आज टहलने नहीं गया। बीती रात, सोने के पहले ही तय कर लिया था कि सुबह टहलने नहीं जाना। इसके बजाय कंधे की कुछ एक्सरसाइज कर लेंगे। जिसमें सिंकाई भी शामिल है। इन सब में लगभग एक घंटा खर्च होता है। खैर।
रात दस बजे के आसपास, दूसरे कमरे में मोबाईल को चार्जिंग पर लगा दिया था कि जब भी नींद टूटेगी इसे चार्जिंग से हटा लेंगे। दूसरे मोबाइल को बिस्तर के कोने में रख लिया था कि अलसुबह शुक्ला जी का फ़ोन आएगा तो उनसे कह देंगे कि आज टहलने नहीं जाना है। दरअसल वे टहलने के लिए रोज ही जगाते हैं। फिर हम साथ-साथ स्टेडियम निकलते हैं, खैर।
सुबह हुई शुक्ला जी का फ़ोन नहीं आया और इधर मैं भी इत्मीनान से उठा। कंधे के व्यायाम आदि से निवृत्त होकर चाय बनाया। चाय पीते समय फोन चेक करना चाहा। लेकिन मोबाइल स्विचऑफ था। याद आ गया, रात में ही इसकी भी बैटरी खतरे के लेबल पर थी। रात भर में यह भी डिस्चार्ज हो गया।
अब मुझे ध्यान हुआ कि हो सकता है सुबह शुक्ला जी का फोन आया हो। मैं दूसरे कमरे में गया। चार्जिंग पर लगे मोबाइल को चेक किया। उसमें दो मिसकाल थे। शुक्ला जी ने ये कॉल पांच बजे के आसपास किए थे।
चाय सुड़कते हुए मैं अखबार पर भी निगाह फेर रहा था। इसी समय घड़ी में देखा, सात बजकर पांच मिनट हो चुके थे। हम लोग स्टेडियम से लौटकर इसी समय आवास पर पहुंचते हैं। मैंने शुक्ला जी को, उनका हालचाल जानने के लिए फोन लगाया, यही पूँछना था कि स्टेडियम से लौटे कि नहीं। इसके साथ ही फोन न उठाने की सजा के तौर पर उनके कुछ व्यंग्यवाण भी सुनने की मेरी इच्छा थी।
उधर से भी वही व्यंग्यात्मक लहजे में उनकी आवाज सुनाई पड़ी, 'सारी..सारी...अब हम आपको डिस्टर्ब नहीं किया करेंगे..।" और अपनी इस बात के साथ मोबाइल स्विचआफ कर लेने का तोहमत भी मुझपर जड़ दिया।
मैं समझ गया। क्योंकि अकसर मैं आलसपन में अलसुबह स्टेडियम जाने से ना-नुकुर करता हूँ। शायद इस बात से ही उन्होंने अनुमान लगाया हो कि जानबूझकर मैंने मोबाइल बंद कर लिया था। उन्हें जो सफाई देना था मैंने दिया भी।
फिर बातों-बातों में वे बोले कि “आप चिंतन-मनन करते हो इस पर कुछ लिखिए।” बातचीत यहीं पर समाप्त हो गई।
सोचा, 'क्या कुछ लिखें? इधर कई दिन से सुबहचर्या पर भी कुछ नहीं लिखा है। बात तो, सुबह की टहलाई पर जाने से ही निकलती है, टहलने बाहर निकला ही नहीं, तो क्या लिखें ?'
फिर ये बातें दिमाग में कौंधीं। इसे ही सुबहचर्या का हिस्सा मान लिया। इस चेतावनी के साथ कि यह कहानी है और इस कहानी के पात्र, स्थान, घटना आदि से साम्यता स्थापित होने की स्थिति में उसे संयोग मात्र माना जाए।
लेकिन चलिए मान लेते हैं, अनंत ब्रह्माण्ड में अनंत पृथ्वियों की भी संभावना हो सकती है और हो सकता है इन्हीं अनंत पृथ्वियों में से किसी एक पृथ्वी पर यह कहानी घट भी रही हो!!
और... मुस्कुराइए कि हो सकता है आप भी यह कहानी पढ़ रहें हों..
#चलते_चलते
किसी भी विषय के प्रति हमारा 'परसेप्शन' बहुत सावधानी पूर्वक बनना चाहिए।
#सुबहचर्या
(२७.८.१९)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें