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रविवार, 12 अप्रैल 2026

नमस्ते

                                 1

         सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर ढक्कन सीमेंट से जाम था। पिछले दस मिनट से वह छेनी और हथौड़े की मदद से इसे मेनहोल से हटाने में जुटा था। ढक्कन के कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे छेनी टिकाता और इसपर हथौड़े से चोट मारता। लेकिन ढक्कन था कि टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा‌ था। पास में खड़ा ठेकेदार रमेसर चुपचाप उसके काम की निगरानी कर रहा था। 

          अचानक रमेसर के 'इस किनारे छेनी लगाओ’ कहने पर उसने दरार पर छेनी टिकाकर एक जोरदार हथौड़ा चला दिया। 

          छेनी छिटककर दूर दूब वाली घास में जा गिरी, इस झटके में उसकी कमीज की जेब से दो सिक्के भी घास में जा गिरे। 

           छेनीवाले को झुककर घास टटोलते देख उन्होंने पूछा, 'छेनी नहीं मिल रही क्या?' लेकिन उसकी बजाय रमेसर बोला उठा, “छेनी तो बड़ी चीज है वह मिल गई है, ये अपना सिक्का खोज रहे हैं।” 

         रमेसर के दो साथी भी चुपचाप खड़े यह देख रहे थे, उसकी मदद के लिए आगे नहीं आए। उनकी ओर देखकर ‘वे’ ने कहा, “इसके मेहनत के सिक्के होंगे, खोजना ही चाहिए।"

        सिक्के मिलते ही छेनीवाला काम में जुट गया। रमेसर ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा, ‘बड़का दिमाग है इसके पास।’ इस मुस्कान में कुछ ऐसा था कि ‘वे’ को लगा, यह ‘बड़का दिमाग’ रमेसर के लिए मुफीद तो है ही, स्वयं छेनीवाले के लिए भी है। उनकी नजरें छेनीवाले पर गड़ गई।

         मोटे कपड़े का मटमैली कमीज, ऊपर धूसर-सी फटी सदरी, ढीली-ढाली पैंट, जैसे इन कपड़ों ने महीनों से पानी न देखा हो। पैरों में चप्पल नहीं, सिर पर घने उलझे बाल, जिन्हें शायद ही कभी कंघी ने छुआ हो। 

          लेकिन काम में उसकी तल्लीनता देख ‘वे’ उसके इस हुलिए से उसके मिजाज का अंदाजा नहीं लगा सके। रमेसर से कुछ पूछने को हुए, लेकिन वह भी छेनीवाले के काम पर ध्यान लगाए था।  

          छेनी पर पड़ते हथौड़े की चोट से ढक्कन हिल उठता। इसे ढीला हुआ सोचकर, रमेसर ट्रैक्टर के टूल बॉक्स से रम्मा निकाल लाया। लेकिन इसका एक सिरा अभी भी मेनहोल से जाम था। उसने इस सिरे पर और छेनी चलाने के लिए कहा।

         कुछ देर बाद ढक्कन चारों ओर से ढीला पड़ता दिखा, तो रमेसर ने छेनी रुकवा दी। फिर रम्मा अड़ाकर ढक्कन का एक सिरा उठाया और छेनीवाले से बोला, “अब इसे मेनहोल से हटा दो।” 

          ‘वे’ को अचरज हुआ कि पास में ही खड़े अपने अन्य दो साथियों से रमेसर ने ढक्कन हटाने के लिए क्यों नहीं कहा! 

           आखिर छेनीवाले ने ही ढक्कन दूसरी ओर उलट दिया। पूरा मेनहोल खुल गया। इसमें झांककर रमेसर ने कहा,

         'अरे! कीचड़ तो कम है, पानी ज्यादा है।’

        "तो सेप्टिक-टैंक में जमा मल ही रमेसर की व्यावसायिक भाषा में 'कीचड़' है!" 'वे' के लिए यह न‌ई बात थी।

         उत्सुकतावश उन्होंने भी मेनहोल में झाँका, तली पर जमा मल सचमुच कीचड़ जैसा ही दिखाई पड़ा।

         इसी समय छेनीवाला टैंकर का सक्शन-पाइप मेनहोल की ओर खींचकर ले आ रहा था। जबकि दूसरा साथी वैक्यूम पंखा चलाने के लिए ट्रैक्टर स्टार्ट करने लगा।      

          रमेसर ने बढ़कर पाइप अपने हाथ में लेकर इसे सेप्टिक-टैंक में उतारा। उधर वैक्यूम फैन चालू होते ही पाइप से पानी सुड़कना शुरू हो गया। 

        अब तक सांझ भी स्याह हो चली थी। बल्ब की रोशनी में रमेसर का चेहरा साफ पढ़ा जा सकता था। वह मेनहोल पर झुका था। उसकी शांत और गंभीर मुखाकृति देखकर ‘वे’ ने सोचा -

          'चार लोगों की टीम में छेनीवाले के अलावा एक रमेसर ही है जिसने सक्शन-पाइप छुआ! वह टीम लीडर भी है, पाइप किसी को भी पकड़ा सकता है, पर हो सकता है दूसरे लोग इसे छूने से कतराते हों।

                             2

       इधर इस कीचड़ को देखते हुए रमेसर के सामने सेप्टिक-टैंक का मेनहोल नहीं, जैसे स्मृतियों की सुरंग खुल गई हो! 

         "दद्दा की बाल्टी में यह ‘कीचड़’ कुछ और ही रंग में होता। वे रोज़ सुबह नौ बजे बाल्टी, झाड़ू और टिन लेकर ब्लॉक की कॉलोनी निकल पड़ते। एक दिन जिद करके मैं भी उनके साथ हो लिया। मेरा साथ चलना दद्दा को अखर रहा था; उन्होंने मुझे पुचकारकर रोकना भी चाहा, पर मैं नहीं माना। तब मेरी उम्र कोई चार–पाँच साल रही होगी।"

      ...उस दिन दद्दा पहले एक बड़े क्वार्टर के पीछे की ओर गए। वहां नींव के ऊपर दीवाल पर लोहे का एक ढक्कन लटक रहा था। दद्दा ने इसे उठाया। यहां आले जैसा एक चौकोर गड्ढा था। उसमें यही 'कीचड़' पीले रंग के ढेर में जमा था। 

          ....दद्दा ने मुड़े टिन से उस पीले मैले के ढेर को बाल्टी में भर लिया फिर आले को झाड़ू से साफ भी किया। यह मुझे बहुत अजीब लगा, लेकिन दद्दा एक-एक कर सभी क्वार्टरों पर जाते ग‌ए। धीरे-धीरे उनकी बाल्टी उसी पीले मैले से भर गई, जिसे दूर झाड़ियों में जाकर खाली कर आए थे।

           ....इस काम के दरमियान न दद्दा बोले, न मैंने कुछ पूछा; बस चुपचाप उन्हें यह काम करते देखता रहा। लेकिन बाल्टी खाली करके लौटे तो एक पल के लिए दद्दा ने मुझे घूरा। आज भी याद है, दद्दा की उन आँखों में जैसे नाराजगी थी। मुझे लेकर वे सीधे हैंडपंप पर आए। अपने सभी सामान धोए फिर नहाए और मुझे भी नहलाए। फिर मैं कभी दद्दा के साथ कॉलोनी की ओर नहीं गया।"

         इसके काफी दिन बाद मैंने दद्दा से कहा भी था, 

        “दद्दा मुझे घिन आती है, मत करो यह काम।” 

       “इसमें क्या घिनाना! यह तो हमारा कर है यही रोजी है” दद्दा ने यही बोलकर तब मुझे चुप करा दिया था।

            रोजी तो मैंने भी सीवर में कूदने वाला ही चुना था बल्कि इसके लिए सीवर के काले गंधाते पानी वाले नाले में झम्म से कूदा भी, जो नहीं कूदे वे सब ऊँच-नीच वाले थे… केवल मुझे ही यह नौकरी मिली जैसे कि इस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो!

          ख्यालों की डोर टूटी। “अब यही अपना काम..अपनी मशीन और अपना धंधा..“ इस भाव से रमेसर ने अपने ट्रैक्टर-टैंकर की ओर ऐसे देखा जैसे दद्दा की ‘रोजी’ से अपनी ‘रोजी’ की तुलना कर रहा हो! 

