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रविवार, 29 मार्च 2026

जब बादल घिर-घिर आएंगे, बीते दिन याद दिलाएंगे।”

       सुबह टहल रहा था तभी बीती रात किसी का भविष्यवक्ता की तरह कहा कथन याद आया कि कल पानी बरसेगा‌। आसमान की ओर देखा। सूरज महोदय नभारोहण के अंदाज में बादलों की फांफी के पीछे से झांक रहे थे, जैसे वहीं से हड़का रहे हों कि तुम लोग इस लायक नहीं हो कि मैं बादलों को बरसने दूँ। वे बूँद बनने से बादलों को रोकते जान पड़े‌ और सूरज की गर्मी बढ़ाने में बादल भी उनका साथ देते प्रतीत हुए। यही नहीं ये बादल जैसे सूरज को उकसा रहे थे कि हे सूरज देव महाराज, मुझ बादल को पानी न बनने दें मुझे ताप से विलीन कर दें जिससे भारतनाम्ना भूमि के रहवासी मेरी बूँद-बूँद के लिए तरसें! 

       दरअसल मामला यह है कि बादल का कोई आवारा टुकड़ा गलती से एक पहाड़ी गाँव के किसी घर में उड़ता हुआ चला आया वहाँ उसकी नजर टी.वी समाचार चैनल पर प्रसारित हो रहे बाढ़ की खबरों पर अटक गई थी। इसी खबर की एक हेडिंग को बादल के इस टुकड़े ने पढ़ लिया। हेडिंग थी, “बादल कहर ढाए” “उमड़ा सैलाब, शहर के शहर मचा कोहराम” या “पानी की मनमानी !” इन खबरों के बीच रह-रहकर विज्ञापन भी चल पड़ते! टी वी पर खबरों की ऐसी हेडिंग और रिपोर्टिंग देख बादल का वह टुकड़ा दुखी हो उठा। उसने दो बूंद आँसू टपकाए और रूठकर वहाँ से हवा के एक झोंके की तरह बाहर निकल आया। बादल का वह टुकड़ा फिर घटाओं से आ मिला था। बादल के उस टुकड़े और बादल की घटाओं के बीच मीडिया पर चल रही इन खबरों को लेकर कुछ कानाफूसी हुई। दोनों एकाकार हुए और फिर आसमान में छायी घटा धीरे-धीरे छंट चुकी थी। 

        बादल नाराज हो ग‌ए होंगे! क्योंकि बादल अभी तक यह सोचकर ही बरसते आए थे कि उसकी बूँदों से धरती हरी-भरी होकर खिलखिलाएगी! इसीलिए ये बादल बूँद बनकर बिना भेदभाव के खेत-खलिहान, पोखर, ताल-तलैया, नदी-नाले सबको सराबोर कर उफना देते थे। लेकिन आज का आदमी बादल और उसकी बूँदों को आफत बताने लगा है और जिस पानी के बिन जीवन सून उसी “पानी की मनमानी” से बादल को उसके बरसने पर ही उलाहना देने लगा है! बादल और उसकी बारिश को लेकर पैदा हुई इधर इस न‌ई इंसानी सोच पर बादलों के फोरम पर खूब माथापच्ची हुआ होगा। इस चर्चा से बादलों ने निष्कर्ष निकाला होगा कि "पानी की मनमानी बोलने वालों को अब पानी की जरूरत नहीं, तभी तो इन लोगों ने ताल-तलैया नदी-नालों पर अपने आलीशान बंगले खड़े कर लिए हैं! ये अपनी इस कारस्तानी को भूल उल्टे हमारी बूँदों को दोष देते हैं! जबकि हमारे बरसने के समाचार से अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाकर कमाई करते हैं। मीडिया तो मीडिया! हमारे बरसने पर जैसे राजनीति भी बरस पड़ती है और राजनैतिक लोग अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने लगते हैं।" अंततः बादलों ने, इस विचार मंथन के बरक्स ही, आपस में तय किया होगा कि आसमान में घूमो टहलो खूब, लेकिन बूँद बनकर भारत नाम्ना धरती पर मत टपको। तो, शायद बादल अब इसीलिए नहीं बरसते। 

       बेचारे ये बादल! धरती और इनके बीच अन्योन्याश्रित संबंध ऐसा था कि बादलों को देखने मात्र से धरती जैसे झूमने लगती और बादल भी बरबस बरस पड़ते थे। धरती ऐसी हरी-भरी हो उठती थी कि संवेदनाओं के गीत गाए जाने लगते।टहलते-टहलते मुझे यूँ ही पुराने जमाने का यह गीत “जब बादल घिर-घिर आएंगे, बीते दिन याद दिलाएंगे” याद आया। शायद वर्ष 1985 का जुलाई माह का कोई दिन था जब पहली बार मैंने यह गाना सुना था। मैं उन दिनों सीएमपी डिग्री कॉलेज में बी ए का छात्र था। इलाहाबाद के मध्य चौक घंटाघर के पास रहता था। वहीं से पैदल डिग्री कॉलेज आया-जाया करता था। उस दिन भी पैदल ही कॉलेज से लौट रहा था। आसमान में बादल घिरे हुए थे और बूंदा-बांदी हो रही थी। हीवेट रोड से जीरो रोड की ओर मैं मुड़ चुका था। इस बूँदाबादी में भविष्य के प्रति बेपरवाह और निश्चिंत पैदल चलते जाना उस दिन न जाने क्यों मुझे अच्छा लग रहा था‌। इसी समय किसी के घर में विविध भारती पर बज रहे इस गाने की आवाज मेरे कानों में पड़ी थी। तब से आज तक बारिश में भीगते हुए वह चलना और इस गाने को मैं नहीं भूल पाया हूँ। ये बादल मेरे मन की उस बेपरवाही और निश्चिंतता की मुझे याद दिलाते हैं। इसीलिए बारिश के इन दिनों में, जब भी मैं आसमान की ओर नजरें उठाता हूँ, तो उन्हीं बादलों को खोजता हूँ!!

मन का आलसी होना

       आजकल सुबह देर से सोकर उठते हैं यदि जल्दी उठ भी ग‌ए तो अजीब सी खुमारी मन पर छायी रहती है। इस आलसाये मन को शरीर का शिथिल पड़े रहना अच्छा लगता है। तो, मैं मन का ही साथ देना पसंद करता हूँ। इस बीच चाय-वाय पीते हुए दो अखबार निपटा देता हूँ। तब कहीं जाकर यह खुमारी छंटती है और मन बिस्तर छुड़वाता है। आजकल इनडोर टहलाई की वजह से सिवा दीवालों के कोई विशेष बात नहीं देख पाता कि ढंग की ‘सुबहचर्या’ हो! खैर मन की आज्ञा से सुबह बिस्तर से उठा, ऐप से कदम भी गिनता हूं, इसलिए मोबाईल भी जेब में रखकर टहलाई के कदम बढ़ाने ही जा रहा था कि पत्नी का फोन आया। उन्होंने पूँछा कि टहल-वहल लिए? मैंने कहा, नहीं, अभी इसकी ही तैयारी में हूँ। विजय भाव में वे बोली कि मैं तो टहल चुकी हूँ और पार्क में बेंच पर बैठी हूँ। दरअसल जब हम दोनों में से कोई एक पहले टहल लेता है तो एक दूसरे को ऐसे ही बताता है कि देखो तुम तो बैठे ही रह ग‌ए हम टहल लिए। खैर मैंने भी अपनी सफाई में मन को दोष दे छुट्टी पाया तो वे मुझे उस पार्क का आँखों देखा हाल सुनाने लगीं।

         इस पार्क में प्रायः रिटायर्ड लोगों का ही कब्जा रहता है वे ही आते हैं यहां। इस पार्क में पक्का स्ट्रक्चर कम है इसलिए यह एक सघन हरियाली वाला पार्क है जिसमें पेड़ो की घनी छाया भी रहती है। इसमें बैडमिंटन कोर्ट होने से पैंतालीस पचास वय के नौकरी-पेशा लोग भी यहां आकर रिटायर्ड लोगों के साथ वर्जिशन बैडमिंटन में हाथ अजमाते हैं। बैडमिंटन के खिलाड़ी रिटायर्ड बूढ़े हों या पचास के जवान, सभी पूरे सज-धज के साथ जैसे कि स्पोर्ट्स-शू, हाफ-पैंट और टी-शर्ट पहन पीठ पर रैकेट टांगकर खेलने आते हैं। बाकी रिटायर्ड लोगों में से अधिकांश इधर-उधर ग्रुप में बैठे हुए आपस में गप्प लड़ाते देखे जा सकते हैं या इनमें से कुछ बाबा रामदेव का योगाभ्यास कर रहे होते हैं। इसमें जो ज्यादा बूढ़े हो चले हैं वे इधर-उधर लेटे हुए कनखियों से पार्क में आने-जाने वाले लोगों की गतिविधियों को निहारते रहते हैं। एक जन तो प्रतिदिन घर से केतली भर चाय बनवाकर लाते हैं और साथ में कागज का गिलास भी, वे यह चाय अपने साथी वृद्ध-वृंदो को पिलाते हैं। इनमें एकाध ऐसे भी हैं जो सब कुछ छोड़कर समरसेबल का पाइप पकड़े पार्क में लगे पेड़ों-झाड़ियों में वाटरिंग करते देखे जा सकते हैं। इस प्रकार ये रिटायर्ड वृद्धजन सुबह-सुबह यहां काफी वक्त गुजारते हैं जैसे कि घर वालों के लिए खाली स्पेस छोड़ने की नीयत से पार्क में आए हों। इनके बीच खूब हँसी-ठट्ठा भी चलता है। यहां पार्क में महिलाओं की उपस्थिति लगभग नगण्य रहती है वे इसलिए भी इस पार्क में जाने से संकोच करती हैं कि उनकी उपस्थिति में ये बूढ़े खुलकर हँस-बोल नहीं पाएंगे।

        पत्नी ने यह विवरण देने के बाद कहा कि मेरा मतलब यह सब कुछ बताने का नहीं था आज मेरे सामने एक मजेदार वाकया हुआ। फिर वे उस वाकये को सुनाने लगीं। बैडमिंटन का खेल चल रहा था कि इस खेल में विवाद शुरू हो गया। एक बुजुर्ग जो लगभग पैंसठ साल की उम्र के होंगे इस बात पर अड़े थे कि उनकी चिड़िया अंदर गिरी है, तो दूसरी तरफ दो-तीन लोग थे, जो कह रहे थे कि नहीं, चिड़िया बाहर गिरी है! ये मिलकर बुजुर्ग को सम‌झाते कि मान जाओ चिड़िया बाहर गिरी है तो बुजुर्ग और भड़क उठते। वे इस बात पर अड़े हुए थे कि उनकी आँखें धोखा नहीं खाती, चिड़िया अंदर ही गिरी है। उधर दूसरी ओर बहुमत का आंकड़ा तीन लोगों का था वे किसी कीमत पर मानने को तैयार नहीं थे कि चिड़िया अंदर गिरी है उनके अनुसार चिड़िया बाहर गिरी थी। इस बात पर विवाद बढ़ता ही जा रहा था। उन तीनों में एक पैंतालीस-पचास का युवा उन बुजुर्ग से बहस में काफी मुखर था। वह बाकियों से कुछ ज्यादा ही उनसे उलझा था। उसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं था कि चिड़िया अंदर गिरी है। इन दोनों के बीच खूब गलगर्दन हो रही थी कि अचानक बुजुर्ग जी तैश में आ गए और उस युवा जैसे दिख रहे व्यक्ति को गाली देते हुए बोल बैठे, “...के कल के लौंडे हमें सिखाने निकले हैं कि चिड़िया कहाँ गिरी है..(गाली) मैं अंधा हूँ?” बस फिर क्या था गाली सुनते ही पैंतालीस साल के शख्स ने अपना आपा खो दिया और बुजुर्ग को मारने दौड़ा। उनका गिरेबान पकड़ कर उन्हें झकझोरते उनके साथ धक्का-मुक्की करने लगा। किसी तरह अन्य लोगों ने बीच-बचाव करते हुए उन्हें अलग किया। इधर बुजुर्ग गुस्से में कांपते हुए उससे कह रहे थे कि तुम हमको नहीं जानते हम तुम्हारा वो हाल कराएंगे कि तुम्हारे टुकड़े भी नहीं मिलेंगे! 

        खैर श्रीमती जी पूरी घटना हँसते हुए ऐसे सुनाया जैसे कि रिटायरमेंट के बाद मैं भी इसी दशा को प्राप्त होऊंगा! लेकिन मैंने तपाक से कहा कि मैं तो इस तरह पार्क में जाने से रहा। बहुत जी लिया प्रतिस्पर्धी मन के साथ।अब तो खुरपी लेकर क्यारियों से घास निकालुंगा और पेड़-पौधों को सींचुंगा बस! ऐसे प्रतिस्पर्धी मन का क्या फायदा जो खेल-कूद, योग-ध्यान के बाद भी लोगों का तनाव दूर नहीं होने देता? इससे अच्छा है मन का आलसी होना!! मैंने हँसकर कहा।

#चलते_चलते

         आलसी मन के अपने नफा-नुकसान है, इसका सबसे बड़ा फायदा यही है ऐसों को तनाव नहीं व्यापता और वह स्वस्थ रहता है। और साथ में यह भी कि ऐसे लोग ईर्ष्या-द्वेष और लालचादि दोषों से भी दूर रहते हैं। लेकिन पता नहीं क्या सच है?

#सुबहचर्या

(26.05.2024)

दीवाल पर टंगा सूखा गुलाब

       उस जलप्रवाह के कूल पर गुम्फित झाड़ियों पर फूल खिले दिखाई पड़े तो मैंने सोचा ये फूल भी तो सुंदर हैं कोई वनमाली पूजा या श्रृंगार के लिए इन्हें क्यों नहीं चुनता? क्या शायद इसलिए कि उद्भिज के ये वनफूल सुगंधहीन तृणपुष्प हैं? या फिर वनमाली के सौन्दर्य बोध के प्रतिमान में ये तृणपुष्प अरूप और अनुपयोगी है, इसलिए वह इन्हें नहीं चुनता? 
            
          इन पुष्पित झाड़ियों की परछाइयां जलप्रवाह में निष्पाप शिशु सी अठखेलियां कर रही हैं! इसे देख मेरे अंतस में एक प्रश्न उठा कि वनमाली के मन में सुंदर और असुंदर का भेद क्यों पनपा?
        
        मुझे इस जलतरंग में तरंगायित प्रतिबिम्ब में सब कुछ सुंदर जान पड़ा वहाँ असुंदर कुछ भी नहीं था, तृण-मात्र भी नहीं! आखिर मैं किसको असुंदर कह दूँ उस पीत पर्ण को कहूँ, जो उस पुष्प को जीवन देकर समय-चक्र से बिंध अब झरने वाला है और जिसने मार्ग प्रशस्त किया है नव-पल्लव का!! या फिर उस सूखे तृण को कैसे असुंदर कह दूं, जो सड़कर खाद बना है जिसके पोषण से गुम्फित इस झाड़ी पर ये सुंदर पुष्प खिले!! और तो और, वह जलकौवा, जो अभी-अभी इन्हीं तृण गुंफनो से निकल जलक्रीड़ा करने लगा है, समवेत सभी, इन्हें मैं कैसे असुंदर कह दूं? 
          
           किसी मनचले ने तृण को जलाकर राख बनाई है। राह में पड़ी उस राख को मैं कैसे असुंदर कह दूँ! फिर तो आग भी असुंदर होगी जिसकी कोख से यह धरती जनमी होगी। और यदि धरती असुंदर है तो, हम न होते, ये गुम्फित तृण न होते, और ये पुष्प भी न होते, फिर तो जलप्रवाह की जलतरंगों पर ये परछाइयाँ भी किसी निर्दोष शिशु सी किल्लोल करती न दिखाई पड़ती.! तो फिर, जब धरती असुंदर नहीं तो ऐसी धरती से उपजा कुछ भी असुंदर नहीं!!
        
           वनमाली के होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान थिरक उठी। उसने फूलों की टोकरी से गुलाब के दो फूल उठाए; एक ताजा एक बासी। इनको मेरी अँजुरियों में रखकर बोला इसमें से कोई भी एक फूल मुझे वापस दे दो उसे इस पुष्पमाला में गूँथना है। उस पुष्पमाला को मैंने पलक भर निहारा। फिर अँजुरी में लिए उन गुलाब के दो फूलों में से एक ताजा गुलाब उसे वापस कर दिया था क्योंकि बेचारा बासी गुलाब ताजे फूलों वाली उस पुष्पमाला में गूँथे जाने के लिए अयोग्य था। वनमाली का चेहरा खिल उठा जैसे वह कह रहा हो, यह अयोग्यता ही तो असुंदर होना है! विजय भाव में उसके चेहरे की मुस्कान अब और गहरी हो उठी थी। मुझे वह अब जय-पराजय के भाव में उलझा दिखाई पड़ा।         
        
          सहसा मुझे उस पल की याद आई! मेरी कर्मस्थली किसी दूर शहर में है। उस समय पत्नी मेरे साथ थीं।  एक दिन प्रफुल्लित पंखुड़ियों वाला एक गुलाब उन्हें भा गया इसे उन्होंने मेरे कमरे की दीवाल पर टांग दिया था। जब तक वे मेरे साथ थीं मेरा ध्यान उस गुलाब की ओर नहीं गया। उनके जाने के क‌ई दिन बाद मेरी दृष्टि दीवाल पर टंगे उस गुलाब पर पड़ी! उसकी पंखुड़ियां सूखकर अब काली पड़ चुकी थी। उस सूखे गुलाब को मैंने वहां से निकालकर फेंकना चाहा। लेकिन उस तक मेरा हाथ पहुँचता मुझे वहां ओस से भींगी पंखुड़ियों वाला ताजा गुलाब लगाते पत्नी दिखाई पड़ी! उस पल की स्मृति मेरे हृदय पटल पर जीवंत हो उठी थी। दीवाल पर टंगे इस सूखे गुलाब के फूल को मैं कैसे असुंदर कह दूं? 
         
            मैंने वनमाली से कहा, वनमाली! तू व्यापारी है पुष्पमाला में गूँथे जाने के लिए तुझे बासी फूल देकर तेरा अहित नहीं करना चाहा, बस इतनी सी बात थी। और सुनो! सच में इस धरती पर कुछ भी असुंदर नहीं, इस बासी गुलाब की छोड़ो, सूखे पंखुड़ियों वाला वह गुलाब भी नही, क्योंकि सूखकर भी ये पंखुड़ियां किसी के लिए मधुर स्मृतियों का खजाना बन जाती हैं!
       
              वनमाली सकपका उठा! लेकिन उसकी भौहें तनी थी। जैसे मुझसे चिढ़कर बोला हो, अच्छा! तो तुम्हारे लिए कुछ भी असुंदर नहीं? तुम गरीबी, बेरोजगारी, लाचारी से नहीं गुजरे होगे इसलिए ये भी तुम्हारे लिए असुंदर नहीं और यदि बहुत हुआ तो तुम इन्हें कर्मों का फल बता दोगे, क्यों है न?  और तो और, ईर्ष्या-द्वेष और घृणा जैसे भाव की अनुभूति तो तुम्हें होगी ही ऐसे ही रोग-शोक को भी देखा होगा। तो क्या तुम्हारी दृष्टि में ये भी असुंदर नहीं? 
         
            मैंने सोचा। यह वनमाली व्यापार में संलिप्त है उसकी भेदबुद्धि मेरी बात नहीं समझ पाएगी। इसलिए उससे केवल इतना ही कह पाया मैं, ये बातें धरती से नहीं, धरती पर उपजी हैं। इसे समझो वनमाली! धरती व्यापार नहीं करती यह सौदाई नहीं है! इसलिए जो कुछ धरती ने उपजाया है उसे मैं कैसे असुंदर कह दूँ?
        
           वनमाली के मर्मस्थल को बेध गई थी मेरी यह बात। मुझे उलाहना देकर वह रोषपूर्ण आवाज में बोला, तुम्हारे मन में यह व्यापार से इतनी घृणा क्यों है? तुम किसी का भला क्यों नहीं चाहते? 
        
           पहली बार मैं मुस्कुराया था। मैंने कहा, वनमाली! यदि मैं तेरे व्यापार से घृणा करता तो पुष्पमाला में गूंथे जाने के लिए तुझे वह ताजा गुलाब न दिया होता! इसे समझो, यहां कोई असुंदर नहीं, यह सोचना ही तो दूसरों का भला चाहना है वनमाली।
      
           लेकिन जय और पराजय की द्वंद्वासक्ति में उलझी वनमाली की मन:स्थिति दुस्साध्य प्रतीत हुई। मेरी कोई बात समझने के लिए वह तैयार नहीं था। बोल पड़ा। अच्छा! धरती व्यापार नहीं करती, लेकिन यह विप्लव और विध्वंस क्या है? इसके उत्तर में मुझे किसी कवि या साहित्यकार की क्रांतिकारी कविता नहीं सुननी, कि इनपर सौन्दर्य का उपमान मढ़ तुम कोई बादल राग गाकर इसे सुंदर बता दो! मैं तुम्हारे ऐसे किसी राग के झाँसे में आने वाला नहीं, मुझे मेरे प्रश्न के अर्थ में ही उत्तर चाहिए! तुम्हें यह भी बताना होगा कि क्या प्रलय भी तुम्हारे लिए असुंदर नहीं?
        
            मैं वनमाली के प्रति दयार्द्र हो उठा! वह इस जलप्रवाह की जलतरंगों को नहीं देख रहा। नहीं तो उसे मेरी बात समझ में आती कि इस धरती पर कुछ भी असुंदर नहीं। वह इस भ्रम में है कि जो सुंदर नहीं वह असुंदर है। इस भ्रम पर ही उसका सारा कारोबार संचालित है। मैंने मुस्कुराकर उससे कहा, ठीक है वनमाली! तुम्हारी बातों का उत्तर मैं तब दे पाउंगा जब चारों ओर घोर अँधियारा छाया हो, ऐसी रात्रि प्रहर में तुम मेरे पास आना! मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करुंगा। 
            
        इस समय मुझे निरुत्तर देख वनमाली का मुखमंडल चमक उठा! मैंने देखा, उसके विभाजित मन की खाईं और भी गहरी होकर चौड़ी हो चुकी थी। जैसे इस क्षण को वह जी लेना चाहता हो और बिना कुछ कहे चला गया था। मैं उससे निराश नहीं था। उसे जाते हुए देख मैं यही सोच रहा था कि उसकी यह क्षणजीविता उसे जीवन के रहस्य को नहीं समझने दे रही! फिर भी मैं आशान्वित था कि अपने प्रश्नों का उत्तर पाने वह अवश्य आएगा।
         
         धीरे-धीरे अंधेरे की कालिमा धरती पर छा रही थी। आकाश में तारों ने भी टिमटिमाना शुरू कर दिया था। मुझे वनमाली के आने की प्रतीक्षा थी। पल-प्रतिपल बीत रहा था, काली निशा और भी काली हुई जा रही थी। इस तारांगन में आकाशगंगा की धूमिल रेखा तारागणों का मशाल लेकर निकल पड़ी थी‌। लेकिन वनमाली अभी तक नहीं आया था। यदि वह आता तो इस घनेरी रात में ऊपर आकाश की काली चादर में विखरे इन सितारों को दिखाकर मैं उसे बताता कि देख वनमाली देख! इसे देख! तुम जिस विप्लव, विध्वंस और प्रलय की बात कर रहे हो न, समय की अनंत काली चादर में जड़े इन सितारों की यह पल-प्रतिपल की कहानी है! यह गति मात्र है। जरा ध्यान से देखो इस गति को! यह उस जलप्रवाह के सदृश्य है जिसकी जलतरंगों में हमारी यह धरती भी झिलमिला रही है! अपने अन्तर्मन की गहराई से इसे देखो और बताओ मुझे इस झिलमिल में क्या असुंदर है? 
        
          लेकिन वनमाली नहीं आया। उसकी प्रतीक्षा करते-करते न जाने कब मैं नींद की गोद में चला गया था। 
      
          अचानक एक व्यक्ति मुझे दिखाई दिया। लोगों को धमकाते हुए वह मेरी ओर आ रहा था! उससे लोग भयभीत दिखाई पड़ रहे थे। वह मेरे पास आया। उसके मनोभाव में आक्रामकता थी। उसने किसी हथियार सी चीज को पूरी ताकत से मेरी ओर फेंका जैसे मुझे मारना हो। मैं सहम गया। लेकिन वह वस्तु बगल से होकर मेरे पीछे की ओर चली गई। मैंने पीछे मुड़कर देखा। वहाँ फूलों वाली क्यारी के बगल में एक गिलहरी पीठ के बल गिरी थी। उसके चारों पैर ऊपर आसमान की ओर उठे हुए कांप रहे थे, उसका पूरा शरीर कांप रहा था। यह गिलहरी क्यारी में खिले फूलों पर सरसराते हुए दौड़ लगा रही थी। उस आदमी ने इस गिलहरी को ही लक्ष्यित कर वह वस्तु फेंका था। मैंने देखा गिलहरी को मारने वाला और कोई नहीं वनमाली है! क्रोध से मैं चिल्ला उठा! वनमाली तूने यह क्या किया? इस गिलहरी को तूने क्यों मारा?वनमाली!वनमाली..बोलो वनमाली क्यों मारा इस मासूम गिलहरी को? 
          
       मैं अपनी पूरी शक्ति से चिल्ला रहा था! 
       
        मेरी नींद खुल गई! किसी स्वप्न के बीच से होकर मैं आया था। संयत हुआ तो खिड़की की ओर देखा। खिड़की खुली हुई थी। सूरज वृक्ष की शाखाओं के बीच तक आ ग‌ए थे। पत्तियों से छनकर आती इनकी झिलमिल अरुणिम किरणें बाहर फैल चुके उजाले का संदेश दे रहीं थीं। कानों में पक्षियों की चहचहाहट भी किसी सुमधुर संगीत की तरह गूँज उठी। एक अव्यक्त  सी आनन्दानुभूति के साथ मैंने उस दीवाल की ओर देखा, जिस पर गुलाब का वह फूल टंगा है! दीवाल पर टंगे उस सूखे गुलाब को मैं एकटक निहारने लगा।
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बुधवार, 25 मार्च 2026

अम्मा : स्मृति की अनंत परिधि



         मेरी गाड़ी घर के सामने आकर रुक गई थी, पर दरवाज़े पर अम्मा दिखाई नहीं पड़ीं। पहले ऐसा कभी नहीं होता था। मेरी गाड़ी की आवाज़ सुनते ही वे दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जातीं, जैसे मेरी राह देख रही हों। आज दरवाज़ा वैसा ही था, पर अम्मा नहीं थीं।

     मैं जानता था..अब गाड़ी की आवाज़ सुनकर अम्मा कभी दरवाज़े पर नहीं आएँगी।

     भारी मन से मैं गाड़ी से उतरा और दरवाज़े की ओर बढ़ा, पर कुछ कदम चलकर ही ठिठक गया। भीतर कहीं एक हूक-सी उठी। पहले होता तो सीधे जाकर दरवाज़े पर खड़ी अम्मा के पैर छूता और सामने पड़े तख़्त पर जा बैठता। पीछे-पीछे अम्मा भी अपनी प्लास्टिक की कुर्सी खींचकर तख़्त के पास ले आतीं। उसी कुर्सी पर बैठी वे मेरा हाल-चाल पूछती रहतीं।

       आज तखत भी वहीं था, कुर्सी भी वहीं रखी थी..पर न जाने क्यों उन्हें देखते ही एक अजीब-सा उजाड़ मन में उतर आया। मैंने ध्यान से देखा…तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी।

     यही वह तखत था, जिस पर अम्मा तह किए हुए कपड़े रखती थीं। उनकी छोटी-सी डोलची भी यहीं रहती थी। रोज़मर्रा की कई चीज़ें वे इसी तख़्त पर सहेजकर रख देतीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें ढूँढना न पड़े।

        मैं भी जब नहाने जाता तो अम्मा से ही कह देता, ‘अम्मा, नहाने जा रहा हूँ।’ और वे वहीं से बता देतीं, ‘तौलिया तख़्त पर रखा है, कंघी और तेल की शीशी डोलची में है…शीशा भी उसी में मिल जाएगा।’

      लेकिन आज उस तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी..सिवा एक गहरी उदासी से भरे खालीपन के।

    मैंने दरवाज़े से नज़रें फेर लीं। ठिठके हुए मेरे कदम अनायास ही पापा के कमरे की ओर मुड़ गए। 

       मेरी पहली तैनाती एक सुदूर जिले में हुई थी। पत्नी और बच्चे भी मेरे साथ जा रहे थे। उस दिन घर के इसी दरवाज़े पर अम्मा खड़ी थीं। वे चुपचाप हमें जाते हुए देख रही थीं। उनके चेहरे पर कोई शब्द नहीं था, लेकिन आँखों में एक ऐसी नमी थी जो बहुत कुछ कह रही थी। जैसे मन का सारा स्नेह उस क्षण पलकों तक आकर ठहर गया हो।

       अम्मा हमेशा चाहती थीं कि घर का कोई भी सदस्य उनसे दूर न जाए। परिवार को एक साथ बाँधे रखना जैसे उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प था। शायद इसी जिद में कभी उन्होंने पापा का तबादला बम्बई से इलाहाबाद कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। पापा केन्द्र सरकार की नौकरी में थे, पर अम्मा के लिए नौकरी की चमक-दमक से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि परिवार बिखरे नहीं। वे चाहती थीं कि सब उनकी आँखों के सामने रहें..एक ही आँगन, एक ही छत के नीचे।

      लेकिन उस दिन शायद परिवार के साथ रहने का सुख उनसे दूर जा रहा था।

       बच्चे रिक्शे पर बैठे थे। रिक्शा धीरे-धीरे घर से कच्चे रास्ते से गाँव से बाहर निकलने लगा। पापा उस रिक्शे के साथ-साथ चल पड़े। वे पक्की सड़क के मोड़ तक आए, फिर उससे आगे सड़क पर चलने लगे थे। वे बिना कुछ कहे चलते रहे..जैसे लौटने का मन ही न हो। अंततः जब वे वापस होने को हुए, तो उनकी चाल में एक अनकही थकान उतर आई थी।

       उसी क्षण मेरी आँखें भी भर आई थीं, पर मैंने उन्हें छिपा लिया। उस समय पहली बार लगा, जैसे मैं किसी नौकरी पर नहीं, अपने ही घर से विदा ले रहा हूँ।

        बच्चों का घर से चले जाना अम्मा को भीतर तक दुःखी कर गया था। वही दुःख धीरे-धीरे उनकी चुप रहने वाली सी नाराज़गी में बदलने लगा। इसके बाद वे मुझसे भी कुछ खिंची-खिंची सी रहने लगीं। अम्मा बहुत भावुक थीं, पर उतनी ही स्वाभिमानी भी। अपने मन की पीड़ा वे किसी से कहती नहीं थीं; उसे भीतर ही भीतर जज़्ब कर लेती थीं।

         और मैं, उनके इतने निकट होकर भी, उनके मन की उन हलचलों को समझने की फुर्सत नहीं निकाल पाया।

       अब जब उस दिन को याद करता हूँ, तो लगता है..दरवाज़े पर खड़ी अम्मा की नम आँखें केवल विदा की नहीं थीं; वे एक ऐसे खालीपन की शुरुआत थीं, जिसे समझने में मुझे बहुत हो गई।

          शायद उस दिन घर से केवल मैं ही नहीं गया था, अम्मा के जीवन का एक हिस्सा भी चुपचाप मेरे साथ चला गया था।

          मैं अपनी नौकरी की व्यस्तताओं में इस कदर उलझता चला गया था कि समय जैसे अनजाने ही हाथ से फिसलता जा रहा था, और इधर अम्मा धीरे-धीरे उम्र की ढलान की ओर बढ़ रही थीं। मेरे मोबाइल में ‘अम्मा’ तो दर्ज था, पर विडंबना यह थी कि उस नाम पर उँगली बहुत कम जाती थी। अक्सर मैं पापा के ही मोबाइल पर फोन कर देता। मन में यह सहज-सा विचार आ जाता कि अम्मा भी तो वहीं पास ही होंगी; यदि इच्छा होगी तो पापा से फोन लेकर मुझसे बात कर लेंगी। पर ऐसा शायद ही कभी हुआ।

     वैसे भी, जब कभी फोन पर अम्मा से बात होती, तो वह दो-तीन वाक्यों से आगे बढ़ ही नहीं पाती। वे पूछतीं—‘सब ठीक है?’

        मैं कहता, ‘हाँ, सब ठीक है।’

        फिर वे दुबारा पूछ लेतीं, ‘खूब ठीक है न?’

      और मैं उतने ही संक्षिप्त स्वर में कह देता, ‘हाँ, खूब ठीक है।’

      बस, इस ‘खूब’ के बाद जैसे शब्दों की डोर टूट जाती और बातचीत वहीं समाप्त हो जाती।

      पर एक दिन उनके सब्र का बाँध जैसे चुपचाप टूट गया। बड़ी करुण आवाज़ में वे बोली थीं, ‘तुम्हारे मुँह से “अम्मा” सुनने को तरस जाती हूँ।’

     उनके स्वर में जो पीड़ा थी, वह आज भी मेरे भीतर कहीं गूंजती है। पर उस समय मैं था कि उनकी इस बात को भी हँसकर टाल गया। कभी-कभी तो वे मुझे आधे उलाहने, आधे स्नेह में ‘निर्मोही’ भी कह देतीं।

      अम्मा चाहती थीं कि मैं उनसे हुलसकर बातें करूँ, जैसे बेटा अपनी माँ से करता है। पर न जाने क्यों, मेरे हिस्से में मौन ही अधिक था। और अम्मा कभी-कभी हल्की-सी शिकायत के साथ पूछ बैठतीं, ‘तुम इतना चुप क्यों रहते हो?’     

         मैं अकसर सोच में पड़ जाता कि आख़िर मेरी मानसिक बनावट कैसी है? और क्यों अम्मा मेरे बारे में इस तरह की धारणाएँ बना लेती हैं? इन प्रश्नों के साथ मैं अपनी स्मृतियों की तहों में उतरने लगता।  

      मेरे बालमन पर अंकित सबसे पहली स्मृति कुछ धुँधली-सी, पर गहरी है। मैं घुटनों के बल सरकता हुआ घर की ऊँची डेहरी लाँघने की कोशिश कर रहा हूँ। डेहरी मेरे छोटे कद के लिए बहुत ऊँची है। घर के दूसरे सदस्य वहीं मौजूद हैं, पर जैसे मेरी ओर उनका ध्यान ही नहीं है। कोई मुझे गोद में उठाकर पार नहीं करा रहा, कोई हाथ बढ़ाकर सहारा नहीं देता। उस क्षण मेरे भीतर पहली बार उपेक्षित होने की एक अनजानी अनुभूति जन्म लेती है।

       इस स्मृति का ज़िक्र बाद में मैंने अम्मा से किया, तो उन्होंने मुझे समझाने के अंदाज में बताया था कि उस समय मेरी उम्र मुश्किल से एक वर्ष रही होगी। तब वे बीटीसी की ट्रेनिंग के लिए इलाहाबाद गई हुई थीं और कभी-कभार मुझे भी अपने साथ वहाँ ले जाती थीं। मेरी स्मृतियों में कर्नलगंज का वह कच्चा दोमंज़िला मकान आज भी धुँधली-सी तस्वीर की तरह बसा हुआ है; वही मकान, जहाँ अम्मा अपनी बीटीसी की ट्रेनिंग कर रही थीं।

       एक बार अम्मा क‌ई महीनों की ट्रेनिंग के बाद घर लौटी थीं। इतने लंबे समय बाद उनका लौटना मेरे बालमन को खल गया था। भीतर कहीं रूठा हुआ गुस्सा जमा था। मैं एक डंडा उठाकर उनके पास पहुँचा और उसे उनके सिर पर चला दिया। पर अम्मा ने न तो डाँटा, न ही क्रोध किया, उन्होंने मुझे तुरंत अपनी गोद में खींच लिया। उस क्षण उनके स्नेह ने मेरे बाल-क्रोध को जैसे पिघला दिया।

       अम्मा यह जानतीं थीं कि मैं बचपन से ही उनसे रूठता आया हूँ..कभी-कभी रूठकर मैं अम्मा से बोलना बंद कर देता तब अम्मा भी मुझसे न बोलतीं‌। मैं सोचता रहता कि अम्मा मुझे मनाए तब मैं बोलूँ। लेकिन अम्मा मुझे सुनाते हुए कहतीं कि देखो यह अपने अम्मा से भी नहीं बोलता, इससे मेरे बालमन को ठेस लगता और अचानक मैं ‘अम्मा’ बोल देता। 

         कभी-कभी इन प्रसंगों को यादकर मैं अम्मा से इसकी चर्चा छेड़ देता। तब अम्मा कहतीं, हाँ बाबा बहुत छोटे थे जब आपको छोड़कर मैं बीटीसी की ट्रेनिंग करने गई थीं। इसके बाद वे मेरा बचपन याद कर भावुक हो उठतीं। इन दिनों अम्मा को मेरा बचपन कुछ ज़्यादा ही याद आने लगा था। अक्सर मुझसे बात करते-करते वे एक घटना का ज़िक्र छेड़ देतीं कि… “बाबा, आप साल भर के हो रहे थे जब पहली बार आप खड़े होकर चले थे। आँगन में तुलसी के चौरा के पास खड़े होकर आपका यह चलना देख मैंने खुशी से चिल्लाकर माई (मेरी नानी) को पुकारा था कि माई देख बाबा चलने लगे..!!”  यह बात पूरी होते-होते अम्मा की आँखें छलछला उठती। इधर दो-एक वर्षों से मैं यह भी देख रहा था अम्मा मेरे बचपन की बातें यादकर बेचैन हो उठतीं थीं जैसे उन्हें कोई बात कचोटती हो! जब भी मैं घर आता अम्मा मुझसे पूँछती, बाबा नजदीक ट्रांसफर नहीं होगा! जब मैं कहता, नहीं, इधर नहीं होगा, तो उनकी यह बेचैनी और भी बढ़ जाती। लेकिन अम्मा की यह बेचैनी मैं नहीं समझ सका। 

         जब अम्मा अध्यापिका बनीं तो एक दिन मुझे भी अपने साथ पहली बार स्कूल ले ग‌ईं। अम्मा ने मुझे अन्य बच्चों के बीच बैठा दिया। कक्षा में अन्य बच्चे अपनी-अपनी पुस्तकें पढ़ रहे थे अम्मा ने मुझे भी पढ़ने के लिए एक पुस्तक दिया और किसी शब्द को पढ़ने के लिए कहा‌। उस समय मैं पढ़ना सीख ही रहा था। किसी अनपहचानी सी शब्दाकृति पर मैं अटक गया। इसे पहचानने की कोशिश कर रहा था कि तभी अम्मा का एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गालों पर पड़ा। उस तमाचे की स्मृति आज भी मेरे गालों पर उभर आती है। एक शिक्षिका होने से इतर अम्मा के व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी था जैसे कि वे सत्य के प्रति आग्रहशील और अपने आदर्शों से समझौता न करने वाली महिला थीं। वे साहसी भी थीं। उस जमाने में साइकिल चलाकर अम्मा स्कूल में पढ़ाने जातीं। इसके लिए उन्हें चार से पाँच किलोमीटर तक साइकिल चलाना पड़ता। कभी-कभी अम्मा मुझे भी साइकिल के पीछे कैरियर पर बैठाकर अपने स्कूल लिवा जातीं। वे मुझे घर पर भी पढ़ने के लिए प्रेरित करतीं।        

     पापा, दादा जी की अकेली संतान थे और मैं तीन बहनों में अकेला भाई। इसलिए दादा जी मुझे ‘तुरुक का दातुन’ कहते, यानी सबके लिए प्रिय अकेली चीज। दादा जी का स्वभाव बड़ा अनुशासनप्रिय था। वे जीवन को नियम और संयम की डोरी से बाँधकर जीने में विश्वास रखते थे। बचपन में उन्होंने मुझे अनुशासन का ऐसा कठोर पाठ पढ़ाया कि उसकी छाप मेरे स्वभाव पर गहराई से अंकित हो गई—आज भी उनकी वह सीख जीवन की राह में मेरा मार्गदर्शन करती है। अम्मा भी तो ऐसी ही थीं। कहते हैं कभी-कभी बहुत दुलार से बच्चों के बिगड़ने का डर होता है, यह बात अम्मा को भी पता थी। अम्मा सदैव मुझे अपने आदर्शों पर कसती रहीं-गढ़ती रहीं। एक दिन रसोईं के पास बैठाकर अम्मा ने मुझे एक पाठ बहुत समझाकर पढ़ाया था: सच्चा बालक! किसी कहानी का यह मेरा पहला पाठ था। इस पाठ के बहाने अम्मा ने मुझे जैसे जीवन का पाठ पढ़ाया था‌। इस तरह अनजाने में ही सही अम्मा मुझे अपने तरीके से गढ़ रही थी।

      पर न जाने क्यों, अम्मा के साथ मेरे संबंधों में एक अदृश्य-सा भावनात्मक शीतयुद्ध भी चलता रहा। शायद ऐसा इसलिए होता है कि जो व्यक्ति हमारे जीवन में सबसे अधिक प्रिय और सबसे अधिक निकट होता है, उसके खो जाने का भय भी उतना ही गहरा होता है। संभव है, माँ-बेटे के बीच यह मौन खिंचाव उसी भीतरी आशंका की उपज रहा हो।

       लेकिन इसके पीछे एक और कारण भी रहा होगा। उम्र चाहे जितनी बीत गई हो, अम्मा के सामने जाते ही मैं अनायास वही छोटा-सा बच्चा बन जाता था…हाँ, वही बच्चा, जो शैशव से ही उनसे रूठता-मनाता चला आया था।

      शायद इसी भावनात्मक शीतयुद्ध का परिणाम था कि न तो अम्मा ने मुझ पर अपना अधिकार जताया, न ही मैं उन पर। और जब जीवन के किसी मोड़ पर मुझे लगा कि अब मुझे अम्मा पर अपना अधिकार जताना चाहिए तभी वे इस दुनिया से विदा हो गईं।

        अम्मा ने अपना पूरा जीवन अपनी ही शर्तों पर जिया… स्वाभिमान और संतोष के साथ। उन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं थी; जो मिला, उसे उन्होंने सहज भाव से स्वीकार किया और उसी में प्रसन्न रहना सीखा। शायद वे मुझसे यही चाहती थीं कि मैं उनके पास बैठूँ, उनसे खुलकर, हुलस-हुलसकर बातें करूँ। पर न जाने क्यों, यह छोटी-सी खुशी भी मैं उन्हें नहीं दे पाया।

        मैं मन ही मन सोचता था, नौकरी से निवृत्त होने के बाद फिर एक बच्चे की तरह अम्मा के पास रहूँगा। उनके साथ समय बिताऊँगा, उनसे जी भरकर बातें करूँगा। बरसों से मन में जो कुछ दबा है, उसे उनके सामने उँडेल दूँगा। और जब मेरी बातों से अम्मा के चेहरे पर वह तृप्त मुस्कान लौट आएगी, तब शायद पहली बार मैं उन पर अपना वह सहज अधिकार भी जता सकूँगा, जो एक बेटे को अपनी माँ पर होना चाहिए।

       लेकिन जीवन हमेशा हमारी प्रतीक्षा नहीं करता। मन की वह इच्छा मन में ही रह गई। जब तक मैं उस अधूरे स्नेह को शब्द दे पाता, अम्मा चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गईं…और मेरे हिस्से में रह गईं बस उनकी स्मृतियाँ, और एक ऐसी रिक्तता, जिसे अब कोई भर नहीं सकता।

         अम्मा के भावनात्मक संसार में यदि कोई सबसे अधिक निकट था, तो शायद वह मैं ही था। यह बात मुझे बचपन में उनके साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों से धीरे-धीरे समझ में आई। पर अम्मा का स्वभाव ऐसा था कि वे इस स्नेह को कभी खुलकर दिखने नहीं देती थीं। शायद उन्हें डर रहता कि कहीं ऐसा न लगे कि मैं ही उनका सबसे प्रिय हूँ और बाकी लोग अपने को उपेक्षित समझ बैठें। इसलिए कई बार सबके सामने वे मेरी उपेक्षा भी कर देतीं।

      लेकिन जब मैं घर आता और घर में बस हम दोनों ही होते, तब अम्मा का वह दबा हुआ स्नेह जैसे अपने आप बाहर आ जाता। वे मेरे आसपास ही मँडराती रहतीं…कभी मेरे बचपन की कोई भूली-बिसरी घटना सुनाने लगतीं, कभी तेल की छोटी-सी शीशी उठा लातीं और बड़े स्नेह से मेरे सिर पर मालिश करने बैठ जातीं।

      एक बार उन्हें लगा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। उन्होंने पूछा, ‘डॉक्टर को दिखाया कि नहीं?’ जब मैंने सहज ही ‘नहीं’ कह दिया, तो वे हल्की-सी चिंता में डूबकर बोलीं थीं कि ‘जब अपने को ही नहीं दिखा रहे हो, तो बीमार पड़ने पर अम्मा को डॉक्टर को क्या दिखाओगे?’

     अम्मा की वह साधारण-सी बात आज भीतर कहीं गहरी टीस की तरह चुभ जाती है।

       पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से अम्मा की स्मरण-शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी थी। कभी उन्हें समय का ठीक-ठीक बोध नहीं रहता, कभी स्थान का, तो कभी अभी-अभी घटित कोई छोटी-सी घटना भी उनकी स्मृति से फिसल जाती। उस समय यह सब उम्र के स्वाभाविक ढलान जैसा ही लगा।

       जब मैं गाँव गया, तब भी इन संकेतों को मैंने संकेत की तरह नहीं देखा। अम्मा की लगातार बनी रहने वाली खाँसी को भी साधारण समझकर टाल गया। कई महीनों से उनसे ठीक से कुछ खाया भी नहीं जा रहा था…मैंने इसे भी कोई गंभीर बात नहीं माना। कस्बे के डॉक्टर ने भी सहज स्वर में कह दिया था, “कोई बड़ी बीमारी नहीं है।” 

        शायद उसी एक वाक्य ने मेरी लापरवाही को जैसे एक तर्क दे दिया।

       आज सोचता हूँ…कभी-कभी मनुष्य अपने आश्वस्त रहने की सुविधा के लिए भी सच से आँख चुरा लेता है।

      अम्मा भीतर से बहुत मजबूत थीं। वे अपनी पीड़ा को सहजता के आवरण में छिपाकर जीने की आदी थीं। उनके चेहरे को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन था कि भीतर कोई बीमारी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है।

        और सच तो यह भी है कि अम्मा ने स्वयं भी कभी नहीं कहा, “मैं बीमार हूँ।”

        वे हमेशा यही कहतीं,

        “मैं ठीक हूँ।”

       शायद उन्हें लगता था कि उनकी बीमारी की बात सुनकर मैं व्यर्थ ही व्याकुल हो जाऊँगा।

       एक दिन पहले ही मैंने पापा के फोन पर उनसे बात की थी।

        “हलो अम्मा… अम्मा…!”

        उधर से हल्की-सी आवाज आई…

        “बाबा…”

         “हाँ अम्मा…”

          अम्मा बोलीं,

        “बाबा… घबड़ा जिन। काहे एतना घबड़ात हउ तू सभे? बीमारी-उमारी त होए जाथ है… हम ठीक होइ जाब…एतना परेशान जिन होत जा…”

         इतना कहते-कहते उन्हें खाँसी आ गई।

       मैंने उस खाँसी को भी एक सामान्य खाँसी की तरह ही लिया।

        किसे पता था कि यह हमारे बीच अंतिम संवाद होगा।

       अगले ही दिन अस्पताल में मैंने अम्मा को एक-एक साँस के लिए संघर्ष करते देखा।

        डॉक्टर ने धीमे और लगभग निर्विकार स्वर में कहा…

      “अब बहुत देर हो चुकी है। इन्फेक्शन पूरे फेफड़ों में फैल चुका है। लगभग पूरा फेफड़ा नष्ट हो चुका है। अभी जो ये साँस ले रही हैं, उसमें भी इन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ रही है.. कुछ देर में ये थक जाएंगी फिर इनकी सांसें थम जाएगी..अगर समय रहते इलाज मिल जाता तो शायद स्थिति अलग होती…”

       डॉक्टर की बात सुनते ही जैसे भीतर कहीं गहराई में टूट गया।

       उस क्षण पहली बार अपनी लापरवाही का पूरा आकार दिखाई दिया।

      अम्मा के जीवन और स्वास्थ्य के प्रति मैंने स्वयं घोर उपेक्षा बरती थी। और फिर एक दिन अम्मा नहीं रहीं।

        अम्मा और उनके बेटे के बीच की इस कहानी का वहीं अंत हो गया….या इस कहानी की वहीं से एक दूसरी शुरुआत हुई। 

           उस दिन अम्मा की चिता जल रही थी। चिता से कुछ दूर बैठा मैं अग्नि की लपटों को देर तक देखता रहा। धीरे-धीरे लकड़ियाँ अंगारों में बदल रही थीं, और मेरे भीतर स्मृतियों का एक लंबा सिलसिला खुलता जा रहा था।

तभी पहली बार यह विचार मन में आया…

        समय वास्तव में कितना अमूल्य होता है। हम अक्सर उसे पहचानने में देर कर देते हैं। और जब तक उसकी महत्ता समझ में आती है, तब तक बहुत कुछ हमारे हाथों से छूट चुका होता है।

       उस दिन लगा..अम्मा की चेतना इस दृश्य जगत से उठकर कहीं उस अनंत ब्रह्मांड में विलीन हो गई है। लेकिन धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगा कि अम्मा कहीं गई नहीं हैं। वे अब भी हमारे भीतर हैं…हमारी स्मृतियों में, हमारे व्यवहार में, हमारे निर्णयों में।

       अम्मा चुपचाप हमें गढ़ती रही थीं…मुझे ही नहीं, पूरे परिवार को, अपने आसपास के संसार को भी। उन्होंने अपने एक साधारण-से बेटे को भी ऐसा आत्मविश्वास दिया कि वह अपने दम पर अपना संसार रच सके।

तेरहवीं के दिन किसी ने सुझाव दिया—

       “अम्मा की एक तस्वीर रख दी जाए, ताकि आने वाले लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें।”

        पापा ने मना कर दिया। मुझे भी वही ठीक लगा। क्योंकि उस समय लगा…अम्मा अब किसी एक तस्वीर में समा जाने वाली उपस्थिति नहीं रहीं। वे स्मृति बनकर हमारे भीतर फैल गई हैं….

      एक ऐसी अदृश्य चेतना की तरह, जो शायद अब कभी हमसे दूर नहीं होगी।