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गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

क्या करें? हम तो चाटुकारों के देश में रहते हैं..

            उस गोष्ठी के सभाकक्ष में पहुँचते ही मैं अपनी घड़ी देखने लगा था| मैं गोष्ठी के प्रारंभ होने के निर्धारित समय से करीब चालीस मिनट विलंब से पहुँचा था, उस समय गोष्ठी के मंच पर अतिथियों की कुर्सियाँ खाली थी| जैसा कि किसी भी गोष्ठी के मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि होते हैं वैसे ही यहाँ भी थे| इनके नाम को दर्शाता हवा में झूलता वह बैनर इन अतिथियों का बेसब्री से इंतज़ार करता हुआ मुझे जान पड़ा लेकिन अभी भी वहाँ के वातावरण में उन महानुभावों के आगमन की सुगबुगाहट मुझे परिलक्षित नहीं हुई तथा आयोजकगण गोष्ठी की तैयारियों में ही व्यस्त दिखे| आमंत्रितकर्ता ने मुझे मंच पर की एक खाली कुर्सी पर बैठाया|  
         कुछ देर बाद मंच की खाली कुर्सियों पर तौलिया डाला जाने लगा था मेरी भी कुर्सी पर तौलिया डाला गया| फिर कदाचित् गर्वित भाव से मैंने मंच के सामने हाल में खाली पड़ी कुर्सियों की ओर देखा जिस पर लोग आ आ कर बैठते जा रहे थे| इधर यहाँ मंच पर अकेले बैठे हुए अतिथियों के इंतज़ार में खाली अन्य कुर्सियों पर मेरा ध्यान चला गया| इन्हें देख मैं थोड़ा असहज हो उठा तथा मन ही मन स्वयं को कोसने लगा कि नाहक ही इतनी जल्दी आ गए| खैर, करीब आधे घंटे बीतने के बाद अतिथियों का आगमन हुआ| विशिष्ट और मुख्य मुख्य अतिथि बारी-बारी से मंच पर विराजमान हुए! दीप प्रज्ज्वलन और औपचारिक उद्घाटन के बाद आयोजनकर्ताओं को अपने समयाभाव का हवाला दे वे कुछ ही देर बाद चलते बने थे|
          इधर बारी-बारी से इन दोनों अतिथियों को जाते देख इनके ‘समयाभाव’ के सामने मैं नतमस्तक हो गया था| मुझमें भी ‘समयाभाव’ से सम्मानित होने का भाव जागृत हो उठा था और तत्क्षण बाद मैं भी यही हवाला दे उस गोष्ठी स्थल से चलता बनना चाहा था| लेकिन मेरा मन थोड़ा समझदार निकला उसने जैसे मुझे समझाया हो “क्यों बे! तुझे पता नहीं कि तेरे पास समय ही समय है? समयाभाव तो मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि नामधारी जीवों के लिए ही आरक्षित किया गया है..तू किस खेत का मूली है..जो इसका सहारा लेगा...चल बैठा रह..” और फिर मैं गोष्ठी में बैठा ही रहा| अब मेरा मन इस निष्कर्ष पर जा टिका कि किसी गोष्ठी या समारोह के लिए विशिष्ट और मुख्य अतिथि बनने जैसा सम्मान अर्जित करने की योग्यता के लिए ‘समयाभाव’ होना पहली शर्त है इसके बाद ही कुछ और! इस शर्त का पालन करते हुए ऐसे अतिथि किसी गोष्ठी या समारोह में सबसे बाद में पहुँचते हैं और सबसे पहले वहाँ से प्रस्थान भी कर जाते हैं| हो सकता है आप की किसी गोष्ठी में ये विशिष्ट जीव अंत तक बैठे रहे हों लेकिन यह अपवाद स्वरुप ही होगा|
       जैसा कि मैंने कहा कि किसी भी गोष्ठी का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलित करके की जाती है और इसके लिए एक डिजाइनर दीप में चार-पाँच बाती रखे होते हैं जिसे बारी-बारी से मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि तथा अन्य अतिथि एक-एक कर प्रज्ज्वलित करते जाते हैं| यहाँ इस गोष्ठी के शुभारम्भ में भी इसी परम्परा का पालन किया गया| लेकिन मैंने देखा मुख्य अतिथि के द्वारा दीप के पाँच बातियों में से चार बातियों को प्रज्ज्वलित कर देने के बाद आयोजक ने विनम्रतापूर्वक उनके हाथों से उस जलते मोमबत्ती को लेकर विशिष्ट अतिथि की ओर बढ़ा दिया और उन्हें भी उस एक बची बाती को प्रज्ज्वलित कर और गोष्ठी के शुभारम्भ करने का गौरवबोध मिल गया था| फिर भी हम जैसे सामान्य से अतिथि मुख्य अतिथि के इस  अनाड़ीपने से ऐसे ही उस गौरवबोध से वंचित हो गए थे| हालांकि इसमें उन महोदय का दोष नहीं था वे शायद पहली बार मुख्य अतिथि बने थे नहीं तो एक बाती जलाने के बाद मोमबत्ती विशिष्ट अतिथि की ओर बढ़ा देते|
       इस गोष्ठी में मुझे एक तथ्य की अनुभूति और हुई जिसे मैंने धीरे से आत्मार्पित कर लिया वह यह कि जरुरी नहीं कि किसी गोष्ठी के मुख्य अतिथि या विशिष्ट अतिथि को उस गोष्ठी के लिए निर्धारित विषय का ज्ञान हो| लेकिन आप इसे अधिनियमित मत मानिएगा क्योंकि हो सकता है नेताओं या उनके लिए आयोजित गोष्ठी अपवाद हो लेकिन तब यह गोष्ठी, गोष्ठी न होकर जनसभा होगी जहाँ जनता उनके ज्ञान का लोहा मान जाती है|
      अब आते हैं एक दूसरी बात पर, अकसर गोष्ठियों में विशिष्ट अतिथि या मुख्य अतिथि के पूर्व अन्य सामान्य से अतिथियों या वक्ताओं का भाषण या कहें संबोधन भी होता है| कभी-कभी वक्तागण गोष्ठी को संबोधित करते समय मुख्य अतिथि के लिए ‘परम आदरणीय’ या ‘आदरणीय’ जैसा विशेषण प्रयोग करने लगते हैं तब ऐसे संबोधनों के कारण एक समस्या उत्पन्न होने की संभावना होती है| जैसे किसी पूर्व वक्ता ने मुख्य अतिथि के लिए ‘परम आदरणीय’ या ‘परम परम श्रद्धेय’ जैसा विशेषण प्रयुक्त किया तो बाद के वक्ता के लिए भी इन विशेषणों का प्रयोग करना एक मज़बूरी बन जाती है अन्यथा “परम” को “आदरणीय” से अलग करने पर उस सीमा तक मुख्य अतिथि अपना असम्मान समझ सकते हैं| यहाँ एक अन्य तथ्य की ओर भी इंगित करना है, अकसर गोष्ठी के वक्ता भाषण के शुरू में सभी अतिथियों का एक-एक कर नाम ले अपना भाषण प्रारम्भ करते हैं, अब यदि किसी का नाम लेने से रह जाए तो फिर जिनका नाम छूटा हो उन महानुभाव के नाराज हो जाने का खतरा भी बना रहता है|
      इन्हीं बातों को सोच-सोच कर कभी-कभी वक्ता के रूप में मैं अपना भाषण गड़बड़ा देता हूँ बोलना कुछ होता है तो बोल कुछ देता हूँ; वक्तृत्व कला गायब हो जाती है| ऐसे में अकसर मुझे अमेरिका के शिकागो में स्वामी विवेकानंद जी के भाषण का “भाइयों और बहनों” का वह संबोधन याद आ जाता है जब इसी संबोधन को सुन वहाँ का हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था| लेकिन यहाँ तो हम ‘आदरणीय’ या ‘परम आदरणीय’ जैसे संबोधनों में ही खोये रहते हैं, तथा कोई भी गोष्ठी जैसे अतिथियों की सम्मान-गाथा भर बन कर रह जाती है, यहाँ सामने बैठे श्रोता वक्ताओं के लिए साध्य नहीं मात्र साधन भर ही होते हैं| क्या करें हम तो चाटुकारों के देश में रहते हैं!
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रविवार, 20 मार्च 2016

आज के ये बुद्धिराजा...

          हाँ मुझे अपने बचपन के वे दिन आज भी याद हैं, उन दिनों हम अपने तीन-चार पारिवारिक हम-उम्र बच्चों के साथ कक्षा छह या सात में पढ़ रहे होंगे। तब हमारे घर पर परिवार के किसी वैवाहिक कार्यक्रम या अन्य अवसरों पर काफी रिश्तेदार जुटते और उनके साथ हमारी ही उम्र के कुछ बच्चे भी होते थे। उन्हीं में से एक बच्चे से अकसर हम चिढ़ने-चिढ़ाने का खेल खेलने लग जाते थे। वह सुबह चार बजे उठकर पढ़ने की अपनी आदत के साथ अंग्रेजी ग्यान का भी हम पर रौब झाड़ता रहता और हम साथी अन्य बच्चों को बुद्धू भी कह देता था, तब हमें लगता वह हमारी खिल्ली उड़ा कर हमें नीचा दिखा रहा है और हमारी बातों का बौद्धिक विश्लेषण भी करने लगता। उस समय हमें बहुत बुरा लगता फिर हम भी अन्य साथी बच्चों के साथ उसे "बुद्धिराजा" कह कर चिढ़ाते। ऐसा कई बार होता और एक तरह से उस बच्चे को "बुद्धिराजा" कह कर हम अपनी भड़ास भी निकाल लेते थे। तब यह सम्बोधन उसकी बुद्धि और हमारे बीच ढाल का काम करती। अंत में इस सम्बोधन से चिढ़ते हुए वह बच्चा चुप हो जाता।
           यहाँ आशय उस हम-उम्र बच्चे को गलत ठहराना नहीं है। यह घटना हमें इसलिए याद आई कि हम "बुद्धिजीवियों" द्वारा दूसरों के कार्यों के छिद्रान्वेषण में ग्यान बघारने की आदत से आहत हो उठते हैं। आज यह सोचकर हम आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि इस शब्द "बुद्धिजीवी" के समानार्थी "बुद्धिराजा" जैसे शब्द का ईजाद फुफेरे भाई के लिए हम बच्चों ने तब कैसे खोज लिया था? उस समय तो हम प्राइमरी कक्षा में ही पढ़ते थे और 'इन्नोसेंट' जैसे ही थे! मतलब साफ है सामाजिक जीवन में किसी व्यक्ति के कार्यों का मात्र बुद्धिवादी नजरिए से विश्लेषण सही नहीं होता बल्कि यह चिढ़ाने और उत्तेजित करने वाला होता है और उसके कार्यों का सही मूल्यांकन नहीं होता। समाज या व्यक्ति के साथ हमारी अन्तर्क्रिया केवल बुद्धि आधारित ही नहीं होती बल्कि इसके पीछे परिस्थितियाँ, भावनाएँ और तमाम तरह के हमारे अनुभव भी उत्तरदायी होते हैं।
           वास्तव में हमारा बुद्धि आधारित व्यवहार हमें केवल औपचारिक ही बनाता है जबकि हम एक अनौपचारिक दुनियाँ में रह रहे हैं। यदि हम यह मानते हैं कि भावनाएँ चीजों के प्रति हमें पूर्वाग्रही बनाती हैं तो उसी प्रकार यह भी तय है कि बुद्धिवादी दृष्टिकोंण भी पूर्वाग्रही होता है क्योंकि हमारे सारे तर्क अपनी ही बात को सही ठहराने के लिए होते हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से यह स्थिति स्वयं के विचारों के प्रति अंध-श्रद्धा है और यह भी भक्ति हुई।
         अन्त में यदि हम अपने किसी विरोधी की आलोचना में मात्र कोरे तर्क-बुद्धि का सहारा लेते हैं तो उस विरोधी को ही ताकतवर बनाते जाते हैं। "बुद्धिराजा" बन ऐसे ही कुछ बुद्धिजीवी आज अपने विचारों की अंध-श्रद्धा पर सवार हो पक्ष प्रतिपक्ष बनकर मात्र एक-दूसरे को ही नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन उन्हें यह नहीं पता इसके क्या परिणाम होते हैं? आप अपने उद्देश्य में सफल नहीं होते और आपका प्रतिपक्ष शक्तिशाली होता जाता है क्योंकि एक तीसरी दृष्टि भी होती है जिसे "बुद्धिराजा" लोग नजरअंदाज करते हैं।

शनिवार, 19 मार्च 2016

सत्य का उद्घाटन..!

             उस दिन मेरे एक साथी महोदय ने कहा- "सत्य को उभारना नहीं चाहिए" हालाँकि इसके आगे उन्होंने कहा था कि "इससे सत्य को उद्घाटित करने वाला स्वयं संकट में पड़ जाता है।" फिर उन्होंने अपनी इस बात में और जोड़ा था "आखिर किसी के आम को इमली कह देने से वह इमली थोड़ी न हो जाएगा.." उनके कहने का आशय यह भी था "सत्य तो सत्य ही रहता है चाहे आप इसे उभारें या न उभारें।"

               फिर उन महोदय ने कुछ ऐसे उदाहरण भी बताए जहाँ सत्य को देखने और समझने वाला व्यक्ति भी इसे सहन नहीं कर पाया और उसने अपने जीवनलीला पर ही संकट खड़ा कर लिया। इसी से उन्होंने यह निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि "यदि हम सत्य न जाने तो जीवन सहज गति से चलता रहता है और इस गति पर कोई फर्क नहीं पड़ता।"
             उनकी बातें मुझे बहुत अच्छी लगी सोचा बैठे-बैठाए व्यवहारिक जीवन के लिए मुफ्त में मार्गदर्शन प्राप्त हो गया नहीं तो कहीं इसके लिए किसी बड़े नामी टीवी बाबा का प्रवचन सुनना पड़ता और वह भी शायद इस सत्य का साक्षात्कार न करा पाते....खैर..
            जब मैंने उन साथी महोदय की इन बातों को सुना था तो उसी समय आपको भी इस सत्य से साक्षात्कार कराने की सोच लिया था.. लेकिन तब कैसे अपने इस साक्षात्कारित सत्य से आप सबको परिचित कराऊँ इसका तरीका नहीं मिल पाया था....
             लेकिन आज जब फेसबुक पर नामी कुछ बौद्धिकों, टीवी चैनल वालों के कंटेंट पर ध्यान गया और मुझे यह बताने का तरीका मिल गया...
             हाँ, एक बात है उन महोदय की बातों से यह तो मैं भी मान गया था कि सत्य को उजागिर करने वाला या सत्य को जाननेवाला स्वयं परेशानी में पड़ सकता है लेकिन यह तो एक बात है! दूसरी महत्वपूर्ण बात का ज्ञान मुझे इसी सोशल मीडिया और टीवी चैनलों को देख कर प्राप्त हुआ...
           वह यह कि चैनलों और मीडिया का अपना-अपना सत्य देख अब शायद ही कोई सत्य उद्घाटित होने की सोचे ? आखिर ऐसा क्यों? भाई आप जरा समझिए! सत्य तो सत्य ही होता है इसमें कोई दो राय नहीं... लेकिन जब लोग इसे ऊभारते हैं तो यह सत्य स्वयं अपने को एक अजीब स्थिति में पाता है, उभरते समय ये सत्य महोदय बहुत खुश रहते हैं..सोचते होंगे कि देखो मैं सत्य हूँ...और तुम सबका हूँ !! लेकिन ढोल नगाड़े के साथ सत्य महोदय का यह प्रकटीकरण का गर्व क्षणभंगुर ही होता है। सत्य का यह गुमान कि सत्य सत्य होता और मैं सबका हूँ, चकनाचूर हो उठता है...!
            यह सत्य बेचारा अपने प्रकटीकरण के बाद ऐसे खींच-तान का शिकार होता है कि चीथड़ों में बंट जाता है.. पहले तो यह होता है कि इसे यानी सत्य को अपने हाथों में थामें कुछ लोग सत्य के वाहक बन खुशी में जोर-जोर से डंका बजाकर नाचते हैं गोया बाकी सब यहाँ असत्यवादी पसरे हों और सत्य भी इसे देखकर खूब खुश होता रहता है। लेकिन जब लोगों के हाथों-हाथ लिया गया और उछलता यह सत्य दूसरी ओर निगाह डालता है तो अचक जाता है! वहाँ दूसरी तरफ तो उसे मातम पसरा हुआ सा दिखाई देता है..! यही नहीं उस दूसरी ओर के लोग इस सत्य को विरोधी के हाथों में खुशी से उछलते देख मुँह बिचका इसमें मीन-मेख निकाल इसे सत्य मानने से ही इनकार कर रहे होते हैं..
            हाँ सत्य अपनी इस स्थिति से, और कुछ के हाथों उछलते तथा दूसरों को अपनी ओर से मुँह मोड़ते देख अपना अपमान समझ व्याकुल हो उठता है! वह सोचता है, कहाँ वह सबका सत्य बनने निकला था और कहाँ अब वह मात्र कुछ ही हाथों का वह खिलौना बन गया है.. यही सोचते-सोचते सत्य बेचारा अपने को ठहरा हुआ पाता है।
               और इसके बाद सत्य के साथ एक दुर्घटना और शुरू हो जाती है! कुछ की खुशी भरे हाथों उछलते सत्य की यहीं से दुर्दशा भी प्रारम्भ हो चुकी होती है। अब यह अपने को नुचता हुआ पाता है! सत्य की इस नोंच-नोचाई में उसको पहचानना भी मुश्किल हो जाता है..! इस बेचारे सत्य का जिसके जो हाँथ लगा उसे ही नोच लोग फरार होने लगते हैं। अपनी इस दुर्दशा से हो सकता है सत्य निकलना चाहता हो लेकिन निकलना अब इसके वश में भी नहीं होता। क्योंकि तब-तक यह दूसरों के हाथों खिलौना बन चुका होता है और अब तक चिंदियों में बँट चुका यह सत्य बेचारा असत्य में रूपांतरित हो चुका होता है, जहाँ इसे रोना भी अब मुअस्सर नहीं...! यहाँ तक तो जय हिंद!!
               हाँ भाई तटस्थ लोग, इस सत्य का खूब मजा लेते हैं.. जैसे हमारे देश की राजधानी वाले मुख्यमंत्री जी हैं इनके हाथों सत्य भी खूब उछला था। मीडिया ने भी सत्य के इस उछल-कूद में उनका खूब साथ दिया था..! लेकिन अब पता नहीं क्या हुआ? हमें लगता है अब उनका वह सत्य, सत्ता पर सवार है या सत्ता स्वयं उस सत्य पर ही सवारी गाँठ रही हो? यह आप लोग ही तय करिए....या इस सवार-सवारी पर निगाह डालिए तथा कौन कितना झलक रहा है इससे तय कर लीजिए।
              अब आते हैं बेचारे रोहित बेमुला पर, उसने जब सत्य को जाना तो वह आत्महत्या कर चुका होता है....! यह सत्य तो वाकई खतरनाक निकला! क्योंकि यहाँ यह सत्य रोहित बेमुला की आत्मा के साथ ही भूत बन सब पर मँडराने लगा है और भाई लोगों की ओझाई-सोखाई चालू है! यहाँ भूत बना यह सत्य या तो प्रकट ही होगा या इस ओझाई-सोखाई से डर ससुरा भाग ही जाएगा..? क्योंकि भूतों का हश्र हम सब जानते हैं!
             हाँ अब आते हैं वो क्या नाम है..? अरे हाँ कन्हैया..! इस समय उसे देख ऐसा लगा जैसे यह सत्य भी कल रात ही जेल से ही छूटा हो, और इसके कंधों पर सवार यह सत्य इसके भाषणों में गौरवान्वित हो खूब इठला रहा हो...सत्य तुमसे खूब रश्क हो रहा है! बस चूँ-चूँ का मुरब्बा मत बनना।
            मैं भी यहाँ बैठे-बैठे यही सोच रहा हूँ उछलो भाई खूब उछलो..! ये मीडिया और टीवी वाले भी कन्हैया के हाथों में अपना हाथ लगा तुम्हें खूब उछाल रहे हैं! कुछ लोग तुम्हें कन्हैया के हाथों उछलते देख हो सकता है मायूस भी हों और तुमसे मुँह चुराना चाहते हों...क्योंकि उनका भी कोई सत्य हो जो कहीं इस खेल में दुबककर तिरोहित न हो जाए..?
             लेकिन भाई मेरे सत्य! यह तो मैं जानता हूँ कि तुम इस समय बहुत परेशान और घबड़ाहट में होगे और वह भी अपने अस्तित्व को लेकर...! मैं तुम्हारी इस सोच और डर से भी वाकिफ हूँ कि कहीं तुम्हें मात्र कन्हैया का ही सत्य न ठहरा दिया जाए...! कुछ लोग इसमें लग भी चुके हैं, और तुम्हें! सत्यों के गुत्थम-गुत्थाई के इस खेल में अपने चिंदी-चिंदी हो जाने का खतरा भी महसूस हो रहा होगा...लेकिन तुम कर भी क्या सकते हो..? ये मीडिया और टीवी वाले तुमको बाँटकर तुम्हें चिंदी बनाने पर ही जो तुले हुए हैं, तुम असहाय से कुछ कर भी नहीं सकते..!
              अंत में कन्हैया के हाथों उछलते या उछलाते जाते हे सत्य महोदय...! बस तुमसे मेरी यही एक विनती है "यदि तुम बचते हो तो इस बेचारे कन्हैया की गरीबी अवश्य दूर करना, जैसे उस बेचारे दिल्ली वाले को मुख्यमंत्री बनाकर किया है...! इतना तुम्हें कन्हैया का एहसान मानना ही होगा आखिर उसके हाथों उछल-उछल अपने होने का मजा जो ले रहे हो! बाकी हम तो आजादी के बाद से गाहे-बगाहे तुम्हारे इस उछल-कुदाई का खेल देखते ही आ रहे हैं..!" एक बार और जोर से बोलो जय हिन्द...!
              वैसे आप बोले नहीं होगे इससे तो कुछ मिलना नहीं... तो क्यों न आप भी इस उछल-कूद में शामिल हो जाते.......

उसे तो एक डर विहीन दिवस ही दे दो!

              उस दिन रात गहरा रही थी और हमारी बस चली जा रही थी। मैं बस की खिड़की से बाहर पसरे अँधेरे को निहारे जा रहा था और रह-रह कर कोई प्रकाश श्रोत इस पसरे अँधेरे से जैसे लड़ते हुए आँखों के सामने गुजर जाता। इस प्रकाश श्रोत के गुजरने की आवृत्ति थोड़ी बढ़ने लगी थी लेकिन ऐसा नहीं कि बस की गति तेज हो गई थी बल्कि राजमार्ग के किनारे कोई बस्ती गुजरने वाली थी
           बस की खिड़की से देखते हुए सहसा आँखों के सामने से एक मंजर गुजरा। उस मंजर में, एक छोटे से मैदान में चकाचौंध करती लाइटों के बीच सजे मंच पर एक बारबाला नाचती हुई दिखाई दी थी। इसके साथ ही मेरी निगाहें उस मंच को घेरे हुए सैकड़ों पुरूषों के समूह पर भी चली गई थी। उन पुरूषों के बीच से तमाम हाथ उस नाचती बारबाला की ओर उठे हुए देखा। वह पुरूष समुदाय उस नाचती बारबाला का जैसे उत्साहवर्धन करता दिखाई दे रहा था।
            अब तक आँखों के सामने से वह मंजर गुजर चुका था। फिर मैं अपनी स्मृतियों में खो गया था। उस समय हम यही स्नातक के दौर से गुजर रहे थे। एक रिश्तेदार की शादी में गए थे। वहाँ भी ऐसे ही बारात में नाचने के लिए एक औरत को बुलाया गया था जिसका नाचना ही पेशा होता था। जनवासे में बारात की महफिल सजी हुई थी और बारातियों के बीच वह नर्तकी नाच रही थी। कुछ अधेड़ किस्म के बाराती अपनी जगह पर ही बैठे-बैठे खुशी से उछल रहे थे तथा एकाध तो खुशी से हवाई फायर भी करने लगे थे। उस समय हमने इसका विरोध किया था और उस जगह से दूर चले गए थे। उस नर्तकी का पुरूषों के बीच नाचना और पुरुषों का उछलते हुए उसे देखना तब हमें बहुत बुरा लगा था। वास्तव में जब कभी भी ऐसा दृश्य आँखों के सामने उपस्थित हुआ हमने ऐसे दृश्य से मुँह मोड़ना ही उचित समझा।
           मैं अकसर ऐसे दृश्यों को देखकर सोचने लगता हूँ कि जो पुरूष नाचती बारबालाओं या नर्तकियों को ललचाई सी नजरों से देख झूमते हुए ताली पीटते हैं वे अपने घर की महिलाओं की कैसी इज्जत करते होंगे? खैर....
           जरा उस महिला के मन झाँकते! जो अकेली पुरूषों के बीच में नाच रही हो और इन्हीं पुरूषों की ललचाई सी आँखें उसके शरीर को बेध रही हों, तो उस महिला के मन पर क्या गुजरती होगी? कुछ लोग इसे पेशा कह देते होंगे, लेकिन क्या कोई इसे सहज पेशा मान सकता है? यह पेशा हो भी तो यह तमाम दर्द और पीड़ा को समेटे हुए उस महिला की गरिमा की शर्तों पर ही होता होगा। ऐसे में मेरी स्मृतियों में आए उस बारात और ऐसे ही अन्य स्थलों पर लोग महिलाओं की गरिमा से खिलवाड़ करते हुए लगते हैं।
            उसी समय बस में जब मैंने सोशल मीडिया को खँगाला तो पता चला कि आज महिला दिवस भी है, क्योंकि कुछ लोग इस महिला दिवस पर बधाई देते हुए नजर आ रहे थे! लेकिन, मैं सोच रहा था पता नहीं वे किसको और किसलिए बधाई दे रहे थे। जबकि यह स्त्री तो-

हाँ वह स्त्री है
नहीं चाहती वह कि-
उसका भी कोई दिवस हो,
उसने तो जननी बन तुमको ही
सारे दिवस सौंप दिए हैं।
हाँ वह स्त्री है,
सहचरी बन साथ निभाया
आँगन की फुदकती उस गौरैया सी
जो तिनका-तिनका खटती है।
हाँ वह एक स्त्री है,
अभिलाषा है उसकी
उन बेधती निगाहों से
किसी मुक्ति-दिवस की।
हाँ, दे सको तो तुम उसे,
अपने जमावड़ों वाले गलियारों से
चटखारे वाली कहानियों का
पात्र बनते जाने से, ऐसा ही कोई
उसे एक मुक्ति दिवस दे दो।
हाँ, वह स्त्री है
अगर दे सकते हो तो उसे
तमाम कसीदों से मुक्त केवल
एक डर विहीन दिवस ही दे दो।
-विनय

स्वर्गलोक में नारद का नया बखेड़ा.

            संयोग से आज महाशिवरात्रि के दिन पृथ्वी का भ्रमण कर नारद जी स्वर्गलोक में भगवान् विष्णु से मिलने पहुँचे थे...मन में उठते कुछ अनसुलझे प्रश्नों से वे बेचैन थे..
           “भगवन् ! आप वामपंथी हैं या दक्षिणपंथी? विष्णु से नारद ने यही प्रश्न किया था| नारद के इस प्रश्न से भगवान् विष्णु अचकचा उठे और उनकी ओर देखते हुए बोले-
              “अरे नारद आप स्वर्गलोक में हो..! फिर भी यह प्रश्न..?”
             “नहीं प्रभु मेरे जिज्ञासु मन को शांत करें..मैं जब से पृथ्वीलोक से वापस आया हूँ..इस प्रश्न ने मेरे दिमाग का मट्ठा कर दिया है..अब आप ही मेरा उलझन दूर कर सकते हैं..|” माथे पर परेशानी का भाव लिए नारद जी ने कहा|
            इधर भगवान् विष्णु नारद के इस अनापेक्षित से प्रश्न से, यह सोचकर हैरान थे कि एक तो नारद के मुँह से आज “नारायण-नारायण” भी नहीं सुनाई दिया, दूसरे कहीं नारद जी उनकी भक्ति को छोड़ वामपंथ-दक्षिणपंथ जैसे सांसारिक प्रश्नों में ही न उलझ जाएं..! फिर भक्ति का प्रचार-प्रसार कौन करेगा..? हाँ अपनी भक्ति किसे अच्छी नहीं लगती...सो भगवान् विष्णु ने धीर-गंभीर वाणी में उनसे कहा-
             “अरे नारद जी ! देवलोक के लिए यह प्रश्न प्रासंगिक नहीं है..आप कहाँ का बखेड़ा यहाँ ला रहे हैं” 
             “नहीं प्रभु यह प्रश्न देवलोक के लिए, आप के लिए और सभी देवताओं के लिए प्रासंगिक है..!” नारद के आत्मविश्वास से लबरेज इस वाक्य को सुन नारायण ने नारद के प्रश्न के प्रति थोड़ी संजीदगी बरतते हुए पूँछा-
             “अच्छा..! ऐसे प्रश्न की प्रेरणा आप में कैसे जागृत हुई?”
           “हे प्रभु..! भोले बाबा और उनके भक्तों को देखकर ही मेरे मन यह प्रश्न आया, भक्तों के प्रति वर्ताव में मुझे आप त्रिदेव भी अप्रत्यक्ष रूप से आज के इस मौंजू प्रश्न में बंटे दिखाई दे रहे हैं, इसीलिए आपसे यह प्रश्न पूँछना पड़ा” -नारद उवाच|
              “तो नारद ! कैलाशपति शंकर जी से ही यह प्रश्न करते..” विष्णु ने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा|
             “हे परम आदरणीय प्रभु..! भोले बाबा से ऐसे प्रश्न करने की आवश्यकता ही नहीं..! वे तो असली वामपंथ के पुरोधा हैं। अहा..! राख भभूत लपेटे साँप, विच्छू धारण किए एकदम आम-आदमी जैसे और ऐसे ही लोगों से घिरे हुए..वही कैलाशपति शंकर..आम आदमी के भगवान ! उन्हें देख कोई भी वामपंथी ही नहीं बल्कि वामपंथ का पुरोधा भी मान लेगा, और यही नहीं प्रभु! आज मैंने धरती पर भी महाशिवरात्रि के पर्व पर वैसे ही जटाजूट धारी भभूत लपेटे हुए शिव-रूप धारण कर घोड़े पर सवार मनुष्य और उस शिवबारात में अब तक आपकी कृपा से वंचित मनुष्यों को बाराती बने देखा जहाँ उन सबका उत्साह देखते ही बनता था!” जैसे नारद जी ने भगवान् शंकर की भक्ति में लीन होकर कहा हो।
             “लेकिन नारद ! इस नश्वर से सांसारिक प्रश्न को हम देवों पर तो न लागू करो..!” नारद के अन्दर उपजते वामपंथी रुझान से अप्रभावित विष्णु ने कहा|
          “नहीं प्रभु..! अब आप त्रिदेवों की इस विषय पर स्पष्ट स्थिति मैं जानना चाहता हूँ..हाँ,भोलेनाथ से तो पूँछने की आवश्यकता ही नहीं उन्हें समझना बहुत आसान है..! बस सीधे आपके पास चला आया हूँ |” 
            “अरे ! पहले इस विषय पर ब्रह्मा की भी तो राय ले लेते...फिर मेरे पास आते..!” विष्णु की इस बात पर नारद थोड़ा उत्तेजित हो कर बोले-
            “देखिए परमेश्वर! जैसी रचना वैसा रचनाकार..!! उनकी पूरी रचना में ही हमें दक्षिणपंथ दिखाई पड़ता है...पृथ्वीलोक पर आते-जाते मुझे इसका स्पष्ट प्रमाण मिल गया है...”
            “नारद ! यह कौन सी पहेली बुझा रहे हो..?” –विष्णु
          “यह पहेली नहीं है प्रभु..देखी कह रहे हैं..! आखिर..वहीँ ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर जीवन रच दिया..उसे हरा-भरा कर दिया...! लेकिन..मंगल..बुध..समेत अन्य ग्रहों की स्थिति क्या है..? यही नहीं..चन्द्रमा तो पृथ्वी के पास ही था, उसको भी ब्रह्मा जी ने उजाड़ बना दिया है..! आखिर अपनी ही रचना में ऐसा भेदभाव क्यों..? यह दक्षिणपंथ नहीं तो और क्या है..? ब्रह्माजी के मन में जो था वैसा ही उन्होंने बना दिया..! एक को सजाओ-सँवारो और दूसरे को उजाड़ बनाए रखो..!! यह कहाँ का दैवीय सामाजिक न्याय है..? हाँ भगवन! मैं तो कहता हूँ..सृष्टि रचने का काम और किसी को सौंपिए..नहीं तो सब गुड़गोबर हो जाएगा..|” नारद के इस तल्खी भरे स्वर को सुन विष्णु समझ चुके थे कि नारद पर अभी पृथ्वीलोक का ही भूत छाया है, वह मौन ही रहे|
            “नहीं भगवन्, आप मौन मत हों..कृपया मेरे प्रश्न का उत्तर दें कि आप वामपंथी हैं या दक्षिणपंथी..? वैसे प्रभु क्षमा करे मुझे आपका रुझान दक्षिणपंथ की ओर ही दिखाई देता है, नहीं तो ब्रह्मा जी के इस अन्यायपूर्ण कार्य में आप अवश्य हस्तक्षेप करते..?” नारद ने अपनी जिज्ञासा और तल्खी को पुनः विष्णु से प्रकट किया..|
इधर भगवान् विष्णु नारद से अपनी बातचीत की दिशा भी नहीं मोड़ पा रहे थे, और यह सोचते हुए “देवी लक्ष्मी भी न जाने कहाँ भ्रमण पर निकल गई हैं...? लक्ष्मी भी तो अक्सर देवताओं के ही यहाँ जाती हैं..सही में नारद के प्रश्न का उत्तर देना कठिन है!!” भगवान विष्णु के माथे पर बल पड़ गया और नारद के इस प्रश्न में उलझ अपना सिर खुजला रहे थे..! उनके कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि नारद के इस प्रश्न का क्या उत्तर दें, फिर अपने मुकुट को सीधा करते हुए (सिर खुजलाने से जो टेढ़ा हो गया था) नारद से अनमने ढंग से पूँछा-
              “अच्छा कैलाशपति शंकर की सवारी क्या है..”
              “नंदी बैल जी..!” – नारद
              “लेकिन मनुष्यों ने तो शिवबारात वाले जुलूस में उन्हें घोड़े पर बैठा दिया था.., मैं कहता हूँ कि मनुष्यों के चक्कर में न पड़िए, ये कुछ का कुछ बना देते हैं!” विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा | 
              विष्णु से अपने अनुत्तरित प्रश्न को लेकर नारद असंतुष्ट थे और विष्णु भी उनके प्रश्नों का उत्तर नहीं देना चाहते थे। भगवान् विष्णु यह सोचकर भी थोड़े परेशान से हुए कि कहीं नारद के इस प्रश्न से देवलोक में भी दक्षिणपंथ-वामपंथ का झगड़ा न शुरू हो जाए...! इसी से चिंतित भगवान विष्णु ने फिर कहा-
             “देखो नारद ! जो ‘गोल्डीलॉक जोन’ में होगा वही खुशहाल होगा...”

             यहाँ भगवान् विष्णु का आशय किसी के संतुलित अवस्था में होने से था...लेकिन नारद उनके इस कथन से भी संतुष्ट नहीं हुए। तभी नारद को कृष्णावतार के समय का उनका गीतोपदेश, जिसमे भगवान् ने स्वयं अपना विराट स्वरुप वर्णित किया था, उस कथन से निकले इसी अर्थ “भगवान् स्वयं अपने को भी पूर्ण रूप से नहीं जान पाते तो मेरे प्रश्न का क्या उत्तर देंगे...?” को सोचते हुए और मन ही मन आज "नारायण-नारायण" की जगह “ॐ नमः शिवाय...ॐ नमः शिवाय” जपते नारद वहाँ से चल दिए..
            महाशिवरात्रि के इस पर्व पर आप सबके जय की मंगलकामना के साथ...!
                                                ----------------------

सोमवार, 18 जनवरी 2016

हमारी मासूम सी ये बेवकूफियाँ..!

            मैं बस पर बैठ चुका था। हाँ, बस में यात्रा करते समय मेरे अन्दर का "मैं" मर गया होता है! लेकिन ऐसा क्यों? जहाँ तक मेरी समझ में इसका कारण यही है कि बस में सभी यात्री बिना भेदभाव के अपने अहं के समान धरातल पर यात्रा कर रहे होते हैं। तब यह "मैं" का एहसास व्यर्थ प्रतीत होता है क्योंकि ऐसी स्थिति में इसकी कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती और हमें स्वयं के साथ ही दूसरों के होने का भी एहसास होता रहता है। इस स्थिति में हम एक-दूसरे की संवेदनाओं में गहराई से उतर सकते हैं। अब जो चालाक हैं ऐसी स्थिति का फायदा उठा लेते हैं, जैसे कोई आम आदमी बनकर बिजली के खम्भे पर चढ़ और आम आदमी से जुड़ाव दिखा कर सत्ता हाँसिल कर लेता है, और मुझ जैसे लोग यहाँ अपनी कहानी तलाश लेते हैं। एक बात है ; निहायत आम आदमी की संवेदनाओं से हम जैसे लोग अपने-अपने तरीके से खेलते हैं, और वही दुर्दशा का शिकार भी होता है। खैर.. 

            जब आप आम आदमी होते हैं तो बेवकूफियाँ भी कुछ ज्यादा ही करते हैं। मैं तो मानता हूँ, जो जितना बड़ा आम आदमी होगा वह उतनी ही बड़ी बेवकूफियाँ करता है। 

            जैसे, एक बार ट्रेन के स्लीपर क्लास में आम आदमी वाले अन्दाज में यात्रा करते समय मैं स्वयं खुद की ही बेवकूफियों का शिकार हुआ था। तब रात के आठ बज रहे होंगे गाड़ी भागी जा रही थी, लघुशंका के बाद पता नहीं क्या सोचकर मैं निरूद्देश्य शौचालय के फ्लश की गोल घुंडी घुमाता रहा और तब तक घुमाता रहा जब तक वह निकल नहीं गया..फिर क्या था पानी का फव्वारा फूट पड़ा.. इधर इसे फिर से कसने के बार-बार के अपने प्रयास में मैं असफल हो जाता। तभी वह घुंडी हाथ से छूटकर शौचालय-सीट से होते हुए रेल की पटरियों के बीच जारी गिरा...अब तक मैं पूरी तरह भींग चुका थ। गनीमत यह कि मौसम गर्मी का ही था। इधर घुंडी के गिरते ही मैं अपनी इस बेवकूफी को तहेदिल से कोस रहा था। मैं ट्रेन की इस बोगी के पानी का टैंक खाली हो जाने और इससे रात में यात्रियों को होने वाली परेशानी को सोचकर चिन्तित हो उठा था। इसी बेचैनी में मैं बोगी के किसी कोच अटेंडेंट को खोजने लगा था। कुछ ही क्षणों बाद संयोग से वह मुझे दिखाई पड़ा, मैंने अपनी बेवकूफी छिपाते हुए उसे फ्लश की खराबी के बारे में बताया। उस कोच अटेंडेंट ने फ्लश से बहते पानी को बंद किया तब जाकर मुझे चैन आया। निरूद्देश्य की गई इस बेवकूफी को मैं अपनी कुछ बड़ी बेवकूफियों में से एक मानता हूँ। 

           यहाँ ध्यातव्य है कि बेवकूफियाँ निरूद्देश्य ही होती हैं, बाकी जो उद्देश्यपरक होती हैं उन्हें हम मूर्खता की श्रेणी में रख सकते हैं। बेवकूफियाँ अपने में मासूम होती हैं जब कि मूर्खता रणनीतिक होती है, या फिर मूर्खता को रणनीतिक विफलता में खोजा जा सकता है। यहाँ हमें मूर्खता के पचड़े में नहीं पड़ना है।

            हाँ तो, इस बस में चढ़ते ही सोचने लगा था कि आगे बैठूँ या पीछे वाली सीट पर बैठूँ, दो वाली पर या तीन वाली सीट पर या कहाँ बैठूँ? कुछ देर तो यही सोचने में लगा दिया और जब एक तीन वाली खाली सीट पर बैठा तो किसी ने यह कहते हुए उठाया कि "अरे, यहाँ लोग बैठे हुए हैं।" तो आगे की एक खाली सीट को ग्रहण किया। बस चल दी। इधर बस में उझक-उझक कर मैं आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ पता नहीं क्या देखने लगा था। 

             बस में भीड़ थी। सीट न मिलने के कारण कुछ यात्री खड़े थे। मैंने देखा, मेरे ठीक बगल में एक महिला अपने बच्चे को गोंदी में लिए हुए आकर खड़ी हो गई थी। बच्चे को लिए हुए बस की भीड़ में उससे ठीक से खड़े होते नहीं बन रहा था। इधर आम आदमी बनते ही मेरी संवेदनशीलता कुलबुलाने लगी, मन में आया कि इसे अपनी सीट देकर मैं खड़ा हो जाऊँ, लेकिन अगले ही पल मेरे मन ने समझाया कि ऐसी मूर्खता करने के साथ अब इतना भी संवेदनशील बनने की जरूरत नहीं है। कविता या साहित्य रचने का यह मतलब नहीं होता कि इस संवेदनशीलता को ही ओढ़ा या बिछाया जाए। इसी बीच किसी ने उस महिला को आगे की तीन वाली सीट के एक खाली सीट पर बैठने के लिए कहा। लेकिन थोड़े प्रयास के बाद वह वैसे ही खड़ी रही। उसका इस तरह खड़े रहना नैतिकता ओढ़े मेरी उस सोच से जिससे साहित्य उपजने की सम्भावना रहती है, उस पर प्रहार सा प्रतीत हुआ। मैंने महिला को वहाँ बैठने के लिए कहते हुए कंडक्टर से भी खाली दिखाई दे रही उस सीट पर उसे बैठाने के लिए कहा। उस खाली सीट पर रखी रजाई को कंडक्टर ने हटवाते हुए बच्चे लिए उस औरत को वहाँ बैठाया। खैर, मैंने अनुभव किया कि यह रजाई रखने वाले की बेवकूफी थी या मूर्खता कि वह स्वयं बिना किसी के कहे ही सीट पर से रजाई हटाने के लिए तैयार क्यों नहीं हुआ? 

           बस चली जा रही थी, पीछे बैठे एक व्यक्ति की आवाजें मेरे कानों में पड़ रही थी "सिंचाई के चार हजार लग जाएंगे और दस-बारह बोरी खाद के, आगे पता नहीं क्या होगा?" मैं पूरी बात नहीं सुन सका लेकिन सूखे में खेती की समस्या पर कोई किसान ही चर्चा कर रहा है। 

           बस को चलते हुए करीब चालीस मिनट से अधिक हो गया था। अचानक मुझे बस में एकदम आगे बैठे कुछ लोगों के चीखने की आवाज के साथ यकायक बस के दायीं ओर मुड़ने और जोरदार ब्रेक लगने की आवाज के साथ ही बस से किसी के टकराने की आवाज भी सुनाई पड़ी। हम भी आगे वाली सीट से टकराते-टकराते बचे थे। बस रूक चुकी थी। कुछ यात्री धड़ाधड़ नीचे उतर रहे थे। धीरे-धीरे कर अधिकांश लोग बस से नीचे उतर चुके थे, लेकिन पता नहीं मैं अपनी किस बेवकूफी में बस में यूँ ही अकेले बैठा रहा। 

              हाँ, मेरी इस बस से किसी का एक्सीडेंट हो गया है, इसका एहसास मुझे हो चुका था। अन्त में मैं भी बस से उतरा। जाकर बस के सामने देखा तो मेरा होश उड़ गया। एक मजदूर जैसा आदमी बस के धक्के से इसके ठीक सामने ही सड़क की दायीं पटरी पर गिरा पड़ा था। उसके सिर से बहता हुआ खून जमीन की ढलान पर लुढ़क रहा था। हम सब किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े केवल उस व्यक्ति को ही देखे जा रहे थे। उसकी मोटरसाइकिल ठीक बस के सामने लगभग उसके नीचे पड़ी थी। 
       
               हममें से कोई पुलिस को बुलाने की बात कर रहा था तो कोई डाक्टर को, तो कोई कह रहा था अभी इसकी साँसें चल रही हैं। लेकिन मुझे तो लगा जैसे यह मर गया हो। किसी ने उस मरणासन्न व्यक्ति के मुँह से शराब की बहुत दुर्गन्ध आने की बात कही तो कोई दुर्घटना स्थल के आधार पर बस ड्राइवर की गलती निकालने का प्रयास करने लगा था। तभी एक व्यक्ति ने कहा, जो शायद बस के एकदम आगे बैठा था, "नहीं, इसमें बस ड्राइवर की कोई गलती नहीं है, यह आदमी उधर से बिना बस को देखे ही अचानक सड़क क्रास करने लगा था.. ड्राइवर ने तो बहुत जोरदार ब्रेक लगाया और इसे बचाने के चक्कर में बस को इधर मोड़ दिया था..बस-ड्राइवर ने तो बहुत सारे यात्रियों की जान भी बचाई अन्यथा बस पलट सकती थी " मैंने ध्यान दिया पटरी से आगे गहरी ढलान थी।

                 फिर, मैंने उधर देखा जिधर से मोटरसाइकिल चलाते अचानक वह सड़क पार करने की कोशिश कर रहा था। वहाँ एक गोमती में "अंग्रेजी शराब की दुकान" लिखा दिखाई दिया। मैं कुछ-कुछ माजरा समझ गया था। सोचा, शायद यह वहीं से नशे में चला होगा। मैंने गौर किया उस "अंग्रेजी शराब की दुकान" का दुकानदार इस घटना से बेपरवाह, जो ठीक उसके दूकान के सामने ही घटी थी, अभी भी अपना दूकान खोले वहीं बैठा था! दुर्घटना का शिकार वह व्यक्ति बेहद आम आदमी जैसा दिखाई पड़ा। किसी ने उसे मजदूर बताया जो किसी दूसरे की मोटरसाइकिल लेकर यहाँ तक आया था। जैसे कुछ सोचते हुए मेरे मुँह से निकला, "लगता है यह वहाँ से अंग्रेजी शराब पीकर चला था" इसे सुन कुछ लोग मुस्कुराते हुए हँस से दिए। लेकिन अगले ही पल मैं मन ही मन अपने इस कथन में छिपे अमानवीयता को कोसने लगा था। हम न तो सौ नम्बर डायल किए 
और न ही एक सौ आठ नम्बर, क्योंकि हम भी निकलने की जल्दी में थे। एक बार तो मैंने उस हादसे के शिकार व्यक्ति के स्थान पर स्वयं को रख कर देखा तो मुझे नियति का किया धरा प्रतीत होने लगा जो मेरे मन में उपजने वाली संवेदनाओं पर भारी पड़ा और मैं घटनास्थल से दूर निकलने की सोचने लगा था। 

              इसके बाद मैं बस में आया, देखा पूरी बस खाली हो चुकी थी, मैंने भी अपना सामान लिया और उस बस से उतर गया क्योंकि अब आगे उसे नहीं जाना था। इसके ड्राइवर और कंडक्टर दोनों उस घटनास्थल से भाग चुके थे। वहाँ हम जैसे बचे-खुचे बस-यात्री अब शेष काम पुलिस का मान अपनी आगे की यात्रा के बारे में सोचने लगे थे। तभी किसी ने कहा "अरे, उस कंडक्टर ने हमारे पैसे भी नहीं लौटाए थे मेरा हजार रूपए का नोट था!" उसकी बात सुन मुझे अपने भी पाँच सौ के नोट की याद आई। फिर किसी ने कहा, वह कंडक्टर इस तरह कई यात्रियों के पैसे नहीं लौटाए थे,  कंडक्टर और ड्राइवर दोनों अपनी जान बचाने के चक्कर में वहाँ से भाग चुके थे। 

            रात गहरा गई थी। हम आगे जाने के लिए साधन का इन्तजार कर रहे थे। कुछ लोग इधर-उधर के साधनों से निकल भी चुके थे। करीब चालीस मिनट के बाद हमने देखा वहाँ पुलिस आई थी। दुर्घटना में घायल या मृत उस व्यक्ति को अस्पताल ले जाया गया था और हम दूर से ही देख रहे थे कि उस दुर्घटनाग्रस्त बस को भी किनारे किया जा रहा था।

              कुछ देर बाद एक सरकारी बस आई हम लोग उसमें सवार हुए। उस बस का कंडक्टर टिकट बनवाने की शर्त पर हमें ले चलने के लिए तैयार हुआ। टिकट लेने के बाद हममें से एक व्यक्ति इस बस कंडक्टर से यह कहते हुए उलझ गया था कि हमें दुर्घटनाग्रस्त बस के ट्रांसफर यात्री के रूप में वह क्यों नहीं लेकर चला? और यदि हमारे पास टिकट के पैसे न बचे होते तो हम क्या करते? लेकिन इस बस का कंडक्टर इन बातों को सुनने के लिए तैयार नहीं था। उसने कहा कि मुझे इस सम्बन्ध में किसी नियम की जानकारी नहीं है। हालांकि, उस व्यक्ति ने अपने को वकील बताते हुए रोडवेज विभाग के साथ ही इस कंडक्टर पर भी मुकदमा कर देने की धमकी दी। और मैंने बेवकूफाना अन्दाज में दुर्घटनाग्रस्त बस के कंडक्टर पर बाकी के पैसे न लौटाने को लेकर चोरी का मुकदमा दर्ज करा देने की बात कही। यहाँ तक कि उस दुर्घटनाग्रस्त बस का नम्बर भी मैंने नोट नहीं किया था कि कम से कम इससे उसके कंडक्टर का पता कर अपने बकाए पैसे ही उससे ले लेता।
       
            हम सब की इस व्यर्थ जैसी बहसबाजी को सुनकर एक व्यक्ति ने कहा, "भाई साहब आप लोग कल सारी बात भूल जाओगे और कुछ नहीं करोगे।" उसकी बात सही भी थी। अन्त में अपने को वकील बताने वाला व्यक्ति पूरी व्यवस्था को कोसते हुए परिवहन विभाग से लेकर सरकार में बैठे सभी लोगों को बारी-बारी से ऊँचे शब्दों में गालियाँ देते हुए कहा, "जिस दिन एक सौ पच्चीस करोड़ जाग जाएंगे उस दिन तुम्हें अपनी औकात पता चल जाएगी..तुम सब हो तो हमारे नौकर ही लेकिन अपने को मालिक समझ बैठे हो...ऐश कर रहे हो...हम सब को जाति -धर्म में बाँटकर! हमारी समस्याओं की कोई परवाह नहीं? "

           उसकी पीड़ा यही थी कि ऐसी परिस्थितियों में फँसे बस के यात्रियों की मदद के लिए कोई व्यवस्था आगे क्यों नहीं आई? क्या सरकार ने इस तरह की परिस्थितियों के दृष्टिगत कोई नियम नहीं बना रखे हैं या कर्मचारियों को इन नियमों की जानकारी ही नहीं दी जाती? उस वकील का आक्रोश इन्हीं बातों को लेकर था। वैसे अन्दर से आक्रोशित तो हम भी थे। मैंने कहा, "इस बस में हमें टिकट नहीं बनवाना चाहिए था इस कंडक्टर को अपने विभाग से स्थिति स्पष्ट कर लेने के लिए बाध्य कर देना चाहिए था।"

             हम आम आदमी बन, कर भी क्या सकते हैं? उस पर यह कि आम आदमी बनते ही हम बेवकूफियों पर अपना जन्मसिद्ध आधिकार बना लेते हैं। फिर दूसरे, ये तमाम तरह के नशे के कारोबारी हमें किसी न किसी नशे का शिकार भी देते हैं। और हमारे दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के बाद भी ये सौदागर इसे ही हमारी नियति मानते हुए आपनी दूकान खोले वहीं से बैठकर तमाशा देखते रहते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो! 

            हमें पता नहीं कि वह मासूम सा आम आदमी अपनी बेवकूफी का या नशे के कारोबारियों का या फिर इन सब से बढ़कर उसके प्रति हमारी अमानवीयता भरी उदासीनता का या फिर इन सब के बीच किस बात का शिकार हुआ? इसका हमें तो कुछ भी पता नहीं..!

            और, जब हम बेवकूफ बनकर नशे के गिरफ्त में होते हुए किसी व्यवस्था का निर्माण करते हैं तो शायद ऐसा ही होता है। हमारी मासूम सी ये बेवकूफियाँ अकसर हम पर ही भारी पड़ जाती हैं और फिर किसी का आगे बढ़ कर हमारी मदद करना हमें एक दूसरे तरह के नशे का शिकार बना जाता है जिससे ऐसी ही व्यवस्थाएं आगे बढ़ती रहती है। 

           हाँ! आप सब से इस बात के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ कि कुछ कहने के लिए किसी दुर्घटना से पीड़ित व्यक्ति का सहारा लिया। क्या करें? मैं यह मानता आया हूँ कि व्यवस्था में स्वयं गड़बड़ियाँ पैदा कर फिर राबिनहुडीय तरीके से मदद पहुँचाने की अपेक्षा इन गड़बड़ियों को न होने देना ही अधिक श्रेयस्कर है।

रविवार, 10 जनवरी 2016

ये जशन-वशन और रास्ते!

             पुराना वर्ष बीते और नया वर्ष शुरू हुए लगभग एक घंटा हो गया था। मैं बस से उतर कर घर के लिए अाटो तलाशता हुआ शहर की सड़क पर चला जा रहा था। अचानक पीछे से तेज ध्वनि करते हुए कुछ बाइकर्स तीव्र गति के साथ आते हुए दिखाई दिए मैं हड़बड़ाहट के साथ सड़क के एकदम किनारे हो लिया। एक-एक बाइक पर तीन-तीन सवार सभी "हा..हू.." करते हुए उसी गति के साथ मोटरसाइकिल को आड़े-तिरछे घुमाते आते-जाते वाहनों और लोगों से बेपरवाह आँखों से ओझल हो गए। मैं तो डर ही गया था..! 

           खैर, तभी मेरे बगल में एक आटो वाला आ कर रूका, उससे बातचीत हुई रिजर्व चलने के लिए तैयार था लेकिन किराया मेरे अनुमान से तीस रूपया अधिक बताया, जिसे सुन मैं आगे बढ़ चला। उसने आटो आगे बढ़ाकर मेरे बगल में रोकते हुए पूँछा, "अच्छा आप क्या देंगे?" मैंने किराया बताया तो फिर वह यह कहते हुए चलने के लिए तैयार हो गया कि "आप पहली सवारी हो और मैं पहली सवारी नहीं छोड़ता।" और मुझे लेकर चल पड़ा। 

          उस नए साल के आगाज वाली आधी रात को रेलवे स्टेशन और बस अड्डे की भीड़-भाड़ से निकल हमारा आटो घर के रास्ते की ओर दौड़ रहा था। एक चौराहे पर उसने कुछ क्षणों के लिए आटो रोक कर तमाम कारों, मोटरसाइकिलों को गुजर जाने की प्रतीक्षा भी की। उस चौराहे से आगे बढ़ने के बाद उसने मुझसे कहा,
       
          "ये सब नया साल मना कर लौट रहे हैं..बहुत भीड़ थी..लाखों की..!" मैंने सोचा, मतलब शहर के मुख्य चौराहे से ये सारे वाहन लौट रहे थे। 

            मुझे भीड़ को लेकर थोड़ा आश्चर्य हुआ मैंने पूँछा,  "वहाँ गए थे क्या?" 

         "हाँ साहब! उधर से ही मैं आ रहा था, यही नहीं वहाँ से थोड़ी दूर पहले मैंने देखा सड़क के डिवाइडर से टकरा कर दो नवयुवक गिरे पड़े थे उनमें से एक तो शायद मर गया था लेकिन दूसरा बेहोश था उसकी साँसें चल रही थी!" आटोवाले ने बताया। 

            "अच्छा!! पता नहीं किसके घर के रहे होंगे?" चौंक कर मैंने कहा। 

            "रहे होंगे किसी के घर के! लेकिन ऐसे अवारा टाइप के लड़के गैर जिम्मेदार ही होते हैं।" 

           आटो वाले की बात सुन मुझे उन बाइकर्स का ध्यान हो आया जिनसे बस से उतरते ही सामना हुआ था। आटोवाले ने फिर कहना शुरू किया -

        "जहाँ मैंने आपको बैठाया था उसी के पास कुछ देर पहले ऐसे ही मोटरसाइकिल लेकर दो लड़के एक इनोवा कार से भिड़ गए थे एक तो इनोवा कार का शीशा तोड़ते हुए उसके अन्दर चला गया था पता नहीं मरे कि बचे? " साहब ये हाल है इन आवारा लफंगों की। 

           "जब ये नए लड़के मस्ती में होते हैं तो इसके अंजाम से अनजान ऐसे ही उठाईगीरी करते हैं।" मैंने कहा।

         "वहाँ चौराहे पर तो गजब था..खूब जोर-जोर से डीजे बज रहा था.. लड़के-लड़कियां सभी डीजे के साथ डांस कर रहे थे..कुछ लड़कियाँ तो सिगरेट पीते हुए भी नाच रहीं थी "

            आटो-ड्राइवर की इस बात पर मैंने कहा,

            "पता नहीं किसके घर की ये लड़कियां होती हैं कि लोग इतनी छूट देते होंगे और ध्यान नहीं देते?"

          "ये बड़े घर की लड़कियाँ हैं, डाक्टर-इंजीनियर के घर की हैं..उधर वो कमाने में लगे हैं कि सात पीढ़ियां बैठकर खाएँ और इधर इनके बच्चे गुलछर्रे उड़ा रहे हैं.."

           मैंने सोचा कि यह ड्राइवर अभी डाक्टर इंजीनियर के ही पीछे है, जैसे बाकी के बारे में इसे पता ही नहीं कि यहाँ डाक्टर इंजीनियर के भी बाप बैठे हैं! तभी आटो-ड्राइवर फिर बोला-

           "यहाँ अपने भाग्य में रोज पानी पीने के लिए कुँआ खोदना पड़ता है! रोज कमाना रोज खाना..हम लोगों के भाग्य में कोई जशन-वशन नहीं लिखा है..जो जितना लूटता है वही उतना ही जशन मनाता है।"

          इधर मैं उसकी बातों में खोता कि मेरा घर आ गया था।आटो रोकने के लिए बोला। मेरे किराया चुकाते समय उसने कहा -

           "साहब! इलाका तो बढ़िया है लेकिन वही रास्ता ही खराब है।" 

          मैंने कहा  "हाँ कुछ लोगों ने अतिक्रमण कर रखा है नाली वगैरह बनने दें तब न बने..पिछली बार बना था लेकिन जल्दी ही खराब हो गया।"

        मैंने सोचा अकसर रास्ता ही तो खराब होता है! कोई मन्दिर बनाकर तो कोई मस्जिद बनाकर इसे अतिक्रमित किए रहता है, इसी पर तो कोई ध्यान नहीं देता, नहीं तो इलाके सब बढ़िया ही होते हैं। 

           आटोवाले को घुर्र-घुर्र कर वापस लौटते हुए मैं देख रहा था.. फिर मैंने घर की घंटी बजाई।