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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

डरना जरूरी है!

आज सुबह स्टेडियम पहुँचने में कुछ देर हो गया। लगभग साढ़े छह बजे पहुँचा था। वह ग्रुप, जिसमें अकसर चार-पांच सदस्य होते हैं, रोज की तरह एक साथ टहलते हुए मिल गया। टहलते हुए ग्रुप के सदस्य एक-दूसरे से बतियाते स्टेडियम का चक्कर लगाते हैं। स्टेडियम में इनके आने का समय पक्का है। ‌जबकि मुझे अकेला ही टहलना पसंद है, एकांत हो तो और भी अच्छा। इसलिए अकसर पौ फटते ही मैं स्टेडियम में पहुँच जाता हूँ और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के अंदाज में टहलकर वापस हो लेता हूं। तब तक ग्रुप भी यहां नहीं आया होता है। लेकिन कभी-कभी कुछ देर हो जाती है तो यह ग्रुप मिल जाता है।

वैसे, इनके बीच में चल रहीं बातें ज्यादातर समसामयिक सामाजिक परिस्थितियों या फिर राजनीति पर होती हैं। ज्यादातर जुमलेबाजी के अंदाज में ही यह बातचीत होती है। 
जैसे आज ही की ही बातचीत में शामिल जुमले कुछ इस तरह थे, "सारा काम मोबाइल करेगा" या "भगत को फोन लगाओ", "अब बिना ड्राइवर के ही गाड़ियाँ होंगी" "बिना दिल का आदमी होगा" आदि-आदि। यही नहीं ये लोग ऐसे प्रत्येक जुमले के बाद समवेत ठहाके भी लगाते जा रहे थे। शायद उनके बीच चल रही यह हंसी-ठिठोली इन्हें दिनभर के लिए ऊर्जस्वित कर रही थी। 

अभी-अभी कोई कहते हुए सुनाई पड़ा, 

“ड्राइविंग जैसी सीट पर बैठे आदमी का अब कोई भरोसा नहीं रहा।” इसीलिए "बिना ड्राइवर के गाड़ी" की बात होने लगी है। 
इसी तरह दिल और दिमाग भी अब जरूरी नहीं रहा केवल "भगत" बनकर काम चलाया जा सकता है। खेमेबाजी के आज के दौर में हर खेमे को भी ऐसे ही दिल और दिमाग विहीन "भगत" चाहिए हैं। 

इन जुमलों के बीच किसी ने कहा, "भगत को फोन लगाओ।" खैर।

स्टेडियम से टहलकर वापस आ गया। 

मेरे आवासीय परिसर के खड़जे पर काफी मात्रा में दूब उग आई थी। इस पर ध्यान जाते ही मैं इस घास की सफाई में जुट गया। इस काम में मन को एक अजीब-सा सुकूँन मिला। 

मुझे लगा जैसे मैं परिसर की नहीं अपने मन के किसी कोने का खंज-अखंज हटा रहा होऊं! 

इस सफाई से निवृत्ति पाकर मैं सुबह की चाय पीने लगा। 
तभी बाहर से अखबार फेंके जाने की आवाज आई। अभी-अभी हॉकर बाहर अखबार फेंककर गया। अखबार उठाने नहीं गया। 

मुझे याद आता है, छात्र-जीवन में सुबह हुआ नहीं कि हॉकर की राह तकने लगता। शायद तब मन में जिज्ञासु भाव ही नहीं देश-दुनियां की प्रबलता थी। लेकिन उम्र के साथ जीवनानुभव बढ़ जाने से यह जिज्ञासु-भाव भी क्षीण होने लगा है।

खैर, जीवन में गंध अभी बाकी है। कुछ क्षण बाद यूँ ही अखबार उठाने चला गया। 

बाहर बरामदे में गौरैया के लिए घोंसला टंगवाया है। आजकल उसमें गौरैया के बच्चे चीं-चीं करते हैं। जैसे ही बाहर का दरवाजा खोला, घोंसले के होल से झांकती गौरैया फ़ुर्र से उड़ गई! 

अचानक मुझे देख वह डरी होगी। वह पास में ही बाउंड्री वॉल पर जाकर बैठ ग‌ई। और वहाँ से वह जैसे मेरी निगरानी करने लगी थी। गौरैया अपने बच्चों के लेकर सावधान हुई थी। 

सावधान होने के लिए उसका यह डरना जरूरी था। वाकई में, डर एक आवश्यक और महत्वपूर्ण गुण है।

आदमी अब निडर है, वह आदिम तो नहीं रहा। लेकिन आज उसके कारनामों से आदिम मनुष्य भी लजा जाए! उसके सारे काम "प्लांडवे" में होते हैं। और उसके भीतर गुण भी "प्लांन्डवे" में ही उभरते हैं। वह स्वयं के कारनामों को "बिना दिल का" होने की सीमा तक जस्टीफाई करता है। 

वैसे आजकल दिल धोखाधड़ी पर उतर आया है‌। लेकिन कोई भरोसा नहीं कि यह कब किसके साथ “सर्जिकल स्ट्राइक” करके उसे अनप्लांन्ड छोड़ जाए। 

धोखाधड़ी भी उसी के साथ संभव है, जिसके भीतर दिल हो, जहां दिल ही न हो, वहां धोखे का प्रश्न भी नहीं उठता! बिना दिल का आदमी पैदा करने के लिए विज्ञान की भी कोई आवश्यकता नहीं.. यह काम तो आदमी स्वयं करने लगा है।

खैर, अखबार से पता चला कि कोई नफरत की बेल भी है, जिसे नेता उगाते हैं। सोचा, इस बेल पर शायद कोई सुंदर-सा फूल खिलता हो, इसीलिए नेता जी लोगों को यह बेल उगाना पसंद हो। 

लेकिन यह तो नेताजी लोगों की बातें हैं; उस बेल पर फूल खिलेंगे या कांटे उगेंगे, इसका पता तो समय की नब्ज़ ही बताएगी। 

फिलहाल मुझे तो उस नन्हीं-सी गौरैय्या का डरना अच्छा लगा। कम-से-कम कम अपने बच्चों को लेकर वह सावधान तो हो गई! मैं उस सावधान हुई गौरैया को ध्यान से देखने लगा।

अखबार में सम्पादकीय पेंज पर "न सरहद हो न सियासत" पढ़कर लगा कि कलाकारों के लिए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ बेमानी है। लेकिन सरहद और सियासत के लिए सभी बातें जायज़ हो जाती है कलाकारों को यह कौन समझाए!!!

#चलते_चलते
सावधान होने के लिए डरना बहुत जरूरी है। 
#सुबहचर्या 
22/6.10.2016

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

महात्मा का जन्मदिवस

            आज थोड़ी फुर्तबाजी में थे। इसलिए पाँच बजे नींद खुलते ही पाँच-दस पर स्टेडियम की ओर निकल लिए। उठने और निकलने में यह फुर्तबाजी इसलिए थी कि, आज गाँधी जी की जयन्ती है और सुबह आठ बजे कार्यालय जाकर उनके फोटू पर माल्यार्पण करना था। चूँकि, हम सरकारी नौकरी में हैं, इसलिए प्रत्येक वर्ष माल्यार्पण का अवसर मिल ही जाता है।
            एक बात है! वैसे तो, है यह आपके कान में सुनाने लायक...लेकिन, यहाँ लिखे दे रहे हैं, आप सुनिए मत, पढ़ लीजिए, वह कि, गाँधी के फोटू को माला पहनाते लाज आती है..! हाँ, उनका माल्यार्पण करते हमें शर्म आती है, इसीलिए मुझे गांधी के सामने हाथ जोड़ना ज्यादा मुफीद लगता है। क्योंकि, यह सोचकर हाथ जोड़ लेते हैं कि, "गाँधी बाबा, तुम ऐइसई दूर रहो, फोटू में ही रहो, वहाँ आप हमें बहुत ठीक लगते हो...इसी दूरी में तो आपसे प्रेम पनपता है। गाँधी!  तुम दिखाने की नहीं छिपाने की चीज हो।"
          आवासीय परिसर से निकलते हुए डीजे की जबर्दस्त आवाज कानों में गुंजायमान हो रही थी। वैसे, रातभर यह डीजे बजता रहा होगा..निश्चित रूप से आसपास वाले ठीक से सो नहीं पाए होंगे। शायद, नवदुर्गा के पांडाल में ही यह डीजे बज रहा होगा। एक दिन अखबार में पढ़े थे कि दुर्गा पंडालों में डीजे बजाने की अनुमति नहीं रहेगी। लेकिन, अब इस पर क्या कहें, यह धर्म का मामला है, किसी धर्म के मामले में टाँग अड़ाना उचित नहीं होता यही सोचकर यहाँ नियमों के पालन को उचित नहीं माना गया होगा।
            हम स्टेडियम पहुँचे। हमारे साथ ही रोज टहलने वाला ग्रुप भी पहुँच गया था। मैंने उन्हें आपस में बतियाते सुना, "आज रात में बिजली का खम्भा टूट गया, और रात में बिजली नहीं आई.." यह सुनते ही मुझे, उनकी पीड़ा की अनुभूति हुई। वाकई, एक तो सड़कें गली जैसी हैं और ऊपर से बिजली के खंभे ऐसे गड़े होते हैं कि डिवाइडर न होते हुए भी डिवाइडर का आभास देते हैं...फिर तो इन खम्भों को टूटना ही होता है! सुना, किसी ट्रैक्टर ने खम्भे को धकिया दिया था। इसीलिए तो, लोग साठ साल का रोना रोते हैं, हम ढंग से बिजली के तार भी अभी तक नहीं फैला पाए हैं।
          चक्कर लगाते, एक सज्जन के बगल से निकलते समय मोबाइल पर उनके बतियाने की आवाज सुनी, वह किसी से कह रहे थे, "यहीं स्टेडियम में टहल रहे हैं" उनके बात करने का अंदाज बता रहा था कि वह अपनी घरवाली से ही बात कर रहे होंगे। खैर..स्टेडियम का, स्वयं के द्वारा निर्धारित चक्कर पूरा कर हम लौट आए।
           आज सुबह-सुबह रामकिशोर आ गए, कभी-कभी रामकिशोर सुबह आकर मेरी चाय बना देते हैं, खासकर जब सुबह कहीं जल्दी निकलना होता है। रामकिशोर का कुत्ता बड़ा प्यारा है, वह भी अकसर सुबह उसी के साथ आता है और मेरे किचेन, कमरे सब जगह घूम लेता है, लेकिन आज वह गेट के बाहर ही रह गया था। मैंने जब गेट खुलवाया तो वह अपनी पूँछ हिलाते धड़ाके से अन्दर घुस गया। रामकिशोर को इधर-उधर ढूँढ़ते हुए अन्त में किचेन में खोज निकाला। मैं अपने कमरे में आराम फरमा रहा था, रामकिशोर को खोज वह महाशय निश्चिंत होकर वहीं मेरे कमरे में आकर आराम फरमाने लगे। जैसे, उसे सब बातें पता हो, और चाय बनने के बाद रामकिशोर के साथ भी निकल भी लिए। मैं, अब कुत्तों को ज्यादा समझदार मानने लगा हूँ।
          चूँकि, आज गाँधी जी पर माल्यार्पण वगैरह करना था, चाय-वाय पीकर नहाने की तैयारी करने लगा। बाथरूम में देखा, बहुत दिनों से शौचालय की सफाई नहीं हुई थी। ध्यान आया, आज गाँधी जयन्ती पर कुछ भासन-वासन भी देना पड़ सकता है, और इधर देश के प्रधानमंत्री भी अपने बहुआयामी स्वच्छता-कार्यक्रम के क्रियान्वयन में जुटे हैं, सो मैं ही क्यों पीछे रहूँ, तो भाषण देते समय मेरे भी करनी और कथनी में कोई अन्तर न रह जाए, आज ही शौचालय साफ करने की ठान ली। अब मेरे कथनी में भी दम रहे, और स्वच्छता अभियान पर एक जोरदार भाषण दे सकूँ; हार्पिक्स तथा ब्रश लेकर अपने इस स्वच्छता महाभियान में हम भी जुट गए। खैर..भाषण देने की नौबत तो आई लेकिन स्वच्छता अभियान दिमाग से निकल गया, आखिर, एक ही चीज को दुहराना भी तो अब हमें अच्छा नहीं लगता..!
             हाँ, गाँधी जी की फोटू को मैंने कई बार निहारा, गाँधी जी ग्राम-स्वराज की बात करते थे। वाकई, गाँधी जी का यह सपना आज ग्रामों में साकार हो रहा है। चारों ओर स्वराज ही स्वराज है!  मजाल है कि हम इस ग्राम-स्वराज में कोई दखलंदाजी कर सकें? बहुत सशक्त हो चुकी है ग्राम-स्वराज की यह अवधारणा! अब सबसे निचले पायदान पर बैठे व्यक्ति को कहीं ऊपर जाने की आवश्यकता नहीं.. ग्राम-स्वराज के रहनुमा द्वारा इनकी समस्याओं का वहीं गाँव में ही चुटकी बजाते निस्तारण कर दिया जाता है। अगर गाँव के ये निचले पायदान के दलिद्रनारायण, भूल से ऊपर अपनी बात पहुँचाने पहुँच भी गए तो ग्राम-स्वराज के ऐसे-ऐसे रहनुमा हैं कि तब ये, इन दलिद्रनारायणों को त्वरित-न्याय देने में, तनिक भी देर और संकोच न करते हुए ग्राम-स्वराज का उत्तम उदाहरण भी तत्काल प्रस्तुत कर देते हैं।
         वैसे, दलिद्रनारायण की सेवा में ही गांधीगीरी भी सफलीभूत होता है। नहीं तो आप ही विचारिए! बिना दलिद्रनारायण के कैसे होगी गाँधीगीरी..? जब तक दलिद्रनारायण रहेंगे तब तक गाँधीगीरी रहेगी.. मैं तो कहता हूँ, गाँधीगीरी और दलिद्रनारायण दोनों में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है! हाँ, दलिद्रनारायण गाँधीगीरी की बदौलत ही जिन्दा है तो गाँधीगीरी भी दलिद्रनारायण की सेवा के बदौलत ही चलती है।
             भाई लोग, मैं तो मानता हूँ, जन्मदिवस मनाना भी एक बिजनेस है, चाहे वह अपना जन्मदिवस हो या दूसरे का या फिर किसी महात्मा का ही क्यों न हो! आखिर, जीने को मजा लूटना ऐसे ही नहीं माना जाता..और कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिनके स्वर्गवासी होने पर हमारी दुकानदारी चलती रहे इसलिए हम उनका जन्मदिन मनाते हैं। हाँ, किसी का जन्मदिन से सेवा भावना की याद आती है ; जैसे यदि हम गाँधी जी को भूलते हैं तो सेवा-भावना भी भूलते हैं और इस भावना में ही तो मेवा है। ऐसे में मेवा मिलता रहे हम गाँधीगीरी करते रहे.. सब का काम चलता रहे। गाँधी, नोट और वोट सब जगह काम आते हैं।
               
               हाँ, एक बात है, दलिद्रों को भी "दलित" जैसे शब्द से सीख लेते हुए "दलिद्रनारायण" सम्बोधन पर अब आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। इस शब्द में भेदभाव जैसा भाव छिपा होता है..एकदम छुआछूत जैसा! क्या मजाक है! भला आज तक "दलिद्र" से कभी "नारायण" जुड़ पाए हैं? अब तक दलिद्रों को, अपने नारायणों का खेल समझ में आ जाना चाहिए था, जो नहीं आया। खैर, मैं यही सोचता रहा और सभा विसर्जित हो चुकी थी। अन्त में, साबिर ने दो गाँधी भजन गाया, जिसे गुनगुनाते हुए मैं उठ गया था -
            "वैष्णव जन तेणे कहिए, जे पीर पड़ाई जाणे रे" और
             "ईश्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान"

                                          --Vinay
                                          #दिनचर्या 21/2.9.16

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

पुरस्कारार्थी

            आज दो दिन बाद टहलने का अवसर मिला..टहल-टुहल कर आया तो कुछ देर यूँ ही बिताया...तुलसी की पत्ती डाल कर चाय बना। असल में "का हो" (हाँ, श्रीमती जी को मैं "का हो" ही कह कर संम्बोधित करता हूँ) यहाँ एक बार आई थीं तो तुलसी के पौधे लगा दिए थे, उन्हीं पत्तियों का प्रयोग चाय में करता हूँ। चाय पी रहा था कि "जागरण"अखबार आ गया। एक खबर की हेडिंग से मैं कुछ अधिक ही प्रभावित हो गया!
           "अब बाबू जी... पुरस्कारों से तो पेट नहीं भरता" लेकिन यह हेडिंग ही मुझे गलत प्रतीत हुई। शंकरगढ़ वाली "दुईजी" अम्मा की बात छोड़िए। मुझे लगता है उन्होंने पुरस्कारों के लिए अपने आवेदन पर "फारवर्डिंग" और "रिकमेंडेशन" उचित माध्यम द्वारा नहीं कराया होगा नहीं तो, पुरस्कारों से तो पेट भरता ही है! 
            हाँ... आज चाय पीते-पीते और अखबारपढ़ते-पढ़ते पुरस्कारों को लेकर दिमाग में तमाम बातें कौंधने लगी। जैसे, हाल के दिनों में साहित्यिक-असाहित्यिक पुरस्कारों पर अखबारों और इहीं फेसबुक पर पढ़ तमाम विमर्शों पर धियान चला गया।
           तब तक देखता हूँ, मुझसे मिलने आयाराम जी आ चुके थे...पीते हुए चाय की ओर मैंने इशारा किया, तो वे बोले, "नहीं नहीं, आप पियो, समझो मैंने भी पी लिया"। खैर,  मैने आने का कारण पूँछा तो अपनी एक व्यक्तिगत समस्या लेकर बैठ गए.. तो लीजिए, आप भी आयाराम की व्यक्तिगत समस्या से रू ब रू होइए - आयाराम चालू हो चुके थे और उन्होंने जो मुझे बताया वह नीचे पूरा का पूरा हू ब हू लिखे दे रहा हूँ...

         "क्या है कि, इधर धड़ाधड़ दो-चार मोटी-मोटी पत्रावलियाँ मेरे समक्ष रखी गई। अब इतनी मोटी फाईल कौन पढ़े सो मैंने अपने कार्यालय सहायक से  पूँछा, इतनी मोटी फाईल..! आखिर माजरा क्या है?"
          कार्यालय सहायक ने  बताया, "सर,ये पुरस्कारार्थियों के आवेदन है!"
           मैं थोड़ा अकबक सा बोला, "पुरस्कारार्थी! आवेदन.? क्या मतलब?"
           "अरे सर गौरमेंट द्वारा विशेष क्षेत्र में काम करने वालों को विशेष विशेष तरह का पुरस्कार दिया जाता है, उसी के लिए लोग आवेदन किए हैं।" सहायक ने समझाया।
            "अरे! तो इसमें आवेदन की कौन सी बात..? सरकार को जिसको पुरस्कार देना हो दे, इसमें हमारा क्या काम?" 
           "आपकी बात तो सही है सर, यहाँ से केवल फारवर्डिंग ही लगनी है और हमारा कोई काम नहीं है" कार्यालय सहायक ने बात रखी। 
           "ठीक है, लेकिन फारवर्डिंग भी एक प्रकार का रिकमेंडेशन ही है। आखिर, हमारी भी तो कुछ जिम्मेवारी है कि बस ऐरे गैरे नत्थू खैरे को पुरस्कार दिलवाता फिरूँ?" कार्यालय सहायक की नजरों में झाँकते हुए रहस्यात्मक अन्दाज में मैंने कहा। जैसे, किसी पुरस्कार देने की चयन समिति का मैं सदस्य होऊँ। 
            "लेकिन सर, यह कोई वैसा मामला नहीं, और फिर फारवर्डिंग ही तो लगानी है! यहाँ हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। फिर इन्हें पुरस्कार मिले या न मिले यह ऊपर वालों का हेडअक् है, इससे हमें क्या लेना देना..गौरमेंट में पुरस्कार देने वाली कोई समिति भी तो होती होगी जो किसी को पुरस्कार देने या न देने पर निर्णय करती होगी.." मेरे सहायक ने शंका समाधान किया। 
           एक बात है भाई! कुछ भी हो, मैं यहाँ अपनी कलम की सार्थकता पर अपने दायित्वों को लेकर थोड़ा गर्वोन्मत्त जैसा हो उठा था..मेरी एक चिड़िया क्या बैठती पुरस्कारार्थियों की पुरस्कारांक्षा को जैसे पर लग जाते! मैं अपने इस अहमियत पर मन ही मन मुस्कुरा उठा था। 
               हाँ, हमें पुरस्कारार्थियों के आवेदनों पर "रिकमेंडेशन" से लेकर "फारवर्डिंग" तक का गुरुतर दायित्व निभाना पड़ रहा था। तो मैं भी, मेरे भी अहर्निश मासिक पुरस्कार पर कोई आँच न आए, इस गुरुतर दायित्व-बोध पर थोड़ा चौकन्ना हो उठा था। क्योंकि, फँसने पर ऊपरवाला नीचे को ही पकड़ता है और यहाँ तो, नीचे से ऊपर तक "रिकमेंडेशन दर रिकमेंडेशन" और "फारवर्डिंग दर फारवर्डिंग" झेलते हुए ही पुरस्कार किसी पुरस्कारार्थी को प्राप्त होने वाला है। 
               यहीं पर एक समस्या थी, इस "रिकमेंडेशन" और "फारवर्डिंग" के बाद भी यदि भाई पुरस्कारार्थियों को पुरस्कार न मिला तो फिर, मेरी क्या गत होगी..? अपने "फारवर्डिंग" पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता मैं नहीं देख सकता। इतना जरूर था कि आज के बेरोजगारी के जमाने में पुरस्कार की इनामी धनराशि इस बात की गारंटी थी कि कोई पुरस्कार लेने से मना नहीं करेगा लेकिन यदि कोई पुरस्कृत, पुरस्कार वापसी पर उतर आए तो मुझ जैसे प्राथमिक "रिकमेंडेटरी" और "फारवर्डक" पर क्या बीतेगी?
           