              ‘वे’ कुछ जाने-पहचाने लगे तो चालीस वर्ष पुरानी धुँधली-सी अपनी स्मृति में उतर गया-

         “तब ये घर कच्चे होते, दद्दा इन घरों में त्योहारी लेने आते। कभी-कभी उनके साथ मैं भी होता। शायद ‘वे’ को तभी देखा हो। आज यहां इनके बराबर खड़ा मैं इनसे सौदेबाजी कर रहा हूँ तो अपने इसी खुद के ‘रोजी’ के बल पर…!”

            अगर अम्मा जबर्दस्ती स्कूल न भेजतीं तो आज मैं यहां इस तरह खड़ा न होता। वह यही तो कहतीं थीं कि 'तुम्हारे दद्दा और पप्पा तो करिया अक्षर हैं, तभी वे मैला ढोते हैं, मुला तुम खूब पढ़ना।

            मेरा स्कूल और घर, एक ब्लॉक के कैंपस में था।

        बीडीओ ऑफिस के पीछे एक छोटी सी कोठरी ही मेरा घर था और वह भी जर्जर। उसके सामने टटिया खड़ी कर दद्दा ने घेर बना लिया था, इसी में उनकी झोपड़ी थी। जिसमें वे अपनी गैया के साथ रहते थे।

        त्योहारों की छुट्टियों में यहां सन्नाटा पसर जाता। तब मेरे भी घर चलने की जिद्द पर अम्मा कहतीं, यही हमारा घर है।      

        लेकिन कक्षा पांच में जाकर पता चला कि आजादी के बाद पहले यह विकास खंड बना, फिर स्कूल, तो मैं चौंक पड़ा था‌। 

           उस दिन कक्षा में पीछे, सबसे अलग-थलग बैठा मैं अचानक पंडी जी से पूछ बैठा था - 

           ‘तब मेरा घर भी यहाँ नहीं था न?’ 

        इस पर कक्षा में सब हँसे थे, जैसे कोई ऊल-जलूल बात कहा हो मैंने। पंडी जी भी मुझे घूरने लगे तो मैं सहम गया था। वे फिर यही बोले थे,

          “हाँ यहां नहीं था।”

         आज सोचता हूं, वह सवाल कैसे पूछ लिया था! तब हमारी जाति में जन्मे बच्चे परली बात सोच ही नहीं सकते थे! जो है, उसे ही सच मानकर जीना सिखा दिया जाता था। 

          घर को लेकर मन में उत्कंठा थी। स्कूल से लौटने के बाद दद्दा को देख मैं उनकी ओर लपका कि चलकर पूछूं। पर उनके हाथ में बाल्टी, झाड़ू और छोटा मुड़ा टिन देखकर ठिठक गया। 

        दद्दा यह काम सुबह ही निपटा लेते हैं, सोचकर चुपचाप लौटकर हैंडपंप के पास आ खड़ा हुआ। 

          दद्दा भी वहीं आए। सारा सामान नल के नीचे रख दिया। मैं हैंडपंप चलाने लगा। वे एक-एक करके उन्हें धोने लगे थे। मैंने उनके चेहरे पर बेचारगी भरी मायूसी देखा। वे किसी कारण सुबह यह काम नहीं कर पाए थे, इसके लिए साहब ने उन्हें तिरस्कृत कर डांटा था। 

          दद्दा ने ही बताया था कि वे तब तेरह-चौदह साल के थे जब अपने बप्पा बद्दन के साथ सीमा पार करके आए थे। वहाँ उन्हें नाली-सीवर से छुटकारा नहीं मिला, उल्टे रस्मोरिवाज निभाना भी मुश्किल था। लेकिन यहां भी वही काम उनका इंतजार कर रहा था।

           चार बरस दिल्ली में रहने के बाद यह ब्लाक बना तो यहां आ ग‌ए।

           फिर दद्दा ने कोठरी की ओर इशारा करके इतना कहा था - 

              'तबसे यही हमारा घर है।’

           टैंक से उठती 'सुड़-सुड़' की आवाज ने ख्यालों की परत हटा दिया। रमेसर ने देखा, टैंक में पाइप के मुहाने के नीचे पानी उतर रहा है।

       रमेसर ने ‘वे’ को मेनहोल में झाँकने का इशारा करते हुए बोला, “टैंक में पानी चार फीट उतर चुका है। एक टैंकर फुल हो गया दूसरा चक्कर भी होगा..दो टैंकर सीवर था इसमें।” विश्वास दिलाने के लिए 'वे' को टैंकर का पारदर्शी संकेतक भी दिखाया।  

            इशारा पाकर छेनीवाले ने टैंकर का नोजल बंद किया और रमेसर ने सेप्टिक-टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाला। वह टैंकर खाली करने पास के खेत की ओर बढ़ा ही था कि 'वे' ने टोक दिया कि "इसमें मत गिराना, खेत मालिक नाराज होंगे।" 

         यहीं रमेसर को बचपन की वह बात याद आई, जब दद्दा से उसने पूछा था, 

         “दद्दा, वहाँ तो सब लड़िकन खेलने जाते हैं…बाल्टी वहाँ क्यों खाली किए? जानते हैं, हमारी गेंद भी वहीं चली गई थी, विज्जू गेंद लेने गया तो उसका पैर छपाक से उसी में पड़ गया, इसे वहाँ न डाला करिए‌।”  

           वे पल भर ठहरकर बोले थे -

         “बचवा, कहां गिराऊँ? यहाँ तो कोई जगह भी नहीं। एक बार उस खेत के कोने में बाल्टी उलट दी थी तो खेत-मालिक ने जी भर के गरियाया था।" 

           यह सुनते ही मेरा रोयां-रोयां सुलग उठा था.. फिर उनकी ओर देखा था। 

          उनके बूढ़ाते शरीर पर पीढ़ियों की बेइज्जती का बोझ साफ झलकता था। जैसे उनका मन हर बात से उचट गया हो, उन्हें देखकर लगा जैसे वे कहना चाह रहे थे - "जिंदगी ने सब सहना सिखा दिया है।"

          इसे याद करते ही रमेसर की मुट्ठियां भिंच ग‌ईं। मन में गुस्से से भरी एक टीस उभरी..

        "हूँ... खेत मालिक नाराज होंगे!" बुदबुदाकर मन में उठे गुस्से को जज्ब किया। फिर कठोर स्वर में यह बोलकर कि - 'खेत के लिए यह खाद ही तो होता' टैंकर लेकर अँधेरे में दूसरी दिशा में बढ़ गया।

                              3      

       सीवर गिराकर टैंकर लौटा तो इसके नोजल में छेनीवाले ने सक्शन-पाइप फिर जोड़ दिया। रमेसर ने पाइप को हाथ में लेकर मेनहोल में झाँका। बल्ब की रोशनी उसमें नहीं पहुँच रही थी। फिर मोबाइल फोन का टार्च ऑन करके देखा। भीतर 'सीवर' का गाढ़ापन उभर आया।

        ऐसे ही गाढ़े सीवर में पप्पा बेहिचक उतर जाया करते थे! यह स्मरण होते ही रमेसर की आँखें सजल हो आईं।      

         सक्शन-पाइप हाथ में लेते ही भीतर कहीं कुछ चुभ उठता है, पप्पा सामने आ खड़े होते हैं! 

        फ़िर वह पाइप तब तक नहीं छोड़ता, जब-तक ‘कीचड़’ पूरी तरह बाहर न आ जाए। 

         उस क्षण पाइप पर हाथ की पकड़ और भी कस उठती है- मानो वह पप्पा की अधूरी लड़ाई पूरी कर रहा हो।

         उस जमाने में यह मशीन नहीं थी। वे खुद सेप्टिक टैंक में उतरते। यह गाढ़ा ‘कीचड़’ बाल्टियों में भर-भरकर बाहर निकालते। उनका पूरा शरीर उस कीचड़ में लथपथ हो जाता।

          पप्पा यह नौकरी नहीं करना चाहते थे, पर दद्दा इसे पुश्तैनी काम मानते। इससे पप्पा चिढ़ते, बेचैन हो उठते और घुटते। शहर में दिहाड़ी की तलाश में निकल जाते, पर वहां भी न टिकते; वापस आकर घर पर ही चुपचाप पड़े रहते। 

           एक बार अम्मा से पप्पा को कहते सुना था - 

         “क्या कीचड़ में लिथड़ी इस पुश्तैनी जाति को उतारकर हम फेंक नहीं सकते?” 

          पप्पा के इस बात का अर्थ मुझे बाद में समझ में आया कि जाति आदमी का भविष्य भी लिख देती है! वे मजदूर भी नहीं बन पा रहे थे। पुश्तैनी पेशा आड़े आ जाता।

           एक दिन दद्दा गाँव से त्योहारी लेकर लौटे थे। उनकी गठरी में ढेर सारी पूरियां-कचौरियां और खाने की चीजें देखकर पप्पा गुस्से में बोले थे - 

       'यह भिखमंग‌ई ठीक नहीं बाबा, इससे अच्छा तो फिर मैला ढोने का काम है.. कम से कम इसमें कुछ करके तो कमाना है।' 

        मैंने देखा था… दद्दा गाँव के ‘बड़े’ घरों की देहरी पर बारी-बारी जाकर खड़े होते; भीतर से कोई निकलता और दूरी बनाकर उनकी चादर में ऊपर से ही त्योहारी डाल देता। लोग उनकी चादर छूने से भी कतराते।

          पप्पा की बात पर दद्दा ने ऐतराज नहीं जताया। लेकिन बोले थे -

         “देख दिन्ने, यह भिखमंगाई नहीं, इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना होता है। यदि दिखाई न पड़ूं तो लोग पूँछने लगते हैं.. दिन्ने! एक बात और! गाँव के लोग शादी-ब्याह पर मुझे नेग-चार देना नहीं भूलते!” 

       दद्दा और पप्पा, दोनों की बातें दो छोर की होती। इनके बीच मैं एक अजीब द्वन्द्व में फंस जाता।

        एक दिन निठल्लेपन से ऊबकर पप्पा स्वीपर बनने शहर चले ग‌ए। एक सफाई ठेकेदार ने उन्हें अपनी टीम में रख लिया।”

           सीवर में उतरने का अपना अनुभव पप्पा कुछ ऐसा ही अम्मा को बताते - 

          “जब सीवर में घुसता हूँ तो तिलचट्टों से घिर जाता हूँ ये मेरे शरीर पर दौड़ने लगते हैं!” 

            शायद स्वप्न में भी ये तिलचट्टे उन्हें अपने शरीर पर रेंगते दिखाई पड़ते इसीलिए कभी-कभी रात में सोते से अचानक उठकर वे अपना शरीर झाड़ने लगते!! 

           यही नहीं वे बार-बार अपना हाथ धोते, टोकने पर अम्मा से कहते - 

           “क्या करूँ..मेरे हाथों में जैसे मैले की बदबू आती रहती है, इसीलिए बार-बार हाथ धोना पड़ता है!”

        उन दिनों डाक्टर ने उन्हें सीवर में उतरने से मना किया था। लेकिन “आज एक बड़े सेप्टिक टैंक की सफाई होना है, न जाने पर ठेकेदार नाराज होगा” कहकर वे सुबह-सुबह शहर चले ग‌ए थे। 

          उस दिन पप्पा नहीं, उनका शरीर लौटकर घर आया। मैं स्कूल से लौट रहा था। घेर के सामने कुछ लोग खड़े थे। सबके चेहरों पर एक अजीब-सी खामोशी थी। मुझे अनहोनी की आशंका हुई। घबड़ाहट में भागते हुए मैं घेर में पहुँचा। वहां पप्पा जमीन पर लेटे थे और अम्मा उनके सिरहाने बैठी थीं..

          कुछ समझता कि दद्दा ने मुझे कसकर अपने अँकवार में भर लिया, उनकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। उधर अम्मा की रुलाई फूट पड़ी थी।

         कहते हैं कि सेप्टिक-टैंक में उतरते ही पप्पा बेहोश हो ग‌ए थे। कुछ देर बाद जब अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो उन्हें देखने एक साथी उतरा.. वे भी वहीं बेहोश हो ग‌ए। 

        ऊपर खड़े लोग शोर मचाते रहे.. लेकिन ठेकेदार वहां से खिसक लिया था। 

       जैसे-तैसे दोनों को बाहर निकालकर अस्पताल ले जाया गया। 

          पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

         दद्दा और अम्मा थाना-कचहरी खूब दौड़े… पर न मुआवजा मिला, न किसी पर दोष आया।

       ....घेर का दृश्य देख मैं जड़वत खड़ा रह गया। अम्मा का रोना और दद्दा के आँसू, सब देखता रहा। पप्पा के पहने हुए कपड़े सीवर के कीचड़ में सने उनके निर्जीव शरीर से अब भी चिपके थे। मेरी आँखें डबडबा आईं, पर मैंने उन्हें बाँह से पोंछ लिया। रोया नहीं।

                               4

          इस गाढ़े कीचड़ का सुड़कना अब मुश्किल है, सोचकर उसने ‘वे’ से एक बाँस मंगाया।

         रमेसर ने बाँस हाथ में लिया। उसने छेनीवाले को पंप चालू करने का इशारा किया और पाइप मेनहोल पर टिका दिया। पंप चालू होते ही पानी टैंक में गिरने लगा। 

          रमेसर ने बांस से टैंक के भीतर जमे हुए गाढ़े कीचड़ को हिलाना शुरू कर दिया। ताकि पानी में घुलकर यह आसानी से खिंच सके।

         तभी सक्शन-पाइप के मुहाने के पास कपड़ेनुमा कोई चीज दिखाई पड़ी। वह पाइप में न फँसे, इसलिए रमेसर ने उसे बाँस से दूर हटा दिया। छेनीवाले ने उसके हाथ से बाँस ले लिया और उसके सहारे उस कपड़े को बाहर निकाल दिया। 

         छेनीवाले के हाथ और पैर सीवर की कीचड़ में सने थे। यह देखकर ‘वे’ ने रमेसर से कहा, “यह छेनीवाला तो बहुत कामकाजी है?

       कुछ पल सोचने के बाद स्थिर और संयत आवाज में रमेसर बोला, 

          यह काम और जाति, एक ही रस्सी में बँधे हैं। शुरू में ट्रैक्टर चलाने के लिए कोई ड्राइवर तक न मिलता। एक लड़का मिला भी, पर पाइप न छूने की शर्त पर!

          ऐसे में, पाइप को जोड़ने से लेकर सेप्टिक-टैंक में उतारने और काम के बाद उसे धो-पोंछकर समेटने तक, सारा काम मुझे ही करना पड़ता। 

           फिर वह छेनीवाले की ओर देखकर मुस्कुराते हुए बोला-

           "यदि यह न मिलाता तो सेप्टिक टैंक सफाई वाला मेरा यह धंधा परवान न चढ़ता… पहली नजर में तो मुझे यह पागल ही लगा था। 

         गाँव की बस्ती से दूर सीवान में एक कमरे की, झोपड़ीनुमा इसकी कोठरी देख, मैंने केवल यही पूँछा था इससे- 

            "यहाँ बस्ती से दूर अकेले में घर क्यों बनाया?" 

             यह छूटते ही बोला था - 

         “मेरी कोई जाति नहीं इसलिए... और खुशी-खुशी मेरे साथ काम करने के लिए तैयार हो गया था।

         पहले ही दिन छेनी-हथौड़ी पकड़ाकर इससे मेनहोल का ढक्कन खुलवाया। बिना झिझके इसने वे सारे काम किए जिसे आज यहाँ कर रहा है। 

          काम समाप्त करके हम लोग चलने को हुए तो इसने बख्शीश मांगा। तभी इसके बड़के दिमाग के बारे में मुझे पता चला। बख्शीश मांगने वाली बात कभी मेरे मन में आया ही नहीं। पैसे की बात पर यह बहुत चैतन्य हो जाता है। उसी दिन से यह 'छेनीवाला' बन गया। 

            बात पूरी होते ही रमेसर ने 'वे' से कहा - 

        "यह छेनीवाला न, आदमी होकर भी आदमी के बीच का आदमी नहीं है, इसीलिए इसे आदमियों की बस्ती से दूर घर बनाकर रहना पड़ता है!" 

                                       5     

         रमेसर के मुँह से छेनीवाले के लिए गूढ़ बात सुनकर ‘वे’ उसे गौर से देखने लगे, जैसे उसके जीवन की कहानी जानना चाहते हों-

           वही बिखरे बाल और ढीले-ढाले कपड़े… चेहरे पर एक अजीब-सी निस्पृहता…!  

          अचानक रमेसर बोला, 

          “मैं इसकी दुखती रग को ज्यादा कुरेदता तो नहीं हूं.. पर लोगों से सुनी-सुनाई बात है…”

        पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटा था.. माँ-बाप के अतिशय लाड़-प्यार के तरीके ने इसे बिगाड़ दिया.. स्कूल-उस्कूल का मुँह नहीं देखा। दिमाग का खुलना बाकी रह गया…

          छेनीवाला बाँस हिला-हिलाकर सेप्टिक-टैंक में कीचड़ घोलने में जुटा था। उसकी ओर देखकर रमेसर ने फिर कहा, 

        “लोग ‘बऊक’ समझकर इसकी हँसी उड़ाते; विवाह भी न हो सका। माँ-बाप भी दुनियां से कूच कर गए.. फिर अपने ही घर में पराया हो गया.. उपेक्षित-सा.. भाइयों ने इसके हिस्से की जमीन भी अपने नाम करा लिया।”

         तभी टैंक से सर्र-सर्र की आवाज आई। छेनीवाले ने बाँस एक ओर रखा और पाइप का मुहाना तली तक ले जाकर उसे इधर-उधर चलाने लगा। रमेसर भी उसके पास चला आया। 

        अब दोनों बारी-बारी एक-दूसरे से पाइप अपने हाथ में लेते और टैंक में बचा-खुचा सीवर सुड़कवाने लगे!

          ‘वे’ ने देखा,

        छेनीवाला बिना झिझक पाइप के कीचड़ से सने हिस्से पर हाथ लगा देता; वहीं रमेसर इसे ऊपर से ही पकड़ता, मानो कीचड़ से बचना चाहता हो। फिर भी दोनों का तालमेल ऐसा था, जैसे एक ही देह के दो हाथ हों। 

          रमेसर ने छेनीवाले को कुछ समझाकर पाइप उसके हाथ में थमाया और फिर 'वे' की ओर मुखातिब हुआ -  

            “फिर एक दिन यह कहीं चला गया.. किसी ने कोई खोज-खबर नहीं ली… और जब वर्षों बाद लौटा तो एक कूबड़ वाली स्त्री को साथ लेकर…”

          इस बातचीत के बीच छेनीवाला टैंक से पाइप बाहर करता दिखाई पड़ा। लेकिन वह अपने काम में ऐसे मगन था जैसे उसकी नहीं, किसी और की बात चल रही हो..

          ..अपने ही घर के दरवाजे नहीं खुले इसके लिए.. लोग हँसते..क‌ई दिन गाँव में भटका… जाति निकाला दे दिया इसको.. गाँव के बाहर जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा मिला.. जिसमें कोठरी बनाया.. उस स्त्री के साथ वहां रहने लगा….

            थोड़ी देर की चुप्पी के बाद रमेसर ही बोला,

         “लेकिन जैसा इसे देख रहे हैं न, यही बात इसके लिए ढाल बन गया.. इसे टूटने नहीं दिया… अच्छा ही है कि यह आदमियों की बस्ती में नहीं रहता।" 

             यह कहकर रमेसर अचानक चुप हो गया। ‘वे’ कहीं छेनीवाले की जाति न पूछ बैठें, इस आशंका में बात को मोड़ते हुए बोला, 

          "बात यह बस्ती में रहता तो आदमियों के बहकावे में आ जाता...सौदेबाजी सीख जाता।" 

      उधर छेनीवाला टैंक से पाइप खींचकर बाहर निकाल चुका था। इसे एक किनारे रखकर धो रहा था।

        'वे' ने मेनहोल में झुककर देखा, गाढ़ा कीचड़ पानी में घुलकर लगभग खिंच चुका था; तली में बचा पानी पाइप की पकड़ में अब नहीं आने वाला था। 

        फिर उनका ध्यान रमेसर के दोनों साथियों पर गया, 

         दोनों पूरे समय वहीं मौजूद रहे, लेकिन न तो उन्होंने पाइप को हाथ लगाया, न ही इसे धोने में छेनीवाले की मदद की। 

           उनके मन में प्रश्न उभरा,

         यहां काम की या फिर जाति की, क्या कोई एक अदृश्य रेखा है जो उन्हें एक-दूसरे से अलग किए हुए है? 

        उनकी नजरें रमेसर पर ठहर गई- मानो इन बातों का मर्म टटोल रही हों।  

         उधर छेनीवाले पर बात थम गई थी। रमेसर मन ही मन बुदबुदाया -

       “यह कितना अजीब है..छेनीवाले की जाति जानकर लोग उसके साथ सहज हो जाते हैं और एक हम हैं, हमारे लिए वही पुराना भाव, चाहे यह दबा हुआ ही हो, पर उभर तो आता ही है…हाँ…पप्पा! उस जमाने में कितना झेले होंगे….”  

                              6

             अचानक रमेसर ने ‘वे’ को एक तरफ चलने के लिए कहा। वह उन्हें एक अँधेरे कोने में ले गया। वहां जमीन की ओर इशारा करके उन्हें कुछ दिखाते हुए वह धीरे से बोला, 

         देखिए, इसे मैंने यहाँ एक किनारे रखवा दिया है। सोचा, आपको बता दूँ, नहीं तो अनजाने में कोई इसे हाथ लगा देता। सुबह किसी से कहकर इसे फिंकवा दीजिएगा।”

           ‘अरे! यह तो वही कपड़ा है...सेप्टिक-टैक से निकला, सीवर में लिथड़ा हुआ...तो इसे यहाँ रखवाया था रमेसर ने! छेनीवाले से इसे कहीं दूर भी तो फेंकवा सकता था!’ 

             उस कपड़े को लेकर रमेसर का यह वर्ताव ‘वे’ को कुछ विचित्र लगा। वे उस कपड़े को देखते हुए मौन रहे।

          रमेसर ने ‘वे’ को नजर भर देखा! वे अपने विचार में खोए हुए-से उसी कपड़े को देख रहे थे।  

        वह पोर्टिको की ओर चला गया जहां बाबू जी कुर्सी पर बैठे थे। उनसे काम का हिसाब किया। छेनीवाला भी अपने हाथ-पैर धोकर वहीं आया। उसे बख्शीश लेना था। यह उसे मिला, जो उसकी अपेक्षा से ज्यादा था। इससे रमेसर और वह, दोनों खुश हो ग‌ए थे।

        यकायक रमेसर ने छेनीवाले को सीवर में लिथड़े उस कपड़े को फेंक आने के लिए कहा। शायद यह प्रतिमूल्य था अतिरिक्त बक्शीश मिलने का और इसमें रमेसर की खुद्दारी भी छिपी थी। 

         ‘वे’ समझ चुके थे कि छेनीवाले के लिए रमेसर ने ‘बड़का दिमाग’ वाली बात यूँ ही नहीं कहा था। यह उस भाव की पहचान थी, जहाँ आदमी अपने मूल्य को जानता है। 

           और वह केवल अपना ही नहीं, उसके हिस्से की गरिमा की भी रक्षा कर रहा था। अन्यथा, उस सीवर में लिथड़े कपड़े को वह पहले भी उससे फिंकवा सकता था। लेकिन तब रमेसर का ठहर जाना उस अदृश्य हीनता के विरुद्ध एक छोटा-सा प्रतिरोध था, जो खुलकर नहीं… भीतर ही भीतर लड़ा जाता है। इसमें बदला नहीं बदलाव की बात थी।


       रमेसर काम समेटकर जाने को हुआ तो अचानक मुड़कर नमस्ते कर गया। ‘वे’ ने भी प्रत्युत्तर में नमस्ते कहा, पर उनके भीतर वही कपड़ा अब भी कहीं अटका हुआ था।

        अँधेरे में, ज़मीन पर पड़ा वह कपड़ा अब उन्हें मात्र एक परित्यक्त वस्तु नहीं लगा..वह जैसे एक अनकहा विचार बनकर उनकी आंखों में ठहर चुका था।

                                *******             

        

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