जब किसी जघन्य अपराध की खबर हम सुनते हैं, तो उबल पड़ते हैं। लेकिन शायद यह नहीं देख पाते कि हमारे आसपास रोजमर्रा के जीवन में बिखरे छोटे-छोटे अँधेरे ही मिलकर अंतहीन लगने वाले घुप्प अँधेरे का पर्दा खड़ा करते हैं, जिसकी ओट में जघन्यतम अपराध संभव होते हैं और जिसके पीछे किसी पीड़ित की आवाजें अनसुनी रह जाती हैं उसकी पीड़ा दिखाई नहीं पड़ती।
चारों ओर दाँव-पेंच हैं। और सिस्टम के न्याय में ‘विवेक’ का इस्तेमाल भी कई बार एक आम आदमी के लिए किसी अंतहीन अँधेरे के बियाबान में खो जाने से कम नहीं होता। क्योंकि अकसर यही विवेक इस दाँव-पेंच से अपवित्र गठबंधन कर बैठता है। और न्याय की गली न जाने कहाँ खो जाती है।
और समाज?
वह भी धीरे-धीरे इस घुप अँधेरे में देखने का अभ्यस्त होता चला जाता है। फिर उसे भी लगने लगता है, सब चलता है। फिर तो, गलत और सही के बीच की रेखा भी धीरे-धीरे धुँधली होती चली जाती है।
इसे यूँ समझिए। दाँव-पेंच के मर्मज्ञ लोग इसी अँधेरे का लाभ उठाकर किसी के हिस्से की जमीन तक निगल जाते हैं, और पीड़ित, हृदय में न्याय की एक धुँधली-सी उम्मीद सँजोए, तारीखों के मकड़जाल में उलझता चला जाता है, और यह अँधेरा अंततः उसे निगल लेता है।
चारों ओर यही परिदृश्य है।
है कोई ऐसा, जो उस आम आदमी को थामकर उसे इस अँधेरे से बाहर निकाल दे?
नहीं..
शायद इसीलिए अँधेरा इतना घना है।
यह समाज भी तो अजीब है, सब कुछ सिस्टम के हवाले करके तमाम छल-छद्म और क्रूरताओं से जैसे इसने मुँह मोड़ लिया है। बल्कि समाज ने रोशनी पर उन्हीं का जायज अधिकार मान लिया है जिन्होंने ऐसे तमाम छल-छद्म और क्रूरताओं के अँधेरे रास्ते से ही चलकर धन-बल जुटाया है।
और यह सिस्टम?
वह भी करे तो क्या करे। ये अँधेरे रास्ते भी घूम-फिरकर अंततः उसी की डेहरी पर चली आती हैं। फिर जाने कैसा संयोग है कि वहाँ भी रोशनी का रास्ता अकसर उन्हीं लोगों के लिए खुलता है, जिन्हें अँधेरे में चलने का हुनर मालूम है। बाकी लोग इस डेहरी पर खड़े होकर आशाभरी नजरों से ताकते रह जाते हैं, उन्हें कोई राह दिखाई नहीं देती।
कहते हैं महानगरों की जगमगाहट वाली रोशनी के नीचे अंडरवर्ल्ड काम करता है, इसीलिए वहाँ आग लगती हैं, बिल्डिंगें गिरती हैं और लोग मरते हैं। यह बड़ी बात नहीं। दूरदराज के इलाकों को छोड़ दीजिए, महानगरों के आसपास के इलाकों में भी यह अँधेरा घना ही होता है।
सुबह का ही वक्त रहा होगा। मैं अभी अपने कार्यालय की कुर्सी पर आकर विराजा ही था कि दरवाजे से पर्दें की ओट से कोई झांकता दिखाई पड़ा। लगा, जैसे वह पहले से ही मेरे आने की प्रतीक्षा कर रहा हो।
मैंने इशारे से उसे अंदर बुलाया।
मेरा संकेत पाते ही सहमा हुआ सा वह अंदर आया और मेज के दूसरी ओर आकर खड़ा हो गया। उसके साथ एक स्त्री भी थी। कपड़ों, चेहरों और शरीर की थकान से दोनों मेहनत-मजदूरी करने वाले लगे।
कुछ पल के लिए मेरे कक्ष में खामोशी छा गई। वे दोनों भी चुपचाप मुझे देख रहे थे।
फिर अचानक उस व्यक्ति ने मेरी ओर एक कागज बढ़ा दिया। मैं उसे पढ़ता, पहले ही वह बोल उठा, "साहब, मेरी दो लड़कियों का नाम परिवार रजिस्टर से काट दिया गया है.. उनका नाम जुड़वा दें साहब!"
मैंने सहज भाव से पूछा, "तुम्हारी लड़कियों का नाम परिवार रजिस्टर से क्यों काटा गया? वह कुछ कहता उससे पहले ही उसके साथ आई स्त्री बोल पड़ी। फिर उसने जो कुछ भी बताया उसे सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। वह स्त्री उन लड़कियों की माँ और मेरे सामने खड़े शिकायती पत्र लेकर आए व्यक्ति की पत्नी थी।
दरअसल वह दंपति महानगर से बहुत दूर किसी भूले-बिसरे इलाके से नहीं आए थे बल्कि उनका गाँव उसी महानगर के आसपास फैले उन पिछड़े क्षेत्रों में था, जहाँ की रोशनी का हिस्सा भी ऐसे महानगरों की जगमगाहट बढ़ाने में ही खर्च हुआ हो।
उस दंपति के चेहरे को देखकर उनके बिना कहे ही उस पिछड़े इलाके की कहानी समझ में आ सकता था।
वे पति-पत्नी ईंट-भट्ठे पर मजदूर थे। उनकी लड़कियों की उम्र तेरह से पंद्रह वर्ष के बीच थी।
ईंट-भट्ठों के आसपास मिट्टी निकालते-निकालते अक्सर बड़े-बड़े गड्ढे बन जाते हैं। कई बार मिट्टी इस तरह निकाल ली जाती है कि जमीन की सीमा पर एक इंच जगह भी नहीं छोड़ी जाती। जिस ईट-भट्ठे पर वे पति-पत्नी काम करते थे वहां भी मेड़ से बिल्कुल सटकर मिट्टी निकाली गई थी, एकदम सीधी और गहरी कटान में। उसी से बने एक गड्ढे में पानी भरा था।
उस दिन दोनों बहनें उसी गड्ढे से सटे मेड़ से होकर जा रहीं थीं। चलते-चलते एक का पैर फिसला और वह सीधे पानी में जा गिरी। उसे डूबता देख दूसरी बहन ने शायद एक क्षण भी नहीं सोचा होगा। वह उसे बचाने के लिए गड्ढे में कूद गई।
फिर दोनों बाहर नहीं आ सकीं। एक बहन को बचाने में दूसरी बहन भी उस पानी में डूब गईं।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई थी।
उन बच्चियों की मृत्यु की तो जैसे किसी को फ़िक्र ही न हुई हो। फ़िक्र हुई भी तो इस बात की कि कहीं उनकी मौत की कीमत न चुकानी पड़ जाए। दंपती का कहना था कि क्षतिपूर्ति से बचने के लिए भट्ठा मालिक ने ग्राम पंचायत अधिकारी से मिलकर परिवार रजिस्टर से उन दोनों बच्चियों के नाम ही कटवा दिए थे।
यह सुनना मेरे लिए हृदय विदारक ही था। यानी जो बच्चियाँ उस गड्ढे से जीवित बाहर नहीं आ सकीं, कागजों से भी उनका अस्तित्व मिटा दिया था। मतलब इस धरती पर वे दोनों लड़कियां आईं ही नहीं थीं।
मैं सामने खड़े उन बच्चियों के माता-पिता का चेहरा देखने लगा था। वे मुझसे कुछ लेने नहीं आए थे। वे तो केवल यह साबित करने आए थे कि उनकी बेटियाँ थीं।
इस संसार में कागजों का खेल बड़ा निराला है। कागज पर खिंची लकीरें ही किसी का अस्तित्व बना या मिटा सकती हैं। लेकिन जब धन और बल किसी कागज की लाइन-दर-लाइन अपनी पहुँच बना लेता है तो फिर ऐसी लाइनों के मायने ही बदल जाते हैं। ऐसी ही पहुँच का प्रयोग कर दबंग तबका सिस्टम की नस-नस में घुस जाता है।
इधर मेरी मुट्ठियाँ अनायास भिंच गईं थीं। मैं गुस्से में था, लेकिन मैं यह भी जानता था मेरा यह गुस्सा किसी परिणाम को प्राप्त नहीं कर पाएगा। कुछ क्षण मैं असहाय-सा उस दंपति की ओर देखता रहा।
न जाने क्यों मुझे एक और दिन की बात याद आई।
उस दिन मैं एक प्राइमरी स्कूल में था। बच्चों के बीच बैठते-बैठते कब उनसे घुल-मिल गया, पता ही नहीं चला। वे बच्चे तो अभावों में पल रहे थे। लेकिन उन बच्चों की चमकती आँखों में मुझे असीम सी क्षमताएं नजर आईं! ऐसे ही एक कक्षा से जब मैं निकलने लगा तो बच्चे खुशी में चिल्लाते हुए तालियाँ बजाने लगे। उनकी खुशी में मैं भी शामिल हो गया था।
आज सोचता हूँ, शायद ये बच्चे बड़े होकर कागज में लिखी लकीरों के पीछे छिपे दाँव-पेंच को पहचान लें और ‘सब चलता है’ जैसे आज के सामाजिक व्याकरण को मानने से इंकार कर दें और जिसे अन्याय केवल तभी न दिखाई दे जब वह जघन्य घटना बनकर अखबारों की सुर्खियां बने।
आखिर यह भी तो सच है कि छोटे-छोटे अँधेरों के विरुद्ध खड़े होने की आदत ही हमें उस घुप्प अँधेरे से लड़ने का साहस और नैतिक बल देती है। क्योंकि छोटे-छोटे अँधेरों से ही तो वह घुप्प अँधेरा बनता है।
वरना, मोमबत्तियाँ तो जलती रहेंगी और उनके नीचे का अँधेरा भी।
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