आज सुबह स्टेडियम पहुँचने में कुछ देर हो गया। लगभग साढ़े छह बजे पहुँचा था। वह ग्रुप, जिसमें अकसर चार-पांच सदस्य होते हैं, रोज की तरह एक साथ टहलते हुए मिल गया। टहलते हुए ग्रुप के सदस्य एक-दूसरे से बतियाते स्टेडियम का चक्कर लगाते हैं। स्टेडियम में इनके आने का समय पक्का है। जबकि मुझे अकेला ही टहलना पसंद है, एकांत हो तो और भी अच्छा। इसलिए अकसर पौ फटते ही मैं स्टेडियम में पहुँच जाता हूँ और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के अंदाज में टहलकर वापस हो लेता हूं। तब तक ग्रुप भी यहां नहीं आया होता है। लेकिन कभी-कभी कुछ देर हो जाती है तो यह ग्रुप मिल जाता है।
वैसे, इनके बीच में चल रहीं बातें ज्यादातर समसामयिक सामाजिक परिस्थितियों या फिर राजनीति पर होती हैं। ज्यादातर जुमलेबाजी के अंदाज में ही यह बातचीत होती है।
जैसे आज ही की ही बातचीत में शामिल जुमले कुछ इस तरह थे, "सारा काम मोबाइल करेगा" या "भगत को फोन लगाओ", "अब बिना ड्राइवर के ही गाड़ियाँ होंगी" "बिना दिल का आदमी होगा" आदि-आदि। यही नहीं ये लोग ऐसे प्रत्येक जुमले के बाद समवेत ठहाके भी लगाते जा रहे थे। शायद उनके बीच चल रही यह हंसी-ठिठोली इन्हें दिनभर के लिए ऊर्जस्वित कर रही थी।
अभी-अभी कोई कहते हुए सुनाई पड़ा,
“ड्राइविंग जैसी सीट पर बैठे आदमी का अब कोई भरोसा नहीं रहा।” इसीलिए "बिना ड्राइवर के गाड़ी" की बात होने लगी है।
इसी तरह दिल और दिमाग भी अब जरूरी नहीं रहा केवल "भगत" बनकर काम चलाया जा सकता है। खेमेबाजी के आज के दौर में हर खेमे को भी ऐसे ही दिल और दिमाग विहीन "भगत" चाहिए हैं।
इन जुमलों के बीच किसी ने कहा, "भगत को फोन लगाओ।" खैर।
स्टेडियम से टहलकर वापस आ गया।
मेरे आवासीय परिसर के खड़जे पर काफी मात्रा में दूब उग आई थी। इस पर ध्यान जाते ही मैं इस घास की सफाई में जुट गया। इस काम में मन को एक अजीब-सा सुकूँन मिला।
मुझे लगा जैसे मैं परिसर की नहीं अपने मन के किसी कोने का खंज-अखंज हटा रहा होऊं!
इस सफाई से निवृत्ति पाकर मैं सुबह की चाय पीने लगा।
तभी बाहर से अखबार फेंके जाने की आवाज आई। अभी-अभी हॉकर बाहर अखबार फेंककर गया। अखबार उठाने नहीं गया।
मुझे याद आता है, छात्र-जीवन में सुबह हुआ नहीं कि हॉकर की राह तकने लगता। शायद तब मन में जिज्ञासु भाव ही नहीं देश-दुनियां की प्रबलता थी। लेकिन उम्र के साथ जीवनानुभव बढ़ जाने से यह जिज्ञासु-भाव भी क्षीण होने लगा है।
खैर, जीवन में गंध अभी बाकी है। कुछ क्षण बाद यूँ ही अखबार उठाने चला गया।
बाहर बरामदे में गौरैया के लिए घोंसला टंगवाया है। आजकल उसमें गौरैया के बच्चे चीं-चीं करते हैं। जैसे ही बाहर का दरवाजा खोला, घोंसले के होल से झांकती गौरैया फ़ुर्र से उड़ गई!
अचानक मुझे देख वह डरी होगी। वह पास में ही बाउंड्री वॉल पर जाकर बैठ गई। और वहाँ से वह जैसे मेरी निगरानी करने लगी थी। गौरैया अपने बच्चों के लेकर सावधान हुई थी।
सावधान होने के लिए उसका यह डरना जरूरी था। वाकई में, डर एक आवश्यक और महत्वपूर्ण गुण है।
आदमी अब निडर है, वह आदिम तो नहीं रहा। लेकिन आज उसके कारनामों से आदिम मनुष्य भी लजा जाए! उसके सारे काम "प्लांडवे" में होते हैं। और उसके भीतर गुण भी "प्लांन्डवे" में ही उभरते हैं। वह स्वयं के कारनामों को "बिना दिल का" होने की सीमा तक जस्टीफाई करता है।
वैसे आजकल दिल धोखाधड़ी पर उतर आया है। लेकिन कोई भरोसा नहीं कि यह कब किसके साथ “सर्जिकल स्ट्राइक” करके उसे अनप्लांन्ड छोड़ जाए।
धोखाधड़ी भी उसी के साथ संभव है, जिसके भीतर दिल हो, जहां दिल ही न हो, वहां धोखे का प्रश्न भी नहीं उठता! बिना दिल का आदमी पैदा करने के लिए विज्ञान की भी कोई आवश्यकता नहीं.. यह काम तो आदमी स्वयं करने लगा है।
खैर, अखबार से पता चला कि कोई नफरत की बेल भी है, जिसे नेता उगाते हैं। सोचा, इस बेल पर शायद कोई सुंदर-सा फूल खिलता हो, इसीलिए नेता जी लोगों को यह बेल उगाना पसंद हो।
लेकिन यह तो नेताजी लोगों की बातें हैं; उस बेल पर फूल खिलेंगे या कांटे उगेंगे, इसका पता तो समय की नब्ज़ ही बताएगी।
फिलहाल मुझे तो उस नन्हीं-सी गौरैय्या का डरना अच्छा लगा। कम-से-कम कम अपने बच्चों को लेकर वह सावधान तो हो गई! मैं उस सावधान हुई गौरैया को ध्यान से देखने लगा।
अखबार में सम्पादकीय पेंज पर "न सरहद हो न सियासत" पढ़कर लगा कि कलाकारों के लिए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ बेमानी है। लेकिन सरहद और सियासत के लिए सभी बातें जायज़ हो जाती है कलाकारों को यह कौन समझाए!!!
#चलते_चलते
सावधान होने के लिए डरना बहुत जरूरी है।
#सुबहचर्या
22/6.10.2016
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें