लगभग सुबह हो चुकी थी, लेकिन आज बिस्तर छोड़ने का मन ही नहीं हुआ। जब उठे तो दिवाल घड़ी में सात बज रहे थे। जबकि अन्य दिनों में अब तक सुबह की सैर पूरी कर लौट चुका होता हूँ। मंगलेश्वर भी उसके बाद ही आते हैं। इसलिए टहलकर वापस आने के बाद सुबह की चाय मैं खुद ही बनाता हूँ।
खैर जब उठा तो सबसे पहले अखबार उठा लिया। उसे सरसरी निगाह से देखा और फिर चाय बनाने चला गया। चाय तैयार हुई तो कप लेकर वापस बिस्तर पर आ गया। यहीं बिस्तर पर ही बैठे-बैठे अखबार के पन्ने पलटता रहा और बीच-बीच में चाय भी सुड़क लेता।
लेकिन जब चाय बना ही रहा था, तभी मंगलेश्वर आ गया। वह बाहर खड़ा दरवाजा खटखटाते हुए बार-बार “साहब-साहब…” कहकर पुकार रहा था। मैंने कोई जल्दी नहीं दिखाई। इत्मीनान से चाय बनाता रहा और उसे थोड़ी देर बाहर ही इंतजार करने दिया। सच तो यह है कि उस समय मैं उससे थोड़ा नाराज़ था।
नाराज़गी की वजह भी थी। पिछली शाम मैं देर तक मीटिंग-सिटिंग में व्यस्त रहने के बाद आवास पर आया था। मंगलेश्वर तब तक केवल दूध गरम करके जा चुका था। खाना बनाने का इंतज़ार किए बिना उसका चले जाना मुझे अच्छा नहीं लगा था।
उस समय किचेन में देखा तो कुकर में दोपहर के बचे हुए चावल थे और एक कटोरे में दाल रखी थी। मन तो गरम-गरम रोटी और सब्जी खाने का था, लेकिन फिर उन्हें बनाने के लिए खटर-पटर करने का मन नहीं हुआ। आलस्य भाव से दोपहर का वही बचा हुआ दाल-चावल खाकर ऊपर से एक गिलास दूध पी लिया।
शायद उसी बात की एक हल्की-सी खीझ अभी तक मन में बनी हुई थी। इसलिए आज मंगलेश्वर के बार-बार "साहब... साहब..." पुकारने पर भी मैंने दरवाज़ा खोलने की कोई जल्दी नहीं दिखाई।
वैसे, मंगलेश्वर पर गुस्से का एक कारण और था, वह अकसर शाम के समय शराब के नशे में होता है। कई बार उसपर शराब नशा ज्यादा चढ़ा देख मैंने उसे जाने के लिए भी कह दिया है। लेकिन एक बार उसने मुझसे कहा था, "साहब आप मुझे हटाना मत, हो सकता है आपके साथ रहने से मेरी शराब छूट जाए।" लेकिन यह तो जगजाहिर है, मुंह लगी शराब छूटने से रही। इसलिए एक दिन मैंने उसे हड़काते हुए कहा था, "देख, नशे में होने पर तू मेरे यहां मत आया कर, नहीं तो मैं तुझे परमानेंटली हटा दुंगा।"
चाय बनाते हुए उसके बारे में मैंने यह भी सोचा कि हो न हो कल रात भी यह पीकर आया हो, और मेरा सामना न हो इसलिए केवल दूध गरम करके चला गया हो। यह सोचकर उसके प्रति मेरी खीझ थोड़ी और बढ़ गई।
चाय बन जाने के बाद मैंने दरवाजा खोला। उससे पूछा कि वह कल शाम इतनी जल्दी क्यों चला गया और खाना क्यों नहीं बनाया। साथ में यह भी पूछा कि क्या उसने ज्यादा शराब पी रखी थी। उसने बताया कि गांव में एक ट्रैक्टर ट्राली पलट गई थी, जिसमें उसके भाई को चोट लग गई थी। इसलिए उसे तुरंत वहां जाना पड़ा। उसने यह भी कहा कि उसने शराब नहीं पी थी।
हालांकि मैं जानता हूँ होश में रहते हुए वह झूठ भी बोल देता है, इसलिए उसकी बात पर तुरंत विश्वास नहीं हुआ। लेकिन उसके बारे में मेरा एक अनुभव यह भी है कि वह मूलतः अच्छा आदमी है। नशे में होने पर वह अकसर सच बोल जाता है। जैसे उस अवस्था में उसके भीतर का छल नहीं, बल्कि उसकी सहज अच्छाई बाहर आ जाती हो। यही सोचते-सोचते उसके प्रति मेरी नाराज़गी धीरे-धीरे पिघलने लगी।
इन्हीं बातों के बीच आज मैं आलस्य में घिरा रहा अभी तक बिस्तर से नहीं उठा हूँ। दरअसल इस आलस्य के पीछे भी एक कारण है, मैंने रविवार वाली सुबह अपने मित्र के इस चैलेंज को स्वीकार कर लिया कि पंद्रह सौ मीटर की दौड़ पूरी कर लेता हूं तो वे मुझे पांच सौ रूपए का इनाम देंगे। इसके लिए उन्होंने सुबह साढ़े पांच बजे जगाया था।
वैसे बात पाँच सौ रुपये की नहीं थी। मुझे भी अपने बारे में यह जानने की उत्सुकता थी कि क्या इस उम्र में भी मैं बिना रुके पन्द्रह सौ मीटर दौड़ सकता हूँ या नहीं।
मैंने दौड़ना शुरू किया और वे कार से मेरा पीछा करते रहे। स्टेडियम पहुँचते-पहुँचते कार की मीटर रीडिंग 1325 दिखा रही थी। मेरी यह दौड़ यहीं समाप्त हुई। मैं अभी भी दो-तीन सौ मीटर और दौड़ सकता था। इसलिए जब उन्होंने पाँच सौ रूपए पुरस्कार में दिया तो मैंने इसे ग्रहण कर लिया। बाद में इसे लौटाते हुए उनसे इसे किसी पार्टी-शार्टी में खर्च कर देने के लिए कहा।
फिर तय हुआ कि इस धनराशि से स्टेडियम में वृक्षारोपण किया जाए। फिर उसी रविवार दोपहर हम सबने मिलकर वहाँ पेड़ पौधे लगाए।
एक बात और बताना चाहता हूँ इस दौड़ के बाद मैं करीब चार किमी पैदल भी टहला। इतना ही नहीं, अगले दिन यानी सोमवार की सुबह भी मेरी अच्छी-खासी टहलाई हुई। शायद इसके बाद मन ने भी अपनी थकान का हिसाब लगाना शुरू कर दिया था। इसीलिए मन के उस हिसाब को आज मैं अपने इस आलसपने से बराबर कर रहा हूँ।
और हां इधर अभी भी बिस्तर पर बैठे हुए लिख रहा हूं, उधर मंगलेश्वर रसोई से पूछ रहा है, “साहब पकौड़ी बनाई है… ले आऊँ?”
मैंने उससे पकौड़ी बनाने के लिए नहीं कहा था। उसने अपने मन से बना दी थी। उसकी आवाज सुनकर मैं मन ही मन मुस्कुरा उठा। लगा, उसपर गुस्सा किए रहता तो शायद उसके मन में मेरे लिए यह पकौड़ी बनाने का सहज भाव न उपजता!
वह किचेन से पकौड़ी लाने गया। आज की सुबह का मेरा यह आलसपन मेरे लिए उचित ही था। शरीर ने विश्राम भी किया और मन ने अपने भीतर झाँका भी।
अब तक मेरी यह सुबहचर्या भी पूरी हो चुकी थी। इस बीच क्या कुछ नहीं हुआ! चाय, अखबार और मन का गुस्सा होना, फिर इस नाराज़गी का पिघलना, आलस्य से थकान का हिसाब बराबर होना अंत में सुबह-सुबह सामने आई ये पकौड़िया!
लेकिन ….
#चलते_चलते
वाकई! जब हम किसी की गलती पर भी गुस्सा करते हैं, तब अक्सर उसमें हमारे ईगो का एक हिस्सा भी शामिल ही होता है। उस गुस्से से सामने वाला असहज तो होता ही है लेकिन हम भी अपना नुकसान कर बैठते हैं। फिर दोनों शांति खो बैठते हैं।
#सुबहचर्या
(२६.११.१९)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें