आज सुबह टहलते हुए मेरे पदचाप खरामा-खरामा जमीन पर पड़ रहे थे, जैसे किसी अबूझ पहेली को समझने का प्रयास कर रहे हों।
वाकई, जैसे-जैसे हम बुद्धिमान होते जा रहे हैं वैसे-वैसे हमारा जीवन एक अजीब-सी अफरा-तफरी में फँसता जा रहा है। जीवन के बहुत सारे पल हम यूँ ही गंवा देते हैं!
आखिर हम अपने इन पलों को क्यों नहीं पहचान पाते?
सोचता हूँ, क्या बुद्धिमत्ता हमें एक अज्ञात भय की ओर भी ढकेलती है? वैसे मान्यता तो यह है कि बुद्धि समस्याओं का हल खोज लेती है। खैर चलिए जो भी हो, आज इस बुद्धिमान प्राणी की बुद्धि इतनी बातों में उलझी हुई है कि वह अपने ही आदमी का पता नहीं ढूँढ़ पा रही है! हाँ, यह आदमी कहाँ जा रहा है यह बताने में बुद्धि जैसे असमर्थ हो चुकी है।
इस तरह टहलते हुए सुबह-सुबह मैं भी अपनी मंजिल के बारे में सोच रहा था मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था इस नासमझी में मेरे पैर जमीन पर खरामा-खरामा पड़ रहे थे।
यूँ ही मेरी दृष्टि पेड़ों और घरों के ऊपर उठ आए सूरज पर पड़ी..सोचा..यही सूरज ढलते हुए साँझ का सूरज भी बन जाएगा। वैसे मुझे अस्त होते हुए सूरज में उदयमान सूरज से कहीं अधिक सौन्दर्य नजर आता है..हाँ एकदम रहस्यमयी दुनियाँ में खोने जैसा..!
खैर.. देखिए न, मैं आज आप से कितनी निरर्थक बातें कर रहा हूँ…
एक दिन मैंने देखा, रोजमर्रा के कामों में व्यस्त एक व्यक्ति जो उम्र की ढलान पर भी था, मेरे साथ कार में बैठा था। हमारी कार उस खूबसूरत रास्ते से गुजर रही थी, जिसके दोनों ओर हरे-भरे वृक्षों की कतार थी। उस व्यक्ति ने अचानक अपना मोबाइल निकाला और उस हरियाली से भरे रास्ते की तस्वीर यूँ ही कैद कर लिया… शायद यही वह पल रहा होगा, जब वह अपने स्वयं के साथ था। ऐसे क्षण चिरस्थाई और जीवन के लिए मूल्यवान होते हैं! जबकि बाकी चीजें तो धीरे-धीरे हमें ही खत्म कर रही होती हैं।
एक बात है, कोई भी "बौद्धिक दृष्टिकोण" हमें किसी अन्तिम सत्य तक नहीं पहुँचा पाता। बुद्धि ऐसी बातों के लिए नहीं उकसाती। वह तर्क तो देती है, पर सौंदर्य का अनुभव केवल तर्क से नहीं आता। मुझे अस्ताचलगामी सूरज और पहाड़ों के दृश्य में जो सौन्दर्य दिखाई देता है, उसे मैं बुद्धि से नहीं, हृदय के भीतर उठती भावनाओं के सहारे ही महसूस कर पाता हूं!
सच तो यह है, बुद्धि हमें जबर्दस्त ढंग से दुनियादार बनाती है.. बुद्धि से उपजी हमारी तार्किकता भी एक सीमा के पश्चात "बौद्धिक धूर्तता" में बदल जाती है। आज सुबह एक खबर पढ़कर इसे जाना।
खबर यही थी कि एक बड़े अधिकारी के घर से अकूत सम्पत्ति बरामद हुई। यह बुद्धि का ही तो कमाल है!! लेकिन बुद्धि के चंगुल में फंसे लोग "यूँ ही पलों" से महरूम हुए होते हैं।
इसी समाचार के ठीक नीचे एक और हेडिंग थी "इलाज के लिए भटक रही पुलवामा शहीद की माँ"!
खैर, इन दोनों समाचारों से 'बुद्धि' और 'भावना' में अंतर का पता चलता है!
बुद्धि किसी को अकूत संपत्तियों का मालिक बना देती है तो कोई भावना में बलिदान होने के लिए तत्पर हो उठता है!! यह भावना पर बुद्घि का जबर्दस्त व्यंग्य है।
फिर भी, एक ओर होता है आशांति और कोलाहल, तो दूसरी ओर नीरव शांति का सौन्दर्य!
#चलते_चलते
देखिए तो जरा अपने जीवन के "यूँ ही पलों" को! इन्हें पहचानिए, ये कभी खत्म नहीं होते!!
#सुबहचर्या
(14.3.18)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें