मेरी गाड़ी घर के सामने आकर रुक गई थी, पर दरवाज़े पर अम्मा दिखाई नहीं पड़ीं। पहले ऐसा कभी नहीं होता था। मेरी गाड़ी की आवाज़ सुनते ही वे दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जातीं, जैसे मेरी राह देख रही हों। आज दरवाज़ा वैसा ही था, पर अम्मा नहीं थीं।
मैं जानता था..अब गाड़ी की आवाज़ सुनकर अम्मा कभी दरवाज़े पर नहीं आएँगी।
भारी मन से मैं गाड़ी से उतरा और दरवाज़े की ओर बढ़ा, पर कुछ कदम चलकर ही ठिठक गया। भीतर कहीं एक हूक-सी उठी। पहले होता तो सीधे जाकर दरवाज़े पर खड़ी अम्मा के पैर छूता और सामने पड़े तख़्त पर जा बैठता। पीछे-पीछे अम्मा भी अपनी प्लास्टिक की कुर्सी खींचकर तख़्त के पास ले आतीं। उसी कुर्सी पर बैठी वे मेरा हाल-चाल पूछती रहतीं।
आज तखत भी वहीं था, कुर्सी भी वहीं रखी थी..पर न जाने क्यों उन्हें देखते ही एक अजीब-सा उजाड़ मन में उतर आया। मैंने ध्यान से देखा…तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी।
यही वह तखत था, जिस पर अम्मा तह किए हुए कपड़े रखती थीं। उनकी छोटी-सी डोलची भी यहीं रहती थी। रोज़मर्रा की कई चीज़ें वे इसी तख़्त पर सहेजकर रख देतीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें ढूँढना न पड़े।
मैं भी जब नहाने जाता तो अम्मा से ही कह देता, ‘अम्मा, नहाने जा रहा हूँ।’ और वे वहीं से बता देतीं, ‘तौलिया तख़्त पर रखा है, कंघी और तेल की शीशी डोलची में है…शीशा भी उसी में मिल जाएगा।’
लेकिन आज उस तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी..सिवा एक गहरी उदासी से भरे खालीपन के।
मैंने दरवाज़े से नज़रें फेर लीं। ठिठके हुए मेरे कदम अनायास ही पापा के कमरे की ओर मुड़ गए।
मेरी पहली तैनाती एक सुदूर जिले में हुई थी। पत्नी और बच्चे भी मेरे साथ जा रहे थे। उस दिन घर के इसी दरवाज़े पर अम्मा खड़ी थीं। वे चुपचाप हमें जाते हुए देख रही थीं। उनके चेहरे पर कोई शब्द नहीं था, लेकिन आँखों में एक ऐसी नमी थी जो बहुत कुछ कह रही थी। जैसे मन का सारा स्नेह उस क्षण पलकों तक आकर ठहर गया हो।
अम्मा हमेशा चाहती थीं कि घर का कोई भी सदस्य उनसे दूर न जाए। परिवार को एक साथ बाँधे रखना जैसे उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प था। शायद इसी जिद में कभी उन्होंने पापा का तबादला बम्बई से इलाहाबाद कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। पापा केन्द्र सरकार की नौकरी में थे, पर अम्मा के लिए नौकरी की चमक-दमक से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि परिवार बिखरे नहीं। वे चाहती थीं कि सब उनकी आँखों के सामने रहें..एक ही आँगन, एक ही छत के नीचे।
लेकिन उस दिन शायद परिवार के साथ रहने का सुख उनसे दूर जा रहा था।
बच्चे रिक्शे पर बैठे थे। रिक्शा धीरे-धीरे घर से कच्चे रास्ते से गाँव से बाहर निकलने लगा। पापा उस रिक्शे के साथ-साथ चल पड़े। वे पक्की सड़क के मोड़ तक आए, फिर उससे आगे सड़क पर चलने लगे थे। वे बिना कुछ कहे चलते रहे..जैसे लौटने का मन ही न हो। अंततः जब वे वापस होने को हुए, तो उनकी चाल में एक अनकही थकान उतर आई थी।
उसी क्षण मेरी आँखें भी भर आई थीं, पर मैंने उन्हें छिपा लिया। उस समय पहली बार लगा, जैसे मैं किसी नौकरी पर नहीं, अपने ही घर से विदा ले रहा हूँ।
बच्चों का घर से चले जाना अम्मा को भीतर तक दुःखी कर गया था। वही दुःख धीरे-धीरे उनकी चुप रहने वाली सी नाराज़गी में बदलने लगा। इसके बाद वे मुझसे भी कुछ खिंची-खिंची सी रहने लगीं। अम्मा बहुत भावुक थीं, पर उतनी ही स्वाभिमानी भी। अपने मन की पीड़ा वे किसी से कहती नहीं थीं; उसे भीतर ही भीतर जज़्ब कर लेती थीं।
और मैं, उनके इतने निकट होकर भी, उनके मन की उन हलचलों को समझने की फुर्सत नहीं निकाल पाया।
अब जब उस दिन को याद करता हूँ, तो लगता है..दरवाज़े पर खड़ी अम्मा की नम आँखें केवल विदा की नहीं थीं; वे एक ऐसे खालीपन की शुरुआत थीं, जिसे समझने में मुझे बहुत हो गई।
शायद उस दिन घर से केवल मैं ही नहीं गया था, अम्मा के जीवन का एक हिस्सा भी चुपचाप मेरे साथ चला गया था।
मैं अपनी नौकरी की व्यस्तताओं में इस कदर उलझता चला गया था कि समय जैसे अनजाने ही हाथ से फिसलता जा रहा था, और इधर अम्मा धीरे-धीरे उम्र की ढलान की ओर बढ़ रही थीं। मेरे मोबाइल में ‘अम्मा’ तो दर्ज था, पर विडंबना यह थी कि उस नाम पर उँगली बहुत कम जाती थी। अक्सर मैं पापा के ही मोबाइल पर फोन कर देता। मन में यह सहज-सा विचार आ जाता कि अम्मा भी तो वहीं पास ही होंगी; यदि इच्छा होगी तो पापा से फोन लेकर मुझसे बात कर लेंगी। पर ऐसा शायद ही कभी हुआ।
वैसे भी, जब कभी फोन पर अम्मा से बात होती, तो वह दो-तीन वाक्यों से आगे बढ़ ही नहीं पाती। वे पूछतीं—‘सब ठीक है?’
मैं कहता, ‘हाँ, सब ठीक है।’
फिर वे दुबारा पूछ लेतीं, ‘खूब ठीक है न?’
और मैं उतने ही संक्षिप्त स्वर में कह देता, ‘हाँ, खूब ठीक है।’
बस, इस ‘खूब’ के बाद जैसे शब्दों की डोर टूट जाती और बातचीत वहीं समाप्त हो जाती।
पर एक दिन उनके सब्र का बाँध जैसे चुपचाप टूट गया। बड़ी करुण आवाज़ में वे बोली थीं, ‘तुम्हारे मुँह से “अम्मा” सुनने को तरस जाती हूँ।’
उनके स्वर में जो पीड़ा थी, वह आज भी मेरे भीतर कहीं गूंजती है। पर उस समय मैं था कि उनकी इस बात को भी हँसकर टाल गया। कभी-कभी तो वे मुझे आधे उलाहने, आधे स्नेह में ‘निर्मोही’ भी कह देतीं।
अम्मा चाहती थीं कि मैं उनसे हुलसकर बातें करूँ, जैसे बेटा अपनी माँ से करता है। पर न जाने क्यों, मेरे हिस्से में मौन ही अधिक था। और अम्मा कभी-कभी हल्की-सी शिकायत के साथ पूछ बैठतीं, ‘तुम इतना चुप क्यों रहते हो?’
मैं अकसर सोच में पड़ जाता कि आख़िर मेरी मानसिक बनावट कैसी है? और क्यों अम्मा मेरे बारे में इस तरह की धारणाएँ बना लेती हैं? इन प्रश्नों के साथ मैं अपनी स्मृतियों की तहों में उतरने लगता।
मेरे बालमन पर अंकित सबसे पहली स्मृति कुछ धुँधली-सी, पर गहरी है। मैं घुटनों के बल सरकता हुआ घर की ऊँची डेहरी लाँघने की कोशिश कर रहा हूँ। डेहरी मेरे छोटे कद के लिए बहुत ऊँची है। घर के दूसरे सदस्य वहीं मौजूद हैं, पर जैसे मेरी ओर उनका ध्यान ही नहीं है। कोई मुझे गोद में उठाकर पार नहीं करा रहा, कोई हाथ बढ़ाकर सहारा नहीं देता। उस क्षण मेरे भीतर पहली बार उपेक्षित होने की एक अनजानी अनुभूति जन्म लेती है।
इस स्मृति का ज़िक्र बाद में मैंने अम्मा से किया, तो उन्होंने मुझे समझाने के अंदाज में बताया था कि उस समय मेरी उम्र मुश्किल से एक वर्ष रही होगी। तब वे बीटीसी की ट्रेनिंग के लिए इलाहाबाद गई हुई थीं और कभी-कभार मुझे भी अपने साथ वहाँ ले जाती थीं। मेरी स्मृतियों में कर्नलगंज का वह कच्चा दोमंज़िला मकान आज भी धुँधली-सी तस्वीर की तरह बसा हुआ है; वही मकान, जहाँ अम्मा अपनी बीटीसी की ट्रेनिंग कर रही थीं।
एक बार अम्मा कई महीनों की ट्रेनिंग के बाद घर लौटी थीं। इतने लंबे समय बाद उनका लौटना मेरे बालमन को खल गया था। भीतर कहीं रूठा हुआ गुस्सा जमा था। मैं एक डंडा उठाकर उनके पास पहुँचा और उसे उनके सिर पर चला दिया। पर अम्मा ने न तो डाँटा, न ही क्रोध किया, उन्होंने मुझे तुरंत अपनी गोद में खींच लिया। उस क्षण उनके स्नेह ने मेरे बाल-क्रोध को जैसे पिघला दिया।
अम्मा यह जानतीं थीं कि मैं बचपन से ही उनसे रूठता आया हूँ..कभी-कभी रूठकर मैं अम्मा से बोलना बंद कर देता तब अम्मा भी मुझसे न बोलतीं। मैं सोचता रहता कि अम्मा मुझे मनाए तब मैं बोलूँ। लेकिन अम्मा मुझे सुनाते हुए कहतीं कि देखो यह अपने अम्मा से भी नहीं बोलता, इससे मेरे बालमन को ठेस लगता और अचानक मैं ‘अम्मा’ बोल देता।
कभी-कभी इन प्रसंगों को यादकर मैं अम्मा से इसकी चर्चा छेड़ देता। तब अम्मा कहतीं, हाँ बाबा बहुत छोटे थे जब आपको छोड़कर मैं बीटीसी की ट्रेनिंग करने गई थीं। इसके बाद वे मेरा बचपन याद कर भावुक हो उठतीं। इन दिनों अम्मा को मेरा बचपन कुछ ज़्यादा ही याद आने लगा था। अक्सर मुझसे बात करते-करते वे एक घटना का ज़िक्र छेड़ देतीं कि… “बाबा, आप साल भर के हो रहे थे जब पहली बार आप खड़े होकर चले थे। आँगन में तुलसी के चौरा के पास खड़े होकर आपका यह चलना देख मैंने खुशी से चिल्लाकर माई (मेरी नानी) को पुकारा था कि माई देख बाबा चलने लगे..!!” यह बात पूरी होते-होते अम्मा की आँखें छलछला उठती। इधर दो-एक वर्षों से मैं यह भी देख रहा था अम्मा मेरे बचपन की बातें यादकर बेचैन हो उठतीं थीं जैसे उन्हें कोई बात कचोटती हो! जब भी मैं घर आता अम्मा मुझसे पूँछती, बाबा नजदीक ट्रांसफर नहीं होगा! जब मैं कहता, नहीं, इधर नहीं होगा, तो उनकी यह बेचैनी और भी बढ़ जाती। लेकिन अम्मा की यह बेचैनी मैं नहीं समझ सका।
जब अम्मा अध्यापिका बनीं तो एक दिन मुझे भी अपने साथ पहली बार स्कूल ले गईं। अम्मा ने मुझे अन्य बच्चों के बीच बैठा दिया। कक्षा में अन्य बच्चे अपनी-अपनी पुस्तकें पढ़ रहे थे अम्मा ने मुझे भी पढ़ने के लिए एक पुस्तक दिया और किसी शब्द को पढ़ने के लिए कहा। उस समय मैं पढ़ना सीख ही रहा था। किसी अनपहचानी सी शब्दाकृति पर मैं अटक गया। इसे पहचानने की कोशिश कर रहा था कि तभी अम्मा का एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गालों पर पड़ा। उस तमाचे की स्मृति आज भी मेरे गालों पर उभर आती है। एक शिक्षिका होने से इतर अम्मा के व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी था जैसे कि वे सत्य के प्रति आग्रहशील और अपने आदर्शों से समझौता न करने वाली महिला थीं। वे साहसी भी थीं। उस जमाने में साइकिल चलाकर अम्मा स्कूल में पढ़ाने जातीं। इसके लिए उन्हें चार से पाँच किलोमीटर तक साइकिल चलाना पड़ता। कभी-कभी अम्मा मुझे भी साइकिल के पीछे कैरियर पर बैठाकर अपने स्कूल लिवा जातीं। वे मुझे घर पर भी पढ़ने के लिए प्रेरित करतीं।
पापा, दादा जी की अकेली संतान थे और मैं तीन बहनों में अकेला भाई। इसलिए दादा जी मुझे ‘तुरुक का दातुन’ कहते, यानी सबके लिए प्रिय अकेली चीज। दादा जी का स्वभाव बड़ा अनुशासनप्रिय था। वे जीवन को नियम और संयम की डोरी से बाँधकर जीने में विश्वास रखते थे। बचपन में उन्होंने मुझे अनुशासन का ऐसा कठोर पाठ पढ़ाया कि उसकी छाप मेरे स्वभाव पर गहराई से अंकित हो गई—आज भी उनकी वह सीख जीवन की राह में मेरा मार्गदर्शन करती है। अम्मा भी तो ऐसी ही थीं। कहते हैं कभी-कभी बहुत दुलार से बच्चों के बिगड़ने का डर होता है, यह बात अम्मा को भी पता थी। अम्मा सदैव मुझे अपने आदर्शों पर कसती रहीं-गढ़ती रहीं। एक दिन रसोईं के पास बैठाकर अम्मा ने मुझे एक पाठ बहुत समझाकर पढ़ाया था: सच्चा बालक! किसी कहानी का यह मेरा पहला पाठ था। इस पाठ के बहाने अम्मा ने मुझे जैसे जीवन का पाठ पढ़ाया था। इस तरह अनजाने में ही सही अम्मा मुझे अपने तरीके से गढ़ रही थी।
पर न जाने क्यों, अम्मा के साथ मेरे संबंधों में एक अदृश्य-सा भावनात्मक शीतयुद्ध भी चलता रहा। शायद ऐसा इसलिए होता है कि जो व्यक्ति हमारे जीवन में सबसे अधिक प्रिय और सबसे अधिक निकट होता है, उसके खो जाने का भय भी उतना ही गहरा होता है। संभव है, माँ-बेटे के बीच यह मौन खिंचाव उसी भीतरी आशंका की उपज रहा हो।
लेकिन इसके पीछे एक और कारण भी रहा होगा। उम्र चाहे जितनी बीत गई हो, अम्मा के सामने जाते ही मैं अनायास वही छोटा-सा बच्चा बन जाता था…हाँ, वही बच्चा, जो शैशव से ही उनसे रूठता-मनाता चला आया था।
शायद इसी भावनात्मक शीतयुद्ध का परिणाम था कि न तो अम्मा ने मुझ पर अपना अधिकार जताया, न ही मैं उन पर। और जब जीवन के किसी मोड़ पर मुझे लगा कि अब मुझे अम्मा पर अपना अधिकार जताना चाहिए तभी वे इस दुनिया से विदा हो गईं।
अम्मा ने अपना पूरा जीवन अपनी ही शर्तों पर जिया… स्वाभिमान और संतोष के साथ। उन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं थी; जो मिला, उसे उन्होंने सहज भाव से स्वीकार किया और उसी में प्रसन्न रहना सीखा। शायद वे मुझसे यही चाहती थीं कि मैं उनके पास बैठूँ, उनसे खुलकर, हुलस-हुलसकर बातें करूँ। पर न जाने क्यों, यह छोटी-सी खुशी भी मैं उन्हें नहीं दे पाया।
मैं मन ही मन सोचता था, नौकरी से निवृत्त होने के बाद फिर एक बच्चे की तरह अम्मा के पास रहूँगा। उनके साथ समय बिताऊँगा, उनसे जी भरकर बातें करूँगा। बरसों से मन में जो कुछ दबा है, उसे उनके सामने उँडेल दूँगा। और जब मेरी बातों से अम्मा के चेहरे पर वह तृप्त मुस्कान लौट आएगी, तब शायद पहली बार मैं उन पर अपना वह सहज अधिकार भी जता सकूँगा, जो एक बेटे को अपनी माँ पर होना चाहिए।
लेकिन जीवन हमेशा हमारी प्रतीक्षा नहीं करता। मन की वह इच्छा मन में ही रह गई। जब तक मैं उस अधूरे स्नेह को शब्द दे पाता, अम्मा चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गईं…और मेरे हिस्से में रह गईं बस उनकी स्मृतियाँ, और एक ऐसी रिक्तता, जिसे अब कोई भर नहीं सकता।
अम्मा के भावनात्मक संसार में यदि कोई सबसे अधिक निकट था, तो शायद वह मैं ही था। यह बात मुझे बचपन में उनके साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों से धीरे-धीरे समझ में आई। पर अम्मा का स्वभाव ऐसा था कि वे इस स्नेह को कभी खुलकर दिखने नहीं देती थीं। शायद उन्हें डर रहता कि कहीं ऐसा न लगे कि मैं ही उनका सबसे प्रिय हूँ और बाकी लोग अपने को उपेक्षित समझ बैठें। इसलिए कई बार सबके सामने वे मेरी उपेक्षा भी कर देतीं।
लेकिन जब मैं घर आता और घर में बस हम दोनों ही होते, तब अम्मा का वह दबा हुआ स्नेह जैसे अपने आप बाहर आ जाता। वे मेरे आसपास ही मँडराती रहतीं…कभी मेरे बचपन की कोई भूली-बिसरी घटना सुनाने लगतीं, कभी तेल की छोटी-सी शीशी उठा लातीं और बड़े स्नेह से मेरे सिर पर मालिश करने बैठ जातीं।
एक बार उन्हें लगा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। उन्होंने पूछा, ‘डॉक्टर को दिखाया कि नहीं?’ जब मैंने सहज ही ‘नहीं’ कह दिया, तो वे हल्की-सी चिंता में डूबकर बोलीं थीं कि ‘जब अपने को ही नहीं दिखा रहे हो, तो बीमार पड़ने पर अम्मा को डॉक्टर को क्या दिखाओगे?’
अम्मा की वह साधारण-सी बात आज भीतर कहीं गहरी टीस की तरह चुभ जाती है।
पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से अम्मा की स्मरण-शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी थी। कभी उन्हें समय का ठीक-ठीक बोध नहीं रहता, कभी स्थान का, तो कभी अभी-अभी घटित कोई छोटी-सी घटना भी उनकी स्मृति से फिसल जाती। उस समय यह सब उम्र के स्वाभाविक ढलान जैसा ही लगा।
जब मैं गाँव गया, तब भी इन संकेतों को मैंने संकेत की तरह नहीं देखा। अम्मा की लगातार बनी रहने वाली खाँसी को भी साधारण समझकर टाल गया। कई महीनों से उनसे ठीक से कुछ खाया भी नहीं जा रहा था…मैंने इसे भी कोई गंभीर बात नहीं माना। कस्बे के डॉक्टर ने भी सहज स्वर में कह दिया था, “कोई बड़ी बीमारी नहीं है।”
शायद उसी एक वाक्य ने मेरी लापरवाही को जैसे एक तर्क दे दिया।
आज सोचता हूँ…कभी-कभी मनुष्य अपने आश्वस्त रहने की सुविधा के लिए भी सच से आँख चुरा लेता है।
अम्मा भीतर से बहुत मजबूत थीं। वे अपनी पीड़ा को सहजता के आवरण में छिपाकर जीने की आदी थीं। उनके चेहरे को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन था कि भीतर कोई बीमारी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है।
और सच तो यह भी है कि अम्मा ने स्वयं भी कभी नहीं कहा, “मैं बीमार हूँ।”
वे हमेशा यही कहतीं,
“मैं ठीक हूँ।”
शायद उन्हें लगता था कि उनकी बीमारी की बात सुनकर मैं व्यर्थ ही व्याकुल हो जाऊँगा।
एक दिन पहले ही मैंने पापा के फोन पर उनसे बात की थी।
“हलो अम्मा… अम्मा…!”
उधर से हल्की-सी आवाज आई…
“बाबा…”
“हाँ अम्मा…”
अम्मा बोलीं,
“बाबा… घबड़ा जिन। काहे एतना घबड़ात हउ तू सभे? बीमारी-उमारी त होए जाथ है… हम ठीक होइ जाब…एतना परेशान जिन होत जा…”
इतना कहते-कहते उन्हें खाँसी आ गई।
मैंने उस खाँसी को भी एक सामान्य खाँसी की तरह ही लिया।
किसे पता था कि यह हमारे बीच अंतिम संवाद होगा।
अगले ही दिन अस्पताल में मैंने अम्मा को एक-एक साँस के लिए संघर्ष करते देखा।
डॉक्टर ने धीमे और लगभग निर्विकार स्वर में कहा…
“अब बहुत देर हो चुकी है। इन्फेक्शन पूरे फेफड़ों में फैल चुका है। लगभग पूरा फेफड़ा नष्ट हो चुका है। अभी जो ये साँस ले रही हैं, उसमें भी इन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ रही है.. कुछ देर में ये थक जाएंगी फिर इनकी सांसें थम जाएगी..अगर समय रहते इलाज मिल जाता तो शायद स्थिति अलग होती…”
डॉक्टर की बात सुनते ही जैसे भीतर कहीं गहराई में टूट गया।
उस क्षण पहली बार अपनी लापरवाही का पूरा आकार दिखाई दिया।
अम्मा के जीवन और स्वास्थ्य के प्रति मैंने स्वयं घोर उपेक्षा बरती थी। और फिर एक दिन अम्मा नहीं रहीं।
अम्मा और उनके बेटे के बीच की इस कहानी का वहीं अंत हो गया….या इस कहानी की वहीं से एक दूसरी शुरुआत हुई।
उस दिन अम्मा की चिता जल रही थी। चिता से कुछ दूर बैठा मैं अग्नि की लपटों को देर तक देखता रहा। धीरे-धीरे लकड़ियाँ अंगारों में बदल रही थीं, और मेरे भीतर स्मृतियों का एक लंबा सिलसिला खुलता जा रहा था।
तभी पहली बार यह विचार मन में आया…
समय वास्तव में कितना अमूल्य होता है। हम अक्सर उसे पहचानने में देर कर देते हैं। और जब तक उसकी महत्ता समझ में आती है, तब तक बहुत कुछ हमारे हाथों से छूट चुका होता है।
उस दिन लगा..अम्मा की चेतना इस दृश्य जगत से उठकर कहीं उस अनंत ब्रह्मांड में विलीन हो गई है। लेकिन धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगा कि अम्मा कहीं गई नहीं हैं। वे अब भी हमारे भीतर हैं…हमारी स्मृतियों में, हमारे व्यवहार में, हमारे निर्णयों में।
अम्मा चुपचाप हमें गढ़ती रही थीं…मुझे ही नहीं, पूरे परिवार को, अपने आसपास के संसार को भी। उन्होंने अपने एक साधारण-से बेटे को भी ऐसा आत्मविश्वास दिया कि वह अपने दम पर अपना संसार रच सके।
तेरहवीं के दिन किसी ने सुझाव दिया—
“अम्मा की एक तस्वीर रख दी जाए, ताकि आने वाले लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें।”
पापा ने मना कर दिया। मुझे भी वही ठीक लगा। क्योंकि उस समय लगा…अम्मा अब किसी एक तस्वीर में समा जाने वाली उपस्थिति नहीं रहीं। वे स्मृति बनकर हमारे भीतर फैल गई हैं….
एक ऐसी अदृश्य चेतना की तरह, जो शायद अब कभी हमसे दूर नहीं होगी।
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