लिखास
यह अकथ-मन ! यहाँ प्रश्नों और उत्तरों की टकराहटों में एक सार्थक दुनियाँ तलाशनें की आकुलता है...
लोकप्रिय पोस्ट
-
१ उसे काम चाहिए…ऐसा काम जिससे उसकी राहें खुल सकें..अपनी मर्ज़ी का मालिक बन सके..पिता और मां नही...
-
रामचरितमानस में एक चौपाई है “ रघुकुल रीति सदा चलि आई , प्राण जाय पर वचन न जाई। ” यहाँ चौपाई के इस कथन में निहित वह ‘मानसिक तत...
-
मैं सुबह-सुबह लगभग साढ़े पाँच बजे स्टेडियम तक टहलने चला जाता हूँ। इस स्टेडियम में चारों ओर किनारे पर लगभग साढ़े चार फीट की...
-
उस दिन इलाहाबाद से महोबा स्वयं ड्राइव करते हुए कार से जाने का मन कर गया...साथ में श्रीमती जी और छोटे पुत्र श्रेयांश भी थे...एक बात...
-
सुखई को बीडीओ साहब से कई बार बुलावा आ चुका था.…! आज हरखू परधान बीडीओ का सन्देश लेकर स्वयं उसे बुलाने आए थे.…! लेकिन…! सुखई ...
-
( "कोमा में" - हाँ पिछले दिनों समाचारों में ...
-
न जाने क्यों कई दिनों से मन में बेचैनी सी छाई हुई थी..इसका कारण खोजने लगा तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था..फिर अपने अन्दर डुबकी लगा...
-
कई दिन हो गए थे टहले हुए, तो आज सुबह पौने पाँच बजे ही निकल पड़ा। वैसे यह टहलाई हप्ते में औसतन तीन दिन होती है। स्टेडियम में ग्रुप...
-
घसीटू को थाने पर आए हुए दो घंटे से अधिक हो गया है, वह तहरीर ले कर आया है लेकिन उसकी ‘रिपोरट’ थाने के रजिस्टर पर अभी तक दर्ज नहीं ह...
-
1 सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर ढक्कन सीमेंट से जाम था। पिछले दस मिनट से वह छेनी और हथौड़े की मदद से इ...
शनिवार, 4 जुलाई 2026
सुबह, गुस्सा और पकौड़ियाँ
बुधवार, 1 जुलाई 2026
विश्वास-धर्म
जैसे ही गिलास खाली कर मेज पर रखा, उन्होंने सीख देने के अंदाज में कहा, "बिना गिलास में देखे इस तरह नहीं पीना चाहिए।
उनकी बात पर मैं कह उठा, "लेकिन जब कोई अपने हाथ से गिलास दे रहा हो, तो उस पर विश्वास करना ही चाहिए। मैंने गिलास में इसलिए नहीं झांका, क्योंकि विश्वास बहुत बड़ी चीज है!’ मेरी यह बात सुनकर मित्र निरुत्तर-से हो गए।
हाँ यहां वे कह सकते थे, "यदि गिलास थमाने वाले से ही कोई लापरवाही हो रही हो तो? इसलिए भी देखना चाहिए।'
खैर बातों का क्या, बातें तो बहुत हो सकती है, मुझे एक घटना याद आती है,
बरसात का मौसम ढलान पर था। उन दिनों रसोई में मिट्टी के चूल्हे पर उपलों और लकड़ियों से ही खाना बनता था और रोशनी के लिए मिट्टी के तेल की ढिबरी जलती थी।
मेरे दादा जी को चाय पीने की आदत थी। वे बखरी के बाहर दलान में रहते थे। उस दिन भी शाम ढल रही थी। रोज़ की तरह अम्मा ने मिट्टी के चूल्हे पर उनके लिए चाय बनाई। मैं गिलास में चाय लेकर दादा जी के पास गया। जैसे ही उन्होंने मेरे हाथ से गिलास लिया उनकी निगाह अचानक चाय पर पड़ी। चाय में एक मरा हुआ मेढक का बच्चा तैर रहा था। यह दृश्य देखकर मैं भी सिहर उठा।
बस, फिर क्या था! दादा जी अम्मा पर बुरी तरह नाराज़ हो उठे। घर के बाकी लोगों ने काफी देर तक उनका मान-मनौव्वल किया और उन्हें समझाया-बुझाया, तब कहीं जाकर उनका गुस्सा शांत हुआ। आखिरकार वे चाय पीने के लिए इस शर्त पर राजी हुए कि चाय उनके सामने बनाई जाएगी।
उन दिनों स्टोव का जमाना था। दालान में स्टोव, चायपत्ती, गुड़, दूध और बाकी सारा सामान लाकर रख दिया गया। दादा जी ने एक-एक चीज को बारीकी से देखकर तसल्ली कर ली, तब चाय बननी शुरू हुई।
लेकिन विडंबना देखिए, जब चाय छन्नी से छानकर गिलास में डाली जा रही थी, तभी छन्नी में एक नन्हा मेंढक दिखाई पड़ा। वह अभी-अभी टैडपोल से मेंढक बना था।
एक पल के लिए हम सब स्तब्ध रह गए। अब किसी को दोष भी कैसे देते? सारी सामग्री दादा जी की आँखों के सामने जाँची-परखी गई थी, फिर भी वह नन्हा मेंढक चाय तक पहुँच ही गया था।
उस समय मेरी उम्र इतनी नहीं थी कि इस घटना के पीछे छिपे निहितार्थ को समझ पाता। मेरे लिए वह बस एक अजीब और हैरान कर देने वाली घटना थी।
लेकिन आज, जब कभी यह प्रसंग याद आता है, तो लगता है कि जीवन की बहुत सी घटनाएँ किसी एक व्यक्ति के दोष से नहीं घटतीं। कई बार पूरी सावधानी बरतने के बाद भी ऐसी बातें हो जातीं हैं, जिनका कोई स्पष्ट दोषी नहीं होता। इसलिए किसी की अनजाने में हुई गलती पर अनावश्यक टंटा खड़ा कर देने से न तो समस्या का समाधान होता है और न ही मन को संतोष मिलता है। उल्टे जीवन में कड़वाहट ही घुलती है।
उस दिन छन्नी में मिला वह नन्हा मेंढक जैसे चुपचाप यही सिखा गया था कि हर घटना में दोषी तलाशना जरूरी नहीं होता; कभी-कभी उसे एक संयोग मानकर आगे बढ़ जाना ही अधिक समझदारी होती है।
आज सुबह टहलकर लौटा तो मन में एक ही बात बार-बार चकरघिन्नी की तरह घूमती रही—विश्वास।
सोचता हूँ, जब मनुष्य ने संगठित धर्मों की कल्पना भी नहीं की होगी, तब भी जीवन किसी न किसी आधार पर तो टिका होगा, शायद वह आधार विश्वास ही रहा होगा। यदि विश्वास न होता, तो न परिवार बनते, न समाज बनता और न ही मानव सभ्यता इतनी दूर तक पहुँच पाती।
यह विश्वास केवल मनुष्य तक ही सीमित नहीं है। किसी घोंसले में चोंच फैलाए बैठे चिड़िया के बच्चे भी यही विश्वास किए रहते हैं कि उनकी माँ लौटेगी और उन्हें दाना चुगाएगी। वे कोई प्रमाण नहीं मांगते, कोई तर्क नहीं करते; उनका जीवन विश्वास पर टिका होता है।
शायद इसी कारण मुझे लगता है कि 'विश्वास-धर्म' सबसे पुराना धर्म है। और आज के समय में, जब संदेह हमारे रिश्तों, व्यवहार और समाज में तेजी से बढ़ रहा है, तब यही धर्म सबसे अधिक बचाए जाने योग्य भी है। बाकी सारे धर्म तभी तक सार्थक हैं, जब तक उनके भीतर विश्वास जीवित है।
लेकिन आज लगता है मनुष्य का सबसे बड़ा संकट विश्वास का संकट है। हम सामने वाले को स्वीकार करने से पहले उसे अपने जैसा ही बनाना चाहते हैं। बस यहीं से विश्वासघात की आशंका जन्म लेती है और विश्वासघात की प्रवृत्ति भी।
इन्हीं बातों के बीच सोचता हूँ आज मित्र ने जो गिलास मेरी ओर बढ़ाया था, उसमें मेरे झाँककर न देखने का कारण यह नहीं था कि मैं लापरवाह था, बल्कि इसलिए कि वह गिलास किसी अपने के हाथ से दिया गया था। मुझे लगा, विश्वास का अर्थ ही यही है कि हर बार प्रमाण की माँग न की जाए।
हो सकता है, व्यवहारिक दृष्टि से मेरा ऐसा करना सावधानी न माना जाए लेकिन मन की दृष्टि से उस क्षण मैंने 'विश्वास-धर्म' निभाया था। विश्वास में जोखिम हो सकता है, कभी-कभी धोखा भी मिल सकता है, फिर भी विश्वास के बिना न मित्रता टिकती है, न परिवार और न समाज। अंततः सभ्यता का सबसे मजबूत आधार नियम नहीं है, विश्वास ही है।
#चलते_चलते
मस्त रहिए, आप अपनी जगह सही रहेंगे, तो बहुत-सी चीजें अपने-आप ठीक हो जाती हैं।
#सुबहचर्या
(२४.१०.१९)
गुरुवार, 25 जून 2026
ऐ इंसां, ज़रा पागल होना भी सीख ले!
मैं जाग ही रहा था, लेकिन फोन मुझे जगाने के लिए आया था। थोड़ी देर बाद मैं मार्निंग वॉक के लिए निकल पड़ा। सड़क पर पहुँचते ही मैंने फोन करके उनको बताया कि मैं सड़क पर आ गया हूँ।
उधर से मुस्कुराहट में पगी आवाज सुनाई पड़ी, 'देखो, मैंने तुम्हें सड़क पर ला दिया।'
मैंने उस चौड़ी, शानदार सड़क पर दूर तक निगाह दौड़ाई और मुस्कुराते हुए कहा, सड़क पर आना कोई बुरी बात नहीं। सड़क तो वह रास्ता है, जो आदमी को उसकी मंजिल तक पहुँचाती है।”
मेरी इस बात के साथ ही दोनों ओर हल्की-सी हँसी बिखर गई और बातचीत समाप्त हो गई। तब-तक फोन करने वाले शख्स सड़क के किनारे खड़े हमारा इंतजार करते दिखाई पड़ गए थे। वहां से हम दोनों साथ-साथ सड़क पर चल पड़े।
तभी उनकी बैडमिंटन टीम के एक साथी खिलाड़ी मोटरसाइकिल से पीछे से आ पहुँचे। वे उनके साथ बैठना तो चाह रहे थे, पर संकोच कर रहे थे। मैंने ही उन्हें थोड़ा सा धक्का दिया कि बैठ जाइए। शायद उन्हें यह शंका थी कि कहीं मैं रास्ते से ही वापस न मुड़ जाऊँ, इसलिए मोटरसाइकिल पर बैठते हुए वे हँसकर बोले, ‘देखिए, आपको स्टेडियम तक आना है, लौटना नहीं है।’ खैर…
वैसे मेरे वे साथी स्टेडियम में पहुंचते हैं तो पहले नीम के एक पेड़ को गले लगाते हैं, उसके तने को छूते हैं। अभी कल वाली सुबह उन्होंने मुझसे भी ऐसा ही करने के लिए कहा था। मैं स्टेडियम में पहुँचा तो वे शायद इन्डोर बैडमिंटन कोर्ट में जा चुके थे। इधर मैं भी स्टेडियम के टहलने वाले ट्रैक की ओर चला गया। उस पर दो चक्कर लगाकर मैं वापस हो लिया।
मैं लौट रहा था। तभी एक व्यक्ति के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी। ध्यान से देखा तो यह आवाज मेरे आगे-आगे चल रहे एक पागल की थी। उसका यूँ बेवजह अजीब-सी आवाज में चिल्लाना, उसकी पागलों वाली अवस्था की अभिव्यक्ति थी।
फिर अचानक एक जगह उसे झुकते देख, मैंने सोचा शायद वह कोई ढेला उठाने के लिए झुका हो। लेकिन उसने वहाँ पड़ी एक मैली-कुचैली तौलिया उठा ली। उसे पास के मील-पत्थर पर बड़े करीने से रख दिया और उसके ऊपर एक छोटा सा पत्थर भी रख दिया।
मैंने सोचा, शायद तौलिया के ऊपर पत्थर उसने इसलिए रखा होगा कि हवा से वह न उड़ जाए। यह सब करने के बाद वह पूरी तरह निर्लिप्त भाव से वहां से आगे बढ़ गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे चल रहा था। तभी मैंने गौर किया कि वह चलते-चलते बीच-बीच में झुक जाता और सड़क पर पड़ी कोई न कोई चीज उठा लेता, कभी कोई ऐसा कंकड़, जो किसी के पैरों में गड़ सकता था, तो कभी कूड़े जैसी चीज। फिर वह उसे सड़क से दूर फेंक देता।
उस पागल के इन कृत्यों को देखकर मैंने सोचा, मानो सड़क पर चलते हुए वह अनजाने में ही राह को दूसरों के लिए थोड़ा और सुगम बनाता जा रहा हो।
आज लिखने का मन नहीं था, लेकिन उस "पागल" की वजह से लिखने बैठ गया, बस आज इतना ही।
#चलते_चलते
ऐ इंसां, तू किस गुमान में है! ज़रा पागल होना भी सीख ले।
#सुबहचर्या
(४.९.१९)
बुधवार, 17 जून 2026
संतोष का कारण
शनिवार, 13 जून 2026
तबियत से पत्थर उछालने वाले की तबियत
गुरुवार, 11 जून 2026
परसेप्शन बनाएं लेकिन…
भारत को तो बख्श दीजिए!
साढ़े पांच बज रहे होंगे जब मैं आवास की छत पर आया। इस भोर की एक तस्वीर भी ली। तस्वीर लेते समय मुझे कामायनी की यह पंक्ति याद आई,
'दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात'
स्टेडियम पहुंचते ही शुक्ला जी इनडोर बैडमिंटन कोर्ट की ओर चले गए और मैं खुले ग्राउंड की ओर। दौड़ते हुए इस मैदान का मैंने दो चक्कर लगाया। और फिर सामान्य चाल से एक चक्कर और पूरा किया। ग्राउंड का एक चक्कर लगभग पांच सौ कदम का है।
बालीबाल टीम के सदस्य दृष्टिगोचर हुए। तो उनके ग्राउंड की ओर चला गया। चूंकि मैं बालीबाल खेलना सीख ही रहा हूँ, इसलिए कौन कैसे बाल हैंडल करता है, ध्यान से देखता हूँ। आज भी ध्यान इसी पर था।
उन्हें मैं मझा खिलाड़ी समझता था, लेकिन साथी खिलाड़ी को बॉल पास करने में उनसे चूक हो गई। वह गलत दिशा में चली गई। मुझे लगा बॉल को नहीं छूना चाहिए था। लेकिन फिर मन में कौंधा कि यदि बाल को हैंडल करने में कोई गलती हुई है तो उससे सीख ही मिलेगा।
स्टेडियम से लौटते समय शुक्ला जी साथ थे। उन्होंने कहा, "जो विजेता होता है, वही इतिहास लिखता है और विजेता वही होता है जो लड़ता है।" उनकी यह बात सही लगी।
कश्मीर से धारा 370 हटाने पर विवाद और संघर्ष की आशंका थी। लेकिन यह भी एक प्रयास है, समस्या से लड़ने का।
एक बात अनुभव से भी सीखता आया हूँ, सही मन से लिए गए निर्णयों के परिणाम अच्छे होते हैं। यहाँ हार में भी जीत होती है।
लोग कश्मीर पर दिल जीतने का तर्क देते हैं। लेकिन हँसी आती है इसपर। क्या दिल जीतना इतना आसान है? वैसे 'राज्य' के सारे कानून दिल जीतने के लिए ही तो हैं फिर भी दिल हैं कि मानता नहीं और समस्या ज्यों की त्यों!
भाई मेरे! राज्य अपने नागरिकों का दिल जीतने वाला कानून तो बनाता ही है लेकिन दूसरी ओर उसे ऐसे कानून भी गढ़ने होते हैं जो स्वयं राज्य को भी संरक्षित करे। इसलिए इन बातों पर ज्यादा हाय-तौबा मचाने और बौद्धिक विश्लेषण की जरूरत नहीं।
मैं देख रहा हूं, धारा 370 हटाए जाने की व्याख्या तमाम नजरिए से हो रही है। जैसे, राष्ट्रवादी, संम्प्रदायवादी, वामपंथी, बुद्धिवादी, संविधानवादी और राजनीतिक; सबकी अपनी-अपनी व्याख्या।
लेकिन सबसे अधिक घातक साम्प्रदायवादी व्याख्या है। ऐसा करने वालों को मैं "नान-स्टेट-ऐक्टर" मान सकता हूँ। ये राज्य की अवधारणा को फालो नहीं करते। यह उर्वर जमींन में ज़हर बोने जैसी व्याख्या है।
खैर यह तो हमारे संविधान की खुबसूरती है कि यहाँ ज़हर बोने की भी स्वतंन्त्रता है!
रही बात कुछ साहित्यकार टाइप के बुद्धिजीवियों की, तो उनकी बात ही निराली है।
प्रकाशकों की कृपा से साहित्यकार बने इन बेचारों को, बस बात को घुमाफिरा कहने की कला भर आती है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। दिल्ली में बैठकर साहित्य नहीं रचा जा सकता। ये अपनी बातों में जबर्दस्ती का साहित्य ठूँसते हैं। जनसरोकार के नाम पर जन से कटे हुए लोग हैं ये।
जहाँ तक ‘लोकतंत्र विरोधी’ जैसी राजनीतिक व्याख्या की बात है, तो उन्हें भी समझना चाहिए कि सत्ता को ताकत भी लोकतंत्र से ही मिलती है।
एक बात और, संविधानवादी व्याख्या की बात है, तो संसद की बात माननी ही पड़ेगी, बाकी सर्वोच्च न्यायालय है ही इस बात की व्याख्या करने के लिए।
अंत में एक बात, प्रकृति ने ही भारत की सीमा को निर्धारित किया था। शायद यही कारण रहा होगा कि इसके एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक हजारों वर्षों से निर्बाध आवागमन चला। अगर ऐसा न होता तो अफगानिस्तान में बामियान न होता, या फिर एक ही संस्कृति के प्रमाण न मिलते।
भाई मेरे, यह भारतभूमि यूरोपियन देशों की तरह किसी राजनीतिक एकता का परिणाम नहीं, एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण का परिणाम था, और आप इसकी तुलना सोवियत या यूरोपियन यूनियन के देशों से करते हो!!
कामरेड, इसे समझिए, आप जैसे लोग धर्म को धर्म नहीं, किसी खास राजनीतिक विचारधारा को ही धर्म मानते हो, या फिर धर्म को संम्प्रदाय बना देते हो, अन्यथा धर्म के नाम पर देश का विभाजन न हुआ होता।
अब तो भारत को बख्श दीजिए और इसे तोड़ने वाले प्राविधानों को ही तोड़िए!
मित्रों, इस सुबहचर्या को मैंने थोड़ी तल्खी में लिख डाला है, क्षमा करें।
#चलते_चलते
किसी चीज के लिए किया गया हमारा सद्प्रयास ही अपने आप में विजय के समान होता है।
#सुबहचर्या
(८.८.१९)