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रविवार, 26 जुलाई 2015

छतरी के नीचे बैठे लोग

    वह सुबह थाने पहुँचा तो उसे कुछ पुलिसवाले छतरी के नीचे बैठे आराम करते दिखाई पड़े। वह अपनी तहरीर लेकर सीधे उनके पास गया। उनमें से एक ने बेरुखी से उसे मुंशी के कक्ष में जाने का इशारा किया।

     घसीटू थाने के फर्श पर ही ऊँकडू-मुकडू बैठा था। उसकी जेब में अब एक भी पैसा नहीं बचा था। किसी तरह सौ रुपये का इंतज़ाम करके वह घर से निकला था। उनमें से आधा तो तहरीर टाइप कराने में खर्च हो गए और बचे रुपये थाने के मुंशी को दही-जलेबी खिलाने में। लेकिन उसकी तहरीर अब भी मुंशी के मेज पर वैसे ही अनसुनी पड़ी है।

     उसे यह डर सता रहा था कि कहीं मुंशी फिर दही-जलेबी लाने के लिए न कह दे। उसकी झुँझलाहट मन ही मन दही-जलेबी वाले दुकानदार पर उतरने लगी, "उफरि पड़‌इ ई दुकानदार! एहका भी यहीं थाने के मुहाने पर दूकान खोल‌इ के रही? पता नहीं का सोचि के खोलिस? जरूर थाने से मिलीभगत होई!” 

     फिर वह खुद पर ही झुँझला उठा। पहली बार मुंशी ने तो कहा था कि पैसे लेते जाओ, लेकिन उसने ही मना कर दिया था। भला वह मुंशी से पैसे कैसे लेता! आखिर रिपोर्ट तो उसी से लिखवानी थी। यही सोचकर उसने पैसे नहीं लिए थे।

     मुंशी एक-एक जलेबी दही में डुबोकर बड़े चाव से खा रहा था। उधर घसीटू सुबह एक ढेला गुड़ और एक लोटा पानी के सहारे घर से निकला था; तब से उसके पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं गया था।

     मुंशी दही-जलेबी के दोनों दोने खाली कर चुका था। अब वह बोतल मुँह से लगाकर पानी पीने लगा। तभी पंखे की हवा से खाली दोने मेज़ से सरककर फर्श पर आ गिरे। पानी पीने के बाद उसकी नज़र एक पल के लिए घसीटू पर पड़ी। फिर उसने दराज़ से एक कागज़ निकाला और उस पर कुछ लिखने लगा।

     घसीटू चुपचाप उठा, दोने उठाकर बाहर कूड़ेदान में डाल आया। जैसे रिपोर्ट लिखवाने के लिए यह करना भी ज़रूरी हो।

    घसीटू लौटा तो मुंशी अब भी उसी कागज़ पर झुका हुआ था। उसे लगा, दोने फेंकने से पहले मुंशी को बता देना चाहिए था। शायद तब मुंशी उसकी रिपोर्ट लिख देता। तभी मुंशी की नज़र उस पर पड़ी। घसीटू बिना कुछ कहे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

    मुंशी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। गाली बुदबुदाकर तल्ख़ लहजे में बोला, "अरे, बैठ अभी! एक तो उसे ठीक से खूंटे से बाँधता नहीं, ऊपर से रिपोर्ट लिखाने चला है... जैसे बाप का थाना हो! अब यही काम रह गया है हमन सब का! पहले बड़े साहब तौ आवन दे।” यह बोलते हुए उसने अपनी नजरें फिर उसी कागज पर गड़ा दीं। मानो घसीटू सामने खड़ा ही न हो।

     मुंशी की झिड़की खाकर उसकी यह पूछने की भी हिम्मत नहीं हुई कि "मुंशी जी, बड़े साहब कित्ती देर में अइहैं?" वह चुपचाप बैठ गया। ये 'बड़े साहब' ही थाने के इंचार्ज थे।

     दूसरी बार घसीटू को दही-जलेबी एक 'साहब' के लिए तब लानी पड़ी, जब मुंशी ने, "ये छोटे साहब हैं," कहकर उनकी ओर देखा और खिस्स से हँस दिया था। वह हँसी घसीटू को भीतर तक चुभ गई थी।

      इस बार मुंशी ने 'पैसे लेते जाओ' भी नहीं कहा। घसीटू समझ गया कि पहली बार का वह कहना केवल दिखावा भर था। अब वह मन ही मन यही प्रार्थना कर रहा था, “'हे भगवान! अब दही-जलेबी लाने की नौबत ही न आए।'”

    इसी बीच उन साहब की नज़र घसीटू पर टिक गई। अचानक उन्होंने मुंशी से उसकी ओर इशारा करते हुए पूछा,       

"ये यहाँ क्यों बैठा है?”

     “भैंस गायब होने की रिपोर्ट लिखाने आया है..” मुंशी के इतना कहते ही उन्होंने घसीटू को सिर से पाँव तक घूरा। फिर होंठ बिचकाकर बोले, "क्यों रे..! अब तुम्हारी हगनी-मुतनी उठाने के लिए ही पुलिस बैठी है क्या? जब भैंस की रखवाली नहीं कर सकता था, तो खरीदी ही क्यों?" 

    ये शब्द सुनते ही घसीटू के पैरों और घुटनों में जैसे अजीब-सी झनझनाहट दौड़ गई। उससे वैसे बैठा नहीं गया। वह थोड़ा पीछे खिसका और दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया। क्या कहता? उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था।

     बैंक से कर्ज लेकर भैंस खरीदा। इसके लिए वह बाजार से नया पगहा खरीदकर लाया था। घंटियों वाला पगहा था। घर के दरवाजे के ठीक सामने खूँटा गाड़ा था। उसी में भैंस को बाँधता। रात में, पगहे की घंटियां टन-टन बजती तो अचानक वह सोते से जाग उठता। भैंस खूंटे से बँधी मिलती। लेकिन न जाने क्यों उस रात घंटी की आवाज वह नहीं सुन पाया। तड़के उठा तो भैंस खूँटे पर नहीं थी। 

      कितना और कहाँ-कहाँ नहीं खोजा उसे। जब कहीं पता नहीं चला, तो गाँव वालों की सलाह पर ही वह थाने आया था। गाँव वाले भी कह रहे थे कि भैंस चोरी हुई है।

       उसी समय निहलवा की बात उसके कानों में फिर से गूँज उठी, "भँइस मत खरीद, पइसा रखि ल्यौ।"

       घसीटू ने सोचा, अगर उस दिन निहलवा की बात मान ली होती, तो शायद आज यह दिन न देखना पड़ता। गाँव में कुछ लोगों ने तो बैंक से मिलीभगत करके यही किया था। लेकिन उसने तो सपने देख लिए थे। उस पर धुन सवार थी कि भैंस की सेवा करेगा, दूध बेचेगा, घर का खर्च चलाएगा और धीरे-धीरे बैंक का कर्ज भी उतार देगा। लेकिन अब उसे लगा, भैंस नहीं, उसने अपने लिए ही आफत मोल ले ली थी। 

    तभी छोटे साहब के मोबाइल फोन की रिंगटोन बजी। मुंशी ने उनसे कहा, “देखिये साहब किसका फोन है।” 

      “अरे इंचार्ज साहब का फोन है!” कहकर वह फोन पर बात करने लगा,

     “जी सर...क्या?... अच्छा!... जी सर...  जी, जी.. सर.. क्या.. चौबीस घंटे के भीतर? यस सर.. फिर तो अभी निकलता हूँ।"

     यह वार्ता समाप्त होते ही वह मुंशी से बोला, ‘क्या कहें.. अब हमें भी जाना पड़ेगा.. बड़े साहब को अल्टीमेटम मिल गया है... यदि चौबीस घंटे के भीतर उसका पता नहीं चला, तो उन्हें अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर तैयार रखना होगा.. ससुरा अब तो यह भी हाईप्रोफाइल मामला हो गया है।”  

     घसीटू कुछ समझ पाता, उससे पहले ही वे साहब कुर्सी से उठे और हड़बड़ी में बाहर निकल गए।

     उनके के बाहर निकलते ही पूरे थाने में हलचल मच गई। हाई-प्रोफाइल मामले की सूचना मिलते ही वही पुलिस वाले, जो अभी तक सुस्त पड़े थे, छतरी के नीचे से दौड़ते हुए निकल पड़े। 

    घसीटू की तहरीर अब भी पेपरवेट के नीचे दबी थी। पंखे की हवा से उसका एक कोना बार-बार फड़फड़ा उठता। घसीटू दीवार से पीठ टिकाए चुपचाप बैठा रहा। 

     उसने मुंशी की ओर देखा। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट तैर रही थी। वह मुस्कुराहट उसकी समझ से बाहर थी। उसे लगा, शायद अब उसकी रिपोर्ट लिखे जाने की बारी आ जाए। तभी मुंशी की कही बात याद आई, "पहिले बड़े साहब तौ आवन दे।" उसकी उम्मीद फिर ढीली पड़ गई। "बड़े साहब कब आएँगे?" यह पूछने का साहस भी उसमें नहीं बचा था।

     मुंशी फिर से कागजों में कुछ लिखने में खो गया था। पिछले दो घंटे की जद्दोजहद उसके तन और मन दोनों पर भारी पड़ चुकी थी। अब वहाँ बैठे रहना उसके लिए कठिन होता जा रहा था। आखिर कब तक यूँ ही बैठा रहे?

     उसके मन में आया, पूछ ही ले कि बड़े साहब कब आएंगे। ज्यादा से ज्यादा मुंशी एक बार फिर गाली ही तो देगा।

      अचानक मुंशी के चेहरे पर एक हल्की-सी शिकन उभरी। वह सिर उठाकर सामने की ओर देखने लगा। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि आँखें सामने थीं, मगर वह सोच कुछ और रहा था।

        घसीटू को जैसे ही लगा कि वह उसे देख रहा है। उसने तुरंत लड़खड़ाती-सी आवाज में पूछा, "मुंशी जी... बड़े साहब कब..?"

      लेकिन वह जैसे घसीटू को भूल ही चुका था। घसीटू के यह पूछते ही चौंक उठा। अगले पल ही सहज होते हुए बोला, "अरे... तू अभी तक बैठा है? आज जाओ। एक हाईप्रोफाइल मामला आ गया है। कल आना।"

      यह 'कल आना' सुनते ही घसीटू का मुँह खुला का खुला रह गया। उसे लगा, पिछले दो घंटे से वह थाने के फर्श पर नहीं, अपनी उम्मीदों की ज़मीन पर बैठा था; और अभी-अभी किसी ने उसके पैरों तले से यह जमीन खिसका दी हो!

    वह मायूस हो गया। एक क्षण के लिए उसे लगा, शायद उसकी मायूसी देखकर मुंशी पसीज जाए। लेकिन उसकी कड़क आवाज गूँजी, "अच्छा, चल... उठ यहाँ से। कल सुबह आना।"

     घसीटू चुपचाप उठ खड़ा हुआ। उसके पैर जैसे भारी हो गए थे। वह धीमे-धीमे, बोझिल कदमों से थाने के बाहर निकल गया।

        आज दूसरा दिन था।

       घसीटू खोई भैंस की चिंता में सुबह ही घर से निकल पड़ा था। थाने पहुँचा तो दिन चढ़ आया था। सूरज की तपन महसूस होने लगी थी। वह सीधे मुंशी के पास गया। मुंशी ने उसे देखते ही बाहर लॉन में छतरी के नीचे बैठे लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा, “उधर जा...  साहब लोग वहीं बैठे हैं, पहले उनसे अपनी बात बता।” 

