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शुक्रवार, 5 जून 2026

धर्म की नदी और संप्रदाय की नावें

सुबह जल्दी उठे। कल द्वारिकाधीश के दर्शन हो ग‌ए थे। आज का प्लान सोमनाथ जाने का था। कल मैं द्वारिकाधीश में एक साधू के बगल में बैठा था। जिसकी तस्वीर मैंने फेसबुक पर शेयर की थी। 

वैसे किसी भी धर्म के विषय में टिप्पणी करना अत्यंत संवेदनशील मसला है, क्योंकि धार्मिक विचार सीधे आस्था से जुड़े होते हैं। जिसकी जैसी आस्था होती है, उसका धर्म बोध भी वैसा ही आकार लेता है। मनुष्य अपनी आस्थाओं के ताने-बाने से ही अपनी जीवन-शैली, व्यवहार और दृष्टिकोण का निर्माण करता है।

लेकिन धार्मिकों को भी चाहिए कि अपने विचारों को लेकर आक्रांता न बनें। धार्मिक विचार बिल्कुल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित होने चाहिए।

खैर, कल किसी बात पर क्षण भर के लिए मन उदास हो आया था। एक पीतवस्त्रधारी साधू बाबा के बगल में आकर बैठ गया। उनसे अपनी तुलना कर बैठा। उनकी निश्चिंतता से मुझे रश्क-सा हुआ!

वैसे धार्मिक परम्पराओं में संसार को अक्सर ‘भवसागर’ कहा गया है। यहाँ ‘भव’ का अर्थ है जन्म-मरण और उससे जुड़ा यह नश्वर संसार, जबकि ‘सागर’ उसकी अथाह और दुस्तर प्रकृति का प्रतीक है। मनुष्य इस भवसागर में मोह, माया, दुःख, भय, रोग, जरा और मृत्यु जैसी अनगिनत लहरों के बीच डगमगाती जीवन-नौका लेकर भटकता रहता है। अपनी-अपनी चिंताओं, इच्छाओं और अस्तित्व के संकटों से जूझते हुए वह किसी स्थिर तट की तलाश करता है।

तो क्या साधु हो जाने मात्र से कोई इस भवसागर के उस स्थिर तट को पा लेता है? संभवतः नहीं। अनेक साधु-संत इससे मुक्ति का उपाय संसार से कुछ दूरी बनाकर अपनी एक अलग दुनिया रच लेने में देखते हैं। किन्तु वे भी अंततः इसी संसार, इसी भवसागर पर आश्रित रहते हैं। उनकी साधना, उनका वैराग्य, यहाँ तक कि उनका अस्तित्व भी उसी समाज और जीवन-व्यवस्था से जुड़ा होता है, जिससे वे स्वयं को अलग मानते हैं। बस वे जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते।

वैसे, आम भारतीय अपने व्यक्तिगत अस्तित्व को लेकर बहुत अधिक फ़िक्रमंद नहीं रहा, वह अपने होने की निरंतरता को पारिवार और आने वाली पीढ़ियों में अवश्य देखता है, किंतु भारतीय चिंतन ने वानप्रस्थ जैसी अवधारणा के माध्यम से इस भाव को भी संतुलित किया, ताकि पारिवार जैसी संस्था की निरंतरता पर व्यक्ति का अहं न टिक जाए। शायद इसी कारण यहाँ जीवन और जगत की वस्तुओं को क्षणभंगुर माना गया, और वैराग्य तथा अनासक्ति को भी जीवन-दृष्टि का हिस्सा बनाया गया। 

लेकिन चतुर और लोभी मन प्रायः अपने अस्तित्व-बोध को ही केंद्र में रखकर जीता है। यही कारण है कि वह परिवार और सामाजिक संस्थाओं को भी अपने अहं तथा वर्चस्व का माध्यम बना देता है। जब व्यक्ति निरंतरता को साधना के बजाय स्वामित्व की दृष्टि से देखने लगता है, तब वही प्रवृत्ति परिवारों और संस्थाओं में विकृतियाँ उत्पन्न कर देती है। जिससे इन संस्थाओं के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो जाता है। सामंती मानसिकता का मूल भी कहीं न कहीं इसी आग्रह में दिखाई देता है।”

भारतीय संदर्भों में धार्मिक विचार एक बहती नदी की तरह रहा है, जिसमें निषेध या बहिष्कार का आग्रह कम, और विविध धाराओं को आत्मसात कर उन्हें अपने प्रवाह का हिस्सा बना लेने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। शायद इसी कारण यहाँ अस्तित्व को स्थिर रूप में बचाए रखने की चिंता से अधिक, जीवन-प्रवाह को सतत और जीवंत बनाए रखने पर बल दिया गया।

लेकिन जब धार्मिक-विचार किसी कठोर सम्प्रदाय में बदलने लगते हैं, तब उनकी यही जीवंतता क्षीण होने लगती है। प्रवाह की जगह आग्रह आ जाता है और समावेश की जगह सीमाएँ खिंचने लगती हैं। तभी अपने बगल में बैठे उस साधु को देखकर मन में यह विचार आया कि कोई भी बाना या पहचान, यदि अस्तित्व-बोध और अहं की चिंता से मुक्त होकर धारण की गई हो, तो वह न कभी दूसरों को भ्रमित करती है और न ही किसी अन्य के होने की अवहेलना करती है।

कल जब हम द्वारिकाधीश के दर्शन करने गए तो वहां के पुरोहित ने मुझसे मेरी जाति पूँछी, मैंने बता दिए! लेकिन अगले ही पल मैंने सोचा मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, एक ऊँच-नीच जातीय मानसिकता वाले समाज में यह किसी और के लिए अपमानजनक हो सकता है। बाद में पत्नी ने भी इसी बात को लक्षित कर मुझसे कहा, "यहाँ तो जाति पूँछते हैं! मुझे खराब लगा।" दरअसल ऐसी ही होती है, अस्तित्ववादी सोच! इसे हम एक अलगाववादी सोच मानते हैं, इसे क्यों न हम एक जिहादी सोच मानें? खैर..

मैंने ओखा में हजारों नावें खड़ी हुई देखी! पहले तो किसी ने बताया ये मरम्मत वगैरह के लिए खड़ी हैं, लेकिन बाद में एक स्थानीय व्यक्ति ने जानकारी दिया कि ये मछुआरों की नावें हैं, मौसम और तेज चलती हवाओं के कारण सरकार ने इन्हें अभी समुद्र में उतारने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है, प्रतिबंध हटते ही यहां एक भी नावें नहीं दिखाई पड़ेंगी!

वाकई, उन नावों और समुद्र को देखते-देखते मेरे भीतर सागर, भवसागर, नाविक, पुरोहित, संप्रदाय, धार्मिक रीति-कुरीतियाँ और जर्जर नावों की छवियाँ आपस में घुलने-मिलने लगीं। मन में प्रश्न उठा, क्या इन धार्मिक नावों के खेवैयों को यह स्मरण है कि नावों की भी समय-समय पर मरम्मत करनी पड़ती है? विचार जब जीवंत रहते हैं तभी वे पार ले जाते हैं, लेकिन जब वे जड़ होकर केवल सम्प्रदाय और मजहबी आग्रह में बदल जाते हैं, तब वे धीरे-धीरे जीर्ण नावों जैसे हो जाते हैं। विडम्बना यह है कि भवसागर से पार होने की आशा में हम आज भी उन्हीं पुरानी, मरम्मत-विहीन नावों पर चढ़े चले जा रहे हैं।

मैं इन नावों के नाविकों से कहता हूं कि- भ‌इया! अपनी-अपनी नावों के रंग-रोगन का ही नहीं, इनके आधुनिकीकरण के बारे में भी सोचिए! खैर।

आइए, अब इन बेफालतू की उलझी हुई बातों से ध्यान हटाकर काठियावाड़ की ओर लौटें। सुबह सोमनाथ के रास्ते पर चलते हुए जगह-जगह दूर तक फैले पवन-ऊर्जा के ऊँचे टावर दिखाई पड़ रहे थे। रास्ते में एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि यहाँ पिछले पाँच वर्षों से ढंग की बारिश नहीं हुई है। फिर भी लोगों के चेहरों को देखकर लगा कि जीवन की जिजीविषा अब भी सूखी नहीं है। कठिन परिस्थितियों में भी यह उन्हें जीने की राह सुझा रही है।

#चलते_चलते

        अपनी जिजीविषा के साथ प्रसन्न चित्त रहिए! यह किसी पंथ,संप्रदाय या मज़हब के ताने-बाने का मोहताज नहीं। खराब मौसम में तो नावें भी खड़ी हो जाती हैं! लेकिन जिजीविषा ही है जो आपको तैरना सिखा जाती है।

#सुबहचर्या

(१९.७.१९)

मंगलवार, 2 जून 2026

एक अबूझ-सी सुबह!

आजकल यूं ही आलसपन घेरे रहता है। जब आदमी को करने को कुछ नहीं सूझता तो ऐसा ही होता है। पांच के आसपास जागा। कुछ देर तो इसी उधेड़बुन में बीता कि टहलने जाएं या नहीं.. खैर.. निकल लिए। 
       यह अलसायी-सी सुबह जैसे मौन थी.. वही सड़क.. वही सुबह.. वैसे ही इक्का-दुक्का आने-जाने वाले लोग और वाहन… और वैसे ही सड़क पर पड़ते मेरे कदम.. रोजमर्रा के वही दृश्य। 
     फिर भी मन को यह सब अबूझ-सा लग रहा था। इसमें कोई कहानी नजर नहीं आ रही थी।
     रोज आते-आते यह सुबह जैसे थक चली हो! बस मजबूरी है उसका आना और गुजर जाना। 
      हाँ समय या काल,जो कुछ भी हो! केवल दिखाई पड़ने वाली चीजों का गुजर जाना भर है!! हमारा देखना बंद हो जाना, हमारा भी गुजर जाना है.. शायद समय इसी को कहते हैं।
        सामने निगाह पड़ी..एक सांड़ आ रहा था… पहले तो मैंने इसे जानवर समझा। इससे बचने की कोशिश भी किया। लेकिन सांड़ ने स्वयं ही रास्ता बदल लिया… वैसे जो हिंसक हो उसे ही जानवर मानना चाहिए! 
      अब तो ‘जानवर’ की परिभाषा बदले जाने की जरूरत है। अकारण ही किसी भी जीव को ‘जानवर’ कह देना अनुचित और आपत्तिजनक है। फिर तो इंसान भी जानवर है!! 
      सोच रहा हूं.. अगर सांड़ मन-वाला हुआ तो जरूर.. मुझे भी जानवर ही समझा होगा.. तभी तो रास्ता बदल लिया। हाँ किसी को जानवर समझ लेना मनुष्य की ही बपौती नहीं है। 
       लेकिन क्या पता हम दोनों ही एक दूसरे को समझने में गलत हों? वैसे हम अपने “समझने” को भी समझ पाते हैं या नहीं, अकसर हमें यह नहीं पता होता।
         कहते हैं, प्रेम की भाषा मूक होती है, इतनी सहज कि उसे एक शिशु भी बिना शब्दों के समझ लेता है। 
      लेकिन जब वही भाषा समझ में आनी बंद हो जाए, तो मान लेना चाहिए कि वह शिशु अब बड़ा हो चुका है। 
     शायद इसीलिए तो, बड़े लोग प्रेम को बार-बार शब्दों, संकेतों और व्यवहारों के माध्यम से जताते और समझते हैं। क्योंकि उनके के लिए अब ‘प्रेम’ एक निष्कलुष भावना नहीं, बल्कि ‘व्यवहार’ में बदल चुका होता है। 
          खैर, चीजें यूं ही गुजर जाती है, अपने समय-भर हम इसे समझते रह जाते हैं..
        चलते-चलते ध्यान आया, 'मदर्स डे’ पर ऑफिस की सीढ़ियों के कोने में एक मरणासन्न टाइप की कृशकाय वृद्धा दिखाई पड़ी थी। पता चला उसका एक पुत्र है, वह ड्राईवरी करता है और शराब पीता है। 
     लोग उस वृद्धा पर दया दिखाते हैं उसका वह पुत्र उस दया में से अपने लिए भी कुछ झटक लेता है। 
     मुझे समझ में नहीं आता ऐसे ‘डे’ क्यों बनाए गए हैं? कुछ बात होगी इसे ‘बनाने वालों” के लिए। 
       खैर लौटकर आया, अपने लिए ग्रीन टी बनाया। पहले मैं ग्रीन टी पीने वालों की खिल्ली उड़ाता था।
चलते_चलते
      किसी चीज को कुछ नाम देना यह हमारा शगल है, शब्दों को मायाजाल में नहीं बांधना चाहिए, शब्द निरीह होते हैं। वैसे मौन भी एक भाषा ही है।
#सुबहचर्या
  17.5.19

शनिवार, 30 मई 2026

गेट पर खड़ी संवेदना

     सुबह की टहलाई के लिए स्टेडियम की ओर निकला। चलते हुए अचानक एक कुत्ते पर निगाह चली गई। सड़क के किनारे वह अपनी पिछली दो टाँगों और आगे की दोनों टाँगों के पंजों को जमीन पर टिकाए आँख बंद किए बैठा था! उसके बैठने के अंदाज से मैं उसे देखता रहा गया। उस कुत्ते की भाव-भंगिमा एकदम से ध्यानावस्था जैसी थी। सड़क पर अभी भी सन्नाटा पसरा था, हम जैसे बस इक्का-दुक्का लोग ही आ-जा रहे थे। वहां एक खंभे पर लगे लैम्प-पोस्ट की रोशनी जरूर आस-पास बिखर रही थी। कुत्ता इसी रोशनी में सड़क की ओर मुँह करके बैठा था। 
        मैं स्टेडियम से वाकिंग करके वापस आ गया। रोज की तरह चाय बनाया। चाय पीने के कार्यक्रम के बीच घर भी फोन लगा दिया। पूरी घंटी गई लेकिन फोन नहीं उठा.. कुछ पल बाद घर से फोन आ गया...चाय सुड़कते हुए मैं फोन पर बतियाने लगा...
          मैंने पूँछा, "का हो..! का, हो रहा है..?"
          "रोटी बना रही हूँ..." का हो की आवाज।
      "इतनी सुबह-सुबह रोटी बन रही है?" थोड़ा चौंकते हुए मैंने पूँछा। असल में घर पर किसी के लिए टिफिन बनाने की तैयारी नहीं करनी होती।
       फिर उन्होंने बताया, "आज सुबह-सुबह जब गेट खोला तो कहीं से वह दौड़कर आ गया था... पहले उसे कुछ बिस्कुट दिया… इसे खाने के बाद भी वह बैठा रहा, गया नहीं.. इसलिए अब उसके लिए रोटी बनानी पड़ रही है।"
         यह पालतू नहीं है। बस हमारी गली में उसका जन्म हुआ था, दो वर्ष पहले। और इस गली में ही वह बड़ा भी हुआ। यह जुड़वा था। इसका भाई मेरे घर के सामने के चौराहे पर ही किसी वाहन से हुई दुर्घटना में चल बसा था। पहले उसका मेरे घर से बहुत लगाव था। कभी-कभी वह घर के बारामदे में चला आता और हम सबके साथ खेलता। जबकि उस समय यह बाहर सड़क पर बैठा रहता और वहीं से घर के गेट की ओर निहारता रहता… घर के अंदर न आता‌। 
        लेकिन उसके जाने के बाद एक दिन यह घर के अंदर बारामदे में बैठा दिखाई पड़ा। इसे वहां देखकर हम लोग विस्मित हुए थे। अब इसका हम लोगों से लगाव हो गया था! जब भी इसका कुछ खाने का मन होता है, यह घर के गेट के बाहर आकर चुपचाप बैठ जाता है। खाने को मिलते ही फिर वापस चला जाता है। और जब इसका आराम करने का मन होता है, तो गेट खुला मिलते ही यह बेधड़क भीतर चला आता है और किसी कोने में या कार के नीचे कुकुर-कुंडली मारकर इस तरह पसर जाता है मानो इसे किसी की परवाह ही न हो! तब घर के लोग भी इसके आराम में खलल डालने से बचते हैं। 
      एक दिन श्रीमती जी इसी के बारे में बता रही थीं। उस दिन जैसे ही उन्होंने गेट खोला, यह न जाने कहाँ से दौड़ता हुआ आ गया। इसके आने पर उनका ध्यान नहीं गया। कुछ देर तक यह उनके आस-पास मंडराता रहा, लेकिन उन्होंने इसे पुचकारने के बजाय झिड़क दिया। इसके बाद यह चुपचाप लौट गया था।
       लेकिन अगले दिन की बात है। पत्नी को कहीं बाहर जाना था। उन्होंने गेट खोला, तो यह गली में ही खड़ा दिखाई दिया। उन्हें देखकर भी इसने जैसे अनदेखा कर दिया और अनजान बन दूसरी ओर चल पड़ा। तभी श्रीमती जी को एहसास हुआ कि यह उनकी उपेक्षा से नाराज़ है। फिर उन्होंने इसे जबरन अपने पास बुलाया, रोटी-बिस्किट देकर मनाया। तब जाकर इसका मन पिघला और यह फिर उनसे खेलने लगा.. मानो इसे भी अपनी नाराज़गी पर संकोच हो आया हो!
      यह केवल एक कुत्ता भर नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील प्राणी है! इसकी इसी संवेदनशीलता को भाँपकर जब भी यह दिखाई पड़ता है, इससे मुखातिब होना पड़ता है, इसकी आवभगत करनी होती है; अन्यथा इसके नाराज हो जाने का डर बना रहता है। 
      सुबह हो या शाम, जैसे ही यह गेट पर आकर खड़ा होता है इसे रोटी दे दी जाती है। लेकिन इसकी सबसे अजीब बात यह है कि यदि यह कभी गेट पर आए और इसे रोटी न मिले तो फिर यह दुबारा उसी तरह गेट पर आकर खड़ा नहीं होगा। मानो इसे केवल रोटी से ही मतलब न हो, बल्कि अपनी उपेक्षा का एहसास भी भीतर तक छू जाता हो! इसके साथ व्यवहार करते हुए इसके पेट का ही नहीं इसकी भावनाओं का भी खयाल रखना पड़ता है!!
     तो आज सुबह-सुबह श्रीमती जी इसी के लिए रोटी बना रहीं थी। मैं मुस्कुरा उठा।
     “भाई, इसे केवल एक कुत्ते की कहानी समझकर हँसी में मत टाल दीजिएगा…! हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि बचपन में जाड़े की रातों में गाँव के अलाव के पास बैठकर हमने ऐसी ही न जाने कितनी कुत्ते-बिल्ली की कहानियाँ सुनी हैं। उन कहानियों में जानवर केवल जानवर नहीं होते थे, वे मनुष्यों की तरह रूठते-मनाते, अपनापन जताते और उपेक्षा महसूस करते थे।
       हाँ, तब कुछ रिश्तेदार हमें इन कहानियों में रस लेते देख ‘गँवार’ कहकर चिढ़ाते भी थे। लेकिन हम कभी चिढ़े नहीं। शायद इसलिए कि उन कहानियों में हमें जीवन की एक सच्चाई दिखाई पड़ती थी… संवेदना केवल मनुष्यों की जागीर नहीं है। यदि उन दिनों हम उन बातों से चिढ़ गए होते, तो आज यहाँ बैठकर आपको यह कहानी भी न सुना रहे होते। सच तो यह है कि अलाव के किनारे सुनी गई उन्हीं मामूली-सी लगने वाली कहानियों ने हमें इतना भर सिखा दिया कि किसी प्राणी की आँखों में उपेक्षा, अपनापन, नाराज़गी और प्रतीक्षा को पढ़ सकें। और शायद उसी का परिणाम है कि आज इस कुत्ते का गेट पर आकर चुपचाप खड़ा होना भी हमें एक कहानी जैसा लगने लगता है…!”
       आज के अखबार के अन्तिम पृष्ठ पर एक समाचार हेडिंग "इतिहास के सबसे खतरनाक मोड़ पर मानवता" में स्टीफन हाँकिंग के हवाले से लिखा था "मानव समुदाय भयानक पर्यावरण संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है। ...मानवता अपने विकास क्रम में सबसे खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर रहा है।" खैर...
#चलते_चलते
          हम भी यहाँ यही कहना चाहते हैं कि....
       ...असल में हमारा अहंकार में डूबा मन दूसरों की संवेदनाओं को पहचान ही नहीं पाता… संवेदनशीलता केवल भावुकता नहीं, बल्कि दूसरे के भीतर घट रही हलचल को महसूस कर पाने की क्षमता है।
 #सुबहचर्या 
    5/12/16

गुरुवार, 28 मई 2026

हिंदू होने की पहली शर्त

      सुबह गहरी नींद में था, जब लाउडस्पीकर का शोर कानों में पड़ा। मैं उठ गया‌, जिस आवाज से निद्रावस्था जैसी समाधि भंग हो निश्चित ही वह आवाज सुकूंन और शांतिदायक तो नहीं ही होगी!! 
       बाहर घना कुहरा छाया था, सड़क पर चलते हुए ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी धुंध में घुसे चले जा रहे हों! पीछे से कुछ लोगों की बातचीत की आवाज आती सुनाई पड़ी, किसी ने किसी को कहीं जाने के लिए कहा था लेकिन वह जाने के लिए तैयार नहीं था। बस इसी खुन्नस में वह "किसी" उस कहने वाले "किसी" को पुलिसिया शैली में गरियाये जा रहा था। उसकी गालियां मातृशक्ति को भी बीच में घसीट रही थी। 
     लौटते समय कुहरा छंटने लगा था। चाय पीते समय ध्यान लाउडस्पीकर पर गूँजती धार्मिक आवाजों पर गया, जिसके कारण सुबह-सुबह ही जाग उठा था। मैं विचार करने लगा…
 .... सभ्यता के प्रारंभ से जिज्ञासु मानव-मन ने अपने रहस्यात्मक-भाव वाले अनुत्तरित प्रश्नों को आध्यात्मिक भाव में बदले होंगे और फिर इसके बरक्स अपना जीवन-दर्शन गढ़ा होगा। मनीषियों ने कालान्तर में 'चाहिए' के भाव के साथ आचरण से सम्पृक्त करने के प्रयास में ही इसे "धर्म" कहा। यहाँ इस "चाहिए" में "बाँधने" का भाव नहीं, अपितु तार्किकता के आधार पर जीवन-दृष्टि का भाव समावेशित है, जो जीवन को सतत और सहज रूप से गतिशील बनाता है। यही "सनातन जीवनशैली" है, जिसे इधर 'हिन्दू धर्म' के नाम से संबोधित किया जा रहा है। यह सनातन जीवनशैली, आध्यात्मिकता और प्रकृति से तादात्म्य स्थापित कर हजारों वर्षों से अपना अस्तित्व बनाए हुए है तथा दुनियाँ की श्रेष्ठ सभ्यताओं में से एक है। 
          हम सदैव से जिज्ञासु रहे हैं; यह जिज्ञासा हमें तर्क के रास्ते वाह्य और अन्तर्जगत के चरम बिंदु अर्थात आध्यात्मिकता के धरातल पर ले जाकर खड़ा कर देती है, जहाँ से विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में ढलकर यह अपना उत्तर तलाशती है। इसप्रकार आध्यात्मिक-दृष्टि, जिसमें वैज्ञानिक और तार्किक दोनों दृष्टि अन्तर्वलित है, वैचारिक-सांस्कृतिक मान्यताओं को औदात्यपूर्ण बनाती है। हमारे इसी सनातन जीवन-शैली के औदात्यपूर्ण चिंतन से एक सर्वसमावेशी-सांस्कृतिक-सभ्यता निर्मित हुई और यही "हिंदू" होने की पहली शर्त भी है। 
     लेकिन आज "भक्ति-भाव" के बढ़ते आडंबर में यह हिंदू जीवन-दृष्टि धीरे-धीरे छीजते हुए कैसे हमें असहज बनाकर अपने ही मूल संदर्भ से विलग हो रही है, यह एक चिंतनीय विषय है। इसकी प्रक्रिया क्या और कैसे रही है, इसे समझने के लिए हम महाकाव्यों में वर्णित "राम" के चरित्र के भावबोध का सहारा ले सकते हैं, क्योंकि हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में राम एक ऐसे चरित्र रहे हैं, जिनसे यह समाज अनुप्राणित होता आया है। 
      हमारे रामायण-महाकाव्य अपने-अपने युगबोध के अनुसार राम के चरित्र को विभिन्न भाव-भूमि पर ग्रहण करते आए हैं। अतः इनमें राम का चरित्र अपने समय से संवाद करता हुआ प्रतीत होता है। इससे तत्कालीन समाज के उस सांस्कृतिक मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को भी समझा जा सकता है, जिससे धार्मिक मनोवृत्तियों में परिवर्तन के साथ समाज भी इससे प्रभावित हुआ। जैसे, ऐसा क्यों है कि जीवन-संघर्ष में जूझते बाल्मीकि के राम एक सामान्य मानवीय चरित्र हैं और वहीं तुलसी के राम 'ईश्वरत्व' की भावभूमि पर स्थापित हैं? यह अध्यात्म से भक्ति की ओर जाते समाज की अपने सांस्कृतिक संदर्भों के साथ प्रतिक्रिया रही होगी। समाज पर इसके प्रभाव का विश्लेषण एक विचारणीय बिंदु है ।...
      हाँ तो आज बस यहीं तक, कोशिश रहेगी इसपर फिर कभी गुफ्तगूँ करेंगे। हो सकता है आप मेरी बातों से इत्तेफाक न रखते हों, लेकिन कोई बात नहीं। 
#चलते_चलते
     धुंध के पार जाने के लिए चलते रहना चाहिए। 
#सुबहचर्या 
 (3.12.18)

ये आवाजें धर्म की नहीं!

        आज रविवार है..टहलने नहीं जाना था, रविवार का दिन निरुद्देश्य बिताने की इच्छा रहती है। लेकिन सुबह की अजान कानों में पड़ी तो नींद खुल गई। दुबारा सोने की कोशिश किया तो भजन की आवाज सुनाई पड़ने लगा। जैसे दो "धर्मानुयायियों" के बीच "राइवलरी" हो! इधर ध्यान दे रहा हूं तो यह प्रवृत्ति कुछ बढ़ती जान पड़ती है। जैसे आज ही लाउडस्पीकर पर सुनाई देने वाली ये आवाजें शोर की हद तक परस्पर गड्डमड्ड हुए जा रही थीं!
     अब तो 'धर्मों' का लाउडस्पीकरीकरण हो चुका है। इससे धर्मों की शान्त..स्निग्ध..कोमल भावना कर्कश ध्वनि में बदलती जा रही है! खैर, 
       यह "धर्मों" में आया यह नया "भक्ति-वाद" हमारे "ज्ञान-तंतु" को धीरे-धीरे कमजोर करने लगा है। इस शोर के बीच मैंने स्वयं से गुफ्तगूं किया - जैसे कि…
       "हिन्दू जीवनशैली या भारतीय जीवन-दर्शन की आधारभूमि वेदः प्रसूत आध्यात्मिकता है, जो हमारी धार्मिक-सांस्कृतिक मनोवृत्तियों को साम्प्रदायिक-मनोवृत्ति में बदलने नहीं देती और व्यक्ति को अपने मान्यताओं के केंद्र में रखकर चलती है। इसकी पुष्टि "बिंब प्रतिबिंब" उपन्यास में स्वामी विवेकानंद के इस कथन से की जा सकती है- 
      "प्रत्येक व्यक्ति का विकास अपनी आन्तरिक शक्ति द्वारा ही होना चाहिए, अपने स्वभावानुसार ही उसका विकास होना चाहिए, उन्नति होनी चाहिए, अवनति होनी चाहिए।"
      यह कथन उस वैदिक संस्कृति की ओर संकेत है जिसमें निहित आध्यात्मिकता से व्यक्ति में स्वतंत्र चेतना के साथ आत्मिक विकास की भावना सुदृढ़ होती है और उसे किसी "सम्प्रदाय" का अंग बनने से रोकती है। 
        लेकिन यहीं पर एक प्रश्न उभरता है, क्या 'हिंदू-धर्म' के रूप में रूढ़ होते इस सनातन जीवनशैली को "धर्म" की संज्ञा देकर "रिलिजन" या "मजहब" की परिधि में लाकर उसकी मूलभावना "आध्यात्मिकता" से इसे अलग नहीं किया जा रहा? 'धर्म' के नाम पर ये आडंबर कहीं हमें अपनी जड़ से काटकर कटी पतंग की तरह भटकने के लिए तो नहीं छोड़ रहे? आखिर इसके लिए कौन सी धार्मिक-वैचारिक सांस्कृतिक परिस्थितियाँ उत्तरदायी है? 
       ये प्रश्न और इनके उत्तर भारतीय जीवन-दर्शन के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके पीछे का मनोविज्ञान किसी राष्ट्र-राज्य की सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक उन्नति के साथ उसे एक श्रेष्ठ समाज व्यवस्था में बदलने का कारण हो सकता है। इस मनोविज्ञान का सामान्य जनमानस पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, इसे समझने का प्रयास किया जा सकता है।"
       हाँ..आज बस इतना ही! इस बात पर फिर बात करने का मन हुआ आगे की बात करेंगे।
 #चलते_चलते
      किसी बात के कई पहलू हो सकते हैं, सार्थक और निरर्थक! लेकिन बात कुछ अर्थ छोड़ते हैं, बस इन अर्थों को पकड़ने कोशिश होनी चाहिए... 
  #सुबहचर्या 
    (2.12.18)
       विनय

ज्ञान का विरोधी ज्ञान

      आज सुबह छह बजे टहलने के लिए निकला‌। बाहर वातावरण में धुँधलका छाया हुआ था, एकदम कुहरा के माफिक! सड़क पर मोटरसाइकिलों एवं अन्य वाहनों का आना-जाना शुरू हो चुका था। मन में खीझ-सी उठी कि इनसे सबेरे की शान्ति भंग हो रही थी। सोचा, इन्हें सुबह-सुबह निकलने की ऐसी क्या जल्दी पड़ी है?
      इस बीच एक मोटरसाइकिल तो धुँएं का गुबार छोड़ते हुए ऐसे निकली कि उसके धुएँ और गंध से मेरे नथुने भर गए! एक अजीब से गुस्से और खीझ लिए मैं वापस लौटने को हुआ, फिर यह सोचकर कि इधर टहलने का रुटीन सही नहीं चल रहा, कम से कम टहलने का कोटा भी तो पूरा होना चाहिए, लौटने का विचार त्याग दिया। खैर..
       टहलाई पूरी कर आवास पर आया। वही रोज़ की भांति अखबार उठाया। पहली निगाह ही "वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का निधन" की हेडिंग पर पड़ी..
         ....हाँ.. अखबार पढ़ने का चाव मुझे बचपन से ही था, लेकिन जैसे-जैसे देश-काल की समझ विकसित होती गई, मैं सम्पादकीय पृष्ठों के लेख भी पढ़ने लगा। जिन लेखकों को मैं विशेष रूचि से पढ़ता था उनमें कुलदीप नैयर भी शामिल थे! 
       उन दिनों इंटर कालेज में पढ़ता था..किसी समसामयिक विषय पर कुलदीप नैयर का एक लेख छपा था। उस दिन घर पर दादा जी समेत कई लोग उसी लेख को लेकर बतिया रहे थे। तब, आज से तीस-पैंतीस वर्ष पहले, लोगों के पास आपस में बिना लाग-लपेट के और बिना जल्दबाजी के बैठकर बतियाने का समय भी हुआ करता था। मैं कुलदीप नैयर का वही लेख पढ़ते हुए उनकी यह बातचीत सुनने लगा। 
     तभी किसी ने मुझसे कहा, "अरे यह कुलदीप नैयरवा तअ.. वामपंथी..है एकर लेख तअ ऐसई ऊटपटांग रहथअ.." लेकिन उसके बाद कुलदीप नैयर के लेख पढ़ने को लेकर मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई.. वह जिज्ञासा आज तक बनी रही..
      यही नहीं किसी विषय पर अपनी बनायी धारणा के विपरीत वाली धारणा को जानने की जिज्ञासा भी धीरे-धीरे बढ़ती गई थी…
       असल में घटनाओं और बातों पर नैयर जी का बौद्धिक विश्लेषण तार्किक हुआ करते थे.. उनके लेख पढ़ते हुए ऐसा लगता जैसे सोचने की एक और न‌ई दृष्टि खुल रही हो!
#चलते_चलते 
      अगर हम अपने ज्ञान के विरोधी ज्ञान को नहीं जानते तो कुछ नहीं जानते...
#सुबहचर्या 
 (24.8.2018)
    श्रावस्ती

बुधवार, 27 मई 2026

इंसानी फितरत को समझने वाले जानवर!

       आज सुबह टहलने निकले, वही पाँच पैंतालीस पर! पहले तो मन ही नहीं हो रहा था कि टहलने निकलें.. लेकिन मन का क्या! वह तो ऐसा ही है। उसके हिसाब से चलें तो फिर हो चुका! यह चीजों को चौपट करके ही माने। इसीलिए कभी-कभी मन के विरुद्ध चलने में भी भलाई छिपा होता है… बशर्ते यह इस बात पर निर्भर है कि हम ऐसा करके चाहते क्या हैं? खैर।
       मैं स्वयं का स्वास्थ्य-शुभेक्षु हुआ सड़क पर पग-चालन करने लगा.. चलते-चलते विकास भवन की एक तस्वीर ली.. सोचा, यदि तस्वीर लेते हुए कोई मुझे देखता है तो वह यही अनुमान लगा सकता है कि हो न हो इस बिल्डिंग में जरूर कोई खास बात है। वैसे यह बिल्डिंग मेरे लिए खास तो है ही! फिलहाल इन विचारों को परे हटाकर मैंने विकास भवन की तस्वीर मोबाइल में कैद कर लिया।
      इधर सड़क पर झुंड में गौ-पशु ऐसे खड़े दिखाई पड़े, मानो आदमियों के काम में व्यवधान डालने की ठान कर आए हों..! मेरे सामने एक ट्रक और एक बस इन्हें बचाते हुए साइड से निकले। 
      थोड़ा आगे बढ़ा तो गायों की देखा-देखी घोड़े भी सड़क पर साधिकार खड़े दिखाई दिए… शायद गायों को देखकर घोड़ों को भी अस्तित्व-बोध हुआ हो कि नहीं हमारे भी कुछ जीवनाधिकार हैं हम भी सड़क पर गायों की तरह खड़े हो सकते हैं, वैसे भी मार्गों पर सदियों से हमारा जन्मसिद्ध अधिकार रहा है! 
       सड़क पर गाय और घोड़े बेफिक्र खड़े थे, मैंने मन ही मन सोचा, अन्य जानवरों को भी इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। सभी जानवर इकट्ठे होकर समझदारी दिखाते हुए एक जानवर-संघ बनाकर सड़क पर आकर खड़े हो जाएं और इंसानों को चेता दें कि हमारे भी मूलाधिकार की चिंता की जाए! 
        वैसे एक बात है, यह जानवर-संघ इंसानों पर अवश्य भारी पड़ेगा, क्योंकि यहाँ प्रत्येक इंसानों में एक दूसरे को इंसान न मानने की प्रजातीय बिमारी है, पशु-संघ इंसानों के बीच की इस बिमारी का लाभ उठा सकते हैं! क्यों है न? खैर। 
     फिर नजर ग‌ई सड़क के ऊपर आर-पार लगे साइन-बोर्ड पर, जिसपर लखनऊ, बहराइच, श्रावस्ती की दूरी लिखा था, उस बोर्ड पर लंगूर परिवार अपने बाल-बच्चों समेत चहलकदमी कर रहे थे! शायद इन्हें इंसानी फितरत की अच्छी समझ है, इन्हें जानवर-संघ का सदस्य बनने की जरूरत नहीं, इसलिए ये सड़क पर नहीं उतरे! 
     यहां सेथोड़ा आगे बढ़ा, एक कुत्ता महाशय जानवर-महासंघ का विद्रोही टाइप बने आदमियों का सहयोग करते प्रतीत हुए..! ये महाशय अकेले ही सड़क के नियमों का पालन करते हुए चले जा रहे थे। इन्हें ऐसे चलते देख मैंने सोचा, "ये महाशय भी आदमगीरी को बखूबी जानते इसके बरक्स इन्हें अपने कुत्तागीरी में ही मज़ा है, इसलिए इन्हें भी जानवर-महासंघ में सम्मिलित होने की क्या जरूरत? शायद इसीलिए निश्चिंत हैं! खैर..
      रात में बारिश हुई थी। अभी तक सुबह के वातावरण में उससे ठंडकपन बनी हुई थी। हवाओं में घुली यह ठंडकपन मेरे विचारों को गर्मी प्रदान कर रही थी। इस मौसम में मुझे अपने विचारों के साथ चलने में मजा आ रहा था। 
     तभी देखा! सामने कुछ दूर एक इंसान सड़क पर ही (पटरी नहीं) अपनी साइकिल छोड़ वहीं खंती की ओर बढ़ गया। वहां बैठा वह प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान को धता बताने लगा! खैर इस सार्वजनिक स्थान पर भी किसी की निजता भंग न हो मैंने उससे नजरें फेर लिया उसकी गिरी-पड़ी साइकिल की तस्वीर भी नहीं लिया‌। 
      इसके लिए कुछ लोग बेचारे प्रधानमंत्री को दोष दे सकते हैं कि उनका स्वच्छता अभियान मात्र दिखावा है! फिर मैंने मन ही मन सोचा, "काश! प्रधानमंत्री यहाँ लट्ठ लेकर खड़े होते, तो उनका स्वच्छता अभियान अवश्य सफल होता!! लेकिन खैर यह देश ही ऐसा है, यहाँ सब को जोर की लगी है..महान से महान प्रधानमंत्री के पुरखे भी इसे नहीं रोक सकते!!!
     अब मैं वापस अपने आवास के पास पहुँचा ही था कि बकरियों की आर्त्र स्वर में मिमियाहट सुनाई पड़ी, मेरे सामने से गुजरती मोटरसाइकिल पर एक आदमी दो बकरियों को अपनी गोद में बेरहमी से दबाए था। उस मोटरसाइकिल के दोनों ओर दो बोरे भी टंगे थे, उसमें भी एक-एक बकरियां बँधी थी! मतलब मोटरसाइकिल पर कुल चार बकरियां और दो आदमी थे! इन्हें इस तरह जाते देख मैंने सोचा, "पता नहीं इन बकरियों की अम्मा इनका खैर मनाने के लिए बची भी होगी या नहीं..."
#चलते_चलते 
      जिसे केवल अपनी पड़ी है, उसे ऊँच-नीच कुछ भी नहीं सूझता..
#सुबहचर्या 
   (26.7.18)