लोकप्रिय पोस्ट

शनिवार, 13 जून 2026

तबियत से पत्थर उछालने वाले की तबियत

मुझे बड़ी परेशानी की अनुभूति हो रही थी... दरअसल, एक डब्बेनुमा बॉक्स के भीतर गोल फ्रेम में जड़ा दर्पण जैसा कुछ फिट था। जो अपनी जगह से निकल गया था.. मुझे उसे फिर से उसी स्थान पर लगाना था। इस प्रयास में कफी समय बीत चुका था। 
तभी मैंने ध्यान से देखा,
बॉक्स के भीतर दो तरफ स्टैंड निकले थे। यह फ्रेम उन्हीं स्टैंडों पर पेंचों से कसा हुआ था… पेंच निकले तो फ्रेम भी निकल लिया! उन पेंचों को मैं खोजने लगा। देखा! एक पेंच तो बिस्तर पर ही मिल गया! अब दूसरे पेंच की ढूँढ़ाई शुरू हुई। यह पेंच उस डिब्बेनुमा बाक्स के भीतर ही गिरा था! मैंने फ्रेम को डिब्बे के भीतर के स्टैंड पर फिर से कसना चाहा कि तभी मोबाइल की धीमी-सी रिंगटोन सुनाई पड़ी..
मोबाइल टटोला। मिलते ही उसे कान पर लगा लिया… 
उधर से आवाज आई, "डी डी ओ साहब बोल रहे हैं?" 
"जी हां, डीडीओ ही बोल रहा हूँ।" मैं बोला था। 
दूसरी ओर से हल्के-फुल्के अंदाज में बोला गया, 
"अरे, मैंने कहा कि सुबह की ठंडी हवा से कंधे का दर्द और बढ़ जाएगा.. मैं डीडीओ साहब से कहुंगा कि वहीं कमरे की गर्म हवा में टहलने से दर्द ठीक हो जाएगा।"  
मैं भी नहीं चूका, बोल दिया, "नहीं, डीडीओ तो चाहते हैं कि बाहर की ठंडी हवा में दर्द को थोड़ा और बढ़ाया जाए।" 
उधर से फिर हँसी के स्वर में बोला गया, "तो फिर, हमारी भी इच्छा है कि हम पांच-दस पर निकल लें।" 
मैंने तत्काल यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
जैसे ही कॉल कटी, समय देखा। सुबह के चार बजकर पचास मिनट हो रहे थे। हां, शुक्ला जी ने मुझे जगाने के लिए यह फोन किया था। तब मैं गहरी नींद में था। 
इस बातचीत के बाद मैं थोड़ी देर तक यूँ ही बिस्तर पर पड़ा रहा। फिर पांच बजकर पंद्रह मिनट पर बाहर निकला। 
मैंने शुक्ला जी से अपनी गाढ़ी निद्रा का जिक्र किया और रात में देखे गए स्वप्न की पूरी कहानी कह सुनाया। इसे सुनकर वे मुस्कुराते हुए बोले, "तो मैंने आपको पेंच नहीं कसने दिया!" 
अब मैं सोचने लगा, अगर उस वक्त उनका फोन न भी आया होता, तो भी मैं वह पेंच नहीं कस पाता। आखिर, निद्रावस्था में देखे गए स्वप्न कहाँ पूरे हो पाते हैं! ऐसे स्वप्न तो अधूरे ही रह जाते हैं!! खैर।
टहलकर आया। कपड़ा धोया। फिर चाय बनाई। चाय पीते हुए अखबार के संपादकीय पर निगाह पड़ी।
विगत तीन वर्षों में गंगा जल के साफ होने का उद्धरण देकर बताया गया था कि वास्तव में सरकारी संकल्प ने बड़ा काम करके दिखाया है, जबकि वही आधिकारी और वही प्रयोगशालाएं हैं जो पहले भी थीं।
अब मुझे अपनी रोडवेज बस-यात्रा का स्मरण हुआ। 
मेरे पीछे वाली सीट पर तीन लोग बैठे थे। शायद ये प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक रहें हों। वे स्कूल में शिक्षकों की उपस्थिति को लेकर सरकार की सख्ती पर चर्चारत थे। एक कह रहा था कि अब तो स्कूल, टाइम से पहुँचना पड़ रहा है।
इस पर दूसरे ने कहा, “आखिर कब तक? फिर सब वैसे ही चलने लगेगा।”
पहला व्यक्ति फिर बोला, "कोई नहीं सुनेगा तो सरकार अब जबरिया रिटायर भी करेगी।" 
तभी तीसरा कह उठा, "अरे, रिटायर करके तो देखें, ये यूनियन वाले किस काम के हैं?" 
यह बातचीत सुनकर मैंने सोचा, कोई यहां क्या-क्या सुधारे? आदमी को सुधारे या सिस्टम! दोनों नहीं सुधरने वाले।
इसी बीच कंडक्टर आ गया। वह टिकट बना रहा था। उसे वर्दी में देख उस पहले व्यक्ति ने पूँछा, "भाई यह वर्दी कब से पहनने लगे?"  
कंडक्टर बोला, "अब सरकार इसपर सख्ती कर रही है, इसलिए पहनना पड़ रहा है।" 
मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने भी कंडक्टर से पूछ लिया, क्या अब सभी कंडक्टर वर्दी पहनने लगे हैं? 
कंडक्टर ने कहा, "हाँ सभी।" 
कंडक्टर की बात सुनते ही मैंने गर्दन घुमाकर पीछे बैठे उन व्यक्तियों से कहा, 
"देखा ! सरकारें चाह लें, तो कुछ भी हो सकता है।" 
दूसरा व्यक्ति निरूत्तर-सा हो गया था। मेरे मन में आया कि अब उसे ‘तबियत से पत्थर उछालने’ वाली बात भी कह दूँ। पर अगले ही पल मैं यह सोचकर चुप्पी साध गया कि उसकी बात में भी तो दम कि “आखिर कब तक? ..” क्योंकि जो आज पत्थर को तबियत से उछाल रहा है, हो सकता है कल उसकी ही तबियत न बिगड़ जाए! और फिर किसी डर या भय से हम कब तक सुधरे रहेंगे?
मेरा यह चुप रह जाना ठीक ही था।
हो सकता है ये सारी बातें निरर्थक हों!
#चलते_चलते
     मुस्कुराइए कि निरर्थक बातें करके थोड़ी देर के लिए ही सही, हमारी तबियत सुधर जाती है, क्यों है न?
#सुबहचर्या
(२९.८.१९)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें