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शनिवार, 20 दिसंबर 2014

वह बौनापन और प्रश्नों की दुनियाँ में उत्तरों का ‘गॉड-पार्टिकल’...


          
         बस की यात्रा मुझे विचारों की गहराई में ले जाने का काम करती रही है...अकसर ऐसी यात्राओं में मेरी एक आदत रही है कि बस की खिड़की से बाहर झाँकने के साथ ही अपने अन्दर झाँकने का काम करता रहा हूँ..और..कई बार मुझे अपनी समस्याओं का हल ऐसी ही यात्राओं में मिला है..और...झिलमिल तारों के साथ चाँद को धरती पर उतर आने का अहसास भी पाया है...!
         
       ..बस में बहुत भीड़ थी...मुझे सीट मिल गयी थी..! मेरे बगल वाली सीट पर एक युवक आकर बैठ गया...मैंने उसकी ओर देखा वह ठीक-ठाक कपड़ों में था...बस की सभी सीटें भरी होने के साथ स्टैडिंग सवारियों से भी वह भर गयी..! बस में अधिकतर यात्री श्रमिक वर्ग से थे जो पूर्वांचल से काम की तलाश में पश्चिम की ओर रुख किए होंगे...वास्तव में पश्चिम में बड़ा दम है हर तरह का रोजगार उपलब्ध कराता है...! ...सोचा..बस को अब चलना चाहिए... तभी बस का ड्राइवर आकर अपनी सीट पर बैठ गया...अब मैं कंडक्टर को तलाशने लगा क्योंकि बगैर उसके बस चल ही नहीं सकती थी...लेकिन यह क्या बस तो चल पड़ी..! बस खचाखच भर गई थी..मेरी निगाहें इधर-उधर कंडक्टर को खोजने लगी...लेकिन कंडक्टर महोदय बस की भीड़ में कहीं नजर नहीं आये...!
     
        आचानक बस के पिछले हिस्से से एक बच्चे की आवाज आई... “फटाफट आप लोग टिकट बनवा लो...” आवाज थोड़ी अजीब लगी...! सोचा बच्चा तो टिकट बाँट नहीं सकता...थोड़ा पीछे उचक कर देखने का प्रयास किया लेकिन बस में भीड़ होने के कारण कंडक्टर को देख पाने में असफल रहा..! बगल में बैठा युवक किसी से अपने मोबाइल पर बात करने लगा..“हाँ..हाँ एकदम सही काम हुआ है...” फिर अपनी बातें समाप्त कर दी.. इसके बाद वह कुछ बोल रहा था लगा जैसे वह मुझे कुछ सुनाने की कोशिश कर रहा हो...! पहले तो मैंने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया..क्योंकि मेरा मन उसके बौद्धिक स्तर या कहें उसके सोशल स्टेटस को भी अपने अनुकूल नहीं पा रहा था...उससे बात करना मैं गैर जरुरी मान रहा था...उसके प्रति मेरे मन की इस उदासीनता की उसे परवाह नहीं थी...या मेरी इस उदासीनता को वह समझ ही न पा रहा हो...
     
        मेरी और मुखातिब होते हुए वह युवक बोला, “एकदम सही काम हुआ..लाटरी से फैसला हो गया...पहली बार मैंने इतना सही काम होते हुए देखा...!” अब मैं अपने को रोक नहीं सकता था क्योंकि वह मुझसे मुखातिब था यदि उससे बात न करता तो वह अपने को अपमानित महसूस कर सकता था..मैंने पूँछ लिया, “किस बात की लाटरी..?” फिर उसने बताया कि किसी अर्ध सरकारी वितरण एजेंसी के लिए योग्य उम्मीदवार के चयन की बात थी..मैंने उससे कहा, “अभी कैसे मान लिए कि सब सही हो गया...क्या नाम फ़ाइनल हो गया..” उसने कहा, “नहीं अभी तो लाटरी ही के माध्यम से नाम आया है..अभी तो और भी प्रक्रियाएं हैं..." फिर कुछ सोचते हुए उसने कहा, "आपने सही कहा..अभी चयन के कई चरण हैं..उसे कुछ शर्तों के साथ रिजेक्ट भी किया जा सकता है...मतलब अभी खेल बाकी है...!” फिर मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “यह भी हो सकता है कोई उसको हड़का दे तो वह एजेंसी लेने से ही मुकर जाए..” उसने मेरी बातों से सहमति जताई..” हाँ..अब-तक कंडक्टर की दो-तीन बार आवाजें सुनाई पड़ चुकी थी..लेकिन अभी भी बस में भीड़ के कारण वह मुझे दिखाई नहीं दिए..!
       
        फिर उस युवक ने बातों ही बातों में कहना शुरू किया कि “दिखावे की जिंदगी बहुत बेकार होती है..बहुत सारी परेशानियों का कारण बनती है...आदमी को अपने वास्तविकताओं में रहना चाहिए..अंत में कौन क्या ले जाता है..!” फिर वह बोला “मैं तो सब कुछ होते हुए भी बहुत साधारण से रहता हूँ..मेरी एक कंपनी है...वहाँ कई मजदूर काम करते हैं, मैं कभी-कभी ही उनके काम देखने जाता हूँ..हाँ मैं इतना अनुमान जरुर रखता हूँ कि मुझे इतना लाभ मिलना चाहिए..! और वे लोग लगभग उतना लाभ मुझे दे भी देते हैं...मैं भी सोचता हूँ कि इस लाभ का उत्तरदायित्व उनपर छोड़ देने से वे मेरी कंपनी को और जिम्मेदारी से चलाएँगे...ऐसा वे करते भी हैं..फिर...यदि वे कुछ थोड़ा लाभ भी ले लेते हों तो क्या फर्क पड़ेगा..उस लाभ के कारण कम से कम मेरी कंपनी के प्रति लगाव रखते हुए कामचोरी तो नहीं करते हैं और कंपनी को अपना समझते हैं...” एक सांस में जैसे उसने ये सारी बाते कह डाली थी, मैंने उसके इस प्रबंधकीय कौशल पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया...लेकिन यह सोचा जरुर की उसने कुछ कहा है...! बस भागी जा रही थी...बाहर अँधेरा घना होने के कारण कुछ दिखाई नहीं दे रहा था..हाँ आते-जाते वाहनों के हेडलाईट की रौशनी जब-तब दिखाई पड़ जाती..खिड़की के बाहर झांकने का प्रश्न ही नहीं था..!
       
       आकस्मात मेरे कानों में आवाज पड़ी, “कहाँ जाना है..टिकट बनवा लें...” मैंने चेहरे को ऊपर किया...“ओह...! तो बच्चे जैसी आवाज वाले यही कंडक्टर महोदय हैं..!” यह सोचते हुए मेरा ध्यान उनके शरीर की ओर भी गया...काफी लम्बा-चौड़ा शरीर था..! उन्हें देखकर मैंने सोचा, “इतने भारी-भरकम शरीर वाले की एक बच्चे जैसी पतली आवाज...!” कंडक्टर के शरीर और उनके आवाज के अनुपात को सोचकर मैं मन ही मन मुस्कुरा दिया..सोचा इसका कारण पूँछ लूँ...लेकिन...कहीं बुरा न मान जाएँ...नहीं पूंछा..! हम लोगों ने टिकटें बनवा ली...इस बीच एकाध स्टॉप पर बस रुकी भी..उसी समय कंडक्टर साहब किसी यात्री पर कुछ चिल्ला पड़े थे...तभी बस में पीछे से एक यात्री की आवाज आई, “अरे कंडक्टर साहब..रउरा के आवाज को का होगइल बा..हो..!” कंडक्टर ने कोई उत्तर नहीं दिया...अपने काम में लगा रहा...शायद सुना ही न हो..! मेरे बगल में बैठा युवक यह सुन हँस पड़ा...मैंने उससे कहा, “अरे नहीं..कंडक्टर से उसकी आवाज के बारे में नहीं पूँछना चाहिए..वह बुरा मान सकते हैं..” उसने कहा, “क्यों..?” “यह उनको कोंचने जैसी बात हो सकती है...” मैंने कहा| “अरे..! इसमें कौन सी कोंचने की बात...?” उसने प्रतिप्रश्न किया| “किसी की कमी की ओर इंगित करना वह भी शारीरिक..तो कोंचने वाली बात तो होगी ही..” मैंने उत्तर दिया|
       
       मेरी इस बात पर वह युवक एक क्षण चुप रहा...फिर चुप्पी तोड़ते हुए बोला, “देखिए भाई साहब..! ये जो बोला है वह मजदूर है..नए उम्र का है..और...इस बस में ज्यादातर यही लोग हैं..इनमें से अधिकतर गुजरात, पंजाब या दिल्ली जा रहे होंगे...ये बेचारे दिन भर मेहनत करते होंगे...ये ऐसे ही तफरी कर लेते हैं...या फिर शाम को दो-चार घूँट लेकर...कुछ क्षण के लिए अपनी रोजमर्रा की तमाम समस्याओं को भुला देते होंगे...इनके मन में जो आया बोल दिए, किसी को बुरा लगे तो लगे...इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता...यह भी इनके जिन्दगी का हिस्सा है...और...ये ज्यादा सोचते भी नहीं..! फिर इसमें कंडक्टर को बुरा मानने वाली कोई बात भी नहीं है...” सुनकर पास बैठे उस युवक की ओर मैं देखने लगा...मैंने अपने को बौना पाया..!
      
       ...और उधर यात्री के प्रश्न का कोई उत्तर न देकर कंडक्टर ने मुझे कोंच दिया...! मेरे मन ने एक अपना प्रश्न खड़ा कर दिया...कि...किसी उत्तर के बगैर क्या किसी प्रश्न की अस्मिता हो सकती है...या...क्या बिना उत्तर के प्रश्न अपनी मौत मर जाते हैं..? तो क्या उन्हें मर जाने देना चाहिए...? लेकिन मेरी बस ऐसे प्रश्नों और उत्तरों से बेपरवाह अपने गंतव्य की ओर कैसे बढ़ी जा रही थी...यह भी मेरे लिए एक प्रश्न था...मतलब...? फिर मेरे मन में इस तरह के विचार आते गए...
       प्रश्न...!
       प्रश्न तैरते रहते है...!
       क्या प्रश्न उत्तरापेक्षी होते है..?
       प्रश्नों का स्वतंत्र अस्तित्व है...!
       उत्तर...!
       क्या उत्तर भी तैरते रहते है...?
       या उत्तर भी स्वतंत्र हैं...!
       या उत्तर सदैव प्रश्न-सापेक्ष ही होते है....!
       प्रश्न और उत्तर...!
       ये अलग-अलग होते हैं या चिपके हुए होते है...!
       या दोनों अपने स्वतन्त्र अस्तित्व के साथ सदैव विद्यमान रहते है...!
       बस कभी-कभार टकरा जाते होंगे...!
       जो भी हो लेकिन एक बात है...प्रश्नों से जब उत्तर टकराते होंगे तो क्या होता होगा...
       या तो प्रतिप्रश्न उत्पन्न होता होगा...!
       या फिर प्रश्न से टकराकर उत्तर उसे ब्लैक होल में बदल देते होंगे और दोनों उसमें विलीन हो विलुप्त हो जाते होंगे...!
      
       जो भी हो प्रश्न संसार रचता है...जो प्रतिप्रश्न के रूप में विस्तारित होता रहता है...उत्तर में इस संसार को नष्ट करने की क्षमता होती है...फिर तो..! उत्तर विध्वंसात्मक होता है..! यह संसार को नष्ट कर सकता है...! विवादों की जड़ है..! प्रतिप्रश्न विवाद नहीं होते क्योंकि वे उत्तरों को अपने से टकराने का अवसर प्रदान करते हैं...और दुनियाँ बनती रहती है...  
     
        हाँ..एक बात है उत्तर प्रश्नों में घनत्व बढ़ा देता है...शायद यही प्रतिप्रश्न उत्पन्न करता होगा...प्रतिप्रश्नों का संसार...! यही हमारी दुनियाँ है...अपने-अपने प्रश्न..! अपनी-अपनी दुनियाँ..! यह दुनियाँ बनी रहे ऐसे उत्तर तलाशें...लेकिन यह उत्तर प्रश्नों को ब्लैक-होल में ले जाने वाला न हो..नहीं तो यह संसार नष्ट हो जाएगा...उत्तर ऐसे हों जो प्रश्नों में घनत्व ले आए..जिससे प्रतिप्रश्न उत्पन्न हो सके...! और दुनियाँ सृजित हो सके...तो फिर...! उत्तरों में ‘गॉड-पार्टिकल’ तलाशें...जो प्रश्नों में घनत्व बनाए या प्रतिप्रश्न उत्पन्न करे...जिससे...दुनियां चलती रहे...बनती रहे..यह ब्लैक होल में न समाए..!
     
         हाँ...कंडक्टर ने कोई उत्तर नहीं दिया था...देता तो बस रुक सकती थी...उसका काम रुक जाता...समय बर्बाद होता...या..ड्राइवर की उलझन बढ़ जाती...बस खड्ड में जा सकती थी...लेकिन कंडक्टर ने उत्तर का ‘गॉड-पार्टिकल’ तलाशा...और बस चलती रही...
     
        मेरे मन में एक बात और उपजी.....
        यदि प्रश्न ही न हों तो....तब क्या होता होगा...क्या संसार रचने से रह जाता होगा...?
     
        चल रही बस में मैंने इसका भी उत्तर तलाशने का प्रयास किया...हाँ...बात उन दिनों की है..
    
      मैं शायद आठवीं में पढ़ रहा था..एक दिन...कक्षा में मास्साहब हम बच्चों को पढ़ा रहे थे...शायद किसी किताब से कुछ बोल कर लिखा रहे थे...तभी उन्हें किसी काम से कक्षा छोड़कर कुछ देर के लिए बाहर जाना पड़ा...उन्होंने आलेख लिखाने का उत्तरदायित्व मुझे दिया और चले गए...मैं छात्रों को बोलकर लिखाने लगा......इसी बीच एक शब्द आया.. ‘अश्लील’ बच्चे इस शब्द को लिख नहीं पा रहे थे...फिर मैंने ब्लैकबोर्ड पर इसे चाक से लिखा...अश्लील...बच्चे इसे देखकर लिख लिए...!       
      
       उसी समय मास्साहब कक्षा में लौट आए थे...आते ही उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर लिखे इस शब्द को देखा...और...बिना हमसे कुछ पूँछे मेरी गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया...! मैं कुछ समझ ही नहीं पाया आखिर यह तमाचा मुझ पर क्यों पड़ा....हाँ...तमाचे के पहले मास्साहब ने मुझसे कोई प्रश्न नहीं किया...और...उस तमाचे के भय से मैं भी कोई प्रश्न नहीं कर पाया...! मैं चुपचाप आकर अपनी बेंच पर बैठ गया...हाँ एक बात और थी...उस समय ‘अश्लील’ शब्द का मुझे कोई अर्थ भी नहीं पता था...इसका अर्थ तो मैंने बहुत वर्षों बाद जाना...और जब जाना तो मेरे मन में यह प्रश्न उभर आया कि “क्या मास्साहब ने ‘अश्लील’ शब्द को ही अश्लील मान लिया था...?” या फिर ब्लैकबोर्ड पर लिखने को मेरा दुस्साहस मान बैठे थे....खैर जो भी हो....यदि हम दोनों ने उस समय प्रश्न किए होते तो संभव था...उत्तरों का कोई ‘गॉड-पार्टिकल’ उन प्रश्नों से टकराता...और...एक और बेहतर दुनियाँ हमारे लिए बनी होती...! हम आज के अपने बौनेपन से भी बचे होते......!
      लेकिन..! अफ़सोस..! आज...तमाचे..! प्रश्नों पर तमाचे..! हाँ तमाचे...मासूम से प्रश्नों को बेमौत मारने पर आमादा हैं...! बिन प्रश्नों के यह दुनियाँ आखिर कैसे बनेगी..उत्तर का कोई ‘गॉड-पार्टिकल’ इनसे कैसे टकराएगा...! और बिना घनत्व के यह दुनियाँ कैसे टिकेगी...? तो....   
     
              आइए...! हम अपने बौनेपन का ध्यान रखते हुए प्रश्नों की दुनियाँ में रहें...लेकिन...उत्तरों के गॉड-पार्टिकल के साथ...!
                            ------------------------------एक पागलपन सोच..विनय...!            


सोमवार, 15 दिसंबर 2014

तो मित्र महोदय इस वीभत्स रस में डूबे हुए हैं....!

       दरवाजे पर दस्तक हुई..! अभी मैं दरवाजा थोड़ा सा ही खोला था कि चिहुँक गया..और अकस्मात् मेरे मुँह से निकल गया, “अरे भाई आप...!” बात यह थी कि ये आगन्तुक महाशय मेरे मित्र थे जिनसे इधर कई दिनों से मेरी मुलाक़ात नहीं हो पाई थी..या यों कहें कि हम अपने-अपने ‘ईगो’ के कारण एक दूसरे से मिलने से कतरा रहे थे...जैसे..यह मिलना भी आजकल फेसबुक के मित्र के किसी कंटेंट के लाइक करने या न करने की प्रवृत्ति से मेल खाता हो...कारण...एक बार मैं मित्र से मिलने उनके घर गया तो महोदय थोड़ी बहुत ‘हाय-हेलो’ के बाद अपना एक आवश्यक कार्य बताते हुए निकल पड़े...मुझे बड़ा नागवार गुजरा एक तो मैं अपने तथाकथित बहुमूल्य समय में से समय निकाला था और दूसरे काफी दूर चल कर उनसे मिलने गया..और..ये महाशय मेरे से बेपरवाह निकल लिए..! ...मैं उनके घर वालों से मिल कर चला आया था...तभी से मैंने भी एक ‘ईगो’ पाल लिया कि अब इस तरह मिलने की पहल करने की आवश्यकता नहीं...और मित्र महोदय भी पलट कर इधर मेरी इतने दिनों से खबर नहीं ले रहे थे..! फलतः कल्पनाशील मेरा मन उनके इस ‘ईगो’ से अपने ‘ईगो’ को लगभग पुष्ट कर चुका था...हाँ..उन्हें अचानक इस तरह आया देख मेरा ईगो दरक सा गया..और...उस समय यह मेरे चिहुँकन में प्रकट भी हो गया..!
       मैंने दरवाजा पूरा खोल दिया...मित्र महोदय बिना हमसे कुछ बोले सीधे मेरे तखत पर लगे बिस्तर पर जा कर बैठ गए और रजाई अपने ऊपर डाल ली...मैं भी आकर तखत पर सिरहाने पीठ को टेक देते हुए आराम से बैठ गया...हम दोनों के बीच कुछ क्षण मौन छाया रहा..! फिर मैं बोला, “इतने दिन बाद फुरसत मिली..!” “हाँ कुछ इधर-उधर की व्यस्तता आ गयी” कहते हुए वे भी तकिये के सहारे अधलेटे हो गए| मैंने मौका देखकर थोड़ी अपनी भड़ास निकालने की कोशिश की, “वैसे आदमी को संबंधों को भी जीना चाहिए...जिससे उसके अंत समय तक चार आदमी काम आ सके...नहीं तो...दुनियाँ में कौन किसको पूँछता है..!”
      उन्होंने मुझे घूरा जैसे मेरी बात अच्छी न लगी हो...बोले, “यार संबंधों को जीना..! इसका मतलब क्या है...?” “अरे मेरे कहने का मतलब यह कि बात-व्यवहार ऐसा रखना चाहिए कि कम से कम चार आदमी तो हमें अपना कह सकें..” मैंने मित्र की आँखों में अपनी आँख गड़ाते हुए कहा जैसे उन्हें किसी बात की चेतावनी दे रहा होऊं..! तभी सामने चल रहे टी.वी. पर मलाला युसुफजई और कैलाश सत्यार्थी को दिए जा रहे नोबेल पुरस्कार समारोह पर दृष्टि पड़ी...काफी भव्य समारोह में यह पुरस्कार उन्हें प्रदान किया जा रहा था..इस समारोह को मित्र महोदय भी देख रहे थे...
       अचानक टी.वी. देखते-देखते वह बोले, “तो तुम चार आदमी पर ही आ कर अटक गए हो..?” फिर मित्र महोदय ने टी.वी. की और इशारा करते हुए कहा, “अगर ये चार आदमी की ही परवाह किये होते तो आज इनका यहाँ ओस्लो में यह सम्मान न हो रहा होता...बल्कि ये तो अपने-अपने समाज के बहिष्कृत से लोग हैं...क्योंकि यह समाज की बुराईयों से लड़ रहे लोग हैं...पहले तो इन्हें तमाम तरह की उपेक्षाएँ ही मिली होंगी..!” और फिर बोले, “देखो यार चार आदमी ही क्यों..या..संबंधों को ही क्यों जीना..! यह बहुत मायने नहीं रखता...मायने तो इसमें है कि आप क्या जी रहे है...और इस जीने का तरीका क्या है..?” मैं मित्र की ओर देख कर सोचने लगा यह कौन सा ‘ईगो’ मैंने पाल लिया था..मेरा दाँव तो उल्टा पड़ गया..! मैं अभी यही सोच रहा था कि मित्र फिर बोल उठे,
       “अंत समय में चार आदमी साथ निभाएंगे या नहीं इसकी परवाह क्यों..? सोचो चार आदमी के चक्कर में कितनों को नजरअंदाज कर रहे हो...? अरे अंत समय में कोई साथ न भी निभाए तो कौन सा फर्क पड़ेगा..तब तो और ही अच्छा होगा..! शरीर सड़ कर मिट्टी में मिलेगी...खाद बनेगी..और भूमि उपजाऊ बनेगी..वैसे भी अब जमीन बंजर हो रही है..! और...यदि मृत शरीर को जानवर नोच कर खा जायेंगे तो कम से कम यह बात तो होगी कि चलो जीते न सही मरने पर तो किसी की भूँख मिटाने के काम आ गए..!”
       मित्र महोदय यह कह कर मंद-मंद मुस्कुराते हुए चुप हो कर मुझे देखने लगे..और..मैं इधर अवाक्..! तो मित्र महोदय इस वीभत्स रस में डूबे हुए हैं..! ...मैंने सोचा..! मेरी तमाम रसों से भरी कविता में...मित्र ने अपने इस वीभत्स रस को..! जिससे हम दूर भाग रहे थे...इसे कहाँ से उड़ेल दिया...! हाँ...इस वीभत्स रस में मेरा ‘ईगो’ भी घुल गया..! दोष मेरा ही था...मेरा मन कुछ ज्यादा ही कल्पनाशील हो गया था..! मैंने अपनी दृष्टि को फिर से टी.वी. पर गड़ा दिया...देखा...मलाला युसुफजई और कैलाश सत्यार्थी नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर रहे थे...लोग तालियों से उनका स्वागत कर रहे थे..! 

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

माना त देऊ नाहीं त पाथर..!

   

     यह हैं हमारे पंडित..! मतलब हमारे खानदानी पुरोहित...! वही पंडित कई वर्ष बाद एक विवाह कार्यक्रम में दिखाई दे गए...! मैंने पहला काम यही किया कि अपने मोबाइल से बिना इनके जाने इनकी तस्वीर उतार ली...हालाँकि...उम्र के इस पड़ाव पर इनकी हँसी गायब थी...या फिर मेरी ही दृष्टि बदल गयी हो...लेकिन..इन्हें देखते ही इनकी वही पुरानी छवि मेरे मन में जीवन्त हो उठी..!

        दादा जी ने बताया था कि इनके पिता जी भी हमारे परिवार के पुरोहित रहे हैं...और कोई बहुत पुराना रिश्ता भी बता रहे थे...! ये बेचारे बहुत सीधे-साधे प्रजाति के जीव हैं..! मैंने आज तक इनके आँखों में कोई बड़ा ख्वाब पलते हुए नहीं देखा है...थोड़ी बहुत खेती-बाड़ी और अपने ‘उपरेहिती’ की आय से जीवन-यापन करते हुए ही इन्हें देखा है...! बस प्राकृतिक ढंग का सहज और सरल सा इनका जीवन-यापन..! जब से मैंने होश संभाला है तभी से मैंने खानदान में शादी-विवाह या अन्य अवसरों पर इन्हें पंडिताई या पूजा-पाठ कराते देखा है...हाँ खानदान के अन्य परिवारों ने इनकी वृद्धावस्था एवं अवसरों पर इनके न पहुँच पाने की स्थिति को देखते हुए अपने अलग-अलग पुरोहित बना लिए हैं...
        
       इनका घर हमारे घर से कई किलोमीटर की दूरी पर था..बचपन में जब ये किसी धार्मिक या शादी-विवाह जैसे अवसरों पर गाँव आते...तो कई दिनों तक हमारे परिवार के लोग इन्हें घर पर रोक लिया करते...पता नहीं क्यों हम बच्चों को भी इनसे बाते करनें में बड़ा मजा आता था..! और जब ये अपने घर जाने के लिए तैयार होते तो हम कुछ बच्चे इनके कपड़े या इनके झोले को जिसमें दान या भेंट में मिली चीजें हुआ करती उसे छिपा कर रख देते...कभी-कभी इस प्रक्रिया में एकाध-दो दिन और रुक जाते...हाँ कभी-कभी ऐसा भी होता कि ये हम लोगों से तो कह देते कि आज नहीं जाएँगे और हमसे सामान देने की हमसे चिरौरी करते...तब हम बच्चे इनका सामान लाकर दे देते...लेकिन हम लोगों के इधर-उधर होते ही मौका पाते ही ये महाशय चुप-चाप निकल लेते..खैर...
       
      धार्मिक क्रियाकलाप कराते समय मैंने शायद ही इनके मुँह से संस्कृत श्लोकों को सुना हो...परिणामस्वरुप सत्यनारायण की कथाओं से बखूबी परिचय मैंने इन्हीं के मुखारबिंदों से प्राप्त किया...क्योंकि परिवार के बड़ों को सत्यनारायण की कथा सुनाते समय ये उसके हिंदी अनुवाद को ही पढ़ते और अध्याय समाप्त होने पर शंख बजाते...हाँ कभी-कभी अध्याय समाप्ति पर शंख बजाने का उत्तरदायित्व हम संभाल लेते...हम-उम्र बच्चों में इस उत्तरदायित्व के लिए एक प्रकार से गलाकाट प्रतियोगिता सी रहती...! इसी क्रम में कलावती, लता-पात, मोरध्वज से मैं बखूबी परिचित हुआ...एक बात और..! विवाह संपन्न कराते समय भी ये संस्कृत श्लोकों का प्रयोग नहीं करते थे...हाँ विवाह कार्यक्रम समाप्त होते समय मंडप में बड़े ही सुरीले अंदाज में मैंने इनको अकसर यह गाते हुए सुना था, “जब लगि गंग जमुन जलधारा तब लगि रहै अचल अहिवात तुम्हारा....” बचपन में किसी विवाह के संपन्न होते समय मैं इनके इसी गाने का इंतजार करता रहता....
       
       एक बार माँ के बहुत दबाव डालने पर मैं स्वयं यजमान बन सत्यनारायण की कथा सुनने बैठा... “आर्यावर्ते जम्बूद्वीपे सप्तरेवा खंडे...” कहते हुए इन्होंने सभी देवताओं का पूजा में आवाह्न किया..जब कथा के सातों अध्याय पूरे हुए तो कथा का समापन करते हुए इन्होंने मुझसे कहा, ”बाबा आप यह कहो कि लक्ष्मी हमारे घर वास करैं और बाकी सभी देवता अपने-अपने स्थान को प्रस्थान करें...” तो मैंने कहा, “सरस्वती हमारे घर वास करें और बाकी सभी देवता प्रस्थान करें...” इस पर इन्होंने हँसते हुए कहा था, “का बाबा..पुजवौ में मजाक करत हया...” फिर हम दोनों हँस पड़े थे..एक बात और थी...उस सत्यनारायण की कथा में नवग्रहों पर जब कुछ द्रव्य चढ़ाने की बात आई तो मैंने पंडित से पूँछा, “कहो पंडित केतना चढ़ाई..” तो इस पर भी उन्होंने हँसते हुए कहा था, “का बाबा इहौ कोनौउ कहई क बात है अरे जौन तोहार इच्छा होई..” हाँ यही बात उन्होंने अपने दक्षिणा के बारे में भी कही थी..
        
       इनमें एक गुण और था..वह था.. “विचार करना..!” जब ये हमारे घर होते तो किसी न किसी बुजुर्ग सदस्य के मुँह से मैं अकसर सुनता, “अरे पंडित आई अहैन उनसे विचरवाई ल्या..” खानदान या गाँव की बड़ी-बूढी महिलायें उनके पास कुछ “विचरवावई” के लिए आ जाया करती थी..स्वाभाविक भी है महिलायें बेचारी अपने घर-परिवार के कुशल-क्षेम के लिए पुरुष प्रजाति से कुछ अधिक ही चिन्तित रहती हैं...फलतः उनमें ज्यादातर भाग्योदय या भविष्य जानने की इच्छा होती थी या परिवार का बीमार सदस्य कब ठीक होगा या फिर कभी-कभी कोई गायब हुई बस्तु कहाँ होगी जैसे प्रश्न सम्मिलित होते थे...पंडित बड़े चाव से उन सबके प्रश्नों का समाधान करते जाते थे...हाँ जब कोई इनसे यह प्रश्न करता कि “का पंडित ई बतिया सही होई कि नाहीं..?” तो पंडित बोलते, “माना त देऊ नाहीं त पाथर..” यह कहते हुए लोगों की इच्छा के अनुरूप उन सब की शंकाओं का समाधान करते जाते...हाँ इनका यह जुमला “माना त देऊ नाहीं त पाथर” बीच-बीच में चलता रहता...एक दिन इसी तरह पंडित का अपना यह कार्यक्रम चल रहा था तो मेरे एक विनोदी स्वाभाव के पारिवारिक चाचा पंडित से बोले, “का..हो..पंडित जऊन रोगिया मन भावै उहई वईद बतावै वाला हाल फाने हया का..?” सुनते ही पंडित बड़े जोर से हँस पड़े और साथ में हम सभी हँस पड़े...फिर पंडित ने हँसते हुए ही कहा, “अरे भईया..! माना त देऊ नाहीं त पाथर..!” एक बार जब मैंने पंडित से ‘रोगिया’ और ‘वैद’ वाली बात पूँछी तो उन्होंने कहा, “का करी बाबा..जौउन इन सब का सुनई में अच्छा लागथअ उहई बताई देई थ...फिर ऊपर वाले क मर्जी...” एक बार मैंने भी इन्हें अपना हाथ दिखाने की कोशिश की तो ये हँसते हुए बोले, “का बाबा तुहऊँ...” फिर मैंने इनसे कहा “नाहीं पंडित तोहरे मुँह से सुनई में अच्छा लागथ..|”
       
       मैंने एक खास बात और देखी थी पंडित की..ये अपने इस “विचारई” की प्रक्रिया में कोई नुस्खा नहीं बताते थे...किसी को गुमराह भी नहीं करते थे...और न ही अन्धविश्वास को बढ़ाने वाली कोई बात ही करते..और मुझे कभी-कभी ऐसा लगता कि ये अपने इस ‘भविष्यवक्तृत्व’ के गुण से बस अपने संकोची स्वाभाव और लोगों की इच्छाओं का सम्मान करने के कारण ही जुड़ते थे...हाँ एक कमी इनमें बस यही थी कि ये सामने वाले को नाराज नहीं करना चाहते थे...!

       
       मेरे खानदान में एक कुलगुरु भी थे..उम्र के एक पड़ाव पर परिवार के वरिष्ठ लोग उनसे गुरुमंत्र लिया करते थे...एक बार मेरे मन में भी आया कि मैं किसे अपना गुरु मानूँ...क्योंकि मेरा मन उन्हें अपना गुरु स्वीकार नहीं करता था...! उनमें मुझे ‘गुरु’ होने का एक तरह का अहंकार दिखाई देता था... मुझे लगा यही अपने पंडित मेरे गुरु बन सकते हैं..! और कई वर्षों पूर्व मन ही मन मैंने इन्हें अपना गुरु मान भी लिया और बिना इन्हें बताए..! सोचा अगर इन्हें अपने मन की यह बात बताऊंगा तो ये बोल उठेंगे, “का बाबा तुहऊँ...!” और फिर “माना त देऊ नाहीं त पाथर” कहते हुए हँस पड़ेंगे...!

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

उस दिन....!

            उस दिन..! मैं शहर से गाँव जा रहा था..माँ को उनके घुटनों के आपरेशन के बाद गाँव छोड़ना था..कार की पिछली सीट पर पत्नी और अगली सीट पर इंटर प्रथम में पढ़ रहे पुत्र श्रेयांश के साथ मैं स्वयं कार ड्राइव कर रहा था...करीब आधे घंटे की ड्राइव फोर-लेन पर मैं कर चुका था...मेरे आगे-आगे एक ट्रक मेरे बाईं लेन पर चला जा रहा था...मेरी गति स्वाभाविक रूप से ट्रक से अधिक थी लगभग 80 किमी/घंटे.. मुझे उससे पास लेकर आगे बढ़ना था..मैंने सड़क के दाएँ लेन से यानि अपनी साइड से ट्रक से आगे निकलने का प्रयास किया..इस प्रयास में मैं ट्रक से कुछ ही मीटर की दूरी पर था कि अकस्मात् ट्रक ड्राइवर ने अपने ट्रक को दाएँ लेन की ओर यानि मेरे लेन पर मोड़ दिया...टक्कर की आशंका से मैं भयभीत हुआ लेकिन बिना समय गँवाए मेरे पैर ने ब्रेक को दबा दिया सड़क पर कार के पहियों के घिसटने की तेज आवाज हुई..मेरी कार कुछ मीटर घिसटने के बाद ट्रक से कुछ ही इंच की दूरी पर रुक गयी मैं ट्रक ड्राइवर से कोई प्रतिक्रिया करता तब तक ट्रक सड़क के डिवाइडर के कट से दूसरी ओर निकल चुकी थी..ट्रक-ड्राइवर के प्रति मन में गुस्सा था..लेकिन मैं भी समय बरबाद न करने की गरज से कार को आगे बढ़ा दिया..पुत्र श्रेयांश ने मुझसे कहा कि गाड़ी रोककर ट्रक ड्राइवर से उसकी गलती के लिए उसे डाट खिलानी चाहिए थी..खैर मैं कुछ बोला नहीं..फिर श्रेयांश बोले “मैंने तो सोच लिया था कि कम से कम कार में डेंट तो पड़ ही जाएगा...” मैं कुछ बोलता तब तक श्रीमती जी मेरी आलोचना करते हुए बोल उठी, “अरे..ये ऐसे ही चलाते हैं...” इस पर मेरे सुपुत्र जी ने कहा, “नहीं इसमें पापा की गलती नहीं है...” अब मैंने अपनी प्रतिक्रिया दी, “वैसे भाई जब मैं गाड़ी चलता हूँ तो अपनी गति के तुलनात्मक इस बात का ध्यान रखता हूँ कि यदि कोई आकस्मात सामने आ जाए तो अपनी गाड़ी को नियंत्रित कर सकूँ..” अब मेरी माँ बोली “कम से कम ड्राइवर को डाँटना चाहिए था...” मैं भी यही सोचने लगा |
         अब मैं लगभग पंद्रह मिनट की ड्राइविंग और कर चुका था सब कुछ सामान्य था पिछली घटना का कोई तनाव नहीं था...एक पुल से मैं गुजर रहा था..पुल को पार करते समय मेरी निगाह हाईवे के विपरीत ओर सड़क निर्माण संबंधी किसी हलचल पर पड़ी मैं उस ओर देखने लगा जैसे मैं भूल गया कि मैं गाड़ी चला रहा था आकस्मात श्रेयांश की आवाज मेरे कानों में पड़ी, “अरे..अरे..हाँ..हाँ..” मेरी तन्द्रा भंग हुई..सामने देखा...! अरे बाप रे...! ठीक सामने एक इनोवा कार मेरी ओर बढ़ी आ रही थी..दिन में ही उसकी जलती हेड लाइटें आँखों को चौंधिया रही थी ! एक दम सीधी टक्कर की संभावना से मैं सिहर सा गया.. प्रत्युत्पन्नमति वश स्टेयरिंग एक ओर घूम गई पलक झपकते इनोवा मेरे बगल से निकल चुकी थी...! आगे मेरी नजर डाइवर्जन पर पड़ी...गाड़ियों को पुल पर चल रहे कार्य की वजह से विपरीत लेन से निकाला जा रहा था इसी क्रम में वह इनोवा भी मेरे सामने से आ रही थी...मेरे पुत्र ने कहा, “आखें बंद कर गाड़ी क्यों चला रहे हो मैं टक्कर को अवश्यम्भावी समझ तनाव में आ गया..” मैंने अपने पुत्र की ओर देखा..कुछ बोल नहीं पाया...बस इतना ही बोला, “हाँ मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई थी...” बेटे ने कहा, “इस बार आपकी पूरी गलती थी...भले ही इनोवा हमारे लेन पर थी लेकिन यह डाइवर्जन के कारण था उसका कोई दोष नहीं माना जाता..” मैंने सहमति से सिर हिलाई..तभी माँ बोल पड़ी, “अरे..तू अईसे हईयाई हया एक ड्राइवर तो राखि नाहीं सकता..” मैं कुछ नहीं बोला अपनी गलतियों पर ही मनन करता रहा...
       कुछ देर मौन ही गाड़ी चलता रहा...मैंने बेटे से कहा, “ईश्वर ने हम लोगों को बचा दिया...” वह इतना बोला “आँख खोल कर चलाया करिए..” मैंने कहा “इस तरह की यह पहली गलती थी..शायद ईश्वर ने इसी कारण बचा दिया...” मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया...! एक बात है...कोई ईश्वर को माने या न माने यह एक निजी व्यक्तिगत मामला हो सकता है लेकिन एक नैतिक सत्ता अवश्य है जिससे यह सारा ब्रह्माण्ड परिचालित है..वह “ऋत” नामक नैतिक सत्ता इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर इसे परिचालित करती है..कहने का आशय यह भी हैं कि यदि हम दुर्घटनाग्रस्त हुए होते तो ईश्वर या ऋत नामक सत्ता न होती ऐसा नहीं....वह तब भी होती...क्योंकि मैंने अपने बेटे से कहा कि हम यदि बार-बार ऐसी गलती करेंगे तो नहीं बच पाएँगे..खैर जो भी हो...!
     
       कुछ देर और कार-ड्राइव करने के बाद मैंने कार को ग्रामीण इलाके में सड़क के किनारे की एक साफ़-सुथरी चाय की दुकान पर रोकी चायवाले को बढ़िया चाय बनाने के लिए कह दिया और उसकी चाय बनने का इन्तजार करने लगा...मैंने देखा उसी समय तीन-चार लोग किसी गाड़ी से उतरकर चायवाले की दुकान पर आये चायवाले के यहाँ का लड़का तीन-चार कुर्सियाँ खींच कर उन लोगों के लिए लगा दिया वे सभी उस पर बैठ चुके थे...इस बीच दो-चार लोग और उनको घेर कर खड़े हो चुके थे...हम लोग कार पर अपनी-अपनी सीटों पर बैठे हुए ही चाय का इन्तजार कर रहे थे...तभी मेरा ध्यान उन नेता टाइप व्यक्ति के साथ आये एक लड़के पर पड़ी...सत्रह-अट्ठारह साल का वह लड़का हाथ में एक गन नुमा बंदूक लिए हुए था...मैंने उसकी उम्र और उसके हाथ के गन पर गौर किया...मैंने बेटे श्रेयांश से कहा, “इसको देखो..” उसकी ओर देखते हुए बेटे ने हँसते हुए कहा, “अरे इसमें कौन सी नई बात है आजकल यह ट्रेंड आम हैं...ऐसे लोग सत्रह-अट्ठारह वर्ष के लड़कों के हाथ में गन देकर उसे आपने साथ ले चलते हैं...और स्वयं सफ़ेद शर्ट और पायजामें में नेता जैसे दिखाई देने का प्रयास करते है..हाँ इस तरह के लोग चेहरे से अनपढ़ जैसे लगते है...ये लोग पुराने हो चुके स्कोर्पियो या फिर टाटा सफारी जैसे वाहन से चलते है...उस पर किसी पार्टी का झंडा भी लगा होता है..इस तरह ये लोग भौकाल मारते है...” सुनकर मैंने पीछे मुड़कर उनकी गाड़ी को देखा वास्तव में वह एक पुरानी स्कार्पियो थी...और किसी पार्टी का उस पर झंडा भी लगा था..बेटे के इस ज्ञान पर मैं मुस्कुराने लगा...
      ...फिर मैंने बेटे से उसके गन के बारे में चर्चा शुरू कर दी..मैंने पूँछा, “यह गन कैसी है...” बेटे ने कहा, “ऐसी गनें सत्रहवीं-अट्ठारवीं शताब्दी में अमेरिका में प्रचलित थी..वहाँ के लोग ऐसी गन से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते थे...” मुझे बेटे से हो रही इस वार्ता में आनंद आ रहा था...मैंने पूँछा, “पता नहीं यह लड़का इसे चला पायेगा या नहीं..” बेटे ने कहा “यह केवल भौकाल के लिए है इस गन को लोड करने में ही इसे एक घंटे लग जायेंगे...और इसका चलना भी मुश्किल होगा..शायद चल ही न पाए..” मैं समझ गया सुपुत्र महोदय के ज्ञान का श्रोत हिस्ट्री चैनल, डिस्कवरी चैनल और उनका कम्प्यूटर गेम के प्रति रुझान था...हालाँकि नेताओं के ट्रेंड के बारे में बेटे का अनुभव मुझे मौलिक लगा...खैर अब तक हम लोग चाय पी चुके थे...जैसे ही मैंने गाड़ी स्टार्ट किया बेटे ने कहा, “आँखे खोल कर गाड़ी चलाइयेगा...” मैंने उनकी ओर देखा और बोला “वहाँ भी ट्रक से पास लेते समय भले ही वह अपनी लेन में उस समय था और मैं अपनी लेन में..! फिर भी मुझे हार्न बजाना चाहिए था...” यह सोचकर मौन हो गया कि अब ऐसी गलती नहीं होने दूँगा...
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मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

क्रिकेट की वह गेंद.....!

          क्रिकेट की वह गेंद...! हाँ उस गेंद की याद फिर ताजा हो आई...धीरे-धीरे कर उस घटना के लगभग तीस वर्ष होने को आ गए हैं...अकसर शाम चार बजे अपने बाग के मैदान में क्रिकेट खेलने निकल जाते थे...खिलाड़ियों में हम-उम्र पारिवारिक बच्चों के साथ गाँव के ही अन्य बच्चे हुआ करते थे...ऐसे ही एक दिन हम खेल रहे थे...मेरे ही हम-उम्र के थे...वे पारिवारिक संबंधों में मेरे चाचा लगते थे..सुरेश..! ...लेकिन हममे संबंध उतना महत्वपूर्ण नहीं था बल्कि मित्रता उससे भी बढ़कर थी...वही क्रिकेट का बल्ला ले बल्लेबाजी कर रहे थे...संयोग से गेंदबाजी भी चचेरा खानदानी भाई कर रहा था...मैं उस समय फील्डिंग कर रहा था...और बल्लेबाज के एकदम करीब गली में था...मुझे याद हैं...गेंदबाज की गेंदें स्टंप से दूर इधर-उधर पड़ रही थी और सुरेश ठीक से खेल नहीं पा रहे थे...आचानक...गेंदबाज से चिढकर बोले थे... “यार तोहका गेंदबाजी क सहूर नहीं है...ई मार्शलवा को देदो गेंद..थोड़ा खेलई में तो मजा आये...” चूँकि मैं थोड़ी तेज गेंदबाजी करता था इसीलिए क्रिकेट खेलते समय वह मुझे ‘मार्शल’ (समकालीन वेस्टइंडीज का तेज गेंदबाज) की उपाधि दे देते...यह सुनते ही मैंने गेंदबाजी कर रहे उस चचेरे भाई से कहा “यार थोड़ी सटीक गेंद डाल..मिडिल स्टंप उड़ा दे...बड़ा गावस्कर बन रहे हैं...”
        मेरे इतना कहते ही वह अगली गेंद फेंकने के लिए लम्बी दौड़ लगाते हुए गेंद फेंकी...हाँ वह गेंद काफी तेज थी...हवा में उड़ती हुई सी आई...सुरेश ने उससे बचने का प्रयास किया और थोड़ा घूम गए...वह गेंद सीधे पिछले गर्दन से ऊपर और सिर के निचले भाग में जा कर लगी...वह सीधे सिर के पीछे हाथ ले जाकर बल्ला छोड़ वहीँ बैठ गए...हम लोग दौड़ कर उनके पास पहुँचे...उनके आँखों में आँसू आ गए थे...कुछ मिनट वह ऐसे ही बैठे रहे हम बारी-बारी से चोट लगे स्थान को मलते जा रहे थे..कुछ मिनटों के बाद वह सामान्य हुए..हम लोग खेल बंद कर घर वापस लौट आये...
       हाँ करीब साल भर बीता होगा उनके सिर में हलका-हलका दर्द होने लगा था...कभी-कभी वह सिर दर्द की दवा ले लेते तो दर्द से राहत मिलती..लेकिन दवा का असर समाप्त होने के बाद दर्द पुनः प्रारंभ हो जाता...यह क्रम कुछ महीनों तक चलता रहा...फिर सुबह-सुबह उन्हें उल्टियों की शिकायत होने लगी...लेकिन कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था...सिर में लगी चोट की बात तो लगभग हम भूल चुके थे...धीरे-धीरे कर उनके एक आँख की रोशनी कम हो रही थी...कस्बे के डॉक्टर ने आँखों की जाँच कराने की सलाह दी...उन दिनों मैं इलहाबाद में रह कर अपनी पढ़ाई कर रहा था...एक दिन सुरेश चाचा मेरे कमरे पर आये...उन्होंने बताया था की डॉक्टर ने आँखों की जाँच कराने के लिए बोला है...उसी दिन मैं उन्हें अपनी साइकिल से स्वरुपरानी जिला चिकित्सालय ले गया...डॉक्टर ने उनकी आँखों में दवा डाली फिर तीन घंटे इन्तजार के बाद आँखों की जाँच के बाद चश्मा लगाने की सलाह दी...सुरेश चाचा फिर गाँव लौट गए थे...लेकिन उनकी बिमारी गंभीर होती जा रही थी...एक दिन मैं गाँव गया मैंने उन्हें एक अच्छे डॉक्टर को दिखाने की सलाह दी...लेकिन वे बहुत ही संकोची स्वाभाव के थे किसी से भी कुछ कहना नहीं चाहते थे...मुझसे उनके सिर के दर्द को देखा नहीं जाता...मैं फिर इलाहबाद लौट आया था...
      एक दिन दोपहर बाद पिता जी मेरे पास आये...मुझे कुछ आशंका सी हुई मैंने उनसे सुरेश के बारे में पूँछा उन्होंने धीरे से बस इतना ही कहा सुरेश अब नही रहे...मैं सुनकर आवक रहा...यह मेरे लिए एक अविश्वसनीय और अकल्पनीय घटना थी....सुरेश साथ छोड़ देंगे यह कभी हमने सोचा ही नहीं था...लेकिन अब सच्चाई यही थी...बाद में पिता जी ने बताया कि ब्रेन स्कैनिंग में पता चला था कि उनके सिर के पिछले हिस्से में एक गाँठ थी...जो शायद चोट के कारण ही थी..उसके आपरेशन के लिए उस दिन उन्हें बंबई ले जाया जा रहा था..वह स्वयं तैयार हो रहे थे..लेकिन उसी समय वह गाँठ सिर के अंदर ही फूट गई थी....जो उनकी मौत का कारण बनी...

       यह एक ऐसी घटना थी जो मुझे आज-तक सालती रहती है...फिलिप ह्यूज की घटना ने सुरेश की याद को पुनः तजा कर दी...ये लोग एक ऐसी भावना के साथ प्राण त्याग किये हैं जहाँ जीतने वाला भी आनंदित होता है तो हारने वाला भी आनंदित होता हैं...क्योंकि खेल का मजा दोनों को ही मिलता है...तभी तो हार के डर से कोई खेलना नहीं छोड़ता...! खेल भावना सबसे बड़ीं सामजिक भावना है..ऐसी सामाजिकता ही इन लोगों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी...!

शनिवार, 15 नवंबर 2014

यह मुआ तो बड़े दिमागदारों का खेल है...!

“आओ सेकुलरिज्म-सेक्युलरिज्म खेलें..!”

“ये सेक्युलरिज्म क्या है..?”

“इतने पॉपुलर खेल के बारे में तुम्हें नहीं पता...? अच्छा...इसका मतलब भेड़िया आया-भेड़िया आया कहानी कभी नहीं पढ़े...!”

“अरे यार..मेरे भाई..! कहानी तो पढ़ा है...”

“लेकिन इसे समझ नहीं पाए...तभी इस खेल को भी नहीं समझ पा रहे हो..!”

“अच्छा भई..! अब तुम्हीं समझाओ, इस खेल को लगे हाथ हम भी खेल लेंगे..!”

“हाँ...! उसी कहानी की तरह ‘सेक्युलरिज्म-सेक्युलरिज्म’ कह कर यह खेल खेला जाता है...मानो कोई बड़ी आफत आनेवाली हो या आ गयी हो..!”

“देखो पहेली मत बुझाओ..खेल की विधि बताओ..!”

“यह तो जानते हो कि स्वतंत्रता हमारा मौलिक अधिकार भी है..और इस स्वतंत्रता की सार्थकता हमारे खेलने की स्वतंत्रता पर निर्भर है..”

“मतलब...? मैं समझा नहीं...”

“मतलब यह कि यदि स्वतंत्रता हो तो हम सभी तरह के खेल खेल सकते है...!”

“मतलब इस खेल के खिलाड़ियों के लिए स्वतंत्रता एक अनिवार्य तत्व है..”

“सही समझे..! आगे और ध्यान से सुनो पूरा खेल समझ में आ जाएगा...”

“नहीं...नहीं..एक बात और समझाओ..मान लो इस खेल के खिलाडियों को स्वतंत्रता न हो तो...?”

“तब तो खेलई नहीं होगा..!”

“ऐसा क्यों..?”

“क्योंकि तब सेक्युलरिज्म-सेक्युलरिज्म कहने वाले भी नहीं रहेंगे..! और न ही खिलाड़ी अलग-अलग रंगों की गोटी इस्तेमाल कर पाएंगे जो इस खेल का प्रमुख तत्व है..”

“अच्छा अब खेल समझाओ...”
“कोई जमीन तैयार करो..फिर तमाम गोटियाँ ले लो...हाँ साथ में कुछ अलग-अलग रंग भी लेना जरुरी होगा...”

“हाँ..ये चीजें हमने ले ली..आगे..”

“अब गोटियों को अपने हिसाब से अलग-अलग रंगों में रंग लिया जाए..”

“क्या प्रत्येक रंग के लिए गोटियों की संख्या बराबर-बराबर होनी चाहिए..?”

“बराबर-बराबर तो कर सकते हो..लेकिन खेल का मज़ा तभी आएगा जब एकाध रंग की गोटियों की संख्या अधिक या किसी रंग की कम हो..अलग-अलग रंगों वाली गोटियों की संख्या भी इस खेल का तत्व है...! क्योंकि इस खेल का मूल तत्व भय है जो गोटियों की एक-दूसरे से कम या ज्यादा संख्या पर विशेष रूप से निर्भर होती  है...”

“ओ.के.-ओ.के...अब आगे..”

“अब तैयार जमीन पर गोटियों को बिछा दिया जाये..”

“नहीं..ये तो बताया ही नहीं कि गोटियों को मैदान में किस प्रकार से बिछाया जाए..मेरा मतलब गोटियों को मिक्स बिछाएं या उनके रगों के समूह के आधार पर..!”

“हाँ इस पर ध्यान देना आवश्यक है..तैयार जमीन पर गोटियाँ आप दोनों तरीके से मसलन मिक्स या रंगों के समूह में, दोनों विधि से बिछा सकते हो..लेकिन दोनों तरीकों के मजे अलग-अलग हैं..मान लो विभिन्न रंगों की गोटियों को मिक्स तरीके से बिछाते हैं..तो खेल की अवधि थोड़ी लम्बी होगी..और यदि रंगों के समूह के आधार पर इन्हें बिछाते हैं तो खेलने की अवधि छोटी हो सकती है..क्योंकि तब खेल आधा ही बचता है...”

“वो कैसे...”

“वो ऐसे कि जब भिन्न रंगों की गोटियों को आपस में मिक्स करके बिछाओगे तो उन्हें अपने-अपने रंगों वाली गोटियों के समूह में लाना होगा और इसके लिए खेल के बाहर के लोगों को भी इस तरह प्रशिक्षित कर खेल का हिस्सा बनाना पड़ेगा कि वो हूटिंग-शूटिंग कर सकें...! इसी प्रक्रिया में गोटियाँ अपने-अपने रंगों वाले समूह की गोटियों में शामिल होने लगती है..यह तब-तक चलता रहे जब-तक कि पूरी तरह गोटियाँ अपने-अपने रंगों के समूहों में न हो जाएं...ध्यान रहे यह गोटियों में आपसी भय या डर पैदा करने का खेल है...और इसे बनाए रखना होगा...”

“अच्छा..! यह बताओ यदि गोटियाँ अपने-अपने रंगों के समूह में हों तो...”

“तो...एक दूसरे को उनके रंगों का भय दिखाते रहो...हाँ अब कुछ ‘सेक्युलरिज्म-सेक्युलरिज्म’ कहने वाले खिलाड़ियों को भी इसमें शामिल करना पड़ेगा...! और...जब तक इस तरह का समूह बना रहेगा..तब तक खेल का आनंद चलता रहेगा...हाँ..भय की मात्रा इस तरह निर्धारित करो कि गोटियाँ आपस में मिक्स न होने पाएं...”

“ये ‘सेक्युलरिज्म-सेक्युलरिज्म’ कहने वाले कैसे होते हैं..और इसका मतलब क्या है...”

“इसका मतलब यह है ये संख्या को भय के रूप में बदलने में माहिर होते हैं..और...यानी..कम संख्या वाले समूह को अधिक संख्या वाले समूह का भय दिखाओ...और..बीच-बीच में उसके अस्तित्व पर संकट दिखाते जाओ... यही भेड़िया है...वैसे यह भेड़िया आता कभी नहीं...! यही प्रक्रिया एक प्रकार की सेक्युलरिज्म है..”

“तो सेक्युलरिज्म का मतलब...”

“अरे मेरे भाई...अब जिन रगों के समूहों में गोटियों की संख्या थोड़ी कम हो उन्हें अधिक संख्या वाले गोटियों के समूह का भय दिखाते रहो..यही तो सेक्युलर-सेक्युलर का खेल है..और ये सेक्युलर-सेक्युलर कहने वाले गोटियों और खिलाड़ियों पर बहुत बारीक नजर रखते हैं..ये एक प्रकार का माइंड-गेम खेलते हैं..”

“ये माइंड-गेम खेलने वाले क्या रेफरी की भूमिका में होते हैं..जो गोटियों और खिलाड़ियों पर नजर रखते हैं..?”

“ये माइंड-गेम खेलने वाले कुछ-कुछ रेफरी जैसा आचरण करते दिखाई देना पसंद करते हैं..लेकिन असल में होते हैं ये भी इस खेल के खिलाड़ी ही...! इनका काम गोटियों के बीच खासकर कम रंगों की संख्या वाले गोटियों में इनसिक्योरिटी का भाव जगाए रखना जिससे ये खेल और खिलाड़ियों के बीच भी बने रहें...”

“यार..तुम तो हमको शतरंज की जैसे चालें बताने लगे...गोटियों को मिक्स ही रहने दो तो क्या फर्क पड़ता है...क्यों इन्हें हाथी, घोड़ा, शेर, बाघ में बदल रहे हो..?”

“यही फर्क पड़ेगा कि तब सारा खेल ख़त्म...!”

“अच्छा एक चीज अन्त में और बता दो..यदि हम अलग-अलग रंगों के समूहों की गोटियों को आपस में मिक्स करने का खेल खेलें तो...?”

“तो..तो..ओ..ओ.. हाँ, तब भेड़िये का डर नहीं रहेगा और खेल का मजा भी ख़त्म...!”   

“लेकिन... यह मुआ आपका खेल है बड़े दिमागदारों का खेल...!”

“तभी तो इतना दिमाग लगाने के बाद भी इस खेल को नहीं समझा पा रहा हूँ..”

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मंगलवार, 4 नवंबर 2014

क्या कर्म करने वाला वास्तव में खुराफाती होता है......?

        “डिप्रेशन” हाँ...उस दिन इसी विषय पर बहस चल रही थी..बहस के प्रतिभागी थे..मेरा भांजा, पिता जी और मैं स्वयं...शायद उसी दिन आमिर का इसी विषय पर ‘सत्यमेव जयते’ प्रसारित हुआ था...हालांकि मैं उसे देख नहीं पाया था...हम लोगों का विषय यही था कि आखिर डिप्रेशन किसी को क्यों होता है..? यहाँ मैं उन तर्कों का उल्लेख नहीं करूँगा जो इसके कारण के रूप में हम लोग दे रहे थे क्योंकि फेसबुक के सभी मित्र विद्वान् और चिंतनशील होते हैं..वो..इन तर्कों को जानते और समझते हैं....अतः ज्ञान बघारने की आवश्यकता नहीं..!
        खैर...बात यहीं से बिगड़ी जब पिता जी ने कहा “भाई हमें तो किसी प्रकार की चिंता और तनाव होता ही नहीं...” उनकी बात मुझे पसंद नहीं थी क्योंकि भक्ति से मुझे चिढ़ सी होती है...! अब बात कर्म और भक्ति की ओर मुड़ गई... तर्क ये भी थे कि कर्म में रत रहने वालों को ही तनाव होता है...भक्ति वाले तो हर चीज से निश्चिंत होते हैं..ईश्वर उनकी मदद करता रहता है..!
        फिर बात आई कर्म और भक्ति में कौन श्रेष्ठ है...! हम आपस में तर्कबाजी में उलझ गए...तभी मेरे भानजे ने कहा, “मामा मेरे एक विद्वान् गुरुजन ने इस विषय पर एक कहानी सुनाई थी..और कहा था कि कहानी सुनने के बाद निष्कर्ष स्वयं निकालना कि कर्म और भक्ति में कौन श्रेष्ठ है...आप भी कहानी सुनने के बाद निष्कर्ष निकालिए....! 
         
         भानजे ने कहानी सुनाना आरम्भ किया जो इस प्रकार थी...

        “एक गुरुकुल में पढ़नेवाले दो छात्र आपस में मित्र थे..एक कर्म में विश्वास रखता तथा कर्मार्जन से जीवन-यापन करता था..! और.. दूसरा भक्ति में..उसके लिए भगवन का नामस्मरण ही सब कुछ था...इसी में वह निश्चिंत रहता था..! एक दिन दोनों आपस में बहस करने लगे..एक कहता कर्म ही श्रेष्ठ है तो दूसरा भक्ति को श्रेष्ठ बताने लगता..! उन दोनों का यह विवाद उनके गुरु जी के पास पहुँच गया...गुरु जी ने एक सुबह उन दोनों को बुलाया और उन्हें एक बड़ी सी कोठरी में बंद कर दिया उस कोठरी में घुप अँधेरा था..! धीरे-धीरे कर कई घंटे बीत गए अब उन दोनों को भूख लगने लगी थी...वहाँ खाने के लिए कुछ था भी नहीं...और अँधेरे में कुछ सूझ भी नहीं रहा था..! भक्ति में तल्लीन रहने वाला मित्र जब भूख से कुलबुलाने लगा तो उसे अपने भगवान् याद आने लगे और वह उनका नाम-जप करने लगा..! इधर दूसरा मित्र भी भूख से बेचैन हो उठा था...लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अँधेरे में क्या करे..! हाँ उसका कर्म-भाव जागृत हो चुका था...वह यूँ ही अँधेरे में ही यहाँ से वहाँ इस कोने से उस कोने यह सोचकर हाँथ मारने लगा कि कहीं कुछ खाने को मिल जाए...अचानक...! उस अँधेरी कोठरी के एक कोने में रखे एक घड़े से उसका हाथ टकरा गया..झट से उस घड़े में हाथ डाला..हाथ में कुछ लगा..उसे घड़े से निकाल कर खाने का प्रयास किया...लेकिन...वह खा नहीं सका..उस ककड़ को उसने अपने मित्र की ओर उछाल दिया और फिर घड़े में हाथ डाला..अबकी बार फिर कुछ हाथ लगा और उसे मुट्ठी में ले मुँह में रखा..अरे वाह...! शायद यह चना था..| इस प्रकार यदि उसके हाथ ककड़ लगता तो उसे वह मित्र की ओर उछाल देता और यदि चना मिलता तो उसे खा लेता...धीरे-धीरे उसकी भूख शांत हो गयी और वह अपने स्थान पर आकर आराम से सो गया..
        ...अब दूसरा दिन...उस कोठरी का दरवाजा खुला गुरूजी उन दोनों के सामने खड़े थे...गुरूजी ने उन दोनों से हाल-चाल के साथ ही उनके भूँख के बारे में भी सवाल किया तो कर्म में विश्वास करने वाले शिष्य ने तपाक से जबाव दिया कि “गुरु जी मैंने तो किसी तरह घड़ा खोज उसमें रखे चने से अपनी भूँख शांत कर ली है...” अब गुरूजी ने दूसरे शिष्य से पूंछा तो वह कुछ नहीं बोला..अपनी बंद मुट्ठी गुरु जी के सामने खोल दी...दोनों मित्रों की आँखे चौंधिया गयी..क्योंकि मुट्ठी में अशर्फियाँ थी...!
        ...फिर गुरु जी ने कहा कि अब तुम दोनों सोचो कि कर्म और भक्ति में कौन श्रेष्ठ है..!”
      
       भानजे ने यह कहानी यहीं पर समाप्त करते हुए कहा, “मामा अब आप बताएं कि इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है..!” 
        मैं भी पशोपेश में पड़ गया..क्योंकि यहाँ एक भूखे मित्र के हाथ में अशर्फियाँ तो दूसरे मित्र ने अपने प्रयासों से अपना भूख शान्त कर लिया था...! फिर कुछ सोचकर मैंने भांजे से पूंछा, 
       “क्या गुरूजी ने यह नहीं बताया कि कर्म और भक्ति में कौन श्रेष्ठ है..?” भांजे ने कहा, “नहीं..उन्होंने भी इसे हम पर छोड़ दिया|”
       मैंने कहा, “..यहाँ कर्म ही श्रेष्ठ है..क्योंकि इसी के बिना पर उसकी भूख शांत हुई...अशर्फियों से तो भूख शांत नहीं होती..!” 
          हलांकि, मैं पहले ही कर्म को भक्ति से श्रेष्ठ बताया था..इसीलिए इस कहानी को सुनने के बाद भी मैंने अपने इसी तर्क को आगे बढ़ाया..लेकिन अशर्फियों के लालच में मैं रह-रह कर इस संबंध में अपनी धारणा बदलने के लिए प्रेरित हो रहा था..! और इसी क्रम में मेरा भी भक्ति की ओर झुकाव बढ़ने लगा क्योंकि यहाँ तो बिना कुछ कर्म किए ही अशर्फियाँ हाथ लगी थी...!
         फ़िलहाल मैं अपने तर्क को संशोधित करने के प्रयास में ही था कि पिता जी गीता का श्लोक बोल पड़े, “कर्मनेवाधिकारास्ते मा फलेषु कदाचनः...” मैं अपने दिमाग पर जोर डालना शुरू किया कि किसे श्रेष्ठ सिद्ध करे लेकिन इस श्लोक का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तथा मैं स्पष्ट निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा था...चूंकि अशर्फियों का लालच मन में था ही इसलिए अब मैं कर्म में खोट खोजने लगा...मैं सोचने लगा...
      “यदि कहीं अशर्फियों की जगह वास्तव में मित्र की मुट्ठी से कंकड़ ही निकलता तो दोनों मित्रों के बीच भविष्य में होने वाले महाभारत की पटकथा लिख गयी होती...! और...वह कर्मवादी मित्र अब अपने अज्ञान पर भी पछता रहा होगा..काश..! मैं उसे कंकड़ न समझता तो भूख तो शान्त हुई ही थी..अशर्फियाँ भी हाथ आ जाती...| उसके कर्म में जरूर कुछ न कुछ कमी रह गयी जिसके कारण वह घड़े में अशर्फियाँ होने के ज्ञान से वंचित हुआ...! जरुर उस कर्मवादी मित्र ने यही सोचा होगा...|”
        जैसे ही मेरे विचार में यह सब आया मैं अशर्फियों के लालच में बोल पड़ा.. “पूर्ण ज्ञान के साथ कर्म करना चाहिए..और इस रूप में ही कर्म भक्ति से भी श्रेष्ठ होती है..!” इतना कह कर मैं चुप हुआ ही था कि भानजा पूँछ बैठा, “वो कैसे मामा...!”
        मैने अपने मन की चोरी अर्थात दिमाग के खुराफात को छिपाते हुए उत्तर देने से बचने का प्रयास करने लगा...आकस्मात..! यह सब सोचते-सोचते मैं सोच बैठा...
         "क्या वास्तव में कर्म करने वाला खुराफाती होता है..?” तभी बीमार माँ को देखने डॉक्टर साहब आ गए और हमारी वार्ता समाप्त हो गयी..तथा मैं उत्तर देने से भी बच गया...!

         अब इस बारे में आप भी सोचिए....
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