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शनिवार, 4 जुलाई 2026

सुबह, गुस्सा और पकौड़ियाँ

लगभग सुबह हो चुकी थी, लेकिन आज बिस्तर छोड़ने का मन ही नहीं हुआ। जब उठे तो दिवाल घड़ी में सात बज रहे थे। जबकि अन्य दिनों में अब तक सुबह की सैर पूरी कर लौट चुका होता हूँ। मंगलेश्वर भी उसके बाद ही आते हैं। इसलिए टहलकर वापस आने के बाद सुबह की चाय मैं खुद ही बनाता हूँ। 

खैर जब उठा तो सबसे पहले अखबार उठा लिया। उसे सरसरी निगाह से देखा और फिर चाय बनाने चला गया। चाय तैयार हुई तो कप लेकर वापस बिस्तर पर आ ग‌या। यहीं बिस्तर पर ही बैठे-बैठे अखबार के पन्ने पलटता रहा और बीच-बीच में चाय भी सुड़क लेता। 

लेकिन जब चाय बना ही रहा था, तभी मंगलेश्वर आ गया। वह बाहर खड़ा दरवाजा खटखटाते हुए बार-बार “साहब-साहब…” कहकर पुकार रहा था। मैंने कोई जल्दी नहीं दिखाई। इत्मीनान से चाय बनाता रहा और उसे थोड़ी देर बाहर ही इंतजार करने दिया। सच तो यह है कि उस समय मैं उससे थोड़ा नाराज़ था।  
नाराज़गी की वजह भी थी। पिछली शाम मैं देर तक मीटिंग-सिटिंग में व्यस्त रहने के बाद आवास पर आया था। मंगलेश्वर तब तक केवल दूध गरम करके जा चुका था। खाना बनाने का इंतज़ार किए बिना उसका चले जाना मुझे अच्छा नहीं लगा था। 

उस समय किचेन में देखा तो कुकर में दोपहर के बचे हुए चावल थे और एक कटोरे में दाल रखी थी। मन तो गरम-गरम रोटी और सब्जी खाने का था, लेकिन फिर उन्हें बनाने के लिए खटर-पटर करने का मन नहीं हुआ। आलस्य भाव से दोपहर का वही बचा हुआ दाल-चावल खाकर ऊपर से एक गिलास दूध पी लिया। 

शायद उसी बात की एक हल्की-सी खीझ अभी तक मन में बनी हुई थी। इसलिए आज मंगलेश्वर के बार-बार "साहब... साहब..." पुकारने पर भी मैंने दरवाज़ा खोलने की कोई जल्दी नहीं दिखाई।

वैसे, मंगलेश्वर पर गुस्से का एक कारण और था, वह अकसर शाम के समय शराब के नशे में होता है। क‌ई बार उसपर शराब नशा ज्यादा चढ़ा देख मैंने उसे जाने के लिए भी कह दिया है। लेकिन ‌एक बार उसने मुझसे कहा था, "साहब आप मुझे हटाना मत, हो सकता है आपके साथ रहने से मेरी शराब छूट जाए।" लेकिन यह तो जगजाहिर है, मुंह लगी शराब छूटने से रही। इसलिए एक दिन मैंने उसे हड़काते हुए कहा था, "देख, नशे में होने पर तू मेरे यहां मत आया कर, नहीं तो मैं तुझे परमानेंटली हटा दुंगा।" 

चाय बनाते हुए उसके बारे में मैंने यह भी सोचा कि हो न हो कल रात भी यह पीकर आया हो, और मेरा सामना न हो इसलिए केवल दूध गरम करके चला गया हो। यह सोचकर उसके प्रति मेरी खीझ थोड़ी और बढ़ गई।

चाय बन जाने के बाद मैंने दरवाजा खोला। उससे पूछा कि वह कल शाम इतनी जल्दी क्यों चला ग‌या और खाना क्यों नहीं बनाया। साथ में यह भी पूछा कि क्या उसने ज्यादा शराब पी रखी थी। उसने बताया कि गांव में एक ट्रैक्टर ट्राली पलट गई थी, जिसमें उसके भाई को चोट लग गई थी। इसलिए उसे तुरंत वहां जाना पड़ा। उसने यह भी कहा कि उसने शराब नहीं पी थी। 

