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गुरुवार, 28 मई 2026

ये आवाजें धर्म की नहीं!

        आज रविवार है..टहलने नहीं जाना था, रविवार का दिन निरुद्देश्य बिताने की इच्छा रहती है। लेकिन सुबह की अजान कानों में पड़ी तो नींद खुल गई। दुबारा सोने की कोशिश किया तो भजन की आवाज सुनाई पड़ने लगा। जैसे दो "धर्मानुयायियों" के बीच "राइवलरी" हो! इधर ध्यान दे रहा हूं तो यह प्रवृत्ति कुछ बढ़ती जान पड़ती है। जैसे आज ही लाउडस्पीकर पर सुनाई देने वाली ये आवाजें शोर की हद तक परस्पर गड्डमड्ड हुए जा रही थीं!
     अब तो 'धर्मों' का लाउडस्पीकरीकरण हो चुका है। इससे धर्मों की शान्त..स्निग्ध..कोमल भावना कर्कश ध्वनि में बदलती जा रही है! खैर, 
       यह "धर्मों" में आया यह नया "भक्ति-वाद" हमारे "ज्ञान-तंतु" को धीरे-धीरे कमजोर करने लगा है। इस शोर के बीच मैंने स्वयं से गुफ्तगूं किया - जैसे कि…
       "हिन्दू जीवनशैली या भारतीय जीवन-दर्शन की आधारभूमि वेदः प्रसूत आध्यात्मिकता है, जो हमारी धार्मिक-सांस्कृतिक मनोवृत्तियों को साम्प्रदायिक-मनोवृत्ति में बदलने नहीं देती और व्यक्ति को अपने मान्यताओं के केंद्र में रखकर चलती है। इसकी पुष्टि "बिंब प्रतिबिंब" उपन्यास में स्वामी विवेकानंद के इस कथन से की जा सकती है- 
      "प्रत्येक व्यक्ति का विकास अपनी आन्तरिक शक्ति द्वारा ही होना चाहिए, अपने स्वभावानुसार ही उसका विकास होना चाहिए, उन्नति होनी चाहिए, अवनति होनी चाहिए।"
      यह कथन उस वैदिक संस्कृति की ओर संकेत है जिसमें निहित आध्यात्मिकता से व्यक्ति में स्वतंत्र चेतना के साथ आत्मिक विकास की भावना सुदृढ़ होती है और उसे किसी "सम्प्रदाय" का अंग बनने से रोकती है। 
        लेकिन यहीं पर एक प्रश्न उभरता है, क्या 'हिंदू-धर्म' के रूप में रूढ़ होते इस सनातन जीवनशैली को "धर्म" की संज्ञा देकर "रिलिजन" या "मजहब" की परिधि में लाकर उसकी मूलभावना "आध्यात्मिकता" से इसे अलग नहीं किया जा रहा? 'धर्म' के नाम पर ये आडंबर कहीं हमें अपनी जड़ से काटकर कटी पतंग की तरह भटकने के लिए तो नहीं छोड़ रहे? आखिर इसके लिए कौन सी धार्मिक-वैचारिक सांस्कृतिक परिस्थितियाँ उत्तरदायी है? 
       ये प्रश्न और इनके उत्तर भारतीय जीवन-दर्शन के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके पीछे का मनोविज्ञान किसी राष्ट्र-राज्य की सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक उन्नति के साथ उसे एक श्रेष्ठ समाज व्यवस्था में बदलने का कारण हो सकता है। इस मनोविज्ञान का सामान्य जनमानस पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, इसे समझने का प्रयास किया जा सकता है।"
       हाँ..आज बस इतना ही! इस बात पर फिर बात करने का मन हुआ आगे की बात करेंगे।
 #चलते_चलते
      किसी बात के कई पहलू हो सकते हैं, सार्थक और निरर्थक! लेकिन बात कुछ अर्थ छोड़ते हैं, बस इन अर्थों को पकड़ने कोशिश होनी चाहिए... 
  #सुबहचर्या 
    (2.12.18)
       विनय

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