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रविवार, 29 मार्च 2026

दीवाल पर टंगा सूखा गुलाब

       उस जलप्रवाह के कूल पर गुम्फित झाड़ियों पर फूल खिले दिखाई पड़े तो मैंने सोचा ये फूल भी तो सुंदर हैं कोई वनमाली पूजा या श्रृंगार के लिए इन्हें क्यों नहीं चुनता? क्या शायद इसलिए कि उद्भिज के ये वनफूल सुगंधहीन तृणपुष्प हैं? या फिर वनमाली के सौन्दर्य बोध के प्रतिमान में ये तृणपुष्प अरूप और अनुपयोगी है, इसलिए वह इन्हें नहीं चुनता? 
            
          इन पुष्पित झाड़ियों की परछाइयां जलप्रवाह में निष्पाप शिशु सी अठखेलियां कर रही हैं! इसे देख मेरे अंतस में एक प्रश्न उठा कि वनमाली के मन में सुंदर और असुंदर का भेद क्यों पनपा?
        
        मुझे इस जलतरंग में तरंगायित प्रतिबिम्ब में सब कुछ सुंदर जान पड़ा वहाँ असुंदर कुछ भी नहीं था, तृण-मात्र भी नहीं! आखिर मैं किसको असुंदर कह दूँ उस पीत पर्ण को कहूँ, जो उस पुष्प को जीवन देकर समय-चक्र से बिंध अब झरने वाला है और जिसने मार्ग प्रशस्त किया है नव-पल्लव का!! या फिर उस सूखे तृण को कैसे असुंदर कह दूं, जो सड़कर खाद बना है जिसके पोषण से गुम्फित इस झाड़ी पर ये सुंदर पुष्प खिले!! और तो और, वह जलकौवा, जो अभी-अभी इन्हीं तृण गुंफनो से निकल जलक्रीड़ा करने लगा है, समवेत सभी, इन्हें मैं कैसे असुंदर कह दूं? 
          
           किसी मनचले ने तृण को जलाकर राख बनाई है। राह में पड़ी उस राख को मैं कैसे असुंदर कह दूँ! फिर तो आग भी असुंदर होगी जिसकी कोख से यह धरती जनमी होगी। और यदि धरती असुंदर है तो, हम न होते, ये गुम्फित तृण न होते, और ये पुष्प भी न होते, फिर तो जलप्रवाह की जलतरंगों पर ये परछाइयाँ भी किसी निर्दोष शिशु सी किल्लोल करती न दिखाई पड़ती.! तो फिर, जब धरती असुंदर नहीं तो ऐसी धरती से उपजा कुछ भी असुंदर नहीं!!
        
           वनमाली के होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान थिरक उठी। उसने फूलों की टोकरी से गुलाब के दो फूल उठाए; एक ताजा एक बासी। इनको मेरी अँजुरियों में रखकर बोला इसमें से कोई भी एक फूल मुझे वापस दे दो उसे इस पुष्पमाला में गूँथना है। उस पुष्पमाला को मैंने पलक भर निहारा। फिर अँजुरी में लिए उन गुलाब के दो फूलों में से एक ताजा गुलाब उसे वापस कर दिया था क्योंकि बेचारा बासी गुलाब ताजे फूलों वाली उस पुष्पमाला में गूँथे जाने के लिए अयोग्य था। वनमाली का चेहरा खिल उठा जैसे वह कह रहा हो, यह अयोग्यता ही तो असुंदर होना है! विजय भाव में उसके चेहरे की मुस्कान अब और गहरी हो उठी थी। मुझे वह अब जय-पराजय के भाव में उलझा दिखाई पड़ा।         
        
          सहसा मुझे उस पल की याद आई! मेरी कर्मस्थली किसी दूर शहर में है। उस समय पत्नी मेरे साथ थीं।  एक दिन प्रफुल्लित पंखुड़ियों वाला एक गुलाब उन्हें भा गया इसे उन्होंने मेरे कमरे की दीवाल पर टांग दिया था। जब तक वे मेरे साथ थीं मेरा ध्यान उस गुलाब की ओर नहीं गया। उनके जाने के क‌ई दिन बाद मेरी दृष्टि दीवाल पर टंगे उस गुलाब पर पड़ी! उसकी पंखुड़ियां सूखकर अब काली पड़ चुकी थी। उस सूखे गुलाब को मैंने वहां से निकालकर फेंकना चाहा। लेकिन उस तक मेरा हाथ पहुँचता मुझे वहां ओस से भींगी पंखुड़ियों वाला ताजा गुलाब लगाते पत्नी दिखाई पड़ी! उस पल की स्मृति मेरे हृदय पटल पर जीवंत हो उठी थी। दीवाल पर टंगे इस सूखे गुलाब के फूल को मैं कैसे असुंदर कह दूं? 
         
            मैंने वनमाली से कहा, वनमाली! तू व्यापारी है पुष्पमाला में गूँथे जाने के लिए तुझे बासी फूल देकर तेरा अहित नहीं करना चाहा, बस इतनी सी बात थी। और सुनो! सच में इस धरती पर कुछ भी असुंदर नहीं, इस बासी गुलाब की छोड़ो, सूखे पंखुड़ियों वाला वह गुलाब भी नही, क्योंकि सूखकर भी ये पंखुड़ियां किसी के लिए मधुर स्मृतियों का खजाना बन जाती हैं!
       
              वनमाली सकपका उठा! लेकिन उसकी भौहें तनी थी। जैसे मुझसे चिढ़कर बोला हो, अच्छा! तो तुम्हारे लिए कुछ भी असुंदर नहीं? तुम गरीबी, बेरोजगारी, लाचारी से नहीं गुजरे होगे इसलिए ये भी तुम्हारे लिए असुंदर नहीं और यदि बहुत हुआ तो तुम इन्हें कर्मों का फल बता दोगे, क्यों है न?  और तो और, ईर्ष्या-द्वेष और घृणा जैसे भाव की अनुभूति तो तुम्हें होगी ही ऐसे ही रोग-शोक को भी देखा होगा। तो क्या तुम्हारी दृष्टि में ये भी असुंदर नहीं? 
         
            मैंने सोचा। यह वनमाली व्यापार में संलिप्त है उसकी भेदबुद्धि मेरी बात नहीं समझ पाएगी। इसलिए उससे केवल इतना ही कह पाया मैं, ये बातें धरती से नहीं, धरती पर उपजी हैं। इसे समझो वनमाली! धरती व्यापार नहीं करती यह सौदाई नहीं है! इसलिए जो कुछ धरती ने उपजाया है उसे मैं कैसे असुंदर कह दूँ?
        
           वनमाली के मर्मस्थल को बेध गई थी मेरी यह बात। मुझे उलाहना देकर वह रोषपूर्ण आवाज में बोला, तुम्हारे मन में यह व्यापार से इतनी घृणा क्यों है? तुम किसी का भला क्यों नहीं चाहते? 
        
           पहली बार मैं मुस्कुराया था। मैंने कहा, वनमाली! यदि मैं तेरे व्यापार से घृणा करता तो पुष्पमाला में गूंथे जाने के लिए तुझे वह ताजा गुलाब न दिया होता! इसे समझो, यहां कोई असुंदर नहीं, यह सोचना ही तो दूसरों का भला चाहना है वनमाली।
      
           लेकिन जय और पराजय की द्वंद्वासक्ति में उलझी वनमाली की मन:स्थिति दुस्साध्य प्रतीत हुई। मेरी कोई बात समझने के लिए वह तैयार नहीं था। बोल पड़ा। अच्छा! धरती व्यापार नहीं करती, लेकिन यह विप्लव और विध्वंस क्या है? इसके उत्तर में मुझे किसी कवि या साहित्यकार की क्रांतिकारी कविता नहीं सुननी, कि इनपर सौन्दर्य का उपमान मढ़ तुम कोई बादल राग गाकर इसे सुंदर बता दो! मैं तुम्हारे ऐसे किसी राग के झाँसे में आने वाला नहीं, मुझे मेरे प्रश्न के अर्थ में ही उत्तर चाहिए! तुम्हें यह भी बताना होगा कि क्या प्रलय भी तुम्हारे लिए असुंदर नहीं?
        
            मैं वनमाली के प्रति दयार्द्र हो उठा! वह इस जलप्रवाह की जलतरंगों को नहीं देख रहा। नहीं तो उसे मेरी बात समझ में आती कि इस धरती पर कुछ भी असुंदर नहीं। वह इस भ्रम में है कि जो सुंदर नहीं वह असुंदर है। इस भ्रम पर ही उसका सारा कारोबार संचालित है। मैंने मुस्कुराकर उससे कहा, ठीक है वनमाली! तुम्हारी बातों का उत्तर मैं तब दे पाउंगा जब चारों ओर घोर अँधियारा छाया हो, ऐसी रात्रि प्रहर में तुम मेरे पास आना! मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करुंगा। 
            
        इस समय मुझे निरुत्तर देख वनमाली का मुखमंडल चमक उठा! मैंने देखा, उसके विभाजित मन की खाईं और भी गहरी होकर चौड़ी हो चुकी थी। जैसे इस क्षण को वह जी लेना चाहता हो और बिना कुछ कहे चला गया था। मैं उससे निराश नहीं था। उसे जाते हुए देख मैं यही सोच रहा था कि उसकी यह क्षणजीविता उसे जीवन के रहस्य को नहीं समझने दे रही! फिर भी मैं आशान्वित था कि अपने प्रश्नों का उत्तर पाने वह अवश्य आएगा।
         
         धीरे-धीरे अंधेरे की कालिमा धरती पर छा रही थी। आकाश में तारों ने भी टिमटिमाना शुरू कर दिया था। मुझे वनमाली के आने की प्रतीक्षा थी। पल-प्रतिपल बीत रहा था, काली निशा और भी काली हुई जा रही थी। इस तारांगन में आकाशगंगा की धूमिल रेखा तारागणों का मशाल लेकर निकल पड़ी थी‌। लेकिन वनमाली अभी तक नहीं आया था। यदि वह आता तो इस घनेरी रात में ऊपर आकाश की काली चादर में विखरे इन सितारों को दिखाकर मैं उसे बताता कि देख वनमाली देख! इसे देख! तुम जिस विप्लव, विध्वंस और प्रलय की बात कर रहे हो न, समय की अनंत काली चादर में जड़े इन सितारों की यह पल-प्रतिपल की कहानी है! यह गति मात्र है। जरा ध्यान से देखो इस गति को! यह उस जलप्रवाह के सदृश्य है जिसकी जलतरंगों में हमारी यह धरती भी झिलमिला रही है! अपने अन्तर्मन की गहराई से इसे देखो और बताओ मुझे इस झिलमिल में क्या असुंदर है? 
        
          लेकिन वनमाली नहीं आया। उसकी प्रतीक्षा करते-करते न जाने कब मैं नींद की गोद में चला गया था। 
      
          अचानक एक व्यक्ति मुझे दिखाई दिया। लोगों को धमकाते हुए वह मेरी ओर आ रहा था! उससे लोग भयभीत दिखाई पड़ रहे थे। वह मेरे पास आया। उसके मनोभाव में आक्रामकता थी। उसने किसी हथियार सी चीज को पूरी ताकत से मेरी ओर फेंका जैसे मुझे मारना हो। मैं सहम गया। लेकिन वह वस्तु बगल से होकर मेरे पीछे की ओर चली गई। मैंने पीछे मुड़कर देखा। वहाँ फूलों वाली क्यारी के बगल में एक गिलहरी पीठ के बल गिरी थी। उसके चारों पैर ऊपर आसमान की ओर उठे हुए कांप रहे थे, उसका पूरा शरीर कांप रहा था। यह गिलहरी क्यारी में खिले फूलों पर सरसराते हुए दौड़ लगा रही थी। उस आदमी ने इस गिलहरी को ही लक्ष्यित कर वह वस्तु फेंका था। मैंने देखा गिलहरी को मारने वाला और कोई नहीं वनमाली है! क्रोध से मैं चिल्ला उठा! वनमाली तूने यह क्या किया? इस गिलहरी को तूने क्यों मारा?वनमाली!वनमाली..बोलो वनमाली क्यों मारा इस मासूम गिलहरी को? 
          
       मैं अपनी पूरी शक्ति से चिल्ला रहा था! 
       
        मेरी नींद खुल गई! किसी स्वप्न के बीच से होकर मैं आया था। संयत हुआ तो खिड़की की ओर देखा। खिड़की खुली हुई थी। सूरज वृक्ष की शाखाओं के बीच तक आ ग‌ए थे। पत्तियों से छनकर आती इनकी झिलमिल अरुणिम किरणें बाहर फैल चुके उजाले का संदेश दे रहीं थीं। कानों में पक्षियों की चहचहाहट भी किसी सुमधुर संगीत की तरह गूँज उठी। एक अव्यक्त  सी आनन्दानुभूति के साथ मैंने उस दीवाल की ओर देखा, जिस पर गुलाब का वह फूल टंगा है! दीवाल पर टंगे उस सूखे गुलाब को मैं एकटक निहारने लगा।
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