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शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

दबंगई का विजन...

            मतदाता पुनरीक्षण का कार्य चल रहा है। सो, हम भी इस काम-धाम की जाँच के लिए अपने जोन में निकल लिए।  बूथ-ऊथ देखते रहे। घटने-बढ़ने वाले मतदाताओं की जानकारी करते रहे। एक चर्चा के दौरान यह बात उठी थी कि अविवाहित लड़कियों की उम्र अट्ठारह वर्ष हो जाने के बाद भी, खासकर गाँवों में, परिवार के लोग मतदाता सूची में इन लड़कियों का नाम शामिल कराने से कतराते हैं। और विवाहित होने पर ससुराल की मतदाता सूची में नाम शामिल हो जाने का तर्क देते हुए सूची में नाम शामिल कराने में रुचि नहीं लेते। खैर, इसके पीछे कुछ अन्य कारण भी होंगे। यह परम्परा से चली आती अधिकारों की गँवई मानसिकता हो सकती है। इसीलिए परम्पराओं की लीक पकड़ कर चलना सदैव ठीक नहीं माना जा सकता। 
         इस सम्बन्ध में एक बूथ पर पूँछने पर बताया गया कि, "ऐसी बात नहीं है, लोग इस वजह से भी मतदाता सूची में शामिल होना चाहते हैं कि मतदाता-पहचानपत्र से उनकी पहचान होती है। आजकल इसकी बहुत जरूरत पड़ने लगी है।" मतलब हो सकता है उपरोक्त बात में आंशिक सत्य हो।
     
           एक बूथ पर वहाँ की जनसंख्या के अनुपात में अधिक मतदाता दिखाई दिए। बी एल ओ ने बताया कि रिकार्ड में जनसंख्या वास्तविक जनसंख्या से कम दर्ज है। कुछ लोग किसी शहर-वहर में निवास करने के बाद भी गाँव की मतदाता सूची में अपना नाम इसलिए देखना चाहते हैं कि, इसमें वे अपनी जड़ तलाश कर रहे होते हैं। मैं इसपर, उसे कुछ सजेशन सा देते हुए सूची से, गाँव से बाहर निवास करने वालों के नाम हटाने के लिए कहा। तो, गाँव के दबंग किस्म के लोगों के डर से, उसने ऐसा करने में कुछ असमर्थता सी व्यक्त की। लेकिन, मैंने उसे थोड़ी हिम्मत बधाई। हालाँकि, गाँव का श्रमिक वर्ग शहरों में मौसमी मजदूरी करने निकल जाता है, जो दो-चार माह बाद वापस भी आ जाते हैं, लेकिन इस चक्कर में उनका भी नाम मतदाता सूची से कट जाने का अंदेशा रहता है। जब दबंगों पर आँच आती है तो वह भी अपने विरोधी ऐसे लोगों का मतदाता-सूची से नाम कटवाने का प्रयास करते हैं। खैर, मैंने बी एल ओ से सावधानी पूर्वक काम करने की बात कह आगे बढ़ गया था। 

           ये दबंग भी गाँव-गाँव विद्यमान है। वाकई! देश को इनसे भी आजादी चाहिए। इनके कारण लोग अपने काम को ढंग से कर ही नहीं पाते। ऐसे ही एक बूथ पर, एक सदियों पुराना किला दिखाई दिया। वह पहाड़नुमा बड़े-बड़े पत्थर के चट्टानों के सहारे बनाया गया था। एक व्यक्ति ने मुझे बताया "यह छत्रसाल के जमाने का है।" इस किले में कई गुप्त-द्वार, तहखाने, सुरंगों के होने का आभास हुआ, जो समय की मिट्टी में, जैसे दब चुके दिखाई दिए थे। 

             इस किले को देखते हुए मन में खयाल आया, तब के दबंग ऐसे किलों में रहते थे। और, इस किले में हो सकता है, तमाम चींखें भी गूँजी हो, जो इस किले की दिवारों से टकराकर शान्त हो गई हों। लेकिन आज के दबंगों को, किसी किले की जरूरत नहीं है, उसके लिए हमईं लोग काफी हैं, हम ही दबंगों के लिए उनके किले हैं। और आज, लोग चीखते भी नहीं, अगर चीखें भी तो इनकी ऐसी आवाजें, अब फाइलों के पन्नों के तहखाने, सुरंगों में गायब हो, धीरे-धीरे समय के साथ दब जाती है। इसीलिए पुराने पत्थर के किले अब ढह चुके हैं और जो बचे हैं वे भी ढह ही रहे हैं। और, किले का स्वरूप बदल गया है, अब ये किले, पन्नों, फाइलों में तब्दील हो चुके हैं। साथ ही दबंगों का आभामंडल भी बदल चुका है। 
          फिर दूसरे गाँव से गुजरे। गाँव के किनारे एक बड़ा सा तालाब था। लेकिन ऊँचे बंधों के कारण तालाब दिखाई नहीं दे रहा था। बँधे के ऊपर कुछ पेड़ थे। बरगद, पीपल, पाकड़ जैसे पेड़। एक पेड़ के नीचे एक छोटा सा मन्दिर बना था। उस मन्दिर पर कुछ ग्रामीण महिलाएँ धूप-दीप दे रही थी। उसी बँधे के ऊपर पच्चीस तीस लड़के कई समूहों में बैठे-खड़े दिखाई दिए। मुझे गाँव में अपने बचपन की याद आई। खैर...
        इधर हाल ही में यहाँ कई तालाबों का खुदाई भी कराई गई है, सो जिज्ञासा वश उस तालाब की स्थिति देखने मैं, बँधे पर चढ़ गया। हाँ, मैंने ध्यान दिया कि बंधे पर मुझे चढ़ते देख कुछ लड़के भागे भी थे। तालाब में पानी भरा था। बच्चे तैर रहे थे, तथा गाँव की कुछ औरते तालाब में नहा भी रहीं थी। तालाब के बँधे से वापस हो लिया। बंधे से उतरते हुए, मैंने वहीं एक आदमी को हैंडपंप पर कप गिलास धोते देखा। किसी उपन्यास में वर्णित ग्रामीण-परिवेश जैसा यह दृश्य जीवंत हो गया। 
          गाड़ी में बैठते ही मेरे ड्राइवर ने बताया, हैंडपंप पर आदमी शराब का कप-गिलास धो रहा था और वहीं पास में शराब की दूकान भी खुली थी। तब तक रामकिशोर ने मुझे एक और जानकारी दी, "बंधे पर आपको देखकर जो लड़के भागे थे, वे जुआ खेल रहे थे।" खैर, बचपन में गाँव में हम भी तो, खूब "दहला-पकड़" खेले थे। ताश का यही खेल मुझे सबसे आसान लगता था। वैसे, शुरुआती दिनों में हम बच्चे बड़ों से छिपकर यह खेल खेलते थे। लेकिन, ये बच्चे मुझे देखकर भागे थे, जबकि मैं इनके घर का बड़ा भी नहीं था। हो सकता है, ये जुआ ही खेल रहे हों। गाँवों में घूमते हुए यह दृश्य आम है। सच में, जिस उर्जा से तस्वीर बदली जा सकती है, तमाम किले ढहाए जा सकते हैं, वही उर्जा बर्बाद हो रही है, आहिस्ता-आहिस्ता सा..! शराब का वह ठेका भी किसी दबंग का ही रहा होगा।
           हमारा ग्राम्य-जीवन बिना किसी "विजन" के आहिस्ता-आहिस्ता केवल सरक सा रहा है। जो लोग केवल ग्राम के होकर रह गए हैं उनके लिए सरकारें काम तो करती हैं, लेकिन इन्हें कोई विजन नहीं दे पाती। सरकारें विजन देने में नाकाम रही हैं। अब "दबंगई" भी एक नए "विजन" के रूप में सामने आई है। हाँ, यह मतदाता सूची भी तो नए-नए दबंग पैदा करती है, दबंगई का ही विजन देती है। और, भारत में लोकतंत्र और कुछ नहीं तो, दबंगई का विजन तो है ही। 

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

डरना जरूरी है!

आज सुबह स्टेडियम पहुँचने में कुछ देर हो गया। लगभग साढ़े छह बजे पहुँचा था। वह ग्रुप, जिसमें अकसर चार-पांच सदस्य होते हैं, रोज की तरह एक साथ टहलते हुए मिल गया। टहलते हुए ग्रुप के सदस्य एक-दूसरे से बतियाते स्टेडियम का चक्कर लगाते हैं। स्टेडियम में इनके आने का समय पक्का है। ‌जबकि मुझे अकेला ही टहलना पसंद है, एकांत हो तो और भी अच्छा। इसलिए अकसर पौ फटते ही मैं स्टेडियम में पहुँच जाता हूँ और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के अंदाज में टहलकर वापस हो लेता हूं। तब तक ग्रुप भी यहां नहीं आया होता है। लेकिन कभी-कभी कुछ देर हो जाती है तो यह ग्रुप मिल जाता है।

वैसे, इनके बीच में चल रहीं बातें ज्यादातर समसामयिक सामाजिक परिस्थितियों या फिर राजनीति पर होती हैं। ज्यादातर जुमलेबाजी के अंदाज में ही यह बातचीत होती है। 
जैसे आज ही की ही बातचीत में शामिल जुमले कुछ इस तरह थे, "सारा काम मोबाइल करेगा" या "भगत को फोन लगाओ", "अब बिना ड्राइवर के ही गाड़ियाँ होंगी" "बिना दिल का आदमी होगा" आदि-आदि। यही नहीं ये लोग ऐसे प्रत्येक जुमले के बाद समवेत ठहाके भी लगाते जा रहे थे। शायद उनके बीच चल रही यह हंसी-ठिठोली इन्हें दिनभर के लिए ऊर्जस्वित कर रही थी। 

अभी-अभी कोई कहते हुए सुनाई पड़ा, 

“ड्राइविंग जैसी सीट पर बैठे आदमी का अब कोई भरोसा नहीं रहा।” इसीलिए "बिना ड्राइवर के गाड़ी" की बात होने लगी है। 
इसी तरह दिल और दिमाग भी अब जरूरी नहीं रहा केवल "भगत" बनकर काम चलाया जा सकता है। खेमेबाजी के आज के दौर में हर खेमे को भी ऐसे ही दिल और दिमाग विहीन "भगत" चाहिए हैं। 

इन जुमलों के बीच किसी ने कहा, "भगत को फोन लगाओ।" खैर।

स्टेडियम से टहलकर वापस आ गया। 

मेरे आवासीय परिसर के खड़जे पर काफी मात्रा में दूब उग आई थी। इस पर ध्यान जाते ही मैं इस घास की सफाई में जुट गया। इस काम में मन को एक अजीब-सा सुकूँन मिला। 

मुझे लगा जैसे मैं परिसर की नहीं अपने मन के किसी कोने का खंज-अखंज हटा रहा होऊं! 

इस सफाई से निवृत्ति पाकर मैं सुबह की चाय पीने लगा। 
तभी बाहर से अखबार फेंके जाने की आवाज आई। अभी-अभी हॉकर बाहर अखबार फेंककर गया। अखबार उठाने नहीं गया। 

मुझे याद आता है, छात्र-जीवन में सुबह हुआ नहीं कि हॉकर की राह तकने लगता। शायद तब मन में जिज्ञासु भाव ही नहीं देश-दुनियां की प्रबलता थी। लेकिन उम्र के साथ जीवनानुभव बढ़ जाने से यह जिज्ञासु-भाव भी क्षीण होने लगा है।

खैर, जीवन में गंध अभी बाकी है। कुछ क्षण बाद यूँ ही अखबार उठाने चला गया। 

बाहर बरामदे में गौरैया के लिए घोंसला टंगवाया है। आजकल उसमें गौरैया के बच्चे चीं-चीं करते हैं। जैसे ही बाहर का दरवाजा खोला, घोंसले के होल से झांकती गौरैया फ़ुर्र से उड़ गई! 

अचानक मुझे देख वह डरी होगी। वह पास में ही बाउंड्री वॉल पर जाकर बैठ ग‌ई। और वहाँ से वह जैसे मेरी निगरानी करने लगी थी। गौरैया अपने बच्चों के लेकर सावधान हुई थी। 

सावधान होने के लिए उसका यह डरना जरूरी था। वाकई में, डर एक आवश्यक और महत्वपूर्ण गुण है।

आदमी अब निडर है, वह आदिम तो नहीं रहा। लेकिन आज उसके कारनामों से आदिम मनुष्य भी लजा जाए! उसके सारे काम "प्लांडवे" में होते हैं। और उसके भीतर गुण भी "प्लांन्डवे" में ही उभरते हैं। वह स्वयं के कारनामों को "बिना दिल का" होने की सीमा तक जस्टीफाई करता है। 

वैसे आजकल दिल धोखाधड़ी पर उतर आया है‌। लेकिन कोई भरोसा नहीं कि यह कब किसके साथ “सर्जिकल स्ट्राइक” करके उसे अनप्लांन्ड छोड़ जाए। 

धोखाधड़ी भी उसी के साथ संभव है, जिसके भीतर दिल हो, जहां दिल ही न हो, वहां धोखे का प्रश्न भी नहीं उठता! बिना दिल का आदमी पैदा करने के लिए विज्ञान की भी कोई आवश्यकता नहीं.. यह काम तो आदमी स्वयं करने लगा है।

खैर, अखबार से पता चला कि कोई नफरत की बेल भी है, जिसे नेता उगाते हैं। सोचा, इस बेल पर शायद कोई सुंदर-सा फूल खिलता हो, इसीलिए नेता जी लोगों को यह बेल उगाना पसंद हो। 

लेकिन यह तो नेताजी लोगों की बातें हैं; उस बेल पर फूल खिलेंगे या कांटे उगेंगे, इसका पता तो समय की नब्ज़ ही बताएगी। 

फिलहाल मुझे तो उस नन्हीं-सी गौरैय्या का डरना अच्छा लगा। कम-से-कम कम अपने बच्चों को लेकर वह सावधान तो हो गई! मैं उस सावधान हुई गौरैया को ध्यान से देखने लगा।

अखबार में सम्पादकीय पेंज पर "न सरहद हो न सियासत" पढ़कर लगा कि कलाकारों के लिए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ बेमानी है। लेकिन सरहद और सियासत के लिए सभी बातें जायज़ हो जाती है कलाकारों को यह कौन समझाए!!!

#चलते_चलते
सावधान होने के लिए डरना बहुत जरूरी है। 
#सुबहचर्या 
22/6.10.2016

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

महात्मा का जन्मदिवस

            आज थोड़ी फुर्तबाजी में थे। इसलिए पाँच बजे नींद खुलते ही पाँच-दस पर स्टेडियम की ओर निकल लिए। उठने और निकलने में यह फुर्तबाजी इसलिए थी कि, आज गाँधी जी की जयन्ती है और सुबह आठ बजे कार्यालय जाकर उनके फोटू पर माल्यार्पण करना था। चूँकि, हम सरकारी नौकरी में हैं, इसलिए प्रत्येक वर्ष माल्यार्पण का अवसर मिल ही जाता है।
            एक बात है! वैसे तो, है यह आपके कान में सुनाने लायक...लेकिन, यहाँ लिखे दे रहे हैं, आप सुनिए मत, पढ़ लीजिए, वह कि, गाँधी के फोटू को माला पहनाते लाज आती है..! हाँ, उनका माल्यार्पण करते हमें शर्म आती है, इसीलिए मुझे गांधी के सामने हाथ जोड़ना ज्यादा मुफीद लगता है। क्योंकि, यह सोचकर हाथ जोड़ लेते हैं कि, "गाँधी बाबा, तुम ऐइसई दूर रहो, फोटू में ही रहो, वहाँ आप हमें बहुत ठीक लगते हो...इसी दूरी में तो आपसे प्रेम पनपता है। गाँधी!  तुम दिखाने की नहीं छिपाने की चीज हो।"
          आवासीय परिसर से निकलते हुए डीजे की जबर्दस्त आवाज कानों में गुंजायमान हो रही थी। वैसे, रातभर यह डीजे बजता रहा होगा..निश्चित रूप से आसपास वाले ठीक से सो नहीं पाए होंगे। शायद, नवदुर्गा के पांडाल में ही यह डीजे बज रहा होगा। एक दिन अखबार में पढ़े थे कि दुर्गा पंडालों में डीजे बजाने की अनुमति नहीं रहेगी। लेकिन, अब इस पर क्या कहें, यह धर्म का मामला है, किसी धर्म के मामले में टाँग अड़ाना उचित नहीं होता यही सोचकर यहाँ नियमों के पालन को उचित नहीं माना गया होगा।
            हम स्टेडियम पहुँचे। हमारे साथ ही रोज टहलने वाला ग्रुप भी पहुँच गया था। मैंने उन्हें आपस में बतियाते सुना, "आज रात में बिजली का खम्भा टूट गया, और रात में बिजली नहीं आई.." यह सुनते ही मुझे, उनकी पीड़ा की अनुभूति हुई। वाकई, एक तो सड़कें गली जैसी हैं और ऊपर से बिजली के खंभे ऐसे गड़े होते हैं कि डिवाइडर न होते हुए भी डिवाइडर का आभास देते हैं...फिर तो इन खम्भों को टूटना ही होता है! सुना, किसी ट्रैक्टर ने खम्भे को धकिया दिया था। इसीलिए तो, लोग साठ साल का रोना रोते हैं, हम ढंग से बिजली के तार भी अभी तक नहीं फैला पाए हैं।
          चक्कर लगाते, एक सज्जन के बगल से निकलते समय मोबाइल पर उनके बतियाने की आवाज सुनी, वह किसी से कह रहे थे, "यहीं स्टेडियम में टहल रहे हैं" उनके बात करने का अंदाज बता रहा था कि वह अपनी घरवाली से ही बात कर रहे होंगे। खैर..स्टेडियम का, स्वयं के द्वारा निर्धारित चक्कर पूरा कर हम लौट आए।
           आज सुबह-सुबह रामकिशोर आ गए, कभी-कभी रामकिशोर सुबह आकर मेरी चाय बना देते हैं, खासकर जब सुबह कहीं जल्दी निकलना होता है। रामकिशोर का कुत्ता बड़ा प्यारा है, वह भी अकसर सुबह उसी के साथ आता है और मेरे किचेन, कमरे सब जगह घूम लेता है, लेकिन आज वह गेट के बाहर ही रह गया था। मैंने जब गेट खुलवाया तो वह अपनी पूँछ हिलाते धड़ाके से अन्दर घुस गया। रामकिशोर को इधर-उधर ढूँढ़ते हुए अन्त में किचेन में खोज निकाला। मैं अपने कमरे में आराम फरमा रहा था, रामकिशोर को खोज वह महाशय निश्चिंत होकर वहीं मेरे कमरे में आकर आराम फरमाने लगे। जैसे, उसे सब बातें पता हो, और चाय बनने के बाद रामकिशोर के साथ भी निकल भी लिए। मैं, अब कुत्तों को ज्यादा समझदार मानने लगा हूँ।
          चूँकि, आज गाँधी जी पर माल्यार्पण वगैरह करना था, चाय-वाय पीकर नहाने की तैयारी करने लगा। बाथरूम में देखा, बहुत दिनों से शौचालय की सफाई नहीं हुई थी। ध्यान आया, आज गाँधी जयन्ती पर कुछ भासन-वासन भी देना पड़ सकता है, और इधर देश के प्रधानमंत्री भी अपने बहुआयामी स्वच्छता-कार्यक्रम के क्रियान्वयन में जुटे हैं, सो मैं ही क्यों पीछे रहूँ, तो भाषण देते समय मेरे भी करनी और कथनी में कोई अन्तर न रह जाए, आज ही शौचालय साफ करने की ठान ली। अब मेरे कथनी में भी दम रहे, और स्वच्छता अभियान पर एक जोरदार भाषण दे सकूँ; हार्पिक्स तथा ब्रश लेकर अपने इस स्वच्छता महाभियान में हम भी जुट गए। खैर..भाषण देने की नौबत तो आई लेकिन स्वच्छता अभियान दिमाग से निकल गया, आखिर, एक ही चीज को दुहराना भी तो अब हमें अच्छा नहीं लगता..!
             हाँ, गाँधी जी की फोटू को मैंने कई बार निहारा, गाँधी जी ग्राम-स्वराज की बात करते थे। वाकई, गाँधी जी का यह सपना आज ग्रामों में साकार हो रहा है। चारों ओर स्वराज ही स्वराज है!  मजाल है कि हम इस ग्राम-स्वराज में कोई दखलंदाजी कर सकें? बहुत सशक्त हो चुकी है ग्राम-स्वराज की यह अवधारणा! अब सबसे निचले पायदान पर बैठे व्यक्ति को कहीं ऊपर जाने की आवश्यकता नहीं.. ग्राम-स्वराज के रहनुमा द्वारा इनकी समस्याओं का वहीं गाँव में ही चुटकी बजाते निस्तारण कर दिया जाता है। अगर गाँव के ये निचले पायदान के दलिद्रनारायण, भूल से ऊपर अपनी बात पहुँचाने पहुँच भी गए तो ग्राम-स्वराज के ऐसे-ऐसे रहनुमा हैं कि तब ये, इन दलिद्रनारायणों को त्वरित-न्याय देने में, तनिक भी देर और संकोच न करते हुए ग्राम-स्वराज का उत्तम उदाहरण भी तत्काल प्रस्तुत कर देते हैं।
         वैसे, दलिद्रनारायण की सेवा में ही गांधीगीरी भी सफलीभूत होता है। नहीं तो आप ही विचारिए! बिना दलिद्रनारायण के कैसे होगी गाँधीगीरी..? जब तक दलिद्रनारायण रहेंगे तब तक गाँधीगीरी रहेगी.. मैं तो कहता हूँ, गाँधीगीरी और दलिद्रनारायण दोनों में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है! हाँ, दलिद्रनारायण गाँधीगीरी की बदौलत ही जिन्दा है तो गाँधीगीरी भी दलिद्रनारायण की सेवा के बदौलत ही चलती है।
             भाई लोग, मैं तो मानता हूँ, जन्मदिवस मनाना भी एक बिजनेस है, चाहे वह अपना जन्मदिवस हो या दूसरे का या फिर किसी महात्मा का ही क्यों न हो! आखिर, जीने को मजा लूटना ऐसे ही नहीं माना जाता..और कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिनके स्वर्गवासी होने पर हमारी दुकानदारी चलती रहे इसलिए हम उनका जन्मदिन मनाते हैं। हाँ, किसी का जन्मदिन से सेवा भावना की याद आती है ; जैसे यदि हम गाँधी जी को भूलते हैं तो सेवा-भावना भी भूलते हैं और इस भावना में ही तो मेवा है। ऐसे में मेवा मिलता रहे हम गाँधीगीरी करते रहे.. सब का काम चलता रहे। गाँधी, नोट और वोट सब जगह काम आते हैं।
               
               हाँ, एक बात है, दलिद्रों को भी "दलित" जैसे शब्द से सीख लेते हुए "दलिद्रनारायण" सम्बोधन पर अब आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। इस शब्द में भेदभाव जैसा भाव छिपा होता है..एकदम छुआछूत जैसा! क्या मजाक है! भला आज तक "दलिद्र" से कभी "नारायण" जुड़ पाए हैं? अब तक दलिद्रों को, अपने नारायणों का खेल समझ में आ जाना चाहिए था, जो नहीं आया। खैर, मैं यही सोचता रहा और सभा विसर्जित हो चुकी थी। अन्त में, साबिर ने दो गाँधी भजन गाया, जिसे गुनगुनाते हुए मैं उठ गया था -
            "वैष्णव जन तेणे कहिए, जे पीर पड़ाई जाणे रे" और
             "ईश्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान"

                                          --Vinay
                                          #दिनचर्या 21/2.9.16