हालांकि मैं जानता हूँ होश में रहते हुए वह झूठ भी बोल देता है, इसलिए उसकी बात पर तुरंत विश्वास नहीं हुआ। लेकिन उसके बारे में मेरा एक अनुभव यह भी है कि वह मूलतः अच्छा आदमी है। नशे में होने पर वह अकसर सच बोल जाता है। जैसे उस अवस्था में उसके भीतर का छल नहीं, बल्कि उसकी सहज अच्छाई बाहर आ जाती हो। यही सोचते-सोचते उसके प्रति मेरी नाराज़गी धीरे-धीरे पिघलने लगी।

इन्हीं बातों के बीच आज मैं आलस्य में घिरा रहा अभी तक बिस्तर से नहीं उठा हूँ। दरअसल इस आलस्य के पीछे भी एक कारण है, मैंने रविवार वाली सुबह अपने मित्र के इस चैलेंज को स्वीकार कर लिया कि पंद्रह सौ मीटर की दौड़ पूरी कर लेता हूं तो वे मुझे पांच सौ रूपए का इनाम देंगे। इसके लिए उन्होंने सुबह साढ़े पांच बजे जगाया था। 

वैसे बात पाँच सौ रुपये की नहीं थी। मुझे भी अपने बारे में यह जानने की उत्सुकता थी कि क्या इस उम्र में भी मैं बिना रुके पन्द्रह सौ मीटर दौड़ सकता हूँ या नहीं।

मैंने दौड़ना शुरू किया और वे कार से मेरा पीछा करते रहे। स्टेडियम पहुँचते-पहुँचते कार की मीटर रीडिंग 1325 दिखा रही थी। मेरी यह दौड़ यहीं समाप्त हुई। मैं अभी भी दो-तीन सौ मीटर और दौड़ सकता था‌। इसलिए जब उन्होंने पाँच सौ रूपए पुरस्कार में दिया तो मैंने इसे ग्रहण कर लिया। बाद में इसे लौटाते हुए उनसे इसे किसी पार्टी-शार्टी में खर्च कर देने के लिए कहा। 

फिर तय हुआ कि इस धनराशि से स्टेडियम में वृक्षारोपण किया जाए‌। फिर उसी रविवार दोपहर हम सबने मिलकर वहाँ पेड़ पौधे लगाए।

एक बात और बताना चाहता हूँ इस दौड़ के बाद मैं करीब चार किमी पैदल भी टहला। इतना ही नहीं, अगले दिन यानी सोमवार की सुबह भी मेरी अच्छी-खासी टहलाई हुई‌। शायद इसके बाद मन ने भी अपनी थकान का हिसाब लगाना शुरू कर दिया था। इसीलिए मन के उस हिसाब को आज मैं अपने इस आलसपने से बराबर कर रहा हूँ।

और हां इधर अभी भी बिस्तर पर बैठे हुए लिख रहा हूं, उधर मंगलेश्वर रसोई से पूछ रहा है, “साहब पकौड़ी बनाई है… ले आऊँ?”

मैंने उससे पकौड़ी बनाने के लिए नहीं कहा था। उसने अपने मन से बना दी थी। उसकी आवाज सुनकर मैं मन ही मन मुस्कुरा उठा‌। लगा, उसपर गुस्सा किए रहता तो शायद उसके मन में मेरे लिए यह पकौड़ी बनाने का सहज भाव न उपजता!
वह किचेन से पकौड़ी लाने गया। आज की सुबह का मेरा यह आलसपन मेरे लिए उचित ही था‌। शरीर ने विश्राम भी किया और मन ने अपने भीतर झाँका भी। 

अब तक मेरी यह सुबहचर्या भी पूरी हो चुकी थी। इस बीच क्या कुछ नहीं हुआ! चाय, अखबार और मन का गुस्सा होना, फिर इस नाराज़गी का पिघलना, आलस्य से थकान का हिसाब बराबर होना अंत में सुबह-सुबह सामने आई ये पकौड़िया!

लेकिन ….

#चलते_चलते
        
वाकई! जब हम किसी की गलती पर भी गुस्सा करते हैं, तब अक्सर उसमें हमारे ईगो का एक हिस्सा भी शामिल ही होता है। उस गुस्से से सामने वाला असहज तो होता ही है लेकिन हम भी अपना नुकसान कर बैठते हैं। फिर दोनों शांति खो बैठते हैं।

#सुबहचर्या
(२६.११.१९)

बुधवार, 1 जुलाई 2026

विश्वास-धर्म

मित्र ही कह सकते हैं उन्हें। एक दिन उन्होंने पानी के गिलास में दवा घोलकर मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने बिना कुछ पूछे उनके हाथ से गिलास लिया और गटागट पी गया।

जैसे ही गिलास खाली कर मेज पर रखा, उन्होंने सीख देने के अंदाज में कहा, "बिना गिलास में देखे इस तरह नहीं पीना चाहिए।

उनकी बात पर मैं कह उठा, "लेकिन जब कोई अपने हाथ से गिलास दे रहा हो, तो उस पर विश्वास करना ही चाहिए। मैंने गिलास में इसलिए नहीं झांका, क्योंकि विश्वास बहुत बड़ी चीज है!’ मेरी यह बात सुनकर मित्र निरुत्तर-से हो ग‌ए। 

हाँ यहां वे कह सकते थे, "यदि गिलास थमाने वाले से ही कोई लापरवाही हो रही हो तो? इसलिए भी देखना चाहिए।' 

खैर बातों का क्या, बातें तो बहुत हो सकती है, मुझे एक घटना याद आती है, 

बरसात का मौसम ढलान पर था। उन दिनों रसोई में मिट्टी के चूल्हे पर उपलों और लकड़ियों से ही खाना बनता था और रोशनी के लिए मिट्टी के तेल की ढिबरी जलती थी। 

मेरे दादा जी को चाय पीने की आदत थी। वे बखरी के बाहर दलान में रहते थे। उस दिन भी शाम ढल रही थी। रोज़ की तरह अम्मा ने मिट्टी के चूल्हे पर उनके लिए चाय बनाई। मैं गिलास में चाय लेकर दादा जी के पास गया। जैसे ही उन्होंने मेरे हाथ से गिलास लिया उनकी निगाह अचानक चाय पर पड़ी। चाय में एक मरा हुआ मेढक का बच्चा तैर रहा था। यह दृश्य देखकर मैं भी सिहर उठा।

बस, फिर क्या था! दादा जी अम्मा पर बुरी तरह नाराज़ हो उठे। घर के बाकी लोगों ने काफी देर तक उनका मान-मनौव्वल किया और उन्हें समझाया-बुझाया, तब कहीं जाकर उनका गुस्सा शांत हुआ। आखिरकार वे चाय पीने के लिए इस शर्त पर राजी हुए कि चाय उनके सामने बनाई जाएगी। 

उन दिनों स्टोव का जमाना था। दालान में स्टोव, चायपत्ती, गुड़, दूध और बाकी सारा सामान लाकर रख दिया गया। दादा जी ने एक-एक चीज को बारीकी से देखकर तसल्ली कर ली, तब चाय बननी शुरू हुई।

लेकिन विडंबना देखिए, जब चाय छन्नी से छानकर गिलास में डाली जा रही थी, तभी छन्नी में एक नन्हा मेंढक दिखाई पड़ा। वह अभी-अभी टैडपोल से मेंढक बना था। 

एक पल के लिए हम सब स्तब्ध रह ग‌ए। अब किसी को दोष भी कैसे देते? सारी सामग्री दादा जी की आँखों के सामने जाँची-परखी गई थी, फिर भी वह नन्हा मेंढक चाय तक पहुँच ही गया था।

उस समय मेरी उम्र इतनी नहीं थी कि इस घटना के पीछे छिपे निहितार्थ को समझ पाता। मेरे लिए वह बस एक अजीब और हैरान कर देने वाली घटना थी।

लेकिन आज, जब कभी यह प्रसंग याद आता है, तो लगता है कि जीवन की बहुत सी घटनाएँ किसी एक व्यक्ति के दोष से नहीं घटतीं। क‌ई बार पूरी सावधानी बरतने के बाद भी ऐसी बातें हो जातीं हैं, जिनका कोई स्पष्ट दोषी नहीं होता। इसलिए किसी की अनजाने में हुई गलती पर अनावश्यक टंटा खड़ा कर देने से न तो समस्या का समाधान होता है और न ही मन को संतोष मिलता है। उल्टे जीवन में कड़वाहट ही घुलती है। 

उस दिन छन्नी में मिला वह नन्हा मेंढक जैसे चुपचाप यही सिखा गया था कि हर घटना में दोषी तलाशना जरूरी नहीं होता; कभी-कभी उसे एक संयोग मानकर आगे बढ़ जाना ही अधिक समझदारी होती है। 

आज सुबह टहलकर लौटा तो मन में एक ही बात बार-बार चकरघिन्नी की तरह घूमती रही—विश्वास।

सोचता हूँ, जब मनुष्य ने संगठित धर्मों की कल्पना भी नहीं की होगी, तब भी जीवन किसी न किसी आधार पर तो टिका होगा, शायद वह आधार विश्वास ही रहा होगा। यदि विश्वास न होता, तो न परिवार बनते, न समाज बनता और न ही मानव सभ्यता इतनी दूर तक पहुँच पाती।

यह विश्वास केवल मनुष्य तक ही सीमित नहीं है। किसी घोंसले में चोंच फैलाए बैठे चिड़िया के बच्चे भी यही विश्वास किए रहते हैं कि उनकी माँ लौटेगी और उन्हें दाना चुगाएगी। वे कोई प्रमाण नहीं मांगते, कोई तर्क नहीं करते; उनका जीवन विश्वास पर टिका होता है।

शायद इसी कारण मुझे लगता है कि 'विश्वास-धर्म' सबसे पुराना धर्म है। और आज के समय में, जब संदेह हमारे रिश्तों, व्यवहार और समाज में तेजी से बढ़ रहा है, तब यही धर्म सबसे अधिक बचाए जाने योग्य भी है। बाकी सारे धर्म तभी तक सार्थक हैं, जब तक उनके भीतर विश्वास जीवित है।

लेकिन आज लगता है मनुष्य का सबसे बड़ा संकट विश्वास का संकट है। हम सामने वाले को स्वीकार करने से पहले उसे अपने जैसा ही बनाना चाहते हैं। बस यहीं से विश्वासघात की आशंका जन्म लेती है और विश्वासघात की प्रवृत्ति भी।

इन्हीं बातों के बीच सोचता हूँ आज मित्र ने जो गिलास मेरी ओर बढ़ाया था, उसमें मेरे झाँककर न देखने का कारण यह नहीं था कि मैं लापरवाह था, बल्कि इसलिए कि वह गिलास किसी अपने के हाथ से दिया गया था। मुझे लगा, विश्वास का अर्थ ही यही है कि हर बार प्रमाण की माँग न की जाए।

हो सकता है, व्यवहारिक दृष्टि से मेरा ऐसा करना सावधानी न माना जाए लेकिन मन की दृष्टि से उस क्षण मैंने 'विश्वास-धर्म' निभाया था। विश्वास में जोखिम हो सकता है, कभी-कभी धोखा भी मिल सकता है, फिर भी विश्वास के बिना न मित्रता टिकती है, न परिवार और न समाज। अंततः सभ्यता का सबसे मजबूत आधार नियम नहीं है, विश्वास ही है।

#चलते_चलते

             मस्त रहिए, आप अपनी जगह सही रहेंगे, तो बहुत-सी चीजें अपने-आप ठीक हो जाती हैं।

#सुबहचर्या

(२४.१०.१९)