             हाल ही में पुरस्कार-वापसी-गैंग की चर्चा से उठी ऐसी ही तमाम शंकाओं ने मेरे माथे पर अच्छा खासा बल डाल दिया था। वैसे भी, कोई भी गैंग हो अपने सहयोगी गैंग की ही मदद करता है और इस पुरस्कार-वापसी-गैंग को भी अपने उस पुरस्कार-प्रदाता-गैंग की चिन्ता तो रहेगी ही जिसने इन्हें पुरस्कार देने के विचार को अमलीजामा पहनाया होगा। ऐसे में पुरस्कार-प्रदाता-समिति में हुए किसी बदलाव पर वापसी-गैंग भी सक्रिय हो सकता है। फिर क्या पता, किसी पुरस्कार वापसी पर मची चिल्ल-पों की गैंगवार की जड़ मुझे ही मान, कुपात्र को पुरस्कृत कराने का ठीकरा मेरे सिर फोड़ दिया जाए? 
                लेकिन एक बात है, यहाँ पुरस्कार वापसी की संभावना नगण्य थी.. क्यों..? क्योंकि, एक पुरस्कारार्थी महोदय अपनी पुरस्कारांक्षा में एक बड़ी सी मोटी फाईल लिए तीन दिन तक मेरे पीछे फारवर्डिंग के लिए दौड़ते रहे थे और मैं था कि अपनी व्यस्तता के चक्कर में इसका निपटारा नहीं कर पा रहा था। अन्त में वे "फारवर्डिंग" के लिए ऐसे बैठे जैसे धरने पर बैठे हों और मुझसे फारवर्डिंग करा कर ही माने। आखिर मैं भी क्या करता, मरता क्या न करता के अन्दाज में, यह सोचकर कि अभी कहीं से कोई सिफारिश आ जाए तो करना ही पड़ेगा और सिफारिश पर काम करने का अपराधबोध भी झेलना पडे़गा, सो उसकी फाईल के पन्नों को उलटने लगा था। वे कलाकार व्यक्ति थे। बड़ी कलाकारी से फाईल तैयार किया गया था, अखबार की कटिंग और कुछ सम्मान-पत्रों और इक्का-दुक्का विदेश यात्राओं से उसकी कलाकारी झलक रही थी, सो फारवर्ड कर दिया। अब आप ही बताइए, जो इतनी शिद्दत से फारवर्डिंग के लिए लगा हो, कलाकारी किया हो, वह भला क्यों किसी वापसी-गैंग का सदस्य बनेगा? जबकि उनकी सारी कलाकारी पुरस्कारधर्मा ही थी। खैर..
            मेरे इस फारवर्डिंग के बाद उस पुरस्कारांक्षी के चेहरे पर जैसे पुरस्कृत हो जाने की प्रसन्नता झलक उठी..आखिर, मैं पूँछ ही बैठा, "तुम फारवर्डिंग पर इतना खुश हो रहे हो?"
              "साहब, ऊपर मेरी बात हो गई है.. वहाँ से मुझे कहा गया है...अपना आवेदन फारवर्ड कराकर भेज भर दो.." पुरस्कारार्थी ने जैसे पुरस्कृत हो जाने के दर्प में कहा था।  वाकई! किसी की पुरस्कारांक्षा फारवर्डिंग के दर्प से भर उठी थी और उसकी बेचारगी भी इसी में छिप गई थी। 
               यह बात मेरे लिए आई गई हो गई थी। ऐसे ही एक दिन कार्यालय में बेकाम सा मैं कुर्सी पर बैठा आराम फरमा रहा था कि एक सज्जन एक मोटी सी फाईल लिए मेरे कमरे में प्रवेश किए। हाँ, वह हाँफ रहे थे, उनके चेहरे पर पसीने की बूँदें चुहचुहाई थी। आते ही फाईल को, मुझसे किसी "फला" पुरस्कार का आवेदन बताते हुए बोले,
            "सर, इसे रिकमेंड कर दीजिए, आज अन्तिम दिन है..!" 
            ध्यान आया, अभी पिछले दिनों ही तो इसी पुरस्कार के लिए एक अन्य पुरस्कारार्थी का आवेदन रिकमेंड हुआ था तो, अब दुबारा उसी पुरस्कार के लिए दूसरे पुरस्कारार्थी का अभ्यावेदन फारवर्ड करना ऊसूलों के खिलाफ जा रहा था। पुरस्कारांक्षा भी रिकमेंडेटरी के लिए अजीब बला है। हाँ, ऊसूलों के खिलाफ इसलिए कि, पुरस्कार तो एक ही व्यक्ति को मिलता है, फिर, पुरस्कारों का कोई घोषित रिक्त पद भी मेरे संज्ञान में नहीं था। थोड़ा झल्लाते हुए उसके अभ्यर्थना पर तुषारापात करने के अंदाज में पुरस्कारार्थी से मैंने कहा,
             "देखो! मैं किसी ऐसे कामों के लिए संस्तुति-फंस्तुति कर्ता अधिकारी नहीं हूँ और न ही मेरा यह काम है.. आप सीधे ऊपर दे आईए..।"
             वैसे फंस्तुति का मतलब पुरस्कार का अपमान करना नहीं था। असल में "फंस्तुति" माने मेरी वह अकर्मण्यता थी जिसके कारण मैं ऐसे महानुभावों के "पुरस्कारधर्मा" से लबरेज कृत्यों को पहचान नहीं पाया था और अपने काम को पहचनवाने के लिए इन्हें मेरे पास आना पड़ा, नहीं तो संस्तुति करने में क्या हर्ज था। लगता है ऊपर बैठे लोग भी फंस्तुति के ही शिकार हैं नहीं तो दुनियाँ में अच्छे कामों वाले पुरस्कारार्थियों की कोई कमी है क्या?
            "सर..सर, मैं इसकी एक प्रति ऊपर दे आया हूँ...लेकिन वहाँ लोग बोले हैं कि अपने जिले से इसे रिकमेंड कराकर भी भेजवा दें..और साहब, आपके लिए ही यह मार्क भी हुआ है..साहब, आज इसका अन्तिम दिन है... कर दीजिए साहब" कहने के दौरान उस पुरस्कारांक्षी की बदहवासी भी झलक उठी थी। सही भी है पुरस्कारधर्मा कार्य पुरस्कारार्थी को पुरस्कारों के लिए बदहवास बना देता है। अन्यथा ऐसे कार्य करने का क्या मतलब? इसी बदहवासी में पुरस्कारार्थी "ऊपर" भी बात कर लेता है। 
             मुझे मार्क हुआ है का क्या मतलब!  ऐसे फालतू कामों के लिए हमीं हैं? लेकिन नौकरी की अपनी बाध्यता का ख्याल आते ही अपनी औकात पर उतर आया। सोचा, किसी के पुरस्कार अभ्यर्थना को रिकमेंड करने-कराने में कोई फँसने-फँसाने की बात नहीं है, और फिर सांन्त्वना पुरस्कार भी तो कोई चीज होती है, हो सकता है इसे यही मिलना हो। मैंने कार्यालय सहायक को पत्र टाइप करने के लिए कहा, लेकिन सहायक ने अवगत कराया, 
            "सर, बिजली नहीं है, इन्वर्टर भी बैठ चुका है, बिजली आने पर पुरस्कार हेतु फारवर्डिंग-पत्र बना देंगे।" सुनकर एक बार तो यही मन हुआ कि इन्वर्टर की खराबी के लिए अपने इस सहायक को अभी यहीं इसी वक्त अपुरस्कृत कर दूँ..लेकिन..खैर, छोड़िए इसे।
           अब पुरस्कारार्थी की अधीरता देखते बन रही थी, जैसे पुरस्कार की रेल छूटी जा रही हो कि छूट गई तो बैठने से रह गए। शाम तक बिजली आने की कोई सम्भावना नहीं थी, और आज अन्तिम दिन था। बोला,
     
            "साहब, मजमून दिलवा दें हम नीचे से टाईप कराए दे रहे हैं.."
            "वाह! ये पुरस्कारार्थी जो कर रहे हैं सो तो कर ही रहे हैं कार्यालय की भी समस्या हल किए दे रहे हैं, इन्हें कम से कम सांन्त्वना पुरस्कार तो मिलना ही चाहिए" इन विचारों के साथ मजमून दिलवा दिया और आगे फारवर्डिंग तो लगनी ही थी।
             लेकिन आयाराम की समस्या जैसे अभी भी बरकरार थी, कहने लगे,
            "फारवर्डिंग में असली समस्या तो अब आई है..!"
              मैंने पूँछा, " वो, कैसे?"
             "चार पुरस्कारार्थियों के आवेदनों का कैसे निस्तारण करें? अब आप ही बताइए चाहिए! राष्ट्रीय एकीकरण के निमित्त "गुरु गोविंद सिंह राष्ट्रीय एकता पुरस्कार" चाहिए, और प्रशस्ति-पत्र लगा है "अखिल भारतीय ब्राह्मण सभा का" यहीं नहीं जिला साक्षरता समिति के प्रमाणपत्र में जातिवाद, छुआछूत को जड़ से उखाड़ देने का प्रमाणपत्र दिया गया है...कुल छियाछठ कामों का उल्लेख है जिसमें कविता, भाषण और रैली का आयोजन सम्मिलित है। अब ऐसे किसी महान भारतरत्न को क्या ऐसा कोई छोटा-मोटा पुरस्कार दिलवाया जा सकता है? मैं तो भाई फारवर्ड नहीं कर सकता। मेरा वश चले तो मैं पुरस्कृत होने के लिए किए गए कार्यों की बजाय अपुरस्कृत होने वाले कार्यों के लिए ही अपना रिकमेंडेशन दूँ...क्या मजाक बना रखा है!" आयाराम तल्खी लिए कह गए थे। 
           कुछ क्षण सोचते हुए मैंने भी कहा,
            "ऐसे में तो सभी महान फेसबुकिए भी पुरस्कार के हकदार होंगे..यहाँ तो फोटुओं की भी कोई कमी नहीं इनके सामने तो ये आवेदक ठहर भी नहीं पाएंगे...ऐसा करिए आयाराम जी! आप सभी पुरस्कारार्थियों की पत्रावलियों के प्रमाणपत्रों को व्यक्तिगत काम बताकर लिख मारिए और ऐसे ही सभी आवेदनों को निस्तारित करते हुए भविष्य के लिए अपनी टिप्पणी भी कर दीजिए कि "पुरस्कारों के लिए, अपने पुरस्कारधर्मा (पुरस्कारांक्षा में किए गए) कार्यो के बजाय अपुरस्कृत होने लायक कार्यों पर ही आवेदन प्रस्तुत करें"
              लेकिन तब तक आयाराम जी जा चुके थे। 
              वाकई! पुरस्कारार्थी भी बड़े कलाकार होते हैं, और कोई भी पुरस्कार कलाकारी से ही हासिल किया जा सकता है। लेकिन आज के बेरोजगारी के जमाने में ऐसी कलाकारी भी करनी पड़ती है। यही पुरस्कारार्थियों की बेचारगी है। मुझे तो लगता है, ऐसे लोगों को पुरस्कार अवश्य मिलना चाहिए, और यही नहीं, एक पुरस्कार इस बात पर भी मिलना चाहिए कि पुरस्कारार्थी ने कितनी बड़ी कलाकारी से पुरस्कार हेतु अपनी अभ्यर्थना प्रस्तुत की है...वाकई! बेचारों बेरोजगारों का, सारा दुख-दलिद्दर दूर हो जाएगा। ये लोग तब तक पुरस्कार भी वापस नहीं करेंगे जब तक इन पुरस्कृतों को और बड़े पुरस्कार की आशा न हो। 
           यह तो हुई फारवर्डिंग और रिकमेंडेशन की बात, जरा सोचिए, पुरस्कार-चयन-समिति कैसे काम करती होगी..! यही सोच, अब किसी पुरस्कृत व्यक्ति के लिए पुरस्कार वापसी गैंग का सदस्य बनना हमें जायज़ लगने लगा है क्योंकि यह गैंग, किसी विरोधी गैंग के विरुद्ध होता है। हाँ, एक बात है पुरस्कार-वापसी-गैंग के सभी सदस्य फारवर्डिंग या रिकमेंडेशन की वजह से पुरस्कृत नहीं हुए होते बल्कि यह भी गैंगगीरी का ही नतीजा होती है। मतलब, पुरस्कृत होना गैंगगीरी का नतीजा है। 
           आयाराम तो गयाराम हो गए..अब #चलते-चलते यहाँ एक बात मैं कहना चाहता हूँ, वह कि, 
           पुरस्कारों से पेट भरता है... बस शर्त यही है कि पुरस्कारों के लिए ही काम करें...." और.. पुरस्कारों के लिए रिकमेंडेशन और फारवर्डिंग उन्हीं का किया जाता है जिनके पेट भरे हों या फिर जो पुरस्कारों के लिए ही काम करते हों..."दुईजी अम्मा" ने पुरस्कारों के लिए काम नहीं किया होगा, इसीलिए वो आज भी भूँखी हैं.
             --Vinay 
            #दिनचर्या 19/29.9.16

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

बतकही

            लंच के लिए आवास पर आया था। आते ही श्रीमती जी से यह कह विस्तर पर लेट गया कि आज कुछ ज्यादा ही थकान है। इस पर उन्होंने कहा कि खाना खाकर कुछ देर आराम करके तब जाना। खैर.. 

              मैं अभी खाना खाया ही था कि आफिस से फोन आ गया, अब मुझे तुरन्त जाना था। मैंने यह बात श्रीमती को बताई कि मुझे तुरन्त जाना है। वे कहने लगी,

    

             "थोड़ी देर आराम कर लो तब जाओ" इस पर मैंने काम की दुहाई दी और कहा, "नहीं, अभी जाना पडे़गा।" 

               अब वह बोल पड़ी, "देखिए..नौकरी कोई एक दिन की नहीं है..अभी बहुत दिन नौकरी करनी है...यह तो रोज-रोज का काम है..ऐसा तो लगा ही रहता है...आप बहुत जल्दी परेशान हो उठते हो।"

               पत्नी की इस बात पर मैं तुरन्त बोल पड़ा, "देखो..मुझे, नौकरी कैसे करनी है, यह मुझे, तुम नहीं बताओगी..और फिर मेरे सरकारी कार्य करने पर तुम नियंत्रण नहीं कर सकती.."

                मैं अभी यह कहते हुए चुप ही हुआ था कि श्रीमती जी तपाक से कह उठी, "सुनिए, मैं तुम्हारे सरकारी कार्य करने पर नहीं, तुम्हारे दिमाग पर नियंत्रण कर रही हूँ।" 

                मैं भौंचक सा उन्हें निहारने लगा...मेरी यह कहने की हिम्मत नहीं हुई कि कोई कैसे मेरे दिमाग को नियंत्रित कर सकता है... चुप्पी ओढ़ लिया...सोचा..इनसे पार पाना कठिन है...! 

                --Vinay 
                  15.6.16

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

ये खिस्स से हँस कर चल देने वाले लोग

             उस दिन रेलवे-क्रासिंग बन्द मिली। क्रासिंग खुलने के इन्तजार में मैंने भी कई गाड़ियों के पीछे कार रोक दी क्योंकि न तो हवा में उड़कर जा सकता था और न ही अपनी आजादी को खतरे में डाल क्रासिंग पार कर सकता था। यहाँ कहने का यह मतलब नहीं कि बन्द क्रासिंग पर रुक कर मैंने क्रासिंग के ऊपर कोई एहसान किया हो, बल्कि इस बन्द क्रासिंग ने मुझे रोककर किसी खतरे से बचाने के लिए इसने मुझ पर ही एहसान किया.! बेचारी यह बन्द क्रासिंग मेरी आजादी को मेरे लिए ही सुरक्षित रखना चाह रही थी। एक बात है, और वह यह कि अगर कहीं किसी रास्ते पर रेलवे टाइप क्रासिंग बन्द मिले तो इसका यह मतलब नहीं कि आपकी आजादी पर कोई ब्रेक लगा है, इससे तो आपकी और रेलवे दोनों की आजादी सुरक्षित रहती है! खैर...
        
               मुझे रुकते देख एक पाँच-छह साल का उलझे, भूरे बालों वाला लड़का हमारी ओर आता दिखाई दिया। वह थोड़ी दाग-धब्बे वाली मैली सी नीली शर्ट पहने हुए था। शायद यह शर्ट सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों के स्कूल-ड्रेस जैसी ही थी, हो सकता है किसी सरकारी स्कूल में पढ़ता भी हो। जैसे ही कार के पास आकर उसने कार के बन्द खिड़की के शीशे पर ठक-ठक किया मैंने शीशा नीचे सरका दिया, कुछ बोलता उसके पहले ही वह मेरी ओर हाथ बढ़ा कर बोल पड़ा था, "बाबू जी...!" एकटक सी मेरी नजर उसके चेहरे पर जम गई, जैसे मैं उसका चेहरा पढ़ रहा होऊँ। मैंने समझा वह मुझसे अपनी कोई आजादी माँग रहा है, फिर मैं कौन होता हूँ इसे आजादी देनेवाला..! यही सोचकर मैंने उससे पूँछा, "तुम्हारे माँ-बाप हैं?" नहीं के अंदाज में सिर हिलाते हुए बोला, "नहीं"। मैंने फिर पूँछा, "तो, तुम किसके साथ रहते हो?" "भाई के साथ" लड़के ने कहा और बताया कि भाई उससे बड़ा है। "अच्छा! तुम भीख क्यों माँग रहे हो?" मैंने पूँछा। इसके जवाब में उस लड़के ने कहा कि वह टाफी खाने के लिए भीख माँग रहा है! मैं थोड़ा चौंका और उससे फिर उसके माँ-बाप के बारे में पूँछा लेकिन उसने अपना वही पहले वाला उत्तर दुहराया।
           
              उत्तर से असंतुष्ट मैंने उससे पूँछा," आखिर तुम यहाँ कैसे आए! तुम्हें कौन पकड़ कर लाया?" वह मेरी ओर देखने लगा था। मैंने उससे अपना प्रश्न पुनः दुहराया, "हाँ..हाँ, बताओ तुम्हें यहाँ कौन पकड़ कर लाया है।"  इस बार उसने मेरे प्रश्न "कौन पकड़ कर लाया" को जैसे पकड़ लिया और खिस्स से हँस दिया फिर बिना कोई उत्तर दिए हँसते हुए ही दूसरी कार की ओर भाग गया। उस लड़के की इस प्रतिक्रिया पर मैं मन ही मन हँस पड़ा। हालाँकि वह भागा न होता तो उसे टाफी खाने के पैसे अवश्य देता। खैर, मैंने उसके साथ नत्थी उसकी आजादी को भी उसी के साथ जाते देखा।
           
              इसके बाद मैंने देखा, मेरे पीछे आनेवाली कुछ कारें विपरीत दिशा से आनेवाले वाहनों के लेन में क्रासिंग के पास जाकर खड़ी हो गई ! मतलब जैसे ही क्रासिंग खुले दूसरों की आजादी को धकियाते हुए अपनीवाली आजादी के साथ रफूचक्कर हो ले।
          
          ध्यान आया आजकल आजादी की मांग बहुत जोर पकड़ रही है, जैसे; अपनीवाली, इसकीवाली, उसकीवाली, ऐसीवाली, तैसीवाली, वैसीवाली, सबकी वाली आदि-आदि न जाने कौनसीवाली और कितनीवाली आजादी चाहिए..! आजादी की उठती इस जबर्दस्त माँग को देख सुनकर मुझे अब आश्चर्य होने लगा है। आश्चर्य क्या, बल्कि दिमाग भन्नाया हुआ सा है। याद आया पन्द्रह अगस्त सन सैंतालिस को तो अंग्रेजों ने बकायदा पैंतीस करोड़ भारतवासियों के लिए आजादी की लोडिंग कर मय रवन्ना भारतवासियों के हाथों सौंप दिया था और फिर हमारे पुरनियों ने भी छब्बीस जनवरी बावन को बकायदा इस आजादी को अपने पैंतीस करोड़ देशवासियों के बीच बाँट दिया था तो फिर समस्या कहाँ से आई कि आज जहाँ देखो वहीं से आजादी की माँग हलकान किए हुए है?
           
             वास्तव में आजादी मिली भी और बँटी भी। कम से कम आजादी की कालाबाजारी कर किसी स्विस अकाउंट में तो नहीं ही रखा गया है। भारत की जनता ही पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को धूम-धड़के एवं हर्षोल्लास के साथ मनाकर इस बात को सिद्ध करती है। रहा-सहा सन्देह तब जाता रहता है जब हम आज के अपने नेता को एक सौ पच्चीस करोड़ देशवासियों के लिए चिन्तित होते हुए देखते हैं। भला ऐसे में कोई क्यों किसी के हिस्से की आजादी स्विस बैंक में रखेगा? तो इससे सिद्ध होता है कि जितनी मात्रा में अंग्रेजों से हमें आजादी मिली थी कुल का कुल देशवासियों के बीच बँटा था। फिर समस्या कहाँ है.. यह आजादी का माँग क्यों उठी? सिर खुजलाते हुए मैंने इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर खोजने लगा।
              
                देखा! सिर खुजलाने से क्या होता है? अरे भाई, समस्या का उत्तर मिल जाता है, और क्या होता है! हाँ, अंग्रेजों ने तो पसंद नापसंद के आधार पर मात्र पैंतीस करोड़ भारतवासियों के लिए ही आजादी हैंडओवर किया था तब उन्हें क्या पता था कि हम एक सौ पच्चीस करोड़ हो जाएँगे! इसी कारण आज आजादी का माल कम पड़ गया है। निश्चित है! पैंतीस भर की चीज एक सौ पच्चीस के लिए पूरा नहीं पड़ेगी। फिर तो यह होना ही था; एक-दूसरे से इसकी छीना-झपटी! इस छीना-झपटी में बेचारी यह आजादी तार-तार हुई। यहीं से शुरू होता है अपने-अपने ब्रांड के अनुसार वैरायटीवाली आजादी की माँग! जैसे, अपनी, इनकी,उनकी, ऐसी, तैसी, जैसी, वैसी आदि वाली आजादी।  एक सौ पच्चीस करोड़ देशवासियों के माई-बाप संविधान के पास भी लगता है इतनी वैरायटी की आजादी, देने के लिए नहीं है।
        
                आज अगर अम्बेडकर जी मिल जाएँ तो उनका टेंटुआ दबा कर पूँछें कि "बडे़ आए संविधान निर्माता बनने! एक अदद आजादी की फैक्टरी कि विधि तो बता नहीं पाए बस फालतू एक किताब में उलझा कर चले गए...अगर आजादी-उत्पादन विधि बताई होती तो कम से कम आज देशवासियों को आजादी की इतनी किल्लत न हो रही होती..! कम से कम आजादी की फैक्टरी तो लोग लगा लेते! और आजादी उत्पादन में रोजगार भी मिलता" खैर, अब कुछ नहीं हो सकता, अब तो इतनी ही आजादी में काम चलाना होगा। हाँ, मेरे प्यारे सवा सौ करोड़ देशवासियों!
         
             लेकिन निराश होने की भी जरूरत नहीं है, अभी लंदन की किसी संस्था ने बताया है कि "आबादी से ज्यादा अहमियत इस बात में है कि कैसे आप संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं।" लो मिल गया न हल यह भी वही अंग्रेज ही बता रहे हैं। हमें आजादी जैसे संसाधन के इस्तेमाल के तरीके भी उन्हीं अंग्रेजों से सीखना चाहिए। यहाँ मेरा अपना यह भी सुझाव है, क्योंकि हम एक गरीब देश के वासी हैं, न हो तो हमें आजादी-बैंक बना लेना चाहिए। बहुत लालच न कर जरूरत भर की आजादी लेकर शेष इसी बैंक में जमा कर देना चाहिए, फिर तो सबका काम चल पड़ेगा।
         
             वैसे भी महात्मा गांधी ने कहा था "धरती पर सबकी जरूरत भर का सामान है, मगर सबके लालच को पूरा करने लायक नही"।  हाँ, गाँधी जी की इस बात से हम सीख ले सकते हैं क्योंकि तब हमें अंग्रेजों से जरूरत भर की आजादी तो मिल ही गई थी। मतलब हमारे देश की सरजमीं पर आज भी अँग्रेजों की दी हुई इतनी आजादी मौजूद है कि पैंतीस में ही एक सौ पच्चीस का काम चल सकता है। बशर्ते, हम अपनी आजादी की लालच पर कंट्रोल रखें! तो भाई आजादी की माँग की समस्या का हल हो गया। मतलब हमें आजादी का लालच कम करना होगा।
              तो क्या ये आजादी की माँग करने वाले लालची हैं? लेकिन क्या पता?
          
            जैसे, अब वही बच्चा जो स्कूल ड्रेस में था शायद स्कूल जाता भी रहा हो, उसके माँ-बाप भी रहे हों जो उसके टाफी खाने की इच्छा पूरी न कर रहे हों। उसने शौकिया अन्दाज में टाफी खाने के लिए मुझसे भीख माँगी हो। उसी तरह हमारा संविधान शौकिया आजादी माँगने वालों का शौक पूरा नहीं कर पा रहा है। जे. एन. यू. टाइप आजादी की माँग करने वाले छात्र या ऐसे ही अन्य लोग अपने किसी शौक को पूरा करने के लिए शौकिया आजादी माँगने वाले लोग हैं। जिनसे ज्यादा पूँछ-ताछ होगी तो खिस्स से हँस कर निकल लेंगे..! जैसे रेलवे-क्रासिंग पर टाफी खाने के लालच में शौकिया भीख माँगता वह बच्चा मेरे द्वारा ज्यादा पूँछ-ताछ करने पर खिस्स से हँस कर चला गया था। इन पर विश्वास न करें। 

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

डालर-ग्रह

              आज अखबार के किसी कोने पर मैंने किसी "मून एक्सप्रेस" के संस्थापक की बात पढ़ी कि चांद पर खरबों डॉलर का प्लेटिनम और हीलियम 3 मौजूद है। पढ़ते ही मेरा दिमाग सुन्न हो गया! सोचने लगा चन्द्रमा पर और कौन-कौन से तत्व होंगे? आखिर जब ये चीजें मिली तो क्या सोना-चांदी का भंडार नहीं होगा..? निश्चित होगा और वह भी खरबों डॉलर से कम का नहीं होगा। ऐसे ही अन्य तत्वों के भी छिटपुट भंडार होंगे और फिर तो पूरा मामला खरबों डालर का नहीं बल्कि शंख-पद्म डॉलर का बनता है..!
          
              मैं तो कहता हूँ...अब तय करने का समय आ गया है कि पहले चन्द्रमा को खोद कर अरबों डॉलर बनाया जाए या फिर पृथ्वी की ही खुदाई चलती रहे? वैसे एक बात है...आज डॉलर के जमाने में सब चाँदी काटना चाहते हैं, इस चक्कर में पूत और पड़ोसी का भी मतलब नहीं रह जाता। ऐसे ही नहीं एक बार एक साहब ने मुझसे कहा था, "अरे! कुछ कमा-धमा लो नहीं तो कोई पूँछेगा नहीं!" मैंने तब यही सोचा था कि यह अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में मुझसे ऐसा बोल गया है और तब उसकी बात बुरी लगी थी। लेकिन, आज सोचता हूँ उन साहब की बात तो ठीक ही थी, अगर अंटी में माल है तो हजार गणेश-परिक्रमा करने वाले बैठे हैं! आखिर, अमेरिका का डालर चाँद पर भी ऐसे ही नहीं झलक गया।
           
             वैसे पड़ोसियों के बीच आजकल कैसा रिश्ता है? भारत-पाकिस्तान को तो आप देख ही रहे हैं..बेचारे हमारे गृहमंत्री बिना खाए-पिए वहाँ से चले आए। मतलब साफ है, छोटे अकसर खुरपेंची होते हैं...माफ करिएगा हो सकता है कोई अपवाद भी मिल जाए..हाँ तो, चन्द्रमा भी तो पृथ्वी का पड़ोसी है और छोटा भी! क्या पता पृथ्वी से अपने टूटने की पूरी खुन्नस यह चांद पृथ्वी को कभी भी टक्कर मारकर पूरी कर ले..? वैसे भी फला धूमकेतु या फला चीज के टकराने का भय अकसर सुनाई ही देता रहता है..! और अगर कहीं चन्द्रमा ने अपनी खुन्नस निकाली तो हम पृथ्वीवासी भी गए काम से! ठीक है कि अभी चन्द्रमा हमारी पृथ्वी की गणेश परिक्रमा करता है, लेकिन यहाँ यह कोई मैटर नहीं है, मैटर तो खरबों डालर का है, बात गणेश-परिक्रमा से नहीं बनती..बात बनेगी तो खरबों डालर से, और चाँद पर चाँदी काटने से..! डालर के प्रताप से चांद जैसी गणेश-परिक्रमा करने वाले न जाने कितने उपग्रह से हम पृथ्वीवासी गगन पाट देंगे..चन्द्रमा की गणेश-परिक्रमा से पिघलने की जरूरत नहीं।
        
           मेरे धरतीवासियों! चांद पर खरबों डॉलर के माल को लावारिस छोड़ना उचित नहीं है। तो, पृथ्वीवासियों! पृथ्वी की खुदाई छोड़कर चाँद की खुदाई में जुट जाओ, कहीं ऐसा न हो कि खरबों डालर के इस माल की चकाचौंध से प्रभावित कोई एलियन इसे न ले उड़े? वैसे भी एक दिन कहीं पढ़ा था कि ग्रहीय जीव के रूप में मानव का विकास अभी उतना नहीं हो पाया है जितना कि अन्तरिक्ष में अन्य ग्रहों पर हुआ होगा..! हाँ तो देर करने की अावश्यकता अब नहीं, डालर खोजो और अपना विकास करो...फिर तो...क्या चांद, क्या मंगल, और अगर इसके आगे कोशिश करोगे तो कहीं तुम्हें सोने, चांदी, प्लेटिनम के विशुद्ध ग्रह भी न मिल जाए...अनन्त की संख्या में डालर..! फिर तो डालर ही डालर !! 
        
            अब इतने डालरों का तुम करोगे क्या? अरे बुद्धू इंसानों इतनी भी बात नहीं समझते? इन डालरों से अपने लिए पृथ्वी से भी बड़ा एक डालर-ग्रह बना डालो वैसे भी तुम्हारी जनसंख्या बढ़ती जा रही है...और धरती पर का सारा माल भी खोदना है.. ऐसे में धरती पर रहते हुए यह पूरी तरह सम्भव नहीं हो पाएगा...! सीधी सी बात है, अपने नवीन डालर-ग्रह पर बैठ धरती को खोदो, और और डालर इकट्ठा करो...अपने डालर-ग्रह पर आराम से निवास करो!! ब्लैकहोल भी आप का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा...आखिर यह भी आपके लिए डालर रखने के काम ही तो आएगा!!! अद्भुत सारा ब्रह्मांड डालरमय...

"बेवकूफी का सौन्दर्य" - अनूप शुक्ल

              वैसे साहित्यकारिता धता बताने का ही काम है, मतलब हम जो हैं, जो नहीं हैं उसे अच्छी तरह कहने का काम है। व्यंग्यकार कौन कहाँ धता बता रहा है इसे बखूबी परख लेता है। अपने एक आदरणीय रिश्तेदार की बातों को परखने और साथ ही इनपर उनकी चुटकी लेने की आदत से मैं बचपन मे ही परिचित हो गया था। तभी से व्यंग्य को कुछ-कुछ समझने की मैं कोशिश करने लगा था हलांकि व्यंग्य के साहित्यशास्त्र का मैंने कोई अध्ययन नहीं किया और किसी व्यंग्य लेखन पर मेरी कोई टिप्पणी एक पाठक की हैसियत से ही हो सकती है, कोई शास्त्रीय व्याख्या नहीं। 
   
             हाँ, एक बात है, व्यंग्यकार साफ हृदय का होता है और धता बताने वालों को वह असानी से पहचान लेता है, इस बात को मैंने अपने उन रिश्तेदार को देख कर ही जाना था। उन्हें चीजों को बिना किसी लाग-लपेट के स्वीकार करते हुए देखा था। खैर..भूमिका पूरी हुई...

            मेरे एक फेसबुक मित्र श्री अनूप शुक्ल जी हैं, जिनसे फेसबुक पर ही सही मैं सौभाग्यवश उनसे जुड़ा हूँ और उनकी सारी पोस्टों को पढ़ता रहा हूँ। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर जुड़े रहने की प्रेरणा उन्हीं से ग्रहण करता हूँ। उनकी हाल ही में एक व्यंग्य रचना "बेवकूफी का सौन्दर्य" पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई है ; जिसे पढ़ने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। हाँ, इसी व्यंग्य रचना पर एक पाठक की हैसियत से कुछ लिखना चाहता हूँ।
       
              "बेवकूफी का सौन्दर्य" को मैंने ठहकर ध्यान से पढ़ने की कोशिश की और पहली बार मैंने किसी व्यंग्य रचना को इतनी शिद्दत से पढ़ा बिलकुल इसकी भूमिका के लेखक श्री आलोक पुराणिक के कथनानुसार व्यंग्य के विद्यार्थी की तरह। वास्तव में इस पुस्तक को पढ़ते हुए मैं परत दर परत व्यंग्य विधा से परिचित होता रहा और मुझे अहसास हुआ कि व्यंग्यकार प्रत्येक धता बताने वाली चीज को पहचान लेता है। मतलब यही कि साहित्य में व्यंग्य की शैली चीजों को उलट-पुलट कर देखने-समझने की विधा है। इस तथ्य का ज्ञान पुस्तक के व्यंग्य "बोरियत जो न कराए" पढ़कर हुआ। ऐसे में व्यंग्यकार की नजरों से कोई चीज छिपती नहीं। परिणामतः शुक्ल जी को कोई धता बता भी नहीं सकता और अगर आप ने इसकी तनिक भी गुस्ताखी की तो झट से इनके व्यंग्य का एक जोरदार डंडा पड़ चुका होता है। 
      
