आज सुबह छह बजे टहलने के लिए निकला। बाहर वातावरण में धुँधलका छाया हुआ था, एकदम कुहरा के माफिक! सड़क पर मोटरसाइकिलों एवं अन्य वाहनों का आना-जाना शुरू हो चुका था। मन में खीझ-सी उठी कि इनसे सबेरे की शान्ति भंग हो रही थी। सोचा, इन्हें सुबह-सुबह निकलने की ऐसी क्या जल्दी पड़ी है?इस बीच एक मोटरसाइकिल तो धुँएं का गुबार छोड़ते हुए ऐसे निकली कि उसके धुएँ और गंध से मेरे नथुने भर गए! एक अजीब से गुस्से और खीझ लिए मैं वापस लौटने को हुआ, फिर यह सोचकर कि इधर टहलने का रुटीन सही नहीं चल रहा, कम से कम टहलने का कोटा भी तो पूरा होना चाहिए, लौटने का विचार त्याग दिया। खैर..टहलाई पूरी कर आवास पर आया। वही रोज़ की भांति अखबार उठाया। पहली निगाह ही "वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का निधन" की हेडिंग पर पड़ी......हाँ.. अखबार पढ़ने का चाव मुझे बचपन से ही था, लेकिन जैसे-जैसे देश-काल की समझ विकसित होती गई, मैं सम्पादकीय पृष्ठों के लेख भी पढ़ने लगा। जिन लेखकों को मैं विशेष रूचि से पढ़ता था उनमें कुलदीप नैयर भी शामिल थे!उन दिनों इंटर कालेज में पढ़ता था..किसी समसामयिक विषय पर कुलदीप नैयर का एक लेख छपा था। उस दिन घर पर दादा जी समेत कई लोग उसी लेख को लेकर बतिया रहे थे। तब, आज से तीस-पैंतीस वर्ष पहले, लोगों के पास आपस में बिना लाग-लपेट के और बिना जल्दबाजी के बैठकर बतियाने का समय भी हुआ करता था। मैं कुलदीप नैयर का वही लेख पढ़ते हुए उनकी यह बातचीत सुनने लगा।तभी किसी ने मुझसे कहा, "अरे यह कुलदीप नैयरवा तअ.. वामपंथी..है एकर लेख तअ ऐसई ऊटपटांग रहथअ.." लेकिन उसके बाद कुलदीप नैयर के लेख पढ़ने को लेकर मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई.. वह जिज्ञासा आज तक बनी रही..यही नहीं किसी विषय पर अपनी बनायी धारणा के विपरीत वाली धारणा को जानने की जिज्ञासा भी धीरे-धीरे बढ़ती गई थी…असल में घटनाओं और बातों पर नैयर जी का बौद्धिक विश्लेषण तार्किक हुआ करते थे.. उनके लेख पढ़ते हुए ऐसा लगता जैसे सोचने की एक और नई दृष्टि खुल रही हो!#चलते_चलतेअगर हम अपने ज्ञान के विरोधी ज्ञान को नहीं जानते तो कुछ नहीं जानते...#सुबहचर्या(24.8.2018)श्रावस्ती
यह अकथ-मन ! यहाँ प्रश्नों और उत्तरों की टकराहटों में एक सार्थक दुनियाँ तलाशनें की आकुलता है...
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गुरुवार, 28 मई 2026
ज्ञान का विरोधी ज्ञान
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