उस दिन मैंने कोई नेकी नहीं की थी
बस इतना हुआ था कि
किसी बड़े शो में,
बड़े लोगों के बीच पहुँचकर
इतराने की बजाय
किसी की नेकी में शामिल हो गया था
शायद वही मेरी नेकी थी।
तभी किसी पुराने जमाने की कही बात
याद आ गई -
“नेकी कर, दरिया में डाल।”
मैं अपनी नेकी पर दयावान हो उठा।
सोचा,
बेचारी को दरिया ही पसंद होगा।
इसीलिए नेकी को कंधे पर लादे
उदास मन से
मैं दरिया की तलाश में निकल पड़ा।
शायद उस जमाने में
नेकी कोई अजूबा नहीं रही होगी,
कोई ऐसी चीज नहीं
जिसे दिखाकर इतराया जाए।
तभी तो,
उसे दरिया में बहा देने का चलन रहा होगा!
लेकिन अब
कोई ऐसी दरिया नहीं
जिसके झिलमिल, कल-कल पानी में
मेरी नहीं, नेकी ही सही,
यह कह सके -
“देखो, मैं अब भी जिंदा हूँ!
मैंने दरिया को देखा,
अब समझ गया -
इसके काले पड़ चुके जलों में
नेकी का दम घुट जाएगा,
वह मर जाएगी।
फिर कौन मानेगा
कि दुनियां में
कभी नेकी जैसी कोई चीज भी थी।
मैं लौट पड़ा
उसे फिर अपने कंधे पर लादे।
मगर अब
उसके बोझ से
मेरे कंधे दुखने लगे थे।
तभी नेकी तडफड़ाई,
और मुझपर दया करके बोली,
तू क्यों दबता है
मेरे बोझ तले?
ले चल मुझे
सोशल मीडिया पर डाल दे।
वहाँ लोग देखेंगे मुझे!
शायद कोई कह उठे,
इस चमकीली, भड़कीली दुनियाँ में
नेकी अब भी
किसी कोने में दुबकी मिल जाती है।”
- विनय

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