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बुधवार, 9 नवंबर 2016

हमारा कश्मीर

            जम्मू में उस सरकारी खादी-भंडार के दुकानदार ने बताया कि जम्मू-कश्मीर का हैंडीक्राफ्ट्स जब देश के अन्य हिस्सों में बिकने जाता है तो उसपर टैक्स लगता है और वही माल देश के अन्य भागों में डेढ़ से दो गुने मँहगे दाम पर बिकता है। इस स्थिति में कश्मीर का व्यापार प्रभावित होता है। दुकानदार ने धारा तीन सौ सत्तर को इस टैक्स का कारण बताया। दुकानदार ने धारा तीन सौ सत्तर को कश्मीर का अन्य भारतीय राज्यों के साथ होने वाले व्यापार में बाधक के रूप में भी उल्लेख किया। वह भारतीय संविधान में प्राप्त कश्मीर के विशेष दर्जे को हटाए जाने के पक्ष में था। यहाँ एक बात और बताना चाहते हैं वैसे जो यहाँ की यात्रा कर चुके होंगे उन्हें पता ही होगा, वह यह कि यहाँ बीएसएनएल या अन्य कम्पनियों के प्रीपेड सिम रोमिंग पर भी काम नहीं करते, जबकि यही सिम भारत के किसी भी क्षेत्र में जाइए रोमिंग के साथ काम करते रहेंगे। एक तरह से यह हमें गलत प्रतीत हुआ था। कुछ लोगों ने इसके पीछे भी धारा तीन सौ सत्तर का कारण बताया। 

              ट्रेन में छह-सात कश्मीरियों का एक दल भी मिला, जो कश्मीर से कोलकाता जा रहा था। वैसे तो वे आपस में कश्मीरी में ही बात करते थे लेकिन अन्य लोगों से बातचीत में हिंदी का ही प्रयोग करते थे। एक बात है, वाकई! आज हिन्दी देश के आमजनों को जोड़ने वाली भाषा बन चुकी है। विशाखापट्टनम आन्ध्रप्रदेश का वह सैनिक भी हिन्दी में बखूबी बोल ले रहा था जो विशाखापट्टनम से जम्मू अपने तैनाती स्थल पर जा रहा था। पूँछने पर उसने बताया था कि पाँच वर्षों से वह यहाँ तैनात है तो हिन्दी सीखनी ही है। मतलब कोई चाहे या न चाहे हिन्दी सही मायने में राष्ट्रभाषा का स्थान लेती जा रही है। हाँ तो, उन कश्मीरियों ने भी जब अपने मोबाइल से गाना सुनने शुरू किए तो वह भी हिन्दी फिल्म का ही गीत था। बातों-बातों में उन कश्मीरियों ने बताया कि वे श्रीनगर के लाल चौक के निवासी हैं और व्यापार के सिलसिले में कोलकाता जा रहे हैं, जहाँ उन्हें लगभग छह माह तक रहना है। उनमें, कुछ के साथ उनका परिवार भी था। हालाँकि वे अपने खाने-पीने से लेकर बड़े मस्त अंदाज में अपनी इस यात्रा पर थे। 

       

             हमारी उनसे बातचीत बढ़ी। तो उन लोगों ने हमसे श्रीनगर जाने के बारे में पूँछा तो पत्नी ने आतंकवादियों का डर बताया। इसपर उन कश्मीरियों ने कहा ऐसी कोई बात नहीं है। हाँ, डलझील के हाउसबोट जरूर मँहगे हैं। फिर एक बुजुर्ग कश्मीरी ने पहलगाम और बाबा अमरनाथ की और मुबारक छड़ी की चर्चा श्रद्धा भाव से करते हुए मुझसे कहा वहाँ अवश्य जाना चाहिए। पत्नी के वहाँ के सेब के बागानों का जिक्र करने पर उनने हमें एक कश्मीरी सेब खाने के लिए दिया। उनके साथ एक अट्ठारह-बीस वर्ष के नौजवान को देखकर पत्नी ने उसकी पढ़ाई के बारे में पूँछा तो उन लोगों ने उसके हाईस्कूल पढ़े होने और बिजनेस सीखने के लिए साथ चलने की बात कही। हाँ, इन दिनों कश्मीर घाटी में हड़ताल होने के कारण स्कूल बंद होने की टीस बातों-बातों में दबे स्वर में भी उनसे व्यक्त हुआ। ट्रेन से उतरते समय उन लोगों ने बड़े जोशो-खरोश और आत्मीयता के साथ हमसे हाथ भी मिलाए थे। 

              मैं मानता हूँ, हमारे अपने देश में चाहे कोई किसी धर्म का माननेवाला क्यों न हो, जब हम कहीं आपस में मिलते हैं तो, किसी परिवार के सदस्यों की ही तरह आत्मीयता लिए हुए! देश के आम लोगों के बीच कहीं कोई कटुता नहीं है। मुझे आश्चर्य होता है कैसे कुछ लोग धर्म की आड़ लेकर दिलों में दरार डालने में कामयाब होते दिखाई देते हैं? 

        एक बात है, यदि इस देश में जीवन की सहजता बनाए रखने दिया जाए तो शायद साम्प्रदायिकता जैसी समस्याएं जन्म ही न लें। मैंने अनुभव किया है कि, यह दिखाने के लिए कि हम आपके साथ हैं किसी अल्पसंख्यक समुदाय को किसी अतिरिक्त सिम्पेथी की भी जरूरत नहीं है। यह दिखावे की प्रवृत्ति भी हम भारतीयों की सहज जीवनशैली को प्रभावित करती है तथा एक तरह की साम्प्रदायिकता को ही जन्म देती है। हम जहाँ मिले एक दूसरे का सम्मान करते हुए आत्मीयता के साथ। मेरा अपना अनुभव है कि, देश में आम लोग साम्प्रदायिक समस्या की चर्चा करने में भी शर्म महसूस करते हैं। वाकई! हमें इसकी चर्चा भी नहीं करनी चाहिए।हम जहाँ मिले एक दूसरे का सम्मान करते हुए आत्मीयता के साथ। समस्याएँ स्वत: हल हो जाएंगी। आखिर, ऐसे ही नहीं हम हजारों साल से साथ रहते आए हैं, हम एक-दूसरे के अंग ही हैं। 

                एक अन्तिम बात, पूरा भारत एक ही तरह का है, इसमें किसी को कोई सन्देह नहीं होना चाहिए। कोई विभिन्नता समझाए तो तत्काल समझ जाइए कि कोई नेता बनने की कोशिश में है। 

यूनियनबाजी

                आजकल नास्तिक लोग भी यूनियनबाजी पर उतर आए हैं। मेरा भी मन करता है कि स्वयं को नास्तिक घोषित कर नास्तिकों की यूनियन में सम्मिलित हो जाएँ। इधर नास्तिकों की एक बैठक की चर्चा जोरों से चल भी रही थी। वैसे भी, भगवान जी के सामने हाथ जोड़कर जब भी खड़ा होता हूँ, तो लगता है जैसे किसी नाटक में भाग ले रहा होऊँ..! भगवान जी हैं भी या नहीं, और अगर हैं भी तो मेरी विनती सुन रहे होंगे या नहीं..हाथ जोड़े-जोड़े, इन्हीं प्रश्नों से दो-चार होता रहता हूँ...सोचता हूँ, नास्तिक हो जाने पर हाथ जोड़ने या भगवान बेचारे के होने न होने की सोच से मुक्ति मिल जाएगी और सबसे बड़ी बात तो स्वयं भगवान जी के लिए होगी.. हमारे जैसे अन्य नास्तिकों की बढ़ती संख्या से भगवान को भक्तों की अर्जियों के ढेर से मुक्ति भी मिलेगी...इन अर्जियों को पढ़ने और इसपर कार्यवाही हेतु अन्य देवताओं को मार्क करने में भगवान जी को काफी जहमत उठानी पड़ती होगी... मतलब, हमारे नास्तिक हो जाने का सबसे बड़ा लाभ स्वयं भगवान को ही मिलेगा...

            एक बात है नास्तिक होना कोई हँसी-ठट्टा जैसा खेल नहीं है.. इसके लिए बकायदा दिमाग पर जोर डालना पड़ता है, फिर किसी बात की परवाह न करते हुए "इनकारी-स्वभाव" बनाना पड़ता है। हाँ.. जैसे "भई मैं इसमें विश्वास नहीं करता.." उसे तर्क पर तर्क करने में महारत हासिल होना चाहिए। मतलब नास्तिक अपनी बुद्धि का जबर्दस्त उपयोगकर्ता होता है। सभी चीजों का खंडन करता है। मंडन तो जैसे उसे आता ही नहीं। तो क्या नास्तिक अपनी बुद्धि में ही जीता है..? हाँ, नास्तिक अपनी बुद्धि में जीता हो या न जीता हो, लेकिन अपने में ही अवश्य जीता है। तर्कबुद्धि वाला अवश्य नास्तिक हो जाता है क्योंकि नास्तिक संसार को छील-छील कर देखता है। नास्तिक बाल की खाल निकाल-निकाल कर नास्तिक होते रहते हैं।

           इधर आस्तिक चीजों को छीलकर देखने का आदी नहीं होता। वह भी छीलने वालों से चिढ़ता है इसीलिए वह सभी चीजों को स्वीकार करनेवाला होता है। उसकी अर्जी भगवान से लेकर हर उस जगह लगी होती है जहाँ से भी उसे कुछ मिलने की उम्मीद रहती है। अभी आप देखो, सत्तापक्ष के लोग आस्तिक होते हैं.. उनमें आशा की किरण छिपी होती है, वे नास्तिक नहीं होते। नास्तिक तो वही होता है जिसकी कहीं सुनी नहीं जाती, और इसी खिसियाहट में ऐसे लोग नास्तिक हो जाते हैं। मतलब नास्तिक होना एक प्रकार की खिसियाहट ही है।

            एक हमारे बाबा थे, एक बार किसी बात पर अपने भगवान से गुसाए तो भगवान को ही कुएँ में फेंक दिए.. एकदम से नास्तिक होने के खिसियाहट भरे अंदाज में..! हालाँकि बाद में वे अपने भगवान के बिना परेशान भी हो उठे थे और अपने भगवान को खोजने के लिए कुँए में भी कूदने के लिए तत्पर हो उठे थे। वे मेरे बाबा बहुत साधारण सपनों वाले इंसान थे इसीलिए अपने भगवान के बिना बेचैन हो उठे थे। मतलब बड़े सपनों वाले लोग काम बनता न देख भी नास्तिक हो जाते हैं..और यही लोग काम की चिन्ता से मुक्त हुए तो, इसी अपने नास्तिकता के कुँए से भी अपना भगवान खोज लाते हैं।..

           कभी-कभी आस्तिकों की मौज देख लोग नास्तिक बन जाते हैं..! मैंने एक व्यक्ति को पूजा-पाठ करने वालों से बहुत चिढ़ते हुए देखा था, वे आस्तिकों के बारे में कहते थे कि , "ये खाए-पिए अघाए लोग हैं।" बात सही भी है, ये  चिढ़ने वाले तो दिनभर अपनी आइडियाबाजी से फुर्सत ही नहीं पाते कि कुछ करके आस्तिकों जैसा सुख लूटें..सो दिन भर आस्तिकों से ही खुन्नस निकालते रहते हैं। और इसी खुन्नस में अपनी नास्तिकता भी प्रदर्शित करते हैं और पीठ पीछे दिन रात माला भी जपते रहते हैं कि हे भगवान हमारे दुख-दलिद्दर काटो। खैर...

          कुछ लोग मानते हैं कि, जो काम करने में ही विश्वास करता है वही नास्तिक होता है..। ये ल्लो,  मैं तो यही मानता आया हूँ, जिसके अन्दर किसी भी तरह का विश्वास का कीड़ा होगा वह आस्तिक ही होगा... नास्तिक तो, विश्वास विहीन जीव होते हैं, ये किसी बात पर विश्वास नहीं करते। फिर ये कर्म पर कैसे विश्वास करेंगे? चार्वाकी तो नास्तिकों के मसीहा माने जा सकते हैं! अगर ये कर्म पर विश्वास कर रहे होते तो "ॠणं कृत्वा घृतम् पीवेत" का उपदेश न दिए होते। नास्तिक कुल मिलाकर मौज करने वाले लोग ही होते हैं, और दूसरे के फटी में अपनी टाँग अड़ाकर मौज लेते रहना, कर्ज लेकर घी पीना इनकी आदत में शुमार होता जाता है। मतलब कर्जदारी में होना भी नास्तिक होने का एक लक्षण ही है।

         लेकिन आप मानो या न मानो यह आपकी मर्जी, नास्तिक होता है बहुत भावुक इंसान..! इसे बात-बात पर रोना आता है..लेकिन ये दूसरों को रुला नहीं पाते..दूसरों को रुला न पाने की अक्षमता के कारण अकसर ये अपने को उपेक्षित ही समझते हैं.. अब यह इनकी अपनी समझ है, इसपर हम क्या कहें..। खैर, ये अकसर आस्तिक या कहें भगत विरादरी से परेशान होकर रोते रहते हैं.. यहाँ भगत विरादरी भी कम चालू नहीं है...यह बिरादरी अपनी आस्तिकता खूब पहचानती हैं.. ये लोग अपनी आस्तिकता के बल पर जब चाहें जिसको रुला देते हैं, हाँ केवल पहले रोना शुरू करके..!

         ये आस्तिक या कहें भगत, अपनी भावना रूपी पतवार को थाम कर भवसागर में उतरते हैं और और बाद में किसी चट्टान जैसे टापू की त्वरित पहचान कर उसपर शरण ले वहीं से भवसागर में तिरते लोगों को भक्ति-भावित कर भवसागर पार कर लेने का सब्जबाग दिखा दिखाकर इस सागर में उनसे हाथ पैर चलावाते रहते हैं..ये हाथ-पैर चलाने वाले इसके सिवा कुछ कर भी नहीं सकते क्योंकि भगत की वंशी की धुन जो बड़ी प्यारी होती है...! हाँ, एक बात है ये भगत और कोई नहीं स्वनामधन्य घोषित आस्तिक ही होते हैं, जिनके आनंदित हो कर बंशी बजाने के सुख से कोई असुखी अपने को नास्तिक घोषित कर लेता है। और ये नास्तिक लोग भवसागर में जाने से कतराते भी हैं तथा घोषित आस्तिकों की, किनारे बैठे लानत-मलामत करते रहते हैं। मतलब यहाँ एक बात और स्पष्ट होती है, वह यह कि, नास्तिक होना या आस्तिक होना केवल कुछ लोगों का ही काम है, हम यह भी कह सकते हैं, जिसका काम बन जाए वह आस्तिक और जिसका काम न बन पाए वह नास्तिक..! यही है नास्तिक-आस्तिक का खेल..बाकी तो सब अपने-अपने तईं, भवसागर में ही डूबते उतराते रहते हैं।

             मैंने शुरू में कहा था न कि मैं भी थोड़ा-बहुत अपने को नास्तिकता की श्रेणी में डाल दूँ..! लेकिन मुझ पर तब कुछ ज्यादई दिमागदार होने का आरोप चस्पा होगा या फिर मेरा कोई काम गड़बड़ा गया है बताया जाएगा। लेकिन, यहाँ मैं अपनी सफाई में कहना चाहता हूँ कि भइए! ऐसा कुछ नहीं है..हाँ, रोज-रोज की चिक-चिक से मुक्ति पाना चाहता हूँ कि लो अब सारा टंटा खतम, न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी..कहो अब सेकुलर-सेकुलर..! मैं तो बन गया नास्तिक..तो..अब सेकुलर काहे का...?.. अब मैं कहाँ धर्मनिरपेक्ष रहा..? मैं तो अब नास्तिक-धर्मी हुआ..! तुम तो अपने ईश्वर, गाड, भगवान, अल्ला..को पकड़े रहो.. मैं तो सब छोड़कर नास्तिक बनने चला..! सेकुलरता के दिखावे से पिंड भी छूट जाएगा।

           अब मैं भगवान को ही नहीं मानता उन बेचारे को तो मैं नास्तिकता के कुँए में फेंक आया..अब न तुम्हारी ईद की सिवईया खाऊँगा और न रोजा-इफ्तार में जाऊँगा और न ही तिलक लगाकर किसी गंगाघाट या मूर्ति के आगे शीश झुकाउंगा..इस नास्तिकता से सेकुलर दिखने का सारा झगड़ा-टंटा खतम..देख लेना एक दिन सभी सेकुलर खेमे के लोग ऐसेई अपने को नास्तिक घोषित कर देंगे..! और तो और..नास्तिक घोषित हो जाने से भगत होने जैसे आरोप से भी मुक्ति पा जाएंगे..बाम-दक्षिण का भी विवाद खतम..। यहाँ एक बात और है, भगवान को कुएँ में फेंक देना ही नास्तिकता नहीं है, किसी खाते-पीते को देखकर चिढ़ जाना भी नास्तिकता ही है, लगे हाथ इसी के साथ गरीबों के मसीहा भी सिद्ध मान लिए जाएंगे। बहुत फायदेमंद है नास्तिक होना।

        लेकिन नास्तिकों को यूनियनबाजी की क्या जरूरत...? अरे भाई! बिना यूनियनबाजी के कोई जान नहीं पाएगा कि हम भी नास्तिक हैं..या नास्तिक होने का कोई लाभ समझ में भी नहीं आएगा। अकेले में बने रहिए नास्तिक...किसी का क्या जाता है..! वैसे भी, आजकल संघ का जमाना है..दल का जमाना है... संघ बनाकर लोग मौज तो कर ही सकते हैं, तो नास्तिकों को इकट्ठा होना ही पड़ेगा, यूनियनबाजी करनी ही होगी।

            वाकई! यह एक दिव्य सोच है...अपने को नास्तिक घोषित कर देना...आखिर, है कोई माई का लाल जो अपने को आस्तिक घोषित कर दे? आस्तिकता कोई घोषित करने वाली चीज नहीं है जैसे प्रकृति कुछ भी घोषित नहीं करती। घोषित तो रेयर वाली चीज होती है आस्तिकता रेयर वाली चीज नहीं है, रेयर तो नास्तिकता ही है! इसीलिए जब घोषित होगी तो नास्तिकता ही। हाँ, नास्तिक घोषित कर देने का यही उचित मौसम भी है और नास्तिकों के यूनियनबाजी का भी। यह जरूरी है ; मान लो, गलती से किसी सम्प्रदाय के चेले-चपाटों के बीच उनसे पाला पड़ गया और गलती से उन्हें नास्तिकता की झाड़ पिलाई तो फिर बड़ी पल्लई होगी..! फिर तो वहाँ साम्प्रदायिक ही घोषित करा दिए जाएँगे, दंगा हो जाएगा..! तब क्या होगा..?  तब यही नास्तिकों की यूनियन हमारे काम काम आएगी, तब सभी नास्तिक मिलकर हमें आरोपमुक्त कराएंगे, दंगाइयों से बचाएंगे। इसीलिए नास्तिकों के यूनियन की जरूरत है, इस यूनियन की बैठक होनी भी जरूरी है। भाई! नास्तिक होने की यही राजनीति है.. हम तो नास्तिकता की राजनीति करेंगे।

