यह अकथ-मन ! यहाँ प्रश्नों और उत्तरों की टकराहटों में एक सार्थक दुनियाँ तलाशनें की आकुलता है...
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१ उसे काम चाहिए…ऐसा काम जिससे उसकी राहें खुल सकें..अपनी मर्ज़ी का मालिक बन सके..पिता और मां नही...
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रामचरितमानस में एक चौपाई है “ रघुकुल रीति सदा चलि आई , प्राण जाय पर वचन न जाई। ” यहाँ चौपाई के इस कथन में निहित वह ‘मानसिक तत...
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मैं सुबह-सुबह लगभग साढ़े पाँच बजे स्टेडियम तक टहलने चला जाता हूँ। इस स्टेडियम में चारों ओर किनारे पर लगभग साढ़े चार फीट की...
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उस दिन इलाहाबाद से महोबा स्वयं ड्राइव करते हुए कार से जाने का मन कर गया...साथ में श्रीमती जी और छोटे पुत्र श्रेयांश भी थे...एक बात...
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सुखई को बीडीओ साहब से कई बार बुलावा आ चुका था.…! आज हरखू परधान बीडीओ का सन्देश लेकर स्वयं उसे बुलाने आए थे.…! लेकिन…! सुखई ...
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( "कोमा में" - हाँ पिछले दिनों समाचारों में ...
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न जाने क्यों कई दिनों से मन में बेचैनी सी छाई हुई थी..इसका कारण खोजने लगा तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था..फिर अपने अन्दर डुबकी लगा...
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वह सुबह थाने पहुँचा तो उसे कुछ पुलिसवाले छतरी के नीचे बैठे आराम करते दिखाई पड़े। वह अपनी तहरीर लेकर सीधे उनके पास गया। उनमें से एक ने ब...
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कई दिन हो गए थे टहले हुए, तो आज सुबह पौने पाँच बजे ही निकल पड़ा। वैसे यह टहलाई हप्ते में औसतन तीन दिन होती है। स्टेडियम में ग्रुप...
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1 सेप्टिक टैंक के मेनहोल पर ढक्कन सीमेंट से जाम था। पिछले दस मिनट से वह छेनी और हथौड़े की मदद से इ...
शनिवार, 13 अक्टूबर 2018
यह तो मन ही है निवास समस्त विपदों का!
शुक्रवार, 25 मई 2018
जीवन की सहजवृत्ति
अभी-अभी पौधे और घास सींचकर बरामदे के तखत पर मैं बैठा हूँ...जानता हूँ, इन्हें छोड़कर अब जाने वाला हूँ...लेकिन इन्हें कुम्हलाते...मुरझाते...नहीं देख सकता..एक अजीब सा लगाव हो आया है..इन पौधों और इस वातावरण से...!! खैर...यह भी जानता हूँ...हम इंसान हैं...भावात्मक बातें सोच-सोचकर भावुक हो उठते हैं..और..निश्चित रूप से हम अपने परिवेश और चीजों से अपने विचारों और सोच के अनुसार ही बर्ताव करने लगते हैं...हाँ..हम अपनी चाहना के अनुसार ही अपनी सोच निर्मित करने लग गए हैं..सच में, आखिर मनुष्य ही तो "सोचनीय" प्राणी है..
...आखिर गौरैया के उस जोड़े और उसके उन बच्चों के बीच ऐसा कौन सा रिश्ता है..जिसके बारे में वे सोचकर व्यवहार करते हैं...!! मैं नहीं जानता...कि...इन पक्षियों के आपस के बीच के कार्य-व्यवहार में इनका कोई सोच आड़े आता होगा..यह तो इनकी सहज वृत्ति है...लेकिन, हम इंसान अपनी सहजवृत्ति खोते जा रहे हैं...अपनी सोच के गुलाम बनते जा रहे हैं.. और यह हमें लगातार अमानवीय बनाती जा रही है...अब तो शायद हमें अपनी सहजवृत्तियों को जगाने के लिए बहुत सारे "डे" भी मनाने पड़ते हैं..!
लेकिन...इनके लिए किसी "डे" की जरूरत नहीं है...क्योंकि ये प्रकृति को समझते हैं...
उस दिन गौरया के घोसले से तिनके जमीन पर गिर इधर-उधर बिखरे पड़े दिखाई दिए थे...मैंने लकड़ी के उस घोसले में झाँक कर देखा, उसमें गौरया नहीं दिखाई पड़ी। इधर मैं उन गौरयों के जोड़ों को कई दिनों से इस घोसले में तिनके लाते हुए देख रहा था...सुबह-सुबह मेरे दरवाजा खोलते ही फुर्र करके ये जोड़े उड़ जाते..कभी-कभी जोड़े का एक गौरैया घोसले के अन्दर से झाँक रहा होता तो दूसरा बाहर से घोसले में झाँकता दिखाई दे जाता...गौरयोों के लिए यह घोसला गौरया दिवस पर हमारे डी एफ ओ साहब ने हमें उपहार में दिया था, जिसे मैंने पिछले दो साल से अपने सरकारी आवास के बरामदे में टांगा हुआ है। इस घोसले में अब तक दो-एक बार गौरयों के जोड़ों ने अंडे भी दिए हैं। गौरैैया का जोड़ा अंडे देने के पहले तिनके ला-लाकर इस घोसले में बिछाते हैं...इसके लिए ये जोड़े मिलकर बड़ी लगन केे साथ मेहनत करते हैं.. घोसले बनाने की इनकी लगन देख मुझे इंसानों को लेकर अचरज होता है।
इधर छह-सात महीने पहले मुझे एक अन्य चिड़िया दिखाई पड़ी थी...यह गौरया से थोड़ी बड़ी और मैना से थोड़ी छोटी होती है, और काफी फुर्तीली भी दिखाई देती है..। इस चिड़िया का नाम तो नहीं पता, लेकिन यह एक शिकारी टाइप की चिड़िया प्रतीत हुई..जो गौरैया के घोसले के आसपास उन दिनों अधिक मँडराती है जब गौरैया के अंडे देने का समय होता है, तब गौरैया के जोड़े इसे भगाने के लिए चीं-चीं करते हुए इसकी घेराबंदी करते हुए दिखाई देते हैं। अकसर सुबह इस चिड़िया रूपी खतरे को भाँप गौरैया की तेज चहचहाटों को सुनकर मैं भी बाहर निकल आता और गौरयों के सहयोग में उस शिकारी चिड़िया को भगाने लगता..
इधर मैंने ध्यान दिया है कि गौरैया के जोड़े अब इसमें अपना घोसला लगाने से कतराने लगे हैं...शायद यही वजह है कि इस घोसले से गौरैया के नन्हे बच्चों की चीं-चीं की आवाज सुने मुझे कई माह हो चुके हैं...उस दिन मैंने सुबह-सुबह इसी घोसले को फिर उजड़ा हुआ पाया था...शायद उसी शिकारी चिड़िया ने उसके घोसले को उजाड़ा होगा..! घोसले के सारे तिनके बरामदे के फर्श पर बिखरे पड़े थे...
खैर...जब मैं देर शाम घर पहुँचा तो पत्नी कुछ ज्यादा ही परेशान दिखाई पड़ी...परेशानी का कारण पूँछने पर उन्होंने बताया कि पोर्टिको की छत पर पंखे लगाने वाली डिब्बी से गौरैया के घोसले से उसके बच्चे गिर पड़े हैं..जिसमें से एक गिरने की चोट से मर गया...और दूसरा अभी जिन्दा है...श्रीमती जी उसी को बचाने की चिन्ता में थी...मैं भी झल्लाते हुए बोला, "इन गौरयों को यह भी नहीं पता कि कहाँ घोसला लगाना चाहिए और कहाँ नही.." लेकिन इसमें बेचारी इन नन्हें पक्षियों का क्या दोष..!! असल मे ये बेचारे हमारी बदली जीवन शैली के शिकार हुए हैं...सोचते-सोचते..पत्नी के साथ उसे देखने मैं भी बाहर आ गया...गौरैया का वह नन्हा बच्चा एक कोने में दुबका सा बैठा था...वहाँ से उठाकर उसे मैंने कार की बोनट के उस भाग पर रख दिया जहाँ वह थोड़ा सुरक्षित रह सके...
... अगले दिन अलसुबह श्रीमती जी ने पके चावल के छोटे से टुकड़े को उस गौरैया की नन्हीं सी चोंच के पास ले जाकर उसे चुगाने का प्रयास किया, लेकिन उसने अपनी चोंच नहीं खोली..इसके बाद हम उसके मम्मी-पापा का इन्तजार करने लगे थे..थोड़ी देर बाद ही पोर्टिको से चीं-चीं की आवाजें सुनाई दी.. उत्सुकतावश देखने पर पाया कि गौरैया का एक जोड़ा उस नन्हीं सी जान को फुदक-फुदक कर चुगाने पर लगा हुआ था..अब वहीं गौरैया का बच्चा अपने मम्मी-पापा की चोंच में कुछ देखते ही झट से अपनी नन्हीं चोंच खोल देता...इघर हमने गौरया के उस जोड़े को दिवाल के सहारे खड़े एक पत्थर की चट्टी के पास भी उछल-कूद करते हुए देखा..! पता चला कि वहाँ छिपे बैठे एक अन्य बच्चे को भी वे बारी-बारी से चुगा रहे थे...मतलब इस जोड़े के तीन बच्चों में से दो बच्चे बचे हुए हैं...पत्नी ने उन दोनों बच्चों को एक साथ कर दिया और उनके लिए पके चावल और एक प्याले में पानी का प्रबंध भी कर दिया गया...
हाँ.. देर शाम हम कहीं से आए थे..तब तक तुफान और बारिश गुजर चुका था...मुझे गौरैये के उन बच्चों की चिन्ता हो रही थी.. मैंने देखा...उनके पंख एक दम भींगे हुए थे और पानी-भरे उस बड़े से प्याले की कोर पर वे सहमे हुए से बैठे थे...उन्हें देखकर ऐसा लगा, जैसे ठंड से वे काँप रहे हों.. खैर हमने उन्हें, वहाँ से उठाकर एक छोटी सी डलिया में कपड़ा बिछा उसमें रख, डलिया को घर की लाबी में रख दिया...रात में हमने पाया...वे दोनों अपना सिर लुढ़काए आराम से सो रहे थे.. शायद उन्हें गरमाहट मिल गई थी...
अगले दिन सुबह पत्नी ने उन दोनों बच्चों को फिर से पोर्टिको में रख दिया था...जहाँ उन्हें चुगाने उनके मम्मी-पापा आ गए थे...पत्नी ने हमें बताया कि उन बच्चों को पोर्टिको में रखने में कुछ देर हो गई थी और इधर गौरैया का वह जोड़ा जोर-जोर की चीं-चीं की आवाजों के साथ इधर-उधर फुदकते हुए जैसे अपने बच्चों को ही खोज रहा था.!! बच्चों को देखते ही वे उन्हें चुगाने में जुट गए थे...बाद में सुपुत्र महोदय ने जब गौरैया के उन बच्चों की तरफ अपनी हथेली बढ़ाई तो वे फुदककर उनकी हथेली पर आ गए थे और फिर उछलकर थोड़ी दूर उड़ दूसरी ओर जाकर बैठ गए...अब वे उड़ना भी सीख चुके थे...कुछ ही देर बाद वे फुर्र हो चुके थे...
शनिवार, 10 मार्च 2018
महोबा: जल-समस्या और समाधान
मंगलवार, 12 दिसंबर 2017
मन के हमदम बनिए!
पाँच बजकर पच्चीस मिनट हो रहे थे जब मैं विस्तर से उठ बैठा। सोचा आज टहलने निकल ही लूँ। असल में इधर तीन दिनों से टहलना-घूमना बंद था, कारण इन तीन दिनों की दिनचर्या शांत नहीं थी। घरेलू कार्य से लेकर सरकारी कार्यों में उलझा रहा था। अब ऐसे में सुबह-सुबह उठने का मन नहीं करता आलस घेरे रहता है। तो, आज मैं थोड़ा रिलैक्स मूड में होने के कारण टहलने निकल लिया...स्टेडियम और आवास के बीच में था कि मित्र शुक्ला जा का फोन आया, उन्हें भी सुबह की सैर करनी होती है। हाँ, इनके बारे में बताएँ, इन जनाब को तो योग का टीचर होना चाहिए था। योग पर इनकी पर इनकी पकड़ देखते बनती है...योग और अन्य विषयों पर ये खूब अध्ययन करते हैं और योग के जबर्दस्त टिप्स कर लेते हैं, जो हम जैसे सामान्यों के लिए असंभव सा होता है। अकसर क्या होता है कि ये हमसे भी वैसे आसन कराने लगते हैं, मुझसे वैसा नहीं हो पाता, तो मैं इन्हें योग करते देखने लगता हूँ..खैर
मैं स्टेडियम पहुँच गया था, इसके दो चक्कर लगाया। तब तक शुक्ला जी मिल गए और अपने साथ हमें भी योग कराने लगे। दो -एक टिप्स के बाद जब मेरी हिम्मत जबाव दे गई तो मैं खड़े होकर इनके योगाभ्यास को देखने लगा। लौटते समय हममें योग को लेकर थोड़ी बहुत बातचीत भी हुई। मतलब योग केवल शारीरिक क्रिया भर नहीं यह मन से जुड़नी चाहिए, मतलब मानसिक योग के बिना शारीरिक योग भी सफल नहीं हो सकता।
हाँ, यह सब मैं अपने फोन पर जब लिख रहा हूँ तो साथ-साथ इसी फोन से गूगल म्यूजिक पर अपने पुराने पसंदीदा फिल्मी गीत भी सुनते जा रहा हूँ.."न तुम हमें जानों...न हम तुम्हें जाने, नजर लगता है कुछ ऐसा कि मेरा हम दम मुझे मिल गया" मतलब भाई, मन को वाह्य झंझावातों से मुक्त करने का प्रयास करते रहना चाहिए! चाहे जिस तरह से!!
आज का अखबार पढ़ रहा था तो एक हेडिंग पर ध्यान चला गया - "भीड़ में अकेले खड़े होने का साहस" तो भाई यह साहस ऐसे नहीं आता, अन्दर पढ़ा तो लिखा मिला "यदि आप दूसरों के कहने पर अपना जीवन जिएंगे, तो सफलता कैसे हासिल करेंगे? जीवन तो आपका है, तो फिर सुख और दुख सब कुछ अापके हिसाब से ही चलेंगे।...जैसे ही आप अपने विचारों और व्यवहारों के अनुरूप जीना शुरू कर देंगे, वैसे ही आप अपने सुख-दुख के मालिक स्वयं हो जाएंगे। आपका जीवन सहजता से आगे बढ़ेगा।" कुल मिलाकर मन के हमदम बनिए!
इन पंक्तियों को लिखते समय मेरा एक और पसंदीदा गाना बजने लगा है "ये मेरा दीवानापन है.." हाँ भाई, अपने मन को "दीवानेपन" के साथ पकड़िए!!!
चलते-चलते -
आप वही करिए जो आपका मन कहता हो...मन के विरुद्ध किया गया काम अ-योग होता है! और मन कभी आपके विरुद्ध नहीं जाता.. बस मन को पहचानिए.!
#सुबहचर्या
निरुद्देश्य-सी दुनियां के लड्डू
दिनभर मानसिक और शारीरिक थकान बनी रहे तो अलसुबह उठना थोड़ा मुश्किल होता है। बस कुछ देर और सो लेने के बहाने आराम करने का मन होता है। ऐसी स्थिति में अकसर टहलना स्थगित हो जाता है। लेकिन आज की सुबह अलसाए मन को चपत लगाया। समय पर उठ गया। टहलते-टहलते उस पहाड़ी पर चढ़ता गया जिसपर विकास भवन है। दूर से यह विकास भवन जैसे पर्यटक-गृह लगता है। वैसे पहाड़ की ऊँचाई पर यह नहीं बनना चाहिए था। क्योंकि विकास धरातल पर हो तभी फायदेमंद होता है। तो भवन भी धरातल पर होना चाहिए। ऊँचाई पर होने से यहां फरियादियों की आवाजाही कम रहती है।
वैसे तो इस पहाड़ी पर चढ़ने में बढ़िया एक्सरसाइज भी हो जाती है। इसीलिए यहाँ शहर के लोग भी सुबह-सुबह टहलने आ जाते हैं और विकास भवन के चारों ओर बनी कोलतार की सड़क पर चक्कर लगाते हैं। मैं भी इसी सड़क पर टहलने लगा था। खैर..
इस सड़क पर टहलते कुछ लोग आपस में बतिया रहे थे। कोई कह रहा था,
"अपने समाज के लोगों से कह दिया गया है कि यदि कोई वोट मांगने आए तो साफ बता दें कि हमारा समाज तय कर चुका है कि कहाँ वोट देना है..अब हम कुछ नहीं कर सकते..हमारा भी वोट वहीं जाएगा।"
यह बात मन को कुरेद गई। मुझे याद आया। एक बार मैंने एक कार में लिफ्ट लिया था। उस कार का ड्राइवर कम पढ़ा-लिखा लगा था। वह गँवई था। लेकिन उसकी बातों से लगा कि काम धंधे के चक्कर में उसे दुनियादारी का बखूबी ज्ञान हो चला है। बातचीत में उसने कहा था -
"साहब जी, विधायकों और सांसदों को ही मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार होना चाहिए।"
उसकी बात पर मैंने जब कहा कि "यही चुनते हैं" तो उसने अपनी बात का मतलब समझाया -
"नहीं सर जी, मेरा मतलब यह है कि पार्टी-शार्टी की व्यवस्था (राजनीतिक दल) खतम होनी चाहिए.. लोग अपने दम पर चुनाव लड़ें.. इनमें जो अच्छा हो, वह जीते… और फिर यही जीते हुए विधायक या सांसद मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का चुनाव करें.. ऐसी व्यवस्था में, ये मंत्री-संन्त्री जो चुनाव प्रचार के लिए निकलते हैं और इससे जनता का जो जी हलकान होता है, वह नहीं होगा.. सब अपना-अपना ही प्रचार करेंगे.. सरकार को भी कोई व्यवस्था नहीं करनी होगी और व्यर्थ का सरकारी ताम-झाम भी नहीं रहेगा, पैसा भी बचेगा..."
यह बात मुझे भी काफी-कुछ जमीं थी! रोजमर्रा की जद्दोजहद में उलझा आम आदमी चाहे जितने दंद-फंद से घिरा हो, तमाम समस्याओं पर सोचता वह भी अंततः सकारात्मक ही है!
अब तक विकास भवन का दो चक्कर पूरा हो गया था। लौटने को हुए तो एक क्षण के लिए पूरब दिशा में क्षितिज की ओर निहारा… दूर स्लेटी रंग की पहाड़ियों के ऊपर सूरज की हलकी-हलकी लालिमा बिखरनी शुरू हो चुकी थी.. मन जैसे आनंदित हो उठा! इधर नीचे महोबा शहर की लाइटें आसमान में सितारों-सी जगमगा रहीं थीं। ईश्वर को धन्यवाद दिया कि भले ही तुम्हारी बनाई दुनियाँ निरुद्देश्य-सी हो, लेकिन इससे मिलने वाली अनुभूतियाँ तो सच्ची हैं।
टहलकर वापस आ गया। चाय बनाया। चाय की चुस्कियों के बीच अखबार पढ़ने लगा।
सम्पादकीय "वोट डालने निकले" पर ध्यान गया। फिर घर से बात की "श्रीमती जी ने कहा वोट डालने क्या जाएं! ये वोट लेने वाले केवल भ्रमित ही तो करते हैं।" इस बात पर उनसे कुछ नहीं कहा।
लोकतंत्र मुझे शादी के लड्डू जैसा लगा। जो खाए वो भी पछताए, और जो न खाए वह भी!!
#सुबहचर्या