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बुधवार, 17 जून 2026

संतोष का कारण

आज चार-पचास पर फोन की घंटी बजी। उधर से आई परिचित आवाज ने पांच-पंद्रह पर निकल लेने के लिए कहा और मुस्कुराने की भी ताकीद कर दी। मैं मुस्कुराया, जो हंसी में भी बदल गई। इस मुस्कुराहट से मन जैसे ताजा हो उठा।
बाहर आया। दूर कहीं बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ रही थी। आसमान में बादल छाए थे, पर उनके यहां बरसने की संभावना नहीं दिखाई पड़ी। लगा, ये दूर कहीं बरस रहे होंगे।
हम और वे परिचित, दोनों साथ चले। स्टेडियम की ओर लगभग छह-सात सौ मीटर आए होंगे कि पीछे एक बोलेरो गाड़ी आकर रुकी। बोलेरो सवार, जो दोनों के परिचित भी थे, हम लोगों से बोलेरो में बैठने का आग्रह किया। 
मेरे साथी फुर्ती दिखाते हुए उसमें सवार हो गए। लेकिन मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “आप लोग बैडमिंटन-कोर्ट में पसीना बहाने वाले हैं। मुझे तो बस टहलना होता है। टहलते-टहलते मैं स्टेडियम पहुँच रहा हूँ।”
खैर, थोड़ी दूर चलने पर उबड़-खाबड़ खड़ंजे वाला वह रास्ता दिखाई पड़ा, जो स्टेडियम की ओर जाता है। पर न जाने क्यों मेरे कदम उस ओर नहीं मुड़े। आगे बढ़ गया।
“सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है..” मोबाइल में यह गीत बजा, मैं समझ गया कि सात बज ग‌ए। यह गाना मुझे बचपन से ही प्रिय है, मुझे स्मृतियों में लौटा ले जाता है। आजकल इसे एलार्म बनाया है।
लेकिन भाई मेरे, इस गीत में छिपी नसीहत से मेरा कोई लेना-देना नहीं! ऑफिसों में दिनभर खुशी के लिए हमें सच के साथ फाइलों, टिप्पणियों, स्पष्टीकरणों में शब्दों की बाजीगरी करनी पड़ती है। फिर मूँछों पर ताव देकर वहाँ से बाहर ऐसे निकलते हैं, मानो सच को शीशे पर उतार दिया हो, कि सबको वही दिखाई दे।
यह लिखते-लिखते बाहर बारिश शुरू हो गई है। गिरती बूंदों की आवाज कानों में पड़ रही है।
तो, आज की अपनी टहलाई पर बात। सड़क पर सीधे चलते-चलते मैं स्वयं द्वारा निर्धारित उस बिंदु पर पहुँचा, जहाँ से लौटना होता है। वहाँ से लौट पड़ा। इस आने-जाने में कुल तीन किलोमीटर की टहलाई हो जाती है। 
खैर, वापसी में, कंधों की एक्सरसाइज भी करते हुए चल रहा था। इसी दौरान पीछे से आवाज आई थी, "साहब, कंधे में दर्द होथै का?" 
मुड़कर देखा, एक मजदूरनुमा व्यक्ति, अपनी साइकिल की रफ्तार धीमी किए हुए मुझसे यही पूछ रहा था। 
उसकी ओर देखते हुए मैंने कहा, "हाँ दरद होथ‌अ, थोड़ा हम कहे कि इह‌उ क‌इ लेई.." 
वह मजदूर बोला, "अरे, साहब, हम‌ई सबका त‌‌अ, ई मौक‌ई नाहीं मिलत।" 
उसका आशय सुबह टहलने के मौके से था। जो उसे नहीं मिलता।
मैंने कहा, "अरे! तोहका क‌उन टहलै के जरूरत बा! तू सब वैसेई दिनभर एतना मेहनत क‌इ लेथ‌अ कि.." 
उसने अब साइकिल की रफ्तार मेरे पैदल चलने के बराबर कर लिया। शायद उसकी इच्छा मुझसे बात करने की थी। 
मुझसे बोला, "साहब, बीस-पच्चीस बिगहा धान बाटइ, उही क राति भर रखाव‌ई क पड़थै, नाहीं त‌अ ससुरन जानवरन क मारा कुछ बचबै न करै.. लेकिन इहूँ में ऊ सारे मरकहवे तो बहुत परेशान कर‌अथै।" 
उसकी इस समस्या से मैंने भी सहमति जताया।
फिर उसने मेरे काम के बारे में पूछा। मैंने उसे गोलमोल जवाब देकर बताया कि किसी आफिस में काम करता हूँ। 
उसने पूछा, "साहब आप कहां के है।" 
जौनपुर बताकर मैंने उससे पूछा, "अउर‌ऊ कुछ कर‌अथ‌अ कि खेतिन भरि?" 
उसकी बात, "नाहीं साहब छह-सात भैसि‌य‌उ पाले ह‌ई..आठ-दस लीटर दूध सेंटर (मिल्क कलेक्शन सेंटर) पर भेज देईथ अउर सांझ वाला दूध लड़िकन के पिय‌ई-खाई के बदे रहथ‌अ।" 
फिर इसमें जोड़ते हुए कहा,, "साहब, सात-आठ टाली गोबर क खादि‌उ होइ जाथ‌अ..एक टाली दुई हजार क बिक‌अथ‌अ..पंद्रह-सोलह हजार क‌अ एक तूरे में।" 
उसकी बात सुनते ही मेरे मुँह से निकल पड़ा, "अच्छा..!" 
गोबर की यह खाद वह अपने भी खेतों में डालता हैै। खेतों में यूरिया खाद नाममात्र डालता है।
खेत में गोबर की खाद डालने से इस सूखे के समय में भी उसकी धान की फसल अभी ठीक है। उसने कुछ ऐसा ही बताया।
 फिर मुझसे पूछा, "तो साहब आप बिहार के अह‌ईं..?" 
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे नाहीं आर..ई जौन‌ऊपुर तोहरेनि उत्तर‌ई प्रदेश में पड़‌अथ‌अ।"
"अच्छा साहब" कहते हुए बाईं ओर इशारा करके उसने कहा, “साहब ई, ज‌ऊन फूल खिला बा न, सफेद फूल चढ़ाव‌इ के लिए ई दस रूपिया में एक्खी बिकाथै।" 
उन खिली कुमुदिनियों को देखकर मैंने कहा, "लेकिन यार अब ई, यहं न खिले, देखत नाहीं बाट‌अ, ई नदियव‌ऊ में घेरि के बाउंड्री खड़ी क‌इ लिहेंन सब, कुछ दिन में अब इहां मकान बनि जाए।"
"हां.. ई बात तो है साहब।" वह बोला।
मैंने उसके गाँव का नाम पूछा। उसने सिरसिया बताया । जो यहाँ से बीस किलोमीटर दूर है। 
मैंने थोड़ा चौंकते हुए पूछा, "तो यहां कैसे?"
उसके कहे अनुसार, वह बहन के यहां गया था। वहीं से लौट रहा था। 
सामने जिला अस्पताल दिखाई पड़ा, उसने वहाँ कुछ काम बताया और उसकी ओर मुड़ गया।
उसके मुड़ते ही, मुझे पिछले दिन सिरसिया में एक गौशाला देखने की बात याद आई। 
खैर, वह मजदूरनुमा या किसाननुमा या दोनों, जो भी था, मैंने उसकी बातों के भीतर छिपे उसके संतोष का अनुभव किया।
बाहर से अभी भी बारिश हो रही थी।
#चलते_चलते
मैं उस किसान के बारे में सोचने लगा। उसके भीतर एक अनजानी-सी खुशी थी। शायद वह स्वयं भी उसके कारण से अनजान था।
#सुबहचर्या
  (३१.८.१९)

शनिवार, 13 जून 2026

तबियत से पत्थर उछालने वाले की तबियत

मुझे बड़ी परेशानी की अनुभूति हो रही थी... दरअसल, एक डब्बेनुमा बॉक्स के भीतर गोल फ्रेम में जड़ा दर्पण जैसा कुछ फिट था। जो अपनी जगह से निकल गया था.. मुझे उसे फिर से उसी स्थान पर लगाना था। इस प्रयास में कफी समय बीत चुका था। 
तभी मैंने ध्यान से देखा,
बॉक्स के भीतर दो तरफ स्टैंड निकले थे। यह फ्रेम उन्हीं स्टैंडों पर पेंचों से कसा हुआ था… पेंच निकले तो फ्रेम भी निकल लिया! उन पेंचों को मैं खोजने लगा। देखा! एक पेंच तो बिस्तर पर ही मिल गया! अब दूसरे पेंच की ढूँढ़ाई शुरू हुई। यह पेंच उस डिब्बेनुमा बाक्स के भीतर ही गिरा था! मैंने फ्रेम को डिब्बे के भीतर के स्टैंड पर फिर से कसना चाहा कि तभी मोबाइल की धीमी-सी रिंगटोन सुनाई पड़ी..
मोबाइल टटोला। मिलते ही उसे कान पर लगा लिया… 
उधर से आवाज आई, "डी डी ओ साहब बोल रहे हैं?" 
"जी हां, डीडीओ ही बोल रहा हूँ।" मैं बोला था। 
दूसरी ओर से हल्के-फुल्के अंदाज में बोला गया, 
"अरे, मैंने कहा कि सुबह की ठंडी हवा से कंधे का दर्द और बढ़ जाएगा.. मैं डीडीओ साहब से कहुंगा कि वहीं कमरे की गर्म हवा में टहलने से दर्द ठीक हो जाएगा।"  
मैं भी नहीं चूका, बोल दिया, "नहीं, डीडीओ तो चाहते हैं कि बाहर की ठंडी हवा में दर्द को थोड़ा और बढ़ाया जाए।" 
उधर से फिर हँसी के स्वर में बोला गया, "तो फिर, हमारी भी इच्छा है कि हम पांच-दस पर निकल लें।" 
मैंने तत्काल यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
जैसे ही कॉल कटी, समय देखा। सुबह के चार बजकर पचास मिनट हो रहे थे। हां, शुक्ला जी ने मुझे जगाने के लिए यह फोन किया था। तब मैं गहरी नींद में था। 
इस बातचीत के बाद मैं थोड़ी देर तक यूँ ही बिस्तर पर पड़ा रहा। फिर पांच बजकर पंद्रह मिनट पर बाहर निकला। 
मैंने शुक्ला जी से अपनी गाढ़ी निद्रा का जिक्र किया और रात में देखे गए स्वप्न की पूरी कहानी कह सुनाया। इसे सुनकर वे मुस्कुराते हुए बोले, "तो मैंने आपको पेंच नहीं कसने दिया!" 
अब मैं सोचने लगा, अगर उस वक्त उनका फोन न भी आया होता, तो भी मैं वह पेंच नहीं कस पाता। आखिर, निद्रावस्था में देखे गए स्वप्न कहाँ पूरे हो पाते हैं! ऐसे स्वप्न तो अधूरे ही रह जाते हैं!! खैर।
टहलकर आया। कपड़ा धोया। फिर चाय बनाई। चाय पीते हुए अखबार के संपादकीय पर निगाह पड़ी।
विगत तीन वर्षों में गंगा जल के साफ होने का उद्धरण देकर बताया गया था कि वास्तव में सरकारी संकल्प ने बड़ा काम करके दिखाया है, जबकि वही आधिकारी और वही प्रयोगशालाएं हैं जो पहले भी थीं।
अब मुझे अपनी रोडवेज बस-यात्रा का स्मरण हुआ। 
मेरे पीछे वाली सीट पर तीन लोग बैठे थे। शायद ये प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक रहें हों। वे स्कूल में शिक्षकों की उपस्थिति को लेकर सरकार की सख्ती पर चर्चारत थे। एक कह रहा था कि अब तो स्कूल, टाइम से पहुँचना पड़ रहा है।
इस पर दूसरे ने कहा, “आखिर कब तक? फिर सब वैसे ही चलने लगेगा।”
पहला व्यक्ति फिर बोला, "कोई नहीं सुनेगा तो सरकार अब जबरिया रिटायर भी करेगी।" 
तभी तीसरा कह उठा, "अरे, रिटायर करके तो देखें, ये यूनियन वाले किस काम के हैं?" 
यह बातचीत सुनकर मैंने सोचा, कोई यहां क्या-क्या सुधारे? आदमी को सुधारे या सिस्टम! दोनों नहीं सुधरने वाले।
इसी बीच कंडक्टर आ गया। वह टिकट बना रहा था। उसे वर्दी में देख उस पहले व्यक्ति ने पूँछा, "भाई यह वर्दी कब से पहनने लगे?"  
कंडक्टर बोला, "अब सरकार इसपर सख्ती कर रही है, इसलिए पहनना पड़ रहा है।" 
मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने भी कंडक्टर से पूछ लिया, क्या अब सभी कंडक्टर वर्दी पहनने लगे हैं? 
कंडक्टर ने कहा, "हाँ सभी।" 
कंडक्टर की बात सुनते ही मैंने गर्दन घुमाकर पीछे बैठे उन व्यक्तियों से कहा, 
"देखा ! सरकारें चाह लें, तो कुछ भी हो सकता है।" 
दूसरा व्यक्ति निरूत्तर-सा हो गया था। मेरे मन में आया कि अब उसे ‘तबियत से पत्थर उछालने’ वाली बात भी कह दूँ। पर अगले ही पल मैं यह सोचकर चुप्पी साध गया कि उसकी बात में भी तो दम कि “आखिर कब तक? ..” क्योंकि जो आज पत्थर को तबियत से उछाल रहा है, हो सकता है कल उसकी ही तबियत न बिगड़ जाए! और फिर किसी डर या भय से हम कब तक सुधरे रहेंगे?
मेरा यह चुप रह जाना ठीक ही था।
हो सकता है ये सारी बातें निरर्थक हों!
#चलते_चलते
     मुस्कुराइए कि निरर्थक बातें करके थोड़ी देर के लिए ही सही, हमारी तबियत सुधर जाती है, क्यों है न?
#सुबहचर्या
(२९.८.१९)

गुरुवार, 11 जून 2026

परसेप्शन बनाएं लेकिन…

आज टहलने नहीं गया। बीती रात, सोने के पहले ही तय कर लिया था कि सुबह टहलने नहीं जाना। इसके बजाय कंधे की कुछ एक्सरसाइज कर लेंगे। जिसमें सिंकाई भी शामिल है। इन सब में लगभग एक घंटा खर्च होता है। खैर।
 
रात दस बजे के आसपास, दूसरे कमरे में मोबाईल को चार्जिंग पर लगा दिया था कि जब भी नींद टूटेगी इसे चार्जिंग से हटा लेंगे। दूसरे मोबाइल को बिस्तर के कोने में रख लिया था कि अलसुबह शुक्ला जी का फ़ोन आएगा तो उनसे कह देंगे कि आज टहलने नहीं जाना है। दरअसल वे टहलने के लिए रोज ही जगाते हैं। फिर हम साथ-साथ स्टेडियम निकलते हैं, खैर। 

सुबह हुई शुक्ला जी का फ़ोन नहीं आया और इधर मैं भी इत्मीनान से उठा। कंधे के व्यायाम आदि से निवृत्त होकर चाय बनाया। चाय पीते समय फोन चेक करना चाहा। लेकिन मोबाइल स्विच‌ऑफ था। याद आ गया, रात में ही इसकी भी बैटरी खतरे के लेबल पर थी। रात भर में यह भी डिस्चार्ज हो गया। 

अब मुझे ध्यान हुआ कि हो सकता है सुबह शुक्ला जी का फोन आया हो। मैं दूसरे कमरे में गया। चार्जिंग पर लगे मोबाइल को चेक किया। उसमें दो मिसकाल थे। शुक्ला जी ने ये कॉल पांच बजे के आसपास किए थे। 

चाय सुड़कते हुए मैं अखबार पर भी निगाह फेर रहा था। इसी समय घड़ी में देखा, सात बजकर पांच मिनट हो चुके थे। हम लोग स्टेडियम से लौटकर इसी समय आवास पर पहुंचते हैं। मैंने शुक्ला जी को, उनका हालचाल जानने के लिए फोन लगाया, यही पूँछना था कि स्टेडियम से लौटे कि नहीं। इसके साथ ही फोन न उठाने की सजा के तौर पर उनके कुछ व्यंग्यवाण भी सुनने की मेरी इच्छा थी।

उधर से भी वही व्यंग्यात्मक लहजे में उनकी आवाज सुनाई पड़ी, 'सारी..सारी...अब हम आपको डिस्टर्ब नहीं किया करेंगे..।" और अपनी इस बात के साथ मोबाइल स्विच‌आफ कर लेने का तोहमत भी मुझपर जड़ दिया। 

मैं समझ गया। क्योंकि अकसर मैं आलसपन में अलसुबह स्टेडियम जाने से ना-नुकुर करता हूँ। शायद इस बात से ही उन्होंने अनुमान लगाया हो कि जानबूझकर मैंने मोबाइल बंद कर लिया था। उन्हें जो सफाई देना था मैंने दिया भी। 

फिर बातों-बातों में वे बोले कि “आप चिंतन-मनन करते हो इस पर कुछ लिखिए।” बातचीत यहीं पर समाप्त हो गई। 

सोचा, 'क्या कुछ लिखें? इधर क‌ई दिन से सुबहचर्या पर भी कुछ नहीं लिखा है। बात तो, सुबह की टहलाई पर जाने से ही निकलती है, टहलने बाहर निकला ही नहीं, तो क्या लिखें ?' 

फिर ये बातें दिमाग में कौंधीं। इसे ही सुबहचर्या का हिस्सा मान लिया। इस चेतावनी के साथ कि यह कहानी है और इस कहानी के पात्र, स्थान, घटना आदि से साम्यता स्थापित होने की स्थिति में उसे संयोग मात्र माना जाए। 

लेकिन चलिए मान लेते हैं, अनंत ब्रह्माण्ड में अनंत पृथ्वियों की भी संभावना हो सकती है और हो सकता है इन्हीं अनंत पृथ्वियों में से किसी एक पृथ्वी पर यह कहानी घट भी रही हो!! 

और... मुस्कुराइए कि हो सकता है आप भी यह कहानी पढ़ रहें हों..

#चलते_चलते

किसी भी विषय के प्रति हमारा 'परसेप्शन' बहुत सावधानी पूर्वक बनना चाहिए।
 
#सुबहचर्या
 (२७.८.१९)

भारत को तो बख्श दीजिए!

आज आठ अगस्त दो हजार उन्नीस है। सुबह पौने पाँच बजे ही शुक्ला जी ने फोन करके जगा दिया। बोले, कि  साढ़े पांच बजे तक आ जाइए, स्टेडियम चल दिया जाएगा। हालांकि अभी नींद की खुमारी दूर नहीं हुई थी। थोड़ी सुस्ती भी छाई थी। सोचा, चाय पीकर चलें। चाय बनाया। चाय पीने के बाद अचानक मन हुआ कि ज़रा छत पर चलकर भोर होती बेला को निहार लें। 

साढ़े पांच बज रहे होंगे जब मैं आवास की छत पर आया। इस भोर की एक तस्वीर भी ली। तस्वीर लेते समय मुझे कामायनी की यह पंक्ति याद आई,

'दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात'   

स्टेडियम पहुंचते ही शुक्ला जी इनडोर बैडमिंटन कोर्ट की ओर चले गए और मैं खुले ग्राउंड की ओर। दौड़ते हुए इस मैदान का मैंने दो चक्कर लगाया। और फिर सामान्य चाल से एक चक्कर और पूरा किया। ग्राउंड का एक चक्कर लगभग पांच सौ कदम का है। 

बालीबाल टीम के सदस्य दृष्टिगोचर हुए। तो उनके ग्राउंड की ओर चला गया। चूंकि मैं बालीबाल खेलना सीख ही रहा हूँ, इसलिए कौन कैसे बाल हैंडल करता है, ध्यान से देखता हूँ। आज भी ध्यान इसी पर था। 

उन्हें मैं मझा खिलाड़ी समझता था, लेकिन साथी खिलाड़ी को बॉल पास करने में उनसे चूक हो गई। वह गलत दिशा में चली गई। मुझे लगा बॉल को नहीं छूना चाहिए था। लेकिन फिर मन में कौंधा कि यदि बाल को हैंडल करने में कोई गलती हुई है तो उससे सीख ही मिलेगा।

स्टेडियम से लौटते समय शुक्ला जी साथ थे। उन्होंने कहा, "जो विजेता होता है, वही इतिहास लिखता है और विजेता वही होता है जो लड़ता है।" उनकी यह बात सही लगी। 

कश्मीर से धारा 370 हटाने पर विवाद और संघर्ष की आशंका थी। लेकिन यह भी एक प्रयास है, समस्या से लड़ने का।

एक बात अनुभव से भी सीखता आया हूँ, सही मन से लिए गए निर्णयों के परिणाम अच्छे होते हैं। यहाँ हार में भी जीत होती है। 

लोग कश्मीर पर दिल जीतने का तर्क देते हैं। लेकिन हँसी आती है इसपर। क्या दिल जीतना इतना आसान है? वैसे 'राज्य' के सारे कानून दिल जीतने के लिए ही तो हैं फिर भी दिल हैं कि मानता नहीं और समस्या ज्यों की त्यों!

भाई मेरे! राज्य अपने नागरिकों का दिल जीतने वाला कानून तो बनाता ही है लेकिन दूसरी ओर उसे ऐसे कानून भी गढ़ने होते हैं जो स्वयं राज्य को भी संरक्षित करे। इसलिए इन बातों पर ज्यादा हाय-तौबा मचाने और बौद्धिक विश्लेषण की जरूरत नहीं।

मैं देख रहा हूं, धारा 370 हटाए जाने की व्याख्या तमाम नजरिए से हो रही है। जैसे, राष्ट्रवादी, संम्प्रदायवादी, वामपंथी, बुद्धिवादी, संविधानवादी और राजनीतिक; सबकी अपनी-अपनी व्याख्या।

लेकिन सबसे अधिक घातक साम्प्रदायवादी व्याख्या है। ऐसा करने वालों को मैं "नान-स्टेट-ऐक्टर" मान सकता हूँ। ये राज्य की अवधारणा को फालो नहीं करते। यह उर्वर जमींन में ज़हर बोने जैसी व्याख्या है।

खैर यह तो हमारे संविधान की खुबसूरती है कि यहाँ ज़हर बोने की भी स्वतंन्त्रता है!  

रही बात कुछ साहित्यकार टाइप के बुद्धिजीवियों की, तो उनकी बात ही निराली है। 

प्रकाशकों की कृपा से साहित्यकार बने इन बेचारों को, बस बात को घुमाफिरा कहने की कला भर आती है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। दिल्ली में बैठकर साहित्य नहीं रचा जा सकता। ये अपनी बातों में जबर्दस्ती का साहित्य ठूँसते हैं। जनसरोकार के नाम पर जन से कटे हुए लोग हैं ये।

जहाँ तक ‘लोकतंत्र विरोधी’ जैसी राजनीतिक व्याख्या की बात है, तो उन्हें भी समझना चाहिए कि सत्ता को ताकत भी लोकतंत्र से ही मिलती है।

एक बात और, संविधानवादी व्याख्या की बात है, तो संसद की बात माननी ही पड़ेगी, बाकी सर्वोच्च न्यायालय है ही इस बात की व्याख्या करने के लिए।

अंत में एक बात, प्रकृति ने ही भारत की सीमा को निर्धारित किया था। शायद यही कारण रहा होगा कि इसके एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक हजारों वर्षों से निर्बाध आवागमन चला। अगर ऐसा न होता तो अफगानिस्तान में बामियान न होता, या फिर एक ही संस्कृति के प्रमाण न मिलते। 

भाई मेरे, यह भारतभूमि यूरोपियन देशों की तरह किसी राजनीतिक एकता का परिणाम नहीं, एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण का परिणाम था, और आप इसकी तुलना सोवियत या यूरोपियन यूनियन के देशों से करते हो!! 

कामरेड, इसे समझिए, आप जैसे लोग धर्म को धर्म नहीं, किसी खास राजनीतिक विचारधारा को ही धर्म मानते हो, या फिर धर्म को संम्प्रदाय बना देते हो, अन्यथा धर्म के नाम पर देश का विभाजन न हुआ होता। 

अब तो भारत को बख्श दीजिए और इसे तोड़ने वाले प्राविधानों को ही तोड़िए! 

मित्रों, इस सुबहचर्या को मैंने थोड़ी तल्खी में लिख डाला है, क्षमा करें।

#चलते_चलते

       किसी चीज के लिए किया गया हमारा सद्प्रयास ही अपने आप में विजय के समान होता है।

#सुबहचर्या

(८.८.१९)

बुधवार, 10 जून 2026

अरे साहब, आपने इन्हें..!

घड़ी में अभी सात भी नहीं बजे थे। दसेक मिनट बाकी था सात बजने में। यूँ ही घर के अंदर-बाहर चहलकदमी करने लगा। 

दरअसल आज नींद पांच-बीस पर खुल गई। मोबाइल देखा।  शुक्ला जी का एक मिसकाल था। पाँच उन्नीस पर आया था यह काल। उन्हें फोन मिलाया। उनींदी-सी आवाज में वे बोल रहे थे कि तैयार हो लीजिए। 

खैर रात में तीन-चार बार नींद खुली थी। कारण कि मेरे कंधे का दर्द मुझे बेचैन किए था। यह दर्द चार-पांच महीने से है। तो ठीक से सो न पाने के कारण मन में आलसपन भी था। बिस्तर छोड़ते ही चाय पीने का मन हुआ। चाय बनाने चला गया। 

चाय बनी। चाय पीते हुए व्हाट्स‌अप पर मित्रों के गुडमॉर्निंग संदेश देखने लगा। इधर यहाँ श्रावस्ती में दो-तीन महीने से नेटवर्क की जबर्दस्त प्रॉब्लम है। पता नहीं क्यों? न संदेश खुल रहे थे और न भेज पा रहा था। बात केवल गोल-गोल घूमकर ट्राई अगेन पर रुक जाती। दिन में सिंग्नल मिलता भी है तो सुबह की "सुप्रभात" दोपहर बाद कहने में संकोच होता है। खैर चाय पीते हुए मैंने फटाफट good morning वाला संदेश छोड़ दिया कि नेटवर्क आते ही यह चला जाए।

चाय और गुड मॉर्निंग से निवृत्त हु‌आ तो शुक्ला जी के यहां चल पड़ा। लेकिन वे स्टेडियम के लिए निकल ग‌ए थे। मैं भी खरामा-खरामा उसी ओर चल पड़ा। 

स्टेडियम के मोड़ पर पहुँचा तो कल की सुबहचर्या पर भाई यशवंत सिंह जी की टिप्पणी याद आ गई। उनकी टिप्पणी थी, "बुढ़ौती में खेल मत खेला।" हालांकि इसी पर भाई रनवीर सिंह चौहान जी ने भी शायराना अंदाज में टिप्पणी किया था कि "दाढ़ी की सफ़ेदी पे न जाओ/सालों की बटोरी हुई चाँदी है वो।" ये दोनों टिप्पणियां जैसे एक-दूसरे को संतुलित कर रहीं हों, सोचकर मुस्कुरा उठा।

लौटते समय एक खच्चर जैसा घोड़ा सड़क के किनारे गिरा पड़ा था। उसके शरीर एक-दो कौवे बैठे उस पर चोंच मारते दिखाई पड़े। वहां किसी वाहन के शीशे के छोटे-छोटे टुकड़े भी बिखरे पड़े थे। इस घोड़े को रात में जरूर किसी वाहन ने टक्कर मारा होगा। एक दूसरा खच्चर उस मृत खच्चर के पास खड़ा था। उसकी आंखों से आंसू बहता प्रतीत हुआ। मैं भी उस खच्चर के दुख से दुखी-सा हो उठा। मुझे लगा दुख या कष्ट प्राकृतिक है किस प्राणी को नहीं होता? चाहे वह मनुष्य हो या फिर जानवर, संवेदना की अनुभूति तो सभी को होती है।

जब मैं घर के अंदर-बाहर चहल-कदमी कर रहा था, तो निगाह बड़े होते उस पाकड़ के पेड़ पर पड़ी, जिसे काटने के लिए मैं क‌ई बार मंगलेश्वर से कह चुका था। एक बार तो वह कुल्हाड़ी भी लाया था, लेकिन फिर उसे वापस लेकर चला गया। 

असल में वह उसे काटना नहीं चाहता था, यही नहीं घर की दीवारों के एकदम किनारे बड़े होते पीपल के पौधों को काटने से उसने यह कहकर मना कर दिया था कि किसी अन्य संम्प्रदाय के व्यक्ति को बुलवाकर इन्हें हटवा देंगे।

इस बीच ये पौधे बड़े हो चुके थे,  इनसे दीवारों को नुक़सान पहुंचने का डर हो आया था। यही नहीं, उन पौधों के बीच सांप वगैरह के छिपने का भी डर था।  

आज मैंने स्वयं इन पौधों को वहां से हटाया। मंगलेश्वर महोदय अभी जब सुबह आए तो आश्चर्य से पूंछा,

 'अरे साहब, आपने इन्हें..!" 

मैंने उसे समझाया - “इनसे दीवारों को नुकसान होता और फिर उसकी झाड़ में कोई सांप-वांप भी तो छिप सकता था, वैसे भी अपने रहने के आसपास की जगह को साफ-सुथरा तो रखना ही चाहिए।” 

वाकई! कितनी चिंता रहती है हमें एक कण से लेकर पेड़ पौधे और सभी प्राणियों तक की!!

हाँ, टहलकर लौटते समय अखबार देने वाला बच्चा मिल गया था, आज अखबार की वैन देर से आई थी। बच्चे ने रास्ते में ही मुझे अखबार पकड़ा दिया था।

अखबार के पन्नों पर छपी खबरें पढ़ने लगा, अगर मीडिया या अखबार न होते तो क्या होता? 

लेकिन राज्य हो या यह मीडिया, सबको देर से जागने की आदत हो चली है। मतलब तब तक घटनाएं घटकर खबर बन चुकी होतीं हैं।

आज यह सब लिखने का मन नहीं था। लेकिन सुबह की टहलाई के बाद लौटा तो मन भीतर तक निश्चल और शांत हो चुका था। सुबह जो भी देखा सुना उसे लेकर मन के भाव, व्यक्त होने के लिए भीतर ही भीतर कुलांचें मार रहा था। सो लिखना पड़ा।

#चलते_चलते

देर से जागने पर केवल लकीर पीटना भर रह जाता है। 

#सुबहचर्या

   (२.८.१९)

यूँ ही में अच्छा लगना

सुबह उठे तो मन ने यूँ ही टहलने न जाने का इरादा जता दिया। पीछे वाला दरवाजा खोलकर पूरब दिशा की ओर निहारा‌। मखमली-से बाल सूरज के दर्शन हुए। लेकिन मैं इनके इस भोले रूप के भुलावे में नहीं आया। जानता था, अभी दो-चार घंटे बाद यही अपने उग्र स्वरूप में दिखाई पड़ेंगे। उस आने वाली तीखी तपन की कल्पना भर से इनके इस बाल रूप की भृकुटी मुझे टेढ़ी नजर आने लगी। अभी से मुझे गर्मी का एहसास होने लगा।

मैं बाहर आया। पौधों पर निगाह गई। पत्तियों पर धूल-गुबार की परत जमी हुई थी। इससे इन पौधों का दम घुटता नजर आया। मैं कमरे से झाड़ू लेकर आया। इन पौधों के आस-पास सफाई किया। फिर बाथरूम में गया। नल की टोंटी खोली। बाल्टी भर गई, तो उसे लेकर फिर इन पौधों के पास आया। उस पानी से इन्हें नहलाया। धूल हटते ही पत्तियाँ चमक उठी, जैसे पौधे खिलखिलाकर मुस्कुरा उठे हों। 

अब कमरे की ओर लौटा। देखा, कमरों के फर्श पर भी धूल की महीन-सी परत जमी थी। तीन-चार बाल्टी पानी कमरों में फैलाया। फिर वायपर से उसे खींचकर बाहर कर दिया। 

घर के आसपास यदि थोड़ी नमी बनी रहे तो मुझे अच्छा लगता है। वैसे भी हमारा देश धूल-धक्कड़ और गर्मी-सूखे से प्रभावित भू-भाग माना जाता है। शायद बाबर ने अपनी किताब बाबरनामा में इसका ज़िक्र किया है।  

खैर, यह सब करके मैंने मन के इरादे को ही चकमा दे दिया था, “बच्चू! मत ले चलो मुझे टहलाने, मैंने भी यूँ ही में काम भर का एक्सरसाइज तो कर ही लिया।

इसके बाद चाय बनानी शुरू की। आज दूध कुछ गड़बड़-सा लगा। फटा तो नहीं था, फ्रिज में ही रखा था और रात भर बिजली भी रही थी। दूध सीधे फ्रिज से ही निकाला था। लेकिन उसमें चिकनाई कुछ जियादा ही प्रतीत हो रही थी। 

चाय पीते हुए देखा, गिलास की सतह पर कुछ महीन कण जैसे जमा हो गए थे। मन में आशंका उठी, कहीं दूध मिलावटी या बनावटी तो नहीं? यह सोचकर दूधिए पर मन ही मन गुस्सा भी हुआ। फिर मन को यह कहकर शांत किया कि कल उससे इस बारे में जरूर पूछूँगा। आखिर पूरी चाय भी नहीं पी पाया। गिलास वैसे ही रख दिया। 

इधर आज ईद है। सोशल मीडिया पर इस पर कोई बढ़िया सा शुभकामनाओं वाला संदेश खोजा। इसे फेसबुक के  टाइमलाइन पर पोस्ट कर दिया। सोशल मीडिया से ही पता चला कि आज विश्व पर्यावरण दिवस भी है। इसपर शुभकामना संदेश देने की इच्छा ही नहीं हु‌ई। क्योंकि सोशल मीडिया पर दिए संदेश से धरती हरी-भरी नहीं होने वाली!

ठीक इसी समय दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज हुई। दरवाज़ा खोलकर देखा, दो नन्हें-मुन्नें-से बच्चे अपने नन्हें हाथ में दूध का डिब्बा लिए खड़े थे। उन्हें घूरते हुए मैंने दूध का डिब्बा ले लिया। भगोने में उड़ेला। दूध ठीक दिखाई पड़ा। बच्चों को खाली डिब्बा लौटाते हुए सोचा, दूध के लिए इन्हें क्या बोलें! ये बच्चे क्या समझेंगे। 

दूध को लेकर बच्चों से कुछ नहीं कहा बल्कि उनसे इतना भर पूंछा, "तुम्हारे यहां भैंस दूध देती है?" 

इस प्रश्न पर बच्चे ने सहमति में सिर हिलाया कि  भैंस है वह दूध देती है। बच्चे झूँठ नहीं बोलेंगे। तो दूध बनावटी या नकली नहीं रहा होगा‌। मैंने निष्कर्ष निकाला। लेकिन साथ में यह भी मन में आया कि इस जमाने में "आदमी के लालच का कोउनऊ भरोसा नाहीं!" 

एक बच्चे ने मुझसे अखबार मांगा। असल में बच्चे जब भी दूध लेकर आते हैं तो मुझसे पुराना अखबार जरूर मांगते हैं। एक दिन मैंने इनसे पूंछा था कि "अखबार का क्या करोगे?" "किताबों पर जिल्द चढ़ाएंगे।" उनकी उस बात से मुझे भी अपना बचपन याद आ गया था। मैंने बच्चों को अखबार दिया और वे चले गए।

उनके जाने के बाद मैं कमरे में आ गया। बिस्तर पर नजर गई। चादर और तकिए के खोल कुछ मैले-से दिखाई पड़े। उन्हें समेटकर बाथरूम में ले आया। बाल्टी में सर्फ घोला और चादर तकिए के खोल उसमें भिगो दिए।उन्हें बाल्टी में डाल दिया। 

इतने में मंगलेश्वर भी आ गए थे। जो मेरा खाना बनाते हैं। लेकिन मैं चुपचाप चादर और तकिए के खोल धोता रहा। फिर उन्हें सूखने के लिए धूप में फैलाने बाहर आया। यह देखते ही मंगलेश्वर बोले, 

अरे साहब, आप क्यों धोए? मैं धो देता..!" 

मैंने जैसे अपनी सफाई देते हुए कहा, 

“नहीं यार, इसी बहाने थोड़ी मेहनत भी हो जाती है।” 

वह चुप हो गया और हमारे हाथ से कपड़े लेकर रस्सी पर फैलाने लगा। खैर..

#चलते_चलते    

कभी-कभी मन, अपने अरयें ही मस्त-सा हो उठता है! फिर उसी मन:स्थति में जो भी हम करते या सोचते हैं, हमें अच्छा लगता है। मतलब छोटी-छोटी बातें भीतर एक संतुष्टि और अपनापन भर जाती हैं।

#सुबहचर्या

   5.6.19 

    विनय     

सोमवार, 8 जून 2026

खैर, हम ऐसे ही हैं!

कहते हैं, लक्ष्य बड़ा है तो उसे पाने के लिए छोटी-छोटी बातों को नज़र‌अंदाज कर देना चाहिए। क्योंकि तुच्छ बातों में उलझ जाना आदमी को बड़े लक्ष्य से भटका देता है। 

सत्ता-प्राप्ति सबसे बड़ा सार्वकालिक राजनीतिक लक्ष्य रहा है। उसके लिए विकास, कानून का राज, संविधान, जनकल्याण और विचारधाराएँ, ये सब आवश्यक पड़ाव भर हैं। सत्ता को ऐसे पड़ाव से वैधता एवं स्वीकार्यता प्राप्त होती है। लेकिन यह विडंबना है कि सत्ता की राजनीति, सत्ता की प्राप्ति और इसके संरक्षण के लिए इन पड़ावों का इस्तेमाल करने लगती है। 

हमारे यहां का सिस्टम कभी भी 'आ‌‌ॅटो-मोड' में काम करता प्रतीत नहीं होता। इसे चलाने के लिए राजनीतिक शक्ति चाहिए, जिसकी अपनी कार्यशैली और नियंत्रण-पद्धति होती है। इसीलिए इसके बरक्स ही चीजें सत्तावादी चरित्र में ढल जाती हैं।

ईमानदारी या पारदर्शिता को ही देखिए। सत्तावादी व्यवस्था इसके साथ खेलते हैं। इन मूल्यों को अपने ढाँचे में ढाल लेते हैं। वहाँ ईमानदारी और पारदर्शिता का कोई स्वतंत्र नैतिक अर्थ नहीं बचता; वे केवल सत्ता वैध और मजबूत दिखाने के औजार बनकर रह जाती हैं। अन्यथा ये मूल्य सत्ता-शक्ति को नाकाबिले बरदाश्त होती है। 

मैंने कहा न, कि यह देश ‘ऑटो-मोड’ में नहीं चलता। सत्ता के जोर से चलता है और वह भी बंदूक की नली से नहीं, खजाने के प्रवाह से संचालित होती है। इसीलिए ‘सत्ता-नीति’ में ईमानदारी और पारदर्शिता की स्थिति बहुत विचित्र है, वे सत्ता के लिए ‘वाह’ भी हैं, और ‘आह’ भी! 

सत्ता का चरित्र ही ऐसा है कि वह धीरे-धीरे अपनी 'मान्यताओं का सिस्टम' गढ़ लेता है। उस सिस्टम में न तो कोई गुंडा होता है, न माफिया; न कोई ईमानदार होता है न बेईमान!

वहाँ व्यक्ति और मूल्य अपने मूल अर्थों में नहीं, बल्कि इनका प्रयोग सत्ता के सोपान के रूप में किया जाता है।

यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि हमारे सत्तावादी चरित्र में, ईमानदारी-फीमानदारी, पारदर्शिता-सार्दर्शिता, नियम-फियम, कानून-फानून और यहाँ तक कि संविधान-फंविधान, ये सब ढकोसले हैं। ये वहीं तक काम करते हैं, जहां तक सत्ता के उपयोग और उसकी आवश्यकता के अनुसार परिभाषित हों।

खैर, इन बातों के तस्दीक के लिए किसी को कुछ भी नहीं करना है, केवल इस सिस्टम की प्रत्येक चमकती हुई चीज का, मने व्यक्ति, संस्था, नीति और स्वयं सिस्टम का चीरफाड़ करके देख ले! उसमें बेहद लिजलिजा, पिलपिला और पीब जैसा पदार्थ नजर आएगा! फिर भी सत्तावादी लोग बेहद गुमान में जीते हैं!!

वाकई, हम ऐसे ही हैं।