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रविवार, 10 अप्रैल 2016

हिन्दू धर्म का “रैपर” दुनिया के सभी धर्मों के रैपरों से अधिक “इकोफ्रेंडली” होता है..

         वैसे देखा जाए तो दुनियाँ के सारे धर्मों की भाषा एक है! भाषा माने उद्देश्य..| मतलब दुनिया के सभी धर्म एक ही उद्देश्य की बात करते हैं; घूम-फिर-कर लोक-परलोक तक की चर्या के लिए समान अचार-व्यवहार की ही चर्चा करते हैं| अब ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब सभी धर्मों का उद्देश्य एक सामान है तो फिर विभिन्न धर्मों के बीच विवाद की जड़ कहाँ से आई?
          असल में तीन दिनों का अवकाश यानी एक तरह से खाली समय मुझे मिला है...आज मेरे साथ रहने वाले ‘रामकिशोर’ और ‘देवपाल’ ने तय किया कि यहीं महोबा में ही कलेक्ट्रट के बगल में ‘गोरखगिरी’ पहाड़ पर चलना है, वहाँ पहाड़ पर कोई छोटी-मोटी गुफा और शंकर भगवान् का एक छोटा सा मंदिर भी है...यहाँ के लोग मानते हैं कि ‘गुरु गोरखनाथ’ ने इसी पर्वत की गुफा में कई वर्षों (बारह वर्ष) तक तपस्या भी किया था, इसी कारण इस पर्वत का नाम ‘गोरखगिरी’ पड़ा है...हाँ तो उन दोनों ने ‘राजू’ अर्थात मेरे ड्राइवर साहब को भी बुला लिया था...साथ में यह भी तय हुआ कि वहीँ पहाड़ पर चलकर कुछ खाया-पिया जाएगा..मतलब खाने-पीने का सामान भी साथ लेकर चलना है...
         हम सभी घर से निकल पड़े थे ‘गोरखगिरी पर्वत’ मेरे आवास से बमुश्किल पाँच-छः किलोमीटर की दूरी पर या कहें महोबा नगर के दूसरे छोर पर स्थित है...रामकिशोर ने रास्ते में पड़ने वाले तिवारी लोगों के एक मुहल्ले की गली में ड्राइवर से गाड़ी मोड़ने के लिए कहा..हम गली में घूम कर एक घर के सामने रुके..शायद रामकिशोर जिन ‘तिवारी जी’ से मुझे मिलवाना चाहता था यह घर उन्हीं का था...तिवारी जी घर से निकले और हमारा परस्पर अभिवादन हुआ, फिर वे हमें अपने बैठक-कक्ष में ले गए..इसके पहले देवपाल और रामकिशोर दोनों ने इस परिवार का गुणगान मुझसे किया हुआ था, जैसे- महोबा नगर का आधा हिस्सा ही इनकी जमीन पर बसा हुआ है...पढ़ा-लिखा परिवार है तथा इनके परिवार में विधायक भी हुए हैं...आदि-आदि, तिवारी जी ने हमें अपने खानदान के लोगों के घर भी दिखाते हुए कहा कि सब एक ही परिवार से निकले हैं, और आपस में कोई विवाद भी नहीं है..और अपना पुश्तैनी घर भी दिखाया जो बहुत मोटी दीवारों वाला है, इसमें अलग-अलग दिशाओं में चार दरवाजे भी हैं जो किसी पुरानी हवेली के दरवाजों के अवशेष जैसे दिखते हैं...एक दाऊ तिवारी हैं, जो इसी परिवार के हैं, वे महोबा के सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं, सामजिक या राष्ट्रीय कार्यक्रमों जैसे, पल्स पोलियो अभियान, स्वतंत्रता दिवस आदि के लिए जिलाधिकारी महोबा द्वारा आयोजित बैठकों में वे अवश्य सम्मिलित होते हैं, और बढ़-चढ़कर अपना योगदान भी देते हैं....तिवारी जी ने श्री दाऊ तिवारी का भी घर दिखाया इसके बाद हमने तिवारी जी (श्री ओमप्रकाश तिवारी) के घर पर उनके ही घर का बना शुद्ध खोये का पेड़ा खाया और नमकीन के साथ बढ़िया चाय भी पिया, फिर तिवारी जी भी हमारे साथ ‘गोरखगिरी’ के लिए हो लिए...
         कुछ ही मिनटों में हम ‘गोरखगिरी’ पहाड़ के किनारे पहुँच गए थे...यह पहाड़ हिमालय जैसा ऊँचा तो है नहीं कि पहाड़ की तलहटी में पहुँचने की बात लिखें, फिर भी इतना ऊँचा तो है ही कि सीधी चढ़ाई चढ़ें तो सांस फूलने लगे (ऊँचाई के कारण नहीं चढ़ने की थकावट के कारण)...हमारे ड्राइवर ने गाड़ी थोड़ी ऊँचाई पर ले जाकर ‘शिव-तांडव’ के पास रोकी.. ‘शिव-तांडव’ इस पहाड़ के एक बड़े से पत्थर या कहें खड़ी चट्टान पर ‘तांडव-नृत्य’ की मुद्रा में लगभग पंद्रह फीट ऊँची तराशी गई मूर्ति वाले स्थान को कहते हैं...’ हमने ‘शिव-तांडव’ के दर्शन किए, साथ में तिवारी जी ने बताया कि एक बड़े से पत्थर पर एक ऊभरी हुई आकृति को ही तराश कर इस मूर्ति को आकार दिया गया है...मैंने ध्यान से इस मूर्ति को देखा; मेरे समझ में नहीं आया कि गढ़ने वाले ने इसे भगवान् शंकर का रूप दिया है या मुण्डमाला धारण किये हुए काली माता का..? लेकिन सब ‘शिव-तांडव की मूर्ति कहते हैं, इसलिए हमने भी भगवान् शंकर की मूर्ति मान पुष्प अर्पित करते हुए प्रणाम किया| (चलते समय रामकिशोर ने कुछ गुलाब के फूल रख लिए थे)....
        ‘शिव-तांडव’ के पीछे से ढलानदार रास्ते से इस पहाड़ पर चढ़ना था जहाँ वह गुफा और मंदिर था..हम लोग तेज धूप में महोबा वाली पड रही गर्मी में धीरे-धीरे पहाड़ की ऊंचाई पर स्थित उस गुफा की ओर चढ़ाई वाले रास्ते पर चल रहे थे..सबसे आगे देवपाल हाथ में झोला और पानी की बाल्टी (थर्मस वाली) लिए हुए, उसके पीछे तिवारी जी, फिर मैं और मेरे पीछे रामकिशोर तथा उसके पीछे ड्राइवर राजू...जिस पहाड़ पर हम चढ़ रहे थे उसके बगल में एक और पहाड़ था थोड़ी ऊंचाई पर जाने पर दोनों पहाड़ों के बीच नदी जैसी स्थिति दिखाई दी तिवारी जी ने इसे दिखाते हुए मुझे बताया कि पहले इतनी वर्षा होती थी कि इन पहाड़ों से झरने फूटते रहते थे और इस नाले से सदैव पानी बहता रहता था और फूटते झरनों की आवाजें सुनकर ऐसा लगता था जैसे हम किसी संगीतमय ध्वनियों के बीच में खड़े हों, बचपन में हम यहाँ आकर नहाते थे...इस चिलचिलाती धूप और गर्मी तथा आसपास के पत्ती विहीन छोटे-छोटे पेड़ तथा झाड़ियों को देखते हुए उनकी बातें मुझे स्वप्न सरीखी प्रतीत हुयी, खैर..
        मेरे आगे-आगे चल रहे तिवारी जी ने बताया कि ‘पहले यहाँ तेंदुए और अन्य जंगली जानवर भी विचरण करते थे’ और एक नई जानकारी से परिचित कराते हुए कहा- “अमर शहीद स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद भी इस पहाड़ी की गुफाओं में आकर छिपे थे तथा पिता जी रात के अँधेरे में एक टार्च और लाठी के सहारे उनको यहाँ खाना देने आते थे...जहाँ कुछ और स्वतंत्रता सेनानी भी होते थे...मेरे पिता भी स्वतंत्रता सेनानी थे|” इस नई जानकारी के साथ मैं इस स्थान से अभिभूत था...
        इस चढ़ाई वाले रास्ते पर ग्रेनाईट के बड़े-बड़े चट्टानों के बीच छोटे-छोटे मैदान भी थे जिसपर पेड़ और झाड़ियाँ थी, “निश्चित ही बरसात में यह स्थान काफी हरा-भरा हो जाता होगा” मैंने सोचा| इस पहाड़ पर चढ़ते हुए तिवारी जी ने अपनी उम्र के बारे में बताया कि वह ‘उन्सठ वर्ष (59) के हैं’...कहने का आशय यही था कि इस उम्र में भी वह एक युवा जैसी क्षमता के साथ इस पहाड़ पर चढ़ रहे थे...इसके साथ ही उनके चेहरे पर मुझे थकान का भी कोई चिह्न नहीं दिखाई दिया...मैंने उन्हें बताया कि मैं आप से दस-इग्यारह साल छोटा हूँ (शायद मेरे कहने का आशय यह था कि मैं तो थकने लगा हूँ)
       इस प्रकार ‘शिव-तांडव’ से लगभग चार सौ मीटर की दूरी तय करते हुए पहाड़ की उंचाई पर मंदिर वाले स्थान पर पहुँच गए थे..मंदिर क्या था बस एक बड़े से पत्थर की चट्टान पर टिके एक अन्य विशालकाय पत्थर के बाहर निकले हुए कुछ भाग के नीचे वाला स्थान, हाँ, उसी स्थान को ही मंदिर कहा जाता है...यहाँ किसी मूर्ति का दर्शन नहीं हुआ बल्कि आधार वाले बड़े पत्थर की दीवाल को ही गाढ़े गेरुए रंग से रंगा गया था और उसपर दो चमकती आँखें लगाईं गई थी..मैंने ध्यान से देखा नीचे पत्त्थर की चौकी पर ‘जय भोले बाबा लिखा’ था...निश्चित रूप से वहाँ कोई मूर्ति नहीं थी फिर भी न जाने क्यों हिन्दुओं को ‘मूर्ति-पूजक’ कहकर चिढाया जाता है! ये बेचारे पत्थर में भी जीवन देखते हैं, इसीलिए उसे भी पूजते हैं..धर्म का प्रकृति से ऐसा तादात्म्य...!! (उसके सामने बैठे-बैठे मैं यही सोच रहा था)..मन श्रद्धा से भर गया...फिर रामकिशोर के दिए गुलाब के फूलों को मैंने वहाँ चढ़ाया...इसके बाद उन बड़ी सी चट्टानों की परिक्रमा की..परिक्रमा करते हुए रामकिशोर ने हमें बताया कि ‘साहब उपाध्याय जी जिला विकास अधिकारी थे उन्होंने ही अपने व्यक्तिगत प्रयासों से इस परिक्रमा मार्ग को बनवाया था..मैंने मन ही मन श्री आर. पी. उपाध्याय जी, तत्कालीन जिलाविकास अधिकारी महोबा, जो बेहद धार्मिक प्रकृति के हैं, को धन्यवाद दिया, अन्यथा चट्टानों के बीच से इस स्थान की परिक्रमा करना बहुत दुष्कर होता...
        इसके बाद आपस में टिके बड़े-बड़े दो पत्थरों के नीचे बैठकर सुस्ताते हुए सब ने रामकिशोर के लाये हुए पकौड़ी खाए फिर देवपाल ने हमें पानी पिलाया...तिवारी जी ने बताया कि ‘यादव-संघ’ इस मंदिर और इस स्थान की देखभाल करता है...तभी हमसे पहले से वहाँ उपस्थित दो व्यक्तियों में से एक ने बताया कि “इधर तो कई वर्षों से तो बारिश ही नहीं हो रही है अन्यथा यह स्थान काफी रमणीक और हरा-भरा रहता है..पहले यहाँ ऊपर भी कभी पानी नहीं सूखता था और पत्थरों से पानी झरता रहता था लेकिन अब नीचे से पानी लाना पड़ता है...यहाँ के पेड़ पौधे और झाड़ियों से लोग लकड़ी भी तोड़कर ले जाते है..सूखी लकड़ी तो ठीक है लेकिन हरी टहनियों को भी तोड़ ले जाते हैं, मना करो तो अफसरों से शिकायत करते हैं, और अफसर बोलते हैं कि नाहक ही मना करते हो...हाँ वे भी गरीब ही हैं गैस पर कहाँ खाना बना पायेंगे? यही सोचकर लकडियाँ तोड़ने से अब हम भी मना नहीं करते...” मैंने उस व्यक्ति से उसका नाम भी पूँछा, तो उसने अपना सरनेम ‘यादव’ बताया जो प्रतिदिन इस स्थान की देखभाल करने के लिए दो बार यहाँ आता है..
       आगे उस व्यक्ति ने कहा, “पहले यहाँ तेंदुए भी रहते थे...लेकिन महोबा जिला हो जाने के और यहीं पास में नीचे पुलिस लाइन बन जाने के बाद फिर कभी तेंदुएं दिखाई नहीं दिए..”...इसके आगे देवपाल ने मेरा ज्ञानवर्धन किया- “सर, पुलिस लाइन से आती बंदूकों की आवाजों के कारण तेंदुओं ने इस स्थान को छोड़ दिया..”, “हाँ पुलिस लाइन में चाँदमारी तो होता ही है” मैंने सोचा| इसी के साथ एक विषय पर और चर्चा हुई वह यह कि महोबा जिला बन जाने से भू-माफियाओं को बहुत लाभ हो रहा है..मैंने पूँछा, “वह कैसे?” तो मेरा ज्ञानवर्धन हुआ कि यहाँ माफिया किस्म के लोग औने-पौने दामों में जमीन का कोई टुकड़ा खरीद लेते है, और फिर आसपास की भूमि को, यदि वह सरकारी हुई तो उस पर कब्ज़ा जमा लेते हैं, अन्यथा गरीबों की यदि जमीन होगी तो उन्हें अपनी जमीन छोड़ने के लिए मजबूर कर देते हैं, फिर अपनी जमीन छोड़ शेष अन्य कब्जाए भाग पर प्लाटिंग करते हुए उसे ऊंचे दामों पर बेचते रहते हैं...इसमें उनका करोड़ों का वारा-न्यारा होता रहता है..खैर, “इस चर्चा पर ज्यादा ‘बोल्डनेस’ दिखाने की जरुरत नहीं” मैंने सोचा|
     हाँ, इसप्रकार कुछ समय बिताने के बाद हम वापस लौट पड़े..लौटते हुए मैंने देखा एक लड़का पेड़ों से लकडियाँ तो तोड़ रहा था..एकबार मन हुआ कि उससे कह दें देखो हरी टहनियों को मत तोडना लेकिन फिर नहीं कहा...कुछ आगे जाने पर एक महिला भी लकडियाँ तोड़ती दिखी..वहीँ से मेरी निगाह नीचे महोबा नगर पर पड़ीं ऊपर से जैसे पूरे महोबा नगर की झलक मिल रही थी...देखते हुए मैंने कहा, “महोबा नगर पहाड़ों के बीच में जैसे किसी घाटी में बसा हुआ दिखाई पड़ रहा है” इसे सुनकर रामकिशोर ने कहा, “यहाँ से महोबा हरिद्वार जैसा दिखाई देता है” हम बात करते-करते नीचे उतर आए थे|
         जब मैं अपने आवास पहुँचा तो पत्नी से उस स्थान की चर्चा की (फोन पर) तो वे नाराज होते हुए बोलीं “अच्छा..! जब हम थे तो काम का बहाना बना हमें वहाँ नहीं ले गए..और अकेले में घूम रहे हो..” वैसे मैं यह सफाई देता रहा कि “उस स्थान के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं थी..और ‘शिव-तांडव’ तो मैं दिखा ही चूका हूँ..” लेकिन उन्होंने मेरी एक नहीं सुनी और बोल उठी, “तभी सब कहते हैं कि आप अपने मन की ही करते हो, चाहे कोई कुछ भी कहे..मैं ही क्यों न कहूँ..” फिर फोन से हमारी वार्ता टूट चुकी थी...
        “अरे! मैं वैचारिक रूप से इतना कट्टर तो नहीं कि श्रीमती जी ऐसा कहें,,?” मैं फोन पर पत्नी से टूटी वार्ता के बाद मन ही मन यही सोच रहा था कि मेरा ध्यान “जब सभी धर्मों का उद्देश्य एक सामान है तो फिर विभिन्न धर्मों के बीच विवाद की जड़ कहाँ से आई?” चला गया..हाँ इस पोस्ट का उद्देश्य इसी पर लिखना था लेकिन इस पोस्ट को व्यर्थ के दूसरे विषय ‘पहाड़ भ्रमण’ की चर्चा में लम्बा-चौड़ा कर दिया, पता नहीं आप पढेंगे भी या नहीं...? खैर..
        हाँ, “धर्मों के बीच विवाद की जड़” के बारे में सोचते हुए मेरा ध्यान विश्व के सभी धर्मों यथा- हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई जैन, बौद्ध आदि पर गया साथ ही इनसे निकले अन्य उपधर्मों पर भी मैंने विचार करते हुए “धर्मों के बीच विवाद की जड़” तलाशने लगा..अचानक मुझे इसका उत्तर मिल गया..फिर इस विवाद की जड़ तलाश लेने की ख़ुशी में मैंने अपनी पीठ थपथपाई !
        इन धर्मों के बीच विवाद की जड़ भी कोई ख़ास नहीं है...बस लोग अपने-अपने धर्म को तरह-तरह के “रैपर” में पेश करते हैं और यह धर्मों का “रैपर” ही इनमें आपसी विवाद का कारण है...हाँ, इस “धर्मों के रैपर” की इस खोज के साथ ही मेरा ध्यान हाल ही में महाराष्ट्र मे एक शनिदेव मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर छिड़े विवाद पर चला गया...न्यायालय के हस्तक्षेप से पाँच सौ वर्षों की परम्परा को एक झटके में बदल दिया गया और महिलाओं को भी शनिदेव के दर्शन की अनुमति दे दी गई..!! है न आश्चर्य की बात..!!! मतलब हिन्दू धर्म का ‘रैपर’ हमें अन्य धर्मों की अपेक्षा सबसे अधिक “इकोफ्रेंडली” दिखाई दिया..मतलब हिन्दू धर्म का “रैपर” पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करता बल्कि यह पर्यावरण के अनुकूल मने “इकोफ्रेंडली” होता है..हाँ, हिन्दू धर्म का “रैपर” कागज के ‘ठोंगे” जैसा ही होता है पर्यावरण में घुल-मिल जानेवाला...जैसे ‘गोरखगिरी’ पर्वत की वह गुफा, और पत्थर में भी चेतना तलाशती आकार विहीन वह मूर्ति..! मतलब हिन्दू धार्मिक भावनाएँ अदृश्य सी पर्यावरण में घुल जीवन ही तलाशती हैं, जीवन को क्षति नहीं पहुंचाती...मैं इस “रैपर” पर बलि-बलि जाऊँ..!!!
       हाँ, दुनियाँ के कुछ धर्मो के रैपर एकदम से “इकोफ्रेंडली” नहीं होते..ऐसे धर्मों के ‘रैपर’ निरंतर पर्यावरण को क्षति पहुँचाने का काम करते है, जैसे “पोलिथीन का रैपर” होता है सैकड़ों सालों तक पर्यावरण में पड़े-पड़े ये “रैपर” पर्यावरण को ही क्षति पहुँचाते रहते हैं...यह “प्लास्टिक जैसा रैपर” जहाँ पड़ा होता है वहाँ जीवन पनपने की संम्भावना को क्षीण करता रहता है...लेकिन पता नहीं क्यों ऐसे धर्मों के लोग अपने धर्म के “पर्यावरणीय-हानिकारक रैपर” की खूबसूरती में ही उलझे रहते हैं...? तो भाई ये “रैपर” ही विवाद की जड़ होते हैं...प्लास्टिक के रैपरों पर कानूनी प्रतिबन्ध लगाने की आवश्यकता है...

      आइए..! कानून न सही, हम स्वयं धर्मों के “प्लास्टिक के रैपरों” पर प्रतिबन्ध लगाएँ...धर्मों के “इकोफ्रेंडली रैपर” ही इनके बीच के सारे विवादों को ख़तम करेंगे|    

गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

यह "एंटीक्लाकवाइज" और "क्लाकवाइज" का चक्कर!

                मैं सुबह-सुबह लगभग साढ़े पाँच बजे स्टेडियम तक टहलने चला जाता हूँ। इस स्टेडियम में चारों ओर किनारे पर लगभग साढ़े चार फीट की चौड़ी कंक्रीट की पटरी बनी हुई है, लोग इसी पर चलते हुए स्टेडियम का चक्कर भी लगाते हैं।
              यहाँ टहलने के लिए सुबह पाँच या साढ़े पाँच बजे के बीच मेरी भी नींद अपने आप ही खुल जाती है और अलसाए हुए होने पर भी खुद ब खुद मेरे कदम स्टेडियम की ओर चल पड़ते हैं। सुबह-सुबह प्रतिदिन उठने और टहलने की मेरी यह आदत इधर कुछ ही महीनों में पड़ी है, इसके पहले इतनी सुबह उठने की आदत नहीं थी, तब मैंने अपने सैमसंग वाले मोबाइल में प्रतिदिन सुबह सात बजे उठने के लिए एलार्म लगा रखा था। एलार्म क्या यह एक तरह से अलग-अलग दिनों के लिए भजनों का सेट है। हालाँकि अब सुबह उठने के लिए इस एलार्म की जरूरत नहीं होती लेकिन इसके बजने के टाइमिंग में मैंने कोई परिवर्तन नहीं किया और यह भजनों वाला एलार्म उसी तरह से सुबह सात बजे ही बजता है। इसे सुनना मुझे अच्छा लगता है। मेरे लिए इस मोबाइल की उपयोगिता भी इन्हीं भजनों के कारण है।
            आज स्टेडियम से टहलकर आने के बाद चाय पीते हुए जब मैं इसे लिख रहा हूँ तो "गोबिन्दा ते गोबिन्दा, तिरूपति बाला गोबिन्दा" का भजनरूपी एलार्म बजने लगा है!
           चूँकि आज वृहस्पतिवार है पत्नी भी पहले प्रत्येक वृहस्पतिवार को व्रत रहते हुए भगवान् विष्णु की पूजा करती थी इसी से प्रेरित होकर मैंने भी आज के दिन के लिए इसी भजन को एलार्म के रूप में चुना था। इसी तरह अन्य दिनों के लिए भी अलग-अलग भजन सेट कर रखे हैं, जैसे मंगलवार और शनिवार के दिन अपने हनुमान जी का। वैसे पत्नी अब वृहस्पतिवार वाला व्रत नहीं रहती, हाँ हम देवताओं के प्रति कोई कट्टर भी नहीं है, लेकिन न जाने क्यों, हम अपने इस सुबह-सुबह टहलने जाने के प्रति कट्टर हो गए हैं?
           वैसे यहाँ स्टेडियम में लोग उसी संकरी पटरी पर टहलते हैं और जिसको दौड़ना होता है वह स्टेडियम में बीच के कच्चे ट्रैक पर दौड़ता है। हाँ मैं भी पटरी पर चलते हुए स्टेडियम का दो-तीन चक्कर लगा लेता हूँ। इस तरह स्टेडियम का चक्कर लगाते समय सूर्योदय के पहले क्षितिज पर छायी मनमोहक अरुणिमा और शीतल मंद-मंद बहती पवन, मन में प्रकृति का एक अद्भुत एहसास करा जाती है। हाँ, इसी एहसास के लिए सूर्योदय के पहले ही कदम खुद ब खुद स्टेडियम की ओर उठ जाते हैं।
टहलते वक्त मैंने कुछ और बातों पर भी गौर किया है जैसे इक्का-दुक्का लोगों को छोड़कर अधिकांश लोग एंटीक्लाकवाइज माने घड़ी की सूईयों के विपरीत दिशा में ही पटरी पर चलते हैं और स्टेडियम का चक्कर लगाते दिखाई देते हैं। जबकि क्लाकवाइज चक्कर वाले अल्पसंख्या में ही होते हैं बस इक्का-दुक्का! चक्कर लगाते समय अधिसंख्य लोगों का दक्षिणावर्त (एंटीक्लाकवाइज) चलने के पीछे के कारण का मनोविज्ञान मेरे समझ में नहीं आया। इसके साथ ही स्टेडियम के इस संकरे walking Street पर चलते हुए मैंने लोगों के बीच एक दूसरे का ख्याल रखने वाली गजब की सहिष्णुता देखता हूँ। जैसे, पीछे से आने वाले की तेज गति का आहट पाते ही आगे चलने वाला व्यक्ति पीछे से आने वाले को रास्ता देने के लिए पहले से ही किनारे होने लगता है। और एक-दूसरे के बगल से गुजरते समय ये लोग अपने हाथों के झटकने का अंदाज बदलकर एक-दूसरे को चोट से भी बचाते हैं। यही नही एक बात और है एंटीक्लाकवाइज घूमते बहुसंख्या वाले लोग सामने से आ रहे इक्का-दुक्का क्लाकवाइज लोगों के लिए आमना-सामना होने पर सम्मानपूर्वक किनारे होते हुए उन्हें निकल जाने के लिए रास्ता छोड़ देते हैं।
           यहाँ इस मैदान के पटरी पर एंटीक्लाकवाइज या क्लाकवाइज टहलते हुए लोगों को अपने समान उद्देश्यों का ज्ञान होता है और वे एक ही जगह पहुँचते भी हैं। एक बात और है, पटरी पर चक्कर लगाते समय प्रतिदिन विपरीत दिशा से आते एक व्यक्ति से मेरा सामना होता है, और टहलते हुए मेरी निगाहें उसे खोजने भी लगती हैं। यहाँ आने पर मुझ पर कट्टरता-विहीन सह-अस्तित्व की भावना तारी हो जाती है। खैर...
             आज देश में सहिष्णुता-असहिष्णुता, देशभक्ति-देशद्रोह, दक्षिणपंथ-वामपंथ जैसे तमाम विवाद दिखाई पड़ रहे हैं, इन विवादों का उत्तर स्त्री-पुरुष के संबंधों को परिभाषित करती "मुझे चाँद चाहिए" की इन पंक्तियों में मुझे मिलता दिखाई देने लगता है। आखिर देश के परस्पर विरोधी विचार वाले लोगों का भी उद्देश्य होता तो समान ही है चाहे वे "क्लाकवाइज" हों या "एंटीक्लाकवाइज" इसका एहसास होना जरूरी है -
              "हर स्त्री-पुरुष के बीच में किसी न किसी तरह का तनाव आता है। इस रिश्ते की प्रकृति ही ऐसी है।....लेकिन आपसी मतभेदों को सुलझाते हुए जिंदगी भी गुजारनी होती है। तुम्हारे मंडी हाउस की तरह जे.एन.यू. भी लिबरेशन का बड़ा अड्डा है। अगर तुम्हारी तरह हर कोई सौ फीसदी अंडरस्टैंडिंग की दलील लेकर अड़ जाए, तो यहाँ कोई घर ही न बसे। अंडरस्टैंडिंग एक प्रक्रिया है, जो एक अवस्था के बाद साथ-साथ धूप-छाँव झेलने से ही अपना स्वरूप लेती है। इसमें दोनों ही पक्षों को एडजस्ट करना होता है। क्या तुम यह कहना चाहती हो कि तुम्हारे और हर्ष के बीच में कोई बुनियादी मतभेद है?" 
वर्षा चुप रही। जवाब देने से पहले 'बुनियाद' की परिभाषा देनी होती, जिससे नयी बहस छिड़ सकती थी। "

               हो सकता है देश में वैचारिक स्तर पर छिड़े सारे विवाद एक-दूसरे के प्रति सामंजस्य बनने की प्रक्रिया के हिस्से हों।

               अंत में चलते-चलते इस पोस्ट के संबंध में एक तथ्य और उद्घाटित करना है, एक बार सुबह मैं इसे पोस्ट कर चुका था लेकिन edit करने के चक्कर में यह post delete हो गयी, जिसकी पुनर्प्राप्ति में मुझे फिर से प्रयास करना पड़ा। शायद इस पोस्ट में पुराने सैमसंग मोबाइल की चर्चा कर देने से सोनी का यह मोबाइल अपनी तौहीन समझ असहिष्णु हो गया था और उस पोस्ट को डिलीट कर मुझसे अपना बदला चुकाया। लेकिन मैंने भी हार नहीं मानी और इस पोस्ट के प्रति इसे सहिष्णु बना कर ही माना।

क्या करें? हम तो चाटुकारों के देश में रहते हैं..

            उस गोष्ठी के सभाकक्ष में पहुँचते ही मैं अपनी घड़ी देखने लगा था| मैं गोष्ठी के प्रारंभ होने के निर्धारित समय से करीब चालीस मिनट विलंब से पहुँचा था, उस समय गोष्ठी के मंच पर अतिथियों की कुर्सियाँ खाली थी| जैसा कि किसी भी गोष्ठी के मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि होते हैं वैसे ही यहाँ भी थे| इनके नाम को दर्शाता हवा में झूलता वह बैनर इन अतिथियों का बेसब्री से इंतज़ार करता हुआ मुझे जान पड़ा लेकिन अभी भी वहाँ के वातावरण में उन महानुभावों के आगमन की सुगबुगाहट मुझे परिलक्षित नहीं हुई तथा आयोजकगण गोष्ठी की तैयारियों में ही व्यस्त दिखे| आमंत्रितकर्ता ने मुझे मंच पर की एक खाली कुर्सी पर बैठाया|  
         कुछ देर बाद मंच की खाली कुर्सियों पर तौलिया डाला जाने लगा था मेरी भी कुर्सी पर तौलिया डाला गया| फिर कदाचित् गर्वित भाव से मैंने मंच के सामने हाल में खाली पड़ी कुर्सियों की ओर देखा जिस पर लोग आ आ कर बैठते जा रहे थे| इधर यहाँ मंच पर अकेले बैठे हुए अतिथियों के इंतज़ार में खाली अन्य कुर्सियों पर मेरा ध्यान चला गया| इन्हें देख मैं थोड़ा असहज हो उठा तथा मन ही मन स्वयं को कोसने लगा कि नाहक ही इतनी जल्दी आ गए| खैर, करीब आधे घंटे बीतने के बाद अतिथियों का आगमन हुआ| विशिष्ट और मुख्य मुख्य अतिथि बारी-बारी से मंच पर विराजमान हुए! दीप प्रज्ज्वलन और औपचारिक उद्घाटन के बाद आयोजनकर्ताओं को अपने समयाभाव का हवाला दे वे कुछ ही देर बाद चलते बने थे|
          इधर बारी-बारी से इन दोनों अतिथियों को जाते देख इनके ‘समयाभाव’ के सामने मैं नतमस्तक हो गया था| मुझमें भी ‘समयाभाव’ से सम्मानित होने का भाव जागृत हो उठा था और तत्क्षण बाद मैं भी यही हवाला दे उस गोष्ठी स्थल से चलता बनना चाहा था| लेकिन मेरा मन थोड़ा समझदार निकला उसने जैसे मुझे समझाया हो “क्यों बे! तुझे पता नहीं कि तेरे पास समय ही समय है? समयाभाव तो मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि नामधारी जीवों के लिए ही आरक्षित किया गया है..तू किस खेत का मूली है..जो इसका सहारा लेगा...चल बैठा रह..” और फिर मैं गोष्ठी में बैठा ही रहा| अब मेरा मन इस निष्कर्ष पर जा टिका कि किसी गोष्ठी या समारोह के लिए विशिष्ट और मुख्य अतिथि बनने जैसा सम्मान अर्जित करने की योग्यता के लिए ‘समयाभाव’ होना पहली शर्त है इसके बाद ही कुछ और! इस शर्त का पालन करते हुए ऐसे अतिथि किसी गोष्ठी या समारोह में सबसे बाद में पहुँचते हैं और सबसे पहले वहाँ से प्रस्थान भी कर जाते हैं| हो सकता है आप की किसी गोष्ठी में ये विशिष्ट जीव अंत तक बैठे रहे हों लेकिन यह अपवाद स्वरुप ही होगा|
       जैसा कि मैंने कहा कि किसी भी गोष्ठी का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलित करके की जाती है और इसके लिए एक डिजाइनर दीप में चार-पाँच बाती रखे होते हैं जिसे बारी-बारी से मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि तथा अन्य अतिथि एक-एक कर प्रज्ज्वलित करते जाते हैं| यहाँ इस गोष्ठी के शुभारम्भ में भी इसी परम्परा का पालन किया गया| लेकिन मैंने देखा मुख्य अतिथि के द्वारा दीप के पाँच बातियों में से चार बातियों को प्रज्ज्वलित कर देने के बाद आयोजक ने विनम्रतापूर्वक उनके हाथों से उस जलते मोमबत्ती को लेकर विशिष्ट अतिथि की ओर बढ़ा दिया और उन्हें भी उस एक बची बाती को प्रज्ज्वलित कर और गोष्ठी के शुभारम्भ करने का गौरवबोध मिल गया था| फिर भी हम जैसे सामान्य से अतिथि मुख्य अतिथि के इस  अनाड़ीपने से ऐसे ही उस गौरवबोध से वंचित हो गए थे| हालांकि इसमें उन महोदय का दोष नहीं था वे शायद पहली बार मुख्य अतिथि बने थे नहीं तो एक बाती जलाने के बाद मोमबत्ती विशिष्ट अतिथि की ओर बढ़ा देते|
       इस गोष्ठी में मुझे एक तथ्य की अनुभूति और हुई जिसे मैंने धीरे से आत्मार्पित कर लिया वह यह कि जरुरी नहीं कि किसी गोष्ठी के मुख्य अतिथि या विशिष्ट अतिथि को उस गोष्ठी के लिए निर्धारित विषय का ज्ञान हो| लेकिन आप इसे अधिनियमित मत मानिएगा क्योंकि हो सकता है नेताओं या उनके लिए आयोजित गोष्ठी अपवाद हो लेकिन तब यह गोष्ठी, गोष्ठी न होकर जनसभा होगी जहाँ जनता उनके ज्ञान का लोहा मान जाती है|
      अब आते हैं एक दूसरी बात पर, अकसर गोष्ठियों में विशिष्ट अतिथि या मुख्य अतिथि के पूर्व अन्य सामान्य से अतिथियों या वक्ताओं का भाषण या कहें संबोधन भी होता है| कभी-कभी वक्तागण गोष्ठी को संबोधित करते समय मुख्य अतिथि के लिए ‘परम आदरणीय’ या ‘आदरणीय’ जैसा विशेषण प्रयोग करने लगते हैं तब ऐसे संबोधनों के कारण एक समस्या उत्पन्न होने की संभावना होती है| जैसे किसी पूर्व वक्ता ने मुख्य अतिथि के लिए ‘परम आदरणीय’ या ‘परम परम श्रद्धेय’ जैसा विशेषण प्रयुक्त किया तो बाद के वक्ता के लिए भी इन विशेषणों का प्रयोग करना एक मज़बूरी बन जाती है अन्यथा “परम” को “आदरणीय” से अलग करने पर उस सीमा तक मुख्य अतिथि अपना असम्मान समझ सकते हैं| यहाँ एक अन्य तथ्य की ओर भी इंगित करना है, अकसर गोष्ठी के वक्ता भाषण के शुरू में सभी अतिथियों का एक-एक कर नाम ले अपना भाषण प्रारम्भ करते हैं, अब यदि किसी का नाम लेने से रह जाए तो फिर जिनका नाम छूटा हो उन महानुभाव के नाराज हो जाने का खतरा भी बना रहता है|
      इन्हीं बातों को सोच-सोच कर कभी-कभी वक्ता के रूप में मैं अपना भाषण गड़बड़ा देता हूँ बोलना कुछ होता है तो बोल कुछ देता हूँ; वक्तृत्व कला गायब हो जाती है| ऐसे में अकसर मुझे अमेरिका के शिकागो में स्वामी विवेकानंद जी के भाषण का “भाइयों और बहनों” का वह संबोधन याद आ जाता है जब इसी संबोधन को सुन वहाँ का हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था| लेकिन यहाँ तो हम ‘आदरणीय’ या ‘परम आदरणीय’ जैसे संबोधनों में ही खोये रहते हैं, तथा कोई भी गोष्ठी जैसे अतिथियों की सम्मान-गाथा भर बन कर रह जाती है, यहाँ सामने बैठे श्रोता वक्ताओं के लिए साध्य नहीं मात्र साधन भर ही होते हैं| क्या करें हम तो चाटुकारों के देश में रहते हैं!
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रविवार, 20 मार्च 2016

आज के ये बुद्धिराजा...

          हाँ मुझे अपने बचपन के वे दिन आज भी याद हैं, उन दिनों हम अपने तीन-चार पारिवारिक हम-उम्र बच्चों के साथ कक्षा छह या सात में पढ़ रहे होंगे। तब हमारे घर पर परिवार के किसी वैवाहिक कार्यक्रम या अन्य अवसरों पर काफी रिश्तेदार जुटते और उनके साथ हमारी ही उम्र के कुछ बच्चे भी होते थे। उन्हीं में से एक बच्चे से अकसर हम चिढ़ने-चिढ़ाने का खेल खेलने लग जाते थे। वह सुबह चार बजे उठकर पढ़ने की अपनी आदत के साथ अंग्रेजी ग्यान का भी हम पर रौब झाड़ता रहता और हम साथी अन्य बच्चों को बुद्धू भी कह देता था, तब हमें लगता वह हमारी खिल्ली उड़ा कर हमें नीचा दिखा रहा है और हमारी बातों का बौद्धिक विश्लेषण भी करने लगता। उस समय हमें बहुत बुरा लगता फिर हम भी अन्य साथी बच्चों के साथ उसे "बुद्धिराजा" कह कर चिढ़ाते। ऐसा कई बार होता और एक तरह से उस बच्चे को "बुद्धिराजा" कह कर हम अपनी भड़ास भी निकाल लेते थे। तब यह सम्बोधन उसकी बुद्धि और हमारे बीच ढाल का काम करती। अंत में इस सम्बोधन से चिढ़ते हुए वह बच्चा चुप हो जाता।
           यहाँ आशय उस हम-उम्र बच्चे को गलत ठहराना नहीं है। यह घटना हमें इसलिए याद आई कि हम "बुद्धिजीवियों" द्वारा दूसरों के कार्यों के छिद्रान्वेषण में ग्यान बघारने की आदत से आहत हो उठते हैं। आज यह सोचकर हम आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि इस शब्द "बुद्धिजीवी" के समानार्थी "बुद्धिराजा" जैसे शब्द का ईजाद फुफेरे भाई के लिए हम बच्चों ने तब कैसे खोज लिया था? उस समय तो हम प्राइमरी कक्षा में ही पढ़ते थे और 'इन्नोसेंट' जैसे ही थे! मतलब साफ है सामाजिक जीवन में किसी व्यक्ति के कार्यों का मात्र बुद्धिवादी नजरिए से विश्लेषण सही नहीं होता बल्कि यह चिढ़ाने और उत्तेजित करने वाला होता है और उसके कार्यों का सही मूल्यांकन नहीं होता। समाज या व्यक्ति के साथ हमारी अन्तर्क्रिया केवल बुद्धि आधारित ही नहीं होती बल्कि इसके पीछे परिस्थितियाँ, भावनाएँ और तमाम तरह के हमारे अनुभव भी उत्तरदायी होते हैं।
           वास्तव में हमारा बुद्धि आधारित व्यवहार हमें केवल औपचारिक ही बनाता है जबकि हम एक अनौपचारिक दुनियाँ में रह रहे हैं। यदि हम यह मानते हैं कि भावनाएँ चीजों के प्रति हमें पूर्वाग्रही बनाती हैं तो उसी प्रकार यह भी तय है कि बुद्धिवादी दृष्टिकोंण भी पूर्वाग्रही होता है क्योंकि हमारे सारे तर्क अपनी ही बात को सही ठहराने के लिए होते हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से यह स्थिति स्वयं के विचारों के प्रति अंध-श्रद्धा है और यह भी भक्ति हुई।
         अन्त में यदि हम अपने किसी विरोधी की आलोचना में मात्र कोरे तर्क-बुद्धि का सहारा लेते हैं तो उस विरोधी को ही ताकतवर बनाते जाते हैं। "बुद्धिराजा" बन ऐसे ही कुछ बुद्धिजीवी आज अपने विचारों की अंध-श्रद्धा पर सवार हो पक्ष प्रतिपक्ष बनकर मात्र एक-दूसरे को ही नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन उन्हें यह नहीं पता इसके क्या परिणाम होते हैं? आप अपने उद्देश्य में सफल नहीं होते और आपका प्रतिपक्ष शक्तिशाली होता जाता है क्योंकि एक तीसरी दृष्टि भी होती है जिसे "बुद्धिराजा" लोग नजरअंदाज करते हैं।

शनिवार, 19 मार्च 2016

सत्य का उद्घाटन..!

             उस दिन मेरे एक साथी महोदय ने कहा- "सत्य को उभारना नहीं चाहिए" हालाँकि इसके आगे उन्होंने कहा था कि "इससे सत्य को उद्घाटित करने वाला स्वयं संकट में पड़ जाता है।" फिर उन्होंने अपनी इस बात में और जोड़ा था "आखिर किसी के आम को इमली कह देने से वह इमली थोड़ी न हो जाएगा.." उनके कहने का आशय यह भी था "सत्य तो सत्य ही रहता है चाहे आप इसे उभारें या न उभारें।"

               फिर उन महोदय ने कुछ ऐसे उदाहरण भी बताए जहाँ सत्य को देखने और समझने वाला व्यक्ति भी इसे सहन नहीं कर पाया और उसने अपने जीवनलीला पर ही संकट खड़ा कर लिया। इसी से उन्होंने यह निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि "यदि हम सत्य न जाने तो जीवन सहज गति से चलता रहता है और इस गति पर कोई फर्क नहीं पड़ता।"
             उनकी बातें मुझे बहुत अच्छी लगी सोचा बैठे-बैठाए व्यवहारिक जीवन के लिए मुफ्त में मार्गदर्शन प्राप्त हो गया नहीं तो कहीं इसके लिए किसी बड़े नामी टीवी बाबा का प्रवचन सुनना पड़ता और वह भी शायद इस सत्य का साक्षात्कार न करा पाते....खैर..
            जब मैंने उन साथी महोदय की इन बातों को सुना था तो उसी समय आपको भी इस सत्य से साक्षात्कार कराने की सोच लिया था.. लेकिन तब कैसे अपने इस साक्षात्कारित सत्य से आप सबको परिचित कराऊँ इसका तरीका नहीं मिल पाया था....
             लेकिन आज जब फेसबुक पर नामी कुछ बौद्धिकों, टीवी चैनल वालों के कंटेंट पर ध्यान गया और मुझे यह बताने का तरीका मिल गया...
             हाँ, एक बात है उन महोदय की बातों से यह तो मैं भी मान गया था कि सत्य को उजागिर करने वाला या सत्य को जाननेवाला स्वयं परेशानी में पड़ सकता है लेकिन यह तो एक बात है! दूसरी महत्वपूर्ण बात का ज्ञान मुझे इसी सोशल मीडिया और टीवी चैनलों को देख कर प्राप्त हुआ...
           वह यह कि चैनलों और मीडिया का अपना-अपना सत्य देख अब शायद ही कोई सत्य उद्घाटित होने की सोचे ? आखिर ऐसा क्यों? भाई आप जरा समझिए! सत्य तो सत्य ही होता है इसमें कोई दो राय नहीं... लेकिन जब लोग इसे ऊभारते हैं तो यह सत्य स्वयं अपने को एक अजीब स्थिति में पाता है, उभरते समय ये सत्य महोदय बहुत खुश रहते हैं..सोचते होंगे कि देखो मैं सत्य हूँ...और तुम सबका हूँ !! लेकिन ढोल नगाड़े के साथ सत्य महोदय का यह प्रकटीकरण का गर्व क्षणभंगुर ही होता है। सत्य का यह गुमान कि सत्य सत्य होता और मैं सबका हूँ, चकनाचूर हो उठता है...!
            यह सत्य बेचारा अपने प्रकटीकरण के बाद ऐसे खींच-तान का शिकार होता है कि चीथड़ों में बंट जाता है.. पहले तो यह होता है कि इसे यानी सत्य को अपने हाथों में थामें कुछ लोग सत्य के वाहक बन खुशी में जोर-जोर से डंका बजाकर नाचते हैं गोया बाकी सब यहाँ असत्यवादी पसरे हों और सत्य भी इसे देखकर खूब खुश होता रहता है। लेकिन जब लोगों के हाथों-हाथ लिया गया और उछलता यह सत्य दूसरी ओर निगाह डालता है तो अचक जाता है! वहाँ दूसरी तरफ तो उसे मातम पसरा हुआ सा दिखाई देता है..! यही नहीं उस दूसरी ओर के लोग इस सत्य को विरोधी के हाथों में खुशी से उछलते देख मुँह बिचका इसमें मीन-मेख निकाल इसे सत्य मानने से ही इनकार कर रहे होते हैं..
            हाँ सत्य अपनी इस स्थिति से, और कुछ के हाथों उछलते तथा दूसरों को अपनी ओर से मुँह मोड़ते देख अपना अपमान समझ व्याकुल हो उठता है! वह सोचता है, कहाँ वह सबका सत्य बनने निकला था और कहाँ अब वह मात्र कुछ ही हाथों का वह खिलौना बन गया है.. यही सोचते-सोचते सत्य बेचारा अपने को ठहरा हुआ पाता है।
               और इसके बाद सत्य के साथ एक दुर्घटना और शुरू हो जाती है! कुछ की खुशी भरे हाथों उछलते सत्य की यहीं से दुर्दशा भी प्रारम्भ हो चुकी होती है। अब यह अपने को नुचता हुआ पाता है! सत्य की इस नोंच-नोचाई में उसको पहचानना भी मुश्किल हो जाता है..! इस बेचारे सत्य का जिसके जो हाँथ लगा उसे ही नोच लोग फरार होने लगते हैं। अपनी इस दुर्दशा से हो सकता है सत्य निकलना चाहता हो लेकिन निकलना अब इसके वश में भी नहीं होता। क्योंकि तब-तक यह दूसरों के हाथों खिलौना बन चुका होता है और अब तक चिंदियों में बँट चुका यह सत्य बेचारा असत्य में रूपांतरित हो चुका होता है, जहाँ इसे रोना भी अब मुअस्सर नहीं...! यहाँ तक तो जय हिंद!!
               हाँ भाई तटस्थ लोग, इस सत्य का खूब मजा लेते हैं.. जैसे हमारे देश की राजधानी वाले मुख्यमंत्री जी हैं इनके हाथों सत्य भी खूब उछला था। मीडिया ने भी सत्य के इस उछल-कूद में उनका खूब साथ दिया था..! लेकिन अब पता नहीं क्या हुआ? हमें लगता है अब उनका वह सत्य, सत्ता पर सवार है या सत्ता स्वयं उस सत्य पर ही सवारी गाँठ रही हो? यह आप लोग ही तय करिए....या इस सवार-सवारी पर निगाह डालिए तथा कौन कितना झलक रहा है इससे तय कर लीजिए।
              अब आते हैं बेचारे रोहित बेमुला पर, उसने जब सत्य को जाना तो वह आत्महत्या कर चुका होता है....! यह सत्य तो वाकई खतरनाक निकला! क्योंकि यहाँ यह सत्य रोहित बेमुला की आत्मा के साथ ही भूत बन सब पर मँडराने लगा है और भाई लोगों की ओझाई-सोखाई चालू है! यहाँ भूत बना यह सत्य या तो प्रकट ही होगा या इस ओझाई-सोखाई से डर ससुरा भाग ही जाएगा..? क्योंकि भूतों का हश्र हम सब जानते हैं!
             हाँ अब आते हैं वो क्या नाम है..? अरे हाँ कन्हैया..! इस समय उसे देख ऐसा लगा जैसे यह सत्य भी कल रात ही जेल से ही छूटा हो, और इसके कंधों पर सवार यह सत्य इसके भाषणों में गौरवान्वित हो खूब इठला रहा हो...सत्य तुमसे खूब रश्क हो रहा है! बस चूँ-चूँ का मुरब्बा मत बनना।
            मैं भी यहाँ बैठे-बैठे यही सोच रहा हूँ उछलो भाई खूब उछलो..! ये मीडिया और टीवी वाले भी कन्हैया के हाथों में अपना हाथ लगा तुम्हें खूब उछाल रहे हैं! कुछ लोग तुम्हें कन्हैया के हाथों उछलते देख हो सकता है मायूस भी हों और तुमसे मुँह चुराना चाहते हों...क्योंकि उनका भी कोई सत्य हो जो कहीं इस खेल में दुबककर तिरोहित न हो जाए..?
             लेकिन भाई मेरे सत्य! यह तो मैं जानता हूँ कि तुम इस समय बहुत परेशान और घबड़ाहट में होगे और वह भी अपने अस्तित्व को लेकर...! मैं तुम्हारी इस सोच और डर से भी वाकिफ हूँ कि कहीं तुम्हें मात्र कन्हैया का ही सत्य न ठहरा दिया जाए...! कुछ लोग इसमें लग भी चुके हैं, और तुम्हें! सत्यों के गुत्थम-गुत्थाई के इस खेल में अपने चिंदी-चिंदी हो जाने का खतरा भी महसूस हो रहा होगा...लेकिन तुम कर भी क्या सकते हो..? ये मीडिया और टीवी वाले तुमको बाँटकर तुम्हें चिंदी बनाने पर ही जो तुले हुए हैं, तुम असहाय से कुछ कर भी नहीं सकते..!
              अंत में कन्हैया के हाथों उछलते या उछलाते जाते हे सत्य महोदय...! बस तुमसे मेरी यही एक विनती है "यदि तुम बचते हो तो इस बेचारे कन्हैया की गरीबी अवश्य दूर करना, जैसे उस बेचारे दिल्ली वाले को मुख्यमंत्री बनाकर किया है...! इतना तुम्हें कन्हैया का एहसान मानना ही होगा आखिर उसके हाथों उछल-उछल अपने होने का मजा जो ले रहे हो! बाकी हम तो आजादी के बाद से गाहे-बगाहे तुम्हारे इस उछल-कुदाई का खेल देखते ही आ रहे हैं..!" एक बार और जोर से बोलो जय हिन्द...!
              वैसे आप बोले नहीं होगे इससे तो कुछ मिलना नहीं... तो क्यों न आप भी इस उछल-कूद में शामिल हो जाते.......

उसे तो एक डर विहीन दिवस ही दे दो!

              उस दिन रात गहरा रही थी और हमारी बस चली जा रही थी। मैं बस की खिड़की से बाहर पसरे अँधेरे को निहारे जा रहा था और रह-रह कर कोई प्रकाश श्रोत इस पसरे अँधेरे से जैसे लड़ते हुए आँखों के सामने गुजर जाता। इस प्रकाश श्रोत के गुजरने की आवृत्ति थोड़ी बढ़ने लगी थी लेकिन ऐसा नहीं कि बस की गति तेज हो गई थी बल्कि राजमार्ग के किनारे कोई बस्ती गुजरने वाली थी
           बस की खिड़की से देखते हुए सहसा आँखों के सामने से एक मंजर गुजरा। उस मंजर में, एक छोटे से मैदान में चकाचौंध करती लाइटों के बीच सजे मंच पर एक बारबाला नाचती हुई दिखाई दी थी। इसके साथ ही मेरी निगाहें उस मंच को घेरे हुए सैकड़ों पुरूषों के समूह पर भी चली गई थी। उन पुरूषों के बीच से तमाम हाथ उस नाचती बारबाला की ओर उठे हुए देखा। वह पुरूष समुदाय उस नाचती बारबाला का जैसे उत्साहवर्धन करता दिखाई दे रहा था।
            अब तक आँखों के सामने से वह मंजर गुजर चुका था। फिर मैं अपनी स्मृतियों में खो गया था। उस समय हम यही स्नातक के दौर से गुजर रहे थे। एक रिश्तेदार की शादी में गए थे। वहाँ भी ऐसे ही बारात में नाचने के लिए एक औरत को बुलाया गया था जिसका नाचना ही पेशा होता था। जनवासे में बारात की महफिल सजी हुई थी और बारातियों के बीच वह नर्तकी नाच रही थी। कुछ अधेड़ किस्म के बाराती अपनी जगह पर ही बैठे-बैठे खुशी से उछल रहे थे तथा एकाध तो खुशी से हवाई फायर भी करने लगे थे। उस समय हमने इसका विरोध किया था और उस जगह से दूर चले गए थे। उस नर्तकी का पुरूषों के बीच नाचना और पुरुषों का उछलते हुए उसे देखना तब हमें बहुत बुरा लगा था। वास्तव में जब कभी भी ऐसा दृश्य आँखों के सामने उपस्थित हुआ हमने ऐसे दृश्य से मुँह मोड़ना ही उचित समझा।
           मैं अकसर ऐसे दृश्यों को देखकर सोचने लगता हूँ कि जो पुरूष नाचती बारबालाओं या नर्तकियों को ललचाई सी नजरों से देख झूमते हुए ताली पीटते हैं वे अपने घर की महिलाओं की कैसी इज्जत करते होंगे? खैर....
           जरा उस महिला के मन झाँकते! जो अकेली पुरूषों के बीच में नाच रही हो और इन्हीं पुरूषों की ललचाई सी आँखें उसके शरीर को बेध रही हों, तो उस महिला के मन पर क्या गुजरती होगी? कुछ लोग इसे पेशा कह देते होंगे, लेकिन क्या कोई इसे सहज पेशा मान सकता है? यह पेशा हो भी तो यह तमाम दर्द और पीड़ा को समेटे हुए उस महिला की गरिमा की शर्तों पर ही होता होगा। ऐसे में मेरी स्मृतियों में आए उस बारात और ऐसे ही अन्य स्थलों पर लोग महिलाओं की गरिमा से खिलवाड़ करते हुए लगते हैं।
            उसी समय बस में जब मैंने सोशल मीडिया को खँगाला तो पता चला कि आज महिला दिवस भी है, क्योंकि कुछ लोग इस महिला दिवस पर बधाई देते हुए नजर आ रहे थे! लेकिन, मैं सोच रहा था पता नहीं वे किसको और किसलिए बधाई दे रहे थे। जबकि यह स्त्री तो-

हाँ वह स्त्री है
नहीं चाहती वह कि-
उसका भी कोई दिवस हो,
उसने तो जननी बन तुमको ही
सारे दिवस सौंप दिए हैं।
हाँ वह स्त्री है,
सहचरी बन साथ निभाया
आँगन की फुदकती उस गौरैया सी
जो तिनका-तिनका खटती है।
हाँ वह एक स्त्री है,
अभिलाषा है उसकी
उन बेधती निगाहों से
किसी मुक्ति-दिवस की।
हाँ, दे सको तो तुम उसे,
अपने जमावड़ों वाले गलियारों से
चटखारे वाली कहानियों का
पात्र बनते जाने से, ऐसा ही कोई
उसे एक मुक्ति दिवस दे दो।
हाँ, वह स्त्री है
अगर दे सकते हो तो उसे
तमाम कसीदों से मुक्त केवल
एक डर विहीन दिवस ही दे दो।
-विनय

स्वर्गलोक में नारद का नया बखेड़ा.

            संयोग से आज महाशिवरात्रि के दिन पृथ्वी का भ्रमण कर नारद जी स्वर्गलोक में भगवान् विष्णु से मिलने पहुँचे थे...मन में उठते कुछ अनसुलझे प्रश्नों से वे बेचैन थे..
           “भगवन् ! आप वामपंथी हैं या दक्षिणपंथी? विष्णु से नारद ने यही प्रश्न किया था| नारद के इस प्रश्न से भगवान् विष्णु अचकचा उठे और उनकी ओर देखते हुए बोले-
              “अरे नारद आप स्वर्गलोक में हो..! फिर भी यह प्रश्न..?”
             “नहीं प्रभु मेरे जिज्ञासु मन को शांत करें..मैं जब से पृथ्वीलोक से वापस आया हूँ..इस प्रश्न ने मेरे दिमाग का मट्ठा कर दिया है..अब आप ही मेरा उलझन दूर कर सकते हैं..|” माथे पर परेशानी का भाव लिए नारद जी ने कहा|
            इधर भगवान् विष्णु नारद के इस अनापेक्षित से प्रश्न से, यह सोचकर हैरान थे कि एक तो नारद के मुँह से आज “नारायण-नारायण” भी नहीं सुनाई दिया, दूसरे कहीं नारद जी उनकी भक्ति को छोड़ वामपंथ-दक्षिणपंथ जैसे सांसारिक प्रश्नों में ही न उलझ जाएं..! फिर भक्ति का प्रचार-प्रसार कौन करेगा..? हाँ अपनी भक्ति किसे अच्छी नहीं लगती...सो भगवान् विष्णु ने धीर-गंभीर वाणी में उनसे कहा-
             “अरे नारद जी ! देवलोक के लिए यह प्रश्न प्रासंगिक नहीं है..आप कहाँ का बखेड़ा यहाँ ला रहे हैं” 
             “नहीं प्रभु यह प्रश्न देवलोक के लिए, आप के लिए और सभी देवताओं के लिए प्रासंगिक है..!” नारद के आत्मविश्वास से लबरेज इस वाक्य को सुन नारायण ने नारद के प्रश्न के प्रति थोड़ी संजीदगी बरतते हुए पूँछा-
             “अच्छा..! ऐसे प्रश्न की प्रेरणा आप में कैसे जागृत हुई?”
           “हे प्रभु..! भोले बाबा और उनके भक्तों को देखकर ही मेरे मन यह प्रश्न आया, भक्तों के प्रति वर्ताव में मुझे आप त्रिदेव भी अप्रत्यक्ष रूप से आज के इस मौंजू प्रश्न में बंटे दिखाई दे रहे हैं, इसीलिए आपसे यह प्रश्न पूँछना पड़ा” -नारद उवाच|
              “तो नारद ! कैलाशपति शंकर जी से ही यह प्रश्न करते..” विष्णु ने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा|
             “हे परम आदरणीय प्रभु..! भोले बाबा से ऐसे प्रश्न करने की आवश्यकता ही नहीं..! वे तो असली वामपंथ के पुरोधा हैं। अहा..! राख भभूत लपेटे साँप, विच्छू धारण किए एकदम आम-आदमी जैसे और ऐसे ही लोगों से घिरे हुए..वही कैलाशपति शंकर..आम आदमी के भगवान ! उन्हें देख कोई भी वामपंथी ही नहीं बल्कि वामपंथ का पुरोधा भी मान लेगा, और यही नहीं प्रभु! आज मैंने धरती पर भी महाशिवरात्रि के पर्व पर वैसे ही जटाजूट धारी भभूत लपेटे हुए शिव-रूप धारण कर घोड़े पर सवार मनुष्य और उस शिवबारात में अब तक आपकी कृपा से वंचित मनुष्यों को बाराती बने देखा जहाँ उन सबका उत्साह देखते ही बनता था!” जैसे नारद जी ने भगवान् शंकर की भक्ति में लीन होकर कहा हो।
             “लेकिन नारद ! इस नश्वर से सांसारिक प्रश्न को हम देवों पर तो न लागू करो..!” नारद के अन्दर उपजते वामपंथी रुझान से अप्रभावित विष्णु ने कहा|
          “नहीं प्रभु..! अब आप त्रिदेवों की इस विषय पर स्पष्ट स्थिति मैं जानना चाहता हूँ..हाँ,भोलेनाथ से तो पूँछने की आवश्यकता ही नहीं उन्हें समझना बहुत आसान है..! बस सीधे आपके पास चला आया हूँ |” 
            “अरे ! पहले इस विषय पर ब्रह्मा की भी तो राय ले लेते...फिर मेरे पास आते..!” विष्णु की इस बात पर नारद थोड़ा उत्तेजित हो कर बोले-
            “देखिए परमेश्वर! जैसी रचना वैसा रचनाकार..!! उनकी पूरी रचना में ही हमें दक्षिणपंथ दिखाई पड़ता है...पृथ्वीलोक पर आते-जाते मुझे इसका स्पष्ट प्रमाण मिल गया है...”
            “नारद ! यह कौन सी पहेली बुझा रहे हो..?” –विष्णु
          “यह पहेली नहीं है प्रभु..देखी कह रहे हैं..! आखिर..वहीँ ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर जीवन रच दिया..उसे हरा-भरा कर दिया...! लेकिन..मंगल..बुध..समेत अन्य ग्रहों की स्थिति क्या है..? यही नहीं..चन्द्रमा तो पृथ्वी के पास ही था, उसको भी ब्रह्मा जी ने उजाड़ बना दिया है..! आखिर अपनी ही रचना में ऐसा भेदभाव क्यों..? यह दक्षिणपंथ नहीं तो और क्या है..? ब्रह्माजी के मन में जो था वैसा ही उन्होंने बना दिया..! एक को सजाओ-सँवारो और दूसरे को उजाड़ बनाए रखो..!! यह कहाँ का दैवीय सामाजिक न्याय है..? हाँ भगवन! मैं तो कहता हूँ..सृष्टि रचने का काम और किसी को सौंपिए..नहीं तो सब गुड़गोबर हो जाएगा..|” नारद के इस तल्खी भरे स्वर को सुन विष्णु समझ चुके थे कि नारद पर अभी पृथ्वीलोक का ही भूत छाया है, वह मौन ही रहे|
            “नहीं भगवन्, आप मौन मत हों..कृपया मेरे प्रश्न का उत्तर दें कि आप वामपंथी हैं या दक्षिणपंथी..? वैसे प्रभु क्षमा करे मुझे आपका रुझान दक्षिणपंथ की ओर ही दिखाई देता है, नहीं तो ब्रह्मा जी के इस अन्यायपूर्ण कार्य में आप अवश्य हस्तक्षेप करते..?” नारद ने अपनी जिज्ञासा और तल्खी को पुनः विष्णु से प्रकट किया..|
इधर भगवान् विष्णु नारद से अपनी बातचीत की दिशा भी नहीं मोड़ पा रहे थे, और यह सोचते हुए “देवी लक्ष्मी भी न जाने कहाँ भ्रमण पर निकल गई हैं...? लक्ष्मी भी तो अक्सर देवताओं के ही यहाँ जाती हैं..सही में नारद के प्रश्न का उत्तर देना कठिन है!!” भगवान विष्णु के माथे पर बल पड़ गया और नारद के इस प्रश्न में उलझ अपना सिर खुजला रहे थे..! उनके कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि नारद के इस प्रश्न का क्या उत्तर दें, फिर अपने मुकुट को सीधा करते हुए (सिर खुजलाने से जो टेढ़ा हो गया था) नारद से अनमने ढंग से पूँछा-
              “अच्छा कैलाशपति शंकर की सवारी क्या है..”
              “नंदी बैल जी..!” – नारद
              “लेकिन मनुष्यों ने तो शिवबारात वाले जुलूस में उन्हें घोड़े पर बैठा दिया था.., मैं कहता हूँ कि मनुष्यों के चक्कर में न पड़िए, ये कुछ का कुछ बना देते हैं!” विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा | 
              विष्णु से अपने अनुत्तरित प्रश्न को लेकर नारद असंतुष्ट थे और विष्णु भी उनके प्रश्नों का उत्तर नहीं देना चाहते थे। भगवान् विष्णु यह सोचकर भी थोड़े परेशान से हुए कि कहीं नारद के इस प्रश्न से देवलोक में भी दक्षिणपंथ-वामपंथ का झगड़ा न शुरू हो जाए...! इसी से चिंतित भगवान विष्णु ने फिर कहा-
             “देखो नारद ! जो ‘गोल्डीलॉक जोन’ में होगा वही खुशहाल होगा...”

             यहाँ भगवान् विष्णु का आशय किसी के संतुलित अवस्था में होने से था...लेकिन नारद उनके इस कथन से भी संतुष्ट नहीं हुए। तभी नारद को कृष्णावतार के समय का उनका गीतोपदेश, जिसमे भगवान् ने स्वयं अपना विराट स्वरुप वर्णित किया था, उस कथन से निकले इसी अर्थ “भगवान् स्वयं अपने को भी पूर्ण रूप से नहीं जान पाते तो मेरे प्रश्न का क्या उत्तर देंगे...?” को सोचते हुए और मन ही मन आज "नारायण-नारायण" की जगह “ॐ नमः शिवाय...ॐ नमः शिवाय” जपते नारद वहाँ से चल दिए..
            महाशिवरात्रि के इस पर्व पर आप सबके जय की मंगलकामना के साथ...!
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