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बुधवार, 27 मई 2026

जीवन तो जीवन है!

        इधर सुबह नींद तो खुलती है लेकिन मन अलसाया रहता है। मन को समझाते-समझाते लगभग पौने छः बज गये थे, तब उठा। एक बात और है हो सकता है वाकिंग के लिए कोई उचित स्थान न पाकर मन टहलने जाने से आनाकानी करता हो? वैसे यहां नया-नया हूँ अभी सामने से गुजरती सड़क पर टहल लेता हूँ। यहाँ एक स्टेडियम भी है; लेकिन वहाँ तक जाने में ही सुबह की टहलाई का कोटा खर्च हो जाता है, वहां टहलने को कुछ नहीं बचता। लेकिन सड़क पर टहलना भी आजकल कम खतरनाक नहीं। सड़क के नियम को लोग नियम-फियम मानकर हवा में उड़ा देते हैं! और अपनी जान के साथ-साथ दूसरे की जान भी खतरे में डाल देते हैं। खैर यह सब जानते-फानते हुए भी हम इसी सड़क पर टहल लेते हैं। 
        आज जिज्ञासावश पहली बार स्टेडियम चलने की सूझी। उधर चलते हुए मैं अपने कदम गिन रहा था। सड़क से स्टेडियम की ओर एक खड़जा-मार्ग जा रहा था। मैं इस रास्ते पर मुड़ गया। इस रास्ते में एक मैदान में कुछ खच्चर नुमा घोड़े घास चरते नजर आए। 
        घर से स्टेडियम के गेट तक पहुँचने में लगभग सोलह सौ कदम हो चुका था। इसके मैदान में चार-छह लोग क्रिकेट खेल रहे थे... एक बच्चा था, वह हाथ में हाकी थामे था। उसके सामने एक सयाना शख्स भी हाकी लिए खड़ा था.. दोनों के बीच नीचे जमीन पर गेंद पड़ी थी। 
       कुछ ही क्षण बाद बच्चा डिबलिंग की कोशिश करने लगा। 
       एक अन्य व्यक्ति मेरी ही तरह स्टेडियम के मैदान को भर-आँख निहार रहा था। मैं इस मैदान का चक्कर लगाने की सोचने लगा। महोबा जैसा यहां मैदान के चारों ओर कंक्रीट-पथ नहीं बना है। 
     "आज पहला दिन है, बाद में टहलने की सोचेंगे" सोचकर मैं वापस होने को हुआ कि तभी दूर एक लंबे-चौड़े सीमेंटेड जमीन के कोने पर आराम से सोए एक कुत्ते पर निगाह पड़ी, वह तो जैसे घोड़ा बेचकर सो रहा था। उसके सोने के अंदाज से मुझे ईर्ष्या हुई कि मैं ही बेवकूफ हूँ जो टहलने आ गया। 
        खैर लौट पड़ा। आवास तक आने में यूँ ही लगभग चौंतीस-पैंतिस सौ कदम चल चुका था।
       अखबार आया था। इसे लेकर पढ़ने बैठ गया। सोचा जब तक चाय बनेगी तबतक मैं अखबार पढ़ चुका होऊंगा। 
      अखबार में मलिक मुहम्मद जायसी की मृत्यु के बारे में एक खबर छपी थी। वे सिंह के धोखे में अमेठी नरेश के बाण का शिकार हो गए थे और जायस कस्बे में उसी स्थल पर उनकी समाधि है…
       इस खबर को पढ़कर मैंने सोचा... उस जमाने में गंगा के इस विशाल मैदान में सिंह गर्जना करते रहे होंगे!  
       अभी कुछ ही दिन पहले आवारा कुत्तों को पकड़ने या उन्हें मारने के विरोध पर सुनवाई करते हुए किसी हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि कुत्तों के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण मानव जीवन है.. 
       ...लेकिन एक बात है, जीवन तो जीवन है चाहे जिसका हो। यह धरती केवल मनुष्यों के लिए ही तो नहीं बनी है? सोचता हूँ क्या मानव जीवन इतना महत्वपूर्ण है वह अपने लिए जल..जंगल...जानवर...जमीन..सबकी बलि लेकर जिंदा रहना चाहता है?? फिर तो ऐसे बियाबान धरती पर जीना भी क्या जीना…!!!
 #चलते-चलते 
        जैसे-जैसे हम स्वार्थी होते चले जाते हैं, वैसे-वैसे स्वयं को ही नष्ट करते जाते हैं..
#सुबहचर्या 
    (6.7.18)

मंगलवार, 26 मई 2026

लगाम

 
      मित्रों! आज सुबह जब टहलने के लिए निकला तो पाँच बजकर अड़तीस मिनट हो चुके थे… यह टाइम यहां इसलिए बता रहा हूँ कि इत्ती सुबह मेरे उठ जाने की सोच आप भी इसके लिए प्रेरित होंगे! वैसे जो सुबह की नींद खराब नहीं करना चाहते पक्का है कि मुझे बेवकूफ समझकर इस नींद का मजा लेते होंगे… चलिए कोई बात नहीं।

        मैं सड़क पर चढ़ चुका था.. चलते हुए अपने आसपास के प्रति थोड़ा इसलिए सजग था कि #सुबहचर्या में लिखने के लिए कोई मसाला मिले! लेकिन सच बताएँ.. ऐसी कोई चीज नजर नहीं आ रही थी कि मतलब की चीज हो और उसका कोई अर्थ निकालें.! 
        तभी एक मोटरसाइकिल भड़-भड़ करती हुई मेरे पीछे आकर रुक गई.. इसके साथ ही कोई कहते सुनाई दिया.. "शायद तेल खतम हो गया..!" 
       पीछे मुड़कर देखा, वह व्यक्ति मोटरसाइकिल स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा था... उसके दो बुर्काधारी महिलाएँ भी थीं.. मन ही मन सोचा, इसे कम से कम मोटरसाइकिल की टंकी में तेल का पता करके चलना चाहिए। 
     इन बातों के बीच मैं अपनी टहलाई का आधा भाग पूरा कर चुका था..मोबाइल से सड़क की तस्वीर ली..सोचा फेसबुक पर इस लेख के साथ यह तस्वीर चेंप कर आपको दिखा दूँ कि मैं इसी सड़क पर टहलता हूँ.. 


      इसी समय सड़क के किनारे खुरचाली करते हुए एक घोड़े पर नजर पड़ी.. जैसे जमीन पर टाप धरने में आनाकानी कर रहा हो, एक आदमी उसकी लगाम पकड़े हुए था। घोड़ा तो हृष्ट-पुष्ट था लेकिन भारतीय मानक वाला था। मेरी नजर अभी घोड़े पर ही थी एक बंदर उछलते हुए सड़क पार करता दिखाई पड़ा! 
       खैर, इन बातों को पीछे छोड़ मैं आगे बढ़ आया। पीछे से घोड़े के टाप की टप-टप सुनाई पड़ा… मुड़कर कर देखा, वही आदमी जो घोड़े का लगाम पकड़े खड़ा था अब साइकिल लगाम को पकड़े मेरे पास से गुजर गया… घोड़ा भी उसी गति से दौड़ते हुए चला जा रहा था। शायद वह आदमी घोड़े को दौड़ना सिखा रहा था।
      अब तक मेरे टहलाई का द एंड होने वाला था... अचानक फिर घोड़े पर निगाह पड़ गई.. अबकी बार साइकिल सवार घोड़े की नाक से कसी लगाम अपनी ओर खींचे, उससे झुंझलाहट में कुछ बड़बड़ा रहा था... लेकिन मैं चौंक तब उठा, जब घोड़े ने भी अपनी गर्दन मोड़कर उसे ऐसी नाराज निगाहों से देखा, जैसे उससे कह रहा हो...कि..
    "अमां यार..तुम इंसान हो, या पायजामा..? सिखाना भी नहीं आता और खींचे जा रहे हो लगाम!" 

        खैर, अब तक मैं एकदम घर के पास पहुँच चुका था, मेरी दृष्टि चचाजान के चाय की दुकान पर अटक गयी.. एकदम झक सफेद दाढ़ी में... सुबहई-सुबहई गोमती खोलकर चाय पिलाना शुरू कर देते हैं…इतने सबेरे अकसर वहां मजदूर ही दिखाई पड़ते हैं, चाय की चुस्की लेकर ये काम पर चले जाते हैं.... 

      अपना देश विचित्रताओं को समेटे है.. तहाँ सभी अपने में मगन! सोशल मीडिया पर एक तस्वीर देखा। एक बाबा की ठुकाई-पिटाई हुई थी। उन्हें देखकर लगा बाबाजी ढंग से साधना करना नहीं आता होगा नहीं तो ऐसी दुर्दशा न होती! हो सकता है लगे होंगे किसी बात पर टांग अड़ाने।

#चलते_चलते 

       वैसे, इस देश की संस्कृति किसी लगाम पर विश्वास नहीं करती..और सारी समस्या की जड़ में, लगाम हाथ में पकड़ने की अभिलाषा रखने वाले ही होते हैं..

#सुबहचर्या 
   (18.7.18)

रविवार, 24 मई 2026

यह तो मन ही है निवास सभी विपदों का

      दोस्तों! आज मन अलसाया था। अलसुबह उठकर  टहलने से आनाकानी करने लगा। मैंने भी करवट बदला और इसे विजयीभव का आशीर्वाद दे दिया कि बेटा तुम्हारी ही इच्छा सर्वोपरि, हम भी नहीं उठने वाले। लेकिन मन तो मन, पल में तोला पल में मासा! फिर कुछ ही पल बाद इसने दिमाग को झिंझोड़कर कहा, उठने दो, हम उठ बैठे।


      खैर, मन की बात चली तो "उर्वशी" में पढ़ी ये पंक्तियाँ याद आयीं -

"तन का क्या अपराध?
यंत्र वह तो
सुकुमार प्रकृति का,
सीमित उसकी शक्ति और सीमित
आवश्यकता है, यह तो मन ही है
निवास जिसमें समस्त
विपदों का ;
वही व्यग्र, व्याकुल असीम अपनी
काल्पनिक क्षुधा से
हाँक -हाँक तन को उस जल को मलिन
बना देता है,
बिम्बित होती किरण अगोचर की जिस
स्वच्छ सलिल में
जिस पवित्र जल में समाधि के सहस्रार
खिलते हैं।"

      तो मित्रों! इस आलसपन के लिए अपने तन को दोष क्यों दूँ! तन तो प्रकृति की तरह निर्मल होता है, असली अपराधी तो यह विषैला मन है, जो अपनी करने के लिए बहाने ढूंढता है,
           
"तन का काम अमृत, लेकिन
यह मन का
काम गरल है।"

      हाँ कवि के शब्दों में यह तन, मन के ही अधीन है... तन को सही राह दिखाने के लिए मन को जागृत होना पड़ता है,

"मन की लिप्सा के अधीन
उसको जगना
पड़ता है ;"
       
          खैर अलसाया मन जागा, मैं बिस्तर से उठा, जाकर मुँह पर पानी के छींटे मारे, चप्पल में पैर डाला और घर से बाहर निकल सड़क पर आ गया‌ ...
     
        बरबस एक लड़के पर ध्यान गया, वह जल्दी-जल्दी पैडल पैर मारते हुए साइकिल खैंचरते बढ़ा जा रहा था। उसके पैर भी अभी पूरी तरह पैडल पर नहीं पहुंचते थे। मुझे लगा शायद वह साइकिल चलाने का अभ्यास कर रहा है.. 

      इधर सड़क पर धीरे-धीरे आवाजाही शुरू होने लगी थी, लोग दिनचर्या के लिए गतिमान हो रहे थे... लड़के की साइकिल चलाने की हड़बड़ी में एक ज़िद थी, यह ज़िद भी काम की ही होती है तभी तो वह साइकिल चलाना सीख लेगा!
     
          ....टहलते-टहलते मैं यूँ ही काफी आगे निकल आया..देखा..एक छोटा-सा सरोवर (?) जिसमें कमल खिलने को तैयार हैं..

     एक दोपहर देखा था, इसमें खिले कमल बहुत खूबसूरत लगे थे..  असल में कमल सूरज की किरणों के साथ ही खिलना शुरू होते हैं... 

      इस नन्हें से सरोवर में, खिले बेचारे ये कमल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते प्रतीत हुए थे.. क्योंकि यह सरोवर अतिक्रमण ही नहीं, किसी प्लाटिंग का हिस्सा बनता दिखाई पड़ा था... आगे जब यहां यह तालाब ही नहीं रहेगा, तो ये कमल भी कहाँ खिलेंगे!!
         
          ...कहते हैं कमल कींचड़ में खिलता है, इस कथन में जैसे "कींचड़" को हेय माना गया है.. जबकि कमल कीचड़ में नहीं तो और कहां खिलेंगे? पथरीली जमीन में तो खिल नहीं सकते।
       
        ....लौटते समय सड़क के किनारे भरे जल में खिली कुमुदिनियों पर निगाह गड़ गयी.. कुमुदिनी एकदम से प्रात:बेला में ही खिलती है।

      वर्षा-ॠतु के तुरंत बाद प्रकृति बड़ी मनोहारी हो उठती है.. हरियाली के साथ सरोवर भी पुष्पित हो उठते हैं! वैरागी-मन ऐसी ही किसी प्राकृतिक अंचल में आश्रय खोजता है… प्रकृति में ही मुक्ति-मार्ग है, यही है वानप्रस्थ!

"जो भी अवसर निसर्ग के,
ईश्वर के भी
क्षण हैं ; धर्म साधना कहीं प्रकृति से भिन्न नहीं
चलती है"

        प्रकृति में रमने वालों के लिए मुक्ति की चाह व्यर्थ है -

"पर, खोजें क्यों मुक्ति?
प्रकृति के हम
प्रसन्न अवयव हैं;
जब तक शेष प्रकृति,
तब तक हम भी
बहते जाएँगे
लीलामय की सहज, शान्त, आनंदमयी
धारा में।"

      इस प्राकृतिक सौन्दर्य से युक्त धरती से...

"कितना कम स्वर्गीय स्वयं सुरपुर है इस
वसुधा से!"

      खैर प्रकृति में रमता हुआ जोगी टाइप की फीलिंग में पहुँचा ही था कि अचानक सड़क की पटरी पर गंदगी के बीच पड़े प्लास्टिक के एक छोटे तिरंगे पर निगाह पहुंची..

       इसे झटपट उठा लिया। लेकिन.. इस झंडे का सम्मानपूर्वक निस्तारण कैसे हो? ऊहापोह में पड़ गया! इसे सड़क पर फेंक नहीं सकता और घर से यह फिर कूड़े के साथ लौट आता…

       अचानक मूर्ति-विसर्जन का ध्यान हुआ... तुरंत राष्ट्रीय प्रतीक इस तिरंगे को मरोड़ा, गोला बनाया और पास में नाले में फेंक दिया..मने मूर्ति की तरह झंडे का विसर्जन कर दिया..

       वैसे ईश-मूर्ति के साथ एक लफड़ा भी है, कभी-कभी पूजा के बाद इसका विसर्जन करना पड़ता है… और विसर्जन के बाद इन मूर्तियों का हाल देखी नहीं जाती..

      खैर, लौट के बुद्धू घर को आए, हमारी भी दिनचर्या शुरू हुई.. चाय बनाया, फिर चाय की छोटी-सी गिलास हाथ में थामे अखबार खोलकर बैठ गया...

      "मुसलमानों के बिना हिंदुत्व भी नहीं बचेगा" यह कथन मन को भाया।

      एक बात है "हिंदुत्व" कोई धर्म नहीं है, भारतीय संविधान ही हिंदुत्व की परिभाषा है।

   खैर,  बातें  बहुत ज्यादा हो ली है, तो

#चलते_चलते
    

      कुल बात का लब्बोलुआब यह कि प्रत्येक हेय चीज में असीम संभावनाएं छिपी हैं।

#सुबहचर्या
(19.9.2018)
  विनय

रविवार, 10 मई 2026

बात डर को ड्राइव करने की है

        आज सुबह साढ़े चार बजे ही मेरी नींद टूट गई। लेकिन किसी मानसिक प्रमाद में उलझा मैं देर तक बिस्तर पर पड़ा रहा। धीरे-धीरे छह बज गए, आखिर में बिस्तर छोड़ना ही पड़ा.! इधर सुबह टहलने की बजाय मैं आलस को महत्व देने लगा हूँ। जो जैसा चल रहा है, उसे वैसे ही चलने देने में मेरा विश्वास बढ़ रहा है! हो सकता है यह उम्र या आज के दौर का तकाजा हो..खैर। 

        बिस्तर छोड़ते ही शरीर में अकड़न महसूस हुई। थोड़ा वॉर्मअप करने के लिए मैं कमरों के बीच ही चकरघिन्नी-सा टहलने लगा, इस कमरे से उस कमरे और उस कमरे से इस कमरे। इन्हीं चक्करों के बीच नजर पड़ी, तीन-चार नन्हें मेंढक कमरे और गलियारे में फुदक रहे थे। मेरे पैरों की धमक पाते ही वे आसन्न खतरे की आहट पहचान लेते और फुदककर दीवार की ओर, किनारे हो जाते! 

       करीब पंद्रह मिनट की चहलकदमी में, मैं उनसे बच-बचाकर पैर धरता रहा।

         बरसात के दिन हैं.. दरवाजे बंद रहने पर भी ये नन्हें मेढक शायद फर्श और दरवाजे की पतली-सी दरार से भीतर चले आते होंगे..और..अन्य परभक्षी से सुरक्षित रहते हैं। यहाँ कमरे में बल्ब की रोशनी में मँडराते कीट-पतंगे इन्हें भोजन के रूप में आसानी से मिल जाते होंगे" नन्हें मेंढ़कों को फुदकते देख मैंने यही सोचा! 

      ध्यान दिया..मेरे पैरों की धमक पाते ही ये जिस तरह फुदककर किनारे हो जा रहे थे, यह डर के प्रति इनकी बुद्धिमत्तापूर्ण प्रतिक्रिया थी! 

     फिर मैंने सोचा, कहीं ये मेरे पैरों तले न कुचल जाएं! डर से फुदकते उन नन्हें मेढकों को मैंने बारी-बारी से अपनी मुट्ठी में समेटा और इन्हें ले जाकर झुरमुटों में छोड़ता गया..

      ... इस दौरान मेरी मुट्ठी में कैद होते मेंढ़क, स्वयं को निगले जाने की स्थिति में पाए होंगे। फिर डर के मारे अपनी अन्तिम घड़ी भी गिने होंगे! मैंने देखा, मुट्ठी से मुक्त होते ही वे झाड़ियों के बीच ऐसे फुदकते हुए भागे, जैसे जान बची तो लाखों पाए! अपने डर से मुक्त होकर वे नन्हें मेढक भीतर-ही-भीतर खुशी भी महसूस किए होंगे!! 

       वाकई! डर से मुक्त होना भीतर ही भीतर एक खुशी लेकर आता है…

      एक बात है अगर ये मेंढक लेखक होते तो निश्चित ही किसी मँझे हुए लेखक की साहित्यिक भाषा में यही लिखते कि "डर, डरने से होता है" या “डर के आगे जीत है।” 

       लेकिन यह साहित्यिक भाषा इनके लिए नहीं है! वे ठहरे मेंढक! इन्हें तो बस फुदककर किनारे ही होना है, जिससे जान बची रहे। आखिर ये घोड़ों की तरह पैरों में नाल बँधवाकर निश्चिंत होकर थोड़ी न घूम सकते हैं!! 

      ....अभी पिछले दिनों अखबारों में पढ़ा, किसी अधिकारी ने आत्महत्या कर ली। उस अधिकारी की फेसबुक प्रोफाइल खंगाला तो मुझे ताज्जुब हुआ! उसकी टैगलाइन थी -

    "it's a must win situation.. no alternative except victory" 

         इन पंक्तियों पर जरा गौर कीजिए! यहां फुदककर किनारे हो लेने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है.. “जीत के सिवा कुछ भी नहीं!” बताइए भला इस तरह का विचार किसी को कहां ले जाएगा? जीवन केवल हार-जीत में नहीं सिमटता!! जीवन भी एक कला है, जीने की कला। 

       पहले पैरों तले दबने से बचने के लिए मेंढकों का फुदककर किनारे होना, फिर मेरी मुट्ठी में होना और तड़फड़ाना, अंततः झाड़ियों में फुदकते हुए भागना… ये भी तो जीवन के हिस्से हैं!! यहां हार-जीत नहीं जीने की लालसा महत्वपूर्ण है। 

      तो, “नो अल्टरनेटिव एक्सेप्ट विक्ट्री” कितना भयानक और खतरनाक विचार है!! ऐसे विचार आत्मविनाश की ओर ही ले जाते हैं। 

     खैर..सुबह "डर" से फुर्सत मिली तो देखा पेड़ बन रहा आम का प्रफुल्लित पौधा गिरा हुआ था...यह कैसे गिरा? बंदर के दो बच्चों को वहाँ उछलते-कूदते देखा। अनुमान लगाया कि यह बंदरों का ही "खुराफात" है, अब इनका क्या! यह तो उनकी सहजवृत्ति है।

#चलते_चलते

       देखिए! क्या मेंढक, क्या आदमी! बात डर को ड्राइव करने की है.. ऑप्शन बहुत हैं…

#सुबहचर्या 

(10.10.18)

विश्वास का धागा

        आज तो सुबह सात बजे बिस्तर छोड़ा.. असल में क्या है कि रात में सोने के ठीक पहले तक यदि आप गंभीर वैचारिक चिंन्तन में उलझे होते हैं, तो निश्चित ही नींद कुछ न कुछ खराब तो होगी ही! मैं बीती रात सोने जाने के ठीक पहले तक ऐसे ही बौद्धिक जुगाली में उलझा था.. सोने की कोशिश किया तो जैसे ही नींद आने को होती अचानक मस्तिष्क में कुछ चुभने जैसा अहसास होता, जिसे पिंच करना समझ सकते हैं। फिर बेचैनी में नींद टूट जाती! अंततः इस नींद की भरपाई मैं सुबह सात बजे तक करता रहा, बिस्तर नहीं छोड़ा।
         हाँ, एक बात है, सोने जाने से एक घंटा पहले मन-मस्तिष्क को रिलैक्स, मने ढीला छोड़ देना चाहिए। इस समय पढ़ने की आदत वालों को भी चाहिए कि गंभीर विषयों का पाठन न करें। मनोरंजन पूर्ण और हल्के-फुल्के विषय ही पढ़ें। एक बात पर और ध्यान देने की जरूरत है, आजकल सोशल-मीडिया का जमाना है... यहां तर्क-वितर्क और स्क्रॉल में लोग उलझ जाते हैं… इससे भी अनावश्यक तनाव पैदा होता है।
         खैर जब तक बिस्तर छोड़ता तब तक लड़का भी आ गया.. उसने चाय बनायी। 
        चाय पीते हुए अखबार उठाया। सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों पर निगाह पड़ी..इन्हें पढ़ते हुए मन ही मन मुस्कराया..एक फैसला तो मानवीय रिश्तों में आपसी विश्वास बहाली या यों कहें विश्वास की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता प्रतीत हुआ... 
        वाकई! मानव निर्मित संबंधों में आपसी विश्वास से बढ़कर कुछ नहीं होता...कानून-फानून तो बनते बिगड़ते रहते हैं...
     ....इन फैसलों से मुझे बचपन (कक्षा पाँच-छह के आसपास) में श्रीमद्भागवत, कल्याण और सुखसागर में पढ़ी वैदिक कहानियाँ याद हो आयी…
       “कामाग्नि से व्याकुल एक व्यक्ति, उसके पति के सामने ही, एक स्त्री से प्रणय-याचना करता है। स्त्री स्वयं को विवाहित बताकर प्रस्ताव अस्वीकार कर देती है, तो वह उसे श्राप देने पर उतारू हो उठता है।” 
         ऐसी ही एक अन्य कथा में 
       पत्नी पति को अपने कंधों पर बैठाकर स्वयं गणिका के पास ले जाती है।
      लेकिन उन वैदिक कथानकों में इन बातों को अनैतिकता की तरह नहीं देखा गया। नहीं तो पहले प्रसंग में ‘श्राप’ नहीं, ‘पाप’ का भाव उभरता और दूसरे में पति-पत्नी के विश्वास के बजाय अपराध-बोध की छाया दिखाई पड़ती।
       बल्कि इन कथाओं में पति-पत्नी के संबंधों, उनके पारस्परिक दायित्वों और सबसे बढ़कर उनके बीच विश्वास की व्याख्या मिलती है। सच तो यह है किसी भी रिश्ते की असली नींव विश्वास ही होता है! विश्वास ही वह नाजुक-सा धागा है जिससे रिश्ते बंधे और टिके रह सकते हैं!!
       बचपन के उन्हीं दिनों मैं अपने बाबू (दादा जी) के मुख से अकसर किसी की पोंगापंथी पर उसे "लकीर का फकीर होना" जुमले से नवाजते सुना करता। इससे अनजाने में ही मुझे यह सीख नसीब हुई कि बातों को केवल तर्क पर ही नहीं संवेदनाओं की भावभूमि पर भी कसना चाहिए।
       ...एक बात और.. हमने ओखली (संविधान अंगीकरण) में सिर दे दिया है, तो मूसलों (संवैधानिक व्यवस्थाओं के निर्णयों) से क्या डरना..! आखिर बिना कुटाई दाना कहां निकलता है… इसमें आया मुहावरा भी कभी दादा जी से ही सुना था… खैर,
        मेरी सुबहचर्या पढ़कर आप इसे बौद्धिक जुगाली समझ बैठें, उससे पहले ही बता दें कि कई दिनों से पड़ोसी के साथ बैठकर चाय नहीं पी थी। मुझे यह कमी महसूस हो रही थी। आज वे दिखाई भी पड़ ग‌ए! मैंने चाय का आग्रह किया, पहले तो वे मुस्कुराए फिर मेरे बैठक में आ ग‌ए। हम दोनों गप्पें लड़ाते हुए साथ-साथ बैठकर चाय पीते रहे...सुबह की यह चाय बहुत सूकूनदायक थी..

#सुबहचर्या 
 (28.9.18)

शनिवार, 9 मई 2026

विचारों का मैन्युप्यूलेशन

        प्रातःकालीन परिदृश्य जैसे कुछ कह रहा होता है। इसे समझने के लिए मन का खाली और बेलाग होना जरूरी है। और सुबह-सुबह मन कुछ ऐसा ही होता है। इसीलिए सुबहचर्या में मैं दुनियाँ से टकराता हूँ। संवेदित हो उठता हूँ, नवीन विचार प्रस्फुटित होते हैं, लिखास जागती है, और इसे फेसबुक पर अभिव्यक्त करता हूँ। 

       लेकिन कभी-कभी मन 'स्टैग्नेशन' जैसी विरामावस्था में आ जाता है। न कुछ सोच पाता है और न कुछ समझता है। ऐसा मन तब जीवन में रमा हुआ-सा होता है, विचार स्वत:स्फूर्त नहीं होते बल्कि विचारों को ‘मैन्यूप्युलेट’ करना होता है। यदि विचार मैन्यूप्युलेट हों तो इससे स्वाभाविक लेखन नहीं हो पाता। क्योंकि तब पाठक को मात्र प्रभावित करने की इच्छा होती है न! 

        दूसरी स्थिति यह भी बनती है कि विचार सृजन के लिए कभी-कभी मन को अंतस की दुनियाँ में ढकेलता हूँ, तो वहाँ की दुनिया भी भाव-अभाव से मुक्त मिलती है.. विचार रूखे ही रह जाते हैं! या विचार निकलते ही नहीं।

      अरे हाँ..! क्या किसी "साहित्य" का सृजन विचारों या कल्पनाओं को बिना "मैन्यूप्युलेट" किए हुए लिखा जा सकता है… और लिख भी दिया गया तो क्या उस लिखे में, उस विषय की आत्मा भी प्रतिष्ठित होती है? मैं मानता हूँ नहीं, क्योंकि संवेदना को कभी "मैन्यूप्युलेट" नहीं किया जा सकता.. हाँ अभिव्यक्ति को तो किया जा सकता है! मतलब सुंदर मूर्तियां तो गढ़ी जा सकती है लेकिन बिना संवेदना के इन मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो सकती! बिना संवेदना की आंच के शब्द और वाक्य केवल बेजान मूर्तियां ही गढ़ते हैं, और पाठक भी इसे वैसे ही विसर्जित कर देता है।

        आजकल लोग अपनी लिखास मिटा रहे हैं लेखक बन रहे हैं; लेखकों के लिए ही लिख रहे हैं, और लेखकों का लिखा लेखक ही समझ रहे हैं या फिर स्वयं ही अपना लिखा समझते होंगे । 

        पत्नी मुझे पढ़कर अकसर यही कहती हैं, "तुम्हीं लिखो तुम्हीं समझो या फिर कोई लेखक ही तुम्हारा लिखा समझता होगा।" मैं पत्नी को कभी-कभी अपना पाठक मान लेने के भ्रम में होता हूँ लेकिन इस कथन के बाद यह भ्रम भी जाता रहा..

        आज सुबह टहलने का मन हो आया था, लेकिन ध्यान हो आया कि जूता अभी सूखा ही नहीं है और हवाई चप्पल में ठंड लगती। असल में दो दिन पहले जूता धुल दिया था। वैसे इस समय अन्य क्षेत्रों में मौसम खुश्क हो चुका होगा लेकिन तराई जैसे क्षेत्र में शायद आर्द्रता बनी रहती है, वैसे भी भिनगा में जंगल होने से यहाँ आर्द्रता की मात्रा कुछ ज्यादा ही है। इसीलिए कपड़े वगैरह दिनभर में भी नहीं सूखते, जूता तो खैर कैनवास का है ही। 

      लेकिन आज Morning walk की इच्छा बलवती हो चुकी थी और गीले जूते को पाँव में डाल कर निकल लिया। कुछ देर के बाद अचानक जूते पर ध्यान गया। देखा, जूते के कैनवास के ऊपर साबुन का झाग निकलकर फैल चुका है। शायद यह ठीक से नहीं धुल पाया था! खैर चलतेे हुए इस झाग को हटाने की कोशिश भी करता रहा। क्योंकि यह कुछ अजीब लगता था! 

        यूँ ही चलते-चलते एक कार्यक्रम में नारी सशक्तिकरण पर दिया अपना भाषण याद आया! भाषण स्वभाविक नहीं, बल्कि इसपर अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर बोल रहा था। कि सामने बैठे लोग मेरे भाषण से प्रभावित हो जाएं! श्रोता के रूप में सामने स्त्रियाँ ही थी, मंच पर केवल और केवल पुरूष थे। मतलब उस भाषण में मेरी ‘आत्मा’ नहीं बोल रही थी।

       खैर, टहल कर लौटा तो उसी तरह से चाय बनाया और अखबार पढ़ा। अखबार में "असली नारी सशक्तिकरण" पर कोई संपादकीय था, लेकिन नहीं पढ़ा। पढ़ा इसलिए नहीं कि वही घिसी-पिटी बातें, इन बातों को क्या पढ़ना! वैसे पर इस विषय पर घिसी-पिटी बातें ही की जाती हैं!

        इस सुबहचर्या को अभी रात में लिख रहा हूँ, तो दिन में एक और अखबार में एक लेख पढ़ लिया था उस लेख में एक हृदयविदारक घटना का जिक्र था, दिल्ली जैसे शहर में एक पढ़े-लिखे परिवार में एक दादी अपनी पोती को पानी की टंकी में इसलिए डुबोकर मार डालती है, क्योंकि वह पहले बच्चे के रूप में पोता चाहती थी। वहीं किसी दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र में बी ए की पढ़ाई पूरी करने की इच्छा रखने वाली बहू को कोई सास उसे ही सुनाकर कहती है "बड़ी आई हो अंगर्रा-बीयर्रा करने"। 

         तो इन भाषणों से क्या होने वाला? 

      और यहां मैं सुबह की बातें रात में लिखने के लिए अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर रहा हूँ...

#चलते_चलते

      "मैन्यूप्युलेशन" उतना बुरा नहीं होता जितना मैं इसे बता रहा हूँ..शरीर को प्रकृति ने "मैन्यूप्युलेट" किया हुआ है, लेकिन इसमें आत्मा डालकर!! तो यह मैन्यूप्युलेशन भी कलात्मक पुनर्सृजन है!

  #सुबहचर्या 

 (22.11.18)

शुक्रवार, 8 मई 2026

फिट होने के राज!

          क‌ई दिन हो गए थे टहले हुए, तो आज सुबह पौने पाँच बजे ही निकल पड़ा। वैसे यह टहलाई हप्ते में औसतन तीन दिन होती है। स्टेडियम में ग्रुप में टहलने वाले टहलते मिले। ये लोग आपस में किसी राजनीतिक मुद्दे पर चर्चावान थे। उनकी बात सुनते हुए मैं आगे बढ़ गया… ऊपर आसमान में चाँद दूधिया रंग बिखेर रहा था। कुछ क्षण चाँद के शांत मगर चटक धवल रंग पर टकटकी लगाए रहा। खैर..

        स्टेडियम में बढ़ती भीड़ से मुझे लगा कि फिटनेस को लेकर जागरूकता बढ़ी है। तभी ग्रुप का कोई सदस्य "आप फिट तो इंडिया फिट" कहता सुनाई पड़ा। देशभक्ति का यह श्लोगन सुनकर मैं चौंक उठा, इस श्लोगन का ही असर है कि सुबह-सुबह देश के चक्कर में स्टेडियम का एक चक्कर फटाफट पूरा किया।

        लेकिन मेरे आगे-आगे एक निहायत आम आदमी तेज डग भरता चला जा रहा था। उसके दोनों हाथ भी उसी गति से पेंडुलमायमान थे। उसकी यह कवायद मुझे सनक जैसी लगी क्योंकि वह तो आलरेडी फिट दिख रहा था! मैंने सोचा, शायद देशवासी उसे फिट न मान रहे हों इसलिए वह और ज्यादा फिट होने पर तुला है। उसकी चप्पलों की फटर-फटर में उसकी बेचैनी छिपी थी - भ‌ई मैं भी फिट हूँ, और देश को फिट रखने की कुव्वत रखता हूँ। 

        लेकिन मुझे चिंता हुई - भला इस देश को कभी आम आदमी ने फिट किया है! कहीं उसकी यह कवायद इंडिया को अनफिट करने की तैयारी तो नहीं? सोचकर यकायक मैं भी आत्मावलोकन की मुद्रा में आ गया। फिर तो आत्मविभोर होने की फीलिंग हुई। 

       वाकई, इंडिया को फिट करना आम आदमी के बूते की बात नहीं, हम या हमारे जैसों के ही बस का है। क्योंकि इसके लिए पहले देशहित की फाइलों का नियम-नियामक और कर्ताधर्ता बनकर खुद को फिट करना होता है, मतलब राज-प्रदत्त पौरुष धारण करना पड़ता है! इस पौरुष का अद्भुत प्रभाव मुझे अपने पदचालन में अनुभूत होने लगा -

         शानदार ब्रांडेड स्पोर्ट्स शूज से सुसज्जित मेरे राजपुरुषोचित चरणों की प्रत्येक धमक धरती को यह संदेश देती जान पड़ती थी कि:

        “हे इंडिया की धरती! मैं तो फिट हो चुका, अब तू भी फिट हो ले!!”

        तत्पश्चात देशभक्ति-भाव से लबरेज मुझ जैसे राजपुरुष के चरणों की धमक धरती पर और तीव्र हो उठी।

       सहसा मुझे मोहन राकेश के नाटक "अषाढ़ का एक दिन" में दन्तुल और कालिदास के बीच का एक प्रसंग स्मरित हुआ। 

         दन्तुल का बाण एक मृगशावक को घायल कर देता है। कालिदास उसे बचाने का प्रयास करता है। दन्तुल घायल मृगशावक को सौंपने का आदेश देता है और न मानने पर दंड की धमकी देता है। किंतु कालिदास उसे ही मृगशावक का अपराधी ठहराकर सौंपने से इंकार कर देता है। दोनों के बीच वार्तालाप होता है -

         "दन्तुल : तो राजपुरुष के अपराध का निर्णय ग्रामवासी करेंगे! ग्रामीण युवक, अपराध और न्याय का शब्दार्थ भी जानते हो! 

       कालिदास: शब्द और अर्थ राजपुरुषों की सम्पत्ति है, जानकर आश्चर्य हुआ।" 

       इसी के साथ एक बार फिर मेरी निगाह आसमान की ओर उठी चाँद में अभी चमक बाकी था, इसी नाटक में मल्लिका एक जगह कह रही है -

       "एक दोष गुणों में उसी तरह छिप जाता है जैसे चाँद की किरणों में कलंक ; परन्तु दारिद्र्य नहीं छिपता।" 

        बस फिर क्या था मेरे अंदर का राजपुरुष हँस पड़ा, मन में आया कि उस आदमी के पास पहुँचकर उसे समझा ही दें कि - राजपुरुष जो कहें वही सही होता है, इसलिए मैं जो कहूँ मान लो, मैं तुमसे कहना चाहता हूं -

       “यार तुम्हारी यह कवायद व्यर्थ है, तुम्हारे फिट होने से इंडिया नहीं फिट होने वाला! क्योंकि यह फिट-उट होना बड़े लोगों और उनके ही बस की बातें हैं। देखो, दारिद्र्य नहीं छिपता! इसलिए तुम्हारी यह दौड़ा-भागी इंडिया को अनफिट होने की श्रेणी में डाल देगा…

        तुमको लोग फिट कहें इसके लिए जरूरी है कि पहले मैं फिट हो लूं जिससे इंडिया मतलब अपना देश फिट हो ले, फिर इंडिया के फिट होते ही आटोमेटिक सब फिट मान लिए जाएंगे; जैसे कि तुम भी! इसलिए पीछे हटो मुझे आगे जाने दो। तुम केवल अपनी रोजमर्रा की चीजों जैसे दाल-रोटी पर ही ध्यान लगाओ। यही देश हित में है! समझे न?”

         यह समझाने मैं उसके पीछे लगभग भागा। 

         लेकिन उस तक मैं पहुँचता कि पाथ-वे से उतर वह स्टेडियम से बाहर निकल गया। जैसे मेरे सामने का कोई अवरोध हट गया हो। मैं स्टेडियम का दूसरा चक्कर लगाने लगा।

       खैर आज की टहलाई पूरी कर अपने आवास लौट आया। यहाँ लान की हरी-हरी दूब पर निगाह पड़ी। दूब की कोमलता देख मुझे "अषाढ़ का एक दिन" नाटक की एक और पंक्ति याद आई - 

     "जीवन एक भावना है! कोमल भावना! बहुत-बहुत कोमल भावना!!"  

      कहते हैं कोमल भावनाएं व्यक्ति को ईर्ष्या-द्वेष, लोभ-लालच वश दुर्नीति बनाने से रोकता है। इस विचार से तो मैं डर ही गया कि कहीं इस भावना के प्रभाव में हम फिट होना ही न छोड़ दें!! क्योंकि फिट होने के लिए कोमल नहीं कठोर भावना की जरूरत पड़ती है! 

         इसी समय मोबाइल बजा। पत्नी का फोन था। वे बोलीं - 

        वह जो कामवाली है न, उसका पति जो राजमिस्त्री है उसको सुबह-सुबह पुलिस पकड़ के ले ग‌ई।

         मैंने उत्सुकतावश पूछा - क्यों? 

         पत्नी - अरे कुछ नहीं, दस-बारह लाख की कोई जमीन लिया था, ब्रोकर ने ही पुलिस से पकड़वाया है।

          मुझे थोड़ा अचंभा हुआ कि राजमिस्त्री ने कहीं कोई घोटाला तो नहीं किया, लगता तो बहुत सीधा और आम आदमी जैसा है, ऐसा फरेब तो वह नहीं कर पाएगा। 

         मैंने पूछा - तो कुछ गड़बड़ किया था क्या?

         पत्नी - अरे नहीं, ऐसा कुछ नहीं, पहले इस जमीन के लिए उसकी ब्रोकर से बात हुई, लेकिन फिर सीधे मालिक से सौदा कर लिया। थोड़ा सस्ता पड़ा तो बेचारे ने एक-एक पैसा जोड़कर इसे खरीद लिया! बेचारी कामवाली भी बड़ी दु:खी थी। फोन पर बता करके कहा - दीदी आज काम पर आने का मन नहीं है।

          मैंने - ब्रोकर ने उसे पुलिस से क्यों पकड़वाया?

          पत्नी बोलीं - अरे वही, ब्रोकर को नुक़सान हो गया उसका कमीशन मारा गया, इस बात से वह नाराज था, ऐसे लोग तो पहुँचवाले होते ही हैं. थाने में बेचारे को धमकाया और मारा-पीटा भी गया..! 

        पत्नी की बात सुनकर मैं साइलेंट हो गया.. मेरी चुप्पी पर वे बोलीं -

         पत्नी - “सरकार-वरकार इस अन्याय पर कुछ करती क्यों नहीं?

           मैं - अरे भई, सरकारें हर जगह दुरबीन-उरबीन लेकर तो बैठी नहीं रहतीं कि कहाँ क्या हो रहा है, नजर में आ जाए!

           पत्नी बेचारी चुप और अब मैं भी चुप। इस चुप्पी के बीच ही बातों का सिलसिला टूट गया।

        वह राजमिस्त्री बिलकुल वैसा ही है जैसे आज स्टेडियम के पाथ-वे पर मेरे आगे-आगे चल रहा वह आम आदमी! 

       तो इस फिट-उट वाली बात पर एक बात और - 

        राजपुरुष बड़े कठोर होते हैं, कठोर फ्रेम से जुड़े भी रहते हैं! यही इनकी फिटनेस का राज है!! जैसे राजमिस्त्री को फिट किया गया, वैसे ही ये देश को भी फिट करते रहते हैं!!!

#चलते-चलते 

       फिटनेस का रहस्य हमारी कोमलता में नहीं हमारी कठोरता में छिपा है…

#सुबहचर्या  

1.06.18