आजकल सुबह देर से सोकर उठते हैं यदि जल्दी उठ भी गए तो अजीब सी खुमारी मन पर छायी रहती है। इस आलसाये मन को शरीर का शिथिल पड़े रहना अच्छा लगता है। तो, मैं मन का ही साथ देना पसंद करता हूँ। इस बीच चाय-वाय पीते हुए दो अखबार निपटा देता हूँ। तब कहीं जाकर यह खुमारी छंटती है और मन बिस्तर छुड़वाता है। आजकल इनडोर टहलाई की वजह से सिवा दीवालों के कोई विशेष बात नहीं देख पाता कि ढंग की ‘सुबहचर्या’ हो! खैर मन की आज्ञा से सुबह बिस्तर से उठा, ऐप से कदम भी गिनता हूं, इसलिए मोबाईल भी जेब में रखकर टहलाई के कदम बढ़ाने ही जा रहा था कि पत्नी का फोन आया। उन्होंने पूँछा कि टहल-वहल लिए? मैंने कहा, नहीं, अभी इसकी ही तैयारी में हूँ। विजय भाव में वे बोली कि मैं तो टहल चुकी हूँ और पार्क में बेंच पर बैठी हूँ। दरअसल जब हम दोनों में से कोई एक पहले टहल लेता है तो एक दूसरे को ऐसे ही बताता है कि देखो तुम तो बैठे ही रह गए हम टहल लिए। खैर मैंने भी अपनी सफाई में मन को दोष दे छुट्टी पाया तो वे मुझे उस पार्क का आँखों देखा हाल सुनाने लगीं।
इस पार्क में प्रायः रिटायर्ड लोगों का ही कब्जा रहता है वे ही आते हैं यहां। इस पार्क में पक्का स्ट्रक्चर कम है इसलिए यह एक सघन हरियाली वाला पार्क है जिसमें पेड़ो की घनी छाया भी रहती है। इसमें बैडमिंटन कोर्ट होने से पैंतालीस पचास वय के नौकरी-पेशा लोग भी यहां आकर रिटायर्ड लोगों के साथ वर्जिशन बैडमिंटन में हाथ अजमाते हैं। बैडमिंटन के खिलाड़ी रिटायर्ड बूढ़े हों या पचास के जवान, सभी पूरे सज-धज के साथ जैसे कि स्पोर्ट्स-शू, हाफ-पैंट और टी-शर्ट पहन पीठ पर रैकेट टांगकर खेलने आते हैं। बाकी रिटायर्ड लोगों में से अधिकांश इधर-उधर ग्रुप में बैठे हुए आपस में गप्प लड़ाते देखे जा सकते हैं या इनमें से कुछ बाबा रामदेव का योगाभ्यास कर रहे होते हैं। इसमें जो ज्यादा बूढ़े हो चले हैं वे इधर-उधर लेटे हुए कनखियों से पार्क में आने-जाने वाले लोगों की गतिविधियों को निहारते रहते हैं। एक जन तो प्रतिदिन घर से केतली भर चाय बनवाकर लाते हैं और साथ में कागज का गिलास भी, वे यह चाय अपने साथी वृद्ध-वृंदो को पिलाते हैं। इनमें एकाध ऐसे भी हैं जो सब कुछ छोड़कर समरसेबल का पाइप पकड़े पार्क में लगे पेड़ों-झाड़ियों में वाटरिंग करते देखे जा सकते हैं। इस प्रकार ये रिटायर्ड वृद्धजन सुबह-सुबह यहां काफी वक्त गुजारते हैं जैसे कि घर वालों के लिए खाली स्पेस छोड़ने की नीयत से पार्क में आए हों। इनके बीच खूब हँसी-ठट्ठा भी चलता है। यहां पार्क में महिलाओं की उपस्थिति लगभग नगण्य रहती है वे इसलिए भी इस पार्क में जाने से संकोच करती हैं कि उनकी उपस्थिति में ये बूढ़े खुलकर हँस-बोल नहीं पाएंगे।
पत्नी ने यह विवरण देने के बाद कहा कि मेरा मतलब यह सब कुछ बताने का नहीं था आज मेरे सामने एक मजेदार वाकया हुआ। फिर वे उस वाकये को सुनाने लगीं। बैडमिंटन का खेल चल रहा था कि इस खेल में विवाद शुरू हो गया। एक बुजुर्ग जो लगभग पैंसठ साल की उम्र के होंगे इस बात पर अड़े थे कि उनकी चिड़िया अंदर गिरी है, तो दूसरी तरफ दो-तीन लोग थे, जो कह रहे थे कि नहीं, चिड़िया बाहर गिरी है! ये मिलकर बुजुर्ग को समझाते कि मान जाओ चिड़िया बाहर गिरी है तो बुजुर्ग और भड़क उठते। वे इस बात पर अड़े हुए थे कि उनकी आँखें धोखा नहीं खाती, चिड़िया अंदर ही गिरी है। उधर दूसरी ओर बहुमत का आंकड़ा तीन लोगों का था वे किसी कीमत पर मानने को तैयार नहीं थे कि चिड़िया अंदर गिरी है उनके अनुसार चिड़िया बाहर गिरी थी। इस बात पर विवाद बढ़ता ही जा रहा था। उन तीनों में एक पैंतालीस-पचास का युवा उन बुजुर्ग से बहस में काफी मुखर था। वह बाकियों से कुछ ज्यादा ही उनसे उलझा था। उसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं था कि चिड़िया अंदर गिरी है। इन दोनों के बीच खूब गलगर्दन हो रही थी कि अचानक बुजुर्ग जी तैश में आ गए और उस युवा जैसे दिख रहे व्यक्ति को गाली देते हुए बोल बैठे, “...के कल के लौंडे हमें सिखाने निकले हैं कि चिड़िया कहाँ गिरी है..(गाली) मैं अंधा हूँ?” बस फिर क्या था गाली सुनते ही पैंतालीस साल के शख्स ने अपना आपा खो दिया और बुजुर्ग को मारने दौड़ा। उनका गिरेबान पकड़ कर उन्हें झकझोरते उनके साथ धक्का-मुक्की करने लगा। किसी तरह अन्य लोगों ने बीच-बचाव करते हुए उन्हें अलग किया। इधर बुजुर्ग गुस्से में कांपते हुए उससे कह रहे थे कि तुम हमको नहीं जानते हम तुम्हारा वो हाल कराएंगे कि तुम्हारे टुकड़े भी नहीं मिलेंगे!
खैर श्रीमती जी पूरी घटना हँसते हुए ऐसे सुनाया जैसे कि रिटायरमेंट के बाद मैं भी इसी दशा को प्राप्त होऊंगा! लेकिन मैंने तपाक से कहा कि मैं तो इस तरह पार्क में जाने से रहा। बहुत जी लिया प्रतिस्पर्धी मन के साथ।अब तो खुरपी लेकर क्यारियों से घास निकालुंगा और पेड़-पौधों को सींचुंगा बस! ऐसे प्रतिस्पर्धी मन का क्या फायदा जो खेल-कूद, योग-ध्यान के बाद भी लोगों का तनाव दूर नहीं होने देता? इससे अच्छा है मन का आलसी होना!! मैंने हँसकर कहा।
#चलते_चलते
आलसी मन के अपने नफा-नुकसान है, इसका सबसे बड़ा फायदा यही है ऐसों को तनाव नहीं व्यापता और वह स्वस्थ रहता है। और साथ में यह भी कि ऐसे लोग ईर्ष्या-द्वेष और लालचादि दोषों से भी दूर रहते हैं। लेकिन पता नहीं क्या सच है?
#सुबहचर्या
(26.05.2024)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें