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बुधवार, 17 जून 2026

संतोष का कारण

आज चार-पचास पर फोन की घंटी बजी। उधर से आई परिचित आवाज ने पांच-पंद्रह पर निकल लेने के लिए कहा और मुस्कुराने की भी ताकीद कर दी। मैं मुस्कुराया, जो हंसी में भी बदल गई। इस मुस्कुराहट से मन जैसे ताजा हो उठा।
बाहर आया। दूर कहीं बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ रही थी। आसमान में बादल छाए थे, पर उनके यहां बरसने की संभावना नहीं दिखाई पड़ी। लगा, ये दूर कहीं बरस रहे होंगे।
हम और वे परिचित, दोनों साथ चले। स्टेडियम की ओर लगभग छह-सात सौ मीटर आए होंगे कि पीछे एक बोलेरो गाड़ी आकर रुकी। बोलेरो सवार, जो दोनों के परिचित भी थे, हम लोगों से बोलेरो में बैठने का आग्रह किया। 
मेरे साथी फुर्ती दिखाते हुए उसमें सवार हो गए। लेकिन मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “आप लोग बैडमिंटन-कोर्ट में पसीना बहाने वाले हैं। मुझे तो बस टहलना होता है। टहलते-टहलते मैं स्टेडियम पहुँच रहा हूँ।”
खैर, थोड़ी दूर चलने पर उबड़-खाबड़ खड़ंजे वाला वह रास्ता दिखाई पड़ा, जो स्टेडियम की ओर जाता है। पर न जाने क्यों मेरे कदम उस ओर नहीं मुड़े। आगे बढ़ गया।
“सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है..” मोबाइल में यह गीत बजा, मैं समझ गया कि सात बज ग‌ए। यह गाना मुझे बचपन से ही प्रिय है, मुझे स्मृतियों में लौटा ले जाता है। आजकल इसे एलार्म बनाया है।
लेकिन भाई मेरे, इस गीत में छिपी नसीहत से मेरा कोई लेना-देना नहीं! ऑफिसों में दिनभर खुशी के लिए हमें सच के साथ फाइलों, टिप्पणियों, स्पष्टीकरणों में शब्दों की बाजीगरी करनी पड़ती है। फिर मूँछों पर ताव देकर वहाँ से बाहर ऐसे निकलते हैं, मानो सच को शीशे पर उतार दिया हो, कि सबको वही दिखाई दे।
यह लिखते-लिखते बाहर बारिश शुरू हो गई है। गिरती बूंदों की आवाज कानों में पड़ रही है।
तो, आज की अपनी टहलाई पर बात। सड़क पर सीधे चलते-चलते मैं स्वयं द्वारा निर्धारित उस बिंदु पर पहुँचा, जहाँ से लौटना होता है। वहाँ से लौट पड़ा। इस आने-जाने में कुल तीन किलोमीटर की टहलाई हो जाती है। 
खैर, वापसी में, कंधों की एक्सरसाइज भी करते हुए चल रहा था। इसी दौरान पीछे से आवाज आई थी, "साहब, कंधे में दर्द होथै का?" 
मुड़कर देखा, एक मजदूरनुमा व्यक्ति, अपनी साइकिल की रफ्तार धीमी किए हुए मुझसे यही पूछ रहा था। 
उसकी ओर देखते हुए मैंने कहा, "हाँ दरद होथ‌अ, थोड़ा हम कहे कि इह‌उ क‌इ लेई.." 
वह मजदूर बोला, "अरे, साहब, हम‌ई सबका त‌‌अ, ई मौक‌ई नाहीं मिलत।" 
उसका आशय सुबह टहलने के मौके से था। जो उसे नहीं मिलता।
मैंने कहा, "अरे! तोहका क‌उन टहलै के जरूरत बा! तू सब वैसेई दिनभर एतना मेहनत क‌इ लेथ‌अ कि.." 
उसने अब साइकिल की रफ्तार मेरे पैदल चलने के बराबर कर लिया। शायद उसकी इच्छा मुझसे बात करने की थी। 
मुझसे बोला, "साहब, बीस-पच्चीस बिगहा धान बाटइ, उही क राति भर रखाव‌ई क पड़थै, नाहीं त‌अ ससुरन जानवरन क मारा कुछ बचबै न करै.. लेकिन इहूँ में ऊ सारे मरकहवे तो बहुत परेशान कर‌अथै।" 
उसकी इस समस्या से मैंने भी सहमति जताया।
फिर उसने मेरे काम के बारे में पूछा। मैंने उसे गोलमोल जवाब देकर बताया कि किसी आफिस में काम करता हूँ। 
उसने पूछा, "साहब आप कहां के है।" 
जौनपुर बताकर मैंने उससे पूछा, "अउर‌ऊ कुछ कर‌अथ‌अ कि खेतिन भरि?" 
उसकी बात, "नाहीं साहब छह-सात भैसि‌य‌उ पाले ह‌ई..आठ-दस लीटर दूध सेंटर (मिल्क कलेक्शन सेंटर) पर भेज देईथ अउर सांझ वाला दूध लड़िकन के पिय‌ई-खाई के बदे रहथ‌अ।" 
फिर इसमें जोड़ते हुए कहा,, "साहब, सात-आठ टाली गोबर क खादि‌उ होइ जाथ‌अ..एक टाली दुई हजार क बिक‌अथ‌अ..पंद्रह-सोलह हजार क‌अ एक तूरे में।" 
उसकी बात सुनते ही मेरे मुँह से निकल पड़ा, "अच्छा..!" 
गोबर की यह खाद वह अपने भी खेतों में डालता हैै। खेतों में यूरिया खाद नाममात्र डालता है।
खेत में गोबर की खाद डालने से इस सूखे के समय में भी उसकी धान की फसल अभी ठीक है। उसने कुछ ऐसा ही बताया।
 फिर मुझसे पूछा, "तो साहब आप बिहार के अह‌ईं..?" 
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे नाहीं आर..ई जौन‌ऊपुर तोहरेनि उत्तर‌ई प्रदेश में पड़‌अथ‌अ।"
"अच्छा साहब" कहते हुए बाईं ओर इशारा करके उसने कहा, “साहब ई, ज‌ऊन फूल खिला बा न, सफेद फूल चढ़ाव‌इ के लिए ई दस रूपिया में एक्खी बिकाथै।" 
उन खिली कुमुदिनियों को देखकर मैंने कहा, "लेकिन यार अब ई, यहं न खिले, देखत नाहीं बाट‌अ, ई नदियव‌ऊ में घेरि के बाउंड्री खड़ी क‌इ लिहेंन सब, कुछ दिन में अब इहां मकान बनि जाए।"
"हां.. ई बात तो है साहब।" वह बोला।
मैंने उसके गाँव का नाम पूछा। उसने सिरसिया बताया । जो यहाँ से बीस किलोमीटर दूर है। 
मैंने थोड़ा चौंकते हुए पूछा, "तो यहां कैसे?"
उसके कहे अनुसार, वह बहन के यहां गया था। वहीं से लौट रहा था। 
सामने जिला अस्पताल दिखाई पड़ा, उसने वहाँ कुछ काम बताया और उसकी ओर मुड़ गया।
उसके मुड़ते ही, मुझे पिछले दिन सिरसिया में एक गौशाला देखने की बात याद आई। 
खैर, वह मजदूरनुमा या किसाननुमा या दोनों, जो भी था, मैंने उसकी बातों के भीतर छिपे उसके संतोष का अनुभव किया।
बाहर से अभी भी बारिश हो रही थी।
#चलते_चलते
मैं उस किसान के बारे में सोचने लगा। उसके भीतर एक अनजानी-सी खुशी थी। शायद वह स्वयं भी उसके कारण से अनजान था।
#सुबहचर्या
  (३१.८.१९)

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