      बाहर आकर उसने देखा -

     लॉन में बने गोल चबूतरे पर लगी छतरी के नीचे बड़े साहब और छोटे साहब बैठे थे। सामने रखी मेज़ के चारों ओर कई कुर्सियाँ थीं। उन्हीं में से एक पर सफेद शर्ट, सफेद पैंट और सफेद जूते पहने एक लंबा-चौड़ा आदमी इत्मीनान से बैठा था। छतरी से कुछ ही दूर दो फ़ॉर्च्यूनर गाड़ियाँ खड़ी थीं, जिनके इर्द-गिर्द हथियारबंद लोग चौकन्ने खड़े थे। वहाँ मानो किसी बड़े आदमी का दरबार लगा था।

     साहब लोगों के सामने मेज पर झबरे बालों वाला कोई विचित्र-सा जानवर बैठा था, वे बारी-बारी से उसके सिर पर दुलार से हाथ फेर रहे थे। उधर दो-तीन सिपाही बिस्कुट जैसी कोई चीज अपने हाथ से उसे खिलाने की कोशिश कर रहे थे। तभी एक सिपाही कटोरी में कुछ लेकर आया और बड़े जतन से उसे पिलाने लगा। 

     घसीटू को अचरज हुआ। उसे लगा, उस विचित्र-से जानवर को खिलाने-पिलाने की इन सिपाहियों के बीच मानो होड़-सी मची हो।

     वह चबूतरे से कुछ दूर ही आकर ठिठक गया। चबूतरे पर चढ़ने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। वह दोनों हाथ जोड़े चुपचाप खड़ा रहा। उसकी निगाहें बार-बार छतरी के नीचे बैठे साहबों की ओर उठतीं और फिर झुक जातीं। लेकिन छतरी के नीचे बैठे लोगों की निगाहें अभी उसकी ओर उठनी बाकी थीं।

    इसी बीच कुछ लोग और आ गए। देखते ही देखते हँसी-ठट्ठा शुरू हो गया। छतरी के नीचे दो-तीन कुर्सियां और लगा दी ग‌ईं। नवांगतुक लोग बैठ ग‌ए। थोड़ी देर बाद ठंडा भी आ गया।

      कुछ ही देर में साहबों के सामने माइक लगा दिए गए। घसीटू समझ नहीं पा रहा था कि वहाँ क्या होने वाला है। तभी एक आदमी आगे बढ़ा और उनसे सवाल पूछने लगा। अगले ही पल कैमरों की फ्लैश लाइटें चमकने लगीं। यह सब देखकर घसीटू को लगा, जरूर कोई बहुत बड़ा मामला है।

     उस आदमी ने पूछा, "सर, इस महत्वपूर्ण मामले का वर्कआउट कैसे हुआ?" उन्होंने इसे एक शातिर चोर की करतूत बताते हुए कहा…

     "हम इस मामले पर लगातार काम कर रहे थे। मुखबिर से सूचना मिली कि वह इसे शहर में बेचने की फिराक में है। हमने तुरंत बरामद कर लिया।”

     तभी कैमरामैन ने कैमरा मेज़ पर बैठे झबरे बालों वाले उस विचित्र जानवर की ओर घुमा दिया, फिर कुछ पल बाद कैमरे का मुँह सफेद शर्ट-पैंट पहने उस लंबे-चौड़े आदमी पर टिक गया। उसके चेहरे पर एक खास किस्म की दबंगई और आत्मविश्वास तैर रहा था। उसकी आवभगत में मानो पूरा थाना ही लगा हुआ था और वह मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। 

    बरामदगी का स्थान पूछे जाने पर बड़े साहब एक पल को सकपका गए। वे छोटे साहब की ओर देखने लगे। उन्होंने तुरंत संगठित गिरोह की आशंका जताते हुए विवेचना जारी होने का हवाला दे दिया।

       इस उत्तर पर हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति की मुस्कान चौड़ी हो उठी। उसने पत्रकार की ओर ठंडे का गिलास बढ़ाते हुए कहा, "अरे छोड़िए न... ठंडा लीजिए, बाहर बड़ी गर्मी है।”

       उसके इस अंदाज पर थाने के बड़े साहब भी मुस्कुरा उठे। दोनों की नजरें मिलीं और उनके होंठों पर एक-सी मुस्कान तैर गई। लगा, जैसे दोनों बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह गए हों। लेकिन वे फिर गंभीर हो गए। फिर वह पत्रकारों से मुखातिब हुआ—

    “ये हमारे थानाध्यक्ष अच्छा काम कर रहे हैं। इनके पहले वाले का काम देखकर मैंने ही उनका ट्रांसफर कराया था…”

     हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति के चुप होते ही एक पत्रकार उनके पास जाकर उनके कान में फुसफुसाया, "सर जी, मैं तो आपके घर अकसर आता-जाता रहता हूँ। यह पिल्ला वह पिल्ला नहीं है!”

     उसने पत्रकार के कंधे पर हाथ रखा और हलकी मुस्कान लाकर महीन आवाज में कहा, "यार, जाने भी दो... पहले वाले से बढ़िया नस्ल का है। मेरे लिए तो यही वही है... समझो, मिल गया।" 

      वह पत्रकार भी मुस्कुराया। दोनों की बातें बड़े साहब सुन रहे थे। उनके चेहरे पर भी दबी-सी मुस्कान थी। उन्होंने हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति से धीरे से कहा, 

     "महोदय, ऐसी नस्ल का पिल्ला आसानी से नहीं मिलता... हमारे छोटे दरोगा जी ने बहुत मेहनत की है।" 

      यह सुनते ही उसका हाथ उनके कंधे पर जा टिका। उनके चेहरे पर वैसी ही संतुष्टि उतर आई, जैसी किसी कठिन 'वर्क-आउट' के सफल हो जाने पर उतरती है। 

      उधर घसीटू धूप में खड़े-खड़े थकने लगा था। इस बीच एक पुलिस वाले ने उसे दो बार छाया में खड़े हो जाने को कहा। लेकिन घसीटू ने उसकी बात अनसुनी कर चबूतरे के पास, छतरी के छज्जे के नीचे चला आया। फिर भी वहाँ भी धूप उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। धूप की परवाह किए बिना उसके मन में बस एक ही उम्मीद थी, शायद छतरी के नीचे बैठे लोगों की नज़र उस पर भी पड़ जाए। 

       उन लोगों की निगाह तो उस पर नहीं पड़ी, मगर उनकी आवाजें अब उसके कानों तक पहुँचने लगी थीं। बड़े साहब के मुँह से 'शातिर चोर', 'शहर में बेचने' और 'बरामदगी' जैसी बातें सुनते ही उसका दिल धक् से रह गया। उसे लगा, जरूर उसकी चोरी हुई भैंस की ही बात हो रही है। वह खुशी से भर उठा। पुलिस वालों के लिए उसके मन से दुआएँ निकलने लगीं। उसे पूरा विश्वास हो गया कि पुलिस ने उसकी भैंस का पता लगा लिया है और छतरी के नीचे बैठे लोग उसी चोरी का खुलासा कर रहे हैं।

     लेकिन अगले ही क्षण उनके मुँह से 'पिल्ला' शब्द और फिर, 'छोटे दरोगा ने इसके लिए बहुत मेहनत की है' निकलते ही घसीटू की सारी उम्मीदें भरभराकर ढह गईं।

     सुबह से खाली पेट, कड़ी धूप में लगातार खड़े रहने और इस अचानक मिले मानसिक आघात का बोझ उसका शरीर सह न सका। उसकी आँखों के आगे क्षणभर के लिए अँधेरा-सा छा गया और वह लड़खड़ा उठा।

     ठीक उसी समय वही पत्रकार, जो हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति के असली पिल्ले को पहचाता था, हलकी सी मुस्कान लेकर बड़े साहब की ओर मुखातिब हो रहा था,

      "सर जी, एक बात और... पिल्ला तो मिल गया, लेकिन चोर की गिरफ्तारी भी हुई या अभी नहीं?"

     उन्होंने गला साफ करते हुए उत्तर दिया "नहीं... हमारे सब इंस्पेक्टर साहब इस पर भी लगातार काम कर रहे हैं। एक संदिग्ध व्यक्ति को हिरासत में लिया गया है। उससे पूछताछ चल रही है। पूछताछ पूरी होते ही हम उसे..."

      इसी बीच छोटे साहब किंचित घबड़ाहहट में चिल्ला उठे थे, 

      "अरे..पकड़ो.. पकड़ो उसे...!" 

      छोटे साहब की इस अचानक उठी चीख में बड़े साहब के मुँह से निकलने वाला शब्द, "गिरफ्तार कर लेंगे" दबकर रह ग‌या। 

     तब तक दो सिपाही लपककर पहुँचे और गिरने ही वाले घसीटू को अपनी बाँहों में थाम लिया। उसके पैरों में जैसे जान ही नहीं बची थी। दोनों लगभग उसे टाँगे हुए तेजी से बरामदे की ओर ले गए।

      तभी एक पत्रकार ने घसीटू की ओर इशारा करके कहा, 

     “यही होगा चोर..!”

     बस फिर क्या था! कैमरों की फ्लैश लाइटें यकायक उसी पर चमकने लगीं। अगले ही पल घसीटू, बिना कुछ जाने-समझे, 'पिल्ला चोर' के संदिग्ध के रूप में तस्वीरों में कैद किया जा रहा था।

        कुछ पल के लिए छतरी के नीचे बैठे लोग असमंजस में पड़ गए। बड़े साहब कुछ बोलने को हुए, तभी छोटे साहब ने हलके-से इशारे से उन्हें रोक दिया। बड़े साहब चुप रह गए।

    अब तक पत्रकार वार्ता समाप्त हो चुकी थी। पत्रकार एक-एक कर वहाँ से निकलने लगे। जाते-जाते वे एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा देते।

     उधर हाई-प्रोफाइल शख्स अपनी गाड़ी की ओर बढ़ा। एक सिपाही उसके पिल्ले को लेकर पीछे-पीछे चल रहा था। गाड़ी के पास पहुँचते ही छोटे साहब लपककर आगे बढ़े और दरवाज़ा खोल दिया। उसने सिपाही से पिल्ला लिया, उसे गोद में रखा और कार में बैठ गया।

     तब तक घसीटू को बरामदे की छाया में पड़ी एक बेंच पर लिटा दिया गया था। उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे गए। कुछ देर बाद उसकी पलकों में हरकत हुई। उसने धीरे-धीरे आँखें खोली।

     अपने चारों ओर खड़े पुलिस वालों को देख भौंचक्का-सा वह उन्हें ताकता रह गया। उस क्षण उसे अपनी तहरीर की भी सुध न रही। उसके मन में अब बस एक ही इच्छा बची थी, किसी तरह यहाँ से निकलकर जल्द से जल्द अपने घर पहुँच जाए।

     इसी क्षण दोनों साहब बरामदे में आ पहुँचे। उनकी निगाहें सीधे बेंच पर लेटे घसीटू पर जाकर ठहर गईं।

        अचानक बड़े साहब सिपाहियों पर गरज पड़े, "अरे, इसे अभी... इसी वक्त इसके घर पहुँचाओ! यहाँ इसे कुछ हो जाता, तो लेने के देने पड़ जाते। पूरे थाने की बदनामी हो जाती!”

     दो सिपाही घसीटू को बाँह थामे उसे सहारा देते हुए धीरे-धीरे उसे जीप की ओर ले चले। उसकी तहरीर मुंशी के टेबल पर अभी भी पेपरवेट के नीचे पंखे की हवा में फड़फड़ा रही थी।

    घसीटू घर लौट आया। उसकी भैंस नहीं मिली। तहरीर का क्या हुआ, उसने फिर कभी पता नहीं किया।

     अगले दिन अखबारों में एक खबर छपी थी-

     "हाई-प्रोफाईल पिल्ला चोरी कांड में संदिग्ध हिरासत में"       

    खबर के साथ दो तस्वीरें थीं। पहली तस्वीर में साहब लोग मीडिया को जानकारी दे रहे थे। दूसरी में दो पुलिसकर्मी एक संदिग्ध को सहारा देकर ले जा रहे थे। संयोग से उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

       निहलवा उससे मिलने आया था। वह कुछ पूछने ही वाला था कि घसीटू ने उसे हाथ के इशारे से चुप करा दिया। उसे छतरी के नीचे का दृश्य याद हो आया। वह बोला, “अब बसि करऽ... हम मजूरै भले। ई रोजगार-फोजगार, थाना-फाना अउर कोरट-कचहरी सब बड़कन के बदे हय। हमन सुभा ऐसेई भल, एहिमइ हमार इज्जत बची हय। हमार बेटउआ इही बदे सहर भागि के मजूरी करै चलि गवा। कउन इंहाँ रहिके गारी खाय... गाँऊ-देस का हालि तू तो जनतै हया।”

                          *****

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

प्रतिमा देवी के वाल से..

         हाँ वह बालक ही तो था उसकी उम्र यही कोई दस-बारह वर्ष के बीच रही होगी| मेरे पड़ोसन के यहाँ वह नौकर के रूप में काम करने आया था| सारे घर के काम तो वह बहुत सलीके से करता था लेकिन पड़ोसन ने बताया कि उस लड़के का यहाँ शहर में उसके घर मन नहीं लगता था| उस बच्चे के पिता ने घर की आर्थिक तंगी के चलते ही उसे एक घरेलू नौकर के रूप में शहर में भेजा था लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वह यहाँ एक घरेलू नौकर के रूप में काम करने आया है| उस बच्चे के घरेलू काम करने के बदले मासिक ढाई हजार रूपया उसके पिता के हाथों में दे दिया जाता था, ऐसा पड़ोसन ने बताया था|
         
          मेरी पड़ोसन ने बताया कि वह लड़का अकसर अपने घर और गाँव को लेकर परेशान हो उठता और कहता, “मैं यदि अपने गाँव होता तो तालाब में नहाने जाता; दिन भर तालाब में डूबा रहता...मछली मारता..पेड़ पर चढ़ आम तोड़ता..गंजी खोदता...लेकिन यहाँ क्या है..यहाँ कुछ भी नहीं है?” पड़ोसन बता रही थी कि अकसर वह इन्हीं बातों को दुहराता रहता था| एक दिन जब वह बच्चा बहुत परेशान हो उठा तो पड़ोसन ने अपना मोबाइल बच्चे को देकर अपने पिता से बात कर लेने के लिए कहा| बच्चे ने मोबाइल पकड़ते ही अपने पिता से कहना शुरू किया, “अरे बापू..! यहाँ आऊ हमको तुरन्त लियाव जाव...यहाँ न तालाब है..न गंजी के खेत हैं...न आम के पेड़ हैं...यहाँ कुछ नहीं है, हमारा मन नहीं लगता हमें लियाई जाव..|” पड़ोसन ने बताया यह बात करते समय उस बच्चे की आँखों में आंसू भी छलक पड़े थे| फिर उस बच्चे का पिता एक दिन शहर आया और उसे वापस गाँव लिवाकर चला गया| मेरी पड़ोसन बता रही थी कि यदि वह लड़का घर पर रुकता तो हम उसके महीने के पैसे और बढ़ा देती क्योंकि वह घर के कामों को बहुत होशियारी और लगन के साथ करता था|

         मैं सोचती हूँ...उस बच्चे का बचपना..कितना अल्हड़..रहा होगा..! एकदम निच्छल..निर्मल..! उस बच्चे को उसका पिता तो वापस लेकर चला गया, लेकिन न जाने ऐसे कितने बच्चे अपनी इस अल्हड़ता और निर्मलता को जीवन की इन कठोर चट्टानों के बीच खो देते होंगे...असमय उनके अन्दर की असीम प्रतिभाएँ मर जाती होंगी...न जाने हम क्या कर रहे हैं...बालश्रम के कानून का ढिढोरा हम अवश्य पीटते हैं..लेकिन समाज या सरकार के स्तर पर हम ऐसे बच्चों के लिए क्या कर पाते हैं..?    

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

प्रतिमा देवी के वाल से



        यही गर्मी की भरी दुपहरी रही होगी, हम अपने पति और छोटे पुत्र के साथ कार से कहीं जा रहे थे| पति महोदय कार चला रहे थे| मैंने देखा कि गर्मी की भरी दोपहरी में एक बूढ़ी औरत एक छोटी लड़की का हाथ पकड़े हुए दोनों नंगे पाँव ही पक्की सड़क पर चले जा रहे थे| मैं उस कड़ी धूप, तपती हुई पक्की सड़क और उस पर उनके नंगे पांवों को देख सिहर सी गई| मैं अभी यह देख पति से अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करती कि मेरी कार उनसे आगे निकल गयी, एक बार मैंने सोचा पति से कार रोकने के लिए कहूँ, और हमारे पास जो एक जोड़ी अतिरिक्त चप्पल था पहनने के लिए उन्हें दे दूँ! लेकिन ऐसा नहीं कर पाई और हम आगे चले गए| मैं सोचती रह गयी कि अभी भी हमारे देश में ऐसे लोग हैं जो एक जोड़ी चप्पल के लिए तरस रहें हैं|

         इधर हम लोग दो-तीन घंटे बाद पुनः उसी रास्ते से वापस लौट रहे थे| लौटते हुए मैंने देखा वही बूढी औरत और साथ की वह बच्ची सड़क के किनारे के एक घनी छाया वाले पेड़ के नीचे बैठे सुस्ता रहे थे इस बीच ऐसे ही नंगे पावों से वे पाँच-छह किमी की दुरी तय कर लिए थे| मैं उन्हें सुस्ताते हुए देख रही थी और हमारी कार आगे निकल गयी थी...पता नहीं यह सब मेरे पति ने देखा था या नहीं!
   
        एक दिन हम अपने पति और छोटे पुत्र के साथ ऐसे ही बैठे गप्पें लड़ा रहे थे की मुझे यह घटना ध्यान में आई और इसका जिक्र मैंने अपने पति से किया, पति के मुँह से सहसा निकला, “अरे! हमको उसी समय बताती, मैं उनकी एक तस्वीर ले लेता..और..उन्हें फेसबुक पर पोस्ट कर देता..|” मुझे पति की ये बातें बहुत ही नागवार गुजरी लेकिन मेरे समझ में कुछ नहीं आया कि इस पर इन्हें मैं क्या कहूँ, लेकिन तभी मैंने अपने छोटे पुत्र को पति महोदय से कहते हुए सुना, “हुँह..हूँ..ऊँ..! आप फेसबुकिए जैसे लोगों को बस यही एक बीमारी है, किसी की पीड़ा भी आपके फेसबुकवाल पर फैशन-शो जैसा इश्तेमाल होता है..|” पुत्र ने अपने पिता को ऐसा जबाव दिया कि मैं मन ही मन प्रसन्न हो गई और उधर पति महोदय पुत्र को आँखें फाड़कर देखे जा रहे थे लेकिन उनके मुँह से कुछ भी नहीं निकल पाया|

                                         -प्रतिमा