मैं जाग ही रहा था, लेकिन फोन मुझे जगाने के लिए आया था। थोड़ी देर बाद मैं मार्निंग वॉक के लिए निकल पड़ा। सड़क पर पहुँचते ही मैंने फोन करके उनको बताया कि मैं सड़क पर आ गया हूँ।
उधर से मुस्कुराहट में पगी आवाज सुनाई पड़ी, 'देखो, मैंने तुम्हें सड़क पर ला दिया।'
मैंने उस चौड़ी, शानदार सड़क पर दूर तक निगाह दौड़ाई और मुस्कुराते हुए कहा, सड़क पर आना कोई बुरी बात नहीं। सड़क तो वह रास्ता है, जो आदमी को उसकी मंजिल तक पहुँचाती है।”
मेरी इस बात के साथ ही दोनों ओर हल्की-सी हँसी बिखर गई और बातचीत समाप्त हो गई। तब-तक फोन करने वाले शख्स सड़क के किनारे खड़े हमारा इंतजार करते दिखाई पड़ गए थे। वहां से हम दोनों साथ-साथ सड़क पर चल पड़े।
तभी उनकी बैडमिंटन टीम के एक साथी खिलाड़ी मोटरसाइकिल से पीछे से आ पहुँचे। वे उनके साथ बैठना तो चाह रहे थे, पर संकोच कर रहे थे। मैंने ही उन्हें थोड़ा सा धक्का दिया कि बैठ जाइए। शायद उन्हें यह शंका थी कि कहीं मैं रास्ते से ही वापस न मुड़ जाऊँ, इसलिए मोटरसाइकिल पर बैठते हुए वे हँसकर बोले, ‘देखिए, आपको स्टेडियम तक आना है, लौटना नहीं है।’ खैर…
वैसे मेरे वे साथी स्टेडियम में पहुंचते हैं तो पहले नीम के एक पेड़ को गले लगाते हैं, उसके तने को छूते हैं। अभी कल वाली सुबह उन्होंने मुझसे भी ऐसा ही करने के लिए कहा था। मैं स्टेडियम में पहुँचा तो वे शायद इन्डोर बैडमिंटन कोर्ट में जा चुके थे। इधर मैं भी स्टेडियम के टहलने वाले ट्रैक की ओर चला गया। उस पर दो चक्कर लगाकर मैं वापस हो लिया।
मैं लौट रहा था। तभी एक व्यक्ति के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी। ध्यान से देखा तो यह आवाज मेरे आगे-आगे चल रहे एक पागल की थी। उसका यूँ बेवजह अजीब-सी आवाज में चिल्लाना, उसकी पागलों वाली अवस्था की अभिव्यक्ति थी।
फिर अचानक एक जगह उसे झुकते देख, मैंने सोचा शायद वह कोई ढेला उठाने के लिए झुका हो। लेकिन उसने वहाँ पड़ी एक मैली-कुचैली तौलिया उठा ली। उसे पास के मील-पत्थर पर बड़े करीने से रख दिया और उसके ऊपर एक छोटा सा पत्थर भी रख दिया।
मैंने सोचा, शायद तौलिया के ऊपर पत्थर उसने इसलिए रखा होगा कि हवा से वह न उड़ जाए। यह सब करने के बाद वह पूरी तरह निर्लिप्त भाव से वहां से आगे बढ़ गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे चल रहा था। तभी मैंने गौर किया कि वह चलते-चलते बीच-बीच में झुक जाता और सड़क पर पड़ी कोई न कोई चीज उठा लेता, कभी कोई ऐसा कंकड़, जो किसी के पैरों में गड़ सकता था, तो कभी कूड़े जैसी चीज। फिर वह उसे सड़क से दूर फेंक देता।
उस पागल के इन कृत्यों को देखकर मैंने सोचा, मानो सड़क पर चलते हुए वह अनजाने में ही राह को दूसरों के लिए थोड़ा और सुगम बनाता जा रहा हो।
आज लिखने का मन नहीं था, लेकिन उस "पागल" की वजह से लिखने बैठ गया, बस आज इतना ही।
#चलते_चलते
ऐ इंसां, तू किस गुमान में है! ज़रा पागल होना भी सीख ले।
#सुबहचर्या
(४.९.१९)