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शनिवार, 9 जुलाई 2022

आपका ईनाम निकला है

          प्रिया के सामने सर्वे सूची थी और उसका कम्प्यूटर भी ऑन था। उसने अनमने ढंग से एक सरसरी दृष्टि सूची पर डाली। एक नाम पर उसकी नज़र ठिठक ग‌ई। उसे प्रार्थनेय कुमार नाम कुछ अजीब लगा लेकिन यही नाम लिखा था और उम्र के कालम में पचपन साल भरा था। इसके बाद उसने सर्वे फार्म में भरे ग‌ए इस व्यक्ति से संबंधित अन्य जानकारियां भी पढ़ी। 'तो ये गवर्नमेंट जाब में है और यदि इनने कंपनी के कूपन में रूचि दिखाई है तो फोन काल पर टर्न‌अप भी हो सकते हैं..वैसे भी नाम प्रार्थनेय कुमार है, शायद प्रार्थना सुन ही लें..कूपन पर ईनाम निकलने की बात जानेंगे तो लेने यहां आएंगे ही' सर्वे फार्म में जॉब वाले कालम को पढ़कर प्रिया ने सोचा था। दरअसल वह एक लिमिटेड कंपनी में कस्टमर केयर ऑफीसर के पद पर काम करती है, और अभी तीन महीने की प्रोबेशन अवधि में है। जिसे पूरा करने पर उसकी नौकरी पक्की होगी। दो माह पहले कंपनी ज्वाइन करते समय वह काफी उत्साहित थी। लेकिन अब कंपनी का टास्क पूरा कर पाना असंभव सा जान पड़ रहा है। 

       पहले वह सर्वे सूची के ग्राहकों के नाम, उम्र और व्यवसाय पर ध्यान नहीं देती थी। सूची के क्रमानुसार ही उन्हें फोन करती और कूपन पर ईनाम निकलना बताकर इसे लेने एरिया आफिस आने के लिए कहती। इस चक्कर में उसे लोगों से डिफरेंट टाइप के प्रश्नों का सामना भी करना होता है। कुछ तो द्विअर्थी अश्लील बातें करने लगते हैं और कुछ हिसाबी प्रश्नों में उलझाते हैं।जैसे कि ईनाम में क्या निकला है, कितने का है, या जितने का ईनाम नहीं होगा, उससे ज्यादा इसे लेने में खर्च हो जाएगा, इसे घर भी तो भेजा जा सकता है, वहां आने की क्या जरूरत। ऐसे लोगों को ईनाम लेने के लिए मोटीवेट करना असंभव होता है। वह अभी तक भावी ग्राहकों को बुलाने के अपने लक्ष्य का मात्र बीस-पच्चीस प्रतिशत ही कर पाई है। जबकि दो महीने का समय निकल चुका है। पता नहीं शेष एक महीने के प्रोबेशन पीरियड में लक्ष्य पूरा कर पाएगी या नहीं। उसके लिए यह चिंता की बात है। इन दिनों उसे नौकरी जाने का भय भी सता रहा है। एरिया मैनेजर से भी दो बार उसे चेतावनी मिल चुकी है और उसके कम्युनिकेशन स्किल पर प्रश्न उठाया गया। इसीलिए अब फोन करने से पहले वह अपने ऑडियंस के मनोविज्ञान का अनुमान लगाती है। अब उनके नाम, उम्र और व्यवसाय पर गौर करती है तभी उन्हें फोन मिलाती है।  

       दरअसल कूपन वाली इस गतिविधि से कंपनी अपनी एक बीमा पॉलिसी का प्रचार कर रही है और ईनाम लेने के बहाने भावी ग्राहकों को अपने ब्रांच आफिसों में बुलाकर इसके लिए परसुएट करती है। प्रार्थनेय कुमार के नाम, उम्र और व्यवसाय से प्रिया का अनुमान था कि "इस उम्र में आकर लोग परिवार और अपने स्वास्थ्य के प्रति फिक्रमंद हो उठते हैं। ये या तो रिस्पांसिबिलिटी निभाते-निभाते इकोनॉमिकली वीक हुए रहते हैं या इसे पूरा कर लेने के बाद इनकी सेविंग बढ़ी हुई होती है, इन्हें इस प्लान के लिए आसानी से मोटीवेट किया जा सकता है। और यदि ये महाशय सरकारी नौकरी में हैं, तो हो सकता है ऊपरी कमाई भी है, इन्हें ही क्यों न फोन किया जाए" सोचकर प्रिया ने प्रार्थनेय कुमार का नंबर डायल कर दिया था। पूरी रिंगटोन जाने के बाद भी उनका फोन नहीं उठा। वह दुबारा नंबर डायल करने जा रही थी कि एरिया मैनेजर रिचा का बुलावा आ गया। वह अचानक कुर्सी से उठी और बगल के कमरे की ओर चल पड़ी। एरिया मैनेजर ने उसे सामने कुर्सी पर बैठने के लिए इशारा किया। वह थोड़ी नर्वस थी लेकिन ऊपर से शांत दिखाई पड़ रही थी। 
       
       "प्रिया इट इज माई लास्ट वार्निंग, योर सक्सेज रेट इज बिलो दैन फोर्टी परशेंट.. नाउ यू हैव टू इम्प्रूव वेरी फास्ट..डु यू अन्डरस्टैंड? इट्स वेरी इम्पोर्टेंट दैट यू शुड थिंक.. व्हाइ योर टारगेटेड आडियंस डज नॉट टर्न‌अप!"
     
        "ज..जी मैम..ब..बट…" प्रिया हकलाई। ब्रांच मैनेजर रिचा की आयु बत्तीस-पैंतीस वर्ष के बीच होगी। उनके पसीनाए चेहरे पर जबर्दस्ती का मेकअप झलक रहा था और आंखों में लगाया हलका धारीदार काजल पसीने के कारण कुछ फैल सा गया था। कमरे में एसी चल रहा था। लेकिन बगल के बड़े रूम में, जिसमें एसी नहीं था, वहां ग्राहकों से कंपनी के बंदों का कन्वर्सेशन चल रहा था, जो ग्राहकों को कंपनी के प्लान के बारे में समझाइश दे रहे थे। मैडम को बार-बार वहां आना-जाना पड़ रहा था, शायद इसीलिए उनके चेहरे पर पसीना था। इस ब्रांच में अधिकतर बंदे चौबीस-पचीस से लेकर चालीस साल की आयु के बीच के थे। स्वयं प्रिया पच्चीस वर्ष की थी। वह साधारण नैन-नक्श वाली और हलके सांवले रंग की थी। आफिस वह बिना मेकअप के ही आती है। जबकि कार्पोरेट कल्चर में व्यक्तित्व को आकर्षक बनाए रखने का भी चलन होता है।
     
       "तुम कुछ बोल रही थी प्रिया..?" प्रिया के अचानक चुप हो जाने पर रिचा मैडम ने पूंछा। 
     
    "मैडम मैं पूरा एफर्ट कर रही हूं..लेकिन मैम…" बोलते-बोलते प्रिया रुक गई।

       "लेकिन क्या.." प्रिया को बात पूरी न करते देख रिचा बोली। 

      "मैम.. मैं कहना चाह रही थी..कूपन बांटने वाले बंदे ग्राहकों को समझे बिना इसे उन्हें देते चले जाते हैं..इसीलिए अधिकांश ऑडियंस टर्न‌अप नहीं होते… इस पर भी सोचना चाहिए.." प्रिया ने कहा। 

      "ओके..बट यार..तुम इस पर नहीं…अच्छा जाओ..अपने काम पर फोकस करो.. अदरवाइज.." रिचा की बोली थोड़ी तल्ख़ थी। 

      "ओ के मैडम.." प्रिया ने कहा। 

    अपने टेबल पर आते ही प्रार्थनेय कुमार का मोबाइल नंबर डायल कर दिया। 
       
                           
       ‌ * * *

        प्रार्थनेय कुमार के पैंट की जेब में रखा फोन बजा। उन्होंने फोन निकाला। मोबाइल में नंबर फीड न होने से इस नंबर की काल को पहले उन्होंने रिसीव नहीं किया था। लेकिन किसी जरूरी बात सोचकर फोन उठा लिया। लेकिन बिजनेस काॅल समझते ही स्वयं को व्यस्त बताकर फोन काट दिया। प्रिया ने इस अनुमान से फोन किया था कि यह व्यक्ति समझाने बुझाने से कंपनी का उपभोक्ता बन सकता है। एम बी ए में पर्सुएशन और अनुनयन का महत्त्व उसे पता था। इसलिए डेढ़ घंटे बीतते ही उसने फिर प्रार्थनेय कुमार को फोन किया। उन्होंने फोन उठाया तो उसने अपना परिचय दिया "जी सर.. मैं प्रिया बोल रही हूं..कंपनी से।" 'कंपनी' की बात पर प्रार्थनेय कुमार ने रूखेपन से बोला, "हां कहिए.." लेकिन प्रिया को इसकी परवाह नहीं हुई। उसे विश्वास था कि वह जो कहने जा रही है, उसे सुनकर वे उसकी बातों में रुचि लेंगे, उसने कहा,
    
     "सर आपका ईनाम निकला है।" 

      लेकिन प्रार्थनेय कुमार की "हूं..तो.?" जैसी उपेक्षात्मक प्रतिक्रिया से उसे विस्मय हुआ। उसने पूंछा, "अरे सर..! ईनाम निकलने पर आप खुश नहीं हुए क्या!" लेकिन उनकी आवाज वैसी ही रही, "भला मेरा ईनाम क्यों निकलने लगा.."‌। प्रिया ने उन्हें बताया कि लखनऊ के एक पेट्रोल पंप पर उसकी कंपनी का कूपन लिया था और ईनाम उसी कूपन पर निकला है। एक लड़के ने कूपन देते समय किसी सर्वे की बात कहकर उनसे नाम, मोबाइल नंबर और पेशा भी पूंछा था। इसे याद करते हुए प्रार्थनेय कुमार ने कहा, "कंपनियों का कूपन-सूपन पर ईनाम-फिनाम निकालना उनके विज्ञापन का तरीका है, और इस बहाने ये पैसा भी वसूलती हैं।" यह सुनकर प्रिया को चिंता हुई कि कहीं यह भावी उपभोक्ता हाथ से न निकल जा‌ए। उसने मनाने के स्वर में प्रतिवाद किया, "नहीं सर..आप आइए केवल अपना ईनाम लेकर जाइ‌ए..आपको कुछ भी नहीं देना है।" उसने उनकी रुचि ईनाम में मिलने वाली चीज के बारे में बताया और इसे लेने के लिए अगले दिन लखन‌ऊ में हजरतगंज स्थित आफिस आने के लिए कहा। इसमें किचेन में डेली यूज होने वाले कुछ सामान थे।

        प्रार्थनेय कुमार की ईनाम लेने में रुचि नहीं थी। सोचा, नाहक ही इस लड़की से बात की, उसे टालने के अंदाज में कहा कि वे लखन‌ऊ में नहीं हैं। लेकिन प्रिया भी उनके जैसे ऑडियंस को छोड़ने वाली नहीं थी और उसने पूंछ लिया कि वे लखनऊ कब आएंगे। उनके यह कहने पर कि "कोई निश्चित नहीं है..हो सकता है संडे-वंडे को आना हो.." उसने भी कह दिया था "ओके सर, हम आपको काल करेंगे..।" प्रिया का मन कह रहा था कि यह व्यक्ति फोन करने पर टर्न‌अप हो सकता है इसलिए नेक्स्ट संडे को फिर फोन करने का निश्चय कर फोन काट दिया।
                               ****
      
        रविवार का दिन था। आज हजरतगंज स्थित कंपनी के आफिस में भावी ग्राहकों के साथ मोटीवेशल कांफ्रेंस होना था। इसके लिए ग्राहकों को बुलाने की जिम्मेदारी प्रिया की थी। उसने सर्वे सूची से क‌ई नाम छांटे और उन सब को फोन कर उनके कूपन पर ईनाम निकलना बताया तथा इसे लेने कंपनी के ऑफिस में आने के लिए कहा। लेकिन उसके बहुत प्रयास करने पर भी बमुश्किल तीन लोग ही ब्रांच ऑफिस में आने के लिए तैयार हुए थे। इधर अब तक इग्यारह बज चुका था और मीटिंग भी एक बजे से शुरू होनी थी। अब उसे चौथे टेबल के खाली रहने की चिंता सता रही थी। इसके लिए एरिया मैनेजर ने उसे अल्टीमेटम भी दिया था। अचानक उसे प्रार्थनेय कुमार से हुई पिछली बातचीत ध्यान में आया! शायद वे लखनऊ आ ग‌ए हों, सोचते हुए उन्हें फोन कर दिया। 

       मोबाईल की रिंग टोन बजी तो प्रार्थनेय कुमार ने फ़्लैश हो रहा नंबर देखा। यह नंबर उन्हें कुछ जाना पहचाना लगा। शायद इस पर किसी से उनकी बातचीत हो चुकी है, सोचकर फोन उठा लिया। उनका अनुमान सही था। यह एक लड़की का फोन था। जिसने चार पांच दिन पहले हुई बातचीत याद कराया और उन्हें ईनाम लेने के लिए कंपनी के आफिस हजरतगंज आने के लिए कहा। 

      लेकिन वे इस बात से परिचित थे कि कंपनियों की कूपन पर ईनाम निकालने की गतिविधि उनके प्रोडक्ट या सेवा के विज्ञापन का तरीका है। इसलिए आधा घंटा बाद लखनऊ पहुंचने और फिर लखनऊ से बाहर जाने की बात कहा तथा ईनाम लेने आने में असमर्थता जताई। यह सुनते ही प्रिया नर्वस हो गई थी। उसे अपने एम बी ए की डिग्री पर खीझ भी हु‌ई। क्योंकि उसे जैसे अब सम‌झ में आया हो कि 'अनुनयन' या 'परसुएशन' जैसी किताबी बातों से बेवकूफ या अज्ञानी लोग ही प्रभावित होते हैं। फिर भी, क्यों न प्रार्थनेय कुमार से थोड़ी प्रार्थना ही कर ली जाए, सोचकर उसने उनका मोबाइल नंबर डायल कर दिया।
       
       इधर मोबाईल फोन की रिंगटोन सुनते ही प्रार्थनेय कुमार समझ ग‌ए कि यह उसी लड़की का फोन है। उन्होंने खीझते हुए कहा 

       "मैंने कह दिया है न…मेरा आना संभव नहीं है, आज लखनऊ से बाहर जाना है मुझे।" 

        लेकिन प्रिया ने घिघियाकर बोला, 

     "अरे सर…मैं आपकी बेटी समान हूं..प्लीज सर…बस आपको आना है, एक घंटे में हम आपको फ्री कर देंगे..यहां कांफ्रेंस हॉल में कुछ लोगों के साथ केवल एक छोटा सा प्रोग्राम है..आप से रिक्वेस्ट है सर..पत्नी को भी साथ में ले आएं..हम आपका ईनाम भी पैक करा दे रहे हैं सर।" 

        जैसे प्रार्थनेय कुमार धर्मसंकट में पड़ ग‌ए हों और जब उनसे कुछ कहते नहीं बना तो केवल यह बोलकर चुप हो ग‌ए कि "अच्छा..लखनऊ पहुंचकर देखते हैं..।" इसपर प्रिया भी चहकी, 

      "ठीक सर, थोड़ी देर बाद मैं फिर फोन करती हूं" उसे जैसे संजीवनी मिली।            
      
       अभी आधा घंटा भी नहीं बीता कि प्रिया का फिर फोन आया और उनसे लखनऊ पहुंचने के बारे में पूछा। लेकिन उनके कुछ बोलने के पहले ही उसने कहा, 

      "प्लीज सर मुझे अपनी बेटी समान ही समझना, ब्रांच आफिस जरूर आइए, आपका ईनाम भी पैक हो गया है अब मना मत करिएगा।" 

       वैसे प्रिया के बोलने का यह अंदाज और उसके शब्द उसके प्रोफेशनल उद्देश्य के लिए थे, लेकिन प्रार्थनेय कुमार ने इसे भावनात्मक रूप से ग्रहण कर लिया। वह कह बैठे,

        "अच्छा ठीक है आते हैं।" 

      इस बातचीत के बाद किसी ने कॉल करके उन्हें ईनाम का कोड नोट कराया गया। उन्हें कोड देने की यह ऐक्टिविटी कंपनी का ग्राहकों के हित की चिंता किए जाने का दिखावा लगा।
                          *****

         दोपहर के पौने एक बजा था। कांफ्रेंस हाल की चार में से तीन मेज पर 'टारगेट ऑडियंस' विराजमान थे। वे लोग अपनी पत्नी के साथ आए थे। उनके साथ कंपनी के सेल्स रिप्रेजेंटेटिव इंट्रैक्ट थे। प्रार्थनेय कुमार घर से चले या नहीं, यह जानने के लिए प्रिया ने उन्हें फोन किया। पता चला कि वे यहां आने के लिए घर से निकल चुके हैं और पत्नी भी उनके साथ हैं। प्रिया के लिए यह एक बड़ी सफलता थी, उसका खुश होना लाजिमी था, इस खुशी में उसने फोन पर ही उनसे कहा कि वह उनकी प्रतीक्षा करती मिलेगी।  
         
          प्रार्थनेय कुमार गाड़ी पार्क कर कंपनी का आफिस खोजते हुए गली में आ गए थे। इसी बीच प्रिया की कॉल आई। कान के पास फोन ले जाते ही प्रिया ने उन्हें देख लिया था। उसने पीछे मुड़ने के लिए कहा। उन्होंने मुड़कर देखा। सामने की बिल्डिंग की पहली मंजिल पर एक लड़की रेलिंग के पास खड़ी थी। वह कान पर मोबाईल लगा‌ए हुए थी। उनके देखते ही उसने हाथ के इशारे से उन्हें वहां आने के लिए कहा। उस बिल्डिंग में ही कंपनी का आफिस था। वे पहली मंजिल पर पहुंचे। लड़की उन्हें अपने सहायक मैनेजर के पास ले ग‌ई और उनसे यह कहकर कि अब ये आपको अटेंड करेंगी, चली गई। उनको जैसे किसी की सुपुर्दगी में दे दिया गया हो। ईनाम का कोड नंबर भी उनसे नहीं पूंछा गया। सामने पानी का गिलास रखा गया, लेकिन उसे पीकर कंपनी का ऋणी नहीं होना चहते थे, इसलिए प्यास न लगने का बहाना बनाया। वैसे भी कार्पोरेट कल्चर में कुछ भी मुफ्त नहीं होता और यह ईनाम भी नहीं। यहां सब चीजों के लिए कीमत चुकानी होती है। मस्तिष्क में चल रहे इन विचारों के बीच वे यह भी निश्चय कर चुके थे कि यहां आ ही ग‌ए हैं तो देखा जा‌एगा और इनके झांसे में नहीं आना है। खैर, उन्हें कांफ्रेंस हाल में ले जाया गया। जहां एक बड़े कमरे में चार अलग-अलग टेबल के साथ स्टूलनुमा ऊँची कुर्सियां रखी थी। जहां तीन पर बैठे लोगों से कंपनी के कर्मचारी वार्ता करने में मशगूल थे। उन्हें चौथे टेबल पर बैठाया गया।

      कुछ क्षण बाद छब्बीस-सत्ताईस साल का एक लड़का उन्हें अटेंड करने आया। गर्मी के मौसम में टाई पहने हुए वह स्वयं को कार्पोरेट आफिशियल्स दिखाने की भावभंगिमा में था। उसने उन पति-पत्नी को मुआयना करने के अंदाज में देखा! उनके साधारणपन से उसने सोचा पता नहीं ये कंपनी का प्लान ले पाएंगे भी या नहीं! उसके चेहरे पर हलका सा तनाव झलका उठा। दरअसल वह इस कंपनी में सेल्स रिप्रेजेंटेटिव है पिछले बीस दिनों से वह भावी उपभोक्ताओं के साथ अपने "परसुएशन" कला का प्रयोग कर इस 'प्लान' के लिए उन्हें रिझाने और मनाने का काम कर रहा है, लेकिन अभी तक किसी को भी इसका ग्राहक नहीं बना पाया है। जबकि महीने में एक ग्राहक तैयार करने का उसका लक्ष्य है। कुर्सी पर बैठते ही स्वयं को सँभालते हुए उनकी ओर देखकर वह अपने तरीके से मुस्कुराया और कहा, 

        "देखिए मैं आपके बारे में कुछ पूंछता हूं और आप भी मेरे बारे में जो मन में आए वह पूंछिए।' 
                    
                       *****
          
        लड़के ने प्रश्न पूंछने की बात मुस्कुराते हुए कही थी, इस पर प्रार्थनेय कुमार ने सोचा कि जो दूसरे का मनोभाव न ताड़ पाए, वह मासूम होता है। वे कहना चाहते थे "बेटा, मुस्कुराते हुए तुम बहुत मासूम लगते हो और हाँ, तुम्हारे बारे में क्या पूंछना, तुम नौकरी कर रहे हो वही करो, तुमसे मै कुछ नहीं पूछुंगा..अन्यथा यही होगा कि तुम्हारी बात मैं गंभीरता से ले रहा हूं जबकि ऐसा है नहीं..हां तुम जो भी मेरे बारे में जानना चाहोगे, मैं बताऊंगा.." लेकिन संकोचवश बोले नहीं मौन ही रहे।
       
        उनकी चुप्पी देख लड़के ने अपनी एम बी ए की डिग्री खंगाला। सेल्स रिप्रेजेंटेटिव को उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए उनसे अंतरंग लगाव स्थापित करना चाहिए। इससे ग्राहक पर मनोवैज्ञानिक असर होता है, इससे वह वह उन्हें आसानी से समझा और मना लेता है। इसे याद कर लड़के ने कहा , 

        "अच्छा चलिए अंकल.. मैं ही आपके बारे में पूंछता हूं.."
    
       उसने पहले जॉब के बारे में पूँछा। उत्तर मिला तो वह चमका उठा। सोचा, इनकी नौकरी ऊपर की कमाई वाली है, तब तो ये आसानी से कंपनी का यह प्लान ले सकते हैं। और इस खुशी में चहकते हुए प्रार्थनेय कुमार के बगल में बैठी उनकी पत्नी से नाम पूँछ लिया, 

        "मूर्ति देवी.." सुनकर लड़के की हँसी छूट गई। उसने कहा "आप दोनों को नहीं लगता कि आपका नाम यूनीक और मैचिंग टाइप का है?" प्रार्थनेय कुमार भी थोड़ा हँसे और कहा, "नाम ही नहीं, पर्सनली भी हम दोनों मैच करते हैं।" इसे सुनते ही लड़का सहज हो गया। उसने खुलकर प्रार्थनेय कुमार से पूँछताछ शुरू कर दी। साथ में उनका आइडेंटीफिकेशन फार्म भी फिल‌अप करता रहा। इस बातचीत से उत्साहित हुआ उसने कहा, 

       "इतनी देर से हम आपके बारे में पूँछे जा रहे हैं, आपने तो हमारे बारे में कुछ पूंछा ही नहीं, अब आप भी पूंछि‌ए..अच्छा चलिए मैं ही अपने बारे में बताए देता हूं।"  

       लड़के ने भी अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताया। वह इससे प्रसन्न था कि प्रार्थनेय कुमार उसकी बातों में खूब रुचि ले रहे थे। उसने कहा, 

      "देखिए इस फार्म पर मैंने आपकी कुछ जानकारियां ली है, यदि हमारी एरिया मैनेजर मैम इसे अप्रूव कर देती हैं तो हम कंपनी के प्लान के बारे में आपसे बात करेंगे, अब आगे यह सेशन बहुत महत्वपूर्ण होगा।" 
     
        लड़के ने 'अप्रूव' शब्द ऐसे बोला जैसे उसकी एरिया मैनेजर किसी महत्वपूर्ण एक्जाम का रिजल्ट डिक्लेयर कराने जा रहीं हों। दर‌असल 'अप्रूव' कराने का दिखावा उपभोक्ता को उसके विशेष होने की अनुभूति कराने की कवायद थी। जिसके प्रभाव में सामने बैठा व्यक्ति कंपनी का उपभोक्ता बनने के लिए तैयार हो जा‌ए। दूसरी बात यह कि इस तरह कंपनियां अपने उत्पाद को प्रामाणिक और महत्वपूर्ण दिखाती हैं। उस फार्म पर एरिया मैनेजर द्वारा बिना कुछ जाने समझे और लापरवाही से कलम चलाते देख प्रार्थनेय कुमार ने यही अनुमान लगाया। 

        एरिया मैनेजर के जाने के बाद सेल्स रिप्रेजेंटेटिव बना वह लड़का उनसे बोला, "सर, मैडम ने अप्रूव कर दिया, अब आप कंपनी के प्लान के लिए एलिजिबल हैं, आइए हम आपको पूरा प्लान समझाते हैं, इसे ध्यान से सुनिएगा.." 

                  ******

            लड़के ने ध्यान से सुनने के लिए कहा तो प्रार्थनेय कुमार का ध्यान टाइम पर गया। प्रिया ने एक घंटे का समय मांगा था। लेकिन अभी तो आधा घंटा ही हुआ है। उन्हें स्वयं से चिढ़ सी हुई कि नाहक ही यहां आकर फंसे। अब बीच में उठना भी अच्छा नहीं। उन्होंने लड़के की ओर देखा। सेल्समैन की भूमिका में मुस्तैद उन्हें वह आशा भरी निगाह से देख रहा था। वे उसे निराश नहीं करना चाहते थे, उनके मुंह से निकला, अच्छा समझाओ।  

       "तो फिर हम शुरू करते हैं.." कहकर लड़के ने इंश्योरेंस पॉलिसी की किश्तें और मेच्योरिटी की धनराशि समझाने लगा। इसी बीच एक स्वर सुनाई पड़ा। हाथ में गुलदस्ता लिए एरिया मैनेजर बोल रहीं थी। वे उस उपभोक्ता जोड़े का ताली बजाकर स्वागत करने के लिए कह रहीं थीं जिसने अभी-अभी कंपनी का इंश्योरेंस प्लान लिया था। सब की तरह प्रार्थनेय कुमार ने भी खड़े होकर ताली बजाया। युवा जोड़ा स्वागत से अभिभूत स्वयं को स्पेशल समझते हुए गर्वित भाव से गुलदस्ता ग्रहण करता दिखाई पड़ा। शायद कंपनी के एडवर्टाइजिंग का यह भी एक तरीका हो, अन्यथा मँहगे प्रीमियम वाली यह पॉलिसी कौन लेता है या फिर कंपनी के सेल्स मैनेजर की बातों में आकर ही ये मुर्गा बने हों! वेलकम सेरेमनी के बाद प्रार्थनेय कुमार अपने इस निष्कर्ष के साथ बैठ ग‌ए। वे सेल्स रिप्रेजेंटेटिव उस लड़के से एक बार फिर मुखातिब हुए।

         लड़के ने उनके उपभोक्ता मन को टटोला। 'प्रॉमिस' वाली मार्केटिंग स्किल की थीम पर कि लोग साबुन नहीं खरीदते हैं, वे सुन्दरता की उम्मीद खरीदते हैं, उसने प्रार्थनेय कुमार से 'प्रॉमिस' किया कि इस इंश्योरेंस पॉलिसी को लेने का अर्थ है कि आप अपनी और परिवार के सुरक्षा की गारंटी खरीद रहे हैं। लेकिन सुरक्षा गारंटी वाली बात पर न जाने क्यों प्रार्थनेए कुमार गंभीर होने का दिखावा कर ग‌ए। इससे उत्साहित हुआ लड़का उनकी पत्नी मूर्ति देवी की ओर देखते हुए अपनी सेल्समैनी वाली स्किल का छक्का जड़ दिया,

       "यदि पॉलिसी लेने के बाद आप मर जाते हैं तो कंपनी सारी किश्तें स्वयं जमा करेगी और अवधि पूर्ण होने पर आपके परिवार को पैंतीस लाख रूपए मिल जाएगा।" 

                 ******

      बीमाधारक के मरने पर परिवार को पैंतीस लाख रुपए मिलने की बात लड़के ने ऐसे कहा था जैसे कंपनी अपने इंश्योरेंस पॉलिसी में मरने का भी ऑफर दे रही हो! मतलब पॉलिसी लेने के बाद बीमाधारक का मरना ही उसके लिए बेहतर लाभ है। प्रार्थनेय कुमार ने अभी 'हां..हूं' ही किया था कि मूर्ति देवी की कड़क आवाज सुनाई पड़ी, वे जैसे लड़के को झिड़कते हुए कह रहीं थी,
      
         "अच्छा तुम ये बताओ! तुमने हमें बुलाया क्यों है? इतनी देर से मैं देख रहीं हूं तुम फालतू की बात किए जा रहे हो। क्या इसीलिए बुलाए हो?"
     
      "मैडम मैं पालिसी के बारे में ही तो बता रहा हूं, और ईनाम भी तो लेना था आपको…" मूर्ति देवी की बात से भौंचक्का हुआ लड़के ने कहा।

        "सुनो! भाड़ में जाए तुम्हारी पॉलिसी और ईनाम.. हमारे पास समय नहीं है यह सब सुनने के लिए.." 
      
       मूर्ति देवी शांत नहीं हुई, पति की ओर मुखातिब हुई, 
     
        "और तुम! वैसे तो तुम्हारे पास समय नहीं रहता लेकिन यहां बैठने के लिए समय ही समय है! तुम्हें दोपहर बाद कहीं जाना भी तो था..चलो उठो यहां से.."
        
         पत्नी के इस रुख से लड़के के सामने प्रार्थनेय कुमार असहज हो गए। उन्होंने लड़के की ओर देखा। उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आई थी।

     "अरे सर! प्लान मत लीजिए..पंद्रह मिनट और बैठ लीजिए, कम से कम मेरी बात तो पूरी हो जाए..आप से एक घंटे का समय देने के लिए कहा गया था.." लड़के ने मायूसी से कहा जैसे छक्का मारने के चक्कर में उसे बाउंड्री पर लपक लिया गया हो। 

      मूर्ति देवी के चेहरे पर गुस्से का भाव था! फिर भी प्रार्थनेय कुमार ने हिम्मत बटोर कर उनसे कहा,
      
        "हां अभी पंद्रह मिनट बाकी है, बस ये अपनी बात पूरी कर लें तो चल देते हैं.."
    
       "सुनो! तुमको सुनना है तो सुनो..मुझे अब नहीं बैठना.. मैं चलती हूं" कहते हुए मूर्तिदेवी उठने को हुई। तभी स्थिति भांपकर एरिया मैनेजर वहां आई। सेल्समैन लड़के से उसने कहा, "ये नहीं सुनना चाहते तो जाने दो इन्हें।" मूर्ति देवी को उठते देख प्रार्थनेय कुमार भी खड़े हो गए और दोनों बाहर की ओर चल दिए।

      इधर लड़के को समझ में नहीं आया कि ऐसी क्या बात हो गई कि मूर्ति देवी अचानक भड़क उठी और ईनाम लिए बिना ही दोनों जा रहे हैं! उसे अपने मार्केटिंग स्किल पर भी झल्लाहट हुई। उसके आत्मविश्वास को चोट पहुंची थी। अब वह किंकर्तव्यविमूढ़ था। इसी समय एरिया मैनेजर उसके पास आई और बोली, "देखो! वे लोग जा रहे हैं..उनका ईनाम तो उन्हें दे दो।"

      लड़का एक पैकेट उठाकर उनके पीछे भागा, वे अभी आफिस के कोरीडोर से गुजर रहे थे। न चाहते हुए भी उन्हें वह पैकट लेना पड़ा।
     
       दोनों नीचे आ गए थे। प्रार्थनेय कुमार से उनकी पत्नी ने कहा "वैसे तो तुम बहुत समझदार बनते हो, लेकिन यहां बेवकूफ बनने चले आए!"

      देखो तुम भी तो हज़रत गंज चलने की बात पर पहले से ही तैयार होकर बैठ गई थी..और बात बेवकूफ बनने की नहीं, उस लड़की प्रिया ने यहां आने के लिए इस तरह रिक्वेस्ट किया कि टाल नहीं पाया..आना पड़ा..हो सकता है.. मेरे आने से उसे जाब में कुछ सहायता हुई हो..

       "लेकिन तुमने लड़के की आँखों में नहीं देखा! उसकी आँखों में बेबसी झलक रही थी, जैसे अपने अंदर कोई पीड़ा छिपाए हो! आज के दौर में प्राइवेट कंपनियों में भी नौकरी करना आसान नहीं है..और हां कितनी बार मैं बाहर निकलती हूं..?" मूर्ति देवी ने शांत भाव से लेकिन पति की ओर आँखे तरेरते हुए कहा। शायद हजरतगंज आने के लिए तैयार होकर बैठने की बात उन्हें बुरी लगी थी।
       
        देखो वह बच्चा है फिर भी कुछ करने की उसके अंदर इच्छा शक्ति भी है। लेकिन तुमने तो उस बेचारे को झिड़क दिया.. प्रार्थनेय कुमार ने मुस्कुरा कर पत्नी से कहा।
   
        "यह तो दूसरी बात है, उसने कुछ ऐसा कह दिया था, और देखो! मैं कोई बात बनाकर नहीं कह पाती" मूर्ति देवी ने कहा।

          दोनों पैदल चलते हुए हजरतगंज के मुख्य स्ट्रीट पर आ ग‌ए थे। अचानक प्रार्थनेय कुमार ने कहा, "आओ मोतीमहल में चलकर कुछ खाते हैं।" दोनों रेस्टोरेंट में चले ग‌ए थे। 

        रेस्टोरेंट से निकलने पर मूर्ति देवी ने पति से कहा "देखो तुम्हारे पास कोई ढंग का कुर्ता नहीं है, चलकर ले लेते हैं। रविवार का दिन था ज्यादातर दुकानें बंद थी। वे दोनों दुकान खोजते हुए आगे बढ़ ग‌ए। 

                         **********    

        

        



         

       

        

         

 

शनिवार, 28 मई 2022

किसी को जिंदा कर देना

           सच तो यह है, मैं यह बातें लिखने के मूड में नहीं था। लेकिन हमारे जिले के जिला अस्पताल के डिप्टी सीएमओ श्री मातनहेलिया जी ने मुझसे कहा आपको यह बात अधिक से अधिक लोगों को अवश्य बताना चाहिए। लोगों के लिए यह प्रेरणादायी है इससे समाज को लाभ मिल सकता है। तो, इस बात को लिखना या इस घटना को सब के बीच में ले आना स्वयं के लिए वाहवाही कराना या आत्मप्रचार का हिस्सा नहीं है। बल्कि जो कर पाया, उसे करने की जानकारी किसी का लिखा पढ़कर ही हुई थी। अचानक किसी की कुछ पलों के अंदर हुई मौत और वह भी एक अच्छे-भले स्वस्थ इंसान का, बहुत झकझोरने वाली होती है क्योंकि मेरा मानना है जीवन इतना अनिश्चित भी नहीं होता। प्रकृति ने किसी भी जीव के शरीर को इस तरह नहीं गढ़ा है कि उसके जीवन धारण की क्षमता अनिश्चित हो! यदि जीवन ऐसा ही होता तो सदियों से मानव सभ्यता अपने भविष्य की चिन्ता करते हुए दिखाई न देती! प्रकृति की चीजों में देखिए तो इसमें एक अद्भुत सिमेट्री दिखाई पड़ती है!! माने यह सृष्टि में व्याप्त एक निश्चित नियम की ही ओर इशारा है। तो फिर ऐसी मौतों के पीछे कौन से कारण हैं और क्या ऐसे व्यक्ति को नहीं बचाया जा सकता? यह प्रश्न मन को बेचैन करता है। इसके लिए इस विषय पर सोशल मीडिया या इंटरनेट आदि पर यदि  कोई लेख मिलता है तो उसे मैं जरूर पढ़ता हूँ।
        
        ऐसे ही फेसबुक पर एक प्रसिद्ध पत्रकार संजय सिन्हा जी हैं, एक बार उन्होंने अपने भाई की अचानक हुई ऐसी ही मृत्यु की कहानी लिखी थी। उन्होंने लिखा था, काश! मेरे भाई के पास उस समय कोई होता तो वह आज जिंदा होता। खैर, मैं आज बताता हूं कि उन्होंने अपनी उस कहानी में क्या लिखा था, और कैसे उनके भाई की जान बचती।
       
          उस दिन मेरे ड्राइवर की तबियत थोड़ी सी नासाज थी। एक तो वह बहुत संवेदनशील है, दूसरे समस्याओं को लेकर गहरी चिंता कर बैठता है। सुबह इग्यारह बजे के आसपास मुझसे अपनी तबियत खराब बताकर वह जिला चिकित्सालय  दवाई लेने गया था। वहां से वापस आकर उसने मुझे दवा लेने के बारे में बताया भी। मैंने सोचा शायद बहुत अधिक चिंता करने आदि के कारण इसकी तबियत खराब हुई होगी। उसे देखने से मुझे ऐसा प्रतीत नहीं हुआ कि आज इसके जीवन पर कोई गंभीर संकट मँडरा रहा है। इस समय दोपहर बाद के ढाई बज रहे होंगे, मेरे आफिस के ज्यादातर लोग लंच पर चले ग‌ए थे। मैं विकास भवन की पहली मंजिल पर अपने कक्ष में बैठा अपने कार्यालय सहायक के साथ किसी बात पर विमर्श कर रहा था।
         
          अचानक मेरे कक्ष के सामने की गैलरी में किसी भारी चीज के गिरने जैसी धम्म की जोर की आवाज सुनाई पड़ी! हम दोनों चौंक ग‌ए थे। मुझे लगा जैसे किसी ने भरा बोरा फर्श पर पटक दिया हो। अपनी कुर्सी पर बैठे हुए मैंने उस गैलरी की ओर खुल रहे अपने कक्ष के दरवाजे की ओर देखा। दरवाजे के आधे भाग तक पर्दा फैला था। मैंने फर्श पर मोजा देखा, बावजूद इसके मुझे एक क्षण तक कुछ समझ में नहीं आया यह पैर में पहना हुआ मोजा है क्योंकि उसके  शरीर का बाकी भाग पर्दे और दीवाल की ओट में था!! अब तक धम्म की आवाज आए छह-सात सेकेंड भी हो चुका था। मैंने अपने कार्यालय सहायक से बाहर चलकर देखने के लिए कहा। हम दोनों जैसे ही अपने कक्ष से निकले, बाहर का दृश्य देखकर हम आवाक थे! अरे!! यह तो मेरा वही ड्राइवर था जो कुछ देर पहले अस्पताल से दवा लेकर आया था! वह  फर्श पर चित पड़ा था!! तो इसी के गिरने की आवाज आई थी। मेरे समझ में यह बात आ गई। हम झपटकर उसके पास पहुंचे। उसके चेहरे को देखा, उसकी दोनों आँखें खुली हुई और पुतलियां ठस स्थिर एकटक शून्य की ओर निहारती प्रतीत हुई। उसके चेहरे पर पानी की छींटें मारी गई, लेकिन इसका कोई असर होता नहीं दिखाई पड़ा। मैंने उसका सिर अपनी बाहों में लेकर उसे उठाने का प्रयास किया। लेकिन उसका शरीर एकदम से झूल रहा था। मैंने ध्यान दिया, उसकी सांसें थम चुकी थी और उसके हृदय की धड़कन बंद थी! मुझे उसके 'डेडबाडी' हो जाने का अहसास हुआ। यही वह क्षण था जब मुझे संजय सिन्हा की पढ़ी उनके भाई की कहानी याद आई। उनका भाई अपने ऐसे ही दुखद क्षण में अकेला था, लेकिन यहां मैं अपने ड्राइवर के साथ था।
         
        मैं समझ गया था, मेरे ड्राइवर को सडेन कार्डियक अरेस्ट हुआ है, और इनका हार्ट फेल हो गया है अर्थात हृदय ने काम करना बंद कर दिया है। मैं जानता था कि हार्ट अटैक में मरीज को बचने की उम्मीद अधिक रहती है लेकिन कार्डियक अरेस्ट में यदि तत्काल उपचार न मिले तो मरीजों की जान चली जाती है। ऐसी स्थितियों में मरीजों को सीपीआर (Cardiopulmonary Resuscitation) देकर बचाया जा सकता है। सोचा, अब तो जो होना था हो चुका है, एक आखिरी प्रयास मैं सी पी आर दे कर लेता हूं, शायद हृदय फिर से धड़कना शुरू कर दें! हालांकि सी पी आर के बारे में मैं पूरी तरह भिज्ञ नहीं था मुझे बस इतना ही पता था कि इसमें हथेलियों से मरीज की छाती को दबाया जाता है और दबाने की गति एक मिनट में कम से कम सौ बार की होनी चाहिए। और ऐसे मामले में इसे दो मिनट के अंदर शुरू कर देना चाहिए!  अब बिना समय गंवाए मैंने सी पी आर देना शुरू कर दिया था। 
       
          हथेलियों से ड्राइवर के सीने को बिना रुके लगातार पंच करते हुए सात-आठ मिनट हुए होंगे, जब मैंने उसके बाएं हाथ की दो अंगुलियों में तनिक सी हरकत देखी! इसे देखकर सोचा  शायद इसके पीछे सी पी आर देते समय शरीर का हिलना कारण हो, लेकिन दूसरे ही क्षण मुझे आभास हुआ, नहीं  शायद यह जीवन लौटने का लक्षण है! मैंने वैसे ही उसके हृदय को पंच दिए जा रहा था। मुझे उसके हाथ में बल आता जान पड़ा। मैं सी पी आर दिए जा रहा था। अचानक मुझे उसकी खुली ठस आंखों की पलकों में थोड़ी सी हलचल होती जान पड़ी! लगा जैसे उसकी पलकें झपकाने की कोशिश में हों! मुझे उसका जीवन लौटता जान पड़ा! अभी भी मेरी हथेलियां उसके सीने को पंच कर रही थी। मुझे लगा जैसे वह अपना हाथ मोड़ना चाहता हो! ठीक यही क्षण था जब उसके मुंह से आवाज भी आई! इसके बाद भी मैं पंच देता रहा, अब हर पंच के साथ उसके मुंह से यह आवाज आने लगी थी! और मुझे उसकी चेतना भी लौटती जान पड़ी। उसका जीवन लौट आया, मुझे यह विश्वास हो गया! अब तक मेरे हाथ भी बेतरह थक चुके थे, मैं पसीने से तरबतर लगभग निढाल पड़ चुका था! लेकिन उसे पूरी तरह होश में लाने तक मैं सी पी आर देते रहना चहता था। मैंने किसी दूसरे से पंच देने के लिए कहा। अभी उसने कुछ पंच दिए ही थे कि मैंने ड्राइवर को कुछ इशारा करते हुए देखा न। अब मैंने सी पी आर की प्रक्रिया को रोकने के लिए कहा। मेरे ड्राइवर का जीवन लौट आया था, किसी फिल्म की कहानी जैसे!! और मेरे लिए यह वैसे ही था जैसे मृत्यु के बाद किसी का जिंदा हो जाना!!
      
       ईश्वर से हम सब प्रार्थना करें कि मेरे ड्राइवर को शीघ्र स्वस्थ कर दें, हां  जीवन इतना अनिश्चित भी नहीं होता। ऐसी स्थिति आए तो हम अवश्य किसी का जीवन बचा सकते हैं!!!

सोमवार, 25 अप्रैल 2022

काहे रे नलिनी तू कुम्हलानी तेरे ही नाल सरोवर पानी!


      धरती के पास सब कुछ होते हुए भी यह धरती अब कुम्हलाने लगी है....सुहृद मित्रों! आज मेरा मन जंगल में एकांतवास करने का हो रहा था। संयोग से आज पंचायत दिवस भी मनाया जा रहा था, इसके लिए श्रावस्ती जनपद में सिरसिया ब्लाक की एक ग्राम पंचायत में भी जाना हुआ। तो आज एक पंथ दो काज हुआ, क्योंकि यहां श्रावस्ती में जो जंगल है अर्थात सुहेलवा रेंज, इसी विकास खंड के नेपाल बार्डर की सीमा पर अवस्थित है, मानिए कि यह जंगल ठीक हिमालय पर्वत श्रृंखला के शिवालिक पर्वत श्रेणी के पैर पर है, जो यहां से शुरू होकर नेपाल में पर्वत श्रृंखलाओं की ऊँचाइयों तक चला जाता है। जंगल के मामले में श्रावस्ती जनपद भी तराई के अन्य जनपदों की तरह ही महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका प्रचार-प्रसार कम हुआ है। सुहेलवा जंगल के आसपास के गांवों में जंगल के बीच से बहकर आते नालों के कटान एक दर्शनीय स्थल का निर्माण करते हैं और जंगल के किनारे के गाँव भी दर्शनीय बन पड़ते हैं। हलांकि यह अप्रैल का महीना है, अभी पतझड़ का मौसम चल रहा था इसलिए यहां जंगल में हरीतिमा की कोंपल अभी बस फूटने ही वाली हैं, इसके बाद इस जंगल की हरियाली देखते ही बनेगी। 
         तो, आज मैंने तय किया था कि मुझे इस जंगल के उस भाग में जाना है, जहां दो पैरों वाले जीवों की आवाजाही कम होती हो, क्योंकि वही स्थान अपने मूल प्राकृतिक स्वरूप मे हो सकता है। सुहेलवा रेंज में एक रजिया ताल का नाम मैंने सुन रखा था, वहीं जाने का फैंसला किया। यहां लोगों की आवाजाही कम या लगभग नहीं के बराबर होती है। वैसे इसी क्षेत्र में सोनपथरी नामक एक दर्शनीय प्राकृतिक स्थल भी है लेकिन यहां एक धार्मिक आश्रम होने के कारण इसकी एकांतिकता भंग हुई सी रहती है। इसलिए मैंने आज रजिया ताल को चुना। यहां पहुंचने के लिए गाँव छोड़ने के बाद जंगल में छह-सात किमी अंदर कच्चे रास्ते पर चलना होता है। यह रास्ता एस‌एसबी जवानों के वाहनों एवं वन विभाग के वाहनों के आवाजाही और उन वाहनों के पहियों से निर्मित लीक से बना है, जिस पर बारिश के दिनों में नहीं चला जा सकता। खैर मौसम सूखा होने से हम लोग वहां आसानी से पहुंच ग‌ए। आगे जाकर यह रास्ता नेपाल की सीमा में प्रवेश कर जाता है, जहां से ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं का प्रारंभ है।

           रजिया ताल पर पहुंचने पर मैंने देखा कि दो लोग इस ताल में मछली के कांटे लगाए बैठे थे, लेकिन हमें देखते ही डर के मारे खिसक लिए, वे इतना डरे थे कि अपना जूता भी नहीं पहन पाए। शायद वे पास में नेपाल के गांव से आए थे। यहां तालाब के किनारे चार-पांच सीमेंट के बेंच और तीन मंजिला एक वाच टावर बना है, बाकी जंगल के बीच यह ताल शांत सुरम्य वातावरण के बीच मानव हलचल से कोसों दूर पुराणों में वर्णित सरोवर जान पड़ा। कमल के पत्तों से भरे तालाब के किनारे रमण करते हुए मन यहां के प्राकृतिक सौंदर्य में खो जाना चाह रहा था! यहां बहुतायत में उड़ती हुई रंग-बिरंगी तितलियां यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य को अद्भुत जीवंतता प्रदान करती हुई जान पड़ रही थी।

       लेकिन मन ही मन मैंने अपने इस मन को समझाया कि हम मानव इतने जंजाल पाले हुए हैं कि अब जंगली बन पाना असंभव है..!

बुधवार, 6 अप्रैल 2022

छुट्टा सांड़

उस दिन मैं सुबह टहलने नहीं गया, क्योंकि शहर में था। पत्नी ने टहलने के लिए जाते समय इसके लिए मुझसे पूंछा भी था। होता क्या है कि जब मैं अपने होम सिटी में होता हूं तो सुबह टहलने के लिए नहीं निकलता। इसके पीछे मेरा अपना तर्क यह होता है कि अपने जाॅब प्लेस पर निवास करते हुए वहां रोज सुबह तो टहलता ही हूं। अब एक दिन न टहलने से क्या हो जाएगा! खैर, टहल कर पत्नी वापस आईं और मुझे बताया कि अब तो सुबह में सड़क टहलने वालों से भरी होती है। इसे सुनकर मैंने जैसे अपने सुबहचर्या पर इतराते हुए कहा, "हां मार्निंग वाक का अब काफी प्रचार हो चला है जैसे कि मैं स्वयं अपनी #सुबहचर्या के माध्यम से इसका प्रचार कर देता हूं!" जब मेरी इस बात पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं किया तो मैंने सुबह वाली चाय बनाने के लिए कहा। इस पर वे पहले चिड़ियों के चुगने के लिए बाहर बिस्कुट का चूरा डालने और वहां रखे मिट्टी के कटोरे में पानी भरने की बात कहकर चली गई। खैर चाय भी बनी और इसे पीते-पियाते आठ बज ग‌ए। चाय पीते हुए मैंने खिड़की से बाहर झांका, तो मुझे पेड़ की डाली पर एक बुलबुल फुदकती हुई दिखाई पड़ी, उसे देखते हुए मैंने पत्नी से कहा, यहां हमें और झुरमुटदार पौधे  लगाने चाहिए, जिससे बुलबुल के छिपने और उनके घोंसले के लिए सुरक्षित स्थान मिल सके। उन्होंने बाहर फाइकस के पेड़ों की ओर इशारा करते हुए मुझसे कहा, बहुत पौधे लगाएं हैं इनके लिए यहां पर्याप्त पौधे हैं। अभी मैंने बाहर जो मिट्टी के छिछले कटोरे में पानी भरा है इसमें बैठकर ये पंख को फड़फड़ा कर खूब नहाएंगी! और ऐसे ही ये रोज नहाती हैं और दिन भर यहां फुदकती हैं।" मैंने मन ही मन सोचा पक्षी भी नियमित नहाते हैं, मतलब नहाना भी एक प्राकृतिक क्रिया है और महत्वपूर्ण भी है। खैर अब मैं गौरैयों के बारे में सोचकर कहा, अपने यहां गौरैया के तीन घोंसले भी तो लगे हैं!" पत्नी ने कहा, देखते नहीं इसीलिए तो दिनभर ये भी यहां फुदकती रहती हैं। इसके साथ ही बढ़‌ई को बुलाकर ऐसे ही और घोंसले बनवाने की बात कही। 

            चाय पीकर मैं बाहर बरामदे में आया, वहां पानी भरे उस पकी मिट्टी के कटोरे के चारों ओर पानी की छींटें पड़ा दिखाई दिया। मैं समझ गया कि बुलबुल ने इस कटोरे में बैठकर खूब नहाया होगा और इसमें बैठकर पंख फड़फड़ाया होगा! इसी बीच मेरी दृष्टि एक गौरैया पर पड़ी वह एक उड़ते हुए कीड़े को पकड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे फुदक रही थी, कीड़ा ऊपर की ओर उड़ा तो वह भी उसके पीछे उसे पकड़ने के लिए उड़ चली।

            इसे देखकर मैंने पत्नी को पुकार कर कहा, देखो, तुम्हारे बिस्कुट के चूरे गौरैया नहीं खाती, इसीलिए यह कीड़ा पकड़ने के लिए उसके पीछे उड़ रही है। इससे तो ये गौरैया भी मांसाहारी बन जाएंगी। थोड़ा इधर-उ़धर चावल के किनके भी बिखेर दिया करो। पत्नी ने कहा, गौरैया कीड़े तो खाती ही हैं, और चावल का किनका ये नहीं चुग पाती। पड़ोसी इनके लिए दाना डालती हैं, ये वहां भी चुगते हैं। और यहां बिस्किट के चूरे भी चुगते हैं। इन गौरैयों की यह आदत बन चुकी है। यदि कहीं किसी और स्थान पर कुछ डाल दें तो ये वहां नहीं जातीं। 

             खैर मैं फिर कमरे में लौट आया था। अखबार के किसी पन्ने पर पर्यावरण से संबंधित समाचार पढ़कर यकायक मेरा ध्यान बीती सांझ लखनऊ के शहीद पथ पर मिले एक आटो ड्राइवर की ओर चला गया। दरअसल घर आने के लिए मैं बस से उतरकर आँटो की तलाश में था। एक आटो वाला दो महिला सवारी बैठाए हुए मेरे बगल में आकर रुका। उसने मुझसे मेरा गंतव्य पूँछा और मुझे बैठाना चाहा लेकिन मैं आटो रिजर्व करके जाना चाहता था। उसने कहा कि इन महिलाओं को उनकी मंजिल पर छोड़ते हुए मुझे मेरे गंतव्य तक पहुंचा देगा। लेकिन घर पहुंचने में बिलंब होने की बात कहकर मैंने उसके आटो में बैठने से इनकार कर दिया। इसके बाद उसने किराया बढ़ाते हुए यह भी कहा कि इन महिला सवारियों को उतारकर मुझे अकेले ले चलेगा। लेकिन आटो में बैठी हुई महिला सवारियों को देखते हुए मैंने उसके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और वहीं पास में खड़े एक दूसरे आटो वाले की ओर मुखातिब हुआ। इसने भी वही किराया बताया जो पहले वाले ने बताया था। मैं इसमें बैठ गया। लेकिन किराया समान होने पर भी पहले वाले आटो में मेरे न बैठने का कारण जानकर उसने मुझसे कहा , "किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए" और उसने पहले वाले आटो की ओर अपना आटो बढ़ा दिया। जो अभी भी तीसरी सवारी की प्रतीक्षा में था। उसके पास ले उसने सवारियों की अदला-बदली कर उसने उन महिलाओं को अपने आटो में बैठाया और मुझसे उसमें बैठने के लिए कहा। मैं भी यंत्रचालित सा बिना किसी प्रतिक्रिया के उसी पहले वाले आटो में बैठ गया। 

          शहीद पथ पर चलते समय आटोड्राइवर मुझसे बात भी किए जा रहा था। बिना किसी लाग लपेट के वह बातें कर रहा था। उसकी बातें दिलचस्प भी थी। लेकिन बात-बात में उसके मुंह से गाली भी निकल जाती। खैर इसी बीच एक टैम्पो काला धुँआ फेंकते हुए आगे बढ़ा तो आटो ड्राइवर ने उसे भद्दी गाली देते हुए मुझसे कहा, देखिए यह डीजल फेंक रहा है, पर्यावरण की ऐसी की तैसी किए दे रहा है.." जब मैंने उससे कहा, इसे कोई रोकता क्यों नहीं, तो उसने एक बार फिर भद्दी गाली देकर कहा कि जब ले रहे हैं तो कौन रोकेगा!" मैं एकदम चुप था, शायद उसके गुस्से और गाली देने के अंदाज से भी मैं सहम गया था। सोचा, जो चीज इसके मन की नहीं, यह उसे गाली से नवाज़ता होगा। वह अपने मन में मुझे भी गाली न दे, मैंने उसे सफाई दिया कि मैं पहले क्यों नहीं उसके आटो में बैठा था। क्योंकि इससे उसके आटो में बैठी महिलाएं परेशान होती। 

        अब मैंने शहीद पथ पर निगाह दौड़ाया, गजब का ट्रैफिक था ! इसे देखते हुए सोचा, हमारी सारी सम्पन्नता और अर्थव्यवस्था इस धरती की कीमत पर ही है। पर्यावरण की दृष्टि से कोरोना काल कुछ सुकूंनभरा था, लेकिन अब तो जैसे सब छुट्टा सांड हुए पगलाए भागे जा रहे हैं। मैं भी तो ऐसे ही भाग रहा हूं।

         इस संसार में हर एक चीज के नष्ट होने की एक अवधि तय है, और धरती के नष्ट होने की अपनी एक अवधि तय है! लेकिन दुनियां में अर्थव्यवस्था बढ़ाने की ललक इस धरती को उसकी इस तय अवधि से पहले ही नष्ट कर देगी। 

         मैंने अखबार मोड़कर रख दिया, क्योंकि इसमें और कुछ खास पढ़ने को नहीं था।

शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

भगवान से भी बढ़कर मनुष्य है

             भगवान से भी बढ़कर मनुष्य होता है। दरअसल 'मनुष्य होना' अस्तित्व बोध है तो वहीं 'ईश्वरत्व' इस अस्तित्व-बोध का खंडन है। हम "सियाराममय सब जग जानी" कहते हैं, इसमें सब कुछ को ईश्वर के रूप में स्वीकार करके चलने की बात है। लेकिन ठीक इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक भाव, 'ईश्वर' की इस 'सब कुछ' से एक खामोशी भरी दूरी को भी स्वीकारता है। इस 'खामोशी भरी दूरी' में चीजों के प्रति उपेक्षा का भाव निहित है, और जो प्रकारांतर से 'अमानवीयता' ही है। 'ईश्वर' की यह 'अमानवीयता' इस रूप में समझ सकते हैं कि यदि मनुष्यता का मुक्ति में विश्वास है तो 'ईश्वरत्व' चीजों को अपने से 'परे' नहीं जाने देती। देखा जाए तो, ईश्वर पाश्चात्य दार्शनिक स्पिनोजा के ईश्वर की तरह सर्वग्रासी है। तभी तो, ऐसे सर्वग्रासी ईश्वर को सिंह की गुफा के सदृश्य माना गया, जिसमें जाते हुए पदचिह्न्न तो दिखाई पड़ते हैं लेकिन बाहर आते हुए पदचिह्न्न नहीं मिलते।

           वैसे 'भगवान' और 'मनुष्य' के बीच का यह झगड़ा सुलझाने के लिए अद्वैत, विशिष्टाद्वैत या द्वैतवाद भी पर्याप्त नहीं है। क्योंकि ईश्वर की अवधारणा में ही ऐसे सारे विवाद की जड़ अन्तर्निहित है। इस समस्या का समाधान दार्शनिक दृष्टि में नहीं, अपितु मानवीय संवेदनाओं से उपजी साहित्यिक-दृष्टि, इसपर अधिक समग्रता और संवेदनशीलता के साथ विचार करती हुई प्रतीत होती है।

            किसी कृति की साहित्यिक दृष्टि उसकी रचना प्रक्रिया से समझी जा सकती है। इसके लिए महाकवि वाल्मीकि के रामायण के राम और तुलसी के रामचरित मानस के राम का चरित्र तुलनीय है। रामायण की रचना प्रक्रिया के पीछे महाकवि वालमीकि के "मा निषाद प्रतिष्ठां.." में अभिव्यक्त 'शोकार्त्त' भाव वाली संवेदनशीलता है। स्वयं आदिकवि वाल्मीकि जी इस बात को स्वीकार करते हैं -

         "शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा"
   
         अर्थात यह श्लोक हमने अपने मुख से शोकार्त्त ही निकाला है।
          
         जिस अभिव्यक्ति के पीछे शोक से उपजी मनःस्थिति हो; वह दूसरों के हृदय में वैसी ही वेदना की कल्पना कर सकता है। ऐसे रचनाकार की रचनावृत्ति मनोवैज्ञानिक ढ़ग से अपने पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को उद्घाटित करते हुए चलती है। इसीलिए आदि कवि वाल्मीकि के राम "सम्पूर्ण मनुष्य" की ओर अग्रसर हैं। नामवर सिंह जी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के कथन का उल्लेख करके यही दिखाने का प्रयास किया है - "वाल्मीकि ने नेता की ही खोज की थी। ऐसे नर चंद्रमा की, जिसमें मनुष्य की 'समग्रा लक्ष्मी' का निवास हो। उन्हें उन नेताओं के किसी ऐसे स्थाई भाव की खोज नहीं थी, जो विभावानुभाव संचारी भाव के संयोग से रस रूप में परिणत हो सके। वे मनुष्य के संपूर्ण और आदर्श रूप के जिज्ञासु थे।" कहने का आशय यह भी है कि महाकवि, रामायण में बिना किसी "वाग्जाल" के राम की प्रतिष्ठा और उनके चरित्र की खोज करते है और जिसमें, नामवर जी के अनुसार, द्विवेदी जी के शब्दों में "उस युग के सम्पूर्ण मनुष्य को उद्भासित करने की क्षमता है।" 

             इस प्रकार यदि वाल्मीकि की संवेदनशीलता एक 'सम्पूर्ण मनुष्य' की खोज करती है तो वहीं तुलसी ने रामचरित मानस को भक्ति-भाव की भूमि पर रचा है और यहाँ राम का पाला 'भक्त' से पड़ा है। इसीलिए तुलसी मानते हैं कि सुकवि की कविता होने पर भी राम नाम के बिना वह श्रेष्ठ नहीं कहलाती। जैसे वस्त्र के बिना अन्य साज-सज्जा के होते हुए भी नारी शोभनीय नहीं होती -     

"भनिति विचित्र सुकवि कृत न जोऊ, राम नाम बिनु सोह न सोऊ।
बिधुवदनी सब भांति संवारी, सोन न बसन बिना बर नारी।।"
       भक्ति-मानस की पृष्ठभूमि में तुलसी की सारी संवेदनाएँ "भगवान" की प्रतिष्ठा में ही खर्च हो जाती है। महिमामंडन के इस प्रयास में "भगवान" का चरित्र ऐसा उभरता है कि 'राम' उसके नीचे दब जाते हैं।
      
        यहाँ इस चर्चा के परिपेक्ष्य में, रामायण और रामचरित मानस में आए अहिल्या वाले प्रसंग से राम के चरित्र की तुलना कर दोनों महाकवियों वाल्मीकि और तुलसी के 'सर्जनात्मक दृष्टि का लक्ष्य' समझ सकते हैं।

           * * * * *

             विद्वानों का कहना है, प्रत्येक लिखा हुआ साहित्य होता है। लेकिन यह "लिखा हुआ" ऐसा वैसा नहीं, इसमें मन-जन का विवेचन होना चाहिए। यह विवेचन जब मर्म को बेधे तभी वह साहित्य है। इसीलिए धार्मिक-साहित्य श्रद्धा के विषय तो हो सकते हैं, लेकिन उनकी रचनाधर्मिता अनुभूतियों को जगाने में लगभग असफल सी होती हैं। क्योंकि 'उपदेश' भावों की सृष्टि नहीं कर पाते। आचार्य द्विवेदी जी के शब्दों में "...काव्य सर्जक है, वह मनुष्य की दुनिया में नए भावों की सृष्टि करके विधाता के भाव-जगत में वृद्धि करता आ रहा है।" इस कथन का आशय यही है कि साहित्य को भाव-जगत की पहचान कराने वाला होना चाहिए। अहिल्या-प्रसंग से वाल्मीकि और तुलसी की अलग-अलग भाव-दृष्टि का ही नहीं, बल्कि उनके काव्यगत उद्देश्यों का भी पता चलता है। 

        रामचरित-मानस की अपेक्षा वाल्मीकि-रामायण में अहिल्या का प्रसंग अधिक गाम्भीर्य और मनोवैज्ञानिकता के साथ मानवीय संवेदना की पहचान कराने वाला है। वहीं तुलसी ने इस प्रसंग को चलताऊ ढंग से लिया। यदि तुलसी के राम "आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं" के कारण जिज्ञासु हैं, तो रामायण के राम की जिज्ञासा "पुराणं निर्जनं रम्यं" अर्थात पुराने और निर्जन लेकिन रमणीक आश्रम के बारे में है। यहां 'पुराणं' और 'रम्यं' जैसे शब्द उस स्थान के प्रति मनोवैज्ञानिक प्रभाव जगाते हैं, जिसका संकेत विश्वामित्र, इसे कभी का 'देवताओं जैसा और देवताओं द्वारा पूजित' गौतम ऋषि का आश्रम (आश्रमो दिव्यसंकाश: सुरैरपि सुपूजित:) कहते हुए, अहिल्या का प्रसंग सुनाकर देते हैं। इसी आश्रम में गौतम ऋषि की अनुपस्थिति जान (तस्यांतर विदित्वा) उनका ही वेश धारण कर (मुनिवेषधरोअहल्यामिदं) इंद्र ने अहिल्या से समागम की इच्छा व्यक्त की थी -
       
          "संगमं त्वहमिच्छामि त्वया सह सुमध्यमे"  

       और मुनि वेशधारी इंद्र को पहचानकर भी अहिल्या ने उसके साथ प्रसन्नतापूर्वक समागम किया -
   
          "मुनिवेषं सहस्त्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन
           मतिं चकार दुर्मेधा देवराज कुतूहलात।।"

        यही नहीं वाल्मीकि जी ने इस समागम के उपरांत अहिल्या से "कृतार्थेनान्तरात्मा" और "कृतार्थास्मि सुरश्रेष्ठ" कहलवाकर अहिल्या के कुछ ऐसे ही मनोरथ के पूर्ण होने का संकेत भी किया है। अहिल्या के इस "मनोरथ" को समझकर ही गौतम ऋषि ने उसे "इह वर्षसहस्त्राणि बहूनि त्वं निवत्स्यसि" अर्थात इसी स्थान पर हजारों वर्षों तक रहने एवं वायु-भक्षण करते हुए निराहार रहकर राख पर सोने एवं अदृश्य रहकर निवास करने का शाप देते हैं - 
       
       "वायुभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी
        अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेsस्मिन्निवत्स्यसि"
       
     लेकिन अब वही अहिल्या राम को तप के तेज से प्रकाशित होती दिखाई पड़ी -
      
        "ददर्श च महाभागां तपसा द्योतितप्रभाम" 
    
        जो कोहरे में छिपी हुई पूर्णमासी के चन्द्रमा की जैसी या जल में पड़ते सूर्य के प्रतिबिम्ब की तरह दीप्तिमान थी -
     ‌ 
        "स तुषारावृतां साभ्रां पूर्णचन्द्रप्रभामिव
         मध्येऽम्भसो दुराधर्षां दीप्तां सूर्यप्रभामिव"

             
          वाल्मीकि के राम ने जिस निर्जन लेकिन रम्य स्थान को देखा वहाँ गौतम ऋषि द्वारा शापित उनकी "दुर्मेधा" पत्नी निवास करती है, समाज-बहिष्कृता होने के कारण जहाँ कोई नहीं जाता। इसीलिए वह स्थान निर्जन है। ये राम एक संवेदनशील व्यक्ति के मानवीय दृष्टि से समाज से ठुकराई एकान्तवासिनी अहिल्या की तपश्चर्या और पश्चात्ताप की वेदना (तुषारावृतां) से उपजे उसके अन्तर की पवित्रता को पहचान जाते हैं। इसीलिए उन्हें अहिल्या 'द्योतितप्रभामाम' अर्थात दीप्तिमान दिखाई पड़ी। महाकवि वाल्मीकि के इस वर्णन में उनकी साहित्यिक-दृष्टि झलक आई है। यही वह दृष्टि है जो वाह्य तो वाह्य! मन की वेदना को भी पहचान जाती है। अहिल्या की इस वेदना वाली मनःस्थिति को दर्शाने के लिए ही महाकवि ने कहा है कि धुएँ में जलती हुई आग की लपट की तरह वह गौतम ऋषि के शाप से किसी को दिखाई नहीं पड़ती थी। 

            धूमेनापि परीतांगीं दीप्तामग्निशिखामिव
            सा हि गौतमवाक्येन दुर्निरीक्ष्या बभूव ह"
     
     वाल्मीकि के इस श्लोक से प्रमाणित है कि, लज्जा और पापबोध से उपजे आत्मग्लानि (धूमेनापि परीतांगीं) और इससे ऊपर समाज-बहिष्कृता तथा पति द्वारा परित्यक्ता होने की आत्म-प्रतारणा से अहिल्या 'निर्वेद' की स्थिति में होती हैं। ऐसी स्थिति में मनुष्य का अन्तर्मन प्रकाशित (दीप्तामग्निशिखामिव) हो उठता है और वह स्वयं दुनियावी मोह-जाल से अपना सरोकार समाप्त कर समाज की नजरों से ओझल सा हो (दुर्निरीक्ष्या बभूव) जाता है। 

      यहाँ ध्यातव्य है, गौतम ऋषि ने अहिल्या को पुनः: स्वीकार करने के लिए लोभ-मोह से रहित (लोभमोहविवर्जिता) होकर राम का आतिथ्य करने की शर्त रखा था - 

         तस्यातिथ्येन दुर्वृत्ते लोभमोहविवर्जिता
         मत्सकाशे मुदा युक्ता स्वं वपुर्धारयिप्यसि

       इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि की काव्यानुभूति राम को 'लोभमोहविवर्जिता' अहिल्या का दर्शन कराती है। ऐसी अहिल्या का उद्धार नहीं होगा तो फिर किसका होगा? इसीलिए वाल्मीकि ने राम से ऐसी 'महाभागा' अहिल्या को तारने के लिए कहा, जिससे वह देवरुपिणी हो जाए -

        "तारयैनां महाभागामहल्यां देवरुपिणीम" 
       
       यहां दोनों महाकवियों वाल्मीकि और तुलसी की दृष्टियों में अंतर स्पष्ट है। गोस्वामी तुलसी दास जी का कवि हृदय इस प्रसंग में उतना मानवीय और संवेदनशील नहीं बन पड़ा है। 'रामचरितमानस' के राम को अहिल्या "सिला" के रूप में दिखाई पड़ती है -

      ‌‌ "पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी" 

        तुलसी से इस 'सिला' की 'मन:स्थिति' और वेदना अननुभूत ही रह जाती है। यहां उनका हृदय साहित्यिक-धर्म निबाहता हुआ नहीं दिखाई देता। बल्कि उनकी यह दृष्टि भक्ति-समन्वित धार्मिक-नैतिकता (पूजा-अराधना की फॉलोइंग वाली) वाली है। अहिल्या उनके लिए हाड़-मांस की नहीं 'उपल देह' वाली अर्थात पत्थर है। उन्होंने विश्वामित्र से कहलवाया भी है- 

       "गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर
       चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुवीर।

       तुलसी अपने प्रभु की 'प्रभुताई' में इतने मगन हैं कि एक स्त्री के शिला बनने के पीछे के गर्हित कारण को वे नहीं दिखाना चाहते। वैसे कुछ लोग मान सकते हैं कि शायद तुलसी दास जी ने अहिल्या के मनोभाव को ही 'सिला' के रूप में इसीलिए चित्रित किया हो कि अतिशय वेदना की स्थितियों से गुजरने पर व्यक्ति पत्थर-हृदय हो जाता है! लेकिन भक्ति के प्रभाव में जब वे राम से इस 'उपल देह' पर‌ "कृपा" करने के लिए कहते हैं, तो जैसे अमानवीय हो उठते हैं। यहाँ तुलसी की छवि थोड़ी-बहुत स्त्री-विरोधी की हो उठती है, उनपर तो जैसे राम का "भगवानत्व" सिद्ध कराने का धुन सवार है।     

        दरअसल इसी धुन में गोस्वामी जी अहिल्या की मानसिक-वेदना और उसकी निर्वेदावस्था को महत्त्व देते हुए नहीं दिखाई पड़ते। यदि वे ऐसा करते तो अहिल्या जिस ऊंचाई पर दिखाई पड़ती, तब उसे 'भगवानत्व' वाली 'कृपा' की नहीं, बल्कि समाज में पुनः प्रतिष्ठा के लिए मानवीय मदद पाने की अधिकारिणी होती। महर्षि वाल्मीकि ने अहिल्या के इस सामाजिक अधिकार को पहचानकर ही विश्वामित्र से "तारयैनां महाभागामहल्यां'' कहलाकर राम के मन में उसके प्रति कर्तव्यबोध जगाया। क्योंकि अहिल्या अब इस योग्य हो चुकी है कि उसे 'कृपा' की नहीं, बल्कि उस तिरष्कृता नारी को उसकी खोई हुई प्रतिष्ठा लौटाने की आवश्यकता है। यह किसी भी सहृदय व्यक्ति का कर्तव्य-कर्म होना चाहिए। इस प्रकार 'रामायण' और 'रामचरितमानस' के अहिल्या-प्रसंग में आए 'तारय' और 'कृपा' जैसे शब्दों से इन दोनों महाकाव्यों के काव्यगत उद्दश्यों में अंतर का भी पता चलता है।
        
              *** *** ***

          नामवर जी "दूसरी परंपरा की खोज" में लिखते हैं, "रचना-प्रक्रियावाली सर्जनात्मक दृष्टि का लक्ष्य मनुष्य ही होता है और काव्य में उसी के सम्मूर्तन की समस्या कवि की मुख्य समस्या होती है।" वाल्मीकि और तुलसी दो अलग-अलग युगों में हुए हैं, और उस समय के देश-काल की परिस्थितियां भी भिन्न रही होंगी। लेकिन युग चाहे जो हो, काव्य-सर्जक अन्ततः अपने युग के मनुष्य की खोज में रहता है। अवतारवाद की अवधारणा भी ऐसे ही खोजों का परिणाम है। वाल्मीकि हों या तुलसी, दोनों की सर्जनात्मक दृष्टि अपने युग के 'पुरुषोत्तम' की खोज करती है। इस लेख में इन महाकवियों की प्रसंगगत तुलना एक ही विषय पर इनकी सर्जनात्मक दृष्टि को लेकर है। काव्य-सृजन के पीछे रचनाकार के मनोविज्ञान की भूमिका होती है, जो रचना-प्रक्रियावली में व्यक्त होकर उसके काव्यात्मक उद्देश्यों की प्राप्ति कराती है। 

         'तारय' या 'कृपा' जैसे शब्दों से अहिल्या-प्रसंग में आए पात्रों के प्रति इन द्वय महाकवियों की मनोवैज्ञानिक संवेदनशीलता प्रदर्शित है। इससे काव्य-कर्म के पीछे का इनका अभिप्रेत संकेतित होता है। भरतमुनि के अनुसार काव्य का उद्देश्य दुख, श्रम शोक से आर्त और तपस्वियों को मानसिक शांति प्रदान करना है - 

       "दुखार्तांना श्रमार्तांना शोकर्तांना तपस्विनाम 
        विश्रामजनन लोके नाट्यमेतद भविष्यति।" 
               
         लेकिन विचारकों ने माना है कि इस उद्देश्य को पाने के लिए काव्य-सर्जक को 'द्रष्टा' होना चाहिए। 'द्रष्टापन' चीजों को उसके सही परिप्रेक्ष्य में समझने का अवसर देता है। क्रौंच पक्षी की पीड़ा से शोकार्त्त महर्षि वाल्मीकि 'रामायण' सृजन के लिए प्रेरित हुए और उनके इस भाव का प्रभाव महाकाव्य के पात्रों पर भी पड़ा है। इसीलिए इस प्रसंग में पात्र सहज और मानवीय चारित्र वाले हैं तथा अपने परिवेश के अनुसार सहज प्रतिक्रिया व्यक्त करते प्रतीत होते हैं। यहाँ रचनाकार ने पात्रों को जैसे खुला छोड़ रखा है, जिनके बीच वह अपने "सर्जनात्मक दृष्टि का लक्ष्य" "मनुष्य के सम्मूर्तन की समस्या" हल करता है। जैसे वह सामाजिकों को बताना चाह रहा हो कि देखो ऐसे भी लोग हैं। अहिल्या-प्रसंग में गौतम ऋषि के आश्रम के घटनाक्रम से अवगत होने के बाद राम वहाँ जिस अहिल्या को देखते हैं वह "तपसा" अर्थात तपस्विनी के रूप में है, उस तप-मूर्ति के लिए ही महाकवि ने 'द्योतितप्रभामाम', तुषारावृतां, पूर्णचन्द्रप्रभामिव, सूर्यप्रभामिव, धूमेनापि परीतांगीं और दीप्तामग्निशिखामिव जैसी उपमा का प्रयोग किया। यहां कवि द्रष्टा है लेकिन साक्षी-भाव से अपने पात्रों की अनुभूतियों को चित्रित करता है, जो काव्य-रसिकों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न करने वाला है। इससे अहिल्या को दोषमुक्ति और उसके अन्तर्मन की पवित्रता की ओर संकेत करने के कवि-कर्म का विशेष प्रयोजन भी पूरा होता है। सामाजिक जहां अहिल्या के प्रति सहृदय हो उठते हैं, वहीं राम के मन में भी श्रद्धाभाव उत्पन्न होता है और वे अहिल्या का पैर छू लेते हैं - 

         "राघवौ तु ततस्तस्याः पादौ जगृहतुस्तदा" 

      इस प्रकार राम की संवेदनशीलता उनके अंदर की मनुष्यता के साथ मूर्तिमान हो उठी है, वे अहिल्या के ऊपर 'कृपा' नहीं, बल्कि अपने सामाजिक दायित्व के साथ कर्त्तव्य निर्वहन करते दिखाई देते हैं। दरअसल 'तारयैनां' शब्द यहां चरितार्थ हुआ है। यही साहित्यिक दृष्टि है, जहाँ बिना लाग-लपेट के मानवता की मंगलकामना प्रतिष्ठित होती है।

       इधर 'रामचरितमानस' में तुलसी की भक्ति-भावना ने काव्य का रूप लिया है, उनके राम भगवान हैं। स्वाभाविक है, भगवान् अपने भक्तों पर 'कृपा' ही करते हैं और यह 'कृपा' किसी भी रूप में हो सकती है। तुलसी लिखते हैं -

'परसद पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही'
           
     राम के पवित्र और शोक को नाश करनेवाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई। राम अपने पैरों से उस 'सिला' का स्पर्श करते हैं। यहाँ स्पष्ट रूप से 'कृपा' और 'तारय' में अंतर है। 'कृपा' में 'मानवीयता' वाली कर्त्तव्य-भावना नहीं बल्कि 'अहसान' करने का बोध छिपा है, जिसमें 'प्रभुता का अहंकार' विराजमान है। हालांकि तुलसी भी अहिल्या को 'तपपुंज' अर्थात तपस्विनी मानते हैं, और उनके विश्वामित्र भी 'सकल कथा मुनि कहा विसेषी' अर्थात अहिल्या के बारे में राम को सब-कुछ बताए रहते हैं। लेकिन क्या कुछ बताया है, यह तुलसी ही जाने! वे इसका विवरण नहीं देते। इससे प्रमाणित है कि तुलसी स्वान्त: सुखाय के कवि हैं क्योंकि वे भक्ति में आनंद खोजते हैं। इसीलिए उनके राम इस संवेदनशील अवसर पर 'भगवान' ही बने रहे और वाल्मीकि के राम जैसी करुण-भावना नहीं दिखाते ! अन्यथा 'सिला' को पैरों से स्पर्श न करते। यहां 'भगवान्' राम ज़्यादा से ज़्यादा 'कर्मवाद' की स्थापना करते दिखाई देते हैं कि तपस्विनी अहिल्या को अब उसके तप का फल मिलना चाहिए। 

       दूसरी ओर वाल्मीकि जी के 'तारयैनां' से "इसका उद्धार करें" अभिप्रेत है। एक तिनका भी किसी का उद्धार कर सकता है। इसमें आए 'तारय' शब्द से किसी सामंतीय भावना की अभिव्यक्ति नहीं होती। अहिल्या का पैर छूकर वाल्मीकि के राम नारी के सम्मान की स्थापना करते हैं और समाज में उसे व्यापक स्वीकृति दिलाते प्रतीत हो रहे हैं। अहिल्या के प्रति व्यक्त हुई राम की इस करुण-भावना में यह संदेश भी छिपा है कि इस संसार को 'ईश्वर' से अधिक 'मनुष्य' की जरूरत है। इसीलिए साहित्यिक दृष्टि ईश्वर की बजाय मनुष्य की खोज में रहती है।
        
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        महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित 'रामायण' एक जन-काव्य है। इस महाकाव्य में परिस्थितियों के साथ पात्रों की प्रतिक्रियाएं मनोवैज्ञानिक ढंग से व्यक्त हुई है। अहिल्या प्रसंग में तो महर्षि वाल्मीकि किसी आधुनिक साहित्यकार की तरह मनोवैज्ञानिक सूत्र पकड़कर चले हैं और स्त्रियों के न्यायपूर्ण अधिकारों की मार्मांतक व्याख्या करते हैं। यहां कवि नहीं, उसके पात्र 'बोलते' हैं। शरतचन्द्र के शब्दों में कहें तो पात्रों का यह बोलना ही उनके "प्राणों की वह पुकार" है जिससे कोई भी साहित्यिक कृति जीवंत हो उठती है। इसीलिए साहित्यिक दृष्टि से 'रामायण' एक जीवंत महाकाव्य है। वहीं 'रामचरितमानस' में सर्वत्र कवि ही 'बोलता' है। तुलसी के इस 'कहने' की प्रवृत्ति ने ही 'मानस' को एक 'धार्मिक-काव्य' बना दिया है, जैसे नीति शास्त्र की कोई 'पोथी' हो। शरत् बाबू भी रेखांकित करते हैं कि "साहित्य धर्म-पुस्तक नहीं, नीति सिखाने की पोथी भी नहीं है।" दरअसल धार्मिक-साहित्य का महत्त्व और प्रभाव एक दायरे तक सीमित होता है, इसलिए शरतचन्द्र यह मानते हैं कि 'साहित्य होने के लिए सबके हितों से सहानुभूति रखना आवश्यक' होता है। 'वाल्मीकि-रामायण' ऐसी ही एक साहित्यिक कृति है, जिसमें राम 'भगवान' की तरह अहिल्या पर 'कृपा' नहीं, बल्कि 'मनुष्य' बने रहकर ही सहानुभूति जताते हैं। राम एक 'लांक्षित' स्त्री का आतिथ्य स्वीकार करके तत्कालीन समाज की बनी-बनाई मर्यादा को तोड़कर "पुरुषोत्तम" बनते हैं।   

     राम और लक्ष्मण द्वारा पैर छूते ही अहिल्या को गौतम ऋषि का श्राप स्मरण हो आया कि इस आश्रम में राम के आने पर 'लोभमोहविवर्जिता' होकर उनका सत्कार करने पर वह श्राप से मुक्ति पाएगी-     

         "स्मरन्ती गौतमवच : प्रतिग्राह सा च त"

       यह याद आते ही अहिल्या उनके चरण पकड़ लेती है‌ और आतिथ्य-सत्कार करती है। इधर राम ने भी अहिल्या के उस आतिथ्य को स्वीकार कर लिया - 

        पाद्यमर्ध्य तथाss तिथ्यं चकार सुसमाहिता
        प्रतिजग्राह काकुत्स्थो विधिदृष्टेन कर्मणा

          यही नहीं, आश्रम में राम के आगमन को जानकर गौतम ऋषि भी आ जाते हैैं। राम उनका भी आतिथ्य स्वीकार करते हैं -

           "रामोऽपि परमां पूजा गौतमस्य महामुनेः"

           वाल्मीकि के इस वर्णन में एक संदेश यह भी छिपा है कि "आतिथ्य करना" और "आतिथ्य स्वीकार करना" दोनों से समान धरातल पर होने का बोध होता है। यहां मेज़बान और मेहमान, दोनों एक-दूसरे का अनुग्रह प्राप्त करते हैं। वहीं तुलसी ने 'भगवान' राम की 'कृपा' प्राप्त होने के बाद अहिल्या से "मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन" कहलाकर राम की 'स्तुति' कराई । इस स्तुति से स्त्री के न्यायपूर्ण अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता का महत्त्व कम होता है।

         अभी पिछले कुछ दशकों तक स्त्रियों के प्रति भारतीय समाज का दृष्टिकोण बेहद संकुचित रहा है। इलाहाबाद के बांध पर अक्सर पागल सी दिखाई पड़ जाने वाली एक वृद्धा के बारे में एक बार किसी ने मुझे बताया था कि विवाह के बाद युवावस्था में ही उसके परिवार वालों ने उसपर चारित्रिक दोष मढ़कर उसे त्याग दिया था। 'चरित्रहीन' में किरणमयी का यह कहना कि "इस जाति को गले में रस्सी बाँधकर यदि दस-बीस वर्ष तक लटकाकर रखा जाए, तब भी यह नहीं मरेगी" समाज में प्रताड़ित ऐसी ही स्त्री की मनोदशा पर मार्मिक कथन है। दरअसल इसके पीछे समाज का दृष्टिकोण उत्तरदाई रहा है। इसपर शरतचंद्र प्रश्न उठाते हैं कि "नारी का शरीर ही सब कुछ है, उसका अन्तर क्या कुछ भी नहीं है?" इसीलिए वे 'सतीत्व' और 'नारीत्व' को अलग देखने के लिए कहते हैं, "मनुष्य का सच्चा रूप हमें किस बात में मिलता है? उसकी देह के आवरण में या उसके अन्तर के आचरण में? आप ही बताएं! इसीलिए सतीत्व और नारीत्व को पृथक् दिखाने के लिए बाध्य हुआ हूं।” और अंततः वे स्त्रीत्व पर किसी भी कलंक-कथा को पाप मानने की घोषणा करते हुए कहते हैं "नारी के कलंक पर अविश्वास करके संसार में ठगा जाना भला है, किन्तु विश्वास करके पाप का भागी होना अच्छा नहीं।" 

      शरतचंद्र ने नारी की प्रताड़ना के पीछे मर्दवादी सोच से उपजे दंभ को उत्तरदाई माना है 'परिणीता' में वे कहते भी हैं "संसार के सारे पुरुष सभी दोष नारी के ऊपर अभिमानपूर्वक मढ़कर एकतरफा फैसला करते हैं। बेचारी नारी को सबकुछ सहन करना पड़ता है।" दरअसल वास्तविकता तो यही है कि स्त्री पर अत्याचारों की जड़ में उसका आत्मनिर्भर न होना ही रहा है। 'आर के नारायण' के उपन्यास "डार्क रूम" में रमानी की पत्नी का यह कथन कि "मेरा कुछ नहीं है इस दुनिया में। औरत के पास उसके बदन के अलावा अपना और क्या है? इसके अलावा सब कुछ उसके बाप का है, पति का है, बेटे का है।" तो स्त्री की परनिर्भरता से उपजी अधिकार-विहीनता का ही दर्द है।  

        कुछ अपवादों को छोड़कर सदियों से स्त्री के प्रति भारतीय समाज की दृष्टि ऐसी ही रही है। उसके साथ चाहे मर्दवादी दंभी व्यवहार रहा हो या फिर व्यभिचार की लांक्षना, प्रताड़ना की केंन्द्रविंदु सदैव से स्त्री ही रही है। ऐसी ही एक प्रताड़ित असहाय सी अहिल्या को समाज में पुनर्प्रतिष्ठा दिलाकर वाल्मीकि के राम ने समाज की बनाई हुई मर्यादा को तोड़ा। जिसका एक संदेश है कि, किसी लीक पर बंधकर चलने की जरूरत नहीं, मानवीय दृष्टिकोण के साथ समाज को परिवर्तनशील होना चाहिए।  

        'मानस' में अहिल्या पर 'कृपा' करना 'भगवान्' राम के लिए उतना चुनौतीपूर्ण नहीं रहा होगा जितना 'रामायण' के 'मनुष्य' राम के लिए! राम उस स्त्री के आश्रम में जाकर उसका आतिथ्य स्वीकारते हैं जिसे उसके पति ने त्याग दिया है, और जिसपर लगे कलंक का दाग़ इतना गहरा था कि उसके आश्रम में मनुष्य क्या, पशु-पक्षियों तक ने जाना छोड़ दिया था!! आखिर कैसी रही होगी उस समय की सामाजिक व्यवस्था? और तो और, अहिल्या के पुत्र शतानंद जिसके लिए वाल्मीकि ने 'महातेजा:' और 'महातपा:' जैसे विशेषण का प्रयोग किया है, ने भी अपनी माता से दूरी बना लिया था।

       ऐसे सामाजिक परिवेश में अहिल्या को सम्मान देना एक दुष्कर लेकिन महान सामाजिक कार्य तो था ही, साथ में राम द्वारा उठाया गया यह कदम आश्चर्यजनक भी था। शायद यही कारण है कि विश्वामित्र से अहिल्या के उद्धार और गौतम ऋषि से भेंट के वृत्तांत (अहल्यादर्शनं चैव गौतमस्य समागमम्) को सुनकर महातपस्वी शतानंद के रोंगटे खड़े हो गए थे -

          तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रस्य धीमतः
          हृष्टरोमा महातेजा: शतानन्दो महातपा: 

         शतानंद इतने पर भी नहीं रुकते वे आश्चर्य में भरकर विश्वामित्र से अपनी जिज्ञासाएं शान्त करने लगते हैं। जैसे कि -

          अपि ते मुनिशार्दूल मन माता यशस्विनी
          दर्शिता राजपुत्राय तपोदीर्घमुपागता 
       
        बहुत दिनों से तप कर रही मेरी माता को क्या श्री राम को दिखाया ? और क्या मेरी माता ने श्री राम का सत्कार किया?-

             अपि रामे महातेजा मम माता यशस्विनी
             वन्यैरुपाहरत्पूजां पूजार्हे सर्वदेहिनाम् 
             
             शतानंद विश्वामित्र से यह भी पूछते हैं कि क्या आपने इंद्र ने मेरी माता के प्रति जो दुराचार किया था वह पुरातन वृत्तांत भी राम से कहा था?  

             अपि रामाय कथितं यथावृत्तं पुरातन मर
             मम मातुर्महातेजो दैवेन दुरनुष्ठितम्

            शतानंद को इस बात पर आश्चर्य था कि क्या यह सब जानने के बाद भी श्री राम वहां गए ? और वे यह भी पूँछते हैं कि क्या राम के दर्शन के प्रभाव से मेरी माता मेरे पिता को मिल गयी या नहीं? 

                अपि कौशिक भद्र ते गुरुणा मम संङ्गता
                माता मम मुनिश्रेष्ठ रामसंदर्शनादितः

            लेकिन शतानंद यह भी समझ रहे थे कि माता का अपराध बहुत बड़ा था और पिता ने श्राप देकर माता को त्यागा था, तो माता का उद्धार करने पर क्या पिता ने राम का सत्कार किया या नहीं! (अर्थात पिता राम से भी तो नाराज नहीं हो गए?) -
       
             अपि मे गुरुणा रामः पूजितः कुशिकात्मज
             इहागतो महातेजाः पूजां प्राप्तो महात्मन:
  
           शतानंद से रहा नहीं गया तो विश्वामित्र से यह प्रश्न भी कर लेते हैं कि आश्रम में मेरे पिता के आने पर श्री राम ने उनको प्रणाम किया था या नहीं? अथवा मेरी माता के दोषों पर ध्यान दे उन्होंने उनका तिरस्कार तो नहीं किया? 

        शतानंद और विश्वामित्र के बीच हुए इस वार्तालाप में 'अपि' शब्द बड़ा मार्मिक और हृदयस्पर्शी है। यही वह शब्द है जिससे पता चलता है भगवान् से भी बढ़कर मनुष्य और उसकी संवेदनाएं हैं। एक सच्चे साहित्यकार की भांति वाल्मीकि को काव्य के मर्मस्थलों की पहचान है। इस प्रकार वे अपनी 'रचनाप्रक्रियावली' के माध्यम से भगवान को नहीं, अपितु 'मनुष्य' को प्रतिष्ठित करते हैं।

      इस लेख के अंत में यह भी उल्लेख करना समीचीन होगा कि यहां वाल्मीकि या तुलसी की तुलना के पीछे का आशय किसी एक को छोटा या बड़ा दिखाना नहीं है। दोनों अपने-अपने युगानुरूप चिंतन-प्रक्रिया में रत रहे होंगे और युगानुकूल साहित्य का सृजन किए। दरअसल इस तुलना के पीछे इनकी दृष्टियों के फ़र्क को समझना रहा है। इनमें एक है संवेदनशील साहित्यिक-दृष्टि, जो मानवतावादी दृष्टिकोण पर जाती प्रतीत हुई और दूसरी भक्ति-भाव से समन्वित धार्मिक-दृष्टि है, जिससे हमारा समाज प्रभावित होता है। आजकल के तमाम सामाजिक और धार्मिक संघर्ष पर ऐसी दृष्टियों का प्रभाव पड़ रहा है।   
                          *****   

वास्तविकता यही है कि "आतिथ्य करना" और "आतिथ्य स्वीकार करना" समान धरातल का बोध कराता है, इसमें भगवान की स्तुति वाला भाव नहीं है जो भगवान की कृपा प्राप्त होने के बाद तुलसी ने अहिल्या से "मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन" कहकर कराई है।
"साहित्य का मूल है सहित से, अर्थात् सबके सहित सहानुभूति रखना आवश्यक है।"

"साहित्य धर्म-पुस्तक नहीं, नीति सिखाने की पोथी भी नहीं है।"


     "स्मरन्ती गौतमवच : प्रतिग्राह सा च तौ"




अहिल्या ने भली भांति उनका आतिथ्य किया । दोनों राजकुमारों ने भी शास्त्रों में वर्णित विधिविधान के साथ किये गए उसके आतिथ्य को ग्रहण किया

गौतमोऽपि महातेजा अहिल्यासहितः सुखी
रामं संपूज्य विधिवत्तपस्तेपे महातपाः

रामोऽपि परमां पूजा गौतमस्य महामुनेः
राम ने भी गौतम से विधिवत् पूजा ग्रहण किया


"सब कुछ लेखक ही कह डालना चाहता है। पात्रों के प्राणों की वह पुकार इसमें कहां सुनाई देती है"

नारी का शरीर ही सब कुछ है, उसका अन्तर क्या कुछ भी नहीं है?

मनुष्य का सच्चा रूप हमें किस बात में मिलता है? उसकी देह के आवरण में या उसके अन्तर के आचरण में? आप ही बताएं! इसीलिए सतीत्व और नारीत्व को पृथक् दिखाने के लिए बाध्य हुआ हूं।”

शरत् बाबू ने अपने साहित्य में स्पष्ट रूप से यह अंकित किया है कि पुरुषों के बनाये हुए झूठे शास्त्र केवल स्त्रियों को बांध रखने की बेड़ियां हैं।

कोरोना शाप

       अश्वमेध यज्ञ के बारे में अश्वलायन श्रौतसूत्र का कथन है कि - जो सब पदार्थों को पाना चाहता है, सब विजयों का इच्छुक होता है और समस्त समृद्धि पाने की कामना करता है वह इस यज्ञ‌ का अधिकारी है। 

         कुछ दिनों पहले तक पृथ्वी पर विकास के विजय का अश्वमेध यज्ञ चल रहा था! और इस यज्ञ के अश्व के खुरों की टाप से ग्लोबल-विलेज का कोना-कोना कंपायमान था। ग्लोब के निवासी विकास के उन्माद में गर्वोन्मत्त होकर इसके पीछे भाग रहे थे, और यह अश्व था कि ग्लोबल विलेज को बेरोक-टोक और बेलगाम होकर रौंदे जा रहा था! किसकी मजा़ल थी कि इस अश्वमेध यज्ञीय अश्व को रोक या बाँध सके!! लेकिन, विजयोन्माद में इसके पीछे भागते पागल पृथ्वीपतियों के हुंकार एवं इनके पद-टापों से बेचारी पृथ्वी तहस-नहस होकर अर्त्रनाद कर रही थी!!
        
         अचानक यह उन्मादी घोड़ा पृथ्वीपतियों को बंधा दिखाई पड़ गया! वह भी कहाँ? कोरोना महाराज के आश्रम पर!! वही घोड़ा, जो विश्वविजय में मतवाला था और चहुँ ओर कुलाचे भर रहा था, कोरोना मुनि के आश्रम पर असहाय और बेबस बंधा खड़ा है। इधर पृथ्वीपति होने के अहंकार में इस घोड़े के पीछे भागने वाला मानव कोरोना महाराज के शाप के भय से मारे डर के कांप रहा है! तथा पृथ्वी भी जैसे अभयदान पाकर विकासोन्मत्त अश्व के टापों से उड़ी धूल झाड़ रही है। खैर..

          हम बाल्मीकि रामायण में आए उस प्रसंग से आज की स्थिति से तुलना कर सकते हैं। राजा सगर अश्वमेध यज्ञ करते हैं और यज्ञ का घोड़ा गायब हो जाता है। वे अपने पुत्रों से उस घोड़े को खोजने के लिए कहते हैं। राजा सगर के साठ हजार पुत्र उस घोड़े को खोजने निकल पड़ते हैं। इस खोज में वे बड़े-बड़े त्रिशूलों और मजबूत हलों से पृथ्वी को खोदते जा रहे थे, जिससे पृथ्वी पर हाहाकार मच जाता है -
           
           शूलैरशनिकल्पैश्च हलैश्चापि सुदारुणैः।
           भिद्यमाना वसुमती ननाद रघुनन्दन।।

        पृथ्वी खोदने में अनेक नाग, दैत्य, और बड़े बड़े दुर्धर्ष राक्षस मारे गए और अनेक घायल हुए -

           नागानां वध्यमानानामसुराणां च राघव।
           राक्षसानां च दुर्धर्ष: सत्त्वानां निनदोभवत्।।

        उन राजकुमारों ने साठ हजार योजन भूमि खोद डाली और पाताल तक पहुँच गए - 

        योजानानां सहस्त्राणि षष्टिं तु रघुनन्दन।
        विभिदुर्धरिणीं वीरा रसातलामनुत्तमम ।।

       वे राजकुमार पर्वतों सहित इस जम्बूद्वीप को खोदते हुए चारों ओर ढूंढ़ते फिर रहे थे -

         एवं पर्वतसंवाधं जम्बूद्वीपं नृपात्मजा:।
         खनन्तो नृपशार्दूल सर्वत: परिचक्रमु:।।

       अन्ततः देवता विकल होकर ब्रह्मा जी के पास गए और उदास होकर उनसे कहा कि हे भगवन् ! महाराज सगर के पुत्र सारी पृथ्वी खोद डालते हैं और उन लोगों ने अनेक सिद्धों, तथा जलवासियों को मार डाला है -

        भगवन्पृथिवी सर्वा खन्यते सागरात्मजै:।
        वहवश्च महात्मो हन्यन्ते जलवासिनः ।।

        तथा सागर के पुत्रों के सामने जो पड़ता है, उसे वे यह कहकर मार डालते हैं कि, हमारे यज्ञीय अश्व का चोर यही है, यही हमारा घोड़ा चुरा ले गया है -

        अयं यज्ञो हरो अस्माकमनेनाश्वोअप्नीयते।
        इति ते सर्वभूतानि हिंसन्ति सगरात्मजा:।।

        देवताओं की बातों को सुनकर ब्रह्मा जी ने उन्हें आश्वस्त किया कि जो पृथ्वी को धारण करते हैं (अर्थात प्रकृति) उन्हीं कपिल के क्रोधानल से वे राजकुमार दग्ध हो जाएंगे। यह पृथ्वी सनातन है निश्चय ही इसका नाश नहीं होगा (प्रकृति बैलेंस करती है) -

        तस्य कोपाग्निना दग्धा भविष्यन्ति नृपात्मजाः।
        पृथिव्याश्चापि निर्भेदो दृष्ट एव सनातनः ।।

         घोड़ा न मिलने पर सगर के पुत्रों ने अपने पिता से जाकर कहा कि हमने सारा सागर समस्त पृथ्वी ढूंढ़ डाली और देव, राक्षस, पिशाच, उरग और पन्नग जो हमें मिले, उन्हें हमने मार डाला, किंतु हमें वह यज्ञीय अश्व नहीं मिला -

        सहितासागर: सर्वे पितरं वाक्यंव्रुवन् ।
        परिक्रांता मही सर्वा सत्त्ववन्तश्च मुदिताः।।
        देवदानवरक्षांसि पिशाचोरगकिन्नराः
        न च पश्यमहेअश्वं…
        
         तो, राजा सगर ने कुपित होकर अपने पुत्रों से पुनः पृथ्वी को खोदने के लिए कहा -

        भूय: खनत भद्रं बो निर्भिद्यं वसुधातलम्। 

        फिर तो सगर के पुत्रों ने रसातल खोदते हुए आगे बढ़कर पूर्व दिशा को खोदकर दक्षिण दिशा को खोदने लगे -
        मानयन्तो हि ते राम जग्मुर्भित्वा रसातलम
        ततः पूर्वां दिशं भित्वा दक्षिणां विभिदुः पुनः।।

        और फिर इसी तरह धरती खोदते हुए पश्चिम, उत्तर दिशा से होते हुए ईशान दिशा की ओर बढ़कर बड़े क्रोध से पृथ्वी खोदने लगे -
 ‌         
         रोषादभ्यखनन्सर्वे पृथिवी सगरात्मजाः।

         अन्ततः उन्होंने अपने उस यज्ञीय अश्व को सनातन वासुदेव कपिल के आश्रम में घास चरते देखा,

           ददृशुः कपिलं तत्र वासुदेवं सनातनम्।
           हयं च तस्य देवस्य चरन्तमविदूरतः।।

           और कपिल को घोड़ा चुराने वाला समझकर क्रुद्ध होकर उन्हें मारने के लिए दौड़े। कपिल भगवान ने क्रुद्ध होकर सगर के उन साठ हजार पुत्रों को भस्म कर राख का ढेर बना दिया -

           ततस्तेनाप्रमेयेण कपिलेन महात्माना।
           भस्मराशीकृताः सर्वे काकुत्स्थ सगरात्मजा:।।

           इस प्रकार बाल्मीकि रामायण में वर्णित इस प्रसंग, जिसमें राजा सगर के साठ हजार पुत्रों से पृथ्वी त्रस्त और आतंकित थी, की तुलना विकास के पीछे पगलाए आज के मनुष्य से करते हैं, तो इसे एक रूपक कथा के सदृश पाते हैं। विकास की लालसा में पृथ्वी पर मनुष्य की गतिविधियाँ धरती की प्राकृतिक व्यवस्था को नष्ट तो करती ही है, साथ में मनुष्य के लिए भी घातक बन जाती है। आज कोरोना संकट भी कपिल भगवान के शाप की तरह मानवजाति पर मँडरा रहा है। यह ग्लोबलविलेज पर नहीं ग्लोबलविलेज का संकट है।

           महाकाव्य के सत्य किसी राजनीतिक विसात पर नहीं रचे जाते, बल्कि उनके पीछे लोककल्याण की अवधारणा होती है। ऐसे ही लोकाभिमुख काव्य का चिरंतन मूल्य होता है।   

भगवान से भी बढ़कर मनुष्य है-3

संकल्प और विकल्प

           मेरा मानना है कि वाल्मीकि के राम स्तुति और अराधना के विषय नहीं हैं, बल्कि इन्हें अपने अन्तर में अनुभव किया जा सकता है। हाँ इन राम में स्वयं को खोजा जा सकता है। दरअसल स्तुति और अराधना भक्ति का वह सोपान है, जिसपर खड़ा व्यक्ति विवेकशून्य हो जाता है, ऐसा अराधक विकल्पहीन होता है, जबकि विकल्पों के बीच ही व्यक्ति को कर्म करने के अवसर दिखाई पड़ते हैं।
           वैसे मनुष्यता, संकल्प और विकल्प के बीच ही विकसित होती है। हमारे अधिकांशतया महात्मन् संकल्प को श्रेष्ठ मानकर विकल्प को खारिज करते हैं और विकल्पों को संकल्प की सिद्धि में बाधक के रूप में देखते है। लेकिन वे यहीं पर भूल करते हैं, मानवीयता विकल्पों के बीच ही विकसित होती है। संकल्पवान् को सिद्धि तो प्राप्त होती है, लेकिन आवश्यक नहीं कि यह सिद्धि संसार के लिए कल्याणकारी ही हो! पुराण कथाओं में राक्षस भी अपने संकल्प के बल सिद्धि प्राप्ति हेतु संकल्पित होकर तप करते दिखाए गए हैं, लेकिन वे अपनी सिद्धियों का दुरुपयोग करते हुए ही देखे गए हैं। आखिर ऐसा क्यों?
       
        दरअसल स्वार्थपूर्ति हेतु अर्जित सिद्धियां कल्याणकारी नहीं होती। ये संसार के लिए अहितकारी तो होती ही हैं स्वयं धारक का भी विनाश कर डालती हैं। इस प्रकार बिना कर्तव्यपथ का अनुगमन किए यदि मात्र संकल्प से ही सिद्धि अर्जित की जाती है तो यह सिद्धि कल्याणकारी नहीं हो सकती। इसीलिए वाल्मीकि के राम संकल्प और विकल्पों के बीच जूझते हुए कर्तव्यपथ के अनुगामी हैं। ऐसे राम में 'राजत्व' नहीं है, तभी वे राक्षसों के साथ रावण का विनाश कर पाते हैं। वहीं विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा के लिए जब राजा दशरथ से राम को मांगते हैं तो पुत्रमोह से व्यथित हो दशरथ स्वयं अपनी सेना के साथ चलकर यज्ञ की रक्षा का प्रस्ताव देते हैं कि -

           इयमक्षौहिणी पूर्णा यस्याहं पतिरीश्वरः ।
           अनन्या संवृतो गत्वा योद्धाहं तैर्निशाचरैः।।
  
           मेरे पास जो भारी सेना है, उसे साथ लेकर मैं उन राक्षसों से लड़ुंगा और आगे विश्वामित्र से कहते हैं "अहं तत्र गमिस्यामि न रामं तेतुमर्हसि" अर्थात् मैं स्वयं वहाँ जाउंगा, आप श्री राम जी को न ले जाइए। इसके बाद वे यानि दशरथ द्वारा उन विघ्नकारी राक्षसों का परिचय पूँछे जाने पर विश्वामित्र "पुलस्त्यवंश प्रभवो रावणो नाम राक्षसः" कहते हुए रावण का परिचय देते हैं और बताते हैं कि उसकी प्रेरणा से बड़े बलवान दो राक्षस जिनके नाम मारीच और सुबाहु है, ऐसे यज्ञों में विघ्न डालते हैं -
       
         "तेन संचोदितौ द्वौ तु राक्षसौ सुमहावलौ 
         मारीचश्च सुबाहुश्च यज्ञविघ्नं करिष्यति।। 

         विश्वामित्र की बात सुनकर राजा दशरथ ऐसे दुरात्मा का सामना‌ करने से इनकार कर देते हैं - 
      
       "न हि शक्तोस्मि संग्रामें स्थातुं तस्य दुरात्मनः" 
और कहते हैं कि रावण युद्ध में बलवानों का बल क्षय कर देता है, अतएव मैं उसके या उसकी सेना के साथ युद्ध करके पार नहीं पा सकता-

          स हि वीर्यवतां वीर्यमादत्ते युद्धि राक्षसः।
          तेन चाहं न शक्रोमि शंयोद्धुं तस्य वा वलैः।।
          
        वाल्मीकि जी ने इस प्रसंग के माध्यम से जैसे यहाँ कहने का प्रयास किया है कि राजत्व से राक्षसत्व को नहीं जीता जा सकता! बल्कि संकल्प और विकल्प के बीच अपने कर्त्तव्यपथ की खोज करने वाले मानवीय भाव वाले राम ही ऐसे राक्षसत्व पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

          ताड़का एक स्त्री है, राम को उसका वध करने में हिचक हो सकती है इसीलिए विश्वामित्र राम को समझाते हैं कि ताड़का अधर्मी है और पहले भी पृथ्वी का नाश चाहने वाली विरोचन की लड़की मन्थरा को इंद्र ने मार डाला था। इसी प्रकार भगवान विष्णु ने भी इंद्र का नाश चाहने वाली भृगु की पतिव्रता पत्नी औत शुक्र की माता को मार डाला था -
          अधर्म्या जहि काकुत्स्थ धर्मो हास्या न विद्यते
           श्रुयते हि पुरा शक्रो विरोचन सुतं नृप।।
           पृथ्वी हन्तुमिच्छन्तीं मन्थरामभ्यमुढ्यत
           विष्णुना च पुरा राम भृगुपत्नी दृढ़व्रतो
           अनिंन्द्रं लोकमिच्छंन्ती काव्यमाता निपिद्रिता।।
     और इसी प्रकार अनेक पुरुषोत्तम राजकुमारों ने समय-समय पर अनेक अधर्माचरण वाली स्त्रियों का वध किया है। अतएव तुमको भी इस दुष्ट यक्षिणी को मारने में किसी प्रकार का विचार न करना चाहिए -

          एतैरन्यैश्च बहुभी राजपुत्र महात्मभि:
          अधर्मनिरता नार्यो हताः पुरुषसत्तमैः
            तस्मादेनां घृणा त्यक्त्वा
             जहि मच्छासनान्नृप।।

       विश्वामित्र के यह समझाने पर राम "गो ब्राह्मणहितार्थाय देशस्यास्य सुखाय च" अर्थात गो ब्राह्मण के हित और इस देश वासियों को सुखी करने हेतु ताड़का को मारने के लिए तैयार होते हैं, लेकिन ताड़का के सामने आने पर उसके कान और नाक काट कर केवल उसे भगाने का ही उद्यम करते हैं - 
       एनां पश्य दुराधर्पा मायावलसमन्वितम
        विनिवृत्तां करोम्यद्य हृतकर्णाग्रानासिकाम्।
क्योंकि वे सोचते हैं, स्त्री की जान लेना ठीक नहीं उसे केवल दुष्ट कर्म करने लायक नहीं रहने देना चाहते -
       न हृयेनामुत्सहे हन्तुं स्त्रीस्वभावेन रक्षिताम्।
       वीर्यं चास्या गतिं चापि हनिष्यामीति मे मतिः।।
       
         यही है वाल्मीकि के राम की मानवीयता! उनका उद्देश्य या संकल्प केवल यज्ञ की रक्षा करने का है, इसके लिए अनावश्यक किसी की वे जान नहीं लेना चाहते!! कर्तव्य पालन के पीछे ऐसी ही भावना होती है और यहाँ विकल्पों को भी महत्त्व मिलता है, यही तो मनुष्यत्त्व भी है। मनुष्यता किसी सिद्धि के लिए लालायित नहीं होती। 

       लेकिन ताड़का रुकती नहीं उसका रूप और भी विध्वंसक होता चला जाता है, इसे देखकर विश्वामित्र राम के इस दया भाव को लक्षित करते हुए उन्हें पुनः समझाते हैं कि इस पर अब दया दिखाने की जरूरत नहीं है -

          दृष्टा गाधिसुतः श्रीमानिदं वचनमव्रवीत्
          अलं ते घृणया राम पापैपा दुष्टचारिणी।।

          यहाँ तुलसी के राम की अपेक्षा वाल्मीकि के राम अधिक मानवीय हैं क्योंकि तुलसी के राम इतना सोच-विचार नहीं करते और ताड़का के दिखाई पड़ने पर मात्र एक ही वाण से वे उसका वध कर डालते हैं -

 चले जात मुन्हि दीन्हि दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई। 
  एकहि बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा।।

         तुलसी में मोक्ष की कामना है, उनके राम भगवान हैं और इसीलिए राम ताड़का को 'दीन' समझकर उसे देवस्थान भी प्रदान करते हैं। 

     लेकिन वाल्मीकि के राम द्वारा ताड़का के मारे जाने पर ताड़का के वन का शाप छूट गया और वह चैत्ररथ वन की तरह अत्यंत रमणीक हो गया -

          मुक्तशापं वनं तच्च तस्मिन्नेव तदाहनि।
          रमणीयं विवभ्राज तथा चैत्ररथं वनम्।।

         वाकई ! कर्त्तव्य पथ का अनुगामी मनुष्य धरती को रमणीय बनाता है। इस प्रकार तुलनात्मक रूप से हम कह सकते हैं कि जहाँ भगवान की कल्पना के केंन्द्र में मुमुक्षु भक्त होता है वहीं मानवीयता के केंन्द्र में विश्व और उसका प्रत्येक कण-कण होता है। इसीलिए ऊपर वाले को केंन्द्र में रखने वाले किसी धार्मिक की अपेक्षा मनुष्यता को केंन्द्र में रखकर कर्तव्य पथ के अनुगामी व्यक्ति इस धरती को अधिक कल्याणकारी और सुंदर बना सकता है। एक कवि की कल्पना में उसका महानायक भी ऐसा ही होता है और वाल्मीकि के राम ऐसे ही हैं।