लोकप्रिय पोस्ट

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

सभ्यता तो जीवन की जीवंतता में है!

सुबह टहलने निकला तो मन शान्त था। हृदय में कहीं कोई हलचल नहीं। एकदम भावहीनता की सी स्थिति। इसी मन:स्थिति में मैं मेरे डग सुबह को नाप रहे थे। तभी दृष्टि एक छोटे से तालाब पर जाकर अटक ग‌ई। 

हाँ, यह वही तालाब था, जिसमें मैंने कमल के पुष्प खिले देखे थे। तब यह तालाब ऐसा लगता था, मानो साहित्य में वर्णित कोई सरोवर जीवंत हो उठा हो, जल के बीच तैरते हरे पत्रों के बीच मुस्कुराते कमल! 

आज उसी तालाब में मिट्टी भराई का काम चल रहा था। उसके आधे भाग में मिट्टी भरी भी जा चुकी थी। शायद इस तालाब के स्थान पर अब प्लाटिंग होगा। यहां मकान बनेंगे। 

खिन्न मन से मैंने उधर से निगाहें फेर लिया।

इधर सामने सड़क पर किसी वाहन से सांप कुचला हुआ पड़ा था। लेकिन उसकी पूंछ अभी भी ऐंठ रही थी। शायद पूंछ में जान बाकी था। इसे नजरअंदाज कर मैं आगे बढ़ा गया। 

थोड़ा आगे बढ़ा तो वह छिछला और चौड़ा नाला दिखाई पड़ा। बरसात में यह पानी से लबालब भर जाता है। फिर वर्षा-ऋतु बीतते-बीतते इसकी सतह पर असंख्य धवल कुमुदिनियाँ खिल उठती थीं। पर अब उस नाले में भी मकान उगने लगे थे। शायद अब न वहाँ बरसाती जल ठहरेगा और न ही कुमुदिनियों का वह उजला सौंदर्य दिखाई पड़ेगा! खैर। 

आज की टहलाई पूरी करके वापस आवास आ गया। चाय-वाय पिया। फिर "संस्कृति और सभ्यता" शीर्षक किताब, जिसे हाल के दिनों में खरीदकर लाया था, उसके भी दो चार पन्ने पलटे। 

इस किताब में एक जगह नंदकिशोर आचार्य, अज्ञेय की एक टीप "मैं अकेलापन चुनता नहीं, स्वीकार करता हूँ" उद्धृत करते हुए गाँधी जी के अन्तिम दिनों के बारे में सोचते हैं -

 "लेकिन अकेलापन शायद गाँधी जी की स्वाभाविक नियति है। सत्य की राह पर चलने वाले अकेले हो जाने को मानो अभिशप्त होते हैं। यह कितना विडंबनापूर्ण है कि हिन्दुत्ववादी उनसे इसलिए नाराज थे कि वे दलितों और मुसलमानों की उन्नति और सुरक्षा की बात करते थे। मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग उनसे नाराज था कि वे पाकिस्तान की अवधारणा के विरोधी थे। और अब दलित उनसे इसलिए नाराज हैं कि उनकी राय में वे सवर्णवादी हैं। धर्मनिरपेक्षतावादी नाराज हैं क्योंकि वह धर्म की भाषा में बात करते हैं। धर्मवादी नाराज हैं क्योंकि वह राज्य को धर्मनिरपेक्ष रखना चाहते हैं। दरअसल, गाँधी तब भी अकेले थे और आज भी अकेले हैं। ऐसा व्यक्ति सदैव अकेला ही रहेगा जिसे दूसरे केवल अपने लिए इस्तेमाल नहीं कर सकें। वह जिस हद तक हमारे लिए सुविधाजनक है, उस हद तक आदरणीय है - लेकिन जब उसके विचार या व्यक्तित्व हमारे लिए असुविधाजनक होने लगे तब उसे अकेला छोड़ देने में ही सुरक्षा है - यदि मिटाया न जा सके। अकेला छोड़ देना भी प्रकारांतर से मिटाना ही है। प्रसाद ने कहीं लिखा भी है कि "उपेक्षा घोर शत्रुता है।"

वैसे इस अंश का कमल, सरोवर, बरसात में लबालब हुआ नाला या कुमुदिनियों से कोई संबंध नहीं है, लेकिन मामला गांधी जी की संवेदनशीलता से जुड़ता है। संवेदनशील-जीवन सभी का अस्तित्व स्वीकार करके चलता है, जो इसे स्वीकार नहीं करता कालांतर में उसे नष्ट होना है, चाहे सभ्यता ही क्यों न हो!!

#चलते_चलते

जीवन तो गतिमान होता ही है, लेकिन जो इस गति में इस्तेमाल होने लगता है वह खतम हो जाता है, और जो नहीं वह अकेला।

#सुबहचर्या

 (19.3.19)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें