कई दिन हो गए थे टहले हुए, तो आज सुबह पौने पाँच बजे ही निकल पड़ा। वैसे यह टहलाई हप्ते में औसतन तीन दिन होती है। स्टेडियम में ग्रुप में टहलने वाले टहलते मिले। ये लोग आपस में किसी राजनीतिक मुद्दे पर चर्चावान थे। उनकी बात सुनते हुए मैं आगे बढ़ गया… ऊपर आसमान में चाँद दूधिया रंग बिखेर रहा था। कुछ क्षण चाँद के शांत मगर चटक धवल रंग पर टकटकी लगाए रहा। खैर..
स्टेडियम में बढ़ती भीड़ से मुझे लगा कि फिटनेस को लेकर जागरूकता बढ़ी है। तभी ग्रुप का कोई सदस्य "आप फिट तो इंडिया फिट" कहता सुनाई पड़ा। देशभक्ति का यह श्लोगन सुनकर मैं चौंक उठा, इस श्लोगन का ही असर है कि सुबह-सुबह देश के चक्कर में स्टेडियम का एक चक्कर फटाफट पूरा किया।
लेकिन मेरे आगे-आगे एक निहायत आम आदमी तेज डग भरता चला जा रहा था। उसके दोनों हाथ भी उसी गति से पेंडुलमायमान थे। उसकी यह कवायद मुझे सनक जैसी लगी क्योंकि वह तो आलरेडी फिट दिख रहा था! मैंने सोचा, शायद देशवासी उसे फिट न मान रहे हों इसलिए वह और ज्यादा फिट होने पर तुला है। उसकी चप्पलों की फटर-फटर में उसकी बेचैनी छिपी थी - भई मैं भी फिट हूँ, और देश को फिट रखने की कुव्वत रखता हूँ।
लेकिन मुझे चिंता हुई - भला इस देश को कभी आम आदमी ने फिट किया है! कहीं उसकी यह कवायद इंडिया को अनफिट करने की तैयारी तो नहीं? सोचकर यकायक मैं भी आत्मावलोकन की मुद्रा में आ गया। फिर तो आत्मविभोर होने की फीलिंग हुई।
वाकई, इंडिया को फिट करना आम आदमी के बूते की बात नहीं, हम या हमारे जैसों के ही बस का है। क्योंकि इसके लिए पहले देशहित की फाइलों का नियम-नियामक और कर्ताधर्ता बनकर खुद को फिट करना होता है, मतलब राज-प्रदत्त पौरुष धारण करना पड़ता है! इस पौरुष का अद्भुत प्रभाव मुझे अपने पदचालन में अनुभूत होने लगा -
शानदार ब्रांडेड स्पोर्ट्स शूज से सुसज्जित मेरे राजपुरुषोचित चरणों की प्रत्येक धमक धरती को यह संदेश देती जान पड़ती थी कि:
“हे इंडिया की धरती! मैं तो फिट हो चुका, अब तू भी फिट हो ले!!”
तत्पश्चात देशभक्ति-भाव से लबरेज मुझ जैसे राजपुरुष के चरणों की धमक धरती पर और तीव्र हो उठी।
सहसा मुझे मोहन राकेश के नाटक "अषाढ़ का एक दिन" में दन्तुल और कालिदास के बीच का एक प्रसंग स्मरित हुआ।
दन्तुल का बाण एक मृगशावक को घायल कर देता है। कालिदास उसे बचाने का प्रयास करता है। दन्तुल घायल मृगशावक को सौंपने का आदेश देता है और न मानने पर दंड की धमकी देता है। किंतु कालिदास उसे ही मृगशावक का अपराधी ठहराकर सौंपने से इंकार कर देता है। दोनों के बीच वार्तालाप होता है -
"दन्तुल : तो राजपुरुष के अपराध का निर्णय ग्रामवासी करेंगे! ग्रामीण युवक, अपराध और न्याय का शब्दार्थ भी जानते हो!
कालिदास: शब्द और अर्थ राजपुरुषों की सम्पत्ति है, जानकर आश्चर्य हुआ।"
इसी के साथ एक बार फिर मेरी निगाह आसमान की ओर उठी चाँद में अभी चमक बाकी था, इसी नाटक में मल्लिका एक जगह कह रही है -
"एक दोष गुणों में उसी तरह छिप जाता है जैसे चाँद की किरणों में कलंक ; परन्तु दारिद्र्य नहीं छिपता।"
बस फिर क्या था मेरे अंदर का राजपुरुष हँस पड़ा, मन में आया कि उस आदमी के पास पहुँचकर उसे समझा ही दें कि - राजपुरुष जो कहें वही सही होता है, इसलिए मैं जो कहूँ मान लो, मैं तुमसे कहना चाहता हूं -
“यार तुम्हारी यह कवायद व्यर्थ है, तुम्हारे फिट होने से इंडिया नहीं फिट होने वाला! क्योंकि यह फिट-उट होना बड़े लोगों और उनके ही बस की बातें हैं। देखो, दारिद्र्य नहीं छिपता! इसलिए तुम्हारी यह दौड़ा-भागी इंडिया को अनफिट होने की श्रेणी में डाल देगा…
तुमको लोग फिट कहें इसके लिए जरूरी है कि पहले मैं फिट हो लूं जिससे इंडिया मतलब अपना देश फिट हो ले, फिर इंडिया के फिट होते ही आटोमेटिक सब फिट मान लिए जाएंगे; जैसे कि तुम भी! इसलिए पीछे हटो मुझे आगे जाने दो। तुम केवल अपनी रोजमर्रा की चीजों जैसे दाल-रोटी पर ही ध्यान लगाओ। यही देश हित में है! समझे न?”
यह समझाने मैं उसके पीछे लगभग भागा।
लेकिन उस तक मैं पहुँचता कि पाथ-वे से उतर वह स्टेडियम से बाहर निकल गया। जैसे मेरे सामने का कोई अवरोध हट गया हो। मैं स्टेडियम का दूसरा चक्कर लगाने लगा।
खैर आज की टहलाई पूरी कर अपने आवास लौट आया। यहाँ लान की हरी-हरी दूब पर निगाह पड़ी। दूब की कोमलता देख मुझे "अषाढ़ का एक दिन" नाटक की एक और पंक्ति याद आई -
"जीवन एक भावना है! कोमल भावना! बहुत-बहुत कोमल भावना!!"
कहते हैं कोमल भावनाएं व्यक्ति को ईर्ष्या-द्वेष, लोभ-लालच वश दुर्नीति बनाने से रोकता है। इस विचार से तो मैं डर ही गया कि कहीं इस भावना के प्रभाव में हम फिट होना ही न छोड़ दें!! क्योंकि फिट होने के लिए कोमल नहीं कठोर भावना की जरूरत पड़ती है!
इसी समय मोबाइल बजा। पत्नी का फोन था। वे बोलीं -
वह जो कामवाली है न, उसका पति जो राजमिस्त्री है उसको सुबह-सुबह पुलिस पकड़ के ले गई।
मैंने उत्सुकतावश पूछा - क्यों?
पत्नी - अरे कुछ नहीं, दस-बारह लाख की कोई जमीन लिया था, ब्रोकर ने ही पुलिस से पकड़वाया है।
मुझे थोड़ा अचंभा हुआ कि राजमिस्त्री ने कहीं कोई घोटाला तो नहीं किया, लगता तो बहुत सीधा और आम आदमी जैसा है, ऐसा फरेब तो वह नहीं कर पाएगा।
मैंने पूछा - तो कुछ गड़बड़ किया था क्या?
पत्नी - अरे नहीं, ऐसा कुछ नहीं, पहले इस जमीन के लिए उसकी ब्रोकर से बात हुई, लेकिन फिर सीधे मालिक से सौदा कर लिया। थोड़ा सस्ता पड़ा तो बेचारे ने एक-एक पैसा जोड़कर इसे खरीद लिया! बेचारी कामवाली भी बड़ी दु:खी थी। फोन पर बता करके कहा - दीदी आज काम पर आने का मन नहीं है।
मैंने - ब्रोकर ने उसे पुलिस से क्यों पकड़वाया?
पत्नी बोलीं - अरे वही, ब्रोकर को नुक़सान हो गया उसका कमीशन मारा गया, इस बात से वह नाराज था, ऐसे लोग तो पहुँचवाले होते ही हैं. थाने में बेचारे को धमकाया और मारा-पीटा भी गया..!
पत्नी की बात सुनकर मैं साइलेंट हो गया.. मेरी चुप्पी पर वे बोलीं -
पत्नी - “सरकार-वरकार इस अन्याय पर कुछ करती क्यों नहीं?
मैं - अरे भई, सरकारें हर जगह दुरबीन-उरबीन लेकर तो बैठी नहीं रहतीं कि कहाँ क्या हो रहा है, नजर में आ जाए!
पत्नी बेचारी चुप और अब मैं भी चुप। इस चुप्पी के बीच ही बातों का सिलसिला टूट गया।
वह राजमिस्त्री बिलकुल वैसा ही है जैसे आज स्टेडियम के पाथ-वे पर मेरे आगे-आगे चल रहा वह आम आदमी!
तो इस फिट-उट वाली बात पर एक बात और -
राजपुरुष बड़े कठोर होते हैं, कठोर फ्रेम से जुड़े भी रहते हैं! यही इनकी फिटनेस का राज है!! जैसे राजमिस्त्री को फिट किया गया, वैसे ही ये देश को भी फिट करते रहते हैं!!!
#चलते-चलते
फिटनेस का रहस्य हमारी कोमलता में नहीं हमारी कठोरता में छिपा है…
#सुबहचर्या
1.06.18