शीशे के पार से नाई की दुकान में झांका। दो कुर्सियों पर दो लोग बैठे थे। शायद दोनों गपशप में मशगूल थे। उधर बेंच पर कोई अन्य व्यक्ति नहीं दिखाई पड़ा। इससे तसल्ली हुई कि समय बचा, नंबर नहीं लगाना पड़ेगा। दुकान में दाखिल हो रहा था कि ‘नमस्ते साहब’ सुनाई दिया। यह सोचकर कि इस दुकान का मालिक जो स्वयं एक कुर्सी संभालता है, उसने मुझे नमस्कार किया है, मैंने भी प्रतिउत्तर में तुरंत उसे ‘नमस्कार’ बोला और फिर उसकी ओर देखा। लेकिन यह मालिक-नाई नहीं था। फिर भी इसका चेहरा खूब जाना-पहचाना लगा। मैं दूकान के अंदर आया। दूसरी कुर्सी पर बैठा नाई उठ खड़ा हुआ। उसने कटिंग के लिए मुझे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। कुर्सी पर बैठने के बाद मैंने नमस्कार करने वाले व्यक्ति के चेहरे को ध्यान से देखकर अपनी यादों को खंगालने लगा कि आखिर यह शख्स कौन है जो मुझे जानता है। तभी अचानक उसने मुझसे कहा, “साहब, जबसे मैं देख रहा हूँ आप बाहर-ही-बाहर नौकरी कर रहे हैं कभी आप लखनऊ नहीं आए।” मैं कुछ बोला नहीं लेकिन मन ही मन उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था। उसने फिर कहा, “साहब, एक फार्म भर कर दे दीजिए जहां चाहें वहां मैं आपका ट्रांसफर करवा दुंगा।” उसकी बात पर मैं मुस्कुराया। यह सोचकर कि यह व्यक्ति मेरा इतना हितैषी है अपने पूरे मन-मस्तिष्क को उसे पहचानने पर लगाकर मैंने उससे कहा, “यह नौकरी है जब तक इसमें हम हैं क्या दूर क्या पास।” उसने नाई से मेरा मकान नंबर बोलकर बताया कि मेरा घर यहाँ है। उसकी इस आवाज ने जैसे मुझे जगा दिया हो! अचानक मुझे याद आ गया कि यह तो मेरा अख़बार वाला है, जो सुबह घर पर अखबार फेंक कर जाता है। दरअसल मेरी एक कमजोरी है, किसी चेहरे को तत्काल ‘रिकग्नाइज’ न कर पाना। इसमें कभी-कभी मुझे कुछ क्षण लग जाता है। दूसरे, वह इस नाई की दुकान पर मिलेगा इसकी मुझे कल्पना नहीं थी, इसलिए भी उसे पहचानने में मुझसे देरी हुई। यह व्यक्ति पिछले 19 वर्षों से मेरे घर पर अखबार देता आ रहा है। गाहे-बगाहे इससे मुलाकात हो जाती है। लेकिन इन बीस वर्षों में भी इस व्यक्ति में कोई खास बदलाव मुझे नहीं दिखाई पड़ा। नाई से बतियाते हुए वह मेरे घर के आस-पास के घरों का परिचय देने लगा।
नाई मेरे बालों की कटिंग शुरू कर चुका था। इस बीच उन दोनों को आपस में घुल-मिलकर बातें करते देख मैंने नाई से उसके गांव के बारे में पूँछ लिया। उसका घर लखनऊ और अमेठी जिले की सीमा पर स्थित किसी गाँव में था। उसने कहा कि बच्चों की पढ़ाई के लिए वह शहर आ गया है क्योंकि शहर में बच्चों के पढ़ाई की सुविधा है। यहाँ वह पचास प्रतिशत प्रति कटिंग मालिक को देता है। जबकि गाँव में उसकी खुद की दुकान थी। बीस वर्षों तक उसने यह दुकान चलाया था, बल्कि उस दुकान में उसका भाई भी काम करता था। लेकिन गाँव में यह दुकानदारी उसे रास नहीं आई। गाँव में किसी एक बिरादरी का बोलबाला था जबकि वहाँ पर उसकी बिरादरी के मात्र दस प्रतिशत घर थे। उसकी दुकान पर लोग कटिंग या दाढ़ी बनवाने के बाद उधारी करके चले जाते थे। धीरे-धीरे यह उधारी एक लाख रुपए से अधिक की हो चुकी थी। मैंने उससे पूँछा, यह उधारी क्यों मान जाते थे? उसका कहना कि क्या करें, लोग पहले दाढ़ी-बाल बनवाते और पैसा मांगने पर कह देते खेत से सीधे चले आए हैं, पर्स पैंट में छूट गया है या पर्स उस वाले पैंट में रह गया या भूल गए, बाद में पैसा दे देंगे। गाँव का मामला होता तो पैसा लेने के लिए जोर भी न दे पाते। फिर नाई ने कहा ऐसा व्यवहार और उधारी कब तक चलता, दिन भर की मेहनत उधारी में चली जाती थी। इसलिए भी मैंने शहर का रुख कर लिया।
उसकी बात सुनकर जब मैं अफसोस जताने लगा तो उसने कहा,
"ऐसी बात मेरे ही साथ नहीं थी। वहाँ कई अन्य नाई की दुकानें और भी थी जो बेचारे उधारी पर दुकान चलाते थे। एक दुकानदार बेचारा ऐसा था कि उसके दुकान पर यह उधारी डेढ़ लाख रुपए तक पहुँच गई थी। इस उधारी को उसने एक कापी पर लिख रखा था, एक दिन मैंने उसे वह कापी जलाते हुए देखा। ऐसा करने से उसे रोकते हुए मैंने उससे पूँछा कि इसे क्यों जला रहे हो, इससे तो तुम्हारा पैसा डूब जाएगा…तो वह कहने लगा, नहीं इस उधारी की कापी को जला देना ही मेरे लिए ठीक है, क्योंकि इसे देखकर मेरा टेंशन बढ़ता है।”
कटिंग पूरी हुई मैंने पैसे दिए और घर की ओर पैदल चल पड़ा। मुझे गाँव की इस तस्वीर में एक स्याहपन नजर आया। इस देश के गाँव भारत को विकसित बनाने के लिए अभी तैयार नहीं हैं, अभी बहुत कुछ बदला जाना बाकी है।
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