने और सेप्टिक टैंक में घुसकर सफाई करने जैसे रोजगार पर सरकारी रोक तो थी लेकिन सन २०१३-१४ में इस रोक के साथ साथ सफाई कर्मियों के लिए पुनर्वास योजना भी लागू हुई। जाति और पेशा से मिले कर्म-संस्कार की बाड़बंदी में कैद दद्दा हाथ से मैला ढोने को अपनी नियति मान बैठे थे। वहीं पप्पा के मन में इस नियति के प्रति जबरदस्त आक्रोश था। गरिमाहीन इस बाड़बंदी से मुक्ति के लिए वे छटपटाते रह ग‌ए! दद्दा और पप्पा की पीड़ा का अहसास उसे बाद में हुआ। इससे उबरने के उपायों पर वह हमेशा ठंडे मन से विचार करने लगा था। उसे सेप्टिक टैंक सफाई के लिए न‌ई तकनीक भी दिखाई पड़ने लगी थी। इसी बीच सरकार की पुनर्वास योजना से उसके लिए एक न‌ए विकल्प का द्वार खुल गया। जैसे-तैसे करके उसने हाथ से मैला ढोने या सीवर साफ करने वालों के पुनर्वास की बन रही सूची में अपना भी नाम शामिल कराया। इस योजना में उसे चालीस हजार रुपए मिले थे‌। इसके बाद उसने सेप्टिक टैंक सफाई व्यवसाय के लिए कौशल प्रशिक्षण भी लिया। इस प्रशिक्षण लेने के भी उसे तीन हजार रुपए मिले। फिर बैंक से पाँच लाख का कर्ज लेकर उसने खुद का सफाई व्यवसाय शुरू किया। आज वह ट्रैक्टर के साथ इस वैक्यूम सक्शन टैंकर वाली मशीन का मालिक है।

          शुरुआत में सीवर टैंकर के ट्रैक्टर की ड्राइवरी के लिए कोई तैयार न होता। एक आदिवासी लड़का ड्राइवरी के लिए तैयार हुआ, लेकिन उसकी शर्त सक्शन पाइप को न छूने की थी! अन्य काम जैसे सक्शन पाइप फैलाना, इसे टैंक में ले जाना और धोकर पाइप को समेटना वह स्वयं करता। आरंभ में ज्यादा काम नहीं था, जो कमाई होती उसका ज्यादातर हिस्सा लोन चुकाने और ड्राइवर पर खर्च हो जाता। लेकिन शुष्क शौचालय के निर्माण पर पूर्ण रोक होने से सेप्टिक टैंक के साथ फ्लश वाले शौचालय बनने लगे थे। क्या नगर और क्या गाँव! शौचालय निर्माण में जैसे क्रांति आ गई थी क्योंकि सरकार ने भी खुले में शौच जाने के विरूद्ध जागरूकता अभियान छेड़ा हुआ था। धीरे-धीरे यह सफाई का काम बढ़ने लगा था। अब एक ऐसा आदमी चाहिए था जो सक्शन पाइप को टैंकर से जोड़े, फैलाए और समेटे। मुश्किल से एक लड़का ‘कींचड़’ न छूने और सामान्य से कुछ ज्यादा मजदूरी पर तैयार हुआ। लेकिन अभी भी सीवर टैंक से ‘कीचड़’ की सफाई उसे ही करना होता और ‘कीचड़’ से लथपथ सक्शन पाइप भी धोता। जबकि उसके अन्य दो साथी तमाशबीन बने रहते! बावजूद इसके कि वह अपनी इस सफाई टीम का मालिक भी था। इससे उसके स्वत्व-बोध को ठेस पहुँचता! अब उसमें श्रेष्ठता-बोध भी जाग रहा था। इस बदली मन:स्थिति में अकसर मिलते काम को भी वह ठुकरा देता। उसने एक तीसरे आदमी को तलाशना शुरू किया जो सीवर का ढक्कन खोलने से लेकर टैंक के अंदर के सीवर को साफ करने में उसका सहयोग करे तथा सीवर ‘छूने’ से भी उसे परहेज़ न हो! 

          रमेसर अपनी ही कहानी अपनी स्मृतियों में देख रहा है। वह वर्तमान में आया। छेनीवाले को तन्मय होकर सेप्टिक टैंक में इधर-उधर पाइप घुमाते देख उसने सोचा, यदि यह न मिला होता तो सेप्टिक टैंक सफाई वाला यह बिजनेस परवान न चढ़ पाता। फिर उसकी ओर देखते हुए रमेसर उसके ‘बड़के दिमाग’ पर मुस्कुरा उठा! ।।११।।

छेनीवाला आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है!

       पहली नजर में पागल ही समझ लिया था इसे! चेहरे और हाव-भाव से यह कुछ ऐसा ही था। इसके पहले जिन दो लोगों को अपनी टीम में शामिल किया उनकी जाति पूँछकर किया था। लेकिन इसकी जाति पूँछने की नौबत ही नहीं आ‌ई। गाँव की बस्ती से दूर सेवार में एक कमरे का इसका घर देखकर पहले यही पूँछा लिया था कि बस्ती से दूर यहाँ घर क्यों बनाया, तो इसने छूटते ही कहा था “मेरी कोई जाति नहीं है मैं जाति से बाहर हूँ इसलिए।” इस जवाब पर इससे फिर सीधे सेप्टिक टैंक सफाई टीम में शामिल होने के लिए पूँछ लिया था। इसके लिए यह सहर्ष तैयार भी हो गया था! 

         इधर ‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा’ सुनकर ‘वे’ ने रमेसर की ओर देखा। वह रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है। लेकिन ‘वे’ को यह देखकर कुछ अजीब लगा कि रमेसर के दो अन्य साथी भी वहाँ थे जो इस ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे और वह भी इनसे ढक्कन नहीं हटवा रहा था जैसे ये इस ढक्कन को छूना नहीं चाहते हों! छेनीवाले ने यंत्रवत वही किया जो रमेसर ने कहा। उसने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। अब पूरा मेनहोल खुल गया था। रमेसर ने इसमें झांककर अंदाजे से बोला कि इसकी गहराई लगभग आठ फीट। ‘वे’ इसकी गहराई जानते थे इसलिए ‘हाँ’ कह दिया था।

         ‘घर’ को लेकर इसकी जिज्ञासा कैसे शांत हुई होगी! इसका उत्तर इसके बचपन की कहानी में है। सेप्टिक टैंक में झाँक रहे रमेसर को देखकर ‘वे’ ने सोचा।

        घर पहुँचते ही बस्ता फेंककर वह दद्दा को ढूंढने लगा‌। उन्हें झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा से पूँछा। पता चला बिलाक कालोनी ग‌ए हैं आते होंगे। वह घर के बाहर खड़ा उनका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद दद्दा उसे आते दिखाई पड़े तो वह उनकी ओर लपका लेकिन उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक पड़ा। दद्दा यह काम दोपहर से पहले कर लेते हैं! सोचकर वह मुड़ गया और धीमें कदमों से हैंडपंप पर चला गया। वह जानता था कि दद्दा सीधे यहीं आएंगे। दद्दा हैंडपंप पर ही गए। नल के नीचे उन्होंने झा‌ड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन रखा वह हैंडपंप चलाने लगा। लेकिन उत्कंठा में वह बेचैन था। हैंडपंप चलाते-चलाते उसने पूँछा, दद्दा, पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे!

          दस साल के बच्चे रमेसर से दद्दा को ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी। बाल्टी धोते-धोते उनके हाथ रुक ग‌ए। विस्फारित आँखों से उसे देखने लगे। उसने भी हैंडपंप चलाना रोक दिया और अपना प्रश्न दोहराया। दद्दा, पंडी जी कह रहे थे कि बिलाक आजादी के बाद बना तो बिलाक बनने से पहले हमारा घर कहाँ था।

            “पाकिस्तान..हाँ हमारा घर पाकिस्तान में था।” बिना लाग-लपेट के दद्दा ने बोल दिया। यह सुनते ही रमेसर ने फिर हैंडपंप चलाना शुरू कर दिया और दद्दा ने बाल्टी धोना। 

       उस स्त्री को देखते ही उसने समझ लिया था कि सामने खड़ा यह व्यक्ति (छेनीवाला) सूरत और सीरत से एक जैसा नहीं है। तभी इससे उस बियाबान में घर बनाने का कारण पूँछा था। 

       उस दिन यह छेनीवाला खुशी-खुशी उसके साथ हो लिया था। कितनी मजदूरी मिलेगी, यह भी नहीं पूँछा था इसने। इसे छेनी-हथौड़ा देकर सबसे पहले मेनहोल का ढक्कन खुलवाया था और बिना हिचक के इसने वे सारे कार्य किए थे जिसे आज यहाँ कर रहा है। उस दिन जब काम पूरा होने के बाद घर के मालिक से इसने बख्शीश मांगा तो पहली बार इसके ‘बड़के दिमाग’ से परिचय हो गया था। यह बख्शीश मांगने की बात स्वयं उसके दिमाग में कभी नहीं आई थी। बख्शीश में इसे सौ रुपए मिले थे। इसे मिलाकर एक घंटे की मेहनत के उस दिन इसे साढ़े तीन सौ रूपए मिले तो यह बहुत खुश हुआ था‌‌। और पहले दिन से ही यह छेनीवाला बन गया था। तभी से सफाई का उसका यह बिजनेस भी दौड़ पड़ा है।

           जाति या कूबड़वाली स्त्री के बारे में बात कर पाने की मनोदशा में छेनीवाला कभी नहीं मिला। उसे संदेह था कि ऐसी बातचीत से नाराज़ होकर यह काम भी छोड़ सकता है। लेकिन एक दिन जब इसने कहा कि उसकी औरत एक अनाथ बच्चा पालना चाहती है तो उसे विस्मय हुआ था। आगे फिर छेनीवाले ने यह भी कहा था कि “उसकी औरत को विकलांग पेंशन के पंद्रह सौ रूपए हर महीने मिलते हैं और सफाई के काम की उसे मजदूरी भी मिल जाती है इन पैसों को जोड़कर दोनों आसानी से एक बच्चा पाल लेंगे।” इस बात से वह किंचित आश्चर्य से भर उठा था छेनीवाले की ओर देखकर उसने सोचा था, यह छेनीवाला आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है, इसीलिए इसे आदमियों की बस्ती से दूर रहना पड़ता है! सच में इंसानी जीवन की यह विद्रूपता ही तो है कि लोग अपने ही जैसे इंसान को कितना कमतर आंकने लगते हैं, शायद स्वार्थ-लिप्सा और अहंकार के छल-छद्म में डूबे ये लोग छेनीवाले जैसों को आदमी मानने से भी इनकार कर देते हैं! दद्दा की बात छोड़ भी दें तो स्वयं उसके पप्पा ने भी इन आदमियों के दंश खूब सहे थे!! 

     छेनीवाले को लेकर उसकी (रमेसर की) जिज्ञासा अभी शांत नहीं हुई थी लेकिन उसके (छेनीवाले के) प्रति अब उसके (रमेसर के) भाव बदल चुके थे। वह छेनीवाले की किसी भी दुखती रग को नहीं छेड़ना चाहता था। लेकिन यह स्वाभाविक है कि पाठक जिज्ञासु होता है! उसकी जिज्ञासा शांत करने के लिए लेखक को अब कहानीकार की भूमिका में उपस्थित होना होगा।  ।।१२।।

ब‌ऊकपन और छेनीवाला!        

      पाँच भाइयों-बहनों में सबसे छोटा था छेनीवाला। माँ-बाप के अतिशय लाड़-प्यार और देखभाल के तरीके से इसके मानसिक विकास में बाधा आई। इसे कभी स्कूल भी नहीं भेजा गया। यह मंद-बुद्धि तो नहीं, लेकिन धीरे-धीरे लोग इसे ‘ब‌ऊक’ समझने लगे थे। विवाह की उम्र तक आते-आते माँ-बाप भी दुनियां से कूँच कर ग‌ए थे और भाई अपने परिवारों में रम ग‌ए। अब यह उपेक्षित रह गया था। ‘एक ब‌ऊक से कौन अपनी लड़की ब्याहेगा’ जैसी बातें इसके विवाह में बाधक बनी। लोग इसका उपहास भी उड़ाते! को‌ई इसे बरगलाकर जमीन अपने नाम न करा ले, इस डर से भाईयों ने इसे मृतक बताकर इसके हिस्से की जमीन अपने नाम करा लिया था। बाद में भाई भी गाँव छोड़कर शहरों में रहने लगे थे। इसके समक्ष अब जीवन-यापन की समस्या थी।

        इधर ‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा’ सुनकर ‘वे’ ने रमेसर की ओर देखा। वह रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है। लेकिन ‘वे’ को यह देखकर कुछ अजीब लगा कि रमेसर के दो अन्य साथी भी वहाँ थे जो इस ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे और वह भी इनसे ढक्कन नहीं हटवा रहा था जैसे ये इस ढक्कन को छूना नहीं चाहते हों! छेनीवाले ने यंत्रवत वही किया जो रमेसर ने कहा। उसने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। अब पूरा मेनहोल खुल गया था। रमेसर ने इसमें झांककर अंदाजे से बोला कि इसकी गहराई लगभग आठ फीट। ‘वे’ इसकी गहराई जानते थे इसलिए ‘हाँ’ कह दिया था।

         ‘घर’ को लेकर इसकी जिज्ञासा कैसे शांत हुई होगी! इसका उत्तर इसके बचपन की कहानी में है। सेप्टिक टैंक में झाँक रहे रमेसर को देखकर ‘वे’ ने सोचा।

        घर पहुँचते ही बस्ता फेंककर वह दद्दा को ढूंढने लगा‌। उन्हें झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा से पूँछा। पता चला बिलाक कालोनी ग‌ए हैं आते होंगे। वह घर के बाहर खड़ा उनका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद दद्दा उसे आते दिखाई पड़े तो वह उनकी ओर लपका लेकिन उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक पड़ा। दद्दा यह काम दोपहर से पहले कर लेते हैं! सोचकर वह मुड़ गया और धीमें कदमों से हैंडपंप पर चला गया। वह जानता था कि दद्दा सीधे यहीं आएंगे। दद्दा हैंडपंप पर ही गए। नल के नीचे उन्होंने झा‌ड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन रखा वह हैंडपंप चलाने लगा। लेकिन उत्कंठा में वह बेचैन था। हैंडपंप चलाते-चलाते उसने पूँछा, दद्दा, पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे!

          इधर ‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा’ सुनकर ‘वे’ ने रमेसर की ओर देखा। वह रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है। लेकिन ‘वे’ को यह देखकर कुछ अजीब लगा कि रमेसर के दो अन्य साथी भी वहाँ थे जो इस ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे और वह भी इनसे ढक्कन नहीं हटवा रहा था जैसे ये इस ढक्कन को छूना नहीं चाहते हों! छेनीवाले ने यंत्रवत वही किया जो रमेसर ने कहा। उसने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। अब पूरा मेनहोल खुल गया था। रमेसर ने इसमें झांककर अंदाजे से बोला कि इसकी गहराई लगभग आठ फीट। ‘वे’ इसकी गहराई जानते थे इसलिए ‘हाँ’ कह दिया था।

         ‘घर’ को लेकर इसकी जिज्ञासा कैसे शांत हुई होगी! इसका उत्तर इसके बचपन की कहानी में है। सेप्टिक टैंक में झाँक रहे रमेसर को देखकर ‘वे’ ने सोचा।

        घर पहुँचते ही बस्ता फेंककर वह दद्दा को ढूंढने लगा‌। उन्हें झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा से पूँछा। पता चला बिलाक कालोनी ग‌ए हैं आते होंगे। वह घर के बाहर खड़ा उनका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद दद्दा उसे आते दिखाई पड़े तो वह उनकी ओर लपका लेकिन उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक पड़ा। दद्दा यह काम दोपहर से पहले कर लेते हैं! सोचकर वह मुड़ गया और धीमें कदमों से हैंडपंप पर चला गया। वह जानता था कि दद्दा सीधे यहीं आएंगे। दद्दा हैंडपंप पर ही गए। नल के नीचे उन्होंने झा‌ड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन रखा वह हैंडपंप चलाने लगा। लेकिन उत्कंठा में वह बेचैन था। हैंडपंप चलाते-चलाते उसने पूँछा, दद्दा, पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे!

          इधर ‘रहने दो अब ढक्कन खुल जाएगा’ सुनकर ‘वे’ ने रमेसर की ओर देखा। वह रम्मा के सहारे ढक्कन उठाए हुए छेनीवाले को मेनहोल से ढक्कन हटाने के लिए कह रहा है। लेकिन ‘वे’ को यह देखकर कुछ अजीब लगा कि रमेसर के दो अन्य साथी भी वहाँ थे जो इस ढक्कन को हाथ नहीं लगा रहे थे और वह भी इनसे ढक्कन नहीं हटवा रहा था जैसे ये इस ढक्कन को छूना नहीं चाहते हों! छेनीवाले ने यंत्रवत वही किया जो रमेसर ने कहा। उसने अपने हाथ से ढक्कन उलट दिया। अब पूरा मेनहोल खुल गया था। रमेसर ने इसमें झांककर अंदाजे से बोला कि इसकी गहराई लगभग आठ फीट। ‘वे’ इसकी गहराई जानते थे इसलिए ‘हाँ’ कह दिया था।

         ‘घर’ को लेकर इसकी जिज्ञासा कैसे शांत हुई होगी! इसका उत्तर इसके बचपन की कहानी में है। सेप्टिक टैंक में झाँक रहे रमेसर को देखकर ‘वे’ ने सोचा।

        घर पहुँचते ही बस्ता फेंककर वह दद्दा को ढूंढने लगा‌। उन्हें झोपड़ी में देखा। वहां भी नहीं थे। फिर अम्मा से पूँछा। पता चला बिलाक कालोनी ग‌ए हैं आते होंगे। वह घर के बाहर खड़ा उनका इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद दद्दा उसे आते दिखाई पड़े तो वह उनकी ओर लपका लेकिन उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक पड़ा। दद्दा यह काम दोपहर से पहले कर लेते हैं! सोचकर वह मुड़ गया और धीमें कदमों से हैंडपंप पर चला गया। वह जानता था कि दद्दा सीधे यहीं आएंगे। दद्दा हैंडपंप पर ही गए। नल के नीचे उन्होंने झा‌ड़ू, बाल्टी और मुड़ा टिन रखा वह हैंडपंप चलाने लगा। लेकिन उत्कंठा में वह बेचैन था। हैंडपंप चलाते-चलाते उसने पूँछा, दद्दा, पहले जब यहां ब्लॉक नहीं था तब हम कहाँ रहते थे!

          दस साल के बच्चे रमेसर से दद्दा को ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी। बाल्टी धोते-धोते उनके हाथ रुक ग‌ए। विस्फारित आँखों से उसे देखने लगे। उसने भी हैंडपंप चलाना रोक दिया और अपना प्रश्न दोहराया। दद्दा, पंडी जी कह रहे थे कि बिलाक आजादी के बाद बना तो बिलाक बनने से पहले हमारा घर कहाँ था।

            “पाकिस्तान..हाँ हमारा घर पाकिस्तान में था।” बिना लाग-लपेट के दद्दा ने बोल दिया। यह सुनते ही रमेसर ने फिर हैंडपंप चलाना शुरू कर दिया और दद्दा ने बाल्टी धोना। 

       रमेसर छेनीवाले की इस कहानी से अनजान हो सकता है लेकिन इसकी जाति से अनजान नहीं रह सका! कहीं-कहीं किसी इलाके में सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय छेनीवाले को जानने वाले लोग मिल जाते हैं। ऐसे समय जब रमेसर और छेनीवाले, दोनों के हाथ सक्शन पाइप के ‘कीचड़’ से सने होते हैं तब इन लोगों की छेनीवाले के लिए बातें और व्यवहार इसकी ऊँची जाति बताने के लिए काफी होता है। 

      वैसे यह कहानी छेनीवाले की नहीं रमेसर की है। रमेसर और छेनीवाला, दोनों के जीवन के शेड भिन्न हैं लेकिन क्या इसपर लिखी इबारत का अर्थ एक है? शायद इस इबारत का अर्थ ‘वे’ को पता हो!! ।।१३।।

 रमेसर अपनी अनुभूतियों से अपना चरित्र गढ़ता है !

         दरअसल किसी व्यक्ति की चेतना-शक्ति ही अनुभूतियों की पहचान कर पाती है। वह इन्हें चिह्नित और वर्गीकृत कर मानसपटल पर अंकित करती चलती है। इसमें गहरी अनुभूति ही व्यक्ति के मानस पर जीवनपर्यंत अंकित रह पाती हैं। जो उस व्यक्ति की जीवन-दशा को दिशा देती है। यह चेतना-शक्ति अनुभूतियों के संयोजन से निर्मित मनोभाव द्वारा व्यक्ति का चरित्र गढ़ता है। साहित्य में यही ‘करेक्टर’ है। लेखक इन्हीं अनुभूतियों को उकेरकर ‘करेक्टर’ गढ़ता है। इस कहानी में रमेसर भी एक ‘करेक्टर’ है जो स्वयं की चेतना-शक्ति से पायी अपनी अनुभूतियों से अपना चरित्र गढ़ता है। और किसी का चरित्र या उसकी निर्मिति ही उसकी कहानी है, जिसमें मार्मिकता का ‘सूत्र’ होता है लेखक इस सूत्र को पकड़कर चलता है। ‘वे’ रमेसर या छेनीवाले के जिस वर्तमान क्षण के साक्षी हैं, वह रुक्ष है वर्णन है, इसमें ‘कहानी तत्व’ नहीं है। लेकिन जब रमेसर की मार्मिक स्मृतियाँ इस ‘दृश्य’ से संम्पृक्त होती हैं तो ‘वे’ का यह वीक्षण स्वयंमेव कहानी बन जाता है। आज जिस रमेसर को ‘वे’ देख रहे हैं उस ‘रमेसर’ की बनावट के पीछे चेतना-शक्ति प्रदत्त उसके मनोभाव हैं। ऐसे मनोभाव किसी को भी अँधेरे बियाबान से निकलने का रास्ता दिखाते हैं इसलिए रमेसर अपने वर्ग का प्रतिनिधि चरित्र है। अतः यह कहानी केवल उसकी ही कहानी नहीं है उसके वर्ग की कहानी है!

       सेप्टिक टैंक की सफाई करते हुए डेढ़ घंटे बीत चुके हैं। इसपर ‘वे’ की नज़र निगरानी के लिए नहीं बल्कि उत्सुकतावश जमी है। रमेसर और छेनीवाला दो नहीं जैसे एक व्यक्ति हों। दोनों का व्यक्तित्व गड्ड-मड्ड दिखाई पड़ रहा था एक दूसरे के काम में सहयोग करते हुए! बल्कि रमेसर के टीम के दो अन्य साथी इस परिदृश्य में अब तक ओझल ही रहे। इसीलिए ‘वे’ की नोटिस में दोनों नहीं हैं। इधर ‘वे’ देख रहे हैं कि रमेसर और छेनीवाला दोनों मेनहोल पर क‌ई मिनट से झुके हैं। दोनों बारी-बारी एक-दूसरे से सक्शन पाइप अपने हाथ में लेकर मेनहोल में झांक-झांककर इसे सेप्टिक टैंक में घुमाते हुए बचा-खुचा सीवर सुड़कवा रहे हैं! शायद सेप्टिक टैंक का यह सफाई कार्य अब अपने अंतिम क्षणों में है। इस बीच ‘वे’ ने छेनीवाले को लापरवाही से सक्शन पाइप हाथ में पकड़ते हुए देखा! वह पाइप के उस हिस्से पर हाथ लगा रहा है जो टैंक के सीवर में जाता है। इसलिए उसका हाथ सीवर के ‘कीचड़’ से सने हैं। लेकिन रमेसर इस मामले में सजग है वह पाइप के ऊपरी हिस्से को ही पकड़ता है। 

        अचानक ‘वे’ से मुखातिब होकर रमेसर ने उनसे मेनहोल में देखने के लिए कहा। 'वे' ने जाकर सेप्टिक टैंक में झांका, तली में कीचड़ नहीं केवल पानी था। उनका अनुमान था कि टैंक का गाढ़ा कीचड़ समरसेबल के पानी में पतला होकर सक्शन पाइप द्वारा सुड़का जा चुका है और अब तीन इंच से भी कम पानी बचा है। रमेसर के जब यह कहा कि पाइप अब पानी नहीं खींच पाएगा तो उन्होंने भी इस पर सहमति जताया। क्योंकि वे देख चुके थे कि  सक्शन पाइप के आधे मुहाने से भी नीचे पानी है। अब रमेसर ने टैंक में गिरते पानी को बंद कराने के लिए छेनीवाले से समरसेबल का पाइप टैंक से बाहर कराया। फिर वह रमेसर के कहने पर सक्शन पाइप को भी सेप्टिक टैंक से निकालकर धोने लगा। इस सक्शन पाइप का एक सिरा टैंकर के नोजल से जुड़ा था। जिसे एक अन्य साथी ने हटाया। छेनीवाले के अन्य साथियों को देखकर ‘वे’ को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे पाइपें धुलने के बाद ही उसके साथी इसे छुएंगे! उनके मन में आया कि रमेसर से इन साथियों के बारे में कुछ पूँछे। लेकिन रमेसर उन्हें कोई चीज दिखाने के लिए सेप्टिक टैंक के किनारे सबसे ओझल रहने वाले स्थान की तरफ ले गया। उस स्थान की ओर इशारा कर उनसे धीरे से बोला, 

        “देखिए इसे मैंने यहां किनारे रखवा दिया हूँ, सोचा आपको बता दूँ कि कहीं गलती से कोई इसे हाथ न लगा दे, सुबह किसी से कहकर इसे आप फेंकवा देना।”

           ‘अरे! यह तो सीवर के कीचड़ में लिथड़ा हुआ वही कपड़ा है जिसे इस रमेसर ने सेप्टिक टैंक से निकलवाया था..तो इसे यहाँ रखवा दिया इसने! अपने आदमियों से कहकर इसे कहीं भी फेंकवा सकता था यह!!’ ‘वे’ ने तनिक विस्मय से सोचा। फिर भी रमेसर से कुछ नहीं कहा। ।।१४।।

बदला नहीं वह बदलाव का आकांक्षी है!

           कीचड में लिथड़े इस कपड़े को वे फेकवाएंगे रमेसर की इस बात से जैसे उनके (वे) अहं को ठेस पहुँचा था। उनके खयाल में आया कि इन महोदय (रमेसर) के दद्दा और पप्पा हाथ से मैला उठाते रहे लेकिन आज इन्हें सीवर में लिथड़े इस कपड़े को फेंकने से परहेज है इसे ये छूना नहीं चाहते! और तो और, छेनीवाले से भी इसे फेंकने के लिए नहीं कहा, आखिर क्यों? लेकिन अगले ही पल वे मन को सांत्वना देने लगे कि रमेसर सेप्टिक टैंक में पड़ी ऊल-जुलूल कूड़े जैसी चीजों की सफाई करने नहीं आया है, यह ‘कपड़ा’ सीवर का हिस्सा तो नहीं। वह तो केवल ‘कीचड़’ की सफाई करने आया है। पैसा भी उसे ‘कीचड़’ सफाई का ही मिलना है। तो फिर क्यों इस कपड़े को फेंके यही क्या कम है कि उसने इसके बारे में बता दिया नहीं तो अनजाने कोई इसे हाथ लगा देता!! ‘वे’ अपने अहं को कुछ यही सांत्वना दिए। इससे वे सहज हुए तो “अच्छा ठीक है” कहकर रमेसर की ओर देखा जहाँ उन्हें एक सपाट चेहरा मिला!

       बल्ब की मद्धिम रोशनी में रमेसर के इस सपाट चेहरे के पीछे के भाव से ‘वे’ अनजान रह ग‌ए। रमेसर को एक बात हमेशा कचोटती रही है। जब एक साँझ को दद्दा हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा टिन लिए हुए आते दिखाई पड़े थे तो उसे बहुत अजीब लगा था क्योंकि दद्दा यह काम दोपहर से पहले ही कर लेते हैं। लेकिन बाद में उसे पता चला था कि दद्दा को उस दिन किसी काम से बाहर जाना पड़ा था इसलिए सुबह ब्लॉक कॉलोनी में मैला उठाने नहीं पहुँचे थे। दोपहर बाद उनके लौटने पर साहब ने उन्हें बुलाकर बहुत डाटा था और तुरंत जाकर मैला उठाने के लिए कहा। फिर उस दिन सांझ को वे मैला उठाने ग‌ए। इसे वह आज तक नहीं भूला है। अहं की कौन कहे उस दिन उसके निरीह दद्दा की मानवीय गरिमा का भी ध्यान नहीं रखा गया था। उन दिनों यह सोचकर कि मैला तो साहबों का ही था, इसे उठाने के लिए दद्दा को क्यों डाटा गया, वह गुस्से से भर उठता और उसकी मुट्ठियां भिंच जाती। लेकिन किसी बदले की भावना का वह शिकार नहीं हुआ। बदला नहीं वह केवल बदलाव का आकांक्षी है! जिसके लिए उसकी पीढ़ियाँ गुजर ग‌ईं थीं। बदलाव की यह आकांक्षा जब उसमें तारी होता तो उसका चेहरा ऐसे ही सपाट हो जाता है। 

       रमेसर ने किंचित गर्व से ‘वे’ को नजर भर देखा! ‘वे’ सेप्टिक टैंक के बगल में पड़े सीवर के कीचड़ से सने उस कपड़े को देख रहे थे। उनके कंधे से कंधा मिलाए वह भी उनके बराबर खड़ा हुआ उनसे ही इस कपड़े को फेंकवाने की बात कह रहा है! यह बदला नहीं, बदलाव लाने का आग्रह था। इस आग्रह में उसके आत्मविश्वास का सामर्थ्य है! फिर न जाने क्यों उसने आसमान की ओर भर नजर देखा, जैसे अपने इस सामर्थ्य को वह दद्दा और पप्पा को दिखाना चाहता हो! उधर ऊपर आसमान में टिमटिमाते तारे भी उसके बात की गवाही दे रहे थे!! काफी समय हो गया कहकर अचानक वह मुड़ा और ‘वे’ को छोड़कर पोर्टिको की ओर चल दिया। जहाँ कुर्सी पर बैठे बाबू जी से उसे आज के काम का हिसाब करना है।

         उसे पोर्टिको की ओर जाते देख ‘वे’ भी पीछे-पीछे चल पड़े। लेकिन तभी छेनीवाले ने उनसे हैंडपंप चलाने के लिए कहा। उसके हाथ और बिना चप्पलों के पैर सीवर के ‘कीचड़’ में सने थे। उसे देखते हुए ‘वे’ को ग्लानि हुई कि बिना दस्ताने और सुरक्षा पोशाक के सीवर सफाई करने वालों को मैन्युअल स्कैवेंजर क्यों नहीं माना जाता! उनका वश चले तो वे इन्हें भी मैन्युअल स्कैवेंजर मान लें! ‘वे’ ने जाकर हैंडपंप चलाया और छेनीवाले ने अपने हाथ-पैर धोए। ।।१५।।

NAMASTE             

       पोर्टिको में आते ही रमेसर ने बाबूजी को बताया कि टैंक की सफाई अच्छे से हो गई है ‘वे’ ने इसे देख लिया है। इसके बाद उनमें यह बातचीत हुई,

            बाबूजी ने पूँछा, “तो कितना दे दें।”

         “इसमें क्या बताना, साढ़े तीन हजार का एक चक्कर  होता है।” रमेसर ने कहा। 

         “इस हिसाब से तो फिर सात हजार हो जाएगा, जबकि बात पाँच हजार में हुई थी।” बाबू जी ने हिसाब लगा कर बोला। 

         “दो चक्कर भी तो लगाना पड़ा..अच्छा ठीक है..आपस की बात है आप ढाई हजार प्रति चक्कर के हिसाब से दे दीजिए।” रमेसर ने मुस्कुराकर कहा।

         बाबूजी ने गिनकर रमेसर को पाँच हजार रुप‌ए दिए। उसको संतुष्ट देख ‘वे’ को पता चल गया कि एक टैंकर सीवर सफाई के कितने रूपए लगते हैं।  

         तब तक छेनीवाला अपना बख्शीश वहाँ लेने आ पहुँचा। बाबू जी ने उसे पचास रुपए दिए लेकिन उसने नाखुशी जाहिर कर दिया। उसकी नाखुशी पर रमेसर ने बाबूजी को बताया कि इसे सौ रूपए चाहिए। बाबूजी के पोटली में ढूँढ़ा। लेकिन उसमें सौ रुपया नहीं मिला तो छेनीवाला मायूस हो गया‌। रमेसर ने उसे समझाया कि चलो, अब नहीं है तो क्या करोगे। ‘वे’ देख रहे उन्होंने अपनी जेब से सौ रुपए का एक नोट निकालकर उसे पकड़ा दिया। मनचाहा बख्शीश पाते ही छेनीवाला और रमेसर दोनों खुश हो ग‌ए। फिर रमेसर ने बाबू जी का पहले दिया पचास रुपया छेनीवाले से वापस कराना चाहा। लेकिन वे ने इसे वापस लेने से मना कर दिया।

            रमेसर की टीम अब जाने की तैयारी करने लगी। एक सदस्य ने सक्शन पाइप समेटकर टैंकर पर रखा तो दूसरा ट्रैक्टर की ड्राइविंग शीट पर बैठ गया। इधर रमेसर छेनीवाले से कुछ कहने को हुआ लेकिन अचानक से चुप हो गया और उसे वहाँ ले गया जहाँ सीवर में लिथड़ा वह कपड़ा पड़ा था। इसे दिखाकर किसी चीज में लपेटकर इसको दूर फेंक आने के लिए कहा। इसे लेकर अचानक रमेसर का मन कैसे बदल गया! वे सोचने लगे। 

      रमेसर की चेतना-शक्ति ने बचपन से ही उसे आत्मसम्मानी बनने के लिए प्रेरित किया। जन्म, जाति और कर्म के दुश्चक्र से बाहर निकलने के लिए उसे पहले नैतिक धरातल अपना व्यक्तित्व मजबूत रखना था। इसीलिए गरीबी और तमाम आर्थिक परेशानियों के क्षण में भी वह लालची और स्वार्थी नहीं बना क्योंकि ये गुण व्यक्ति को छोटा बनाते हैं। किसी के बराबर खड़े होकर सौदेबाजी करने का साहस भी वह इसलिए अर्जित कर पाया कि न तो किसी के एहसान तले दबकर उसे कमजोर और छोटा बनना था और न ही किसी को छोटा बनाना! दद्दा और पप्पा जैसे दो छोर के बीच खड़ा वह जीवन की स्थितियों को देख, सुन और समझ रहा था। उसके लिए कोई काम छोटा-बड़ा या ऊँच-नीच नहीं है उसे अपने काम का मेहनताना चाहिए बस! बख्शीश में छेनीवाले को सौ की जगह डेढ़ सौ रूपए मिले। वह ईमानदार और खुद्दार सौदेबाज और सेवा प्रदाता है और उसमें पेशागत ईमानदारी भी है इसीलिए अतिरिक्त बख्शीश से मिली खुशी के प्रतिमूल्य में उसने छेनीवाले से उस कपड़े को फेंकने के लिए कहा। छेनीवाला दूर कहीं उस कपड़े को फेंक भी आया था।

            पुनः हैंडपंप पर छेनीवाले का हाथ धुलाते हुए ‘वे’ उसके और रमेसर के बारे में सोचने लगे। रमेसर एक दुश्चक्र से पार पाने की जद्दोजहद में अपनी चेतना-शक्ति और मार्मिक स्मृतियों से प्रेरणा पाता है तो वहीं छेनीवाले का यह चरित्र ‘परिस्थितिजन्य’ है उसके जीवन में कोई प्रेरणाश्रोत नहीं। बल्कि उसका ब‌ऊकपन, उसके भाई और उसका जाति निकाला उसकी आज की ‘परिस्थिति’ के कारक हैं। दोनों की पीड़ा की अनुभूति का धरातल भिन्न हैं! छेनीवाले में आंतरिक और वाह्य किसी प्रकार का कोई संघर्ष नहीं। ज्यादा से ज्यादा उसका संघर्ष ‘मार्मिक चालाकी’ तक सीमित है। लेकिन रमेसर आंतरिक और वाह्य और चेतना के प्रत्येक स्तर पर, संघर्षशील है! यह रमेसर के लिए कितनी मार्मिक बात है कि उसके और छेनीवाला दोनों के हाथ सीवर की कीचड़ में सने हैं फिर भी छेनीवाले के साथ वैसा भेदभाव नहीं होता जैसा रमेसर के साथ होता है! इससे समझा जा सकता है कौन नायक है और यह कहानी किसकी है!!

          वे याद करते हैं एक स्वच्छकार विमुक्ति सम्मेलन में इसी नायकत्व के कारण रमेसर जैसे एक योद्धा को सम्मानित कराया जा रहा था। उस सम्मेलन में कुछ ऐसी ही कहानी उस व्यक्तित्व की वहाँ बताई जा रही थी। इसीलिए आज इस सेप्टिक टैंक के सफाई अभियान पर उनकी दृष्टि लगातार जमी रही। यहाँ स्वयं रमेसर उस स्वच्छकार विमुक्ति में सम्मानित होने वाले योद्धा की हू-ब-हू प्रतिमूर्ति है।

        इसी बीच ट्रैक्टर स्टार्ट होने की आवाज सुन छेनीवाला ट्रैक्टर पर सवार होने चला गया। बाबूजी के पास खड़ा रमेसर उनसे नमस्ते किया और ट्रैक्टर की ओर मुड़ा। तभी ‘वे’ पर उसकी दृष्टि पड़ी, फिर वे को भी उसने हाथ जोड़कर नमस्ते कहा। प्रतिउत्तर में ‘वे’ ने भी हाथ जोड़े और नमस्ते बोला!! लेकिन अगले ही पल जब उनको अपने इस ‘नमस्ते’ का खोखलापन समझ में आया तब उनका ध्यान रमेसर और उसकी टीम के ईकोसिस्टम के लिए बने NAMASTE पर गया!! रमेसर हो या छेनीवाला या उसकी टीम के अन्य सदस्य, इनके लिए खड़े होकर यह NAMASTE बोलना चाहिए। जिसका अर्थ है National Action For Mechanised Sanitation Ecosystem. सरकार इनके लिए 2022 से ही यह NAMASTE बोल रही है! अब तो 2025 का आगाज हो चुका है ऐसे में यह NAMASTE अब इतनी जोर से बोला जाना चाहिए कि इसकी आवाज देश में सभी जगह सबको सुनाई पड़े और जिसकी प्रतिध्वनि बहुत समय तक गूँजती रहे। ।।१६।।

           (जी हाँ अब NAMASTE…NAMASTE… )

                                       - विनय कुमार तिवारी