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बुधवार, 27 मई 2026

इंसानी फितरत को समझने वाले जानवर!

       आज सुबह टहलने निकले, वही पाँच पैंतालीस पर! पहले तो मन ही नहीं हो रहा था कि टहलने निकलें.. लेकिन मन का क्या! वह तो ऐसा ही है। उसके हिसाब से चलें तो फिर हो चुका! यह चीजों को चौपट करके ही माने। इसीलिए कभी-कभी मन के विरुद्ध चलने में भी भलाई छिपा होता है… बशर्ते यह इस बात पर निर्भर है कि हम ऐसा करके चाहते क्या हैं? खैर।
       मैं स्वयं का स्वास्थ्य-शुभेक्षु हुआ सड़क पर पग-चालन करने लगा.. चलते-चलते विकास भवन की एक तस्वीर ली.. सोचा, यदि तस्वीर लेते हुए कोई मुझे देखता है तो वह यही अनुमान लगा सकता है कि हो न हो इस बिल्डिंग में जरूर कोई खास बात है। वैसे यह बिल्डिंग मेरे लिए खास तो है ही! फिलहाल इन विचारों को परे हटाकर मैंने विकास भवन की तस्वीर मोबाइल में कैद कर लिया।
      इधर सड़क पर झुंड में गौ-पशु ऐसे खड़े दिखाई पड़े, मानो आदमियों के काम में व्यवधान डालने की ठान कर आए हों..! मेरे सामने एक ट्रक और एक बस इन्हें बचाते हुए साइड से निकले। 
      थोड़ा आगे बढ़ा तो गायों की देखा-देखी घोड़े भी सड़क पर साधिकार खड़े दिखाई दिए… शायद गायों को देखकर घोड़ों को भी अस्तित्व-बोध हुआ हो कि नहीं हमारे भी कुछ जीवनाधिकार हैं हम भी सड़क पर गायों की तरह खड़े हो सकते हैं, वैसे भी मार्गों पर सदियों से हमारा जन्मसिद्ध अधिकार रहा है! 
       सड़क पर गाय और घोड़े बेफिक्र खड़े थे, मैंने मन ही मन सोचा, अन्य जानवरों को भी इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। सभी जानवर इकट्ठे होकर समझदारी दिखाते हुए एक जानवर-संघ बनाकर सड़क पर आकर खड़े हो जाएं और इंसानों को चेता दें कि हमारे भी मूलाधिकार की चिंता की जाए! 
        वैसे एक बात है, यह जानवर-संघ इंसानों पर अवश्य भारी पड़ेगा, क्योंकि यहाँ प्रत्येक इंसानों में एक दूसरे को इंसान न मानने की प्रजातीय बिमारी है, पशु-संघ इंसानों के बीच की इस बिमारी का लाभ उठा सकते हैं! क्यों है न? खैर। 
     फिर नजर ग‌ई सड़क के ऊपर आर-पार लगे साइन-बोर्ड पर, जिसपर लखनऊ, बहराइच, श्रावस्ती की दूरी लिखा था, उस बोर्ड पर लंगूर परिवार अपने बाल-बच्चों समेत चहलकदमी कर रहे थे! शायद इन्हें इंसानी फितरत की अच्छी समझ है, इन्हें जानवर-संघ का सदस्य बनने की जरूरत नहीं, इसलिए ये सड़क पर नहीं उतरे! 
     यहां सेथोड़ा आगे बढ़ा, एक कुत्ता महाशय जानवर-महासंघ का विद्रोही टाइप बने आदमियों का सहयोग करते प्रतीत हुए..! ये महाशय अकेले ही सड़क के नियमों का पालन करते हुए चले जा रहे थे। इन्हें ऐसे चलते देख मैंने सोचा, "ये महाशय भी आदमगीरी को बखूबी जानते इसके बरक्स इन्हें अपने कुत्तागीरी में ही मज़ा है, इसलिए इन्हें भी जानवर-महासंघ में सम्मिलित होने की क्या जरूरत? शायद इसीलिए निश्चिंत हैं! खैर..
      रात में बारिश हुई थी। अभी तक सुबह के वातावरण में उससे ठंडकपन बनी हुई थी। हवाओं में घुली यह ठंडकपन मेरे विचारों को गर्मी प्रदान कर रही थी। इस मौसम में मुझे अपने विचारों के साथ चलने में मजा आ रहा था। 
     तभी देखा! सामने कुछ दूर एक इंसान सड़क पर ही (पटरी नहीं) अपनी साइकिल छोड़ वहीं खंती की ओर बढ़ गया। वहां बैठा वह प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान को धता बताने लगा! खैर इस सार्वजनिक स्थान पर भी किसी की निजता भंग न हो मैंने उससे नजरें फेर लिया उसकी गिरी-पड़ी साइकिल की तस्वीर भी नहीं लिया‌। 
      इसके लिए कुछ लोग बेचारे प्रधानमंत्री को दोष दे सकते हैं कि उनका स्वच्छता अभियान मात्र दिखावा है! फिर मैंने मन ही मन सोचा, "काश! प्रधानमंत्री यहाँ लट्ठ लेकर खड़े होते, तो उनका स्वच्छता अभियान अवश्य सफल होता!! लेकिन खैर यह देश ही ऐसा है, यहाँ सब को जोर की लगी है..महान से महान प्रधानमंत्री के पुरखे भी इसे नहीं रोक सकते!!!
     अब मैं वापस अपने आवास के पास पहुँचा ही था कि बकरियों की आर्त्र स्वर में मिमियाहट सुनाई पड़ी, मेरे सामने से गुजरती मोटरसाइकिल पर एक आदमी दो बकरियों को अपनी गोद में बेरहमी से दबाए था। उस मोटरसाइकिल के दोनों ओर दो बोरे भी टंगे थे, उसमें भी एक-एक बकरियां बँधी थी! मतलब मोटरसाइकिल पर कुल चार बकरियां और दो आदमी थे! इन्हें इस तरह जाते देख मैंने सोचा, "पता नहीं इन बकरियों की अम्मा इनका खैर मनाने के लिए बची भी होगी या नहीं..."
#चलते_चलते 
      जिसे केवल अपनी पड़ी है, उसे ऊँच-नीच कुछ भी नहीं सूझता..
#सुबहचर्या 
   (26.7.18)

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