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रविवार, 10 मई 2026

विश्वास का धागा

        आज तो सुबह सात बजे बिस्तर छोड़ा.. असल में क्या है कि रात में सोने के ठीक पहले तक यदि आप गंभीर वैचारिक चिंन्तन में उलझे होते हैं, तो निश्चित ही नींद कुछ न कुछ खराब तो होगी ही! मैं बीती रात सोने जाने के ठीक पहले तक ऐसे ही बौद्धिक जुगाली में उलझा था.. सोने की कोशिश किया तो जैसे ही नींद आने को होती अचानक मस्तिष्क में कुछ चुभने जैसा अहसास होता, जिसे पिंच करना समझ सकते हैं। फिर बेचैनी में नींद टूट जाती! अंततः इस नींद की भरपाई मैं सुबह सात बजे तक करता रहा, बिस्तर नहीं छोड़ा।
         हाँ, एक बात है, सोने जाने से एक घंटा पहले मन-मस्तिष्क को रिलैक्स, मने ढीला छोड़ देना चाहिए। इस समय पढ़ने की आदत वालों को भी चाहिए कि गंभीर विषयों का पाठन न करें। मनोरंजन पूर्ण और हल्के-फुल्के विषय ही पढ़ें। एक बात पर और ध्यान देने की जरूरत है, आजकल सोशल-मीडिया का जमाना है... यहां तर्क-वितर्क और स्क्रॉल में लोग उलझ जाते हैं… इससे भी अनावश्यक तनाव पैदा होता है।
         खैर जब तक बिस्तर छोड़ता तब तक लड़का भी आ गया.. उसने चाय बनायी। 
        चाय पीते हुए अखबार उठाया। सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों पर निगाह पड़ी..इन्हें पढ़ते हुए मन ही मन मुस्कराया..एक फैसला तो मानवीय रिश्तों में आपसी विश्वास बहाली या यों कहें विश्वास की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता प्रतीत हुआ... 
        वाकई! मानव निर्मित संबंधों में आपसी विश्वास से बढ़कर कुछ नहीं होता...कानून-फानून तो बनते बिगड़ते रहते हैं...
     ....इन फैसलों से मुझे बचपन (कक्षा पाँच-छह के आसपास) में श्रीमद्भागवत, कल्याण और सुखसागर में पढ़ी वैदिक कहानियाँ याद हो आयी…
       “कामाग्नि से व्याकुल एक व्यक्ति, उसके पति के सामने ही, एक स्त्री से प्रणय-याचना करता है। स्त्री स्वयं को विवाहित बताकर प्रस्ताव अस्वीकार कर देती है, तो वह उसे श्राप देने पर उतारू हो उठता है।” 
         ऐसी ही एक अन्य कथा में 
       पत्नी पति को अपने कंधों पर बैठाकर स्वयं गणिका के पास ले जाती है।
      लेकिन उन वैदिक कथानकों में इन बातों को अनैतिकता की तरह नहीं देखा गया। नहीं तो पहले प्रसंग में ‘श्राप’ नहीं, ‘पाप’ का भाव उभरता और दूसरे में पति-पत्नी के विश्वास के बजाय अपराध-बोध की छाया दिखाई पड़ती।
       बल्कि इन कथाओं में पति-पत्नी के संबंधों, उनके पारस्परिक दायित्वों और सबसे बढ़कर उनके बीच विश्वास की व्याख्या मिलती है। सच तो यह है किसी भी रिश्ते की असली नींव विश्वास ही होता है! विश्वास ही वह नाजुक-सा धागा है जिससे रिश्ते बंधे और टिके रह सकते हैं!!
       बचपन के उन्हीं दिनों मैं अपने बाबू (दादा जी) के मुख से अकसर किसी की पोंगापंथी पर उसे "लकीर का फकीर होना" जुमले से नवाजते सुना करता। इससे अनजाने में ही मुझे यह सीख नसीब हुई कि बातों को केवल तर्क पर ही नहीं संवेदनाओं की भावभूमि पर भी कसना चाहिए।
       ...एक बात और.. हमने ओखली (संविधान अंगीकरण) में सिर दे दिया है, तो मूसलों (संवैधानिक व्यवस्थाओं के निर्णयों) से क्या डरना..! आखिर बिना कुटाई दाना कहां निकलता है… इसमें आया मुहावरा भी कभी दादा जी से ही सुना था… खैर,
        मेरी सुबहचर्या पढ़कर आप इसे बौद्धिक जुगाली समझ बैठें, उससे पहले ही बता दें कि कई दिनों से पड़ोसी के साथ बैठकर चाय नहीं पी थी। मुझे यह कमी महसूस हो रही थी। आज वे दिखाई भी पड़ ग‌ए! मैंने चाय का आग्रह किया, पहले तो वे मुस्कुराए फिर मेरे बैठक में आ ग‌ए। हम दोनों गप्पें लड़ाते हुए साथ-साथ बैठकर चाय पीते रहे...सुबह की यह चाय बहुत सूकूनदायक थी..

#सुबहचर्या 
 (28.9.18)

शनिवार, 9 मई 2026

विचारों का मैन्युप्यूलेशन

        प्रातःकालीन परिदृश्य जैसे कुछ कह रहा होता है। इसे समझने के लिए मन का खाली और बेलाग होना जरूरी है। और सुबह-सुबह मन कुछ ऐसा ही होता है। इसीलिए सुबहचर्या में मैं दुनियाँ से टकराता हूँ। संवेदित हो उठता हूँ, नवीन विचार प्रस्फुटित होते हैं, लिखास जागती है, और इसे फेसबुक पर अभिव्यक्त करता हूँ। 

       लेकिन कभी-कभी मन 'स्टैग्नेशन' जैसी विरामावस्था में आ जाता है। न कुछ सोच पाता है और न कुछ समझता है। ऐसा मन तब जीवन में रमा हुआ-सा होता है, विचार स्वत:स्फूर्त नहीं होते बल्कि विचारों को ‘मैन्यूप्युलेट’ करना होता है। यदि विचार मैन्यूप्युलेट हों तो इससे स्वाभाविक लेखन नहीं हो पाता। क्योंकि तब पाठक को मात्र प्रभावित करने की इच्छा होती है न! 

        दूसरी स्थिति यह भी बनती है कि विचार सृजन के लिए कभी-कभी मन को अंतस की दुनियाँ में ढकेलता हूँ, तो वहाँ की दुनिया भी भाव-अभाव से मुक्त मिलती है.. विचार रूखे ही रह जाते हैं! या विचार निकलते ही नहीं।

      अरे हाँ..! क्या किसी "साहित्य" का सृजन विचारों या कल्पनाओं को बिना "मैन्यूप्युलेट" किए हुए लिखा जा सकता है… और लिख भी दिया गया तो क्या उस लिखे में, उस विषय की आत्मा भी प्रतिष्ठित होती है? मैं मानता हूँ नहीं, क्योंकि संवेदना को कभी "मैन्यूप्युलेट" नहीं किया जा सकता.. हाँ अभिव्यक्ति को तो किया जा सकता है! मतलब सुंदर मूर्तियां तो गढ़ी जा सकती है लेकिन बिना संवेदना के इन मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो सकती! बिना संवेदना की आंच के शब्द और वाक्य केवल बेजान मूर्तियां ही गढ़ते हैं, और पाठक भी इसे वैसे ही विसर्जित कर देता है।

        आजकल लोग अपनी लिखास मिटा रहे हैं लेखक बन रहे हैं; लेखकों के लिए ही लिख रहे हैं, और लेखकों का लिखा लेखक ही समझ रहे हैं या फिर स्वयं ही अपना लिखा समझते होंगे । 

        पत्नी मुझे पढ़कर अकसर यही कहती हैं, "तुम्हीं लिखो तुम्हीं समझो या फिर कोई लेखक ही तुम्हारा लिखा समझता होगा।" मैं पत्नी को कभी-कभी अपना पाठक मान लेने के भ्रम में होता हूँ लेकिन इस कथन के बाद यह भ्रम भी जाता रहा..

        आज सुबह टहलने का मन हो आया था, लेकिन ध्यान हो आया कि जूता अभी सूखा ही नहीं है और हवाई चप्पल में ठंड लगती। असल में दो दिन पहले जूता धुल दिया था। वैसे इस समय अन्य क्षेत्रों में मौसम खुश्क हो चुका होगा लेकिन तराई जैसे क्षेत्र में शायद आर्द्रता बनी रहती है, वैसे भी भिनगा में जंगल होने से यहाँ आर्द्रता की मात्रा कुछ ज्यादा ही है। इसीलिए कपड़े वगैरह दिनभर में भी नहीं सूखते, जूता तो खैर कैनवास का है ही। 

      लेकिन आज Morning walk की इच्छा बलवती हो चुकी थी और गीले जूते को पाँव में डाल कर निकल लिया। कुछ देर के बाद अचानक जूते पर ध्यान गया। देखा, जूते के कैनवास के ऊपर साबुन का झाग निकलकर फैल चुका है। शायद यह ठीक से नहीं धुल पाया था! खैर चलतेे हुए इस झाग को हटाने की कोशिश भी करता रहा। क्योंकि यह कुछ अजीब लगता था! 

        यूँ ही चलते-चलते एक कार्यक्रम में नारी सशक्तिकरण पर दिया अपना भाषण याद आया! भाषण स्वभाविक नहीं, बल्कि इसपर अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर बोल रहा था। कि सामने बैठे लोग मेरे भाषण से प्रभावित हो जाएं! श्रोता के रूप में सामने स्त्रियाँ ही थी, मंच पर केवल और केवल पुरूष थे। मतलब उस भाषण में मेरी ‘आत्मा’ नहीं बोल रही थी।

       खैर, टहल कर लौटा तो उसी तरह से चाय बनाया और अखबार पढ़ा। अखबार में "असली नारी सशक्तिकरण" पर कोई संपादकीय था, लेकिन नहीं पढ़ा। पढ़ा इसलिए नहीं कि वही घिसी-पिटी बातें, इन बातों को क्या पढ़ना! वैसे पर इस विषय पर घिसी-पिटी बातें ही की जाती हैं!

        इस सुबहचर्या को अभी रात में लिख रहा हूँ, तो दिन में एक और अखबार में एक लेख पढ़ लिया था उस लेख में एक हृदयविदारक घटना का जिक्र था, दिल्ली जैसे शहर में एक पढ़े-लिखे परिवार में एक दादी अपनी पोती को पानी की टंकी में इसलि विचारों का मैन्यूप्युलेशन ए डुबोकर मार डालती है, क्योंकि वह पहले बच्चे के रूप में पोता चाहती थी। वहीं किसी दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र में बी ए की पढ़ाई पूरी करने की इच्छा रखने वाली बहू को कोई सास उसे ही सुनाकर कहती है "बड़ी आई हो अंगर्रा-बीयर्रा करने"। 

         तो इन भाषणों से क्या होने वाला? 

      और यहां मैं सुबह की बातें रात में लिखने के लिए अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर रहा हूँ...

#चलते_चलते

      "मैन्यूप्युलेशन" उतना बुरा नहीं होता जितना मैं इसे बता रहा हूँ..शरीर को प्रकृति ने "मैन्यूप्युलेट" किया हुआ है, लेकिन इसमें आत्मा डालकर!! तो यह मैन्यूप्युलेशन भी कलात्मक पुनर्सृजन है!

  #सुबहचर्या 

 (22.11.18)

शुक्रवार, 8 मई 2026

फिट होने के राज!

          क‌ई दिन हो गए थे टहले हुए, तो आज सुबह पौने पाँच बजे ही निकल पड़ा। वैसे यह टहलाई हप्ते में औसतन तीन दिन होती है। स्टेडियम में ग्रुप में टहलने वाले टहलते मिले। ये लोग आपस में किसी राजनीतिक मुद्दे पर चर्चावान थे। उनकी बात सुनते हुए मैं आगे बढ़ गया… ऊपर आसमान में चाँद दूधिया रंग बिखेर रहा था। कुछ क्षण चाँद के शांत मगर चटक धवल रंग पर टकटकी लगाए रहा। खैर..

        स्टेडियम में बढ़ती भीड़ से मुझे लगा कि फिटनेस को लेकर जागरूकता बढ़ी है। तभी ग्रुप का कोई सदस्य "आप फिट तो इंडिया फिट" कहता सुनाई पड़ा। देशभक्ति का यह श्लोगन सुनकर मैं चौंक उठा, इस श्लोगन का ही असर है कि सुबह-सुबह देश के चक्कर में स्टेडियम का एक चक्कर फटाफट पूरा किया।

        लेकिन मेरे आगे-आगे एक निहायत आम आदमी तेज डग भरता चला जा रहा था। उसके दोनों हाथ भी उसी गति से पेंडुलमायमान थे। उसकी यह कवायद मुझे सनक जैसी लगी क्योंकि वह तो आलरेडी फिट दिख रहा था! मैंने सोचा, शायद देशवासी उसे फिट न मान रहे हों इसलिए वह और ज्यादा फिट होने पर तुला है। उसकी चप्पलों की फटर-फटर में उसकी बेचैनी छिपी थी - भ‌ई मैं भी फिट हूँ, और देश को फिट रखने की कुव्वत रखता हूँ। 

        लेकिन मुझे चिंता हुई - भला इस देश को कभी आम आदमी ने फिट किया है! कहीं उसकी यह कवायद इंडिया को अनफिट करने की तैयारी तो नहीं? सोचकर यकायक मैं भी आत्मावलोकन की मुद्रा में आ गया। फिर तो आत्मविभोर होने की फीलिंग हुई। 

       वाकई, इंडिया को फिट करना आम आदमी के बूते की बात नहीं, हम या हमारे जैसों के ही बस का है। क्योंकि इसके लिए पहले देशहित की फाइलों का नियम-नियामक और कर्ताधर्ता बनकर खुद को फिट करना होता है, मतलब राज-प्रदत्त पौरुष धारण करना पड़ता है! इस पौरुष का अद्भुत प्रभाव मुझे अपने पदचालन में अनुभूत होने लगा -

         शानदार ब्रांडेड स्पोर्ट्स शूज से सुसज्जित मेरे राजपुरुषोचित चरणों की प्रत्येक धमक धरती को यह संदेश देती जान पड़ती थी कि:

        “हे इंडिया की धरती! मैं तो फिट हो चुका, अब तू भी फिट हो ले!!”

        तत्पश्चात देशभक्ति-भाव से लबरेज मुझ जैसे राजपुरुष के चरणों की धमक धरती पर और तीव्र हो उठी।

       सहसा मुझे मोहन राकेश के नाटक "अषाढ़ का एक दिन" में दन्तुल और कालिदास के बीच का एक प्रसंग स्मरित हुआ। 

         दन्तुल का बाण एक मृगशावक को घायल कर देता है। कालिदास उसे बचाने का प्रयास करता है। दन्तुल घायल मृगशावक को सौंपने का आदेश देता है और न मानने पर दंड की धमकी देता है। किंतु कालिदास उसे ही मृगशावक का अपराधी ठहराकर सौंपने से इंकार कर देता है। दोनों के बीच वार्तालाप होता है -

         "दन्तुल : तो राजपुरुष के अपराध का निर्णय ग्रामवासी करेंगे! ग्रामीण युवक, अपराध और न्याय का शब्दार्थ भी जानते हो! 

       कालिदास: शब्द और अर्थ राजपुरुषों की सम्पत्ति है, जानकर आश्चर्य हुआ।" 

       इसी के साथ एक बार फिर मेरी निगाह आसमान की ओर उठी चाँद में अभी चमक बाकी था, इसी नाटक में मल्लिका एक जगह कह रही है -

       "एक दोष गुणों में उसी तरह छिप जाता है जैसे चाँद की किरणों में कलंक ; परन्तु दारिद्र्य नहीं छिपता।" 

        बस फिर क्या था मेरे अंदर का राजपुरुष हँस पड़ा, मन में आया कि उस आदमी के पास पहुँचकर उसे समझा ही दें कि - राजपुरुष जो कहें वही सही होता है, इसलिए मैं जो कहूँ मान लो, मैं तुमसे कहना चाहता हूं -

       “यार तुम्हारी यह कवायद व्यर्थ है, तुम्हारे फिट होने से इंडिया नहीं फिट होने वाला! क्योंकि यह फिट-उट होना बड़े लोगों और उनके ही बस की बातें हैं। देखो, दारिद्र्य नहीं छिपता! इसलिए तुम्हारी यह दौड़ा-भागी इंडिया को अनफिट होने की श्रेणी में डाल देगा…

        तुमको लोग फिट कहें इसके लिए जरूरी है कि पहले मैं फिट हो लूं जिससे इंडिया मतलब अपना देश फिट हो ले, फिर इंडिया के फिट होते ही आटोमेटिक सब फिट मान लिए जाएंगे; जैसे कि तुम भी! इसलिए पीछे हटो मुझे आगे जाने दो। तुम केवल अपनी रोजमर्रा की चीजों जैसे दाल-रोटी पर ही ध्यान लगाओ। यही देश हित में है! समझे न?”

         यह समझाने मैं उसके पीछे लगभग भागा। 

         लेकिन उस तक मैं पहुँचता कि पाथ-वे से उतर वह स्टेडियम से बाहर निकल गया। जैसे मेरे सामने का कोई अवरोध हट गया हो। मैं स्टेडियम का दूसरा चक्कर लगाने लगा।

       खैर आज की टहलाई पूरी कर अपने आवास लौट आया। यहाँ लान की हरी-हरी दूब पर निगाह पड़ी। दूब की कोमलता देख मुझे "अषाढ़ का एक दिन" नाटक की एक और पंक्ति याद आई - 

     "जीवन एक भावना है! कोमल भावना! बहुत-बहुत कोमल भावना!!"  

      कहते हैं कोमल भावनाएं व्यक्ति को ईर्ष्या-द्वेष, लोभ-लालच वश दुर्नीति बनाने से रोकता है। इस विचार से तो मैं डर ही गया कि कहीं इस भावना के प्रभाव में हम फिट होना ही न छोड़ दें!! क्योंकि फिट होने के लिए कोमल नहीं कठोर भावना की जरूरत पड़ती है! 

         इसी समय मोबाइल बजा। पत्नी का फोन था। वे बोलीं - 

        वह जो कामवाली है न, उसका पति जो राजमिस्त्री है उसको सुबह-सुबह पुलिस पकड़ के ले ग‌ई।

         मैंने उत्सुकतावश पूछा - क्यों? 

         पत्नी - अरे कुछ नहीं, दस-बारह लाख की कोई जमीन लिया था, ब्रोकर ने ही पुलिस से पकड़वाया है।

          मुझे थोड़ा अचंभा हुआ कि राजमिस्त्री ने कहीं कोई घोटाला तो नहीं किया, लगता तो बहुत सीधा और आम आदमी जैसा है, ऐसा फरेब तो वह नहीं कर पाएगा। 

         मैंने पूछा - तो कुछ गड़बड़ किया था क्या?

         पत्नी - अरे नहीं, ऐसा कुछ नहीं, पहले इस जमीन के लिए उसकी ब्रोकर से बात हुई, लेकिन फिर सीधे मालिक से सौदा कर लिया। थोड़ा सस्ता पड़ा तो बेचारे ने एक-एक पैसा जोड़कर इसे खरीद लिया! बेचारी कामवाली भी बड़ी दु:खी थी। फोन पर बता करके कहा - दीदी आज काम पर आने का मन नहीं है।

          मैंने - ब्रोकर ने उसे पुलिस से क्यों पकड़वाया?

          पत्नी बोलीं - अरे वही, ब्रोकर को नुक़सान हो गया उसका कमीशन मारा गया, इस बात से वह नाराज था, ऐसे लोग तो पहुँचवाले होते ही हैं. थाने में बेचारे को धमकाया और मारा-पीटा भी गया..! 

        पत्नी की बात सुनकर मैं साइलेंट हो गया.. मेरी चुप्पी पर वे बोलीं -

         पत्नी - “सरकार-वरकार इस अन्याय पर कुछ करती क्यों नहीं?

           मैं - अरे भई, सरकारें हर जगह दुरबीन-उरबीन लेकर तो बैठी नहीं रहतीं कि कहाँ क्या हो रहा है, नजर में आ जाए!

           पत्नी बेचारी चुप और अब मैं भी चुप। इस चुप्पी के बीच ही बातों का सिलसिला टूट गया।

        वह राजमिस्त्री बिलकुल वैसा ही है जैसे आज स्टेडियम के पाथ-वे पर मेरे आगे-आगे चल रहा वह आम आदमी! 

       तो इस फिट-उट वाली बात पर एक बात और - 

        राजपुरुष बड़े कठोर होते हैं, कठोर फ्रेम से जुड़े भी रहते हैं! यही इनकी फिटनेस का राज है!! जैसे राजमिस्त्री को फिट किया गया, वैसे ही ये देश को भी फिट करते रहते हैं!!!

#चलते-चलते 

       फिटनेस का रहस्य हमारी कोमलता में नहीं हमारी कठोरता में छिपा है…

#सुबहचर्या  

1.06.18

रविवार, 12 अप्रैल 2026

नमस्ते

                                 1

         सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर ढक्कन सीमेंट से जाम था। पिछले दस मिनट से वह छेनी और हथौड़े की मदद से इसे मेनहोल से हटाने में जुटा था। ढक्कन के कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे छेनी टिकाता और इसपर हथौड़े से चोट मारता। लेकिन ढक्कन था कि टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा‌ था। पास में खड़ा ठेकेदार रमेसर चुपचाप उसके काम की निगरानी कर रहा था। 

          अचानक रमेसर के 'इस किनारे छेनी लगाओ’ कहने पर उसने दरार पर छेनी टिकाकर एक जोरदार हथौड़ा चला दिया। 

          छेनी छिटककर दूर दूब वाली घास में जा गिरी, इस झटके में उसकी कमीज की जेब से दो सिक्के भी घास में जा गिरे। 

           छेनीवाले को झुककर घास टटोलते देख उन्होंने पूछा, 'छेनी नहीं मिल रही क्या?' लेकिन उसकी बजाय रमेसर बोला उठा, “छेनी तो बड़ी चीज है वह मिल गई है, ये अपना सिक्का खोज रहे हैं।” 

         रमेसर के दो साथी भी चुपचाप खड़े यह देख रहे थे, उसकी मदद के लिए आगे नहीं आए। उनकी ओर देखकर ‘वे’ ने कहा, “इसके मेहनत के सिक्के होंगे, खोजना ही चाहिए।"

        सिक्के मिलते ही छेनीवाला काम में जुट गया। रमेसर ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा, ‘बड़का दिमाग है इसके पास।’ इस मुस्कान में कुछ ऐसा था कि ‘वे’ को लगा, यह ‘बड़का दिमाग’ रमेसर के लिए मुफीद तो है ही, स्वयं छेनीवाले के लिए भी है। उनकी नजरें छेनीवाले पर गड़ गई।

         मोटे कपड़े का मटमैली कमीज, ऊपर धूसर-सी फटी सदरी, ढीली-ढाली पैंट, जैसे इन कपड़ों ने महीनों से पानी न देखा हो। पैरों में चप्पल नहीं, सिर पर घने उलझे बाल, जिन्हें शायद ही कभी कंघी ने छुआ हो। 

          लेकिन काम में उसकी तल्लीनता देख ‘वे’ उसके इस हुलिए से उसके मिजाज का अंदाजा नहीं लगा सके। रमेसर से कुछ पूछने को हुए, लेकिन वह भी छेनीवाले के काम पर ध्यान लगाए था।  

          छेनी पर पड़ते हथौड़े की चोट से ढक्कन हिल उठता। इसे ढीला हुआ सोचकर, रमेसर ट्रैक्टर के टूल बॉक्स से रम्मा निकाल लाया। लेकिन इसका एक सिरा अभी भी मेनहोल से जाम था। उसने इस सिरे पर और छेनी चलाने के लिए कहा।

         कुछ देर बाद ढक्कन चारों ओर से ढीला पड़ता दिखा, तो रमेसर ने छेनी रुकवा दी। फिर रम्मा अड़ाकर ढक्कन का एक सिरा उठाया और छेनीवाले से बोला, “अब इसे मेनहोल से हटा दो।” 

          ‘वे’ को अचरज हुआ कि पास में ही खड़े अपने अन्य दो साथियों से रमेसर ने ढक्कन हटाने के लिए क्यों नहीं कहा! 

           आखिर छेनीवाले ने ही ढक्कन दूसरी ओर उलट दिया। पूरा मेनहोल खुल गया। इसमें झांककर रमेसर ने कहा,

         'अरे! कीचड़ तो कम है, पानी ज्यादा है।’

        "तो सेप्टिक-टैंक में जमा मल ही रमेसर की व्यावसायिक भाषा में 'कीचड़' है!" 'वे' के लिए यह न‌ई बात थी।

         उत्सुकतावश उन्होंने भी मेनहोल में झाँका, तली पर जमा मल सचमुच कीचड़ जैसा ही दिखाई पड़ा।

         इसी समय छेनीवाला टैंकर का सक्शन-पाइप मेनहोल की ओर खींचकर ले आ रहा था। जबकि दूसरा साथी वैक्यूम पंखा चलाने के लिए ट्रैक्टर स्टार्ट करने लगा।      

          रमेसर ने बढ़कर पाइप अपने हाथ में लेकर इसे सेप्टिक-टैंक में उतारा। उधर वैक्यूम फैन चालू होते ही पाइप से पानी सुड़कना शुरू हो गया। 

        अब तक सांझ भी स्याह हो चली थी। बल्ब की रोशनी में रमेसर का चेहरा साफ पढ़ा जा सकता था। वह मेनहोल पर झुका था। उसकी शांत और गंभीर मुखाकृति देखकर ‘वे’ ने सोचा -

          'चार लोगों की टीम में छेनीवाले के अलावा एक रमेसर ही है जिसने सक्शन-पाइप छुआ! वह टीम लीडर भी है, पाइप किसी को भी पकड़ा सकता है, पर हो सकता है दूसरे लोग इसे छूने से कतराते हों।'

                             2

       इधर इस कीचड़ को देखते हुए रमेसर के सामने सेप्टिक-टैंक का मेनहोल नहीं, जैसे स्मृतियों की सुरंग खुल गई हो! 

         "दद्दा की बाल्टी में यह ‘कीचड़’ कुछ और ही रंग में होता। वे रोज़ सुबह नौ बजे बाल्टी, झाड़ू और टिन लेकर ब्लॉक की कॉलोनी निकल पड़ते। एक दिन जिद करके मैं भी उनके साथ हो लिया। मेरा साथ चलना दद्दा को अखर रहा था; उन्होंने मुझे पुचकारकर रोकना भी चाहा, पर मैं नहीं माना। तब मेरी उम्र कोई चार–पाँच साल रही होगी।"

      ...उस दिन दद्दा पहले एक बड़े क्वार्टर के पीछे की ओर गए। वहां नींव के ऊपर दीवाल पर लोहे का एक ढक्कन लटक रहा था। दद्दा ने इसे उठाया। यहां आले जैसा एक चौकोर गड्ढा था। उसमें यही 'कीचड़' पीले रंग के ढेर में जमा था। 

          ....दद्दा ने मुड़े टिन से उस पीले मैले के ढेर को बाल्टी में भर लिया फिर आले को झाड़ू से साफ भी किया। यह मुझे बहुत अजीब लगा, लेकिन दद्दा एक-एक कर सभी क्वार्टरों पर जाते ग‌ए। धीरे-धीरे उनकी बाल्टी उसी पीले मैले से भर गई, जिसे दूर झाड़ियों में जाकर खाली कर आए थे।

           ....इस काम के दरमियान न दद्दा बोले, न मैंने कुछ पूछा; बस चुपचाप उन्हें यह काम करते देखता रहा। लेकिन बाल्टी खाली करके लौटे तो एक पल के लिए दद्दा ने मुझे घूरा। आज भी याद है, दद्दा की उन आँखों में जैसे नाराजगी थी। मुझे लेकर वे सीधे हैंडपंप पर आए। अपने सभी सामान धोए फिर नहाए और मुझे भी नहलाए। फिर मैं कभी दद्दा के साथ कॉलोनी की ओर नहीं गया।"

         इसके काफी दिन बाद मैंने दद्दा से कहा भी था, 

        “दद्दा मुझे घिन आती है, मत करो यह काम।” 

       “इसमें क्या घिनाना! यह तो हमारा कर है यही रोजी है” दद्दा ने यही बोलकर तब मुझे चुप करा दिया था।

            रोजी तो मैंने भी सीवर में कूदने वाला ही चुना था बल्कि इसके लिए सीवर के काले गंधाते पानी वाले नाले में झम्म से कूदा भी, जो नहीं कूदे वे सब ऊँच-नीच वाले थे… केवल मुझे ही यह नौकरी मिली जैसे कि इस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो!

          ख्यालों की डोर टूटी। “अब यही अपना काम..अपनी मशीन और अपना धंधा..“ इस भाव से रमेसर ने अपने ट्रैक्टर-टैंकर की ओर ऐसे देखा जैसे दद्दा की ‘रोजी’ से अपनी ‘रोजी’ की तुलना कर रहा हो! 

             पास में खड़े ‘वे’ कुछ जाने-पहचाने लगे तो चालीस वर्ष पुरानी धुँधली-सी अपनी स्मृति में उतर गया-

         “तब ये घर कच्चे होते, दद्दा इन घरों में त्योहारी लेने आते। कभी-कभी उनके साथ मैं भी होता। शायद ‘वे’ को तभी देखा हो। आज यहां इनके बराबर खड़ा मैं इनसे सौदेबाजी कर रहा हूँ तो अपने इसी खुद के ‘रोजी’ के बल पर…!”

            अगर अम्मा जबर्दस्ती स्कूल न भेजतीं तो आज मैं यहां इस तरह खड़ा न होता। वह यही तो कहतीं थीं कि 'तुम्हारे दद्दा और पप्पा तो करिया अक्षर हैं, तभी वे मैला ढोते हैं, मुला तुम खूब पढ़ना।

            मेरा स्कूल और घर, एक ब्लॉक के कैंपस में था।

        बीडीओ ऑफिस के पीछे एक छोटी सी कोठरी ही मेरा घर था और वह भी जर्जर। उसके सामने टटिया खड़ी कर दद्दा ने घेर बना लिया था, इसी में उनकी झोपड़ी थी। जिसमें वे अपनी गैया के साथ रहते थे।

        त्योहारों की छुट्टियों में यहां सन्नाटा पसर जाता। तब मेरे भी घर चलने की जिद्द पर अम्मा कहतीं, यही हमारा घर है।      

        लेकिन कक्षा पांच में जाकर पता चला कि आजादी के बाद पहले यह विकास खंड बना, फिर स्कूल, तो मैं चौंक पड़ा था‌। 

           उस दिन कक्षा में पीछे, सबसे अलग-थलग बैठा मैं, अचानक पंडी जी से पूछ बैठा था - 

           ‘तब मेरा घर भी यहाँ नहीं था न?’ 

        इस पर कक्षा में सब हँसे थे, जैसे कोई ऊल-जलूल बात कहा हो मैंने। पंडी जी भी मुझे घूरने लगे तो मैं सहम गया था। वे फिर यही बोले थे,

          “हाँ यहां नहीं था।”

         आज सोचता हूं, वह सवाल कैसे पूछ लिया था! तब हमारी जाति में जन्मे बच्चे परली बात सोच ही नहीं सकते थे! जो है, उसे ही सच मानकर जीना सिखा दिया जाता था। 

          घर को लेकर मन में उत्कंठा थी। स्कूल से लौटने के बाद दद्दा को देख मैं उनकी ओर लपका कि चलकर पूछूं। पर उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक गया। 

        दद्दा यह काम सुबह ही निपटा लेते हैं, सोचकर चुपचाप लौटकर हैंडपंप के पास आ खड़ा हुआ। 

          दद्दा भी वहीं आए। सारा सामान नल के नीचे रख दिया। मैं हैंडपंप चलाने लगा। वे एक-एक करके उन्हें धोने लगे थे। मैंने उनके चेहरे पर बेचारगी भरी मायूसी देखा। वे किसी कारण सुबह यह काम नहीं कर पाए थे, इसके लिए साहब ने उन्हें तिरस्कृत कर डांटा था। 

          दद्दा ने ही बताया था कि वे तब तेरह-चौदह साल के थे जब अपने बप्पा बद्दन के साथ सीमा पार करके आए थे। वहाँ उन्हें नाली-सीवर से छुटकारा नहीं मिला, उल्टे रस्मोरिवाज निभाना भी मुश्किल था। लेकिन यहां भी वही काम उनका इंतजार कर रहा था।

           चार बरस दिल्ली में रहने के बाद यह ब्लाक बना तो यहां आ ग‌ए।

         फिर दद्दा ने कोठरी की ओर इशारा करके इतना कहा था - 

           'तबसे यही हमारा घर है।’

          टैंक से उठती 'सुड़-सुड़' की आवाज ने ख्यालों की परत हटा दिया। रमेसर ने देखा, टैंक में पाइप के मुहाने के नीचे पानी उतर रहा है।

       रमेसर ने ‘वे’ को मेनहोल में झाँकने का इशारा करके बोला, “टैंक में पानी चार फीट उतर चुका है। एक टैंकर फुल हो गया दूसरा चक्कर भी होगा..दो टैंकर सीवर था इसमें।” विश्वास दिलाने के लिए 'वे' को टैंकर का पारदर्शी संकेतक भी दिखाया।  

        इशारा पाकर छेनीवाले ने टैंकर का नोजल बंद किया और रमेसर ने सेप्टिक-टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाला। वह टैंकर खाली करने पास के खेत की ओर बढ़ा ही था कि 'वे' ने टोक दिया कि "इसमें मत गिराना, खेत मालिक नाराज होंगे।" 

          रमेसर को बचपन की वह बात याद आई, जब दद्दा से उसने पूछा था, 

         “दद्दा, वहाँ तो सब लड़िकन खेलने जाते हैं…बाल्टी वहाँ क्यों खाली किए? जानते हैं, हमारी गेंद भी वहीं चली गई थी, विज्जू गेंद लेने गया तो उसका पैर छपाक से उसमें पड़ गया, इसे वहाँ न डाला करिए‌।”  

           वे पल भर ठहरकर बोले थे -

         “बचवा, कहां गिराऊँ? यहाँ तो कोई जगह भी नहीं। एक बार उस खेत के कोने में बाल्टी उलट दी थी तो खेत-मालिक ने जी भर के गरियाया था।" 

           यह सुनते ही मेरा रोयां-रोयां सुलग उठा था.. फिर उनकी ओर देखा था। 

          उनके बूढ़ाते शरीर पर पीढ़ियों की बेइज्जती का बोझ साफ झलकता था। जैसे उनका मन हर बात से उचट गया हो, उन्हें देखकर लगा जैसे वे कहना चाह रहे थे - "जिंदगी ने सब सहना सिखा दिया है।"

          इसे याद करते ही रमेसर की मुट्ठियां भिंच ग‌ईं। मन में गुस्से से भरी एक टीस उभरी..

        "हूँ... खेत मालिक नाराज होंगे!" बुदबुदाकर मन में उठे गुस्से को जज्ब किया। फिर कठोर स्वर में यह बोलकर कि - 'खेत के लिए यह खाद ही तो होता' टैंकर लेकर अँधेरे में दूसरी दिशा में बढ़ गया।

                              3      

       सीवर गिराकर टैंकर लौटा तो इसके नोजल में छेनीवाले ने सक्शन-पाइप फिर जोड़ दिया। रमेसर ने पाइप को हाथ में लेकर मेनहोल में झाँका। बल्ब की रोशनी उसमें नहीं पहुँच रही थी। फिर मोबाइल फोन का टार्च ऑन करके देखा। भीतर 'सीवर' का गाढ़ापन उभर आया।

        ऐसे ही गाढ़े सीवर में पप्पा बेहिचक उतर जाया करते थे! यह स्मरण होते ही रमेसर की आँखें सजल हो आईं।      

         सक्शन-पाइप हाथ में लेते ही भीतर कहीं कुछ चुभ उठता है, पप्पा सामने आ खड़े होते हैं! 

        फ़िर वह पाइप तब तक नहीं छोड़ता, जब-तक ‘कीचड़’ पूरी तरह बाहर न आ जाए। 

         उस क्षण पाइप पर हाथ की पकड़ और भी कस उठती है- मानो वह पप्पा की अधूरी लड़ाई पूरी कर रहा हो।

         उस जमाने में यह मशीन नहीं थी। वे खुद सेप्टिक टैंक में उतरते। यह गाढ़ा ‘कीचड़’ बाल्टियों में भर-भरकर बाहर निकालते। उनका पूरा शरीर उस कीचड़ में लथपथ हो जाता।

          पप्पा यह नौकरी नहीं करना चाहते थे, पर दद्दा इसे पुश्तैनी काम मानते। इससे पप्पा चिढ़ते, बेचैन हो उठते और घुटते। शहर में दिहाड़ी की तलाश में निकल जाते, पर वहां भी न टिकते; वापस आकर घर पर ही चुपचाप पड़े रहते। 

           एक बार अम्मा से पप्पा को कहते सुना था - 

         “क्या कीचड़ में लिथड़ी इस पुश्तैनी जाति को उतारकर हम फेंक नहीं सकते?” 

          पप्पा के इस बात का अर्थ मुझे बाद में समझ में आया कि जाति आदमी का भविष्य भी लिख देती है! वे मजदूर भी नहीं बन पा रहे थे। पुश्तैनी पेशा आड़े आ जाता।

          एक दिन दद्दा गाँव से त्योहारी लेकर लौटे थे। उनकी गठरी में ढेर सारी पूरियां-कचौरियां और खाने की चीजें देखकर पप्पा गुस्से में बोले थे - 

         'यह भिखमंग‌ई ठीक नहीं बाबा, इससे अच्छा तो फिर मैला ढोने का काम है.. कम से कम इसमें कुछ करके तो कमाना है।' 

           मैंने देखा था… दद्दा गाँव के ‘बड़े’ घरों की देहरी पर बारी-बारी जाकर खड़े होते; भीतर से कोई निकलता और दूरी बनाकर उनकी चादर में ऊपर से ही त्योहारी डाल देता। लोग उनकी चादर छूने से भी कतराते।

              पप्पा की बात पर दद्दा ने ऐतराज नहीं जताया। लेकिन बोले थे -

       “देख दिन्ने, यह भिखमंगाई नहीं, इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना होता है। यदि दिखाई न पड़ूं तो लोग पूँछने लगते हैं.. दिन्ने! एक बात और! गाँव के लोग शादी-ब्याह पर मुझे नेग-चार देना नहीं भूलते!” 

        दद्दा और पप्पा, दोनों की बातें दो छोर की होती। इनके बीच मैं एक अजीब द्वन्द्व में फंस जाता।

        एक दिन निठल्लेपन से ऊबकर पप्पा स्वीपर बनने शहर चले ग‌ए। एक सफाई ठेकेदार ने उन्हें अपनी टीम में रख लिया।”

          सीवर में उतरने का अपना अनुभव पप्पा कुछ ऐसा ही अम्मा को बताते - 

          “जब सीवर में घुसता हूँ तो तिलचट्टों से घिर जाता हूँ ये मेरे शरीर पर दौड़ने लगते हैं!” 

            शायद स्वप्न में भी ये तिलचट्टे उन्हें अपने शरीर पर रेंगते दिखाई पड़ते इसीलिए कभी-कभी रात में सोते से अचानक उठकर वे अपना शरीर झाड़ने लगते!! 

           यही नहीं वे बार-बार अपना हाथ धोते, टोकने पर अम्मा से कहते - 

           “क्या करूँ..मेरे हाथों में जैसे मैले की बदबू आती रहती है, इसीलिए बार-बार हाथ धोना पड़ता है!”

        उन दिनों डाक्टर ने उन्हें सीवर में उतरने से मना किया था। लेकिन “आज एक बड़े सेप्टिक टैंक की सफाई होना है, न जाने पर ठेकेदार नाराज होगा” कहकर वे सुबह-सुबह शहर चले ग‌ए थे। 

          उस दिन पप्पा नहीं, उनका शरीर लौटकर घर आया। मैं स्कूल से लौट रहा था। घेर के सामने कुछ लोग खड़े थे। सबके चेहरों पर एक अजीब-सी खामोशी थी। मुझे अनहोनी की आशंका हुई। घबड़ाहट में भागते हुए मैं घेर में पहुँचा। वहां पप्पा जमीन पर लेटे थे और अम्मा उनके सिरहाने बैठी थीं..

          कुछ समझता कि दद्दा ने मुझे कसकर अपने अँकवार में भर लिया, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। उधर अम्मा की रुलाई फूट पड़ी थी।

         कहते हैं कि सेप्टिक-टैंक में उतरते ही पप्पा बेहोश हो ग‌ए थे। कुछ देर बाद जब अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्हें देखने एक साथी उतरा.. वे भी वहीं बेहोश हो ग‌ए। 

        ऊपर खड़े लोग शोर मचाते रहे.. लेकिन ठेकेदार वहां से खिसक लिया था। 

       जैसे-तैसे दोनों को बाहर निकालकर अस्पताल ले जाया गया। 

          पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

        दद्दा और अम्मा थाना-कचहरी खूब दौड़े… पर न मुआवजा मिला, न किसी पर दोष आया।

       ....घेर का दृश्य देख मैं जड़वत खड़ा रह गया। अम्मा का रोना और दद्दा के आँसू, सब देखता रहा। पप्पा के पहने हुए कपड़े सीवर के कीचड़ में सने उनके निर्जीव शरीर से अब भी चिपके थे। मेरी आँखें डबडबा आईं, पर मैंने उन्हें बाँह से पोंछ लिया। रोया नहीं।

                               4

          इस गाढ़े कीचड़ का सुड़कना अब मुश्किल है, सोचकर उसने ‘वे’ से एक बाँस मंगाया।

          रमेसर ने बाँस हाथ में लिया। उसने छेनीवाले को पंप चालू करने का इशारा किया और पाइप मेनहोल पर टिका दिया। पंप चालू होते ही पानी टैंक में गिरने लगा। 

          रमेसर ने बांस से टैंक के भीतर जमे हुए गाढ़े कीचड़ को हिलाना शुरू कर दिया। ताकि पानी में घुलकर यह आसानी से खिंच सके।

         तभी सक्शन-पाइप के मुहाने के पास कपड़ेनुमा कोई चीज दिखाई पड़ी। वह पाइप में न फँसे, इसलिए रमेसर ने उसे बाँस से दूर हटा दिया। छेनीवाले ने उसके हाथ से बाँस ले लिया और उसके सहारे उस कपड़े को बाहर निकाल दिया। 

         छेनीवाले के हाथ और पैर सीवर की कीचड़ में सने थे। यह देखकर ‘वे’ ने रमेसर से कहा, “यह छेनीवाला तो बहुत कामकाजी है?

         कुछ पल सोचने के बाद स्थिर और संयत आवाज में रमेसर बोला, 

          देखिए, यह काम और जाति, एक ही रस्सी में बँधे हैं। शुरू में ट्रैक्टर चलाने के लिए कोई ड्राइवर तक न मिलता। एक लड़का मिला भी, पर पाइप न छूने की शर्त पर!

          ऐसे में, पाइप को जोड़ने से लेकर सेप्टिक-टैंक में उतारने और काम के बाद उसे धो-पोंछकर समेटने तक, सारा काम मुझे ही करना पड़ता। 

           फिर वह छेनीवाले की ओर देखकर मुस्कुराते हुए बोला-

           "यदि यह न मिलाता तो सेप्टिक-टैंक सफाई वाला मेरा यह धंधा परवान न चढ़ता… पहली नजर में मुझे यह पागल ही लगा था। 

         गाँव की बस्ती से दूर सीवान में एक कमरे की, झोपड़ीनुमा इसकी कोठरी देख, मैंने केवल यही पूँछा था इससे- 

            "यहाँ बस्ती से दूर अकेले में घर क्यों बनाया?" 

             यह छूटते ही बोला था - 

         “मेरी कोई जाति नहीं इसलिए... और खुशी-खुशी मेरे साथ काम करने के लिए तैयार हो गया था।

         पहले ही दिन छेनी-हथौड़ी पकड़ाकर इससे मेनहोल का ढक्कन खुलवाया था। बिना झिझके इसने वे सारे काम किए जिसे आज यहाँ कर रहा है। 

          काम समाप्त करके हम लोग चलने को हुए तो इसने बख्शीश मांगा। तभी इसके बड़के दिमाग के बारे में मुझे पता चला। यह बख्शीश मांगने वाली बात कभी मेरे मन में आया ही नहीं। पैसे की बात पर यह बहुत चैतन्य हो जाता है। उसी दिन से यह 'छेनीवाला' बन गया। 

            बात पूरी होते ही रमेसर ने 'वे' से कहा - 

        "यह छेनीवाला न, आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है, इसीलिए इसे आदमियों की बस्ती से दूर घर बनाकर रहना पड़ता है!" 

                                       5     

         रमेसर के मुँह से छेनीवाले के लिए गूढ़ बात सुनकर ‘वे’ ने उसे गौर से देखा, जैसे उसके जीवन की कहानी जानना चाहते हों-

         वही बिखरे बाल और ढीले-ढाले कपड़े… चेहरे पर एक अजीब-सी निस्पृहता…!  

          अचानक रमेसर बोला, 

          “मैं इसकी दुखती रग को ज्यादा कुरेदता तो नहीं हूं.. पर लोगों से सुनी-सुनाई बात है…”

        पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटा था.. माँ-बाप के अतिशय लाड़-प्यार के तरीके ने इसे बिगाड़ दिया.. स्कूल-उस्कूल का मुँह नहीं देखा। दिमाग का खुलना बाकी रह गया…

       छेनीवाला बाँस हिला-हिलाकर सेप्टिक-टैंक में कीचड़ घोलने में जुटा था। उसकी ओर देखकर रमेसर ने फिर कहा, 

        “लोग ‘बऊक’ समझकर इसकी हँसी उड़ाते; विवाह भी न हो सका। माँ-बाप भी दुनियां से कूच कर गए.. फिर अपने ही घर में पराया हो गया.. उपेक्षित-सा.. भाइयों ने इसके हिस्से की जमीन भी अपने नाम करा लिया।”

          तभी टैंक से सर्र-सर्र की आवाज आई। छेनीवाले ने बाँस एक ओर रखा और पाइप का मुहाना तली तक ले जाकर उसे इधर-उधर चलाने लगा। रमेसर भी उसके पास चला आया। 

         अब दोनों बारी-बारी एक-दूसरे से पाइप अपने हाथ में लेते और टैंक में बचा-खुचा सीवर सुड़कवाने लगे!

          ‘वे’ ने देखा,

         छेनीवाला बिना झिझक पाइप के कीचड़ से सने हिस्से पर हाथ लगा देता; वहीं रमेसर इसे ऊपर से ही पकड़ता, मानो कीचड़ से बचना चाहता हो। फिर भी दोनों का तालमेल ऐसा था, जैसे एक ही देह के दो हाथ हों। 

          रमेसर ने छेनीवाले को कुछ समझाकर पाइप उसके हाथ में थमाया और फिर 'वे' की ओर मुखातिब हुआ -  

         “फिर एक दिन यह कहीं चला गया.. किसी ने कोई खोज-खबर नहीं ली… और जब वर्षों बाद लौटा तो एक कूबड़ वाली स्त्री को साथ लेकर…”

        इधर छेनीवाला टैंक से पाइप बाहर निकालने लगा। लेकिन वह अपने काम में ऐसे मगन था जैसे उसकी नहीं, किसी और की बात चल रही हो..

       ..अपने ही घर के दरवाजे नहीं खुले इसके लिए.. लोग हँसते..क‌ई दिन गाँव में भटका… जाति निकाला दे दिया इसको.. गाँव के बाहर जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा मिला.. जिसमें कोठरी बनाया.. उस स्त्री के साथ वहां रहने लगा….

          थोड़ी देर की चुप्पी के बाद रमेसर ही बोला,

        “लेकिन जैसा इसे देख रहे हैं न, यही बात इसके लिए ढाल बन गया.. इसे टूटने नहीं दिया… अच्छा ही है कि यह आदमियों की बस्ती में नहीं रहता।" 

      यह कहकर रमेसर अचानक चुप हो गया। ‘वे’ कहीं छेनीवाले की जाति न पूछ बैठें, इस आशंका में बात को मोड़ते हुए बोला, 

         "बात यह कि बस्ती में रहता तो आदमियों के बहकावे में आ जाता...सौदेबाजी सीख जाता।" 

         उधर छेनीवाला टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाल चुका था। इसे एक किनारे रखकर धो रहा था।

       'वे' ने मेनहोल में झुककर देखा, गाढ़ा कीचड़ पानी में घुलकर लगभग खिंच चुका था; तली में बचा पानी पाइप की पकड़ में अब नहीं आने वाला था। 

          फिर उनका ध्यान रमेसर के दोनों साथियों पर गया, 

         दोनों पूरे समय वहीं मौजूद रहे, लेकिन न तो उन्होंने पाइप को हाथ लगाया, न ही इसे धोने में छेनीवाले की मदद की। 

           उनके मन में प्रश्न उभरा,

         यहां काम की या फिर जाति की, क्या कोई एक अदृश्य रेखा है जो उन्हें एक-दूसरे से अलग किए हुए है? 

        उनकी नजरें रमेसर पर ठहर गई- मानो इन बातों का मर्म टटोल रही हों।  

        छेनीवाले पर बात थम गई थी। रमेसर मन ही मन बुदबुदाया -

         “यह कितना अजीब है..छेनीवाले की जाति जानकर लोग उसके साथ सहज हो जाते हैं और एक हम हैं, हमारे लिए वही पुराना भाव, चाहे यह दबा हुआ ही हो, पर उभर तो आता ही है…हाँ…पप्पा! उस जमाने में कितना झेले होंगे….”  

                              6

         अचानक रमेसर ने ‘वे’ को एक तरफ चलने के लिए कहा। वह उन्हें एक अँधेरे कोने में ले गया। वहां जमीन की ओर इशारा करके उन्हें कुछ दिखाते हुए धीरे से बोला, 

         "देखिए, इसे मैंने यहाँ एक किनारे रखवा दिया है। सोचा, आपको बता दूँ, नहीं तो अनजाने में कोई इसे हाथ लगा देता। सुबह किसी से कहकर इसे फिंकवा दीजिएगा।”

       ‘अरे! यह तो वही कपड़ा है...सेप्टिक-टैक से निकला, सीवर में लिथड़ा हुआ...तो इसे यहाँ रखवाया था रमेसर ने! छेनीवाले से इसे कहीं दूर भी तो फेंकवा सकता था!’ 

          उस कपड़े को लेकर रमेसर का यह वर्ताव ‘वे’ को कुछ विचित्र लगा। वे उस कपड़े को देखते हुए मौन रहे।

          रमेसर ने ‘वे’ को नजर भर देखा! वे अपने विचार में खोए हुए-से उसी कपड़े को देख रहे थे।  

          वह पोर्टिको की ओर चला गया जहां बाबू जी कुर्सी पर बैठे थे। उनसे काम का हिसाब किया। छेनीवाला भी अपने हाथ-पैर धोकर वहीं आया। उसे बख्शीश लेना था। यह उसे मिला, जो उसकी अपेक्षा से ज्यादा था। इससे रमेसर और वह, दोनों खुश हो ग‌ए थे।

         यकायक रमेसर ने छेनीवाले को सीवर में लिथड़े उस कपड़े को फेंक आने के लिए कहा। शायद यह प्रतिमूल्य था अतिरिक्त बक्शीश मिलने का और इसमें रमेसर की खुद्दारी भी छिपी थी। 

           ‘वे’ समझ चुके थे कि छेनीवाले के लिए रमेसर ने ‘बड़का दिमाग’ वाली बात यूँ ही नहीं कहा था। यह उस भाव की पहचान थी, जहाँ आदमी अपने मूल्य को जानता है। 

         और वह केवल अपना ही नहीं, उसके हिस्से की गरिमा की भी रक्षा कर रहा था। अन्यथा, उस सीवर में लिथड़े कपड़े को वह पहले भी उससे फिंकवा सकता था। लेकिन तब रमेसर का ठहर जाना उस अदृश्य हीनता के विरुद्ध एक छोटा-सा प्रतिरोध था, जो खुलकर नहीं… भीतर ही भीतर लड़ा जाता है। इसमें बदला नहीं बदलाव की बात थी।

           रमेसर काम समेटकर जाने को हुआ तो अचानक मुड़कर नमस्ते कर गया। ‘वे’ ने भी प्रत्युत्तर में नमस्ते कहा, पर उनके भीतर वही कपड़ा अब भी कहीं अटका हुआ था।

          अँधेरे में, ज़मीन पर पड़ा वह कपड़ा अब उन्हें मात्र एक परित्यक्त वस्तु नहीं लगा..वह जैसे एक अनकहा विचार बनकर उनकी आंखों में ठहर चुका था।

                                *******             

        

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

शीशे के उस पार

       शीशे के पार से नाई की दुकान में झांका। दो कुर्सियों पर दो लोग बैठे थे। शायद दोनों गपशप में मशगूल थे। उधर बेंच पर कोई अन्य व्यक्ति नहीं दिखाई पड़ा। इससे तसल्ली हुई कि समय बचा, नंबर नहीं लगाना पड़ेगा। दुकान में दाखिल हो रहा था कि ‘नमस्ते साहब’ सुनाई दिया। यह सोचकर कि इस दुकान का मालिक जो स्वयं एक कुर्सी संभालता है, उसने मुझे नमस्कार किया है, मैंने भी प्रतिउत्तर में तुरंत उसे ‘नमस्कार’ बोला और फिर उसकी ओर देखा। लेकिन यह मालिक-नाई नहीं था। फिर भी इसका चेहरा खूब जाना-पहचाना लगा। मैं दूकान के अंदर आया। दूसरी कुर्सी पर बैठा नाई उठ खड़ा हुआ। उसने कटिंग के लिए मुझे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। कुर्सी पर बैठने के बाद मैंने नमस्कार करने वाले व्यक्ति के चेहरे को ध्यान से देखकर अपनी यादों को खंगालने लगा कि आखिर यह शख्स कौन है जो मुझे जानता है। तभी अचानक उसने मुझसे कहा, “साहब, जबसे मैं देख रहा हूँ आप बाहर-ही-बाहर नौकरी कर रहे हैं कभी आप लखनऊ नहीं आए।” मैं कुछ बोला नहीं लेकिन मन ही मन उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था। उसने फिर कहा, “साहब, एक फार्म भर कर दे दीजिए जहां चाहें वहां मैं आपका ट्रांसफर करवा दुंगा।” उसकी बात पर मैं मुस्कुराया। यह सोचकर कि यह व्यक्ति मेरा इतना हितैषी है अपने पूरे मन-मस्तिष्क को उसे पहचानने पर लगाकर मैंने उससे कहा, “यह नौकरी है जब तक इसमें हम हैं क्या दूर क्या पास।” उसने नाई से मेरा मकान नंबर बोलकर बताया कि मेरा घर यहाँ है। उसकी इस आवाज ने जैसे मुझे जगा दिया हो! अचानक मुझे याद आ गया कि यह तो मेरा अख़बार वाला है, जो सुबह घर पर अखबार फेंक कर जाता है। दरअसल मेरी एक कमजोरी है, किसी चेहरे को तत्काल ‘रिकग्नाइज’ न कर पाना। इसमें कभी-कभी मुझे कुछ क्षण लग जाता है। दूसरे, वह इस नाई की दुकान पर मिलेगा इसकी मुझे कल्पना नहीं थी, इसलिए भी उसे पहचानने में मुझसे देरी हुई। यह व्यक्ति पिछले 19 वर्षों से मेरे घर पर अखबार देता आ रहा है। गाहे-बगाहे इससे मुलाकात हो जाती है। लेकिन इन बीस वर्षों में भी इस व्यक्ति में कोई खास बदलाव मुझे नहीं दिखाई पड़ा। नाई से बतियाते हुए वह मेरे घर के आस-पास के घरों का परिचय देने लगा। 

      नाई मेरे बालों की कटिंग शुरू कर चुका था। इस बीच उन दोनों को आपस में घुल-मिलकर बातें करते देख मैंने नाई से उसके गांव के बारे में पूँछ लिया। उसका घर लखनऊ और अमेठी जिले की सीमा पर स्थित किसी गाँव में था। उसने कहा कि बच्चों की पढ़ाई के लिए वह शहर आ गया है क्योंकि शहर में बच्चों के पढ़ाई की सुविधा है। यहाँ वह पचास प्रतिशत प्रति कटिंग मालिक को देता है। जबकि गाँव में उसकी खुद की दुकान थी। बीस वर्षों तक उसने यह दुकान चलाया था, बल्कि उस दुकान में उसका भाई भी काम करता था। लेकिन गाँव में यह दुकानदारी उसे रास नहीं आई। गाँव में किसी एक बिरादरी का बोलबाला था जबकि वहाँ पर उसकी बिरादरी के मात्र दस प्रतिशत घर थे। उसकी दुकान पर लोग कटिंग या दाढ़ी बनवाने के बाद उधारी करके चले जाते थे। धीरे-धीरे यह उधारी एक लाख रुपए से अधिक की हो चुकी थी। मैंने उससे पूँछा, यह उधारी क्यों मान जाते थे? उसका कहना कि क्या करें, लोग पहले दाढ़ी-बाल बनवाते और पैसा मांगने पर कह देते खेत से सीधे चले आए हैं, पर्स पैंट में छूट गया है या पर्स उस वाले पैंट में रह गया या भूल ग‌ए, बाद में पैसा दे देंगे। गाँव का मामला होता तो पैसा लेने के लिए जोर भी न दे पाते। फिर नाई ने कहा ऐसा व्यवहार और उधारी कब तक चलता, दिन भर की मेहनत उधारी में चली जाती थी। इसलिए भी मैंने शहर का रुख कर लिया।

       उसकी बात सुनकर जब मैं अफसोस जताने लगा तो उसने कहा,

      "ऐसी बात मेरे ही साथ नहीं थी। वहाँ क‌ई अन्य नाई की दुकानें और भी थी जो बेचारे उधारी पर दुकान चलाते थे। एक दुकानदार बेचारा ऐसा था कि उसके दुकान पर यह उधारी डेढ़ लाख रुपए तक पहुँच गई थी। इस उधारी को उसने एक कापी पर लिख रखा था, एक दिन मैंने उसे वह कापी जलाते हुए देखा। ऐसा करने से उसे रोकते हुए मैंने उससे पूँछा कि इसे क्यों जला रहे हो, इससे तो तुम्हारा पैसा डूब जाएगा…तो वह कहने लगा, नहीं इस उधारी की कापी को जला देना ही मेरे लिए ठीक है, क्योंकि इसे देखकर मेरा टेंशन बढ़ता है।” 

          कटिंग पूरी हुई मैंने पैसे दिए और घर की ओर पैदल चल पड़ा। मुझे गाँव की इस तस्वीर में एक स्याहपन नजर आया‌। इस देश के गाँव भारत को विकसित बनाने के लिए अभी तैयार नहीं हैं, अभी बहुत कुछ बदला जाना बाकी है।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

वह बातूनी टैक्सी ड्राइवर!


        सामने ही बस अड्डा था। जहाँ से लखनऊ के लिए मुझे बस पकड़ना था। मोबाइल का स्क्रीन ऑन किया। समय देखा, रात का सवा दस बज चुका था। बस अड्डे पर अभी भी चहल-पहल थी। काफी संख्या में यात्री अपने गंतव्य की बस की प्रतीक्षा में इधर-उधर खड़े थे। जिनके चेहरों पर प्रतीक्षा की हलकी सी व्यग्रता थी। दो बसें रवानगी के स्थान पर खड़ी थीं। इनमें से कोई एक बस लख‌न‌ऊ जाएगी, मैंने सोचा। तभी एक कंडक्टर ने आवाज लगाई -’लखन‌ऊ जाने वाले यात्री इस बस में बैठें।’ इतना सुनते ही जहाँ-तहाँ खड़े लोगों में हलचल सी हुई, लोग बस की ओर लपक पड़े। देखते-देखते बस के दरवाजे पर भीड़ जमा हो ग‌ई। बस में सीट सुरक्षित कर लेने की होड़ में दरवाजे पर लोग धक्का-मुक्की शुरू कर दिए। 

       यह दृश्य देख मेरी निगाह अनायास ही सड़क के उस पार स्थित टैक्सी स्टैंड की ओर उठ गई, जो बस‌-अड्डे से अधिक दूर नहीं था। पर वहाँ से भी लोग बस की ओर ही भाग रहे थे‌; इसे देख मन में एक आशंका उभरी कि अब टैक्सी को सवारी मिलने में देर हो सकती है- फिर भी ‘थोड़ी और प्रतीक्षा कर ली जाए’ - सोचकर मैं टैक्सी स्टैंड की ओर बढ़ गया। 
        
      एक टैक्सी चालक लखनऊ जाने वाली सवारियों की बाट जोहता दिखाई पड़ा। मैंने उससे लखनऊ चलने के लिए पूँछा तो वह बोला, एक-दो सवारी और मिल जाए तो तुरंत चल देंगे।’ उसके इस ‘तुरंत’ में न जाने क्यों मुझे अपनी ही उतावली की प्रतिध्वनि सुनाई दी। मैं भी उसके साथ खड़ा आने-जाने वालों में संभावित सवारियां तलाशने लगा। 
     
       मैंने उससे कहा, ‘लोग बस से जाने के चक्कर में यहां से खिसक लिए…पता नहीं लखनऊ के लिए अब सवारी कब जुटेगी।’ वह टैक्सी वाला मानो बातचीत का बहाना ही ढूँढ़ रहा था, तपाक से बोल उठा- 
   
    “ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इस रूट पर खूब सवारियां मिलती हैं लखनऊ के लिए तो मिलती ही हैं खाड़ी के देशों के लिए एयरपोर्ट जाने के लिए भी सवारियां मिल जाती हैं। मैं तो अकसर इसी रूट पर चलता हूँ…अन्यथा मेरी टैक्सी आल इंडिया परमिट वाली है, जरूरत पड़ने पर अन्य राज्यों का भी ट्रिप लगा लेता हूँ। आजकल कोविड महामारी का दौर है, पैसे वाले लोग किराए की प्राइवेट टैक्सी में ही चलना सुरक्षित मानते हैं, इससे भी सवारियों की कमी नहीं है।"

      फिर मेरी जिज्ञासा यह जानने की हुई कि वह केवल ड्राइवर है या टैक्सी मालिक भी?"
 
        "अभी बमुश्किल से छह महीना हुआ होगा यह कार लिए हुए, लेकिन साढ़े तीन लाख किलोमीटर चल चुकी है! ससुरा लोहा भी कभी पुराना होता है..बस ग्रीस-तेल-पानी और सर्विसिंग होती रहे तो चकाचक न‌ई बनी रहे! बेचारी मेरी यह कार अभी काफी दिन साथ देगी, लोन अदा हो जाए तब बदलने की सोचेंगे..अभी तो लोन-फोन, तेल-पानी और टैक्स-फैक्स के खर्चे-वर्चे निकाल कर भी बीस हजार बच जाता है, फिलहाल यह क्या कम है! मुझे नशा-पाती, गुटखा-फुटका की लत भी नहीं है कि फालतू के पैसे खर्च हो रहे हों, अपनी टैक्सी अपना राज और अपने मन की सवारी!!”
      
     टैक्सी वाला एक ही सांस में बोलता चला गया। बातों से वह दिलचस्प और सच्चा लगा! उसकी बातों में एक अजीब-सा आत्म-संतोष था‌। मुस्कुराते हुए वह फिर शुरू हो गया-

       “हूँह.. कैसी-कैसी सवारियों से पाला पडता है लेकिन मुझे तो अपने धंधे से मतलब है, कुछ यात्री खंडूस भी होते हैं वे ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे टैक्सी डीजल से नहीं, उनके कुंए के पानी से चलती है और मैं उनका ज़रख़रीद गुलाम होऊँ..लेकिन इनका भी इलाज मैं जानता हूँ…जैसी सवारी वैसी बात।”
  
         उसकी बातें सुनकर मुस्कुराते हुए मैंने बस-अड्डे की ओर देखा -
    
      बस-अड्डे पर आने-जाने वाले लोग जैसे टैक्सी स्टैण्ड से अनजान दिखाई पड़े। विलंब के अनुमान से मेरी भाव-भंगिमा में बेचैनी आ गई। जैसे टैक्सी ड्राइवर ने इसे भाँप लिया हो! ठेकेदार पर भड़ास निकालते हुए वह बोला- 

       “'ये ससुरे टैक्सी-स्टैंड के ठेकेदार भी कम हरामी पीस नहीं होते... पाँच सौ खुद खाने के चक्कर में यात्री को लखनऊ का किराया दो हजार बताएंगे, गजब की गुंडागर्दी है इनकी! पता नहीं ऐसी गुंड‌ई की गाड़ी कब पलटेगी? वैसे भी बस के डेढ़ सौ की जगह टैक्सी पर दो हजार कौन खर्चेगा? सवारी-फवारी जाए भाड़ में अब चला जाए।”

       मैंने देखा, वह ठेकेदार एक टूटी कुर्सी पर विराजमान है। तभी एक बुलेरो से तीन लोग उतरकर बस की ओर लपक लिए! लेकिन कुछ क्षण बाद इनमें से दो लोग टैक्सी की ओर लौट पड़े!

        ड्राइवर ने चार सवारी से कम पर चलने को घाटे का सौदा बताकर इनसे एक सवारी के आने तक प्रतीक्षा करने के लिए कहा। वाकई इस टैक्सी वाले को केवल अपने धंधे से ही मतलब है।

       इसी बीच तीसरा यात्री भी वहां आ गया, मुझे लेकर अब चार सवारी हो चुकी थी। ड्राइवर को कुल आठ सौ रूपया किराया मिलना सुनिश्चित हो गया।
    
       लेकिन चालक ने खुश होकर ड्राइविंग सीट सँभाला ही था कि वह ठेकेदार आ धमका। उसने खिड़की के भीतर हाथ बढ़ाकर चालक से डेढ़ सौ रुपए मांग लिए। मैं चालक के बगल वाली सीट पर बैठा था। जाते-जाते ठेकेदार ने मुझे नमस्कार किया। उसके जाने के बाद चालक बुदबुदाया-

       “आठ सौ में डेढ़ सौ ये ले जाएगा और बचेंगे साढ़े छह सौ जिसमें से तेल के जाएंगे पाँच सौ, खैर डेढ़ सौ तो बचेंगे ही।”

          तभी पीछे से एक परिचित यात्री ने कहा कि उसने ‘साहब’ का परिचय पहले दे दिया था, नहीं तो वह पाँच सौ से कम न लेता।

        टैक्सी रोड पर दौड़ रही थी। चालक ने मेरी ओर देखा जैसे परखा रहा हो। कोई ‘साहबी ठाट’ न दिखाई देने पर उसे मेरे साहब होने पर संदेह हुआ होगा.. क्योंकि उससे डेढ़ सौ रूपए ठेकेदार तो ले ही गया था।

         अचानक मैंने उससे पूँछ लिया कि तुम टैक्सी चलाने का यह धंधा कब से कर रहे हो?

           जैसे यही वह चाहता था कि कोई उससे बतियाता चले। उसने तपाक से बोला - 

         “मैं तो पहले दिल्ली में बड़े-बड़े नेताओं और मंत्रियों के फ्लीट की गाड़ियां चलाता था..क‌ई मंत्रियों-नेताओं का ड्राइवर रहा हूँ…लेकिन ये बड़े लोग भी न, सब ऐसे ही हैं! ये स्वयं को समाज से ऊपर समझते हैं। नियम-कानून तो हम जैसों के लिए है। आम आदमी इनसे कितना धोखा खाता है! उसे समझ नहीं। देखने में ये एक-दूसरे के धुर विरोधी, लेकिन सांझ ढले सब आपस में गलबहियां डाले ठहाके लगाते हैं। बाकी वोटरों को जाति-धर्म के बंधन का एहसास कराते हैं। मैंने तो फाइव-स्टार होटलों में इन्हें छोड़ते और वहाँ से लाते समय इनकी कारगुजारियाँ भी देखी हैं।”
       
           इस समय वह एक ट्रक को ओवरटेक करने की कोशिश में था लेकिन तभी सामने से तेज गति में आती एक कार की हेड लाईट से आँखें चौंधिया गई! इसपर वह बोला, 
    
       “ये देखो, साला हाई बीम मारते चला आ रहा है, इसे तो ड्राइविंग सेंस ही नहीं है! पता नहीं कैसे-कैसे लोग लाइसेंस पा जाते हैं।” 

         अब ड्राइवर ट्रक को ओवरटेक करने में कोई हड़बड़ी नहीं दिखा रहा था। तभी पीछे से एक यात्री अचानक भड़ककर बोला -

        “बैलगाड़ी चला रहे हो क्या? तुम्हारी इस चाल पर तो मेरी फ्लाइट छूट जाएगी।”
      
         ड्राइवर को यात्री की बात खल गई, अचानक कार को सड़क के किनारे रोककर उसने यात्री से कहा, 

       “तो अभी मेरी कार से उतर जाइए..” ड्राइवर थोड़े गुस्से में था।” 

      फिर शांत होते हुए कहा, “मै अस्सी से ज्यादा नहीं चलता। आपको समय पर एयरपोर्ट पहुँचा देंगे।” 

         इधर यात्री भी शांत रहा। 

         कुछ क्षण की शांति के बाद ड्राइवर ने कहा, “ड्राइविंग के समय गुस्सा आना ठीक नहीं।”  
    
        इसके बाद मैंने भी चुप्पी को तोड़ी, ड्राइवर से पूँछा, “तुम लोग विरोध क्यों नहीं करते ठेकेदारों का?”
      
          मेरे इस प्रश्न पर ड्राइवर क्षण-भर की चुप्पी के बाद बोला,

      “सर, माना आज आप बैठे हैं, लेकिन हमारा तो रोज़ इन्हीं से पाला पड़ेगा। कहाँ तक इनसे पंगा लेते फिरेंगे? आखिर हैं तो हम टैक्सी-ड्राइवर ही।” 

         फिर वह अपने अनुभव सुनाने लगा -

    “साहब, मैंने तो इस टैक्सी ड्राइवरी में बहुत कुछ देखा-सुना है। एक बार एक बड़े ढाबे के कैश काउंटर पर एक शराबी को ढाबे मालिक से उलझा देखा। ढाबे मालिक से उसे पाँच हजार रुपए चाहिए था। कुछ देर ना-नुकूर के बाद मालिक ने उसे पंद्रह सौ रुपए थमाए। बाद में ढाबे के मालिक ने मुझसे यही कहा कि कौन उलझे इनसे धंधा ख़राब होता।”

        इसके बाद टैक्सी ड्राइवर ने दूसरी घटना सुनाई - 

     “कितनी-कितनी बातें बताऊँ साहब! एक दिन तो एक आदमी जबर्दस्ती आकर मेरी गाड़ी में बैठ गया, जबकि गाड़ी पहले से ही बुक थी। उतरने को कहा तो वह उतरने को तैयार नहीं, उल्टा झगड़ा करने लगा। 

        थाने से सौ कदम दूर थे हम..पर उसे ज़रा भी डर नहीं लगा। कहने लगा कि ‘दारोगा और सिपाही सब उसके जान-पहचान के हैं’ जैसे-तैसे करके उसे नीचे उतारा, तो जाते-जाते सिर में मुक्का मारकर भाग गया! 

        सच कहूँ तो साहब, इस देश में मेहनत करके खाने-कमाने वालों की कोई कद्र नहीं है। इज्जत-उज्जत सब बड़े लोगों के चोंचले हैं। हम लोगों की इज्जत बस इतनी है कि बिना दंद-फंद और चोरी-चकारी के अपना परिवार पाल ले…लेकिन अब उसमें भी चैन कहाँ है…"

       और पुलिस? उसके पास जाओ तो लगता है उल्टा हमें ही फंसा देगी। डंडा फटकारते ही मिलती है। 
      
      कहने के लिए बहुत टीम-टाम है लेकिन हमारे लिए नहीं..हम तो राम भरोसे ही रहते हैं। वर्षों की इस टैक्सी ड्राइवरी में मैंने यही समझा है।” 

      टैक्सी ड्राइवर की बातें मैं बहुत ध्यान से सुन रहा था, वह फिर अपनी रौं में बहने लगा..

       “उस दिन तो साहब, गजब ही हो गया था! साँझ ढल चुकी थी, एक लड़की ने टैक्सी बुक किया। दूर खड़ी होकर वह साथ जाने वाले किसी का इंतजार करने लगी थी‌। देर होता देख उसे इशारे से मैं बुलाने लगा तो एक पुलिसवाला आ धमका..डंडे से मेरी टैक्सी ठकठकाते हुए उसने मुझे एक भद्दी गाली दिया। फिर मुझ पर इल्जाम लगाया कि मैं गाड़ी में गलत धंधा कराता हूँ! और मुझे जेल भेजने की धमकी देने लगा। मेरी गवाही देने के लिए वहां कोई नहीं था वह लड़की भी नहीं! उस दिन तो मैं एकदम से फँस ही गया था!! 

        एक हजार रुपए की उस दिन की पूरी कमाई उस पुलिस वाले को रिश्वत के रूप में देना पड़ा…मुझे बहुत मलाल हुआ था इसका।”

        अंत में टैक्सी ड्राइवर ने कहा -
 
      साहब, बुरा मत मानिएगा…उस वक्त तो लगा कि इस सरकारी व्यवस्था का हर आदमी जैसे लुटेरा है। 

         लुटेरा!! और ये लूटनेवाले भी अजीब हुनर रखते हैं साहब!” 
    
          फिर उसने बहुत ही तल्ख़ स्वर में कहा -

       “साहब जी, बुरा मत मानिएगा…लूटने में जो जितना माहिर होता है, वह उतने ही ऊँचे ओहदे पर बैठा मिलता है।”
     
       ड्राइवर की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक मेरे मुँह से हड़बड़ी में निकल पड़ा, 

      “रुको… रुको, यहीं रोक दो…मुझे यहीं उतरना है!”

     दरअसल हम लखनऊ के शहीद पथ पर थे। जैसे ही रमाबाई अंबेडकर पार्क नजर आया, मुझे एकदम से ध्यान आया, अरे, यहीं तो उतरना था!
     
      टैक्सी रुक गई। मैं उतरा। टैक्सी ड्राइवर ने एक नज़र मेरी ओर देखा, जैसे वह कुछ कहना चाहता हो, पर कहा नहीं। गाड़ी आगे बढ़ा दिया।

      मैं सड़क किनारे खड़ा रह गया उसके शब्द अब भी मेरे भीतर गूंज रहे थे,
      
      “लूटने में जो जितना माहिर है…”
                               ******

रविवार, 29 मार्च 2026

जब बादल घिर-घिर आएंगे, बीते दिन याद दिलाएंगे।”

       सुबह टहल रहा था तभी बीती रात किसी का भविष्यवक्ता की तरह कहा कथन याद आया कि कल पानी बरसेगा‌। आसमान की ओर देखा। सूरज महोदय नभारोहण के अंदाज में बादलों की फांफी के पीछे से झांक रहे थे, जैसे वहीं से हड़का रहे हों कि तुम लोग इस लायक नहीं हो कि मैं बादलों को बरसने दूँ। वे बूँद बनने से बादलों को रोकते जान पड़े‌ और सूरज की गर्मी बढ़ाने में बादल भी उनका साथ देते प्रतीत हुए। यही नहीं ये बादल जैसे सूरज को उकसा रहे थे कि हे सूरज देव महाराज, मुझ बादल को पानी न बनने दें मुझे ताप से विलीन कर दें जिससे भारतनाम्ना भूमि के रहवासी मेरी बूँद-बूँद के लिए तरसें! 

       दरअसल मामला यह है कि बादल का कोई आवारा टुकड़ा गलती से एक पहाड़ी गाँव के किसी घर में उड़ता हुआ चला आया वहाँ उसकी नजर टी.वी समाचार चैनल पर प्रसारित हो रहे बाढ़ की खबरों पर अटक गई थी। इसी खबर की एक हेडिंग को बादल के इस टुकड़े ने पढ़ लिया। हेडिंग थी, “बादल कहर ढाए” “उमड़ा सैलाब, शहर के शहर मचा कोहराम” या “पानी की मनमानी !” इन खबरों के बीच रह-रहकर विज्ञापन भी चल पड़ते! टी वी पर खबरों की ऐसी हेडिंग और रिपोर्टिंग देख बादल का वह टुकड़ा दुखी हो उठा। उसने दो बूंद आँसू टपकाए और रूठकर वहाँ से हवा के एक झोंके की तरह बाहर निकल आया। बादल का वह टुकड़ा फिर घटाओं से आ मिला था। बादल के उस टुकड़े और बादल की घटाओं के बीच मीडिया पर चल रही इन खबरों को लेकर कुछ कानाफूसी हुई। दोनों एकाकार हुए और फिर आसमान में छायी घटा धीरे-धीरे छंट चुकी थी। 

        बादल नाराज हो ग‌ए होंगे! क्योंकि बादल अभी तक यह सोचकर ही बरसते आए थे कि उसकी बूँदों से धरती हरी-भरी होकर खिलखिलाएगी! इसीलिए ये बादल बूँद बनकर बिना भेदभाव के खेत-खलिहान, पोखर, ताल-तलैया, नदी-नाले सबको सराबोर कर उफना देते थे। लेकिन आज का आदमी बादल और उसकी बूँदों को आफत बताने लगा है और जिस पानी के बिन जीवन सून उसी “पानी की मनमानी” से बादल को उसके बरसने पर ही उलाहना देने लगा है! बादल और उसकी बारिश को लेकर पैदा हुई इधर इस न‌ई इंसानी सोच पर बादलों के फोरम पर खूब माथापच्ची हुआ होगा। इस चर्चा से बादलों ने निष्कर्ष निकाला होगा कि "पानी की मनमानी बोलने वालों को अब पानी की जरूरत नहीं, तभी तो इन लोगों ने ताल-तलैया नदी-नालों पर अपने आलीशान बंगले खड़े कर लिए हैं! ये अपनी इस कारस्तानी को भूल उल्टे हमारी बूँदों को दोष देते हैं! जबकि हमारे बरसने के समाचार से अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाकर कमाई करते हैं। मीडिया तो मीडिया! हमारे बरसने पर जैसे राजनीति भी बरस पड़ती है और राजनैतिक लोग अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने लगते हैं।" अंततः बादलों ने, इस विचार मंथन के बरक्स ही, आपस में तय किया होगा कि आसमान में घूमो टहलो खूब, लेकिन बूँद बनकर भारत नाम्ना धरती पर मत टपको। तो, शायद बादल अब इसीलिए नहीं बरसते। 

       बेचारे ये बादल! धरती और इनके बीच अन्योन्याश्रित संबंध ऐसा था कि बादलों को देखने मात्र से धरती जैसे झूमने लगती और बादल भी बरबस बरस पड़ते थे। धरती ऐसी हरी-भरी हो उठती थी कि संवेदनाओं के गीत गाए जाने लगते।टहलते-टहलते मुझे यूँ ही पुराने जमाने का यह गीत “जब बादल घिर-घिर आएंगे, बीते दिन याद दिलाएंगे” याद आया। शायद वर्ष 1985 का जुलाई माह का कोई दिन था जब पहली बार मैंने यह गाना सुना था। मैं उन दिनों सीएमपी डिग्री कॉलेज में बी ए का छात्र था। इलाहाबाद के मध्य चौक घंटाघर के पास रहता था। वहीं से पैदल डिग्री कॉलेज आया-जाया करता था। उस दिन भी पैदल ही कॉलेज से लौट रहा था। आसमान में बादल घिरे हुए थे और बूंदा-बांदी हो रही थी। हीवेट रोड से जीरो रोड की ओर मैं मुड़ चुका था। इस बूँदाबादी में भविष्य के प्रति बेपरवाह और निश्चिंत पैदल चलते जाना उस दिन न जाने क्यों मुझे अच्छा लग रहा था‌। इसी समय किसी के घर में विविध भारती पर बज रहे इस गाने की आवाज मेरे कानों में पड़ी थी। तब से आज तक बारिश में भीगते हुए वह चलना और इस गाने को मैं नहीं भूल पाया हूँ। ये बादल मेरे मन की उस बेपरवाही और निश्चिंतता की मुझे याद दिलाते हैं। इसीलिए बारिश के इन दिनों में, जब भी मैं आसमान की ओर नजरें उठाता हूँ, तो उन्हीं बादलों को खोजता हूँ!!