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गुरुवार, 28 मई 2026

हिंदू होने की पहली शर्त

      सुबह गहरी नींद में था, जब लाउडस्पीकर का शोर कानों में पड़ा। मैं उठ गया‌, जिस आवाज से निद्रावस्था जैसी समाधि भंग हो निश्चित ही वह आवाज सुकूंन और शांतिदायक तो नहीं ही होगी!! 
       बाहर घना कुहरा छाया था, सड़क पर चलते हुए ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी धुंध में घुसे चले जा रहे हों! पीछे से कुछ लोगों की बातचीत की आवाज आती सुनाई पड़ी, किसी ने किसी को कहीं जाने के लिए कहा था लेकिन वह जाने के लिए तैयार नहीं था। बस इसी खुन्नस में वह "किसी" उस कहने वाले "किसी" को पुलिसिया शैली में गरियाये जा रहा था। उसकी गालियां मातृशक्ति को भी बीच में घसीट रही थी। 
     लौटते समय कुहरा छंटने लगा था। चाय पीते समय ध्यान लाउडस्पीकर पर गूँजती धार्मिक आवाजों पर गया, जिसके कारण सुबह-सुबह ही जाग उठा था। मैं विचार करने लगा…
 .... सभ्यता के प्रारंभ से जिज्ञासु मानव-मन ने अपने रहस्यात्मक-भाव वाले अनुत्तरित प्रश्नों को आध्यात्मिक भाव में बदले होंगे और फिर इसके बरक्स अपना जीवन-दर्शन गढ़ा होगा। मनीषियों ने कालान्तर में 'चाहिए' के भाव के साथ आचरण से सम्पृक्त करने के प्रयास में ही इसे "धर्म" कहा। यहाँ इस "चाहिए" में "बाँधने" का भाव नहीं, अपितु तार्किकता के आधार पर जीवन-दृष्टि का भाव समावेशित है, जो जीवन को सतत और सहज रूप से गतिशील बनाता है। यही "सनातन जीवनशैली" है, जिसे इधर 'हिन्दू धर्म' के नाम से संबोधित किया जा रहा है। यह सनातन जीवनशैली, आध्यात्मिकता और प्रकृति से तादात्म्य स्थापित कर हजारों वर्षों से अपना अस्तित्व बनाए हुए है तथा दुनियाँ की श्रेष्ठ सभ्यताओं में से एक है। 
          हम सदैव से जिज्ञासु रहे हैं; यह जिज्ञासा हमें तर्क के रास्ते वाह्य और अन्तर्जगत के चरम बिंदु अर्थात आध्यात्मिकता के धरातल पर ले जाकर खड़ा कर देती है, जहाँ से विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में ढलकर यह अपना उत्तर तलाशती है। इसप्रकार आध्यात्मिक-दृष्टि, जिसमें वैज्ञानिक और तार्किक दोनों दृष्टि अन्तर्वलित है, वैचारिक-सांस्कृतिक मान्यताओं को औदात्यपूर्ण बनाती है। हमारे इसी सनातन जीवन-शैली के औदात्यपूर्ण चिंतन से एक सर्वसमावेशी-सांस्कृतिक-सभ्यता निर्मित हुई और यही "हिंदू" होने की पहली शर्त भी है। 
     लेकिन आज "भक्ति-भाव" के बढ़ते आडंबर में यह हिंदू जीवन-दृष्टि धीरे-धीरे छीजते हुए कैसे हमें असहज बनाकर अपने ही मूल संदर्भ से विलग हो रही है, यह एक चिंतनीय विषय है। इसकी प्रक्रिया क्या और कैसे रही है, इसे समझने के लिए हम महाकाव्यों में वर्णित "राम" के चरित्र के भावबोध का सहारा ले सकते हैं, क्योंकि हमारे धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में राम एक ऐसे चरित्र रहे हैं, जिनसे यह समाज अनुप्राणित होता आया है। 
      हमारे रामायण-महाकाव्य अपने-अपने युगबोध के अनुसार राम के चरित्र को विभिन्न भाव-भूमि पर ग्रहण करते आए हैं। अतः इनमें राम का चरित्र अपने समय से संवाद करता हुआ प्रतीत होता है। इससे तत्कालीन समाज के उस सांस्कृतिक मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को भी समझा जा सकता है, जिससे धार्मिक मनोवृत्तियों में परिवर्तन के साथ समाज भी इससे प्रभावित हुआ। जैसे, ऐसा क्यों है कि जीवन-संघर्ष में जूझते बाल्मीकि के राम एक सामान्य मानवीय चरित्र हैं और वहीं तुलसी के राम 'ईश्वरत्व' की भावभूमि पर स्थापित हैं? यह अध्यात्म से भक्ति की ओर जाते समाज की अपने सांस्कृतिक संदर्भों के साथ प्रतिक्रिया रही होगी। समाज पर इसके प्रभाव का विश्लेषण एक विचारणीय बिंदु है ।...
      हाँ तो आज बस यहीं तक, कोशिश रहेगी इसपर फिर कभी गुफ्तगूँ करेंगे। हो सकता है आप मेरी बातों से इत्तेफाक न रखते हों, लेकिन कोई बात नहीं। 
#चलते_चलते
     धुंध के पार जाने के लिए चलते रहना चाहिए। 
#सुबहचर्या 
 (3.12.18)

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