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बुधवार, 1 जुलाई 2026

विश्वास-धर्म

मित्र ही कह सकते हैं उन्हें। एक दिन उन्होंने पानी के गिलास में दवा घोलकर मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने बिना कुछ पूछे उनके हाथ से गिलास लिया और गटागट पी गया।

जैसे ही गिलास खाली कर मेज पर रखा, उन्होंने सीख देने के अंदाज में कहा, "बिना गिलास में देखे इस तरह नहीं पीना चाहिए।

उनकी बात पर मैं कह उठा, "लेकिन जब कोई अपने हाथ से गिलास दे रहा हो, तो उस पर विश्वास करना ही चाहिए। मैंने गिलास में इसलिए नहीं झांका, क्योंकि विश्वास बहुत बड़ी चीज है!’ मेरी यह बात सुनकर मित्र निरुत्तर-से हो ग‌ए। 

हाँ यहां वे कह सकते थे, "यदि गिलास थमाने वाले से ही कोई लापरवाही हो रही हो तो? इसलिए भी देखना चाहिए।' 

खैर बातों का क्या, बातें तो बहुत हो सकती है, मुझे एक घटना याद आती है, 

बरसात का मौसम ढलान पर था। उन दिनों रसोई में मिट्टी के चूल्हे पर उपलों और लकड़ियों से ही खाना बनता था और रोशनी के लिए मिट्टी के तेल की ढिबरी जलती थी। 

मेरे दादा जी को चाय पीने की आदत थी। वे बखरी के बाहर दलान में रहते थे। उस दिन भी शाम ढल रही थी। रोज़ की तरह अम्मा ने मिट्टी के चूल्हे पर उनके लिए चाय बनाई। मैं गिलास में चाय लेकर दादा जी के पास गया। जैसे ही उन्होंने मेरे हाथ से गिलास लिया उनकी निगाह अचानक चाय पर पड़ी। चाय में एक मरा हुआ मेढक का बच्चा तैर रहा था। यह दृश्य देखकर मैं भी सिहर उठा।

बस, फिर क्या था! दादा जी अम्मा पर बुरी तरह नाराज़ हो उठे। घर के बाकी लोगों ने काफी देर तक उनका मान-मनौव्वल किया और उन्हें समझाया-बुझाया, तब कहीं जाकर उनका गुस्सा शांत हुआ। आखिरकार वे चाय पीने के लिए इस शर्त पर राजी हुए कि चाय उनके सामने बनाई जाएगी। 

उन दिनों स्टोव का जमाना था। दालान में स्टोव, चायपत्ती, गुड़, दूध और बाकी सारा सामान लाकर रख दिया गया। दादा जी ने एक-एक चीज को बारीकी से देखकर तसल्ली कर ली, तब चाय बननी शुरू हुई। बनाने की सामग्री लाई गई और उनके सामने चाय बनाई गई। मजे की बात यह कि एक-एक सामग्री की जाँच-परख कर लेने के बाद चाय बनाई गई। 

लेकिन विडंबना देखिए, जब चाय छन्नी से छानकर गिलास में डाली जा रही थी, तभी छन्नी में एक नन्हा मेंढक दिखाई पड़ा। वह अभी-अभी टैडपोल से मेंढक बना था। 

एक पल के लिए हम सब स्तब्ध रह ग‌ए। अब किसी को दोष भी कैसे देते? सारी सामग्री दादा जी की आँखों के सामने जाँची-परखी गई थी, फिर भी वह नन्हा मेंढक चाय तक पहुँच ही गया था।

उस समय मेरी उम्र इतनी नहीं थी कि इस घटना के पीछे छिपे निहितार्थ को समझ पाता। मेरे लिए वह बस एक अजीब और हैरान कर देने वाली घटना थी।

लेकिन आज, जब कभी यह प्रसंग याद आता है, तो लगता है कि जीवन की बहुत सी घटनाएँ किसी एक व्यक्ति के दोष से नहीं घटतीं। क‌ई बार पूरी सावधानी बरतने के बाद भी ऐसी बातें हो जातीं हैं, जिनका कोई स्पष्ट दोषी नहीं होता। इसलिए किसी की अनजाने में हुई गलती पर अनावश्यक टंटा खड़ा कर देने से न तो समस्या का समाधान होता है और न ही मन को संतोष मिलता है। उल्टे जीवन में कड़वाहट ही घुलती है। 

उस दिन छन्नी में मिला वह नन्हा मेंढक जैसे चुपचाप यही सिखा गया था कि हर घटना में दोषी तलाशना जरूरी नहीं होता; कभी-कभी उसे एक संयोग मानकर आगे बढ़ जाना ही अधिक समझदारी होती है। 

आज सुबह टहलकर लौटा तो मन में एक ही बात बार-बार चकरघिन्नी की तरह घूमती रही—विश्वास।

सोचता हूँ, जब मनुष्य ने संगठित धर्मों की कल्पना भी नहीं की होगी, तब भी जीवन किसी न किसी आधार पर तो टिका होगा, शायद वह आधार विश्वास ही रहा होगा। यदि विश्वास न होता, तो न परिवार बनते, न समाज बनता और न ही मानव सभ्यता इतनी दूर तक पहुँच पाती।

यह विश्वास केवल मनुष्य तक ही सीमित नहीं है। किसी घोंसले में चोंच फैलाए बैठे चिड़िया के बच्चे भी यही विश्वास किए रहते हैं कि उनकी माँ लौटेगी और उन्हें दाना चुगाएगी। वे कोई प्रमाण नहीं मांगते, कोई तर्क नहीं करते; उनका जीवन विश्वास पर टिका होता है।

शायद इसी कारण मुझे लगता है कि 'विश्वास-धर्म' सबसे पुराना धर्म है। और आज के समय में, जब संदेह हमारे रिश्तों, व्यवहार और समाज में तेजी से बढ़ रहा है, तब यही धर्म सबसे अधिक बचाए जाने योग्य भी है। बाकी सारे धर्म तभी तक सार्थक हैं, जब तक उनके भीतर विश्वास जीवित है।

लेकिन आज लगता है मनुष्य का सबसे बड़ा संकट विश्वास का संकट है। हम सामने वाले को स्वीकार करने से पहले उसे अपने जैसा ही बनाना चाहते हैं। बस यहीं से विश्वासघात की आशंका जन्म लेती है और विश्वासघात की प्रवृत्ति भी।

इन्हीं बातों के बीच सोचता हूँ आज मित्र ने जो गिलास मेरी ओर बढ़ाया था, उसमें मेरे झाँककर न देखने का कारण यह नहीं था कि मैं लापरवाह था, बल्कि इसलिए कि वह गिलास किसी अपने के हाथ से दिया गया था। मुझे लगा, विश्वास का अर्थ ही यही है कि हर बार प्रमाण की माँग न की जाए।

हो सकता है, व्यवहारिक दृष्टि से मेरा ऐसा करना सावधानी न माना जाए लेकिन मन की दृष्टि से उस क्षण मैंने 'विश्वास-धर्म' निभाया था। विश्वास में जोखिम हो सकता है, कभी-कभी धोखा भी मिल सकता है, फिर भी विश्वास के बिना न मित्रता टिकती है, न परिवार और न समाज। अंततः सभ्यता का सबसे मजबूत आधार नियम नहीं है, विश्वास ही है।

#चलते_चलते

             मस्त रहिए, आप अपनी जगह सही रहेंगे, तो बहुत-सी चीजें अपने-आप ठीक हो जाती हैं।

#सुबहचर्या

(२४.१०.१९)

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