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सोमवार, 8 जून 2026

खैर, हम ऐसे ही हैं!

कहते हैं, लक्ष्य बड़ा है तो उसे पाने के लिए छोटी-छोटी बातों को नज़र‌अंदाज कर देना चाहिए। क्योंकि तुच्छ बातों में उलझ जाना आदमी को बड़े लक्ष्य से भटका देता है। 

सत्ता-प्राप्ति सबसे बड़ा सार्वकालिक राजनीतिक लक्ष्य रहा है। उसके लिए विकास, कानून का राज, संविधान, जनकल्याण और विचारधाराएँ, ये सब आवश्यक पड़ाव भर हैं। सत्ता को ऐसे पड़ाव से वैधता एवं स्वीकार्यता प्राप्त होती है। लेकिन यह विडंबना है कि सत्ता की राजनीति, सत्ता की प्राप्ति और इसके संरक्षण के लिए इन पड़ावों का इस्तेमाल करने लगती है। 

हमारे यहां का सिस्टम कभी भी 'आ‌‌ॅटो-मोड' में काम करता प्रतीत नहीं होता। इसे चलाने के लिए राजनीतिक शक्ति चाहिए, जिसकी अपनी कार्यशैली और नियंत्रण-पद्धति होती है। इसीलिए इसके बरक्स ही चीजें सत्तावादी चरित्र में ढल जाती हैं।

ईमानदारी या पारदर्शिता को ही देखिए। सत्तावादी व्यवस्था इसके साथ खेलते हैं। इन मूल्यों को अपने ढाँचे में ढाल लेते हैं। वहाँ ईमानदारी और पारदर्शिता का कोई स्वतंत्र नैतिक अर्थ नहीं बचता; वे केवल सत्ता वैध और मजबूत दिखाने के औजार बनकर रह जाती हैं। अन्यथा ये मूल्य सत्ता-शक्ति को नाकाबिले बरदाश्त होती है। 

मैंने कहा न, कि यह देश ‘ऑटो-मोड’ में नहीं चलता। सत्ता के जोर से चलता है और वह भी बंदूक की नली से नहीं, खजाने के प्रवाह से संचालित होती है। इसीलिए ‘सत्ता-नीति’ में ईमानदारी और पारदर्शिता की स्थिति बहुत विचित्र है, वे सत्ता के लिए ‘वाह’ भी हैं, और ‘आह’ भी! 

सत्ता का चरित्र ही ऐसा है कि वह धीरे-धीरे अपनी 'मान्यताओं का सिस्टम' गढ़ लेता है। उस सिस्टम में न तो कोई गुंडा होता है, न माफिया; न कोई ईमानदार होता है न बेईमान!

वहाँ व्यक्ति और मूल्य अपने मूल अर्थों में नहीं, बल्कि इनका प्रयोग सत्ता के सोपान के रूप में किया जाता है।

यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि हमारे सत्तावादी चरित्र में, ईमानदारी-फीमानदारी, पारदर्शिता-सार्दर्शिता, नियम-फियम, कानून-फानून और यहाँ तक कि संविधान-फंविधान, ये सब ढकोसले हैं। ये वहीं तक काम करते हैं, जहां तक सत्ता के उपयोग और उसकी आवश्यकता के अनुसार परिभाषित हों।

खैर, इन बातों के तस्दीक के लिए किसी को कुछ भी नहीं करना है, केवल इस सिस्टम की प्रत्येक चमकती हुई चीज का, मने व्यक्ति, संस्था, नीति और स्वयं सिस्टम का चीरफाड़ करके देख ले! उसमें बेहद लिजलिजा, पिलपिला और पीब जैसा पदार्थ नजर आएगा! फिर भी सत्तावादी लोग बेहद गुमान में जीते हैं!!

वाकई, हम ऐसे ही हैं।

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