आज अलसुबह जैसे ही नींद टूटी मन में पहला विचार यही आया कि "चलो सुबह हो गई"। मतलब, रात बीतने पर संतोष हुआ। लेकिन जब तक जीवन है, यह साँझ और सुबह होती रहेगी! फिर तो अंधेरों आए या उजाला इससे क्या चिंतित होना!!
दरअसल सोने के पहले बीती रात दिमाग में चिंता की आड़ी-तिरछी रेखाएं उभर आयी थी, इन्हीं रेखाओं के मिटने का अहसास सुबह उठते ही हुआ, मने 'रात बीती, बात बीती' टाइप से मन को फीलगुड हुआ कि चलो सुबह हो गई! सच तो यह है, यह जीवन अपने ही हिसाब से चलता है, यदि इसके साथ दाँव-पेंच खेलें तो इसमें उलझना तय है।
हाँ, आज छह तेईस बजे हम टहलने निकले। बाहर बेहद गलन थी, हाथ जैसे सुन्न हुआ जा रहा था। दूर सड़क के किनारे आग की ऊँची उठती लौ दिखाई पड़ी, मन हुआ चलकर वहां हाथ सेंक लें। लेकिन पास पहुंचने पर आग की वह लपट अब शांत हो चुकी थी। दो लोग गत्ते जलाकर, उसे ताप रहे थे, भला गत्ते की लौ कितनी देर ठहरती? मुझे गत्ता जलने की गंध पसंद नहीं आया। आगे बढ़ लिया। खैर, चलते हुए हथेलियों को आपस में रगड़ कर गर्मी पैदा करने लगा।
लौटते समय जिला अस्पताल की ओर निगाह गई तो उसकी तस्वीर ले लिया।
घर पहुँचा। चाय बनाने किचन में चला आया। यहां डस्टबिन में पड़े कूड़े की गंध नथुनों में पड़ी, शायद डस्टबिन में कई दिन से कूड़ा पड़ा था। इसे बाहर ले जाकर फेंक आया और डस्टबिन को धुलकर फिर उसी स्थान पर रख दिया।
चाय पीते हुए अखबार भी पढ़ना शुरू कर दिया। प्रमुख खबर थी, किसी "आतंकी माड्यूल का पर्दाफाश"। "भक्ति" को लेकर मन में खिन्नता उठी कि इसके कारण हम मरने-मारने पर उतारू हैं!
दरअसल, जि समाज के बीच से हिंसक लोग पैदा होते हों, वह "बीमारू-समाज" है। आज इक्कीसवीं शताब्दी में हम ब्रहमांड में जीवन के रहस्यों को जानने की ओर अग्रसर हैं, तो इस मध्ययुगीन-मानसिकता का औचित्य क्या है? खैर..
ऐसा इसलिए है कि, छोटी-छोटी बातों पर हमारा ध्यान नहीं जाता। उन बातों की ओर से मुँह फेर हम केवल "ऊँह" करके रह जाते हैं।
#चलते_चलते
जब कुछ समझ में न आए कि क्या करें तो अपने आसपास की छोटी से छोटी बातों पर ध्यान देना शुरू कर दें, कुछ नहीं तो डस्टबिन में पड़े कूड़े को ही फेंक आएं।
#सुबहचर्या
(27.12.18)
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