लिखास
यह अकथ-मन ! यहाँ प्रश्नों और उत्तरों की टकराहटों में एक सार्थक दुनियाँ तलाशनें की आकुलता है...
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बुधवार, 27 मई 2026
जीवन तो जीवन है!
मंगलवार, 26 मई 2026
लगाम
रविवार, 24 मई 2026
यह तो मन ही है निवास सभी विपदों का
एक दोपहर देखा था, इसमें खिले कमल बहुत खूबसूरत लगे थे.. असल में कमल सूरज की किरणों के साथ ही खिलना शुरू होते हैं...
इसे झटपट उठा लिया। लेकिन.. इस झंडे का सम्मानपूर्वक निस्तारण कैसे हो? ऊहापोह में पड़ गया! इसे सड़क पर फेंक नहीं सकता और घर से यह फिर कूड़े के साथ लौट आता…
"मुसलमानों के बिना हिंदुत्व भी नहीं बचेगा" यह कथन मन को भाया।
एक बात है "हिंदुत्व" कोई धर्म नहीं है, भारतीय संविधान ही हिंदुत्व की परिभाषा है।
रविवार, 10 मई 2026
बात डर को ड्राइव करने की है
आज सुबह साढ़े चार बजे ही मेरी नींद टूट गई। लेकिन किसी मानसिक प्रमाद में उलझा मैं देर तक बिस्तर पर पड़ा रहा। धीरे-धीरे छह बज गए, आखिर में बिस्तर छोड़ना ही पड़ा.! इधर सुबह टहलने की बजाय मैं आलस को महत्व देने लगा हूँ। जो जैसा चल रहा है, उसे वैसे ही चलने देने में मेरा विश्वास बढ़ रहा है! हो सकता है यह उम्र या आज के दौर का तकाजा हो..खैर।
बिस्तर छोड़ते ही शरीर में अकड़न महसूस हुई। थोड़ा वॉर्मअप करने के लिए मैं कमरों के बीच ही चकरघिन्नी-सा टहलने लगा, इस कमरे से उस कमरे और उस कमरे से इस कमरे। इन्हीं चक्करों के बीच नजर पड़ी, तीन-चार नन्हें मेंढक कमरे और गलियारे में फुदक रहे थे। मेरे पैरों की धमक पाते ही वे आसन्न खतरे की आहट पहचान लेते और फुदककर दीवार की ओर, किनारे हो जाते!
करीब पंद्रह मिनट की चहलकदमी में, मैं उनसे बच-बचाकर पैर धरता रहा।
बरसात के दिन हैं.. दरवाजे बंद रहने पर भी ये नन्हें मेढक शायद फर्श और दरवाजे की पतली-सी दरार से भीतर चले आते होंगे..और..अन्य परभक्षी से सुरक्षित रहते हैं। यहाँ कमरे में बल्ब की रोशनी में मँडराते कीट-पतंगे इन्हें भोजन के रूप में आसानी से मिल जाते होंगे" नन्हें मेंढ़कों को फुदकते देख मैंने यही सोचा!
ध्यान दिया..मेरे पैरों की धमक पाते ही ये जिस तरह फुदककर किनारे हो जा रहे थे, यह डर के प्रति इनकी बुद्धिमत्तापूर्ण प्रतिक्रिया थी!
फिर मैंने सोचा, कहीं ये मेरे पैरों तले न कुचल जाएं! डर से फुदकते उन नन्हें मेढकों को मैंने बारी-बारी से अपनी मुट्ठी में समेटा और इन्हें ले जाकर झुरमुटों में छोड़ता गया..
... इस दौरान मेरी मुट्ठी में कैद होते मेंढ़क, स्वयं को निगले जाने की स्थिति में पाए होंगे। फिर डर के मारे अपनी अन्तिम घड़ी भी गिने होंगे! मैंने देखा, मुट्ठी से मुक्त होते ही वे झाड़ियों के बीच ऐसे फुदकते हुए भागे, जैसे जान बची तो लाखों पाए! अपने डर से मुक्त होकर वे नन्हें मेढक भीतर-ही-भीतर खुशी भी महसूस किए होंगे!!
वाकई! डर से मुक्त होना भीतर ही भीतर एक खुशी लेकर आता है…
एक बात है अगर ये मेंढक लेखक होते तो निश्चित ही किसी मँझे हुए लेखक की साहित्यिक भाषा में यही लिखते कि "डर, डरने से होता है" या “डर के आगे जीत है।”
लेकिन यह साहित्यिक भाषा इनके लिए नहीं है! वे ठहरे मेंढक! इन्हें तो बस फुदककर किनारे ही होना है, जिससे जान बची रहे। आखिर ये घोड़ों की तरह पैरों में नाल बँधवाकर निश्चिंत होकर थोड़ी न घूम सकते हैं!!
....अभी पिछले दिनों अखबारों में पढ़ा, किसी अधिकारी ने आत्महत्या कर ली। उस अधिकारी की फेसबुक प्रोफाइल खंगाला तो मुझे ताज्जुब हुआ! उसकी टैगलाइन थी -
"it's a must win situation.. no alternative except victory"
इन पंक्तियों पर जरा गौर कीजिए! यहां फुदककर किनारे हो लेने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है.. “जीत के सिवा कुछ भी नहीं!” बताइए भला इस तरह का विचार किसी को कहां ले जाएगा? जीवन केवल हार-जीत में नहीं सिमटता!! जीवन भी एक कला है, जीने की कला।
पहले पैरों तले दबने से बचने के लिए मेंढकों का फुदककर किनारे होना, फिर मेरी मुट्ठी में होना और तड़फड़ाना, अंततः झाड़ियों में फुदकते हुए भागना… ये भी तो जीवन के हिस्से हैं!! यहां हार-जीत नहीं जीने की लालसा महत्वपूर्ण है।
तो, “नो अल्टरनेटिव एक्सेप्ट विक्ट्री” कितना भयानक और खतरनाक विचार है!! ऐसे विचार आत्मविनाश की ओर ही ले जाते हैं।
खैर..सुबह "डर" से फुर्सत मिली तो देखा पेड़ बन रहा आम का प्रफुल्लित पौधा गिरा हुआ था...यह कैसे गिरा? बंदर के दो बच्चों को वहाँ उछलते-कूदते देखा। अनुमान लगाया कि यह बंदरों का ही "खुराफात" है, अब इनका क्या! यह तो उनकी सहजवृत्ति है।
#चलते_चलते
देखिए! क्या मेंढक, क्या आदमी! बात डर को ड्राइव करने की है.. ऑप्शन बहुत हैं…
#सुबहचर्या
(10.10.18)
विश्वास का धागा
शनिवार, 9 मई 2026
विचारों का मैन्युप्यूलेशन
प्रातःकालीन परिदृश्य जैसे कुछ कह रहा होता है। इसे समझने के लिए मन का खाली और बेलाग होना जरूरी है। और सुबह-सुबह मन कुछ ऐसा ही होता है। इसीलिए सुबहचर्या में मैं दुनियाँ से टकराता हूँ। संवेदित हो उठता हूँ, नवीन विचार प्रस्फुटित होते हैं, लिखास जागती है, और इसे फेसबुक पर अभिव्यक्त करता हूँ।
लेकिन कभी-कभी मन 'स्टैग्नेशन' जैसी विरामावस्था में आ जाता है। न कुछ सोच पाता है और न कुछ समझता है। ऐसा मन तब जीवन में रमा हुआ-सा होता है, विचार स्वत:स्फूर्त नहीं होते बल्कि विचारों को ‘मैन्यूप्युलेट’ करना होता है। यदि विचार मैन्यूप्युलेट हों तो इससे स्वाभाविक लेखन नहीं हो पाता। क्योंकि तब पाठक को मात्र प्रभावित करने की इच्छा होती है न!
दूसरी स्थिति यह भी बनती है कि विचार सृजन के लिए कभी-कभी मन को अंतस की दुनियाँ में ढकेलता हूँ, तो वहाँ की दुनिया भी भाव-अभाव से मुक्त मिलती है.. विचार रूखे ही रह जाते हैं! या विचार निकलते ही नहीं।
अरे हाँ..! क्या किसी "साहित्य" का सृजन विचारों या कल्पनाओं को बिना "मैन्यूप्युलेट" किए हुए लिखा जा सकता है… और लिख भी दिया गया तो क्या उस लिखे में, उस विषय की आत्मा भी प्रतिष्ठित होती है? मैं मानता हूँ नहीं, क्योंकि संवेदना को कभी "मैन्यूप्युलेट" नहीं किया जा सकता.. हाँ अभिव्यक्ति को तो किया जा सकता है! मतलब सुंदर मूर्तियां तो गढ़ी जा सकती है लेकिन बिना संवेदना के इन मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो सकती! बिना संवेदना की आंच के शब्द और वाक्य केवल बेजान मूर्तियां ही गढ़ते हैं, और पाठक भी इसे वैसे ही विसर्जित कर देता है।
आजकल लोग अपनी लिखास मिटा रहे हैं लेखक बन रहे हैं; लेखकों के लिए ही लिख रहे हैं, और लेखकों का लिखा लेखक ही समझ रहे हैं या फिर स्वयं ही अपना लिखा समझते होंगे ।
पत्नी मुझे पढ़कर अकसर यही कहती हैं, "तुम्हीं लिखो तुम्हीं समझो या फिर कोई लेखक ही तुम्हारा लिखा समझता होगा।" मैं पत्नी को कभी-कभी अपना पाठक मान लेने के भ्रम में होता हूँ लेकिन इस कथन के बाद यह भ्रम भी जाता रहा..
आज सुबह टहलने का मन हो आया था, लेकिन ध्यान हो आया कि जूता अभी सूखा ही नहीं है और हवाई चप्पल में ठंड लगती। असल में दो दिन पहले जूता धुल दिया था। वैसे इस समय अन्य क्षेत्रों में मौसम खुश्क हो चुका होगा लेकिन तराई जैसे क्षेत्र में शायद आर्द्रता बनी रहती है, वैसे भी भिनगा में जंगल होने से यहाँ आर्द्रता की मात्रा कुछ ज्यादा ही है। इसीलिए कपड़े वगैरह दिनभर में भी नहीं सूखते, जूता तो खैर कैनवास का है ही।
लेकिन आज Morning walk की इच्छा बलवती हो चुकी थी और गीले जूते को पाँव में डाल कर निकल लिया। कुछ देर के बाद अचानक जूते पर ध्यान गया। देखा, जूते के कैनवास के ऊपर साबुन का झाग निकलकर फैल चुका है। शायद यह ठीक से नहीं धुल पाया था! खैर चलतेे हुए इस झाग को हटाने की कोशिश भी करता रहा। क्योंकि यह कुछ अजीब लगता था!
यूँ ही चलते-चलते एक कार्यक्रम में नारी सशक्तिकरण पर दिया अपना भाषण याद आया! भाषण स्वभाविक नहीं, बल्कि इसपर अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर बोल रहा था। कि सामने बैठे लोग मेरे भाषण से प्रभावित हो जाएं! श्रोता के रूप में सामने स्त्रियाँ ही थी, मंच पर केवल और केवल पुरूष थे। मतलब उस भाषण में मेरी ‘आत्मा’ नहीं बोल रही थी।
खैर, टहल कर लौटा तो उसी तरह से चाय बनाया और अखबार पढ़ा। अखबार में "असली नारी सशक्तिकरण" पर कोई संपादकीय था, लेकिन नहीं पढ़ा। पढ़ा इसलिए नहीं कि वही घिसी-पिटी बातें, इन बातों को क्या पढ़ना! वैसे पर इस विषय पर घिसी-पिटी बातें ही की जाती हैं!
इस सुबहचर्या को अभी रात में लिख रहा हूँ, तो दिन में एक और अखबार में एक लेख पढ़ लिया था उस लेख में एक हृदयविदारक घटना का जिक्र था, दिल्ली जैसे शहर में एक पढ़े-लिखे परिवार में एक दादी अपनी पोती को पानी की टंकी में इसलिए डुबोकर मार डालती है, क्योंकि वह पहले बच्चे के रूप में पोता चाहती थी। वहीं किसी दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र में बी ए की पढ़ाई पूरी करने की इच्छा रखने वाली बहू को कोई सास उसे ही सुनाकर कहती है "बड़ी आई हो अंगर्रा-बीयर्रा करने"।
तो इन भाषणों से क्या होने वाला?
और यहां मैं सुबह की बातें रात में लिखने के लिए अपने विचारों को "मैन्यूप्युलेट" कर रहा हूँ...
#चलते_चलते
"मैन्यूप्युलेशन" उतना बुरा नहीं होता जितना मैं इसे बता रहा हूँ..शरीर को प्रकृति ने "मैन्यूप्युलेट" किया हुआ है, लेकिन इसमें आत्मा डालकर!! तो यह मैन्यूप्युलेशन भी कलात्मक पुनर्सृजन है!
#सुबहचर्या
(22.11.18)
शुक्रवार, 8 मई 2026
फिट होने के राज!
कई दिन हो गए थे टहले हुए, तो आज सुबह पौने पाँच बजे ही निकल पड़ा। वैसे यह टहलाई हप्ते में औसतन तीन दिन होती है। स्टेडियम में ग्रुप में टहलने वाले टहलते मिले। ये लोग आपस में किसी राजनीतिक मुद्दे पर चर्चावान थे। उनकी बात सुनते हुए मैं आगे बढ़ गया… ऊपर आसमान में चाँद दूधिया रंग बिखेर रहा था। कुछ क्षण चाँद के शांत मगर चटक धवल रंग पर टकटकी लगाए रहा। खैर..
स्टेडियम में बढ़ती भीड़ से मुझे लगा कि फिटनेस को लेकर जागरूकता बढ़ी है। तभी ग्रुप का कोई सदस्य "आप फिट तो इंडिया फिट" कहता सुनाई पड़ा। देशभक्ति का यह श्लोगन सुनकर मैं चौंक उठा, इस श्लोगन का ही असर है कि सुबह-सुबह देश के चक्कर में स्टेडियम का एक चक्कर फटाफट पूरा किया।
लेकिन मेरे आगे-आगे एक निहायत आम आदमी तेज डग भरता चला जा रहा था। उसके दोनों हाथ भी उसी गति से पेंडुलमायमान थे। उसकी यह कवायद मुझे सनक जैसी लगी क्योंकि वह तो आलरेडी फिट दिख रहा था! मैंने सोचा, शायद देशवासी उसे फिट न मान रहे हों इसलिए वह और ज्यादा फिट होने पर तुला है। उसकी चप्पलों की फटर-फटर में उसकी बेचैनी छिपी थी - भई मैं भी फिट हूँ, और देश को फिट रखने की कुव्वत रखता हूँ।
लेकिन मुझे चिंता हुई - भला इस देश को कभी आम आदमी ने फिट किया है! कहीं उसकी यह कवायद इंडिया को अनफिट करने की तैयारी तो नहीं? सोचकर यकायक मैं भी आत्मावलोकन की मुद्रा में आ गया। फिर तो आत्मविभोर होने की फीलिंग हुई।
वाकई, इंडिया को फिट करना आम आदमी के बूते की बात नहीं, हम या हमारे जैसों के ही बस का है। क्योंकि इसके लिए पहले देशहित की फाइलों का नियम-नियामक और कर्ताधर्ता बनकर खुद को फिट करना होता है, मतलब राज-प्रदत्त पौरुष धारण करना पड़ता है! इस पौरुष का अद्भुत प्रभाव मुझे अपने पदचालन में अनुभूत होने लगा -
शानदार ब्रांडेड स्पोर्ट्स शूज से सुसज्जित मेरे राजपुरुषोचित चरणों की प्रत्येक धमक धरती को यह संदेश देती जान पड़ती थी कि:
“हे इंडिया की धरती! मैं तो फिट हो चुका, अब तू भी फिट हो ले!!”
तत्पश्चात देशभक्ति-भाव से लबरेज मुझ जैसे राजपुरुष के चरणों की धमक धरती पर और तीव्र हो उठी।
सहसा मुझे मोहन राकेश के नाटक "अषाढ़ का एक दिन" में दन्तुल और कालिदास के बीच का एक प्रसंग स्मरित हुआ।
दन्तुल का बाण एक मृगशावक को घायल कर देता है। कालिदास उसे बचाने का प्रयास करता है। दन्तुल घायल मृगशावक को सौंपने का आदेश देता है और न मानने पर दंड की धमकी देता है। किंतु कालिदास उसे ही मृगशावक का अपराधी ठहराकर सौंपने से इंकार कर देता है। दोनों के बीच वार्तालाप होता है -
"दन्तुल : तो राजपुरुष के अपराध का निर्णय ग्रामवासी करेंगे! ग्रामीण युवक, अपराध और न्याय का शब्दार्थ भी जानते हो!
कालिदास: शब्द और अर्थ राजपुरुषों की सम्पत्ति है, जानकर आश्चर्य हुआ।"
इसी के साथ एक बार फिर मेरी निगाह आसमान की ओर उठी चाँद में अभी चमक बाकी था, इसी नाटक में मल्लिका एक जगह कह रही है -
"एक दोष गुणों में उसी तरह छिप जाता है जैसे चाँद की किरणों में कलंक ; परन्तु दारिद्र्य नहीं छिपता।"
बस फिर क्या था मेरे अंदर का राजपुरुष हँस पड़ा, मन में आया कि उस आदमी के पास पहुँचकर उसे समझा ही दें कि - राजपुरुष जो कहें वही सही होता है, इसलिए मैं जो कहूँ मान लो, मैं तुमसे कहना चाहता हूं -
“यार तुम्हारी यह कवायद व्यर्थ है, तुम्हारे फिट होने से इंडिया नहीं फिट होने वाला! क्योंकि यह फिट-उट होना बड़े लोगों और उनके ही बस की बातें हैं। देखो, दारिद्र्य नहीं छिपता! इसलिए तुम्हारी यह दौड़ा-भागी इंडिया को अनफिट होने की श्रेणी में डाल देगा…
तुमको लोग फिट कहें इसके लिए जरूरी है कि पहले मैं फिट हो लूं जिससे इंडिया मतलब अपना देश फिट हो ले, फिर इंडिया के फिट होते ही आटोमेटिक सब फिट मान लिए जाएंगे; जैसे कि तुम भी! इसलिए पीछे हटो मुझे आगे जाने दो। तुम केवल अपनी रोजमर्रा की चीजों जैसे दाल-रोटी पर ही ध्यान लगाओ। यही देश हित में है! समझे न?”
यह समझाने मैं उसके पीछे लगभग भागा।
लेकिन उस तक मैं पहुँचता कि पाथ-वे से उतर वह स्टेडियम से बाहर निकल गया। जैसे मेरे सामने का कोई अवरोध हट गया हो। मैं स्टेडियम का दूसरा चक्कर लगाने लगा।
खैर आज की टहलाई पूरी कर अपने आवास लौट आया। यहाँ लान की हरी-हरी दूब पर निगाह पड़ी। दूब की कोमलता देख मुझे "अषाढ़ का एक दिन" नाटक की एक और पंक्ति याद आई -
"जीवन एक भावना है! कोमल भावना! बहुत-बहुत कोमल भावना!!"
कहते हैं कोमल भावनाएं व्यक्ति को ईर्ष्या-द्वेष, लोभ-लालच वश दुर्नीति बनाने से रोकता है। इस विचार से तो मैं डर ही गया कि कहीं इस भावना के प्रभाव में हम फिट होना ही न छोड़ दें!! क्योंकि फिट होने के लिए कोमल नहीं कठोर भावना की जरूरत पड़ती है!
इसी समय मोबाइल बजा। पत्नी का फोन था। वे बोलीं -
वह जो कामवाली है न, उसका पति जो राजमिस्त्री है उसको सुबह-सुबह पुलिस पकड़ के ले गई।
मैंने उत्सुकतावश पूछा - क्यों?
पत्नी - अरे कुछ नहीं, दस-बारह लाख की कोई जमीन लिया था, ब्रोकर ने ही पुलिस से पकड़वाया है।
मुझे थोड़ा अचंभा हुआ कि राजमिस्त्री ने कहीं कोई घोटाला तो नहीं किया, लगता तो बहुत सीधा और आम आदमी जैसा है, ऐसा फरेब तो वह नहीं कर पाएगा।
मैंने पूछा - तो कुछ गड़बड़ किया था क्या?
पत्नी - अरे नहीं, ऐसा कुछ नहीं, पहले इस जमीन के लिए उसकी ब्रोकर से बात हुई, लेकिन फिर सीधे मालिक से सौदा कर लिया। थोड़ा सस्ता पड़ा तो बेचारे ने एक-एक पैसा जोड़कर इसे खरीद लिया! बेचारी कामवाली भी बड़ी दु:खी थी। फोन पर बता करके कहा - दीदी आज काम पर आने का मन नहीं है।
मैंने - ब्रोकर ने उसे पुलिस से क्यों पकड़वाया?
पत्नी बोलीं - अरे वही, ब्रोकर को नुक़सान हो गया उसका कमीशन मारा गया, इस बात से वह नाराज था, ऐसे लोग तो पहुँचवाले होते ही हैं. थाने में बेचारे को धमकाया और मारा-पीटा भी गया..!
पत्नी की बात सुनकर मैं साइलेंट हो गया.. मेरी चुप्पी पर वे बोलीं -
पत्नी - “सरकार-वरकार इस अन्याय पर कुछ करती क्यों नहीं?
मैं - अरे भई, सरकारें हर जगह दुरबीन-उरबीन लेकर तो बैठी नहीं रहतीं कि कहाँ क्या हो रहा है, नजर में आ जाए!
पत्नी बेचारी चुप और अब मैं भी चुप। इस चुप्पी के बीच ही बातों का सिलसिला टूट गया।
वह राजमिस्त्री बिलकुल वैसा ही है जैसे आज स्टेडियम के पाथ-वे पर मेरे आगे-आगे चल रहा वह आम आदमी!
तो इस फिट-उट वाली बात पर एक बात और -
राजपुरुष बड़े कठोर होते हैं, कठोर फ्रेम से जुड़े भी रहते हैं! यही इनकी फिटनेस का राज है!! जैसे राजमिस्त्री को फिट किया गया, वैसे ही ये देश को भी फिट करते रहते हैं!!!
#चलते-चलते
फिटनेस का रहस्य हमारी कोमलता में नहीं हमारी कठोरता में छिपा है…
#सुबहचर्या
1.06.18