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गुरुवार, 25 जून 2026

ऐ इंसां, ज़रा पागल होना भी सीख ले!

मैं जाग ही रहा था, लेकिन फोन मुझे जगाने के लिए आया था। थोड़ी देर बाद मैं मार्निंग वॉक के लिए निकल पड़ा। सड़क पर पहुँचते ही मैंने फोन करके उनको बताया कि मैं सड़क पर आ गया हूँ। 

उधर से मुस्कुराहट में पगी आवाज सुनाई पड़ी, 'देखो, मैंने तुम्हें सड़क पर ला दिया।' 

मैंने उस चौड़ी, शानदार सड़क पर दूर तक निगाह दौड़ाई और मुस्कुराते हुए कहा, सड़क पर आना कोई बुरी बात नहीं। सड़क तो वह रास्ता है, जो आदमी को उसकी मंजिल तक पहुँचाती है।” 

मेरी इस बात के साथ ही दोनों ओर हल्की-सी हँसी बिखर गई और बातचीत समाप्त हो गई। तब-तक फोन करने वाले शख्स सड़क के किनारे खड़े हमारा इंतजार करते दिखाई पड़ ग‌ए थे। वहां से हम दोनों साथ-साथ सड़क पर चल पड़े।

तभी उनकी बैडमिंटन टीम के एक साथी खिलाड़ी मोटरसाइकिल से पीछे से आ पहुँचे। वे उनके साथ बैठना तो चाह रहे थे, पर संकोच कर रहे थे। मैंने ही उन्हें थोड़ा सा धक्का दिया कि बैठ जाइए। शायद उन्हें यह शंका थी कि कहीं मैं रास्ते से ही वापस न मुड़ जाऊँ, इसलिए मोटरसाइकिल पर बैठते हुए वे हँसकर बोले, ‘देखिए, आपको स्टेडियम तक आना है, लौटना नहीं है।’ खैर…

वैसे मेरे वे साथी स्टेडियम में पहुंचते हैं तो पहले नीम के एक पेड़ को गले लगाते हैं, उसके तने को छूते हैं। अभी कल वाली सुबह उन्होंने मुझसे भी ऐसा ही करने के लिए कहा था। मैं स्टेडियम में पहुँचा तो वे शायद इन्डोर बैडमिंटन कोर्ट में जा चुके थे। इधर मैं भी स्टेडियम के टहलने वाले ट्रैक की ओर चला गया। उस पर दो चक्कर लगाकर मैं वापस हो लिया।

मैं लौट रहा था। तभी एक व्यक्ति के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी। ध्यान से देखा तो यह आवाज मेरे आगे-आगे चल रहे एक पागल की थी। उसका यूँ बेवजह अजीब-सी आवाज में चिल्लाना, उसकी पागलों वाली अवस्था की अभिव्यक्ति थी। 

फिर अचानक एक जगह उसे झुकते देख, मैंने सोचा शायद वह कोई ढेला उठाने के लिए झुका हो। लेकिन उसने वहाँ पड़ी एक मैली-कुचैली तौलिया उठा ली। उसे पास के मील-पत्थर पर बड़े करीने से रख दिया और उसके ऊपर एक छोटा सा पत्थर भी रख दिया। 

मैंने सोचा, शायद तौलिया के ऊपर पत्थर उसने इसलिए रखा होगा कि हवा से वह न उड़ जाए। यह सब करने के बाद वह पूरी तरह निर्लिप्त भाव से वहां से आगे बढ़ गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे चल रहा था। तभी मैंने गौर किया कि वह चलते-चलते बीच-बीच में झुक जाता और सड़क पर पड़ी कोई न कोई चीज उठा लेता, कभी कोई ऐसा कंकड़, जो किसी के पैरों में गड़ सकता था, तो कभी कूड़े जैसी चीज। फिर वह उसे सड़क से दूर फेंक देता।

उस पागल के इन कृत्यों को देखकर मैंने सोचा, मानो सड़क पर चलते हुए वह अनजाने में ही राह को दूसरों के लिए थोड़ा और सुगम बनाता जा रहा हो।

आज लिखने का मन नहीं था, लेकिन उस "पागल" की वजह से लिखने बैठ गया, बस आज इतना ही।

#चलते_चलते

 ऐ इंसां, तू किस गुमान में है! ज़रा पागल होना भी सीख ले।

#सुबहचर्या

 (४.९.१९)

बुधवार, 17 जून 2026

संतोष का कारण

आज चार-पचास पर फोन की घंटी बजी। उधर से आई परिचित आवाज ने पांच-पंद्रह पर निकल लेने के लिए कहा और मुस्कुराने की भी ताकीद कर दी। मैं मुस्कुराया, जो हंसी में भी बदल गई। इस मुस्कुराहट से मन जैसे ताजा हो उठा।
बाहर आया। दूर कहीं बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ रही थी। आसमान में बादल छाए थे, पर उनके यहां बरसने की संभावना नहीं दिखाई पड़ी। लगा, ये दूर कहीं बरस रहे होंगे।
हम और वे परिचित, दोनों साथ चले। स्टेडियम की ओर लगभग छह-सात सौ मीटर आए होंगे कि पीछे एक बोलेरो गाड़ी आकर रुकी। बोलेरो सवार, जो दोनों के परिचित भी थे, हम लोगों से बोलेरो में बैठने का आग्रह किया। 
मेरे साथी फुर्ती दिखाते हुए उसमें सवार हो गए। लेकिन मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “आप लोग बैडमिंटन-कोर्ट में पसीना बहाने वाले हैं। मुझे तो बस टहलना होता है। टहलते-टहलते मैं स्टेडियम पहुँच रहा हूँ।”
खैर, थोड़ी दूर चलने पर उबड़-खाबड़ खड़ंजे वाला वह रास्ता दिखाई पड़ा, जो स्टेडियम की ओर जाता है। पर न जाने क्यों मेरे कदम उस ओर नहीं मुड़े। आगे बढ़ गया।
“सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है..” मोबाइल में यह गीत बजा, मैं समझ गया कि सात बज ग‌ए। यह गाना मुझे बचपन से ही प्रिय है, मुझे स्मृतियों में लौटा ले जाता है। आजकल इसे एलार्म बनाया है।
लेकिन भाई मेरे, इस गीत में छिपी नसीहत से मेरा कोई लेना-देना नहीं! ऑफिसों में दिनभर खुशी के लिए हमें सच के साथ फाइलों, टिप्पणियों, स्पष्टीकरणों में शब्दों की बाजीगरी करनी पड़ती है। फिर मूँछों पर ताव देकर वहाँ से बाहर ऐसे निकलते हैं, मानो सच को शीशे पर उतार दिया हो, कि सबको वही दिखाई दे।
यह लिखते-लिखते बाहर बारिश शुरू हो गई है। गिरती बूंदों की आवाज कानों में पड़ रही है।
तो, आज की अपनी टहलाई पर बात। सड़क पर सीधे चलते-चलते मैं स्वयं द्वारा निर्धारित उस बिंदु पर पहुँचा, जहाँ से लौटना होता है। वहाँ से लौट पड़ा। इस आने-जाने में कुल तीन किलोमीटर की टहलाई हो जाती है। 
खैर, वापसी में, कंधों की एक्सरसाइज भी करते हुए चल रहा था। इसी दौरान पीछे से आवाज आई थी, "साहब, कंधे में दर्द होथै का?" 
मुड़कर देखा, एक मजदूरनुमा व्यक्ति, अपनी साइकिल की रफ्तार धीमी किए हुए मुझसे यही पूछ रहा था। 
उसकी ओर देखते हुए मैंने कहा, "हाँ दरद होथ‌अ, थोड़ा हम कहे कि इह‌उ क‌इ लेई.." 
वह मजदूर बोला, "अरे, साहब, हम‌ई सबका त‌‌अ, ई मौक‌ई नाहीं मिलत।" 
उसका आशय सुबह टहलने के मौके से था। जो उसे नहीं मिलता।
मैंने कहा, "अरे! तोहका क‌उन टहलै के जरूरत बा! तू सब वैसेई दिनभर एतना मेहनत क‌इ लेथ‌अ कि.." 
उसने अब साइकिल की रफ्तार मेरे पैदल चलने के बराबर कर लिया। शायद उसकी इच्छा मुझसे बात करने की थी। 
मुझसे बोला, "साहब, बीस-पच्चीस बिगहा धान बाटइ, उही क राति भर रखाव‌ई क पड़थै, नाहीं त‌अ ससुरन जानवरन क मारा कुछ बचबै न करै.. लेकिन इहूँ में ऊ सारे मरकहवे तो बहुत परेशान कर‌अथै।" 
उसकी इस समस्या से मैंने भी सहमति जताया।
फिर उसने मेरे काम के बारे में पूछा। मैंने उसे गोलमोल जवाब देकर बताया कि किसी आफिस में काम करता हूँ। 
उसने पूछा, "साहब आप कहां के है।" 
जौनपुर बताकर मैंने उससे पूछा, "अउर‌ऊ कुछ कर‌अथ‌अ कि खेतिन भरि?" 
उसकी बात, "नाहीं साहब छह-सात भैसि‌य‌उ पाले ह‌ई..आठ-दस लीटर दूध सेंटर (मिल्क कलेक्शन सेंटर) पर भेज देईथ अउर सांझ वाला दूध लड़िकन के पिय‌ई-खाई के बदे रहथ‌अ।" 
फिर इसमें जोड़ते हुए कहा,, "साहब, सात-आठ टाली गोबर क खादि‌उ होइ जाथ‌अ..एक टाली दुई हजार क बिक‌अथ‌अ..पंद्रह-सोलह हजार क‌अ एक तूरे में।" 
उसकी बात सुनते ही मेरे मुँह से निकल पड़ा, "अच्छा..!" 
गोबर की यह खाद वह अपने भी खेतों में डालता हैै। खेतों में यूरिया खाद नाममात्र डालता है।
खेत में गोबर की खाद डालने से इस सूखे के समय में भी उसकी धान की फसल अभी ठीक है। उसने कुछ ऐसा ही बताया।
 फिर मुझसे पूछा, "तो साहब आप बिहार के अह‌ईं..?" 
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे नाहीं आर..ई जौन‌ऊपुर तोहरेनि उत्तर‌ई प्रदेश में पड़‌अथ‌अ।"
"अच्छा साहब" कहते हुए बाईं ओर इशारा करके उसने कहा, “साहब ई, ज‌ऊन फूल खिला बा न, सफेद फूल चढ़ाव‌इ के लिए ई दस रूपिया में एक्खी बिकाथै।" 
उन खिली कुमुदिनियों को देखकर मैंने कहा, "लेकिन यार अब ई, यहं न खिले, देखत नाहीं बाट‌अ, ई नदियव‌ऊ में घेरि के बाउंड्री खड़ी क‌इ लिहेंन सब, कुछ दिन में अब इहां मकान बनि जाए।"
"हां.. ई बात तो है साहब।" वह बोला।
मैंने उसके गाँव का नाम पूछा। उसने सिरसिया बताया । जो यहाँ से बीस किलोमीटर दूर है। 
मैंने थोड़ा चौंकते हुए पूछा, "तो यहां कैसे?"
उसके कहे अनुसार, वह बहन के यहां गया था। वहीं से लौट रहा था। 
सामने जिला अस्पताल दिखाई पड़ा, उसने वहाँ कुछ काम बताया और उसकी ओर मुड़ गया।
उसके मुड़ते ही, मुझे पिछले दिन सिरसिया में एक गौशाला देखने की बात याद आई। 
खैर, वह मजदूरनुमा या किसाननुमा या दोनों, जो भी था, मैंने उसकी बातों के भीतर छिपे उसके संतोष का अनुभव किया।
बाहर से अभी भी बारिश हो रही थी।
#चलते_चलते
मैं उस किसान के बारे में सोचने लगा। उसके भीतर एक अनजानी-सी खुशी थी। शायद वह स्वयं भी उसके कारण से अनजान था।
#सुबहचर्या
  (३१.८.१९)

शनिवार, 13 जून 2026

तबियत से पत्थर उछालने वाले की तबियत

मुझे बड़ी परेशानी की अनुभूति हो रही थी... दरअसल, एक डब्बेनुमा बॉक्स के भीतर गोल फ्रेम में जड़ा दर्पण जैसा कुछ फिट था। जो अपनी जगह से निकल गया था.. मुझे उसे फिर से उसी स्थान पर लगाना था। इस प्रयास में कफी समय बीत चुका था। 
तभी मैंने ध्यान से देखा,
बॉक्स के भीतर दो तरफ स्टैंड निकले थे। यह फ्रेम उन्हीं स्टैंडों पर पेंचों से कसा हुआ था… पेंच निकले तो फ्रेम भी निकल लिया! उन पेंचों को मैं खोजने लगा। देखा! एक पेंच तो बिस्तर पर ही मिल गया! अब दूसरे पेंच की ढूँढ़ाई शुरू हुई। यह पेंच उस डिब्बेनुमा बाक्स के भीतर ही गिरा था! मैंने फ्रेम को डिब्बे के भीतर के स्टैंड पर फिर से कसना चाहा कि तभी मोबाइल की धीमी-सी रिंगटोन सुनाई पड़ी..
मोबाइल टटोला। मिलते ही उसे कान पर लगा लिया… 
उधर से आवाज आई, "डी डी ओ साहब बोल रहे हैं?" 
"जी हां, डीडीओ ही बोल रहा हूँ।" मैं बोला था। 
दूसरी ओर से हल्के-फुल्के अंदाज में बोला गया, 
"अरे, मैंने कहा कि सुबह की ठंडी हवा से कंधे का दर्द और बढ़ जाएगा.. मैं डीडीओ साहब से कहुंगा कि वहीं कमरे की गर्म हवा में टहलने से दर्द ठीक हो जाएगा।"  
मैं भी नहीं चूका, बोल दिया, "नहीं, डीडीओ तो चाहते हैं कि बाहर की ठंडी हवा में दर्द को थोड़ा और बढ़ाया जाए।" 
उधर से फिर हँसी के स्वर में बोला गया, "तो फिर, हमारी भी इच्छा है कि हम पांच-दस पर निकल लें।" 
मैंने तत्काल यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
जैसे ही कॉल कटी, समय देखा। सुबह के चार बजकर पचास मिनट हो रहे थे। हां, शुक्ला जी ने मुझे जगाने के लिए यह फोन किया था। तब मैं गहरी नींद में था। 
इस बातचीत के बाद मैं थोड़ी देर तक यूँ ही बिस्तर पर पड़ा रहा। फिर पांच बजकर पंद्रह मिनट पर बाहर निकला। 
मैंने शुक्ला जी से अपनी गाढ़ी निद्रा का जिक्र किया और रात में देखे गए स्वप्न की पूरी कहानी कह सुनाया। इसे सुनकर वे मुस्कुराते हुए बोले, "तो मैंने आपको पेंच नहीं कसने दिया!" 
अब मैं सोचने लगा, अगर उस वक्त उनका फोन न भी आया होता, तो भी मैं वह पेंच नहीं कस पाता। आखिर, निद्रावस्था में देखे गए स्वप्न कहाँ पूरे हो पाते हैं! ऐसे स्वप्न तो अधूरे ही रह जाते हैं!! खैर।
टहलकर आया। कपड़ा धोया। फिर चाय बनाई। चाय पीते हुए अखबार के संपादकीय पर निगाह पड़ी।
विगत तीन वर्षों में गंगा जल के साफ होने का उद्धरण देकर बताया गया था कि वास्तव में सरकारी संकल्प ने बड़ा काम करके दिखाया है, जबकि वही आधिकारी और वही प्रयोगशालाएं हैं जो पहले भी थीं।
अब मुझे अपनी रोडवेज बस-यात्रा का स्मरण हुआ। 
मेरे पीछे वाली सीट पर तीन लोग बैठे थे। शायद ये प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक रहें हों। वे स्कूल में शिक्षकों की उपस्थिति को लेकर सरकार की सख्ती पर चर्चारत थे। एक कह रहा था कि अब तो स्कूल, टाइम से पहुँचना पड़ रहा है।
इस पर दूसरे ने कहा, “आखिर कब तक? फिर सब वैसे ही चलने लगेगा।”
पहला व्यक्ति फिर बोला, "कोई नहीं सुनेगा तो सरकार अब जबरिया रिटायर भी करेगी।" 
तभी तीसरा कह उठा, "अरे, रिटायर करके तो देखें, ये यूनियन वाले किस काम के हैं?" 
यह बातचीत सुनकर मैंने सोचा, कोई यहां क्या-क्या सुधारे? आदमी को सुधारे या सिस्टम! दोनों नहीं सुधरने वाले।
इसी बीच कंडक्टर आ गया। वह टिकट बना रहा था। उसे वर्दी में देख उस पहले व्यक्ति ने पूँछा, "भाई यह वर्दी कब से पहनने लगे?"  
कंडक्टर बोला, "अब सरकार इसपर सख्ती कर रही है, इसलिए पहनना पड़ रहा है।" 
मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने भी कंडक्टर से पूछ लिया, क्या अब सभी कंडक्टर वर्दी पहनने लगे हैं? 
कंडक्टर ने कहा, "हाँ सभी।" 
कंडक्टर की बात सुनते ही मैंने गर्दन घुमाकर पीछे बैठे उन व्यक्तियों से कहा, 
"देखा ! सरकारें चाह लें, तो कुछ भी हो सकता है।" 
दूसरा व्यक्ति निरूत्तर-सा हो गया था। मेरे मन में आया कि अब उसे ‘तबियत से पत्थर उछालने’ वाली बात भी कह दूँ। पर अगले ही पल मैं यह सोचकर चुप्पी साध गया कि उसकी बात में भी तो दम कि “आखिर कब तक? ..” क्योंकि जो आज पत्थर को तबियत से उछाल रहा है, हो सकता है कल उसकी ही तबियत न बिगड़ जाए! और फिर किसी डर या भय से हम कब तक सुधरे रहेंगे?
मेरा यह चुप रह जाना ठीक ही था।
हो सकता है ये सारी बातें निरर्थक हों!
#चलते_चलते
     मुस्कुराइए कि निरर्थक बातें करके थोड़ी देर के लिए ही सही, हमारी तबियत सुधर जाती है, क्यों है न?
#सुबहचर्या
(२९.८.१९)

गुरुवार, 11 जून 2026

परसेप्शन बनाएं लेकिन…

आज टहलने नहीं गया। बीती रात, सोने के पहले ही तय कर लिया था कि सुबह टहलने नहीं जाना। इसके बजाय कंधे की कुछ एक्सरसाइज कर लेंगे। जिसमें सिंकाई भी शामिल है। इन सब में लगभग एक घंटा खर्च होता है। खैर।
 
रात दस बजे के आसपास, दूसरे कमरे में मोबाईल को चार्जिंग पर लगा दिया था कि जब भी नींद टूटेगी इसे चार्जिंग से हटा लेंगे। दूसरे मोबाइल को बिस्तर के कोने में रख लिया था कि अलसुबह शुक्ला जी का फ़ोन आएगा तो उनसे कह देंगे कि आज टहलने नहीं जाना है। दरअसल वे टहलने के लिए रोज ही जगाते हैं। फिर हम साथ-साथ स्टेडियम निकलते हैं, खैर। 

सुबह हुई शुक्ला जी का फ़ोन नहीं आया और इधर मैं भी इत्मीनान से उठा। कंधे के व्यायाम आदि से निवृत्त होकर चाय बनाया। चाय पीते समय फोन चेक करना चाहा। लेकिन मोबाइल स्विच‌ऑफ था। याद आ गया, रात में ही इसकी भी बैटरी खतरे के लेबल पर थी। रात भर में यह भी डिस्चार्ज हो गया। 

अब मुझे ध्यान हुआ कि हो सकता है सुबह शुक्ला जी का फोन आया हो। मैं दूसरे कमरे में गया। चार्जिंग पर लगे मोबाइल को चेक किया। उसमें दो मिसकाल थे। शुक्ला जी ने ये कॉल पांच बजे के आसपास किए थे। 

चाय सुड़कते हुए मैं अखबार पर भी निगाह फेर रहा था। इसी समय घड़ी में देखा, सात बजकर पांच मिनट हो चुके थे। हम लोग स्टेडियम से लौटकर इसी समय आवास पर पहुंचते हैं। मैंने शुक्ला जी को, उनका हालचाल जानने के लिए फोन लगाया, यही पूँछना था कि स्टेडियम से लौटे कि नहीं। इसके साथ ही फोन न उठाने की सजा के तौर पर उनके कुछ व्यंग्यवाण भी सुनने की मेरी इच्छा थी।

उधर से भी वही व्यंग्यात्मक लहजे में उनकी आवाज सुनाई पड़ी, 'सारी..सारी...अब हम आपको डिस्टर्ब नहीं किया करेंगे..।" और अपनी इस बात के साथ मोबाइल स्विच‌आफ कर लेने का तोहमत भी मुझपर जड़ दिया। 

मैं समझ गया। क्योंकि अकसर मैं आलसपन में अलसुबह स्टेडियम जाने से ना-नुकुर करता हूँ। शायद इस बात से ही उन्होंने अनुमान लगाया हो कि जानबूझकर मैंने मोबाइल बंद कर लिया था। उन्हें जो सफाई देना था मैंने दिया भी। 

फिर बातों-बातों में वे बोले कि “आप चिंतन-मनन करते हो इस पर कुछ लिखिए।” बातचीत यहीं पर समाप्त हो गई। 

सोचा, 'क्या कुछ लिखें? इधर क‌ई दिन से सुबहचर्या पर भी कुछ नहीं लिखा है। बात तो, सुबह की टहलाई पर जाने से ही निकलती है, टहलने बाहर निकला ही नहीं, तो क्या लिखें ?' 

फिर ये बातें दिमाग में कौंधीं। इसे ही सुबहचर्या का हिस्सा मान लिया। इस चेतावनी के साथ कि यह कहानी है और इस कहानी के पात्र, स्थान, घटना आदि से साम्यता स्थापित होने की स्थिति में उसे संयोग मात्र माना जाए। 

लेकिन चलिए मान लेते हैं, अनंत ब्रह्माण्ड में अनंत पृथ्वियों की भी संभावना हो सकती है और हो सकता है इन्हीं अनंत पृथ्वियों में से किसी एक पृथ्वी पर यह कहानी घट भी रही हो!! 

और... मुस्कुराइए कि हो सकता है आप भी यह कहानी पढ़ रहें हों..

#चलते_चलते

किसी भी विषय के प्रति हमारा 'परसेप्शन' बहुत सावधानी पूर्वक बनना चाहिए।
 
#सुबहचर्या
 (२७.८.१९)

भारत को तो बख्श दीजिए!

आज आठ अगस्त दो हजार उन्नीस है। सुबह पौने पाँच बजे ही शुक्ला जी ने फोन करके जगा दिया। बोले, कि  साढ़े पांच बजे तक आ जाइए, स्टेडियम चल दिया जाएगा। हालांकि अभी नींद की खुमारी दूर नहीं हुई थी। थोड़ी सुस्ती भी छाई थी। सोचा, चाय पीकर चलें। चाय बनाया। चाय पीने के बाद अचानक मन हुआ कि ज़रा छत पर चलकर भोर होती बेला को निहार लें। 

साढ़े पांच बज रहे होंगे जब मैं आवास की छत पर आया। इस भोर की एक तस्वीर भी ली। तस्वीर लेते समय मुझे कामायनी की यह पंक्ति याद आई,

'दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात'   

स्टेडियम पहुंचते ही शुक्ला जी इनडोर बैडमिंटन कोर्ट की ओर चले गए और मैं खुले ग्राउंड की ओर। दौड़ते हुए इस मैदान का मैंने दो चक्कर लगाया। और फिर सामान्य चाल से एक चक्कर और पूरा किया। ग्राउंड का एक चक्कर लगभग पांच सौ कदम का है। 

बालीबाल टीम के सदस्य दृष्टिगोचर हुए। तो उनके ग्राउंड की ओर चला गया। चूंकि मैं बालीबाल खेलना सीख ही रहा हूँ, इसलिए कौन कैसे बाल हैंडल करता है, ध्यान से देखता हूँ। आज भी ध्यान इसी पर था। 

उन्हें मैं मझा खिलाड़ी समझता था, लेकिन साथी खिलाड़ी को बॉल पास करने में उनसे चूक हो गई। वह गलत दिशा में चली गई। मुझे लगा बॉल को नहीं छूना चाहिए था। लेकिन फिर मन में कौंधा कि यदि बाल को हैंडल करने में कोई गलती हुई है तो उससे सीख ही मिलेगा।

स्टेडियम से लौटते समय शुक्ला जी साथ थे। उन्होंने कहा, "जो विजेता होता है, वही इतिहास लिखता है और विजेता वही होता है जो लड़ता है।" उनकी यह बात सही लगी। 

कश्मीर से धारा 370 हटाने पर विवाद और संघर्ष की आशंका थी। लेकिन यह भी एक प्रयास है, समस्या से लड़ने का।

एक बात अनुभव से भी सीखता आया हूँ, सही मन से लिए गए निर्णयों के परिणाम अच्छे होते हैं। यहाँ हार में भी जीत होती है। 

लोग कश्मीर पर दिल जीतने का तर्क देते हैं। लेकिन हँसी आती है इसपर। क्या दिल जीतना इतना आसान है? वैसे 'राज्य' के सारे कानून दिल जीतने के लिए ही तो हैं फिर भी दिल हैं कि मानता नहीं और समस्या ज्यों की त्यों!

भाई मेरे! राज्य अपने नागरिकों का दिल जीतने वाला कानून तो बनाता ही है लेकिन दूसरी ओर उसे ऐसे कानून भी गढ़ने होते हैं जो स्वयं राज्य को भी संरक्षित करे। इसलिए इन बातों पर ज्यादा हाय-तौबा मचाने और बौद्धिक विश्लेषण की जरूरत नहीं।

मैं देख रहा हूं, धारा 370 हटाए जाने की व्याख्या तमाम नजरिए से हो रही है। जैसे, राष्ट्रवादी, संम्प्रदायवादी, वामपंथी, बुद्धिवादी, संविधानवादी और राजनीतिक; सबकी अपनी-अपनी व्याख्या।

लेकिन सबसे अधिक घातक साम्प्रदायवादी व्याख्या है। ऐसा करने वालों को मैं "नान-स्टेट-ऐक्टर" मान सकता हूँ। ये राज्य की अवधारणा को फालो नहीं करते। यह उर्वर जमींन में ज़हर बोने जैसी व्याख्या है।

खैर यह तो हमारे संविधान की खुबसूरती है कि यहाँ ज़हर बोने की भी स्वतंन्त्रता है!  

रही बात कुछ साहित्यकार टाइप के बुद्धिजीवियों की, तो उनकी बात ही निराली है। 

प्रकाशकों की कृपा से साहित्यकार बने इन बेचारों को, बस बात को घुमाफिरा कहने की कला भर आती है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। दिल्ली में बैठकर साहित्य नहीं रचा जा सकता। ये अपनी बातों में जबर्दस्ती का साहित्य ठूँसते हैं। जनसरोकार के नाम पर जन से कटे हुए लोग हैं ये।

जहाँ तक ‘लोकतंत्र विरोधी’ जैसी राजनीतिक व्याख्या की बात है, तो उन्हें भी समझना चाहिए कि सत्ता को ताकत भी लोकतंत्र से ही मिलती है।

एक बात और, संविधानवादी व्याख्या की बात है, तो संसद की बात माननी ही पड़ेगी, बाकी सर्वोच्च न्यायालय है ही इस बात की व्याख्या करने के लिए।

अंत में एक बात, प्रकृति ने ही भारत की सीमा को निर्धारित किया था। शायद यही कारण रहा होगा कि इसके एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक हजारों वर्षों से निर्बाध आवागमन चला। अगर ऐसा न होता तो अफगानिस्तान में बामियान न होता, या फिर एक ही संस्कृति के प्रमाण न मिलते। 

भाई मेरे, यह भारतभूमि यूरोपियन देशों की तरह किसी राजनीतिक एकता का परिणाम नहीं, एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण का परिणाम था, और आप इसकी तुलना सोवियत या यूरोपियन यूनियन के देशों से करते हो!! 

कामरेड, इसे समझिए, आप जैसे लोग धर्म को धर्म नहीं, किसी खास राजनीतिक विचारधारा को ही धर्म मानते हो, या फिर धर्म को संम्प्रदाय बना देते हो, अन्यथा धर्म के नाम पर देश का विभाजन न हुआ होता। 

अब तो भारत को बख्श दीजिए और इसे तोड़ने वाले प्राविधानों को ही तोड़िए! 

मित्रों, इस सुबहचर्या को मैंने थोड़ी तल्खी में लिख डाला है, क्षमा करें।

#चलते_चलते

       किसी चीज के लिए किया गया हमारा सद्प्रयास ही अपने आप में विजय के समान होता है।

#सुबहचर्या

(८.८.१९)

बुधवार, 10 जून 2026

अरे साहब, आपने इन्हें..!

घड़ी में अभी सात भी नहीं बजे थे। दसेक मिनट बाकी था सात बजने में। यूँ ही घर के अंदर-बाहर चहलकदमी करने लगा। 

दरअसल आज नींद पांच-बीस पर खुल गई। मोबाइल देखा।  शुक्ला जी का एक मिसकाल था। पाँच उन्नीस पर आया था यह काल। उन्हें फोन मिलाया। उनींदी-सी आवाज में वे बोल रहे थे कि तैयार हो लीजिए। 

खैर रात में तीन-चार बार नींद खुली थी। कारण कि मेरे कंधे का दर्द मुझे बेचैन किए था। यह दर्द चार-पांच महीने से है। तो ठीक से सो न पाने के कारण मन में आलसपन भी था। बिस्तर छोड़ते ही चाय पीने का मन हुआ। चाय बनाने चला गया। 

चाय बनी। चाय पीते हुए व्हाट्स‌अप पर मित्रों के गुडमॉर्निंग संदेश देखने लगा। इधर यहाँ श्रावस्ती में दो-तीन महीने से नेटवर्क की जबर्दस्त प्रॉब्लम है। पता नहीं क्यों? न संदेश खुल रहे थे और न भेज पा रहा था। बात केवल गोल-गोल घूमकर ट्राई अगेन पर रुक जाती। दिन में सिंग्नल मिलता भी है तो सुबह की "सुप्रभात" दोपहर बाद कहने में संकोच होता है। खैर चाय पीते हुए मैंने फटाफट good morning वाला संदेश छोड़ दिया कि नेटवर्क आते ही यह चला जाए।

चाय और गुड मॉर्निंग से निवृत्त हु‌आ तो शुक्ला जी के यहां चल पड़ा। लेकिन वे स्टेडियम के लिए निकल ग‌ए थे। मैं भी खरामा-खरामा उसी ओर चल पड़ा। 

स्टेडियम के मोड़ पर पहुँचा तो कल की सुबहचर्या पर भाई यशवंत सिंह जी की टिप्पणी याद आ गई। उनकी टिप्पणी थी, "बुढ़ौती में खेल मत खेला।" हालांकि इसी पर भाई रनवीर सिंह चौहान जी ने भी शायराना अंदाज में टिप्पणी किया था कि "दाढ़ी की सफ़ेदी पे न जाओ/सालों की बटोरी हुई चाँदी है वो।" ये दोनों टिप्पणियां जैसे एक-दूसरे को संतुलित कर रहीं हों, सोचकर मुस्कुरा उठा।

लौटते समय एक खच्चर जैसा घोड़ा सड़क के किनारे गिरा पड़ा था। उसके शरीर एक-दो कौवे बैठे उस पर चोंच मारते दिखाई पड़े। वहां किसी वाहन के शीशे के छोटे-छोटे टुकड़े भी बिखरे पड़े थे। इस घोड़े को रात में जरूर किसी वाहन ने टक्कर मारा होगा। एक दूसरा खच्चर उस मृत खच्चर के पास खड़ा था। उसकी आंखों से आंसू बहता प्रतीत हुआ। मैं भी उस खच्चर के दुख से दुखी-सा हो उठा। मुझे लगा दुख या कष्ट प्राकृतिक है किस प्राणी को नहीं होता? चाहे वह मनुष्य हो या फिर जानवर, संवेदना की अनुभूति तो सभी को होती है।

जब मैं घर के अंदर-बाहर चहल-कदमी कर रहा था, तो निगाह बड़े होते उस पाकड़ के पेड़ पर पड़ी, जिसे काटने के लिए मैं क‌ई बार मंगलेश्वर से कह चुका था। एक बार तो वह कुल्हाड़ी भी लाया था, लेकिन फिर उसे वापस लेकर चला गया। 

असल में वह उसे काटना नहीं चाहता था, यही नहीं घर की दीवारों के एकदम किनारे बड़े होते पीपल के पौधों को काटने से उसने यह कहकर मना कर दिया था कि किसी अन्य संम्प्रदाय के व्यक्ति को बुलवाकर इन्हें हटवा देंगे।

इस बीच ये पौधे बड़े हो चुके थे,  इनसे दीवारों को नुक़सान पहुंचने का डर हो आया था। यही नहीं, उन पौधों के बीच सांप वगैरह के छिपने का भी डर था।  

आज मैंने स्वयं इन पौधों को वहां से हटाया। मंगलेश्वर महोदय अभी जब सुबह आए तो आश्चर्य से पूंछा,

 'अरे साहब, आपने इन्हें..!" 

मैंने उसे समझाया - “इनसे दीवारों को नुकसान होता और फिर उसकी झाड़ में कोई सांप-वांप भी तो छिप सकता था, वैसे भी अपने रहने के आसपास की जगह को साफ-सुथरा तो रखना ही चाहिए।” 

वाकई! कितनी चिंता रहती है हमें एक कण से लेकर पेड़ पौधे और सभी प्राणियों तक की!!

हाँ, टहलकर लौटते समय अखबार देने वाला बच्चा मिल गया था, आज अखबार की वैन देर से आई थी। बच्चे ने रास्ते में ही मुझे अखबार पकड़ा दिया था।

अखबार के पन्नों पर छपी खबरें पढ़ने लगा, अगर मीडिया या अखबार न होते तो क्या होता? 

लेकिन राज्य हो या यह मीडिया, सबको देर से जागने की आदत हो चली है। मतलब तब तक घटनाएं घटकर खबर बन चुकी होतीं हैं।

आज यह सब लिखने का मन नहीं था। लेकिन सुबह की टहलाई के बाद लौटा तो मन भीतर तक निश्चल और शांत हो चुका था। सुबह जो भी देखा सुना उसे लेकर मन के भाव, व्यक्त होने के लिए भीतर ही भीतर कुलांचें मार रहा था। सो लिखना पड़ा।

#चलते_चलते

देर से जागने पर केवल लकीर पीटना भर रह जाता है। 

#सुबहचर्या

   (२.८.१९)

यूँ ही में अच्छा लगना

सुबह उठे तो मन ने यूँ ही टहलने न जाने का इरादा जता दिया। पीछे वाला दरवाजा खोलकर पूरब दिशा की ओर निहारा‌। मखमली-से बाल सूरज के दर्शन हुए। लेकिन मैं इनके इस भोले रूप के भुलावे में नहीं आया। जानता था, अभी दो-चार घंटे बाद यही अपने उग्र स्वरूप में दिखाई पड़ेंगे। उस आने वाली तीखी तपन की कल्पना भर से इनके इस बाल रूप की भृकुटी मुझे टेढ़ी नजर आने लगी। अभी से मुझे गर्मी का एहसास होने लगा।

मैं बाहर आया। पौधों पर निगाह गई। पत्तियों पर धूल-गुबार की परत जमी हुई थी। इससे इन पौधों का दम घुटता नजर आया। मैं कमरे से झाड़ू लेकर आया। इन पौधों के आस-पास सफाई किया। फिर बाथरूम में गया। नल की टोंटी खोली। बाल्टी भर गई, तो उसे लेकर फिर इन पौधों के पास आया। उस पानी से इन्हें नहलाया। धूल हटते ही पत्तियाँ चमक उठी, जैसे पौधे खिलखिलाकर मुस्कुरा उठे हों। 

अब कमरे की ओर लौटा। देखा, कमरों के फर्श पर भी धूल की महीन-सी परत जमी थी। तीन-चार बाल्टी पानी कमरों में फैलाया। फिर वायपर से उसे खींचकर बाहर कर दिया। 

घर के आसपास यदि थोड़ी नमी बनी रहे तो मुझे अच्छा लगता है। वैसे भी हमारा देश धूल-धक्कड़ और गर्मी-सूखे से प्रभावित भू-भाग माना जाता है। शायद बाबर ने अपनी किताब बाबरनामा में इसका ज़िक्र किया है।  

खैर, यह सब करके मैंने मन के इरादे को ही चकमा दे दिया था, “बच्चू! मत ले चलो मुझे टहलाने, मैंने भी यूँ ही में काम भर का एक्सरसाइज तो कर ही लिया।

इसके बाद चाय बनानी शुरू की। आज दूध कुछ गड़बड़-सा लगा। फटा तो नहीं था, फ्रिज में ही रखा था और रात भर बिजली भी रही थी। दूध सीधे फ्रिज से ही निकाला था। लेकिन उसमें चिकनाई कुछ जियादा ही प्रतीत हो रही थी। 

चाय पीते हुए देखा, गिलास की सतह पर कुछ महीन कण जैसे जमा हो गए थे। मन में आशंका उठी, कहीं दूध मिलावटी या बनावटी तो नहीं? यह सोचकर दूधिए पर मन ही मन गुस्सा भी हुआ। फिर मन को यह कहकर शांत किया कि कल उससे इस बारे में जरूर पूछूँगा। आखिर पूरी चाय भी नहीं पी पाया। गिलास वैसे ही रख दिया। 

इधर आज ईद है। सोशल मीडिया पर इस पर कोई बढ़िया सा शुभकामनाओं वाला संदेश खोजा। इसे फेसबुक के  टाइमलाइन पर पोस्ट कर दिया। सोशल मीडिया से ही पता चला कि आज विश्व पर्यावरण दिवस भी है। इसपर शुभकामना संदेश देने की इच्छा ही नहीं हु‌ई। क्योंकि सोशल मीडिया पर दिए संदेश से धरती हरी-भरी नहीं होने वाली!

ठीक इसी समय दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज हुई। दरवाज़ा खोलकर देखा, दो नन्हें-मुन्नें-से बच्चे अपने नन्हें हाथ में दूध का डिब्बा लिए खड़े थे। उन्हें घूरते हुए मैंने दूध का डिब्बा ले लिया। भगोने में उड़ेला। दूध ठीक दिखाई पड़ा। बच्चों को खाली डिब्बा लौटाते हुए सोचा, दूध के लिए इन्हें क्या बोलें! ये बच्चे क्या समझेंगे। 

दूध को लेकर बच्चों से कुछ नहीं कहा बल्कि उनसे इतना भर पूंछा, "तुम्हारे यहां भैंस दूध देती है?" 

इस प्रश्न पर बच्चे ने सहमति में सिर हिलाया कि  भैंस है वह दूध देती है। बच्चे झूँठ नहीं बोलेंगे। तो दूध बनावटी या नकली नहीं रहा होगा‌। मैंने निष्कर्ष निकाला। लेकिन साथ में यह भी मन में आया कि इस जमाने में "आदमी के लालच का कोउनऊ भरोसा नाहीं!" 

एक बच्चे ने मुझसे अखबार मांगा। असल में बच्चे जब भी दूध लेकर आते हैं तो मुझसे पुराना अखबार जरूर मांगते हैं। एक दिन मैंने इनसे पूंछा था कि "अखबार का क्या करोगे?" "किताबों पर जिल्द चढ़ाएंगे।" उनकी उस बात से मुझे भी अपना बचपन याद आ गया था। मैंने बच्चों को अखबार दिया और वे चले गए।

उनके जाने के बाद मैं कमरे में आ गया। बिस्तर पर नजर गई। चादर और तकिए के खोल कुछ मैले-से दिखाई पड़े। उन्हें समेटकर बाथरूम में ले आया। बाल्टी में सर्फ घोला और चादर तकिए के खोल उसमें भिगो दिए।उन्हें बाल्टी में डाल दिया। 

इतने में मंगलेश्वर भी आ गए थे। जो मेरा खाना बनाते हैं। लेकिन मैं चुपचाप चादर और तकिए के खोल धोता रहा। फिर उन्हें सूखने के लिए धूप में फैलाने बाहर आया। यह देखते ही मंगलेश्वर बोले, 

अरे साहब, आप क्यों धोए? मैं धो देता..!" 

मैंने जैसे अपनी सफाई देते हुए कहा, 

“नहीं यार, इसी बहाने थोड़ी मेहनत भी हो जाती है।” 

वह चुप हो गया और हमारे हाथ से कपड़े लेकर रस्सी पर फैलाने लगा। खैर..

#चलते_चलते    

कभी-कभी मन, अपने अरयें ही मस्त-सा हो उठता है! फिर उसी मन:स्थति में जो भी हम करते या सोचते हैं, हमें अच्छा लगता है। मतलब छोटी-छोटी बातें भीतर एक संतुष्टि और अपनापन भर जाती हैं।

#सुबहचर्या

   5.6.19 

    विनय     

सोमवार, 8 जून 2026

खैर, हम ऐसे ही हैं!

कहते हैं, लक्ष्य बड़ा है तो उसे पाने के लिए छोटी-छोटी बातों को नज़र‌अंदाज कर देना चाहिए। क्योंकि तुच्छ बातों में उलझ जाना आदमी को बड़े लक्ष्य से भटका देता है। 

सत्ता-प्राप्ति सबसे बड़ा सार्वकालिक राजनीतिक लक्ष्य रहा है। उसके लिए विकास, कानून का राज, संविधान, जनकल्याण और विचारधाराएँ, ये सब आवश्यक पड़ाव भर हैं। सत्ता को ऐसे पड़ाव से वैधता एवं स्वीकार्यता प्राप्त होती है। लेकिन यह विडंबना है कि सत्ता की राजनीति, सत्ता की प्राप्ति और इसके संरक्षण के लिए इन पड़ावों का इस्तेमाल करने लगती है। 

हमारे यहां का सिस्टम कभी भी 'आ‌‌ॅटो-मोड' में काम करता प्रतीत नहीं होता। इसे चलाने के लिए राजनीतिक शक्ति चाहिए, जिसकी अपनी कार्यशैली और नियंत्रण-पद्धति होती है। इसीलिए इसके बरक्स ही चीजें सत्तावादी चरित्र में ढल जाती हैं।

ईमानदारी या पारदर्शिता को ही देखिए। सत्तावादी व्यवस्था इसके साथ खेलते हैं। इन मूल्यों को अपने ढाँचे में ढाल लेते हैं। वहाँ ईमानदारी और पारदर्शिता का कोई स्वतंत्र नैतिक अर्थ नहीं बचता; वे केवल सत्ता वैध और मजबूत दिखाने के औजार बनकर रह जाती हैं। अन्यथा ये मूल्य सत्ता-शक्ति को नाकाबिले बरदाश्त होती है। 

मैंने कहा न, कि यह देश ‘ऑटो-मोड’ में नहीं चलता। सत्ता के जोर से चलता है और वह भी बंदूक की नली से नहीं, खजाने के प्रवाह से संचालित होती है। इसीलिए ‘सत्ता-नीति’ में ईमानदारी और पारदर्शिता की स्थिति बहुत विचित्र है, वे सत्ता के लिए ‘वाह’ भी हैं, और ‘आह’ भी! 

सत्ता का चरित्र ही ऐसा है कि वह धीरे-धीरे अपनी 'मान्यताओं का सिस्टम' गढ़ लेता है। उस सिस्टम में न तो कोई गुंडा होता है, न माफिया; न कोई ईमानदार होता है न बेईमान!

वहाँ व्यक्ति और मूल्य अपने मूल अर्थों में नहीं, बल्कि इनका प्रयोग सत्ता के सोपान के रूप में किया जाता है।

यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि हमारे सत्तावादी चरित्र में, ईमानदारी-फीमानदारी, पारदर्शिता-सार्दर्शिता, नियम-फियम, कानून-फानून और यहाँ तक कि संविधान-फंविधान, ये सब ढकोसले हैं। ये वहीं तक काम करते हैं, जहां तक सत्ता के उपयोग और उसकी आवश्यकता के अनुसार परिभाषित हों।

खैर, इन बातों के तस्दीक के लिए किसी को कुछ भी नहीं करना है, केवल इस सिस्टम की प्रत्येक चमकती हुई चीज का, मने व्यक्ति, संस्था, नीति और स्वयं सिस्टम का चीरफाड़ करके देख ले! उसमें बेहद लिजलिजा, पिलपिला और पीब जैसा पदार्थ नजर आएगा! फिर भी सत्तावादी लोग बेहद गुमान में जीते हैं!!

वाकई, हम ऐसे ही हैं।

शनिवार, 6 जून 2026

दरिया से लौटती नेकी


उस दिन मैंने कोई नेकी नहीं की थी 

बस इतना हुआ था कि 

किसी बड़े शो में, 

बड़े लोगों के बीच पहुँचकर 

इतराने की बजाय 

किसी की नेकी में शामिल हो गया था

शायद वही मेरी नेकी थी।


तभी किसी पुराने जमाने की कही बात  

याद आ गई -

“नेकी कर, दरिया में डाल।” 


मैं अपनी नेकी पर दयावान हो उठा।

सोचा, 

बेचारी को दरिया ही पसंद होगा।

इसीलिए नेकी को कंधे पर लादे

उदास मन से 

मैं दरिया की तलाश में निकल पड़ा।


शायद उस जमाने में 

नेकी कोई अजूबा नहीं रही होगी, 

कोई ऐसी चीज नहीं

जिसे दिखाकर इतराया जाए।


तभी तो, 

उसे दरिया में बहा देने का चलन रहा होगा! 


लेकिन अब

कोई ऐसी दरिया नहीं 

जिसके झिलमिल, कल-कल पानी में 

मेरी नहीं, नेकी ही सही, 

यह कह सके -

“देखो, मैं अब भी जिंदा हूँ!


मैंने दरिया को देखा, 

अब समझ गया - 

इसके काले पड़ चुके जलों में 

नेकी का दम घुट जाएगा, 

वह मर जाएगी।


फिर कौन मानेगा 

कि दुनियां में 

कभी नेकी जैसी कोई चीज भी थी।


मैं लौट पड़ा

उसे फिर अपने कंधे पर लादे।

मगर अब 

उसके बोझ से

मेरे कंधे दुखने लगे थे।


तभी नेकी तडफड़ाई, 

और मुझपर दया करके बोली,

तू क्यों दबता है 

मेरे बोझ तले?

ले चल मुझे 

सोशल मीडिया पर डाल दे।

वहाँ लोग देखेंगे मुझे! 


शायद कोई कह उठे,

इस चमकीली, भड़कीली दुनियाँ में 

नेकी अब भी 

किसी कोने में दुबकी मिल जाती है‌।”

           - विनय 

काठियावाड़ का खारा पानी

आज पाँच बजे ही आँख खुल गई। सोमनाथ से निकलना था। कुछ देर तक यूं ही चहल-कदमी करता रहा। फिर नहाने का विचार आया, लेकिन यहाँ यह भी कठिन काम लगा। दरअसल पानी इतना खारा था कि जैसे सीधे समुद्र का पानी हो! मैंने होटल वाले से पूँछा भी था, *क्या सीधे समुद्र का पानी सप्लाई करते हो?” वह हँसकर बोला था, “नहीं, बोरिंग का पानी है।” 

गुजराती भोजन में मीठे का प्रयोग होता है। साथ में छाछ भी होता है? मैं इसपर सोचने लगा कि ऐसा क्यों? मुझे लगता है पूरे काठियावाड़ के भोजन में एक अलग तरह का स्वाद संतुलन दिखाई देता है। यहाँ दाल-सब्जियों में हलकी मिठास, साथ में छाए, और क‌ई व्यंजनों में दूध-घी या खोए का प्रयोग सामान्य बात है। यह पहले तो मुझे थोड़ा अजीब लगा लेकिन फिर मुझे भी ऐसे भोजन का स्वाद अच्छा लगने लगा। दरअसल इसके पीछे केवल स्वाद नहीं, बल्कि वहां की जलवायु और जीवन स्थितियों का बड़ा हाथ है। 

काठियावाड़ क्षेत्र में पानी स्वभावत: कुछ खारा या क्षारीय है। संभव है भोजन में मिठास और छाछ का प्रचलन इसी खारेपन को संतुलित करने से जुड़ा हो। वैसे भी गर्म जलवायु में छाछ भोजन को सुपाच्य रखता है। 

गुजरात व्यापारिक प्रदेश है। यहां यात्राएं भी लोग करते रहे होंगे, लंबी यात्राओं में भोजन खराब न हो इसलिए भोजन को मधुर और सुपाच्य रखने की परंपरा रही होगी। यही बात यहां की भोजन-संस्कृति का हिस्सा बन गई हो। 

खैर जो भी हो, यहां बाटी भी खोया डालकर बनाते हैं, यह बहुत स्वादिष्ट होता है। घी और खोए की वह मिली-जुली सुगंध साधारण बाटी को भी एक अलग ही व्यंजन बना देती है। पहली बार खाने पर लगता है जैसे राजस्थानी बाटी और किसी मिठाई का स्वाद एक साथ मिल गया हो।

यहां काठियावाड़ में नारियल की खेती तो खूब होती ही है, मूँगफली की भी होती है। फिर बीच-बीच में फैले छोटे-बड़े उद्योग और समुद्र से जुड़े बंदरगाह, सब मिलकर यहां की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं।  

लगता है भारत के उद्योगपतियों के लिए गुजरात मुफीद जगह प्रतीत हुई। समुद्री बंदरगाहों की उपलब्धता, अपेक्षाकृत कम आबादी वाले विस्तृत भू-भाग, और व्यापारिक दृष्टि से अनुकूल वातावरण ने यहाँ औद्योगिक इकाइयों को तेजी से विकसित होने का अवसर दिया होगा। छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक कहीं न कहीं कोई फैक्ट्री, प्रोसेसिंग यूनिट या औद्योगिक परिसर दिखाई पड़ ही जाता है।

इन्हें देखकर सहज ही समझ में आता है कि उत्तर भारत के इतने मजदूर रोज़गार की तलाश में यहाँ क्यों आते हैं। दरअसल उद्योग केवल पूँजी को नहीं बुलाते, वे श्रम को भी आकर्षित करते हैं। शायद यही कारण है कि गुजरात के शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में आपको उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान तक के लोग काम करते दिखाई पड़ जाते हैं। यहाँ की आर्थिक सक्रियता ने अलग-अलग प्रदेशों के लोगों को एक साझा श्रम-संस्कृति में जोड़ दिया है।

इस समय हम सोमनाथ-अहमदाबाद हाईवे पर चल रहे थे। ऐसे मार्गों का प्रभाव गुजरात की आर्थिक गतिविधियों पर ही नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी अच्छा प्रभाव पड़ा है। 

#चलते_चलते

देश में हो रहे विकास के बावजूद भारतीय नागरिक एक जिम्मेदार नागरिक नहीं बन पा रहे हैं।

#सुबहचर्या

 (2.07.19)

शुक्रवार, 5 जून 2026

धर्म की नदी और संप्रदाय की नावें

सुबह जल्दी उठे। कल द्वारिकाधीश के दर्शन हो ग‌ए थे। आज का प्लान सोमनाथ जाने का था। कल मैं द्वारिकाधीश में एक साधू के बगल में बैठा था। जिसकी तस्वीर मैंने फेसबुक पर शेयर की थी। 

वैसे किसी भी धर्म के विषय में टिप्पणी करना अत्यंत संवेदनशील मसला है, क्योंकि धार्मिक विचार सीधे आस्था से जुड़े होते हैं। जिसकी जैसी आस्था होती है, उसका धर्म बोध भी वैसा ही आकार लेता है। मनुष्य अपनी आस्थाओं के ताने-बाने से ही अपनी जीवन-शैली, व्यवहार और दृष्टिकोण का निर्माण करता है।

लेकिन धार्मिकों को भी चाहिए कि अपने विचारों को लेकर आक्रांता न बनें। धार्मिक विचार बिल्कुल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित होने चाहिए।

खैर, कल किसी बात पर क्षण भर के लिए मन उदास हो आया था। एक पीतवस्त्रधारी साधू बाबा के बगल में आकर बैठ गया। उनसे अपनी तुलना कर बैठा। उनकी निश्चिंतता से मुझे रश्क-सा हुआ!

वैसे धार्मिक परम्पराओं में संसार को अक्सर ‘भवसागर’ कहा गया है। यहाँ ‘भव’ का अर्थ है जन्म-मरण और उससे जुड़ा यह नश्वर संसार, जबकि ‘सागर’ उसकी अथाह और दुस्तर प्रकृति का प्रतीक है। मनुष्य इस भवसागर में मोह, माया, दुःख, भय, रोग, जरा और मृत्यु जैसी अनगिनत लहरों के बीच डगमगाती जीवन-नौका लेकर भटकता रहता है। अपनी-अपनी चिंताओं, इच्छाओं और अस्तित्व के संकटों से जूझते हुए वह किसी स्थिर तट की तलाश करता है।

तो क्या साधु हो जाने मात्र से कोई इस भवसागर के उस स्थिर तट को पा लेता है? संभवतः नहीं। अनेक साधु-संत इससे मुक्ति का उपाय संसार से कुछ दूरी बनाकर अपनी एक अलग दुनिया रच लेने में देखते हैं। किन्तु वे भी अंततः इसी संसार, इसी भवसागर पर आश्रित रहते हैं। उनकी साधना, उनका वैराग्य, यहाँ तक कि उनका अस्तित्व भी उसी समाज और जीवन-व्यवस्था से जुड़ा होता है, जिससे वे स्वयं को अलग मानते हैं। बस वे जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते।

वैसे, आम भारतीय अपने व्यक्तिगत अस्तित्व को लेकर बहुत अधिक फ़िक्रमंद नहीं रहा, वह अपने होने की निरंतरता को पारिवार और आने वाली पीढ़ियों में अवश्य देखता है, किंतु भारतीय चिंतन ने वानप्रस्थ जैसी अवधारणा के माध्यम से इस भाव को भी संतुलित किया, ताकि पारिवार जैसी संस्था की निरंतरता पर व्यक्ति का अहं न टिक जाए। शायद इसी कारण यहाँ जीवन और जगत की वस्तुओं को क्षणभंगुर माना गया, और वैराग्य तथा अनासक्ति को भी जीवन-दृष्टि का हिस्सा बनाया गया। 

लेकिन चतुर और लोभी मन प्रायः अपने अस्तित्व-बोध को ही केंद्र में रखकर जीता है। यही कारण है कि वह परिवार और सामाजिक संस्थाओं को भी अपने अहं तथा वर्चस्व का माध्यम बना देता है। जब व्यक्ति निरंतरता को साधना के बजाय स्वामित्व की दृष्टि से देखने लगता है, तब वही प्रवृत्ति परिवारों और संस्थाओं में विकृतियाँ उत्पन्न कर देती है। जिससे इन संस्थाओं के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो जाता है। सामंती मानसिकता का मूल भी कहीं न कहीं इसी आग्रह में दिखाई देता है।”

भारतीय संदर्भों में धार्मिक विचार एक बहती नदी की तरह रहा है, जिसमें निषेध या बहिष्कार का आग्रह कम, और विविध धाराओं को आत्मसात कर उन्हें अपने प्रवाह का हिस्सा बना लेने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। शायद इसी कारण यहाँ अस्तित्व को स्थिर रूप में बचाए रखने की चिंता से अधिक, जीवन-प्रवाह को सतत और जीवंत बनाए रखने पर बल दिया गया।

लेकिन जब धार्मिक-विचार किसी कठोर सम्प्रदाय में बदलने लगते हैं, तब उनकी यही जीवंतता क्षीण होने लगती है। प्रवाह की जगह आग्रह आ जाता है और समावेश की जगह सीमाएँ खिंचने लगती हैं। तभी अपने बगल में बैठे उस साधु को देखकर मन में यह विचार आया कि कोई भी बाना या पहचान, यदि अस्तित्व-बोध और अहं की चिंता से मुक्त होकर धारण की गई हो, तो वह न कभी दूसरों को भ्रमित करती है और न ही किसी अन्य के होने की अवहेलना करती है।

कल जब हम द्वारिकाधीश के दर्शन करने गए तो वहां के पुरोहित ने मुझसे मेरी जाति पूँछी, मैंने बता दिए! लेकिन अगले ही पल मैंने सोचा मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, एक ऊँच-नीच जातीय मानसिकता वाले समाज में यह किसी और के लिए अपमानजनक हो सकता है। बाद में पत्नी ने भी इसी बात को लक्षित कर मुझसे कहा, "यहाँ तो जाति पूँछते हैं! मुझे खराब लगा।" दरअसल ऐसी ही होती है, अस्तित्ववादी सोच! इसे हम एक अलगाववादी सोच मानते हैं, इसे क्यों न हम एक जिहादी सोच मानें? खैर..

मैंने ओखा में हजारों नावें खड़ी हुई देखी! पहले तो किसी ने बताया ये मरम्मत वगैरह के लिए खड़ी हैं, लेकिन बाद में एक स्थानीय व्यक्ति ने जानकारी दिया कि ये मछुआरों की नावें हैं, मौसम और तेज चलती हवाओं के कारण सरकार ने इन्हें अभी समुद्र में उतारने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है, प्रतिबंध हटते ही यहां एक भी नावें नहीं दिखाई पड़ेंगी!

वाकई, उन नावों और समुद्र को देखते-देखते मेरे भीतर सागर, भवसागर, नाविक, पुरोहित, संप्रदाय, धार्मिक रीति-कुरीतियाँ और जर्जर नावों की छवियाँ आपस में घुलने-मिलने लगीं। मन में प्रश्न उठा, क्या इन धार्मिक नावों के खेवैयों को यह स्मरण है कि नावों की भी समय-समय पर मरम्मत करनी पड़ती है? विचार जब जीवंत रहते हैं तभी वे पार ले जाते हैं, लेकिन जब वे जड़ होकर केवल सम्प्रदाय और मजहबी आग्रह में बदल जाते हैं, तब वे धीरे-धीरे जीर्ण नावों जैसे हो जाते हैं। विडम्बना यह है कि भवसागर से पार होने की आशा में हम आज भी उन्हीं पुरानी, मरम्मत-विहीन नावों पर चढ़े चले जा रहे हैं।

मैं इन नावों के नाविकों से कहता हूं कि- भ‌इया! अपनी-अपनी नावों के रंग-रोगन का ही नहीं, इनके आधुनिकीकरण के बारे में भी सोचिए! खैर।

आइए, अब इन बेफालतू की उलझी हुई बातों से ध्यान हटाकर काठियावाड़ की ओर लौटें। सुबह सोमनाथ के रास्ते पर चलते हुए जगह-जगह दूर तक फैले पवन-ऊर्जा के ऊँचे टावर दिखाई पड़ रहे थे। रास्ते में एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि यहाँ पिछले पाँच वर्षों से ढंग की बारिश नहीं हुई है। फिर भी लोगों के चेहरों को देखकर लगा कि जीवन की जिजीविषा अब भी सूखी नहीं है। कठिन परिस्थितियों में भी यह उन्हें जीने की राह सुझा रही है।

#चलते_चलते

        अपनी जिजीविषा के साथ प्रसन्न चित्त रहिए! यह किसी पंथ,संप्रदाय या मज़हब के ताने-बाने का मोहताज नहीं। खराब मौसम में तो नावें भी खड़ी हो जाती हैं! लेकिन जिजीविषा ही है जो आपको तैरना सिखा जाती है।

#सुबहचर्या

(१९.७.१९)

मंगलवार, 2 जून 2026

एक अबूझ-सी सुबह!

आजकल यूं ही आलसपन घेरे रहता है। जब आदमी को करने को कुछ नहीं सूझता तो ऐसा ही होता है। पांच के आसपास जागा। कुछ देर तो इसी उधेड़बुन में बीता कि टहलने जाएं या नहीं.. खैर.. निकल लिए। 

यह अलसायी-सी सुबह जैसे मौन थी.. वही सड़क.. वही सुबह.. वैसे ही इक्का-दुक्का आने-जाने वाले लोग और वाहन… और वैसे ही सड़क पर पड़ते मेरे कदम.. रोजमर्रा के वही दृश्य। 

फिर भी मन को यह सब अबूझ-सा लग रहा था। इसमें कोई कहानी नजर नहीं आ रही थी।
     
रोज आते-आते यह सुबह जैसे थक चली हो! बस मजबूरी है उसका आना और गुजर जाना। 
      
हाँ समय या काल,जो कुछ भी हो! केवल दिखाई पड़ने वाली चीजों का गुजर जाना भर है!! हमारा देखना बंद हो जाना, हमारा भी गुजर जाना है.. शायद समय इसी को कहते हैं।
        
सामने निगाह पड़ी..एक सांड़ आ रहा था… पहले तो मैंने इसे जानवर समझा। इससे बचने की कोशिश भी किया। लेकिन सांड़ ने स्वयं ही रास्ता बदल लिया… वैसे जो हिंसक हो उसे ही जानवर मानना चाहिए! 
      
अब तो ‘जानवर’ की परिभाषा बदले जाने की जरूरत है। अकारण ही किसी भी जीव को ‘जानवर’ कह देना अनुचित और आपत्तिजनक है। फिर तो इंसान भी जानवर है!! 
      
सोच रहा हूं.. अगर सांड़ मन-वाला हुआ तो जरूर.. मुझे भी जानवर ही समझा होगा.. तभी तो रास्ता बदल लिया। हाँ किसी को जानवर समझ लेना मनुष्य की ही बपौती नहीं है। 
       
लेकिन क्या पता हम दोनों ही एक दूसरे को समझने में गलत हों? वैसे हम अपने “समझने” को भी समझ पाते हैं या नहीं, अकसर हमें यह नहीं पता होता।
         
कहते हैं, प्रेम की भाषा मूक होती है, इतनी सहज कि उसे एक शिशु भी बिना शब्दों के समझ लेता है। 
      
लेकिन जब वही भाषा समझ में आनी बंद हो जाए, तो मान लेना चाहिए कि वह शिशु अब बड़ा हो चुका है। 
     
शायद इसीलिए तो, बड़े लोग प्रेम को बार-बार शब्दों, संकेतों और व्यवहारों के माध्यम से जताते और समझते हैं। क्योंकि उनके के लिए अब ‘प्रेम’ एक निष्कलुष भावना नहीं, बल्कि ‘व्यवहार’ में बदल चुका होता है। 
          
खैर, चीजें यूं ही गुजर जाती है, अपने समय-भर हम इसे समझते रह जाते हैं..
        
चलते-चलते ध्यान आया, 'मदर्स डे’ पर ऑफिस की सीढ़ियों के कोने में एक मरणासन्न टाइप की कृशकाय वृद्धा दिखाई पड़ी थी। पता चला उसका एक पुत्र है, वह ड्राईवरी करता है और शराब पीता है। 
     
लोग उस वृद्धा पर दया दिखाते हैं उसका वह पुत्र उस दया में से अपने लिए भी कुछ झटक लेता है। 
     
मुझे समझ में नहीं आता ऐसे ‘डे’ क्यों बनाए गए हैं? कुछ बात होगी इसे ‘बनाने वालों” के लिए। 
       
खैर लौटकर आया, अपने लिए ग्रीन टी बनाया। पहले मैं ग्रीन टी पीने वालों की खिल्ली उड़ाता था।

चलते_चलते
      
किसी चीज को कुछ नाम देना यह हमारा शगल है, शब्दों को मायाजाल में नहीं बांधना चाहिए, शब्द निरीह होते हैं। वैसे मौन भी एक भाषा ही है।

#सुबहचर्या
  17.5.19