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रविवार, 12 अप्रैल 2026

नमस्ते

                                  1

        सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर ढक्कन सीमेंट से जाम था। पिछले दस मिनट से वह छेनी और हथौड़े की मदद से इसे मेनहोल से हटाने में जुटा था। ढक्कन के कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे छेनी टिकाता और इसपर हथौड़े से चोट मारता। लेकिन ढक्कन था कि टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा‌ था। पास में खड़ा ठेकेदार रमेसर चुपचाप उसके काम की निगरानी कर रहा था। 

        अचानक रमेसर के 'इस किनारे छेनी लगाओ’ कहने पर उसने दरार पर छेनी टिकाकर एक जोरदार हथौड़ा चला दिया। 

         छेनी छिटककर दूर दूब वाली घास में जा गिरी, इस झटके में उसकी कमीज की जेब से दो सिक्के भी घास में जा गिरे। 

           छेनीवाले को झुके हुए घास टटोलता देख उन्होंने हैरानी से पूँछा, 'छेनी नहीं मिल रही है क्या?' लेकिन छेनीवाले की बजाय रमेसर बोला उठा, “छेनी तो बड़ी चीज है वह मिल गई है, ये अपना सिक्का खोज रहे हैं।” 

         रमेसर के दो साथी वहां चुपचाप खड़े रहे,  छेनीवाले की मदद के लिए आगे नहीं आए। 'वे' को यह कुछ अजीब लगा। उनकी ओर देखकर कहा, “इसके मेहनत के सिक्के होंगे, खोजना ही चाहिए।"

        सिक्के मिलते ही छेनीवाला काम में जुट गया। रमेसर ने उसकी ओर इशारा करके मुस्कुराते हुए कहा, ‘बड़का दिमाग है इसके पास।’ इस मुस्कान में कुछ ऐसा था कि ‘वे’ को लगा, यह ‘बड़का दिमाग’ रमेसर के लिए तो मुफीद है ही स्वयं छेनीवाले के लिए भी मुफीद है। उनकी नजरें छेनीवाले पर गड़ गई।

         मोटे कपड़े का मटमैली कमीज, ऊपर धूसर-सी फटी सदरी, ढीली-ढाली पैंट, जैसे इन कपड़ों ने महीनों से पानी न देखा हो। पैरों में चप्पल नहीं, सिर पर घने उलझे बाल, जिन्हें शायद ही कभी कंघी ने छुआ हो। 

          लेकिन काम में उसकी तल्लीनता देख उसके हुलिए से मिजाज का अंदाजा वे नहीं लगा सके। इसके लिए रमेसर से कुछ पूछने को हुए, लेकिन वह भी छेनीवाले के काम पर ध्यान लगाए था।  

          छेनी पर पड़ते हथौड़े की चोट से ढक्कन हिल उठता। शायद यह ढीला हो चुका है, सोचकर रमेसर ट्रैक्टर के टूल बॉक्स से रम्मा भी निकाल लाया। लेकिन ढक्कन का एक सिरा अभी भी मेनहोल से जाम था। उसने छेनीवाले को उसे छेनी से अभी और काटने के लिए कहा।

         कुछ देर बाद ढक्कन चारों ओर से ढीला पड़ गया। रमेसर ने तुरंत छेनीवाले से छेनी-हथौड़ा रोकने के लिए कहा‌। फिर रम्मे के सहारे ढक्कन का एक सिरा उठाते हुए इसे मेनहोल से हटाने के लिए बोला।  

          वे को अचरज-सा हुआ कि रमेसर रम्मे के सहारे ढक्कन संभाले खड़ा था, और उसके दोनों साथी पास खड़े होकर भी उसे छूने से कतराते थे। आखिर छेनीवाले ने ही ढक्कन दूसरी ओर उलट दिया। पूरा मेनहोल खुल चुका था। इसमें झांककर रमेसर ने कहा,

         'अरे! इसमें कींचड़ तो कम है, पानी ज्यादा है।’

         "तो सेप्टिक-टैंक में जमा मल ही रमेसर की व्यावसायिक भाषा में 'कीचड़' है!" 'वे' को यह न‌ई बात पता चली।

         उत्सुकतावश उन्होंने मेनहोल झाँककर देखा, तली पर जमा मल सचमुच कींचड़ जैसा ही दिखाई पड़ा।

          इधर इस कींचड़ को देखकर रमेसर के सामने जैसे सेप्टिक-टैंक का मेनहोल नहीं; स्मृतियों की सुरंग खुल गई! 

         "दद्दा की बाल्टी में यह ‘कींचड़’ कुछ और ही रंग में होता। वे रोज़ सुबह नौ बजे बाल्टी, झाड़ू और टिन लेकर ब्लॉक की कॉलोनी निकल पड़ते। एक दिन जिद करके मैं भी उनके साथ हो लिया। मेरा साथ चलना दद्दा को अखर रहा था; उन्होंने मुझे पुचकारकर रोकना भी चाहा, पर मैं नहीं माना था। तब मेरी उम्र कोई चार–पाँच साल रही होगी।"

      ...उस दिन पहले दद्दा एक बड़े क्वार्टर के पीछे की ओर गए। उस क्वार्टर के नींव के ऊपर दीवाल पर लोहे का एक ढक्कन लटक रहा था। दद्दा ने इसे उठाया। यहां आले जैसा एक चौकोर गड्ढा था। उसमें यही 'कींचड़' पीले रंग के ढेर में जमा था। 

          ....दद्दा ने मुड़े हुए टिन से उस पीले मैले के ढेर को बाल्टी में भर लिया फिर आले को झाड़ू से साफ भी किया।  यह सब मुझे बेहद अजीब लगा, लेकिन दद्दा एक-एक कर सभी क्वार्टरों पर जाते ग‌ए। धीरे-धीरे उनकी बाल्टी उसी पीले मैले से भर गई, जिसे दूर झाड़ियों में जाकर खाली कर आए थे।

           ....इस काम के दरमियान न दद्दा बोले, न मैंने कुछ पूँछा; मैं बस चुपचाप उन्हें यह काम करते देखता रहा। लेकिन बाल्टी खाली करके लौटे तो एक पल के लिए दद्दा ने मुझे घूरा भी था। उनका वह घूरना मुझे आज भी याद है। दद्दा की आँखों में जैसे नाराजगी थी। वे मुझे भी लेकर सीधे हैंडपंप पर आए। अपने सभी सामान धोए फिर नहाए और मुझे भी नहलाए थे। इसके बाद मैं कभी दद्दा के साथ कॉलोनी की ओर नहीं गया।"

        हालांकि काफी दिनों बाद मैंने दद्दा से कहा भी था, 

        “दद्दा मुझे घिन आती है, मत करो यह काम।” 

         “इससे क्या घिनाना! यह तो हमारा कर है यही रोजी है” दद्दा ने यही बोलकर तब मुझे चुप करा दिया था।

           रोजी तो मैंने भी सीवर में कूदने वाला ही चुना था बल्कि यह नौकरी पाने के लिए नगरपालिका के सीवर के काले गंधाते पानी वाले नाले में झम्म से कूद भी पड़ा था! जबकि सात जने, जो ऊँची जात के थे उसमें नहीं कूदे,..अन्य दो जने जैसे-तैसे नाले में उतरे भी तो तुरंत बाहर निकल आए…शायद तब के अफसरानों ने भी दद्दा की वह बात कि ‘यही हमारा कर है यही रोजी है’ मानकर मुझे इस नौकरी के लिए चुना था।

          इन ख्यालों के साथ रमेसर ने गर्व से अपने ट्रैक्टर-टैंकर की ओर देखकर सोचा, अब यही अपना काम..अपनी मशीन और अपना धंधा..  जैसे दद्दा की ‘रोजी’ से अपनी ‘रोजी’ की तुलना कर रहा हो! 

        उसे ‘वे’ का चेहरा कुछ जाना-पहचाना-सा लगा। मन में चालीस वर्ष पुरानी कोई धुँधली स्मृति उभरी -

        “तब मैं मुश्किल से पाँच-छह साल का रहा होऊंगा। यहां के घर कच्चे होते। बाबा इन्हीं घरों से त्योहारी लेने आते। कभी-कभी मैं भी उनके साथ चला आता। शायद तब इनको यहीं कहीं देखा रहा हो। लेकिन आज इनके बराबर खड़ा होकर इनसे सौदेबाजी भी कर रहा हूँ, तो इसी अपने ‘रोजी’ के बल पर; आज मैं खुद के सेप्टिक-टैंक सफाई-व्यवसाय का मालिक हूँ!”

            अम्मा की याद आई। अगर अम्मा मुझे जबर्दस्ती स्कूल न भेजतीं तो मैं आज भी नगरपालिका में वही सफाई कर्मचारी होता। अम्मा यही तो कहतीं कि 'तुम्हारे दद्दा और पप्पा तो करिया अक्षर हैं, इसीलिए वे मैला ढोते हैं मुला तुम यह काम मत करना, खूब पढ़ना। इसीलिए मैं कक्षा आठ तक पढ़ भी गया था।'

            मेरा स्कूल और घर, दोनों एक ब्लॉक के कैंपस में था।

           बीडीओ ऑफिस के पीछे आठ बाई दस की कोठरी ही मेरा घर था। कोठरी भी जर्जर हो चली थी। दद्दा ने उसके सामने छोटी सी जगह में टटिया खड़ी कर घेर बना लिया था, इसी घेर में उनकी झोपड़ी थी, जिसमें वे अपनी गैया के साथ रहते।

        अच्छी तरह याद है, त्योहारों की छुट्टियां आती तो ब्लाक कैंपस में सन्नाटा पसर जाता! सब अपने-अपने घर लौट जाते। मैं भी घर चलने की जिद्द करता, पर अम्मा कहतीं, 'यही तो हमारा घर है।'

         लेकिन घर को लेकर मेरी बेचैनी शांत नहीं हुई, मन के किसी कोने में गाँठ बनकर दबी रह गई, जो कक्षा पांच में जाने पर खुली।"     

        उस दिन भी मैं कक्षा में पीछे, सबसे अलग-थलग बैठा था। पंडी जी पढ़ा रहे थे - आजादी के बाद पहले यह विकास खंड बना, फिर यह स्कूल, तो मैं चौंक पड़ा। 

          अचानक पूछ लिया - पंडी जी, तब मेरा घर भी यहाँ नहीं था न? 

           इसे सुनकर कक्षा में सब ऐसे हँसे मानो मैंने कोई ऊल-जलूल बात कह दिया था। पंडी जी भी घूरने लगे तो मैं सहम गया था। 

        आज सोचता हूँ, मैंने यह सवाल आखिर किस हिम्मत से पूछ लिया था! जबकि हमारी जाति में जन्मा कोई बच्चा परली बात सोच ही नहीं सकता था! बस जो है, उसे ही सच मानकर जीना सिखा दिया जाता था। 

           फिर उस दिन पंडी जी का कहना कि ‘नहीं, तब तुम्हारा घर भी यहाँ नहीं था’ सुनकर मेरा दिमाग चकरा गया था। उस वक्त कक्षा, पाठ, और हँसी सबसे ध्यान हटकर, मन उस सवाल पर जा अटका कि ब्लॉक बनने से पहले हम कहां रहते थे। यह बात दद्दा से पूछने की बेचैनी में, छुट्टी होते ही मैं सीधे घर की ओर भागा था।

       बस्ता फेंका और उनकी झोपड़ी में गया। वे वहां नहीं थे। अम्मा ने बताया कि वे बिलाक कालोनी ग‌ए हैं, आते होंगे। फिर बाहर आकर मैं उनकी बाट जोहने लगा था।  

           दद्दा आते दिखाई पड़े। मैं उनकी ओर लपका। पर उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक गया। दद्दा यह काम दोपहर से पहले ही निपटा लेते हैं, सोचते हुए मैं धीमे-धीमे लौटकर हैंडपंप के पास आ खड़ा हुआ। 

          दद्दा भी वहीं आ गए। सारा सामान नल के नीचे रख दिया। मैं चुपचाप हैंडपंप चलाने लगा। वे एक-एक करके उन्हें धोने लगे। मैंने उनके चेहरे पर बेचारगी-सी मायूसी देखा।  यह कुछ अजीब-सा लगा। उनकी बड़बड़ाहट से ही मैं समझ गया वे किसी कारण सुबह यह काम नहीं कर पाए थे इसके लिए ब्लाक के साहब ने उन्हें तिरस्कृत कर डांटा था। इसलिए इसे दूसरी बेला में किया। अब उनसे कुछ पूछने का मन नहीं हुआ।

          उनका सारा सामान धुलवाया। इसके बाद मैं भी उनके साथ झोपड़ी के भीतर आया। अचानक मुझसे घेर के बाहर खड़े होने का कारण पूछ लिया, मेरे मन की मुराद जैसे पूरी हो गई, उनसे पूछ बैठा था,

            “दद्दा, जब यहाँ बिलाक नहीं था… तब हम कहाँ रहते थे?”

            इस सवाल पर मेरी ओर अचरज से देखा तो मैंने उन्हें अपनी बात समझाकर बोला था,

          “पंडी जी कह रहे थे न… कि बिलाक आज़ादी के बाद बना। तब तो हमारा घर भी यहाँ नहीं रहा होगा?”

           “हाँ.. हमारा घर पाकिस्तान में था।”

            दद्दा तब तेरह-चौदह साल के थे अपने बप्पा बद्दन के साथ भारत आए। बप्पा को लगा था कि बँटवारे के बाद ऊँची जात वालों के चले जाने से अछूत होने का दर्द नहीं रहेगा। लेकिन जल्दी ही अहसास हुआ कि वहां अपने रस्मोरिवाज भी खुलकर नहीं निभा पाएंगे - नाली-सीवर ही साफ करना पड़ेगा। तब एक दिन वे चुपचाप परिवार समेत सीमा पार कर ग‌ए। 

            चार साल परिवार सहित दिल्ली के एक तंबू में बिताए। फिर सरकार ने इसी ब्लॉक में सफाई की नौकरी पर भेज दिया। 

           अंत में दद्दा ने कोठरी की ओर इशारा करके कहा था - 'तबसे यही हमारा घर है।’

            अकस्मात रमेसर की नजर छेनीवाले पर पड़ी। वह टैंकर का सक्शन-पाइप मेनहोल की ओर खींचकर ले आ रहा है। दूसरा साथी वैक्यूम पंखा स्टार्ट करने के लिए ट्रैक्टर पर चढ़ा था।      

          रमेसर ने बढ़कर छेनीवाले से यह पाइप अपने हाथ में ले लिया। इसे सेप्टिक-टैंक में उतारा। उधर वैक्यूम फैन चालू होते ही पाइप से पानी सुड़कना शुरू हो गया। 

        अब तक सांझ भी स्याह हो चली थी। बल्ब की रोशनी में रमेसर का चेहरा साफ पढ़ा जा सकता था। वह मेनहोल पर झुका था। उसकी शांत और गंभीर मुखाकृति देखकर ‘वे’ ने सोचा -

          'चार लोगों की टीम है इसकी, लेकिन छेनीवाले के अलावा एक रमेसर ही है जिसने सक्शन-पाइप छुआ! जबकि वह टीम लीडर है, पाइप किसी को भी पकड़ा सकता है। हो सकता है स्वयं इसलिए करता हो कि यह काम अच्छे से हो‌।" 

                                        2

         धीरे-धीरे पानी घटने पर सेप्टिक-टैंक में 'सीवर' का गाढ़ापन उभर आया। ऐसे ही गाढ़े सीवर में पप्पा बेहिचक उतर जाया करते थे! यह स्मरण होते ही रमेसर की आँखें सजल हो आईं।      

         सक्शन-पाइप हाथ में लेते ही भीतर टीस उठती है, पप्पा सामने आ खड़े होते हैं! फ़िर वह पाइप तब तक नहीं छोड़ता, जब-तक ‘कीचड़’ पूरी तरह बाहर न आ जाए। उस क्षण पाइप पर हाथ की पकड़ और भी कस उठती है- मानो वह पप्पा की अधूरी लड़ाई पूरी कर रहा हो।

        "दद्दा चाहते थे कि पप्पा स्वीपर की नौकरी कर ले, इसे वे पुश्तैनी काम मानते। पप्पा चिढ़ उठते। उनमें एक बेचैन छटपटाहट भर जाती। वे शहर में दिहाड़ी की तलाश में निकल जाते, पर वहां भी न टिकते; वापस आकर घर पर ही चुपचाप पड़े रहते। 

           एक बार अम्मा से पप्पा को कहते सुना था - 

         “क्या कींचड़ में लिथड़ी इस जाति को उतारकर हम फेंक नहीं सकते?” 

         उस दिन पप्पा की बात का अर्थ नहीं समझ सका था। लेकिन वर्षों बाद जाना, जाति सचमुच में भविष्य लिखती है! पप्पा निरक्षर थे - सोचते रहते, बस घुटते रहते।

         एक दिन दद्दा गाँव में से त्योहारी लेकर लौटे थे। उनकी गठरी में ढेर सारी पूरियां-कचौरियां और खाने की चीजें थीं। गठरी देखकर पप्पा गुस्से में बोले थे - 

       'यह अच्छी बात नहीं कि घरों के सामने हाथ पसार जाकर खड़े हो जाओ, यह भिखमंग‌ई ठीक नहीं बाबा, इससे अच्छा तो फिर मैला ढोने का काम है.. इसमें कम से कम कुछ करके तो कमाना है।' 

        उसने स्वयं देखा था—दद्दा गाँव के ‘बड़े’ घरों की देहरी पर बारी-बारी जाकर खड़े होते; भीतर से कोई निकलता और दूरी बनाकर उनकी चादर में ऊपर से ही त्योहारी डाल देता। उनकी चादर छूने से लोग कतराते, और उन्हें हमेशा दूर ही बिठाया जाता।

          पप्पा की बात पर दद्दा ने ऐतराज नहीं जताया। लेकिन बोले थे -

         “देख दिन्ने, यह भिखमंगाई नहीं, इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना हो जाता है। यदि दिखाई न पड़ूं तो लोग पूँछने लगते हैं.. दिन्ने! एक बात और! गाँव के लोग शादी-ब्याह पर मुझे नेग-चार देना नहीं भूलते!” 

       दद्दा और पप्पा, दोनों की बातें दो छोर की होती। इनके बीच वह एक अजीब द्वन्द्व में फंस जाता। समझ नहीं पाता किसे सही माने। यह उलझन उसके भीतर बैठ गई।

          और उस दिन पप्पा नहीं उनका शरीर आया था घर। तब कक्षा सात में था वह। स्कूल से लौट रहा था। घेर के सामने कुछ लोग खड़े दिखाई दिए। सबके चेहरों पर एक अजीब-सी खामोशी थी। उसे अनहोनी की आशंका हुई। घबड़ाहट में भागते हुए घेर में पहुँचा। वहां पप्पा जमीन पर लेटे थे और अम्मा उनके सिरहाने बैठी थीं..

          वह कुछ समझ पाता कि दद्दा ने उसे कसकर अँकवार में भर लिया था, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। उधर अम्मा की अचानक रुलाई फूट पड़ी, वे दहाड़ें मारकर रो उठीं थीं।

         पप्पा के मन से अनजान रहते दद्दा..। पप्पा स्वीपर नहीं मजदूर बनना चाहते थे लेकिन जाति और पुश्तैनी पेशा आड़े आ जाता। 'जाति माथे पर कलंक है' यही सुना था अम्मा से कहते हुए उन्हें। शायद विवशता में ही उन्होंने शहर जाना छोड़ दिया था। 

             दद्दा के निठल्ला कहने से आजिज आकर एक दिन पप्पा स्वीपर बनने को तैयार हो ग‌ए। शहर ग‌ए तो नगरपालिका के एक सफाई ठेकेदार ने उन्हें अपनी टीम में रख लिया।”

          उस जमाने में वैक्यूम-सक्शन टैंकर जैसी कोई मशीन नहीं थी। उन्हें खुद सेप्टिक टैंक में उतरना पड़ता और गाढ़ा ‘कीचड़’ बाल्टियों में भर-भरकर बाहर निकालते। तब उनका पूरा शरीर उसी कीचड़ में लथपथ हो जाता।

           सीवर में उतरने का अपना अनुभव पप्पा कुछ ऐसा ही अम्मा को बताते - 

          “जब सीवर में घुसता हूँ तो तिलचट्टों से घिर जाता हूँ ये मेरे शरीर पर दौड़ने लगते हैं!” 

            शायद स्वप्न में भी ये तिलचट्टे उन्हें अपने शरीर पर रेंगते दिखाई पड़ते इसीलिए कभी-कभी रात में सोते से अचानक उठकर वे अपना शरीर झाड़ने लगते!! 

           यही नहीं वे बार-बार अपना हाथ धोते, टोकने पर अम्मा से कहते - 

            “क्या करूँ..मेरे हाथों में जैसे मैले की बदबू आती रहती है, इसीलिए बार-बार हाथ धोना पड़ता है!”

           फिर अचानक उनका शहर जाना बंद हो गया। दद्दा के पूछने पप्पा ने बताया था - 'सरकार के डर से ठेकेदार अब काम पर नहीं बुलाता‌... आदमी को सीवर में घुसने पर रोक लगा दी गई है।' 

        लेकिन दो-चार महीने बीतते-बीतते पप्पा फिर शहर जाने लगे थे। 

         उन दिनों वे बीमार भी रहते। डाक्टर ने उन्हें सीवर में उतरने से मना कर दिया था। पर वे कहाँ मानने वाले थे। अम्मा के टोकने पर कहते, ‘बप्पा अब रिटायर हैं, मेरा काम पर जाना जरूरी है। 

          उस दिन भी उनकी तबियत खराब थी। लेकिन “आज एक बड़े सेप्टिक टैंक की सफाई होना है, न जाने से ठेकेदार नाराज होगा” कहकर सुबह-सुबह वे शहर चले ग‌ए थे। 

         लोग बताते थे कि सेप्टिक-टैंक में उतरते ही पप्पा बेहोश हो ग‌ए। अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्हें देखने उनके एक साथी सेप्टिक-टैंक में उतरे। लेकिन वे भी बेहोश हो ग‌ए। 

         फिर शोर-शराबे पर भीड़ इकट्ठी हुई। तब तक ठेकेदार भाग चुका था। जैसे-तैसे सेप्टिक-टैंक से बाहर निकालकर उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। लेकिन दोनों नहीं बच पाए। 

        कहते हैं कि पप्पा की मौत सेप्टिक-टैंक में ही हो गई थी। दद्दा और अम्मा बहुत दिनों तक थाना-से-कचहरी घूमते रहे, मुआवजा भी नहीं मिला। बाद में पता चला कि इस घटना के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं माना गया। 

       ....घेर का दृश्य देख मैं जड़वत खड़ा रह गया। अम्मा का रोना और दद्दा के आँसू, सब देखता रहा। पप्पा के पहने हुए कपड़े सीवर के कीचड़ में सने उनके निर्जीव शरीर से अब भी चिपके थे। मेरी आँखें डबडबा आईं, पर मैंने उन्हें बाँह से पोंछ लिया। रोया नहीं।

           ख्यालों की वह परत अचानक हट गई जब टैंक से आती 'सुड़-सुड़' की आवाज कानों में पड़ी। रमेसर ने देखा, टैंक में सक्शन-पाइप के मुहाने के नीचे पानी उतर चुका था ।

                                        3

              रमेसर ने ‘वे’ को मेनहोल में दिखाकर कहा कि “टैंक में पानी चार फीट उतर चुका है। एक टैंकर फुल हो गया दूसरा चक्कर भी लगाना होगा..दो टैंकर सीवर था इसमें।” फिर विश्वास दिलाने के लिए 'वे' को टैंकर का पारदर्शी संकेतक भी दिखाया।  

            इशारा पाकर  छेनीवाले ने टैंकर का नोजल बंद किया और रमेसर ने सेप्टिक-टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाला। वह टैंकर खाली करने पास के खेत की ओर बढ़ा ही था कि 'वे' ने टोक दिया कि "इसमें मत गिराना, खेत मालिक नाराज होंगे।" 

         अचानक रमेसर को बचपन की एक घटना याद आ गई जब उसने दद्दा से पूछ लिया था,

         “दद्दा, बाल्टी वहाँ क्यों खाली किए, वहाँ तो सब लड़िकन खेलने जाते हैं… जानते हैं, हमारी गेंद भी वहाँ चली गई थी, विज्जू उसे लाने गया तो उसका पैर छपाक से उसमें पड़ गया, इसे वहाँ न डाला करिए‌।”  

           दद्दा पल भर ठहरकर बोले थे -

         “बचवा, इसे कहां गिराऊँ? यहाँ कोई जगह भी नहीं है। एक बार उस खेत के कोने में बाल्टी उलट दिया तो खेत-मालिक ने खूब गरियाया था।" 

            दद्दा के गरियाए जाने की बात सुनते ही मेरा रोयां-रोयां सुलग उठा था.. उनकी ओर देखा था। 

          उनके बूढ़ाते शरीर पर पीढ़ियों की बेइज्जती का बोझ साफ झलकता था। जैसे अब उनका मन हर बात से उचट गया हो। उन्हें देखकर मुझे यह भी लगा था जैसे वे कहना चाह रहे थे - "जिंदगी ने सब सहना सिखा दिया है।"

         इसे यादकर रमेसर की मुट्ठियां भिंच ग‌ईं। मन में गुस्से से भरी एक टीस उभरी..

        "हूँ... खेत मालिक नाराज होंगे!" बुदबुदाकर मन में उठे गुस्से को जज्ब किया।फिर कठोर स्वर में यह बोलकर कि - 'खेत के लिए यह खाद ही तो होता' टैंकर लेकर अँधेरे में दूसरी दिशा में बढ़ गया।

          सीवर गिराकर टैंकर लौटा तो इसके नोजल में छेनीवाले ने सक्शन-पाइप फिर जोड़ दिया। इस पाइप को हाथ में लेकर रमेसर ने मेनहोल में झाँका।  बल्ब की रोशनी उसमें नहीं पहुँच रही थी। मोबाइल फोन का टार्च ऑनकर देखा। 

          टैंक में भीतर सीवर गाढ़ा दिखाई दिया। इसका सुड़कना अब मुश्किल है, सोचकर उसने ‘वे’ से एक बाँस मंगाया।

        रमेसर ने बाँस हाथ में लिया। उसने छेनीवाले को पंप चालू करने का इशारा किया और पाइप मेनहोल पर टिका दिया। पंप चालू होते ही पानी टैंक में गिरने लगा। 

          रमेसर ने बांस से टैंक के भीतर जमे हुए गाढ़े कीचड़ को हिलाना शुरू कर दिया। ताकि पानी में घुलकर यह आसानी से खिंच सके।

         तभी सक्शन-पाइप के मुहाने के पास कपड़ेनुमा कोई चीज दिखाई पड़ी। वह पाइप में न फँसे, इसलिए रमेसर ने उसे बाँस से दूर हटा दिया। छेनीवाले ने उसके हाथ से बाँस ले लिया। और उसके सहारे उस कपड़े को बाहर निकाल दिया। 

         ‘वे’ ने देखा, छेनीवाले के हाथ और पैर सीवर की कींचड़ से लथपथ थे। रमेसर से बोले, “यह छेनीवाला तो बहुत कामकाजी है?

          कुछ पल सोचने के बाद स्थिर और संयत आवाज में रमेसर बोला, 

          यह काम और मेरी यह जाति, जैसे एक ही रस्सी में बँधे हों। शुरुआत में ट्रैक्टर चलाने के लिए कोई ड्राइवर न मिलता। एक आदिवासी लड़का मिला भी तो सक्शन पाइप न छूने की शर्त पर!

              ऐसे में, सक्शन-पाइप को जोड़ने से लेकर सेप्टिक-टैंक में उतारने और काम के बाद उसे धो-पोंछकर समेटने तक ये सारे काम मुझे ही करना पड़ता। 

        फिर छेनीवाले की ओर देखकर रमेसर ने मुस्कुराकर कहा-

           "यदि यह न मिला होता तो सेप्टिक टैंक सफाई वाला मेरा यह धंधा परवान न चढ़ता… पहली नजर में तो मुझे यह पागल ही लगा था। 

         गाँव की बस्ती से दूर सीवान में एक कमरे की, झोपड़ीनुमा इसकी कोठरी देख, मैंने इससे केवल यही पूँछा था- 

            "यहाँ बस्ती से दूर अकेले में घर क्यों बनाया?" 

               यह छूटते ही बोला था - 

              “मेरी कोई जाति नहीं इसलिए... और खुशी-खुशी मेरे साथ काम करने के लिए तैयार हो गया था।

        पहले ही दिन मैंने इसे छेनी-हथौड़ी देकर मेनहोल का ढक्कन खुलवाया। बिना झिझके इसने वे सारे कार्य किए जिसे आज यहाँ कर रहा है। 

          काम समाप्त होने के बाद इसने बख्शीश मांगा। तभी मुझे लगा कि इसके पास ‘बड़का दिमाग’ है। यह बात तो मेरे मन में कभी आई ही नहीं थी। पैसे को लेकर यह बहुत चैतन्य रहता है उसी दिन से यह 'छेनीवाला' बन गया। 

            बात पूरी होते ही रमेसर ने 'वे' से कहा - 

        "यह छेनीवाला न, आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है, इसीलिए इसे आदमियों की बस्ती से दूर घर बनाकर रहना पड़ता है!" 

                                       4     

         रमेसर ने छेनीवाले को लेकर जैसे कोई गूढ़ बात कहा  हो, ‘वे’ उसे गौर से देखने लगे, जैसे वे उसके जीवन की कहानी जानना चाहते हों-

           वही बिखरे बाल और ढीले-ढाले कपड़े… चेहरे पर एक अजीब-सी निस्पृहता… हाथ कीचड़ में सने हुए !  

         अचानक रमेसर बोला, 

         “यह ब‌ऊक नहीं.. वही मैंने जो पहले कहा था... बड़का दिमाग है इसके पास..”

         कुछ पल रुककर रमेसर ने फिर कहा -

          “मैं इसकी दुखती रग को ज्यादा कुरेदता तो नहीं हूं.. पर लोगों से सुनी-सुनाई बात है…”

        पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटा था.. माँ-बाप के अतिशय लाड़-प्यार के तरीके ने इसे बिगाड़ दिया.. स्कूल-उस्कूल का मुँह नहीं देखा। दिमाग का खुलना बाकी रह गया…

          छेनीवाला बाँस हिला-हिलाकर सेप्टिक-टैंक में कींचड़ घोलने में जुटा था। उसकी ओर देखकर रमेसर ने फिर कहा, 

        “लोग इसे ‘बऊक’ समझते, इसकी हँसी उड़ाते;  विवाह भी न हो सका। माँ-बाप भी दुनियां से कूच कर गए.. फिर यह अपने ही घर में पराया हो गया.. उपेक्षित-सा.. भाइयों ने तो इसके हिस्से की जमीन भी अपने नाम करा लिया।”

         तभी सेप्टिक-टैंक से सर्र-सर्र की आवाज आई। छेनीवाले ने बाँस एक किनारे रखा और सक्शन-पाइप हाथ में लिया। वह मेनहोल पर झुका हुआ यह पाइप अंदर इधर-उधर चलाने लगा। रमेसर भी उसके पास चला गया। 

         दोनों बारी-बारी एक-दूसरे से पाइप अपने हाथ में लेते और सेप्टिक टैंक में घुमाते हुए बचा-खुचा सीवर सुड़कवाने लगे!

          ‘वे’ भी उसी ओर देखने लगे।

         छेनीवाला बिना झिझक पाइप के सीवर की कीचड़ से सने हिस्से पर भी हाथ लगा देता; रमेसर ऊपर के हिस्से को ही पकड़ता, मानो कीचड़ से बचना चाहता हो। फिर भी दोनों का तालमेल ऐसा था, जैसे एक ही देह के दो हाथ हों। 

          रमेसर, छेनीवाले को कुछ समझाने लगा था। इधर 'वे' भी मेनहोल के थोड़ा और करीब चले गए।

         छेनीवाले के हाथ में पाइप देकर रमसेर फिर 'वे' से मुखातिब होकर बोला -

            “एक दिन यह कहीं चला गया.. किसी ने कोई खोज-खबर नहीं ली… और जब वर्षों बाद लौटा तो एक कूबड़ वाली स्त्री को साथ लेकर…”

          इन बातों के बीच छेनीवाला चुपचाप पाइप को टैंक में घुमाता रहा, उसकी नहीं, जैसे किसी और की बात चल रही हो.. 

           .. अपने ही घर के दरवाजे नहीं खुले इसके लिए.. लोग हँसते..क‌ई दिन गाँव में भटकता रहा…  जाति निकाला हो गया इसका.. किसी तरह गाँव के बाहर कोठरी भर की जमीन का टुकड़ा मिला तो वहीं उस स्त्री के साथ रहने लगा….

           थोड़ी देर चुप्पी छाई रही।

            फिर रमेसर ही बोला,

         लेकिन इसका यह ‘ब‌ऊकपन’ न, इसके लिए ढाल बन गया.. इसे टूटने नहीं दिया…

           उधर छेनीवाला अपने ही धुन में था।  वह टैंक से सक्शन-पाइप निकालने लगा‌।

             रमेसर ने उसकी ओर देखकर फिर ‘वे’ से कहा -

          "अच्छा ही है कि यह आदमियों की बस्ती में नहीं रहता।"

            'वे' थोड़ा चौंके। उनकी निगाहें रमेसर पर ठहर ग‌ई- मानो इन शब्दों के मर्म टटोल रही हों। 

         वह भी थोड़ा असहज हुआ। क्षण भर के लिए यह सोचकर झिझका कि कहीं वे छेनीवाले की जाति न पूछने लगें, इस आशंका में बात को मोड़ता हुआ बोला, 

          "बात यह कि बस्ती में रहकर यह आदमियों के बहकावे में आ जाता...सौदेबाजी सीख जाता।" 

             अब तक छेनीवाले ने सक्शन-पाइप बाहर खींच लिया था और उसे किनारे रखकर धोने लगा था। 

        'वे' मेनहोल में झांकने लगे कि सीवर पूरी तरह निकला या नहीं,  छेनीवाले पर बात यहीं थम गई थी। 

           लेकिन रमेसर मन ही मन बुदबुदाया -

            “यह कितना अजीब है..छेनीवाले की ऊँची जाति जानकर लोग उसके साथ सहज हो जाते हैं और एक हम हैं,  हमारे लिए वही ऊँच-नीच का पुराना भाव, चाहे यह दबा हुआ ही हो, पर उभर तो आता ही है…हाँ…पप्पा! उस जमाने में कितना झेले होंगे….”

         'वे' ने देखा, गाढ़ा कीचड़ पानी में घुलकर लगभग खिंच चुका था; तली में बचा पानी पाइप की पकड़ में अब नहीं आने वाला। 

         उधर रमेसर के वे दोनों साथी जो पूरे समय वहीं आसपास मँडराते रहे थे, न पाइप को हाथ लगाए और न ही इसे धोने में छेनीवाले का हाथ बंटाया। 

        उनकी ओर ध्यान जाते ही उनके मन में प्रश्न उभरा - 

        यह काम की या फिर जाति की, क्या कोई एक अदृश्य रेखा है जो उन्हें एक-दूसरे से अलग किए हुए है?  

                                        5

             अचानक रमेसर ने ‘वे’ से एक तरफ चलने के लिए कहा, वह उन्हें एक अँधेरे कोने में ले गया। वहां जमीन की ओर इशारा करके उन्हें कुछ दिखाते हुए वह धीरे से बोला, 

         देखिए, इसे मैंने यहाँ एक किनारे रखवा दिया है। सोचा, आपको बता दूँ, नहीं तो अनजाने में कोई इसे हाथ लगा देता। सुबह किसी से कहकर इसे फिंकवा दीजिएगा।”

           ‘अरे! यह तो वही कपड़ा है...सेप्टिक-टैक से निकला, सीवर में लिथड़ा हुआ...तो इसे यहाँ रखवाया था रमेसर ने! छेनीवाले से इसे कहीं दूर भी तो फेंकवा सकता था!’ 

            सीवर में सने उस कपड़े को लेकर रमेसर का यह वर्ताव ‘वे’ को कुछ विचित्र लगा। वे उस कपड़े को देखते हुए मौन रहे।

          रमेसर ने ‘वे’ को नजर भर देखा! वे अभी भी किसी विचार में डूबे उसी कपड़े को देख रहे थे।  

       फिर अचानक वह पोर्टिको की ओर चला गया जहां बाबू जी कुर्सी पर बैठे थे। उनसे काम का हिसाब किया। छेनीवाला भी अपने हाथ पैर धोकर वहीं आया। उसे बख्शीश लेना था। यह उसे मिला, जो उसकी अपेक्षा से ज्यादा था। इससे रमेसर और वह, दोनों खुश हो ग‌ए थे।

        यकायक रमेसर ने छेनीवाले को सीवर में लिथड़े उस कपड़े को फेंक आने के लिए कहा। शायद यहां किसी की कोई जाति नहीं थी; प्रतिमूल्य था अतिरिक्त बक्शीश मिलने का और इसमें रमेसर की खुद्दारी भी छिपी थी। 

         ‘वे’ को समझ में आ गया कि छेनीवाले के लिए रमेसर ने ‘बड़का दिमाग’ वाली बात यूँ ही नहीं कहा था। यह उस भाव की पहचान थी, जहाँ आदमी अपने मूल्य को जानता है। 

           और  वह केवल अपना ही नहीं, उसके हिस्से की गरिमा की भी रक्षा कर रहा था। अन्यथा, उस सीवर में लिथड़े कपड़े को वह पहले भी उससे फिंकवा सकता था। लेकिन तब रमेसर का ठहर जाना उस अदृश्य हीनता के विरुद्ध एक छोटा-सा प्रतिरोध था, जो खुलकर नहीं… भीतर ही भीतर लड़ा जाता है। 

         रमेसर काम समाप्त करके जाने को हुआ तो अचानक घूमकर नमस्ते बोला, प्रतिउत्तर में 'वे' ने भी उसे नमस्ते कहा। लेकिन उनके जेहन में वही कपड़ा अब भी घूम रहा था।

        अँधेरे में, ज़मीन पर पड़ा वह कपड़ा उन्हें मात्र एक परित्यक्त वस्तु नहीं लगा..वह जैसे एक अनकहा विचार बनकर उनकी आँखों में ठहर चुका था।

         

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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

शीशे के उस पार

       शीशे के पार से नाई की दुकान में झांका। दो कुर्सियों पर दो लोग बैठे थे। शायद दोनों गपशप में मशगूल थे। उधर बेंच पर कोई अन्य व्यक्ति नहीं दिखाई पड़ा। इससे तसल्ली हुई कि समय बचा, नंबर नहीं लगाना पड़ेगा। दुकान में दाखिल हो रहा था कि ‘नमस्ते साहब’ सुनाई दिया। यह सोचकर कि इस दुकान का मालिक जो स्वयं एक कुर्सी संभालता है, उसने मुझे नमस्कार किया है, मैंने भी प्रतिउत्तर में तुरंत उसे ‘नमस्कार’ बोला और फिर उसकी ओर देखा। लेकिन यह मालिक-नाई नहीं था। फिर भी इसका चेहरा खूब जाना-पहचाना लगा। मैं दूकान के अंदर आया। दूसरी कुर्सी पर बैठा नाई उठ खड़ा हुआ। उसने कटिंग के लिए मुझे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। कुर्सी पर बैठने के बाद मैंने नमस्कार करने वाले व्यक्ति के चेहरे को ध्यान से देखकर अपनी यादों को खंगालने लगा कि आखिर यह शख्स कौन है जो मुझे जानता है। तभी अचानक उसने मुझसे कहा, “साहब, जबसे मैं देख रहा हूँ आप बाहर-ही-बाहर नौकरी कर रहे हैं कभी आप लखनऊ नहीं आए।” मैं कुछ बोला नहीं लेकिन मन ही मन उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था। उसने फिर कहा, “साहब, एक फार्म भर कर दे दीजिए जहां चाहें वहां मैं आपका ट्रांसफर करवा दुंगा।” उसकी बात पर मैं मुस्कुराया। यह सोचकर कि यह व्यक्ति मेरा इतना हितैषी है अपने पूरे मन-मस्तिष्क को उसे पहचानने पर लगाकर मैंने उससे कहा, “यह नौकरी है जब तक इसमें हम हैं क्या दूर क्या पास।” उसने नाई से मेरा मकान नंबर बोलकर बताया कि मेरा घर यहाँ है। उसकी इस आवाज ने जैसे मुझे जगा दिया हो! अचानक मुझे याद आ गया कि यह तो मेरा अख़बार वाला है, जो सुबह घर पर अखबार फेंक कर जाता है। दरअसल मेरी एक कमजोरी है, किसी चेहरे को तत्काल ‘रिकग्नाइज’ न कर पाना। इसमें कभी-कभी मुझे कुछ क्षण लग जाता है। दूसरे, वह इस नाई की दुकान पर मिलेगा इसकी मुझे कल्पना नहीं थी, इसलिए भी उसे पहचानने में मुझसे देरी हुई। यह व्यक्ति पिछले 19 वर्षों से मेरे घर पर अखबार देता आ रहा है। गाहे-बगाहे इससे मुलाकात हो जाती है। लेकिन इन बीस वर्षों में भी इस व्यक्ति में कोई खास बदलाव मुझे नहीं दिखाई पड़ा। नाई से बतियाते हुए वह मेरे घर के आस-पास के घरों का परिचय देने लगा। 

      नाई मेरे बालों की कटिंग शुरू कर चुका था। इस बीच उन दोनों को आपस में घुल-मिलकर बातें करते देख मैंने नाई से उसके गांव के बारे में पूँछ लिया। उसका घर लखनऊ और अमेठी जिले की सीमा पर स्थित किसी गाँव में था। उसने कहा कि बच्चों की पढ़ाई के लिए वह शहर आ गया है क्योंकि शहर में बच्चों के पढ़ाई की सुविधा है। यहाँ वह पचास प्रतिशत प्रति कटिंग मालिक को देता है। जबकि गाँव में उसकी खुद की दुकान थी। बीस वर्षों तक उसने यह दुकान चलाया था, बल्कि उस दुकान में उसका भाई भी काम करता था। लेकिन गाँव में यह दुकानदारी उसे रास नहीं आई। गाँव में किसी एक बिरादरी का बोलबाला था जबकि वहाँ पर उसकी बिरादरी के मात्र दस प्रतिशत घर थे। उसकी दुकान पर लोग कटिंग या दाढ़ी बनवाने के बाद उधारी करके चले जाते थे। धीरे-धीरे यह उधारी एक लाख रुपए से अधिक की हो चुकी थी। मैंने उससे पूँछा, यह उधारी क्यों मान जाते थे? उसका कहना कि क्या करें, लोग पहले दाढ़ी-बाल बनवाते और पैसा मांगने पर कह देते खेत से सीधे चले आए हैं, पर्स पैंट में छूट गया है या पर्स उस वाले पैंट में रह गया या भूल ग‌ए, बाद में पैसा दे देंगे। गाँव का मामला होता तो पैसा लेने के लिए जोर भी न दे पाते। फिर नाई ने कहा ऐसा व्यवहार और उधारी कब तक चलता, दिन भर की मेहनत उधारी में चली जाती थी। इसलिए भी मैंने शहर का रुख कर लिया।

       उसकी बात सुनकर जब मैं अफसोस जताने लगा तो उसने कहा,

      "ऐसी बात मेरे ही साथ नहीं थी। वहाँ क‌ई अन्य नाई की दुकानें और भी थी जो बेचारे उधारी पर दुकान चलाते थे। एक दुकानदार बेचारा ऐसा था कि उसके दुकान पर यह उधारी डेढ़ लाख रुपए तक पहुँच गई थी। इस उधारी को उसने एक कापी पर लिख रखा था, एक दिन मैंने उसे वह कापी जलाते हुए देखा। ऐसा करने से उसे रोकते हुए मैंने उससे पूँछा कि इसे क्यों जला रहे हो, इससे तो तुम्हारा पैसा डूब जाएगा…तो वह कहने लगा, नहीं इस उधारी की कापी को जला देना ही मेरे लिए ठीक है, क्योंकि इसे देखकर मेरा टेंशन बढ़ता है।” 

          कटिंग पूरी हुई मैंने पैसे दिए और घर की ओर पैदल चल पड़ा। मुझे गाँव की इस तस्वीर में एक स्याहपन नजर आया‌। इस देश के गाँव भारत को विकसित बनाने के लिए अभी तैयार नहीं हैं, अभी बहुत कुछ बदला जाना बाकी है।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

वह बातूनी टैक्सी ड्राइवर!


        सामने ही बस अड्डा था। जहाँ से लखनऊ के लिए मुझे बस पकड़ना था। मोबाइल का स्क्रीन ऑन किया। समय देखा, रात का सवा दस बज चुका था। बस अड्डे पर अभी भी चहल-पहल थी। काफी संख्या में यात्री अपने गंतव्य की बस की प्रतीक्षा में इधर-उधर खड़े थे। जिनके चेहरों पर प्रतीक्षा की हलकी सी व्यग्रता थी। दो बसें रवानगी के स्थान पर खड़ी थीं। इनमें से कोई एक बस लख‌न‌ऊ जाएगी, मैंने सोचा। तभी एक कंडक्टर ने आवाज लगाई -’लखन‌ऊ जाने वाले यात्री इस बस में बैठें।’ इतना सुनते ही जहाँ-तहाँ खड़े लोगों में हलचल सी हुई, लोग बस की ओर लपक पड़े। देखते-देखते बस के दरवाजे पर भीड़ जमा हो ग‌ई। बस में सीट सुरक्षित कर लेने की होड़ में दरवाजे पर लोग धक्का-मुक्की शुरू कर दिए। 

       यह दृश्य देख मेरी निगाह अनायास ही सड़क के उस पार स्थित टैक्सी स्टैंड की ओर उठ गई, जो बस‌-अड्डे से अधिक दूर नहीं था। पर वहाँ से भी लोग बस की ओर ही भाग रहे थे‌; इसे देख मन में एक आशंका उभरी कि अब टैक्सी को सवारी मिलने में देर हो सकती है- फिर भी ‘थोड़ी और प्रतीक्षा कर ली जाए’ - सोचकर मैं टैक्सी स्टैंड की ओर बढ़ गया। 
        
      एक टैक्सी चालक लखनऊ जाने वाली सवारियों की बाट जोहता दिखाई पड़ा। मैंने उससे लखनऊ चलने के लिए पूँछा तो वह बोला, एक-दो सवारी और मिल जाए तो तुरंत चल देंगे।’ उसके इस ‘तुरंत’ में न जाने क्यों मुझे अपनी ही उतावली की प्रतिध्वनि सुनाई दी। मैं भी उसके साथ खड़ा आने-जाने वालों में संभावित सवारियां तलाशने लगा। 
     
       मैंने उससे कहा, ‘लोग बस से जाने के चक्कर में यहां से खिसक लिए…पता नहीं लखनऊ के लिए अब सवारी कब जुटेगी।’ वह टैक्सी वाला मानो बातचीत का बहाना ही ढूँढ़ रहा था, तपाक से बोल उठा- 
   
    “ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इस रूट पर खूब सवारियां मिलती हैं लखनऊ के लिए तो मिलती ही हैं खाड़ी के देशों के लिए एयरपोर्ट जाने के लिए भी सवारियां मिल जाती हैं। मैं तो अकसर इसी रूट पर चलता हूँ…अन्यथा मेरी टैक्सी आल इंडिया परमिट वाली है, जरूरत पड़ने पर अन्य राज्यों का भी ट्रिप लगा लेता हूँ। आजकल कोविड महामारी का दौर है, पैसे वाले लोग किराए की प्राइवेट टैक्सी में ही चलना सुरक्षित मानते हैं, इससे भी सवारियों की कमी नहीं है।"

      फिर मेरी जिज्ञासा यह जानने की हुई कि वह केवल ड्राइवर है या टैक्सी मालिक भी?"
 
        "अभी बमुश्किल से छह महीना हुआ होगा यह कार लिए हुए, लेकिन साढ़े तीन लाख किलोमीटर चल चुकी है! ससुरा लोहा भी कभी पुराना होता है..बस ग्रीस-तेल-पानी और सर्विसिंग होती रहे तो चकाचक न‌ई बनी रहे! बेचारी मेरी यह कार अभी काफी दिन साथ देगी, लोन अदा हो जाए तब बदलने की सोचेंगे..अभी तो लोन-फोन, तेल-पानी और टैक्स-फैक्स के खर्चे-वर्चे निकाल कर भी बीस हजार बच जाता है, फिलहाल यह क्या कम है! मुझे नशा-पाती, गुटखा-फुटका की लत भी नहीं है कि फालतू के पैसे खर्च हो रहे हों, अपनी टैक्सी अपना राज और अपने मन की सवारी!!”
      
     टैक्सी वाला एक ही सांस में बोलता चला गया। बातों से वह दिलचस्प और सच्चा लगा! उसकी बातों में एक अजीब-सा आत्म-संतोष था‌। मुस्कुराते हुए वह फिर शुरू हो गया-

       “हूँह.. कैसी-कैसी सवारियों से पाला पडता है लेकिन मुझे तो अपने धंधे से मतलब है, कुछ यात्री खंडूस भी होते हैं वे ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे टैक्सी डीजल से नहीं, उनके कुंए के पानी से चलती है और मैं उनका ज़रख़रीद गुलाम होऊँ..लेकिन इनका भी इलाज मैं जानता हूँ…जैसी सवारी वैसी बात।”
  
         उसकी बातें सुनकर मुस्कुराते हुए मैंने बस-अड्डे की ओर देखा -
    
      बस-अड्डे पर आने-जाने वाले लोग जैसे टैक्सी स्टैण्ड से अनजान दिखाई पड़े। विलंब के अनुमान से मेरी भाव-भंगिमा में बेचैनी आ गई। जैसे टैक्सी ड्राइवर ने इसे भाँप लिया हो! ठेकेदार पर भड़ास निकालते हुए वह बोला- 

       “'ये ससुरे टैक्सी-स्टैंड के ठेकेदार भी कम हरामी पीस नहीं होते... पाँच सौ खुद खाने के चक्कर में यात्री को लखनऊ का किराया दो हजार बताएंगे, गजब की गुंडागर्दी है इनकी! पता नहीं ऐसी गुंड‌ई की गाड़ी कब पलटेगी? वैसे भी बस के डेढ़ सौ की जगह टैक्सी पर दो हजार कौन खर्चेगा? सवारी-फवारी जाए भाड़ में अब चला जाए।”

       मैंने देखा, वह ठेकेदार एक टूटी कुर्सी पर विराजमान है। तभी एक बुलेरो से तीन लोग उतरकर बस की ओर लपक लिए! लेकिन कुछ क्षण बाद इनमें से दो लोग टैक्सी की ओर लौट पड़े!

        ड्राइवर ने चार सवारी से कम पर चलने को घाटे का सौदा बताकर इनसे एक सवारी के आने तक प्रतीक्षा करने के लिए कहा। वाकई इस टैक्सी वाले को केवल अपने धंधे से ही मतलब है।

       इसी बीच तीसरा यात्री भी वहां आ गया, मुझे लेकर अब चार सवारी हो चुकी थी। ड्राइवर को कुल आठ सौ रूपया किराया मिलना सुनिश्चित हो गया।
    
       लेकिन चालक ने खुश होकर ड्राइविंग सीट सँभाला ही था कि वह ठेकेदार आ धमका। उसने खिड़की के भीतर हाथ बढ़ाकर चालक से डेढ़ सौ रुपए मांग लिए। मैं चालक के बगल वाली सीट पर बैठा था। जाते-जाते ठेकेदार ने मुझे नमस्कार किया। उसके जाने के बाद चालक बुदबुदाया-

       “आठ सौ में डेढ़ सौ ये ले जाएगा और बचेंगे साढ़े छह सौ जिसमें से तेल के जाएंगे पाँच सौ, खैर डेढ़ सौ तो बचेंगे ही।”

          तभी पीछे से एक परिचित यात्री ने कहा कि उसने ‘साहब’ का परिचय पहले दे दिया था, नहीं तो वह पाँच सौ से कम न लेता।

        टैक्सी रोड पर दौड़ रही थी। चालक ने मेरी ओर देखा जैसे परखा रहा हो। कोई ‘साहबी ठाट’ न दिखाई देने पर उसे मेरे साहब होने पर संदेह हुआ होगा.. क्योंकि उससे डेढ़ सौ रूपए ठेकेदार तो ले ही गया था।

         अचानक मैंने उससे पूँछ लिया कि तुम टैक्सी चलाने का यह धंधा कब से कर रहे हो?

           जैसे यही वह चाहता था कि कोई उससे बतियाता चले। उसने तपाक से बोला - 

         “मैं तो पहले दिल्ली में बड़े-बड़े नेताओं और मंत्रियों के फ्लीट की गाड़ियां चलाता था..क‌ई मंत्रियों-नेताओं का ड्राइवर रहा हूँ…लेकिन ये बड़े लोग भी न, सब ऐसे ही हैं! ये स्वयं को समाज से ऊपर समझते हैं। नियम-कानून तो हम जैसों के लिए है। आम आदमी इनसे कितना धोखा खाता है! उसे समझ नहीं। देखने में ये एक-दूसरे के धुर विरोधी, लेकिन सांझ ढले सब आपस में गलबहियां डाले ठहाके लगाते हैं। बाकी वोटरों को जाति-धर्म के बंधन का एहसास कराते हैं। मैंने तो फाइव-स्टार होटलों में इन्हें छोड़ते और वहाँ से लाते समय इनकी कारगुजारियाँ भी देखी हैं।”
       
           इस समय वह एक ट्रक को ओवरटेक करने की कोशिश में था लेकिन तभी सामने से तेज गति में आती एक कार की हेड लाईट से आँखें चौंधिया गई! इसपर वह बोला, 
    
       “ये देखो, साला हाई बीम मारते चला आ रहा है, इसे तो ड्राइविंग सेंस ही नहीं है! पता नहीं कैसे-कैसे लोग लाइसेंस पा जाते हैं।” 

         अब ड्राइवर ट्रक को ओवरटेक करने में कोई हड़बड़ी नहीं दिखा रहा था। तभी पीछे से एक यात्री अचानक भड़ककर बोला -

        “बैलगाड़ी चला रहे हो क्या? तुम्हारी इस चाल पर तो मेरी फ्लाइट छूट जाएगी।”
      
         ड्राइवर को यात्री की बात खल गई, अचानक कार को सड़क के किनारे रोककर उसने यात्री से कहा, 

       “तो अभी मेरी कार से उतर जाइए..” ड्राइवर थोड़े गुस्से में था।” 

      फिर शांत होते हुए कहा, “मै अस्सी से ज्यादा नहीं चलता। आपको समय पर एयरपोर्ट पहुँचा देंगे।” 

         इधर यात्री भी शांत रहा। 

         कुछ क्षण की शांति के बाद ड्राइवर ने कहा, “ड्राइविंग के समय गुस्सा आना ठीक नहीं।”  
    
        इसके बाद मैंने भी चुप्पी को तोड़ी, ड्राइवर से पूँछा, “तुम लोग विरोध क्यों नहीं करते ठेकेदारों का?”
      
