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रविवार, 10 मई 2026

विश्वास का धागा

        आज तो सुबह सात बजे बिस्तर छोड़ा.. असल में क्या है कि रात में सोने के ठीक पहले तक यदि आप गंभीर वैचारिक चिंन्तन में उलझे होते हैं, तो निश्चित ही नींद कुछ न कुछ खराब तो होगी ही! मैं बीती रात सोने जाने के ठीक पहले तक ऐसे ही बौद्धिक जुगाली में उलझा था.. सोने की कोशिश किया तो जैसे ही नींद आने को होती अचानक मस्तिष्क में कुछ चुभने जैसा अहसास होता, जिसे पिंच करना समझ सकते हैं। फिर बेचैनी में नींद टूट जाती! अंततः इस नींद की भरपाई मैं सुबह सात बजे तक करता रहा, बिस्तर नहीं छोड़ा।
         हाँ, एक बात है, सोने जाने से एक घंटा पहले मन-मस्तिष्क को रिलैक्स, मने ढीला छोड़ देना चाहिए। इस समय पढ़ने की आदत वालों को भी चाहिए कि गंभीर विषयों का पाठन न करें। मनोरंजन पूर्ण और हल्के-फुल्के विषय ही पढ़ें। एक बात पर और ध्यान देने की जरूरत है, आजकल सोशल-मीडिया का जमाना है... यहां तर्क-वितर्क और स्क्रॉल में लोग उलझ जाते हैं… इससे भी अनावश्यक तनाव पैदा होता है।
         खैर जब तक बिस्तर छोड़ता तब तक लड़का भी आ गया.. उसने चाय बनायी। 
        चाय पीते हुए अखबार उठाया। सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों पर निगाह पड़ी..इन्हें पढ़ते हुए मन ही मन मुस्कराया..एक फैसला तो मानवीय रिश्तों में आपसी विश्वास बहाली या यों कहें विश्वास की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता प्रतीत हुआ... 
        वाकई! मानव निर्मित संबंधों में आपसी विश्वास से बढ़कर कुछ नहीं होता...कानून-फानून तो बनते बिगड़ते रहते हैं...
     ....इन फैसलों से मुझे बचपन (कक्षा पाँच-छह के आसपास) में श्रीमद्भागवत, कल्याण और सुखसागर में पढ़ी वैदिक कहानियाँ याद हो आयी…
       “कामाग्नि से व्याकुल एक व्यक्ति, उसके पति के सामने ही, एक स्त्री से प्रणय-याचना करता है। स्त्री स्वयं को विवाहित बताकर प्रस्ताव अस्वीकार कर देती है, तो वह उसे श्राप देने पर उतारू हो उठता है।” 
         ऐसी ही एक अन्य कथा में 
       पत्नी पति को अपने कंधों पर बैठाकर स्वयं गणिका के पास ले जाती है।
      लेकिन उन वैदिक कथानकों में इन बातों को अनैतिकता की तरह नहीं देखा गया। नहीं तो पहले प्रसंग में ‘श्राप’ नहीं, ‘पाप’ का भाव उभरता और दूसरे में पति-पत्नी के विश्वास के बजाय अपराध-बोध की छाया दिखाई पड़ती।
       बल्कि इन कथाओं में पति-पत्नी के संबंधों, उनके पारस्परिक दायित्वों और सबसे बढ़कर उनके बीच विश्वास की व्याख्या मिलती है। सच तो यह है किसी भी रिश्ते की असली नींव विश्वास ही होता है! विश्वास ही वह नाजुक-सा धागा है जिससे रिश्ते बंधे और टिके रह सकते हैं!!
       बचपन के उन्हीं दिनों मैं अपने बाबू (दादा जी) के मुख से अकसर किसी की पोंगापंथी पर उसे "लकीर का फकीर होना" जुमले से नवाजते सुना करता। इससे अनजाने में ही मुझे यह सीख नसीब हुई कि बातों को केवल तर्क पर ही नहीं संवेदनाओं की भावभूमि पर भी कसना चाहिए।
       ...एक बात और.. हमने ओखली (संविधान अंगीकरण) में सिर दे दिया है, तो मूसलों (संवैधानिक व्यवस्थाओं के निर्णयों) से क्या डरना..! आखिर बिना कुटाई दाना कहां निकलता है… इसमें आया मुहावरा भी कभी दादा जी से ही सुना था… खैर,
        मेरी सुबहचर्या पढ़कर आप इसे बौद्धिक जुगाली समझ बैठें, उससे पहले ही बता दें कि कई दिनों से पड़ोसी के साथ बैठकर चाय नहीं पी थी। मुझे यह कमी महसूस हो रही थी। आज वे दिखाई भी पड़ ग‌ए! मैंने चाय का आग्रह किया, पहले तो वे मुस्कुराए फिर मेरे बैठक में आ ग‌ए। हम दोनों गप्पें लड़ाते हुए साथ-साथ बैठकर चाय पीते रहे...सुबह की यह चाय बहुत सूकूनदायक थी..

#सुबहचर्या 
 (28.9.18)

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