                 वास्तव में श्री शुक्ल जी दृष्टि प्रदान करने वाले तथा "महानता" के घोषित तत्वों को भी कुशलता से कठघरे में खड़ा कर देने वाले व्यंग्यकार हैं; मतलब वे विसंगतियों पर प्रहार ही नहीं करते बल्कि अपने व्यंग्य में राह भी दिखाते हैं, जैसे "अरे भाई। दिमाग को संसद में मत बदलो। जरा तमीज से पेश आओ।" इसीप्रकार "बुजुर्गों को अपने नाती-पोतों को खिलाने का शौक बहुत रहता है। इसी बहाने घर में टिके भी रहते हैं।" या "चुनाव भावुकता से नहीं लड़े जाते बच्चा।घोषणापत्र में भावुकता दिखेगी तो जनता समझेगी ये कवि लोग हैं। राजनेता नहीं हैं।...घोषणापत्र ललित निबंध सरीखा होना चाहिए जो पढ़ने में मनभावन होना चाहिए। भले ही उसका मतलब कुछ न निकले।" व्यंग्यकार यहाँ कुछ कहते हुए भी जान पड़ता है, जहाँ तमाम भावार्थों से संघनित ऐसी पंक्तियों के पिघलने पर व्यंग्य कई स्तरों पर बहता हुआ दिखाई देने लगता है, जहाँ विद्रूप व्यवस्था पर चोट तो होती ही है अन्तर्धारा के रूप में व्यंग्यकार की करुणा भी झलक उठती है। जैसे "बुजुर्गों" वाली बात मेँ या "फटाफट क्रिकेट में चीयरबालाओं की स्थिति" में आया यह व्यंग्य-कथन दृष्टव्य है "बहुत कम कपड़े पहनती है। इतने कम कि वे अगर खूबसूरत न हों और उनके पहने कपड़े गंदे हों तो देश की आम जनता सी लगी"।
                 
               अभी तक अन्य लेखकों के जो भी छिटपुट व्यंग्य पढ़ा वहाँ मुझे लगा कि व्यंग्यकार किसी विशेष "थीम" पर चलते हैं, जैसे किसी खास बात को सूत्र-रूप में पकड़कर उसी पर केंद्रित हो जाते हैं और यहाँ व्यंग्यकार का व्यंग्य-विषय तुरत-फुरत समझ में आ जाता है जो भरी सभा में किसी को चिढ़ाने जैसा ही होता है, जहाँ चिढ़नेवाला भी आसानी से प्रतिउत्तर देने हेतु तत्पर हो उठता है। लेकिन "बेवकूफी का सौन्दर्य" में आए व्यंग्य सुननेवाले को आत्ममंथन के लिए सोचने पर विवश करता है। यहाँ व्यंग्य किसी बात को सूत्र-रूप में पकड़कर चलता हुआ दिखाई नहीं देता और लट्ठमलट्ठ की बात भी नहीं होती बल्कि इनके व्यंग्य की आधारभूमि में फैलाव होता जाता है, जैसे टार्च की रोशनी में सलीके से और भी चीजें दिख जाती हैं। "आनलाइन कविता स्कूल" व्यंग्य से इस तथ्य को समझा जा सकता है। लेकिन कहीं-कहीं व्यंग्यकार आवश्यकता पड़ने पर सीधे व्यंग्य पर उतर आता है, जैसे, "आइए घाटा पूरा करे"। इसीप्रकार "जाम के व्यावहारिक उपयोग के बहाने" व्यंग्यकार किसी समस्या पर सरकारी-तंत्र और समस्या के प्रति हमारे दृष्टिकोण की पोल खोल देता है।
     
              वैसे व्यंग्य गुस्सा, हास्य और करुणा जैसे भाव को अन्तर्धारा के रूप में लेकर चलता है, लेकिन यहाँ हास्य जोकरों वाला नहीं होता बल्कि हँसी-हँसी में कुछ कह जाने वाला हास्य होता है, असल में यहाँ आया हास्य गुस्से को संतुलित करते दिखाई देता है जबकि करुणा जैसा भाव सुनने वाले को संजीदा कर जाता है। "बेवकूफी का सौन्दर्य" में ये सभी तत्व दिखाई देते हैं। व्यंग्यकार के गुस्से को मैंने "देश सेवा का ठेका" में "चल बे मेरे प्यारे देश। इस तरफ चल। उधर नहीं बे इधर। तेरी सेवा का ठेका हमें मिला है। तुझे हमारी मर्जी से चलना पड़ेगा। समझ गया न।" में बखूबी एहसास किया। इस कथन से मैं सिद्ध कर सकता हूँ कि श्री शुक्ल जी गुस्सा, हास्य और करुणा के संविलयन से उपजे क्षोभ से प्रेरित व्यंग्यकार हैं। वैसे "बायें थूकिये" से तो हँसी ही फूट पड़ती है, या "बेटा विमोचन में फंसा हूं। जैसे ही विमोचन हटा घर आता हूं।" यहाँ व्यंग्यकार गुदगुदाते हुए अपने विनोदी स्वभाव से भी परिचित कराता है।
       
               "बेवकूफी का सौन्दर्य" की व्यंग्य-रचनाओं में बहुत सुलझी हुई दृष्टि का इस्तेमाल किया गया है। "जनसेवा का जोखिम" पढ़ते हुए यह बात प्रमाणित होती है कि किसी बात के पक्ष में लिख देना भी आधुनिक युग में एक व्यंग्य-विधा है। इनकी सुलझी हुई इस व्यंग्य-शैली में प्रयुक्त भाषा का भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि व्यंग्य में किसी बात की व्याख्या नहीं होती बल्कि व्यंग्य एक कथन है, जो अपने पाठक में व्यंग्य-कथनों के प्रति रुचि जगाती बात करते हुए चलती है। व्यंग्य की चोट के प्रभाव का एहसास उसकी भाषा में ही छिपा होता है। यहाँ व्यंग्य-लेखक इस भाषा में सिद्धहस्त है। हम जैसे व्यंग्य के नए पाठकों को भाषा ही व्यंग्य के चुटीलेपन का एहसास कराती है। जैसे, "अरे यार देओ चाहे जो कुछ लेकिन लिखो लैपटॉपै।" व्यंग्यकार ने अपने व्यंग्यों में आम बोलचाल की भाषा को सहज-शैली में अपनाया है।
      
               इसप्रकार "बेवकूफी का सौन्दर्य" समग्र रूप से व्यंग्य का सौन्दर्य है, जिसमें व्यंग्य के सभी तत्व परिलक्षित होते हैं। व्यंग्य की खोज में भटक रहे किसी पाठक के लिए यह एक बेहतर किताब है। आज की इस व्यवस्थात्मक जटिलता में किसी व्यंग्य को समझने के लिए उस व्यवस्था को भी समझना बहुत जरूरी होता है जिस पर तंज कसा गया हो। "बेवकूफी का सौन्दर्य" कुछ ऐसे ही जटिल समस्याओं पर प्रहार करती है, जिसकी रोचकता पाठक की समझ पर निर्भर करती है। वैसे भी व्यंग्य जब धीरे-धीरे साहित्य बनने की ओर उन्मुख होता है तो उसमें मंचीय हास्य जैसी रोचकता खोजना व्यर्थ की कवायद है। अतः इस पुस्तक में सम्मिलित व्यंग्य की रोचकता इसके विषय-वस्तु की गंभीरता की समझ में निहित है, मतलब यहाँ आए व्यंग्यों की रोचकता इसके विषय-वस्तु की गंभीरता और पाठक में इसकी समझ के समानुपाती है।
       
                अंत में इस किताब का नाम "बेवकूफी का सौन्दर्य" है, जो व्यंग्य का अनेकांतवादी शास्त्र है, यहाँ व्यंग्य का लोकतंत्र है, जहाँ कोई भी बात किसी भी ढंग से कह देने की स्वतंत्रता है, इसलिए व्यंग्य-स्कूल के मुझ प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थी को इतनी बातें कहने की हिम्मत हुई।
                                                                                              -विनय कुमार तिवारी