          मेरे इस प्रश्न पर ड्राइवर क्षण-भर की चुप्पी के बाद बोला,

      “सर, माना आज आप बैठे हैं, लेकिन हमारा तो रोज़ इन्हीं से पाला पड़ेगा। कहाँ तक इनसे पंगा लेते फिरेंगे? आखिर हैं तो हम टैक्सी-ड्राइवर ही।” 

         फिर वह अपने अनुभव सुनाने लगा -

    “साहब, मैंने तो इस टैक्सी ड्राइवरी में बहुत कुछ देखा-सुना है। एक बार एक बड़े ढाबे के कैश काउंटर पर एक शराबी को ढाबे मालिक से उलझा देखा। ढाबे मालिक से उसे पाँच हजार रुपए चाहिए था। कुछ देर ना-नुकूर के बाद मालिक ने उसे पंद्रह सौ रुपए थमाए। बाद में ढाबे के मालिक ने मुझसे यही कहा कि कौन उलझे इनसे धंधा ख़राब होता।”

        इसके बाद टैक्सी ड्राइवर ने दूसरी घटना सुनाई - 

     “कितनी-कितनी बातें बताऊँ साहब! एक दिन तो एक आदमी जबर्दस्ती आकर मेरी गाड़ी में बैठ गया, जबकि गाड़ी पहले से ही बुक थी। उतरने को कहा तो वह उतरने को तैयार नहीं, उल्टा झगड़ा करने लगा। 

        थाने से सौ कदम दूर थे हम..पर उसे ज़रा भी डर नहीं लगा। कहने लगा कि ‘दारोगा और सिपाही सब उसके जान-पहचान के हैं’ जैसे-तैसे करके उसे नीचे उतारा, तो जाते-जाते सिर में मुक्का मारकर भाग गया! 

        सच कहूँ तो साहब, इस देश में मेहनत करके खाने-कमाने वालों की कोई कद्र नहीं है। इज्जत-उज्जत सब बड़े लोगों के चोंचले हैं। हम लोगों की इज्जत बस इतनी है कि बिना दंद-फंद और चोरी-चकारी के अपना परिवार पाल ले…लेकिन अब उसमें भी चैन कहाँ है…"

       और पुलिस? उसके पास जाओ तो लगता है उल्टा हमें ही फंसा देगी। डंडा फटकारते ही मिलती है। 
      
      कहने के लिए बहुत टीम-टाम है लेकिन हमारे लिए नहीं..हम तो राम भरोसे ही रहते हैं। वर्षों की इस टैक्सी ड्राइवरी में मैंने यही समझा है।” 

      टैक्सी ड्राइवर की बातें मैं बहुत ध्यान से सुन रहा था, वह फिर अपनी रौं में बहने लगा..

       “उस दिन तो साहब, गजब ही हो गया था! साँझ ढल चुकी थी, एक लड़की ने टैक्सी बुक किया। दूर खड़ी होकर वह साथ जाने वाले किसी का इंतजार करने लगी थी‌। देर होता देख उसे इशारे से मैं बुलाने लगा तो एक पुलिसवाला आ धमका..डंडे से मेरी टैक्सी ठकठकाते हुए उसने मुझे एक भद्दी गाली दिया। फिर मुझ पर इल्जाम लगाया कि मैं गाड़ी में गलत धंधा कराता हूँ! और मुझे जेल भेजने की धमकी देने लगा। मेरी गवाही देने के लिए वहां कोई नहीं था वह लड़की भी नहीं! उस दिन तो मैं एकदम से फँस ही गया था!! 

        एक हजार रुपए की उस दिन की पूरी कमाई उस पुलिस वाले को रिश्वत के रूप में देना पड़ा…मुझे बहुत मलाल हुआ था इसका।”

        अंत में टैक्सी ड्राइवर ने कहा -
 
      साहब, बुरा मत मानिएगा…उस वक्त तो लगा कि इस सरकारी व्यवस्था का हर आदमी जैसे लुटेरा है। 

         लुटेरा!! और ये लूटनेवाले भी अजीब हुनर रखते हैं साहब!” 
    
          फिर उसने बहुत ही तल्ख़ स्वर में कहा -

       “साहब जी, बुरा मत मानिएगा…लूटने में जो जितना माहिर होता है, वह उतने ही ऊँचे ओहदे पर बैठा मिलता है।”
     
       ड्राइवर की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक मेरे मुँह से हड़बड़ी में निकल पड़ा, 

      “रुको… रुको, यहीं रोक दो…मुझे यहीं उतरना है!”

     दरअसल हम लखनऊ के शहीद पथ पर थे। जैसे ही रमाबाई अंबेडकर पार्क नजर आया, मुझे एकदम से ध्यान आया, अरे, यहीं तो उतरना था!
     
      टैक्सी रुक गई। मैं उतरा। टैक्सी ड्राइवर ने एक नज़र मेरी ओर देखा, जैसे वह कुछ कहना चाहता हो, पर कहा नहीं। गाड़ी आगे बढ़ा दिया।

      मैं सड़क किनारे खड़ा रह गया उसके शब्द अब भी मेरे भीतर गूंज रहे थे,
      
      “लूटने में जो जितना माहिर है…”
                               ******

रविवार, 29 मार्च 2026

जब बादल घिर-घिर आएंगे, बीते दिन याद दिलाएंगे।”

       सुबह टहल रहा था तभी बीती रात किसी का भविष्यवक्ता की तरह कहा कथन याद आया कि कल पानी बरसेगा‌। आसमान की ओर देखा। सूरज महोदय नभारोहण के अंदाज में बादलों की फांफी के पीछे से झांक रहे थे, जैसे वहीं से हड़का रहे हों कि तुम लोग इस लायक नहीं हो कि मैं बादलों को बरसने दूँ। वे बूँद बनने से बादलों को रोकते जान पड़े‌ और सूरज की गर्मी बढ़ाने में बादल भी उनका साथ देते प्रतीत हुए। यही नहीं ये बादल जैसे सूरज को उकसा रहे थे कि हे सूरज देव महाराज, मुझ बादल को पानी न बनने दें मुझे ताप से विलीन कर दें जिससे भारतनाम्ना भूमि के रहवासी मेरी बूँद-बूँद के लिए तरसें! 

       दरअसल मामला यह है कि बादल का कोई आवारा टुकड़ा गलती से एक पहाड़ी गाँव के किसी घर में उड़ता हुआ चला आया वहाँ उसकी नजर टी.वी समाचार चैनल पर प्रसारित हो रहे बाढ़ की खबरों पर अटक गई थी। इसी खबर की एक हेडिंग को बादल के इस टुकड़े ने पढ़ लिया। हेडिंग थी, “बादल कहर ढाए” “उमड़ा सैलाब, शहर के शहर मचा कोहराम” या “पानी की मनमानी !” इन खबरों के बीच रह-रहकर विज्ञापन भी चल पड़ते! टी वी पर खबरों की ऐसी हेडिंग और रिपोर्टिंग देख बादल का वह टुकड़ा दुखी हो उठा। उसने दो बूंद आँसू टपकाए और रूठकर वहाँ से हवा के एक झोंके की तरह बाहर निकल आया। बादल का वह टुकड़ा फिर घटाओं से आ मिला था। बादल के उस टुकड़े और बादल की घटाओं के बीच मीडिया पर चल रही इन खबरों को लेकर कुछ कानाफूसी हुई। दोनों एकाकार हुए और फिर आसमान में छायी घटा धीरे-धीरे छंट चुकी थी। 

        बादल नाराज हो ग‌ए होंगे! क्योंकि बादल अभी तक यह सोचकर ही बरसते आए थे कि उसकी बूँदों से धरती हरी-भरी होकर खिलखिलाएगी! इसीलिए ये बादल बूँद बनकर बिना भेदभाव के खेत-खलिहान, पोखर, ताल-तलैया, नदी-नाले सबको सराबोर कर उफना देते थे। लेकिन आज का आदमी बादल और उसकी बूँदों को आफत बताने लगा है और जिस पानी के बिन जीवन सून उसी “पानी की मनमानी” से बादल को उसके बरसने पर ही उलाहना देने लगा है! बादल और उसकी बारिश को लेकर पैदा हुई इधर इस न‌ई इंसानी सोच पर बादलों के फोरम पर खूब माथापच्ची हुआ होगा। इस चर्चा से बादलों ने निष्कर्ष निकाला होगा कि "पानी की मनमानी बोलने वालों को अब पानी की जरूरत नहीं, तभी तो इन लोगों ने ताल-तलैया नदी-नालों पर अपने आलीशान बंगले खड़े कर लिए हैं! ये अपनी इस कारस्तानी को भूल उल्टे हमारी बूँदों को दोष देते हैं! जबकि हमारे बरसने के समाचार से अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाकर कमाई करते हैं। मीडिया तो मीडिया! हमारे बरसने पर जैसे राजनीति भी बरस पड़ती है और राजनैतिक लोग अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने लगते हैं।" अंततः बादलों ने, इस विचार मंथन के बरक्स ही, आपस में तय किया होगा कि आसमान में घूमो टहलो खूब, लेकिन बूँद बनकर भारत नाम्ना धरती पर मत टपको। तो, शायद बादल अब इसीलिए नहीं बरसते। 

       बेचारे ये बादल! धरती और इनके बीच अन्योन्याश्रित संबंध ऐसा था कि बादलों को देखने मात्र से धरती जैसे झूमने लगती और बादल भी बरबस बरस पड़ते थे। धरती ऐसी हरी-भरी हो उठती थी कि संवेदनाओं के गीत गाए जाने लगते।टहलते-टहलते मुझे यूँ ही पुराने जमाने का यह गीत “जब बादल घिर-घिर आएंगे, बीते दिन याद दिलाएंगे” याद आया। शायद वर्ष 1985 का जुलाई माह का कोई दिन था जब पहली बार मैंने यह गाना सुना था। मैं उन दिनों सीएमपी डिग्री कॉलेज में बी ए का छात्र था। इलाहाबाद के मध्य चौक घंटाघर के पास रहता था। वहीं से पैदल डिग्री कॉलेज आया-जाया करता था। उस दिन भी पैदल ही कॉलेज से लौट रहा था। आसमान में बादल घिरे हुए थे और बूंदा-बांदी हो रही थी। हीवेट रोड से जीरो रोड की ओर मैं मुड़ चुका था। इस बूँदाबादी में भविष्य के प्रति बेपरवाह और निश्चिंत पैदल चलते जाना उस दिन न जाने क्यों मुझे अच्छा लग रहा था‌। इसी समय किसी के घर में विविध भारती पर बज रहे इस गाने की आवाज मेरे कानों में पड़ी थी। तब से आज तक बारिश में भीगते हुए वह चलना और इस गाने को मैं नहीं भूल पाया हूँ। ये बादल मेरे मन की उस बेपरवाही और निश्चिंतता की मुझे याद दिलाते हैं। इसीलिए बारिश के इन दिनों में, जब भी मैं आसमान की ओर नजरें उठाता हूँ, तो उन्हीं बादलों को खोजता हूँ!!

मन का आलसी होना

       आजकल सुबह देर से सोकर उठते हैं यदि जल्दी उठ भी ग‌ए तो अजीब सी खुमारी मन पर छायी रहती है। इस आलसाये मन को शरीर का शिथिल पड़े रहना अच्छा लगता है। तो, मैं मन का ही साथ देना पसंद करता हूँ। इस बीच चाय-वाय पीते हुए दो अखबार निपटा देता हूँ। तब कहीं जाकर यह खुमारी छंटती है और मन बिस्तर छुड़वाता है। आजकल इनडोर टहलाई की वजह से सिवा दीवालों के कोई विशेष बात नहीं देख पाता कि ढंग की ‘सुबहचर्या’ हो! खैर मन की आज्ञा से सुबह बिस्तर से उठा, ऐप से कदम भी गिनता हूं, इसलिए मोबाईल भी जेब में रखकर टहलाई के कदम बढ़ाने ही जा रहा था कि पत्नी का फोन आया। उन्होंने पूँछा कि टहल-वहल लिए? मैंने कहा, नहीं, अभी इसकी ही तैयारी में हूँ। विजय भाव में वे बोली कि मैं तो टहल चुकी हूँ और पार्क में बेंच पर बैठी हूँ। दरअसल जब हम दोनों में से कोई एक पहले टहल लेता है तो एक दूसरे को ऐसे ही बताता है कि देखो तुम तो बैठे ही रह ग‌ए हम टहल लिए। खैर मैंने भी अपनी सफाई में मन को दोष दे छुट्टी पाया तो वे मुझे उस पार्क का आँखों देखा हाल सुनाने लगीं।

         इस पार्क में प्रायः रिटायर्ड लोगों का ही कब्जा रहता है वे ही आते हैं यहां। इस पार्क में पक्का स्ट्रक्चर कम है इसलिए यह एक सघन हरियाली वाला पार्क है जिसमें पेड़ो की घनी छाया भी रहती है। इसमें बैडमिंटन कोर्ट होने से पैंतालीस पचास वय के नौकरी-पेशा लोग भी यहां आकर रिटायर्ड लोगों के साथ वर्जिशन बैडमिंटन में हाथ अजमाते हैं। बैडमिंटन के खिलाड़ी रिटायर्ड बूढ़े हों या पचास के जवान, सभी पूरे सज-धज के साथ जैसे कि स्पोर्ट्स-शू, हाफ-पैंट और टी-शर्ट पहन पीठ पर रैकेट टांगकर खेलने आते हैं। बाकी रिटायर्ड लोगों में से अधिकांश इधर-उधर ग्रुप में बैठे हुए आपस में गप्प लड़ाते देखे जा सकते हैं या इनमें से कुछ बाबा रामदेव का योगाभ्यास कर रहे होते हैं। इसमें जो ज्यादा बूढ़े हो चले हैं वे इधर-उधर लेटे हुए कनखियों से पार्क में आने-जाने वाले लोगों की गतिविधियों को निहारते रहते हैं। एक जन तो प्रतिदिन घर से केतली भर चाय बनवाकर लाते हैं और साथ में कागज का गिलास भी, वे यह चाय अपने साथी वृद्ध-वृंदो को पिलाते हैं। इनमें एकाध ऐसे भी हैं जो सब कुछ छोड़कर समरसेबल का पाइप पकड़े पार्क में लगे पेड़ों-झाड़ियों में वाटरिंग करते देखे जा सकते हैं। इस प्रकार ये रिटायर्ड वृद्धजन सुबह-सुबह यहां काफी वक्त गुजारते हैं जैसे कि घर वालों के लिए खाली स्पेस छोड़ने की नीयत से पार्क में आए हों। इनके बीच खूब हँसी-ठट्ठा भी चलता है। यहां पार्क में महिलाओं की उपस्थिति लगभग नगण्य रहती है वे इसलिए भी इस पार्क में जाने से संकोच करती हैं कि उनकी उपस्थिति में ये बूढ़े खुलकर हँस-बोल नहीं पाएंगे।

        पत्नी ने यह विवरण देने के बाद कहा कि मेरा मतलब यह सब कुछ बताने का नहीं था आज मेरे सामने एक मजेदार वाकया हुआ। फिर वे उस वाकये को सुनाने लगीं। बैडमिंटन का खेल चल रहा था कि इस खेल में विवाद शुरू हो गया। एक बुजुर्ग जो लगभग पैंसठ साल की उम्र के होंगे इस बात पर अड़े थे कि उनकी चिड़िया अंदर गिरी है, तो दूसरी तरफ दो-तीन लोग थे, जो कह रहे थे कि नहीं, चिड़िया बाहर गिरी है! ये मिलकर बुजुर्ग को सम‌झाते कि मान जाओ चिड़िया बाहर गिरी है तो बुजुर्ग और भड़क उठते। वे इस बात पर अड़े हुए थे कि उनकी आँखें धोखा नहीं खाती, चिड़िया अंदर ही गिरी है। उधर दूसरी ओर बहुमत का आंकड़ा तीन लोगों का था वे किसी कीमत पर मानने को तैयार नहीं थे कि चिड़िया अंदर गिरी है उनके अनुसार चिड़िया बाहर गिरी थी। इस बात पर विवाद बढ़ता ही जा रहा था। उन तीनों में एक पैंतालीस-पचास का युवा उन बुजुर्ग से बहस में काफी मुखर था। वह बाकियों से कुछ ज्यादा ही उनसे उलझा था। उसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं था कि चिड़िया अंदर गिरी है। इन दोनों के बीच खूब गलगर्दन हो रही थी कि अचानक बुजुर्ग जी तैश में आ गए और उस युवा जैसे दिख रहे व्यक्ति को गाली देते हुए बोल बैठे, “...के कल के लौंडे हमें सिखाने निकले हैं कि चिड़िया कहाँ गिरी है..(गाली) मैं अंधा हूँ?” बस फिर क्या था गाली सुनते ही पैंतालीस साल के शख्स ने अपना आपा खो दिया और बुजुर्ग को मारने दौड़ा। उनका गिरेबान पकड़ कर उन्हें झकझोरते उनके साथ धक्का-मुक्की करने लगा। किसी तरह अन्य लोगों ने बीच-बचाव करते हुए उन्हें अलग किया। इधर बुजुर्ग गुस्से में कांपते हुए उससे कह रहे थे कि तुम हमको नहीं जानते हम तुम्हारा वो हाल कराएंगे कि तुम्हारे टुकड़े भी नहीं मिलेंगे! 

        खैर श्रीमती जी पूरी घटना हँसते हुए ऐसे सुनाया जैसे कि रिटायरमेंट के बाद मैं भी इसी दशा को प्राप्त होऊंगा! लेकिन मैंने तपाक से कहा कि मैं तो इस तरह पार्क में जाने से रहा। बहुत जी लिया प्रतिस्पर्धी मन के साथ।अब तो खुरपी लेकर क्यारियों से घास निकालुंगा और पेड़-पौधों को सींचुंगा बस! ऐसे प्रतिस्पर्धी मन का क्या फायदा जो खेल-कूद, योग-ध्यान के बाद भी लोगों का तनाव दूर नहीं होने देता? इससे अच्छा है मन का आलसी होना!! मैंने हँसकर कहा।

#चलते_चलते

         आलसी मन के अपने नफा-नुकसान है, इसका सबसे बड़ा फायदा यही है ऐसों को तनाव नहीं व्यापता और वह स्वस्थ रहता है। और साथ में यह भी कि ऐसे लोग ईर्ष्या-द्वेष और लालचादि दोषों से भी दूर रहते हैं। लेकिन पता नहीं क्या सच है?

#सुबहचर्या

(26.05.2024)

दीवाल पर टंगा सूखा गुलाब

       उस जलप्रवाह के कूल पर गुम्फित झाड़ियों पर फूल खिले दिखाई पड़े तो मैंने सोचा ये फूल भी तो सुंदर हैं कोई वनमाली पूजा या श्रृंगार के लिए इन्हें क्यों नहीं चुनता? क्या शायद इसलिए कि उद्भिज के ये वनफूल सुगंधहीन तृणपुष्प हैं? या फिर वनमाली के सौन्दर्य बोध के प्रतिमान में ये तृणपुष्प अरूप और अनुपयोगी है, इसलिए वह इन्हें नहीं चुनता? 
            
          इन पुष्पित झाड़ियों की परछाइयां जलप्रवाह में निष्पाप शिशु सी अठखेलियां कर रही हैं! इसे देख मेरे अंतस में एक प्रश्न उठा कि वनमाली के मन में सुंदर और असुंदर का भेद क्यों पनपा?
        
        मुझे इस जलतरंग में तरंगायित प्रतिबिम्ब में सब कुछ सुंदर जान पड़ा वहाँ असुंदर कुछ भी नहीं था, तृण-मात्र भी नहीं! आखिर मैं किसको असुंदर कह दूँ उस पीत पर्ण को कहूँ, जो उस पुष्प को जीवन देकर समय-चक्र से बिंध अब झरने वाला है और जिसने मार्ग प्रशस्त किया है नव-पल्लव का!! या फिर उस सूखे तृण को कैसे असुंदर कह दूं, जो सड़कर खाद बना है जिसके पोषण से गुम्फित इस झाड़ी पर ये सुंदर पुष्प खिले!! और तो और, वह जलकौवा, जो अभी-अभी इन्हीं तृण गुंफनो से निकल जलक्रीड़ा करने लगा है, समवेत सभी, इन्हें मैं कैसे असुंदर कह दूं? 
          
           किसी मनचले ने तृण को जलाकर राख बनाई है। राह में पड़ी उस राख को मैं कैसे असुंदर कह दूँ! फिर तो आग भी असुंदर होगी जिसकी कोख से यह धरती जनमी होगी। और यदि धरती असुंदर है तो, हम न होते, ये गुम्फित तृण न होते, और ये पुष्प भी न होते, फिर तो जलप्रवाह की जलतरंगों पर ये परछाइयाँ भी किसी निर्दोष शिशु सी किल्लोल करती न दिखाई पड़ती.! तो फिर, जब धरती असुंदर नहीं तो ऐसी धरती से उपजा कुछ भी असुंदर नहीं!!
        
           वनमाली के होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान थिरक उठी। उसने फूलों की टोकरी से गुलाब के दो फूल उठाए; एक ताजा एक बासी। इनको मेरी अँजुरियों में रखकर बोला इसमें से कोई भी एक फूल मुझे वापस दे दो उसे इस पुष्पमाला में गूँथना है। उस पुष्पमाला को मैंने पलक भर निहारा। फिर अँजुरी में लिए उन गुलाब के दो फूलों में से एक ताजा गुलाब उसे वापस कर दिया था क्योंकि बेचारा बासी गुलाब ताजे फूलों वाली उस पुष्पमाला में गूँथे जाने के लिए अयोग्य था। वनमाली का चेहरा खिल उठा जैसे वह कह रहा हो, यह अयोग्यता ही तो असुंदर होना है! विजय भाव में उसके चेहरे की मुस्कान अब और गहरी हो उठी थी। मुझे वह अब जय-पराजय के भाव में उलझा दिखाई पड़ा।         
        
          सहसा मुझे उस पल की याद आई! मेरी कर्मस्थली किसी दूर शहर में है। उस समय पत्नी मेरे साथ थीं।  एक दिन प्रफुल्लित पंखुड़ियों वाला एक गुलाब उन्हें भा गया इसे उन्होंने मेरे कमरे की दीवाल पर टांग दिया था। जब तक वे मेरे साथ थीं मेरा ध्यान उस गुलाब की ओर नहीं गया। उनके जाने के क‌ई दिन बाद मेरी दृष्टि दीवाल पर टंगे उस गुलाब पर पड़ी! उसकी पंखुड़ियां सूखकर अब काली पड़ चुकी थी। उस सूखे गुलाब को मैंने वहां से निकालकर फेंकना चाहा। लेकिन उस तक मेरा हाथ पहुँचता मुझे वहां ओस से भींगी पंखुड़ियों वाला ताजा गुलाब लगाते पत्नी दिखाई पड़ी! उस पल की स्मृति मेरे हृदय पटल पर जीवंत हो उठी थी। दीवाल पर टंगे इस सूखे गुलाब के फूल को मैं कैसे असुंदर कह दूं? 
         
            मैंने वनमाली से कहा, वनमाली! तू व्यापारी है पुष्पमाला में गूँथे जाने के लिए तुझे बासी फूल देकर तेरा अहित नहीं करना चाहा, बस इतनी सी बात थी। और सुनो! सच में इस धरती पर कुछ भी असुंदर नहीं, इस बासी गुलाब की छोड़ो, सूखे पंखुड़ियों वाला वह गुलाब भी नही, क्योंकि सूखकर भी ये पंखुड़ियां किसी के लिए मधुर स्मृतियों का खजाना बन जाती हैं!
       
              वनमाली सकपका उठा! लेकिन उसकी भौहें तनी थी। जैसे मुझसे चिढ़कर बोला हो, अच्छा! तो तुम्हारे लिए कुछ भी असुंदर नहीं? तुम गरीबी, बेरोजगारी, लाचारी से नहीं गुजरे होगे इसलिए ये भी तुम्हारे लिए असुंदर नहीं और यदि बहुत हुआ तो तुम इन्हें कर्मों का फल बता दोगे, क्यों है न?  और तो और, ईर्ष्या-द्वेष और घृणा जैसे भाव की अनुभूति तो तुम्हें होगी ही ऐसे ही रोग-शोक को भी देखा होगा। तो क्या तुम्हारी दृष्टि में ये भी असुंदर नहीं? 
         
            मैंने सोचा। यह वनमाली व्यापार में संलिप्त है उसकी भेदबुद्धि मेरी बात नहीं समझ पाएगी। इसलिए उससे केवल इतना ही कह पाया मैं, ये बातें धरती से नहीं, धरती पर उपजी हैं। इसे समझो वनमाली! धरती व्यापार नहीं करती यह सौदाई नहीं है! इसलिए जो कुछ धरती ने उपजाया है उसे मैं कैसे असुंदर कह दूँ?
        
           वनमाली के मर्मस्थल को बेध गई थी मेरी यह बात। मुझे उलाहना देकर वह रोषपूर्ण आवाज में बोला, तुम्हारे मन में यह व्यापार से इतनी घृणा क्यों है? तुम किसी का भला क्यों नहीं चाहते? 
        
           पहली बार मैं मुस्कुराया था। मैंने कहा, वनमाली! यदि मैं तेरे व्यापार से घृणा करता तो पुष्पमाला में गूंथे जाने के लिए तुझे वह ताजा गुलाब न दिया होता! इसे समझो, यहां कोई असुंदर नहीं, यह सोचना ही तो दूसरों का भला चाहना है वनमाली।
      
           लेकिन जय और पराजय की द्वंद्वासक्ति में उलझी वनमाली की मन:स्थिति दुस्साध्य प्रतीत हुई। मेरी कोई बात समझने के लिए वह तैयार नहीं था। बोल पड़ा। अच्छा! धरती व्यापार नहीं करती, लेकिन यह विप्लव और विध्वंस क्या है? इसके उत्तर में मुझे किसी कवि या साहित्यकार की क्रांतिकारी कविता नहीं सुननी, कि इनपर सौन्दर्य का उपमान मढ़ तुम कोई बादल राग गाकर इसे सुंदर बता दो! मैं तुम्हारे ऐसे किसी राग के झाँसे में आने वाला नहीं, मुझे मेरे प्रश्न के अर्थ में ही उत्तर चाहिए! तुम्हें यह भी बताना होगा कि क्या प्रलय भी तुम्हारे लिए असुंदर नहीं?
        
            मैं वनमाली के प्रति दयार्द्र हो उठा! वह इस जलप्रवाह की जलतरंगों को नहीं देख रहा। नहीं तो उसे मेरी बात समझ में आती कि इस धरती पर कुछ भी असुंदर नहीं। वह इस भ्रम में है कि जो सुंदर नहीं वह असुंदर है। इस भ्रम पर ही उसका सारा कारोबार संचालित है। मैंने मुस्कुराकर उससे कहा, ठीक है वनमाली! तुम्हारी बातों का उत्तर मैं तब दे पाउंगा जब चारों ओर घोर अँधियारा छाया हो, ऐसी रात्रि प्रहर में तुम मेरे पास आना! मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करुंगा। 
            
        इस समय मुझे निरुत्तर देख वनमाली का मुखमंडल चमक उठा! मैंने देखा, उसके विभाजित मन की खाईं और भी गहरी होकर चौड़ी हो चुकी थी। जैसे इस क्षण को वह जी लेना चाहता हो और बिना कुछ कहे चला गया था। मैं उससे निराश नहीं था। उसे जाते हुए देख मैं यही सोच रहा था कि उसकी यह क्षणजीविता उसे जीवन के रहस्य को नहीं समझने दे रही! फिर भी मैं आशान्वित था कि अपने प्रश्नों का उत्तर पाने वह अवश्य आएगा।
         
         धीरे-धीरे अंधेरे की कालिमा धरती पर छा रही थी। आकाश में तारों ने भी टिमटिमाना शुरू कर दिया था। मुझे वनमाली के आने की प्रतीक्षा थी। पल-प्रतिपल बीत रहा था, काली निशा और भी काली हुई जा रही थी। इस तारांगन में आकाशगंगा की धूमिल रेखा तारागणों का मशाल लेकर निकल पड़ी थी‌। लेकिन वनमाली अभी तक नहीं आया था। यदि वह आता तो इस घनेरी रात में ऊपर आकाश की काली चादर में विखरे इन सितारों को दिखाकर मैं उसे बताता कि देख वनमाली देख! इसे देख! तुम जिस विप्लव, विध्वंस और प्रलय की बात कर रहे हो न, समय की अनंत काली चादर में जड़े इन सितारों की यह पल-प्रतिपल की कहानी है! यह गति मात्र है। जरा ध्यान से देखो इस गति को! यह उस जलप्रवाह के सदृश्य है जिसकी जलतरंगों में हमारी यह धरती भी झिलमिला रही है! अपने अन्तर्मन की गहराई से इसे देखो और बताओ मुझे इस झिलमिल में क्या असुंदर है? 
        
          लेकिन वनमाली नहीं आया। उसकी प्रतीक्षा करते-करते न जाने कब मैं नींद की गोद में चला गया था। 
      
          अचानक एक व्यक्ति मुझे दिखाई दिया। लोगों को धमकाते हुए वह मेरी ओर आ रहा था! उससे लोग भयभीत दिखाई पड़ रहे थे। वह मेरे पास आया। उसके मनोभाव में आक्रामकता थी। उसने किसी हथियार सी चीज को पूरी ताकत से मेरी ओर फेंका जैसे मुझे मारना हो। मैं सहम गया। लेकिन वह वस्तु बगल से होकर मेरे पीछे की ओर चली गई। मैंने पीछे मुड़कर देखा। वहाँ फूलों वाली क्यारी के बगल में एक गिलहरी पीठ के बल गिरी थी। उसके चारों पैर ऊपर आसमान की ओर उठे हुए कांप रहे थे, उसका पूरा शरीर कांप रहा था। यह गिलहरी क्यारी में खिले फूलों पर सरसराते हुए दौड़ लगा रही थी। उस आदमी ने इस गिलहरी को ही लक्ष्यित कर वह वस्तु फेंका था। मैंने देखा गिलहरी को मारने वाला और कोई नहीं वनमाली है! क्रोध से मैं चिल्ला उठा! वनमाली तूने यह क्या किया? इस गिलहरी को तूने क्यों मारा?वनमाली!वनमाली..बोलो वनमाली क्यों मारा इस मासूम गिलहरी को? 
          
       मैं अपनी पूरी शक्ति से चिल्ला रहा था! 
       
        मेरी नींद खुल गई! किसी स्वप्न के बीच से होकर मैं आया था। संयत हुआ तो खिड़की की ओर देखा। खिड़की खुली हुई थी। सूरज वृक्ष की शाखाओं के बीच तक आ ग‌ए थे। पत्तियों से छनकर आती इनकी झिलमिल अरुणिम किरणें बाहर फैल चुके उजाले का संदेश दे रहीं थीं। कानों में पक्षियों की चहचहाहट भी किसी सुमधुर संगीत की तरह गूँज उठी। एक अव्यक्त  सी आनन्दानुभूति के साथ मैंने उस दीवाल की ओर देखा, जिस पर गुलाब का वह फूल टंगा है! दीवाल पर टंगे उस सूखे गुलाब को मैं एकटक निहारने लगा।
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बुधवार, 25 मार्च 2026

अम्मा : स्मृति की अनंत परिधि



         मेरी गाड़ी घर के सामने आकर रुक गई थी, पर दरवाज़े पर अम्मा दिखाई नहीं पड़ीं। पहले ऐसा कभी नहीं होता था। मेरी गाड़ी की आवाज़ सुनते ही वे दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जातीं, जैसे मेरी राह देख रही हों। आज दरवाज़ा वैसा ही था, पर अम्मा नहीं थीं।

     मैं जानता था..अब गाड़ी की आवाज़ सुनकर अम्मा कभी दरवाज़े पर नहीं आएँगी।

     भारी मन से मैं गाड़ी से उतरा और दरवाज़े की ओर बढ़ा, पर कुछ कदम चलकर ही ठिठक गया। भीतर कहीं एक हूक-सी उठी। पहले होता तो सीधे जाकर दरवाज़े पर खड़ी अम्मा के पैर छूता और सामने पड़े तख़्त पर जा बैठता। पीछे-पीछे अम्मा भी अपनी प्लास्टिक की कुर्सी खींचकर तख़्त के पास ले आतीं। उसी कुर्सी पर बैठी वे मेरा हाल-चाल पूछती रहतीं।

       आज तखत भी वहीं था, कुर्सी भी वहीं रखी थी..पर न जाने क्यों उन्हें देखते ही एक अजीब-सा उजाड़ मन में उतर आया। मैंने ध्यान से देखा…तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी।

     यही वह तखत था, जिस पर अम्मा तह किए हुए कपड़े रखती थीं। उनकी छोटी-सी डोलची भी यहीं रहती थी। रोज़मर्रा की कई चीज़ें वे इसी तख़्त पर सहेजकर रख देतीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें ढूँढना न पड़े।

        मैं भी जब नहाने जाता तो अम्मा से ही कह देता, ‘अम्मा, नहाने जा रहा हूँ।’ और वे वहीं से बता देतीं, ‘तौलिया तख़्त पर रखा है, कंघी और तेल की शीशी डोलची में है…शीशा भी उसी में मिल जाएगा।’

      लेकिन आज उस तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी..सिवा एक गहरी उदासी से भरे खालीपन के।

    मैंने दरवाज़े से नज़रें फेर लीं। ठिठके हुए मेरे कदम अनायास ही पापा के कमरे की ओर मुड़ गए। 

       मेरी पहली तैनाती एक सुदूर जिले में हुई थी। पत्नी और बच्चे भी मेरे साथ जा रहे थे। उस दिन घर के इसी दरवाज़े पर अम्मा खड़ी थीं। वे चुपचाप हमें जाते हुए देख रही थीं। उनके चेहरे पर कोई शब्द नहीं था, लेकिन आँखों में एक ऐसी नमी थी जो बहुत कुछ कह रही थी। जैसे मन का सारा स्नेह उस क्षण पलकों तक आकर ठहर गया हो।

       अम्मा हमेशा चाहती थीं कि घर का कोई भी सदस्य उनसे दूर न जाए। परिवार को एक साथ बाँधे रखना जैसे उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प था। शायद इसी जिद में कभी उन्होंने पापा का तबादला बम्बई से इलाहाबाद कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। पापा केन्द्र सरकार की नौकरी में थे, पर अम्मा के लिए नौकरी की चमक-दमक से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि परिवार बिखरे नहीं। वे चाहती थीं कि सब उनकी आँखों के सामने रहें..एक ही आँगन, एक ही छत के नीचे।

      लेकिन उस दिन शायद परिवार के साथ रहने का सुख उनसे दूर जा रहा था।

       बच्चे रिक्शे पर बैठे थे। रिक्शा धीरे-धीरे घर से कच्चे रास्ते से गाँव से बाहर निकलने लगा। पापा उस रिक्शे के साथ-साथ चल पड़े। वे पक्की सड़क के मोड़ तक आए, फिर उससे आगे सड़क पर चलने लगे थे। वे बिना कुछ कहे चलते रहे..जैसे लौटने का मन ही न हो। अंततः जब वे वापस होने को हुए, तो उनकी चाल में एक अनकही थकान उतर आई थी।

       उसी क्षण मेरी आँखें भी भर आई थीं, पर मैंने उन्हें छिपा लिया। उस समय पहली बार लगा, जैसे मैं किसी नौकरी पर नहीं, अपने ही घर से विदा ले रहा हूँ।

        बच्चों का घर से चले जाना अम्मा को भीतर तक दुःखी कर गया था। वही दुःख धीरे-धीरे उनकी चुप रहने वाली सी नाराज़गी में बदलने लगा। इसके बाद वे मुझसे भी कुछ खिंची-खिंची सी रहने लगीं। अम्मा बहुत भावुक थीं, पर उतनी ही स्वाभिमानी भी। अपने मन की पीड़ा वे किसी से कहती नहीं थीं; उसे भीतर ही भीतर जज़्ब कर लेती थीं।

         और मैं, उनके इतने निकट होकर भी, उनके मन की उन हलचलों को समझने की फुर्सत नहीं निकाल पाया।

       अब जब उस दिन को याद करता हूँ, तो लगता है..दरवाज़े पर खड़ी अम्मा की नम आँखें केवल विदा की नहीं थीं; वे एक ऐसे खालीपन की शुरुआत थीं, जिसे समझने में मुझे बहुत हो गई।

          शायद उस दिन घर से केवल मैं ही नहीं गया था, अम्मा के जीवन का एक हिस्सा भी चुपचाप मेरे साथ चला गया था।

          मैं अपनी नौकरी की व्यस्तताओं में इस कदर उलझता चला गया था कि समय जैसे अनजाने ही हाथ से फिसलता जा रहा था, और इधर अम्मा धीरे-धीरे उम्र की ढलान की ओर बढ़ रही थीं। मेरे मोबाइल में ‘अम्मा’ तो दर्ज था, पर विडंबना यह थी कि उस नाम पर उँगली बहुत कम जाती थी। अक्सर मैं पापा के ही मोबाइल पर फोन कर देता। मन में यह सहज-सा विचार आ जाता कि अम्मा भी तो वहीं पास ही होंगी; यदि इच्छा होगी तो पापा से फोन लेकर मुझसे बात कर लेंगी। पर ऐसा शायद ही कभी हुआ।

     वैसे भी, जब कभी फोन पर अम्मा से बात होती, तो वह दो-तीन वाक्यों से आगे बढ़ ही नहीं पाती। वे पूछतीं—‘सब ठीक है?’

        मैं कहता, ‘हाँ, सब ठीक है।’

        फिर वे दुबारा पूछ लेतीं, ‘खूब ठीक है न?’

      और मैं उतने ही संक्षिप्त स्वर में कह देता, ‘हाँ, खूब ठीक है।’

      बस, इस ‘खूब’ के बाद जैसे शब्दों की डोर टूट जाती और बातचीत वहीं समाप्त हो जाती।

      पर एक दिन उनके सब्र का बाँध जैसे चुपचाप टूट गया। बड़ी करुण आवाज़ में वे बोली थीं, ‘तुम्हारे मुँह से “अम्मा” सुनने को तरस जाती हूँ।’

     उनके स्वर में जो पीड़ा थी, वह आज भी मेरे भीतर कहीं गूंजती है। पर उस समय मैं था कि उनकी इस बात को भी हँसकर टाल गया। कभी-कभी तो वे मुझे आधे उलाहने, आधे स्नेह में ‘निर्मोही’ भी कह देतीं।

      अम्मा चाहती थीं कि मैं उनसे हुलसकर बातें करूँ, जैसे बेटा अपनी माँ से करता है। पर न जाने क्यों, मेरे हिस्से में मौन ही अधिक था। और अम्मा कभी-कभी हल्की-सी शिकायत के साथ पूछ बैठतीं, ‘तुम इतना चुप क्यों रहते हो?’     

         मैं अकसर सोच में पड़ जाता कि आख़िर मेरी मानसिक बनावट कैसी है? और क्यों अम्मा मेरे बारे में इस तरह की धारणाएँ बना लेती हैं? इन प्रश्नों के साथ मैं अपनी स्मृतियों की तहों में उतरने लगता।  

      मेरे बालमन पर अंकित सबसे पहली स्मृति कुछ धुँधली-सी, पर गहरी है। मैं घुटनों के बल सरकता हुआ घर की ऊँची डेहरी लाँघने की कोशिश कर रहा हूँ। डेहरी मेरे छोटे कद के लिए बहुत ऊँची है। घर के दूसरे सदस्य वहीं मौजूद हैं, पर जैसे मेरी ओर उनका ध्यान ही नहीं है। कोई मुझे गोद में उठाकर पार नहीं करा रहा, कोई हाथ बढ़ाकर सहारा नहीं देता। उस क्षण मेरे भीतर पहली बार उपेक्षित होने की एक अनजानी अनुभूति जन्म लेती है।

       इस स्मृति का ज़िक्र बाद में मैंने अम्मा से किया, तो उन्होंने मुझे समझाने के अंदाज में बताया था कि उस समय मेरी उम्र मुश्किल से एक वर्ष रही होगी। तब वे बीटीसी की ट्रेनिंग के लिए इलाहाबाद गई हुई थीं और कभी-कभार मुझे भी अपने साथ वहाँ ले जाती थीं। मेरी स्मृतियों में कर्नलगंज का वह कच्चा दोमंज़िला मकान आज भी धुँधली-सी तस्वीर की तरह बसा हुआ है; वही मकान, जहाँ अम्मा अपनी बीटीसी की ट्रेनिंग कर रही थीं।

       एक बार अम्मा क‌ई महीनों की ट्रेनिंग के बाद घर लौटी थीं। इतने लंबे समय बाद उनका लौटना मेरे बालमन को खल गया था। भीतर कहीं रूठा हुआ गुस्सा जमा था। मैं एक डंडा उठाकर उनके पास पहुँचा और उसे उनके सिर पर चला दिया। पर अम्मा ने न तो डाँटा, न ही क्रोध किया, उन्होंने मुझे तुरंत अपनी गोद में खींच लिया। उस क्षण उनके स्नेह ने मेरे बाल-क्रोध को जैसे पिघला दिया।

       अम्मा यह जानतीं थीं कि मैं बचपन से ही उनसे रूठता आया हूँ..कभी-कभी रूठकर मैं अम्मा से बोलना बंद कर देता तब अम्मा भी मुझसे न बोलतीं‌। मैं सोचता रहता कि अम्मा मुझे मनाए तब मैं बोलूँ। लेकिन अम्मा मुझे सुनाते हुए कहतीं कि देखो यह अपने अम्मा से भी नहीं बोलता, इससे मेरे बालमन को ठेस लगता और अचानक मैं ‘अम्मा’ बोल देता। 

         कभी-कभी इन प्रसंगों को यादकर मैं अम्मा से इसकी चर्चा छेड़ देता। तब अम्मा कहतीं, हाँ बाबा बहुत छोटे थे जब आपको छोड़कर मैं बीटीसी की ट्रेनिंग करने गई थीं। इसके बाद वे मेरा बचपन याद कर भावुक हो उठतीं। इन दिनों अम्मा को मेरा बचपन कुछ ज़्यादा ही याद आने लगा था। अक्सर मुझसे बात करते-करते वे एक घटना का ज़िक्र छेड़ देतीं कि… “बाबा, आप साल भर के हो रहे थे जब पहली बार आप खड़े होकर चले थे। आँगन में तुलसी के चौरा के पास खड़े होकर आपका यह चलना देख मैंने खुशी से चिल्लाकर माई (मेरी नानी) को पुकारा था कि माई देख बाबा चलने लगे..!!”  यह बात पूरी होते-होते अम्मा की आँखें छलछला उठती। इधर दो-एक वर्षों से मैं यह भी देख रहा था अम्मा मेरे बचपन की बातें यादकर बेचैन हो उठतीं थीं जैसे उन्हें कोई बात कचोटती हो! जब भी मैं घर आता अम्मा मुझसे पूँछती, बाबा नजदीक ट्रांसफर नहीं होगा! जब मैं कहता, नहीं, इधर नहीं होगा, तो उनकी यह बेचैनी और भी बढ़ जाती। लेकिन अम्मा की यह बेचैनी मैं नहीं समझ सका। 

         जब अम्मा अध्यापिका बनीं तो एक दिन मुझे भी अपने साथ पहली बार स्कूल ले ग‌ईं। अम्मा ने मुझे अन्य बच्चों के बीच बैठा दिया। कक्षा में अन्य बच्चे अपनी-अपनी पुस्तकें पढ़ रहे थे अम्मा ने मुझे भी पढ़ने के लिए एक पुस्तक दिया और किसी शब्द को पढ़ने के लिए कहा‌। उस समय मैं पढ़ना सीख ही रहा था। किसी अनपहचानी सी शब्दाकृति पर मैं अटक गया। इसे पहचानने की कोशिश कर रहा था कि तभी अम्मा का एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गालों पर पड़ा। उस तमाचे की स्मृति आज भी मेरे गालों पर उभर आती है। एक शिक्षिका होने से इतर अम्मा के व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी था जैसे कि वे सत्य के प्रति आग्रहशील और अपने आदर्शों से समझौता न करने वाली महिला थीं। वे साहसी भी थीं। उस जमाने में साइकिल चलाकर अम्मा स्कूल में पढ़ाने जातीं। इसके लिए उन्हें चार से पाँच किलोमीटर तक साइकिल चलाना पड़ता। कभी-कभी अम्मा मुझे भी साइकिल के पीछे कैरियर पर बैठाकर अपने स्कूल लिवा जातीं। वे मुझे घर पर भी पढ़ने के लिए प्रेरित करतीं।        

     पापा, दादा जी की अकेली संतान थे और मैं तीन बहनों में अकेला भाई। इसलिए दादा जी मुझे ‘तुरुक का दातुन’ कहते, यानी सबके लिए प्रिय अकेली चीज। दादा जी का स्वभाव बड़ा अनुशासनप्रिय था। वे जीवन को नियम और संयम की डोरी से बाँधकर जीने में विश्वास रखते थे। बचपन में उन्होंने मुझे अनुशासन का ऐसा कठोर पाठ पढ़ाया कि उसकी छाप मेरे स्वभाव पर गहराई से अंकित हो गई—आज भी उनकी वह सीख जीवन की राह में मेरा मार्गदर्शन करती है। अम्मा भी तो ऐसी ही थीं। कहते हैं कभी-कभी बहुत दुलार से बच्चों के बिगड़ने का डर होता है, यह बात अम्मा को भी पता थी। अम्मा सदैव मुझे अपने आदर्शों पर कसती रहीं-गढ़ती रहीं। एक दिन रसोईं के पास बैठाकर अम्मा ने मुझे एक पाठ बहुत समझाकर पढ़ाया था: सच्चा बालक! किसी कहानी का यह मेरा पहला पाठ था। इस पाठ के बहाने अम्मा ने मुझे जैसे जीवन का पाठ पढ़ाया था‌। इस तरह अनजाने में ही सही अम्मा मुझे अपने तरीके से गढ़ रही थी।

      पर न जाने क्यों, अम्मा के साथ मेरे संबंधों में एक अदृश्य-सा भावनात्मक शीतयुद्ध भी चलता रहा। शायद ऐसा इसलिए होता है कि जो व्यक्ति हमारे जीवन में सबसे अधिक प्रिय और सबसे अधिक निकट होता है, उसके खो जाने का भय भी उतना ही गहरा होता है। संभव है, माँ-बेटे के बीच यह मौन खिंचाव उसी भीतरी आशंका की उपज रहा हो।

       लेकिन इसके पीछे एक और कारण भी रहा होगा। उम्र चाहे जितनी बीत गई हो, अम्मा के सामने जाते ही मैं अनायास वही छोटा-सा बच्चा बन जाता था…हाँ, वही बच्चा, जो शैशव से ही उनसे रूठता-मनाता चला आया था।

      शायद इसी भावनात्मक शीतयुद्ध का परिणाम था कि न तो अम्मा ने मुझ पर अपना अधिकार जताया, न ही मैं उन पर। और जब जीवन के किसी मोड़ पर मुझे लगा कि अब मुझे अम्मा पर अपना अधिकार जताना चाहिए तभी वे इस दुनिया से विदा हो गईं।

        अम्मा ने अपना पूरा जीवन अपनी ही शर्तों पर जिया… स्वाभिमान और संतोष के साथ। उन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं थी; जो मिला, उसे उन्होंने सहज भाव से स्वीकार किया और उसी में प्रसन्न रहना सीखा। शायद वे मुझसे यही चाहती थीं कि मैं उनके पास बैठूँ, उनसे खुलकर, हुलस-हुलसकर बातें करूँ। पर न जाने क्यों, यह छोटी-सी खुशी भी मैं उन्हें नहीं दे पाया।

        मैं मन ही मन सोचता था, नौकरी से निवृत्त होने के बाद फिर एक बच्चे की तरह अम्मा के पास रहूँगा। उनके साथ समय बिताऊँगा, उनसे जी भरकर बातें करूँगा। बरसों से मन में जो कुछ दबा है, उसे उनके सामने उँडेल दूँगा। और जब मेरी बातों से अम्मा के चेहरे पर वह तृप्त मुस्कान लौट आएगी, तब शायद पहली बार मैं उन पर अपना वह सहज अधिकार भी जता सकूँगा, जो एक बेटे को अपनी माँ पर होना चाहिए।

       लेकिन जीवन हमेशा हमारी प्रतीक्षा नहीं करता। मन की वह इच्छा मन में ही रह गई। जब तक मैं उस अधूरे स्नेह को शब्द दे पाता, अम्मा चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गईं…और मेरे हिस्से में रह गईं बस उनकी स्मृतियाँ, और एक ऐसी रिक्तता, जिसे अब कोई भर नहीं सकता।

         अम्मा के भावनात्मक संसार में यदि कोई सबसे अधिक निकट था, तो शायद वह मैं ही था। यह बात मुझे बचपन में उनके साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों से धीरे-धीरे समझ में आई। पर अम्मा का स्वभाव ऐसा था कि वे इस स्नेह को कभी खुलकर दिखने नहीं देती थीं। शायद उन्हें डर रहता कि कहीं ऐसा न लगे कि मैं ही उनका सबसे प्रिय हूँ और बाकी लोग अपने को उपेक्षित समझ बैठें। इसलिए कई बार सबके सामने वे मेरी उपेक्षा भी कर देतीं।

      लेकिन जब मैं घर आता और घर में बस हम दोनों ही होते, तब अम्मा का वह दबा हुआ स्नेह जैसे अपने आप बाहर आ जाता। वे मेरे आसपास ही मँडराती रहतीं…कभी मेरे बचपन की कोई भूली-बिसरी घटना सुनाने लगतीं, कभी तेल की छोटी-सी शीशी उठा लातीं और बड़े स्नेह से मेरे सिर पर मालिश करने बैठ जातीं।

      एक बार उन्हें लगा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। उन्होंने पूछा, ‘डॉक्टर को दिखाया कि नहीं?’ जब मैंने सहज ही ‘नहीं’ कह दिया, तो वे हल्की-सी चिंता में डूबकर बोलीं थीं कि ‘जब अपने को ही नहीं दिखा रहे हो, तो बीमार पड़ने पर अम्मा को डॉक्टर को क्या दिखाओगे?’

     अम्मा की वह साधारण-सी बात आज भीतर कहीं गहरी टीस की तरह चुभ जाती है।

       पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से अम्मा की स्मरण-शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी थी। कभी उन्हें समय का ठीक-ठीक बोध नहीं रहता, कभी स्थान का, तो कभी अभी-अभी घटित कोई छोटी-सी घटना भी उनकी स्मृति से फिसल जाती। उस समय यह सब उम्र के स्वाभाविक ढलान जैसा ही लगा।

       जब मैं गाँव गया, तब भी इन संकेतों को मैंने संकेत की तरह नहीं देखा। अम्मा की लगातार बनी रहने वाली खाँसी को भी साधारण समझकर टाल गया। कई महीनों से उनसे ठीक से कुछ खाया भी नहीं जा रहा था…मैंने इसे भी कोई गंभीर बात नहीं माना। कस्बे के डॉक्टर ने भी सहज स्वर में कह दिया था, “कोई बड़ी बीमारी नहीं है।” 

        शायद उसी एक वाक्य ने मेरी लापरवाही को जैसे एक तर्क दे दिया।

       आज सोचता हूँ…कभी-कभी मनुष्य अपने आश्वस्त रहने की सुविधा के लिए भी सच से आँख चुरा लेता है।

      अम्मा भीतर से बहुत मजबूत थीं। वे अपनी पीड़ा को सहजता के आवरण में छिपाकर जीने की आदी थीं। उनके चेहरे को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन था कि भीतर कोई बीमारी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है।

        और सच तो यह भी है कि अम्मा ने स्वयं भी कभी नहीं कहा, “मैं बीमार हूँ।”

        वे हमेशा यही कहतीं,

        “मैं ठीक हूँ।”

       शायद उन्हें लगता था कि उनकी बीमारी की बात सुनकर मैं व्यर्थ ही व्याकुल हो जाऊँगा।

       एक दिन पहले ही मैंने पापा के फोन पर उनसे बात की थी।

        “हलो अम्मा… अम्मा…!”

        उधर से हल्की-सी आवाज आई…

        “बाबा…”

         “हाँ अम्मा…”

          अम्मा बोलीं,

        “बाबा… घबड़ा जिन। काहे एतना घबड़ात हउ तू सभे? बीमारी-उमारी त होए जाथ है… हम ठीक होइ जाब…एतना परेशान जिन होत जा…”

         इतना कहते-कहते उन्हें खाँसी आ गई।

       मैंने उस खाँसी को भी एक सामान्य खाँसी की तरह ही लिया।

        किसे पता था कि यह हमारे बीच अंतिम संवाद होगा।

       अगले ही दिन अस्पताल में मैंने अम्मा को एक-एक साँस के लिए संघर्ष करते देखा।

        डॉक्टर ने धीमे और लगभग निर्विकार स्वर में कहा…

      “अब बहुत देर हो चुकी है। इन्फेक्शन पूरे फेफड़ों में फैल चुका है। लगभग पूरा फेफड़ा नष्ट हो चुका है। अभी जो ये साँस ले रही हैं, उसमें भी इन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ रही है.. कुछ देर में ये थक जाएंगी फिर इनकी सांसें थम जाएगी..अगर समय रहते इलाज मिल जाता तो शायद स्थिति अलग होती…”

       डॉक्टर की बात सुनते ही जैसे भीतर कहीं गहराई में टूट गया।

       उस क्षण पहली बार अपनी लापरवाही का पूरा आकार दिखाई दिया।

      अम्मा के जीवन और स्वास्थ्य के प्रति मैंने स्वयं घोर उपेक्षा बरती थी। और फिर एक दिन अम्मा नहीं रहीं।

        अम्मा और उनके बेटे के बीच की इस कहानी का वहीं अंत हो गया….या इस कहानी की वहीं से एक दूसरी शुरुआत हुई। 

           उस दिन अम्मा की चिता जल रही थी। चिता से कुछ दूर बैठा मैं अग्नि की लपटों को देर तक देखता रहा। धीरे-धीरे लकड़ियाँ अंगारों में बदल रही थीं, और मेरे भीतर स्मृतियों का एक लंबा सिलसिला खुलता जा रहा था।

तभी पहली बार यह विचार मन में आया…

        समय वास्तव में कितना अमूल्य होता है। हम अक्सर उसे पहचानने में देर कर देते हैं। और जब तक उसकी महत्ता समझ में आती है, तब तक बहुत कुछ हमारे हाथों से छूट चुका होता है।

       उस दिन लगा..अम्मा की चेतना इस दृश्य जगत से उठकर कहीं उस अनंत ब्रह्मांड में विलीन हो गई है। लेकिन धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगा कि अम्मा कहीं गई नहीं हैं। वे अब भी हमारे भीतर हैं…हमारी स्मृतियों में, हमारे व्यवहार में, हमारे निर्णयों में।

       अम्मा चुपचाप हमें गढ़ती रही थीं…मुझे ही नहीं, पूरे परिवार को, अपने आसपास के संसार को भी। उन्होंने अपने एक साधारण-से बेटे को भी ऐसा आत्मविश्वास दिया कि वह अपने दम पर अपना संसार रच सके।

तेरहवीं के दिन किसी ने सुझाव दिया—

       “अम्मा की एक तस्वीर रख दी जाए, ताकि आने वाले लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें।”

        पापा ने मना कर दिया। मुझे भी वही ठीक लगा। क्योंकि उस समय लगा…अम्मा अब किसी एक तस्वीर में समा जाने वाली उपस्थिति नहीं रहीं। वे स्मृति बनकर हमारे भीतर फैल गई हैं….

      एक ऐसी अदृश्य चेतना की तरह, जो शायद अब कभी हमसे दूर नहीं होगी।