         लेकिन हम तो ठहरे साधारण लोग...हम कोई आइडियाबाज भी नहीं है.. और न ही किसी ऊँचे ख्वाब में जीने वाले लोग, तो क्यों अपने को आस्तिक या नास्तिक घोषित कर यूनियनबाजी का चक्कर पालें? यूनियनबाज ही घोषणाएँ करते हैं और किसी घोषणा की सफलता के लिए यूनियनबाजी की दरकार होती है। मतलब यूनियनबाजी का चक्कर हर जगह है... सोच रहा हूँ इस पचड़े में पड़ने से बेहतर सलाहियत मेरे लिए यही होगी कि...जब यूनियनबाजी ही करनी है तो नास्तिक होने से बेहतर "सेकुलर" ही बने रहना है..और सेकुलरों का बना बनाया यूनियन भी मिल जाता है..! ...इसमें साम्प्रदायिक होने का कम से कम कोई खतरा भी नहीं होता। तो भाई लोग, "सेकुलर" होने का विकल्प "नास्तिक" होने में मत तलाशो यह ठीक नहीं आज की राजनीति में "सेकुलरता" ही उम्दा माल है..! नहीं तो, जिसके लिए तुम नास्तिक बन रहे हो वही तुम्हें साम्प्रदायिक घोषित करा देगा।

           इधर नास्तिक के कुँए में फेंके गए मेरे भगवान जी मुझे याद आने लगे हैं. मुझे उनकी कमी अखर रही है...मिल जाएँ तो कम से कम उन्हें पकड़ कर दो बूँद आँसू ही गिरा लूँ...मन बड़ा भावुक-भावुक सा हो रहा है इतनी राजनीति मैं संभाल नहीं पाउँगा...मेरे ख्वाब बड़े नहीं हैं। मुझे नास्तिक या आस्तिक होने में कोई दिलचस्पी नहीं है क्योंकि मैं यूनियनबाज भी नहीं हूँ....

अपने-अपने परिभ्रमणीय पथ

              आज सवा पाँच बजे "मार्निंग वाक" के लिए निकले थे। धीरे-धीरे दिन छोटा रात बड़ी होने लगी है। इसलिए अभी अँधेरा था। करीब सात-आठ मिनट की दूरी तय करने के बाद देखा रास्ते के किनारे पड़ने वाले एक कार्यालय के सीमेंटेड बेंच पर दो महिलाएँ बैठी इत्मीनान से आपस में बतिया रही थी। मैंने सोचा निश्चित रूप से ये महिलाएँ अल-सुबह टहलने के लिए ही निकली होंगी, लेकिन यहाँ टहलने का काम भूल गप्पबाजी में मशगूल हो गई हैं। वास्तव मे, औरतों की हो सकता है यह आदत ही हो कि, जहाँ दो इकट्ठी होंगी, वहाँ अपना सब काम छोड़कर बतियायेंगी ही...

           खैर,  मेरी इस धारणा को पढ़कर कुछ नारीवादियों को कोफ्त हो सकती है कि मैं महिलाओं पर गलत चार्ज फ्रेम कर रहा हूँ..! लेकिन इसकी तुलना पुरुषों से करते हुए सिद्ध कर सकता हूँ कि पुरुष ऐसे नहीं होते...अब यहीं स्टेडियम में ग्रुप में पुरुष टहलते हैं, और टहलते हुए आपस में खूब बतियाते भी हैं, लेकिन इस बतियाने के चक्कर में अपना टहलने वाला काम नहीं छोड़ते...खैर.. 

            मेरा यहाँ उद्देश्य, स्त्रियों को नीचा दिखाना नहीं है। बेचारी ये स्त्रियाँ अपने घरेलू कार्यों में इतनी उलझी हुई होती हैं कि इन्हें फुर्सत में बतियाने का मौका ही नहीं मिल पाता...और दूसरे, अधिकांशतया इनका दायरा भी सीमित ही होता है.. आखिर बतियाएँ भी तो किससे..! इसीलिए जब दो-चार इकट्ठी हो जाती हैं तो ये स्त्रियाँ बेचारी अपने सारे काम भूल कर बतियाने की अपनी भड़ास निकाल लेती हैं। जबकि वहीं पुरुष अपने काम-धाम के चक्कर में, उसे दिनभर कहीं न कहीं गप्पबाजी का अवसर मिल ही जाता है। 

            इन्हीं विचारों के साथ मैंने स्टेडियम में प्रवेश किया अब झुलफुले की आहट मिलने लगी थी...हवाओं में कुछ गति थी, पेडों की पत्तियों से सरसराहट सुनाई पड़ रही थी और हवाओं के शरीर छूकर निकलने का अहसास हो रहा था...कुल मिलाकर अच्छा भी लग रहा था... इधर तीन-चार दिन बाद स्टेडियम भी आया था... सोचा हमारी धरती दिव्य है..!!

         जैसा कि रोज ही होता है, चाय बनाता हूँ.. पीता हूँ..और फिर अखबार पढ़ता हूँ...सो अखबार पढ़ना चालू किए -

             बाकी आप जानते ही हैं कि अखबार पढ़ने पर क्या मिलता है..वही सब बातें जिनसे हम पीछा छुड़ाना चाहते हैं..सबेरे-सबेरे बे-फालतू की बातों की चर्चा कर आपका मूड खराब करने का कोई इरादा नहीं है... हाँ, एक बात पढ़ कर थोड़ा रोमांचित और उद्वेलित अवश्य हुआ...वह कि.. "ब्रह्मांड में दो लाख करोड़ आकाशगंगाएं" मतलब मतलब पूर्व के अनुमान से बीस गुना अधिक आकाशगंगाएं हैं। पहले तो दसी हजार का अनुमान था! एक बात और है, मौजूदा तकनीक से हम मात्र दस फीसदी हिस्से का ही अध्ययन कर पाते हैं..! 

       देखा भाई लोग!  ये है हमारा अनन्त ब्रह्मांड...लेकिन मेरा अपना मत है कि अनन्त आकाशगंगाएं हैं..कोई गिनती नहीं...!! और हम इसके सामने कितने तुच्छ हैं कि माइक्रोस्कोप या सूक्ष्मदर्शी से देखें तो अपनी पृथ्वी ही न दिखाई पड़े..फिर भी हम अपने को ही ब्रह्मांड मान ऐंठे रहते हैं...

            इधर फेसबुक भी अपना एक ब्रह्मांड लिए फिर रहा है...! इसका हाल तो कुछ मत पूँछिए..! यहाँ की आकाशगंगाएं और उसके ग्रह-नक्षत्र परस्पर एक दूसरे को विरोधी मानकर एक-दूसरे के परिभ्रमण पथ पर अपने गुरुत्वाकर्षणीय प्रभाव को जबर्दस्ती डालने से बाज नहीं आते..लगातार एक दूसरे के परिभ्रमण पथ को प्रभावित करने की कोशिश में लगे रहते हैं..! बेचारा, अगर कोई कमजोर पड़ जाए तो अपना परिभ्रमण पथ छोड़कर पलायित हो लेता है..और कुछ ऐसे भी हैं, जो किसी की चमक का ऐसा अहसास करते हैं कि दिन-रात कुढ़न में उसके ऊपर धूमकेतुओं की ऐसी बौछार करते हैं कि उसकी सारी चमक और उर्जा फीकी पड़ जाए..!  यहाँ सभी तो आकाशगंगा की तरह अपने-अपने ग्रह और नक्षत्र बना लिए हैं...

         बेचारा यह अनन्त ब्रह्मांड होता रहे अनन्त..! लगाते रहें इसके ग्रह-नक्षत्र अपनी-अपनी कक्षा में चक्कर..! लेकिन रहेगा यह अदना का अदना ही क्योंकि अनन्त काल से इसने जैसे कुछ सीखा ही नहीं...कि, किसी के परिभ्रमण पथ पर कैसे अड़ंगा लगाया जा सकता है..!

          लेकिन इससे हमें क्या फर्क पड़ता है..हमने, हमारा रचा ब्रह्मांड अदना नहीं है..इस फेसबुकीय ब्रह्मांड में ब्रह्मांडीय नियम लागू ही नहीं होते...हम अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते..! 

           चलते-चलते - 

            

               भाई मेरे!  सबके अपने-अपने परिभ्रमणीय पथ होते हैं.. सबको चलते रहने दो...इससे कोई फर्क नहीं पड़नेवाला..!! जीवन की परिस्थितियाँ तो किसी संन्तुलित पथ पर ही उपजती है..!

             --Vinay 

             #दिनचर्या 23/15.10.16

शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

दबंगई का विजन...

            मतदाता पुनरीक्षण का कार्य चल रहा है। सो, हम भी इस काम-धाम की जाँच के लिए अपने जोन में निकल लिए।  बूथ-ऊथ देखते रहे। घटने-बढ़ने वाले मतदाताओं की जानकारी करते रहे। एक चर्चा के दौरान यह बात उठी थी कि अविवाहित लड़कियों की उम्र अट्ठारह वर्ष हो जाने के बाद भी, खासकर गाँवों में, परिवार के लोग मतदाता सूची में इन लड़कियों का नाम शामिल कराने से कतराते हैं। और विवाहित होने पर ससुराल की मतदाता सूची में नाम शामिल हो जाने का तर्क देते हुए सूची में नाम शामिल कराने में रुचि नहीं लेते। खैर, इसके पीछे कुछ अन्य कारण भी होंगे। यह परम्परा से चली आती अधिकारों की गँवई मानसिकता हो सकती है। इसीलिए परम्पराओं की लीक पकड़ कर चलना सदैव ठीक नहीं माना जा सकता। 
         इस सम्बन्ध में एक बूथ पर पूँछने पर बताया गया कि, "ऐसी बात नहीं है, लोग इस वजह से भी मतदाता सूची में शामिल होना चाहते हैं कि मतदाता-पहचानपत्र से उनकी पहचान होती है। आजकल इसकी बहुत जरूरत पड़ने लगी है।" मतलब हो सकता है उपरोक्त बात में आंशिक सत्य हो।
     
           एक बूथ पर वहाँ की जनसंख्या के अनुपात में अधिक मतदाता दिखाई दिए। बी एल ओ ने बताया कि रिकार्ड में जनसंख्या वास्तविक जनसंख्या से कम दर्ज है। कुछ लोग किसी शहर-वहर में निवास करने के बाद भी गाँव की मतदाता सूची में अपना नाम इसलिए देखना चाहते हैं कि, इसमें वे अपनी जड़ तलाश कर रहे होते हैं। मैं इसपर, उसे कुछ सजेशन सा देते हुए सूची से, गाँव से बाहर निवास करने वालों के नाम हटाने के लिए कहा। तो, गाँव के दबंग किस्म के लोगों के डर से, उसने ऐसा करने में कुछ असमर्थता सी व्यक्त की। लेकिन, मैंने उसे थोड़ी हिम्मत बधाई। हालाँकि, गाँव का श्रमिक वर्ग शहरों में मौसमी मजदूरी करने निकल जाता है, जो दो-चार माह बाद वापस भी आ जाते हैं, लेकिन इस चक्कर में उनका भी नाम मतदाता सूची से कट जाने का अंदेशा रहता है। जब दबंगों पर आँच आती है तो वह भी अपने विरोधी ऐसे लोगों का मतदाता-सूची से नाम कटवाने का प्रयास करते हैं। खैर, मैंने बी एल ओ से सावधानी पूर्वक काम करने की बात कह आगे बढ़ गया था। 

           ये दबंग भी गाँव-गाँव विद्यमान है। वाकई! देश को इनसे भी आजादी चाहिए। इनके कारण लोग अपने काम को ढंग से कर ही नहीं पाते। ऐसे ही एक बूथ पर, एक सदियों पुराना किला दिखाई दिया। वह पहाड़नुमा बड़े-बड़े पत्थर के चट्टानों के सहारे बनाया गया था। एक व्यक्ति ने मुझे बताया "यह छत्रसाल के जमाने का है।" इस किले में कई गुप्त-द्वार, तहखाने, सुरंगों के होने का आभास हुआ, जो समय की मिट्टी में, जैसे दब चुके दिखाई दिए थे। 

             इस किले को देखते हुए मन में खयाल आया, तब के दबंग ऐसे किलों में रहते थे। और, इस किले में हो सकता है, तमाम चींखें भी गूँजी हो, जो इस किले की दिवारों से टकराकर शान्त हो गई हों। लेकिन आज के दबंगों को, किसी किले की जरूरत नहीं है, उसके लिए हमईं लोग काफी हैं, हम ही दबंगों के लिए उनके किले हैं। और आज, लोग चीखते भी नहीं, अगर चीखें भी तो इनकी ऐसी आवाजें, अब फाइलों के पन्नों के तहखाने, सुरंगों में गायब हो, धीरे-धीरे समय के साथ दब जाती है। इसीलिए पुराने पत्थर के किले अब ढह चुके हैं और जो बचे हैं वे भी ढह ही रहे हैं। और, किले का स्वरूप बदल गया है, अब ये किले, पन्नों, फाइलों में तब्दील हो चुके हैं। साथ ही दबंगों का आभामंडल भी बदल चुका है। 
          फिर दूसरे गाँव से गुजरे। गाँव के किनारे एक बड़ा सा तालाब था। लेकिन ऊँचे बंधों के कारण तालाब दिखाई नहीं दे रहा था। बँधे के ऊपर कुछ पेड़ थे। बरगद, पीपल, पाकड़ जैसे पेड़। एक पेड़ के नीचे एक छोटा सा मन्दिर बना था। उस मन्दिर पर कुछ ग्रामीण महिलाएँ धूप-दीप दे रही थी। उसी बँधे के ऊपर पच्चीस तीस लड़के कई समूहों में बैठे-खड़े दिखाई दिए। मुझे गाँव में अपने बचपन की याद आई। खैर...
        इधर हाल ही में यहाँ कई तालाबों का खुदाई भी कराई गई है, सो जिज्ञासा वश उस तालाब की स्थिति देखने मैं, बँधे पर चढ़ गया। हाँ, मैंने ध्यान दिया कि बंधे पर मुझे चढ़ते देख कुछ लड़के भागे भी थे। तालाब में पानी भरा था। बच्चे तैर रहे थे, तथा गाँव की कुछ औरते तालाब में नहा भी रहीं थी। तालाब के बँधे से वापस हो लिया। बंधे से उतरते हुए, मैंने वहीं एक आदमी को हैंडपंप पर कप गिलास धोते देखा। किसी उपन्यास में वर्णित ग्रामीण-परिवेश जैसा यह दृश्य जीवंत हो गया। 
          गाड़ी में बैठते ही मेरे ड्राइवर ने बताया, हैंडपंप पर आदमी शराब का कप-गिलास धो रहा था और वहीं पास में शराब की दूकान भी खुली थी। तब तक रामकिशोर ने मुझे एक और जानकारी दी, "बंधे पर आपको देखकर जो लड़के भागे थे, वे जुआ खेल रहे थे।" खैर, बचपन में गाँव में हम भी तो, खूब "दहला-पकड़" खेले थे। ताश का यही खेल मुझे सबसे आसान लगता था। वैसे, शुरुआती दिनों में हम बच्चे बड़ों से छिपकर यह खेल खेलते थे। लेकिन, ये बच्चे मुझे देखकर भागे थे, जबकि मैं इनके घर का बड़ा भी नहीं था। हो सकता है, ये जुआ ही खेल रहे हों। गाँवों में घूमते हुए यह दृश्य आम है। सच में, जिस उर्जा से तस्वीर बदली जा सकती है, तमाम किले ढहाए जा सकते हैं, वही उर्जा बर्बाद हो रही है, आहिस्ता-आहिस्ता सा..! शराब का वह ठेका भी किसी दबंग का ही रहा होगा।
           हमारा ग्राम्य-जीवन बिना किसी "विजन" के आहिस्ता-आहिस्ता केवल सरक सा रहा है। जो लोग केवल ग्राम के होकर रह गए हैं उनके लिए सरकारें काम तो करती हैं, लेकिन इन्हें कोई विजन नहीं दे पाती। सरकारें विजन देने में नाकाम रही हैं। अब "दबंगई" भी एक नए "विजन" के रूप में सामने आई है। हाँ, यह मतदाता सूची भी तो नए-नए दबंग पैदा करती है, दबंगई का ही विजन देती है। और, भारत में लोकतंत्र और कुछ नहीं तो, दबंगई का विजन तो है ही। 

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

डरना जरूरी है!

आज सुबह स्टेडियम पहुँचने में कुछ देर हो गया। लगभग साढ़े छह बजे पहुँचा था। वह ग्रुप, जिसमें अकसर चार-पांच सदस्य होते हैं, रोज की तरह एक साथ टहलते हुए मिल गया। टहलते हुए ग्रुप के सदस्य एक-दूसरे से बतियाते स्टेडियम का चक्कर लगाते हैं। स्टेडियम में इनके आने का समय पक्का है। ‌जबकि मुझे अकेला ही टहलना पसंद है, एकांत हो तो और भी अच्छा। इसलिए अकसर पौ फटते ही मैं स्टेडियम में पहुँच जाता हूँ और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के अंदाज में टहलकर वापस हो लेता हूं। तब तक ग्रुप भी यहां नहीं आया होता है। लेकिन कभी-कभी कुछ देर हो जाती है तो यह ग्रुप मिल जाता है।

वैसे, इनके बीच में चल रहीं बातें ज्यादातर समसामयिक सामाजिक परिस्थितियों या फिर राजनीति पर होती हैं। ज्यादातर जुमलेबाजी के अंदाज में ही यह बातचीत होती है। 
जैसे आज ही की ही बातचीत में शामिल जुमले कुछ इस तरह थे, "सारा काम मोबाइल करेगा" या "भगत को फोन लगाओ", "अब बिना ड्राइवर के ही गाड़ियाँ होंगी" "बिना दिल का आदमी होगा" आदि-आदि। यही नहीं ये लोग ऐसे प्रत्येक जुमले के बाद समवेत ठहाके भी लगाते जा रहे थे। शायद उनके बीच चल रही यह हंसी-ठिठोली इन्हें दिनभर के लिए ऊर्जस्वित कर रही थी। 

अभी-अभी कोई कहते हुए सुनाई पड़ा, 

“ड्राइविंग जैसी सीट पर बैठे आदमी का अब कोई भरोसा नहीं रहा।” इसीलिए "बिना ड्राइवर के गाड़ी" की बात होने लगी है। 
इसी तरह दिल और दिमाग भी अब जरूरी नहीं रहा केवल "भगत" बनकर काम चलाया जा सकता है। खेमेबाजी के आज के दौर में हर खेमे को भी ऐसे ही दिल और दिमाग विहीन "भगत" चाहिए हैं। 

इन जुमलों के बीच किसी ने कहा, "भगत को फोन लगाओ।" खैर।

स्टेडियम से टहलकर वापस आ गया। 

मेरे आवासीय परिसर के खड़जे पर काफी मात्रा में दूब उग आई थी। इस पर ध्यान जाते ही मैं इस घास की सफाई में जुट गया। इस काम में मन को एक अजीब-सा सुकूँन मिला। 

मुझे लगा जैसे मैं परिसर की नहीं अपने मन के किसी कोने का खंज-अखंज हटा रहा होऊं! 

इस सफाई से निवृत्ति पाकर मैं सुबह की चाय पीने लगा। 
तभी बाहर से अखबार फेंके जाने की आवाज आई। अभी-अभी हॉकर बाहर अखबार फेंककर गया। अखबार उठाने नहीं गया। 

मुझे याद आता है, छात्र-जीवन में सुबह हुआ नहीं कि हॉकर की राह तकने लगता। शायद तब मन में जिज्ञासु भाव ही नहीं देश-दुनियां की प्रबलता थी। लेकिन उम्र के साथ जीवनानुभव बढ़ जाने से यह जिज्ञासु-भाव भी क्षीण होने लगा है।

खैर, जीवन में गंध अभी बाकी है। कुछ क्षण बाद यूँ ही अखबार उठाने चला गया। 

बाहर बरामदे में गौरैया के लिए घोंसला टंगवाया है। आजकल उसमें गौरैया के बच्चे चीं-चीं करते हैं। जैसे ही बाहर का दरवाजा खोला, घोंसले के होल से झांकती गौरैया फ़ुर्र से उड़ गई! 

अचानक मुझे देख वह डरी होगी। वह पास में ही बाउंड्री वॉल पर जाकर बैठ ग‌ई। और वहाँ से वह जैसे मेरी निगरानी करने लगी थी। गौरैया अपने बच्चों के लेकर सावधान हुई थी। 

सावधान होने के लिए उसका यह डरना जरूरी था। वाकई में, डर एक आवश्यक और महत्वपूर्ण गुण है।

आदमी अब निडर है, वह आदिम तो नहीं रहा। लेकिन आज उसके कारनामों से आदिम मनुष्य भी लजा जाए! उसके सारे काम "प्लांडवे" में होते हैं। और उसके भीतर गुण भी "प्लांन्डवे" में ही उभरते हैं। वह स्वयं के कारनामों को "बिना दिल का" होने की सीमा तक जस्टीफाई करता है। 

वैसे आजकल दिल धोखाधड़ी पर उतर आया है‌। लेकिन कोई भरोसा नहीं कि यह कब किसके साथ “सर्जिकल स्ट्राइक” करके उसे अनप्लांन्ड छोड़ जाए। 

धोखाधड़ी भी उसी के साथ संभव है, जिसके भीतर दिल हो, जहां दिल ही न हो, वहां धोखे का प्रश्न भी नहीं उठता! बिना दिल का आदमी पैदा करने के लिए विज्ञान की भी कोई आवश्यकता नहीं.. यह काम तो आदमी स्वयं करने लगा है।

खैर, अखबार से पता चला कि कोई नफरत की बेल भी है, जिसे नेता उगाते हैं। सोचा, इस बेल पर शायद कोई सुंदर-सा फूल खिलता हो, इसीलिए नेता जी लोगों को यह बेल उगाना पसंद हो। 

लेकिन यह तो नेताजी लोगों की बातें हैं; उस बेल पर फूल खिलेंगे या कांटे उगेंगे, इसका पता तो समय की नब्ज़ ही बताएगी। 

फिलहाल मुझे तो उस नन्हीं-सी गौरैय्या का डरना अच्छा लगा। कम-से-कम कम अपने बच्चों को लेकर वह सावधान तो हो गई! मैं उस सावधान हुई गौरैया को ध्यान से देखने लगा।

अखबार में सम्पादकीय पेंज पर "न सरहद हो न सियासत" पढ़कर लगा कि कलाकारों के लिए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ बेमानी है। लेकिन सरहद और सियासत के लिए सभी बातें जायज़ हो जाती है कलाकारों को यह कौन समझाए!!!

#चलते_चलते
सावधान होने के लिए डरना बहुत जरूरी है। 
#सुबहचर्या 
22/6.10.2016

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

महात्मा का जन्मदिवस

            आज थोड़ी फुर्तबाजी में थे। इसलिए पाँच बजे नींद खुलते ही पाँच-दस पर स्टेडियम की ओर निकल लिए। उठने और निकलने में यह फुर्तबाजी इसलिए थी कि, आज गाँधी जी की जयन्ती है और सुबह आठ बजे कार्यालय जाकर उनके फोटू पर माल्यार्पण करना था। चूँकि, हम सरकारी नौकरी में हैं, इसलिए प्रत्येक वर्ष माल्यार्पण का अवसर मिल ही जाता है।
            एक बात है! वैसे तो, है यह आपके कान में सुनाने लायक...लेकिन, यहाँ लिखे दे रहे हैं, आप सुनिए मत, पढ़ लीजिए, वह कि, गाँधी के फोटू को माला पहनाते लाज आती है..! हाँ, उनका माल्यार्पण करते हमें शर्म आती है, इसीलिए मुझे गांधी के सामने हाथ जोड़ना ज्यादा मुफीद लगता है। क्योंकि, यह सोचकर हाथ जोड़ लेते हैं कि, "गाँधी बाबा, तुम ऐइसई दूर रहो, फोटू में ही रहो, वहाँ आप हमें बहुत ठीक लगते हो...इसी दूरी में तो आपसे प्रेम पनपता है। गाँधी!  तुम दिखाने की नहीं छिपाने की चीज हो।"
          आवासीय परिसर से निकलते हुए डीजे की जबर्दस्त आवाज कानों में गुंजायमान हो रही थी। वैसे, रातभर यह डीजे बजता रहा होगा..निश्चित रूप से आसपास वाले ठीक से सो नहीं पाए होंगे। शायद, नवदुर्गा के पांडाल में ही यह डीजे बज रहा होगा। एक दिन अखबार में पढ़े थे कि दुर्गा पंडालों में डीजे बजाने की अनुमति नहीं रहेगी। लेकिन, अब इस पर क्या कहें, यह धर्म का मामला है, किसी धर्म के मामले में टाँग अड़ाना उचित नहीं होता यही सोचकर यहाँ नियमों के पालन को उचित नहीं माना गया होगा।
            हम स्टेडियम पहुँचे। हमारे साथ ही रोज टहलने वाला ग्रुप भी पहुँच गया था। मैंने उन्हें आपस में बतियाते सुना, "आज रात में बिजली का खम्भा टूट गया, और रात में बिजली नहीं आई.." यह सुनते ही मुझे, उनकी पीड़ा की अनुभूति हुई। वाकई, एक तो सड़कें गली जैसी हैं और ऊपर से बिजली के खंभे ऐसे गड़े होते हैं कि डिवाइडर न होते हुए भी डिवाइडर का आभास देते हैं...फिर तो इन खम्भों को टूटना ही होता है! सुना, किसी ट्रैक्टर ने खम्भे को धकिया दिया था। इसीलिए तो, लोग साठ साल का रोना रोते हैं, हम ढंग से बिजली के तार भी अभी तक नहीं फैला पाए हैं।
          चक्कर लगाते, एक सज्जन के बगल से निकलते समय मोबाइल पर उनके बतियाने की आवाज सुनी, वह किसी से कह रहे थे, "यहीं स्टेडियम में टहल रहे हैं" उनके बात करने का अंदाज बता रहा था कि वह अपनी घरवाली से ही बात कर रहे होंगे। खैर..स्टेडियम का, स्वयं के द्वारा निर्धारित चक्कर पूरा कर हम लौट आए।
           आज सुबह-सुबह रामकिशोर आ गए, कभी-कभी रामकिशोर सुबह आकर मेरी चाय बना देते हैं, खासकर जब सुबह कहीं जल्दी निकलना होता है। रामकिशोर का कुत्ता बड़ा प्यारा है, वह भी अकसर सुबह उसी के साथ आता है और मेरे किचेन, कमरे सब जगह घूम लेता है, लेकिन आज वह गेट के बाहर ही रह गया था। मैंने जब गेट खुलवाया तो वह अपनी पूँछ हिलाते धड़ाके से अन्दर घुस गया। रामकिशोर को इधर-उधर ढूँढ़ते हुए अन्त में किचेन में खोज निकाला। मैं अपने कमरे में आराम फरमा रहा था, रामकिशोर को खोज वह महाशय निश्चिंत होकर वहीं मेरे कमरे में आकर आराम फरमाने लगे। जैसे, उसे सब बातें पता हो, और चाय बनने के बाद रामकिशोर के साथ भी निकल भी लिए। मैं, अब कुत्तों को ज्यादा समझदार मानने लगा हूँ।
          चूँकि, आज गाँधी जी पर माल्यार्पण वगैरह करना था, चाय-वाय पीकर नहाने की तैयारी करने लगा। बाथरूम में देखा, बहुत दिनों से शौचालय की सफाई नहीं हुई थी। ध्यान आया, आज गाँधी जयन्ती पर कुछ भासन-वासन भी देना पड़ सकता है, और इधर देश के प्रधानमंत्री भी अपने बहुआयामी स्वच्छता-कार्यक्रम के क्रियान्वयन में जुटे हैं, सो मैं ही क्यों पीछे रहूँ, तो भाषण देते समय मेरे भी करनी और कथनी में कोई अन्तर न रह जाए, आज ही शौचालय साफ करने की ठान ली। अब मेरे कथनी में भी दम रहे, और स्वच्छता अभियान पर एक जोरदार भाषण दे सकूँ; हार्पिक्स तथा ब्रश लेकर अपने इस स्वच्छता महाभियान में हम भी जुट गए। खैर..भाषण देने की नौबत तो आई लेकिन स्वच्छता अभियान दिमाग से निकल गया, आखिर, एक ही चीज को दुहराना भी तो अब हमें अच्छा नहीं लगता..!
             हाँ, गाँधी जी की फोटू को मैंने कई बार निहारा, गाँधी जी ग्राम-स्वराज की बात करते थे। वाकई, गाँधी जी का यह सपना आज ग्रामों में साकार हो रहा है। चारों ओर स्वराज ही स्वराज है!  मजाल है कि हम इस ग्राम-स्वराज में कोई दखलंदाजी कर सकें? बहुत सशक्त हो चुकी है ग्राम-स्वराज की यह अवधारणा! अब सबसे निचले पायदान पर बैठे व्यक्ति को कहीं ऊपर जाने की आवश्यकता नहीं.. ग्राम-स्वराज के रहनुमा द्वारा इनकी समस्याओं का वहीं गाँव में ही चुटकी बजाते निस्तारण कर दिया जाता है। अगर गाँव के ये निचले पायदान के दलिद्रनारायण, भूल से ऊपर अपनी बात पहुँचाने पहुँच भी गए तो ग्राम-स्वराज के ऐसे-ऐसे रहनुमा हैं कि तब ये, इन दलिद्रनारायणों को त्वरित-न्याय देने में, तनिक भी देर और संकोच न करते हुए ग्राम-स्वराज का उत्तम उदाहरण भी तत्काल प्रस्तुत कर देते हैं।
         वैसे, दलिद्रनारायण की सेवा में ही गांधीगीरी भी सफलीभूत होता है। नहीं तो आप ही विचारिए! बिना दलिद्रनारायण के कैसे होगी गाँधीगीरी..? जब तक दलिद्रनारायण रहेंगे तब तक गाँधीगीरी रहेगी.. मैं तो कहता हूँ, गाँधीगीरी और दलिद्रनारायण दोनों में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है! हाँ, दलिद्रनारायण गाँधीगीरी की बदौलत ही जिन्दा है तो गाँधीगीरी भी दलिद्रनारायण की सेवा के बदौलत ही चलती है।
             भाई लोग, मैं तो मानता हूँ, जन्मदिवस मनाना भी एक बिजनेस है, चाहे वह अपना जन्मदिवस हो या दूसरे का या फिर किसी महात्मा का ही क्यों न हो! आखिर, जीने को मजा लूटना ऐसे ही नहीं माना जाता..और कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिनके स्वर्गवासी होने पर हमारी दुकानदारी चलती रहे इसलिए हम उनका जन्मदिन मनाते हैं। हाँ, किसी का जन्मदिन से सेवा भावना की याद आती है ; जैसे यदि हम गाँधी जी को भूलते हैं तो सेवा-भावना भी भूलते हैं और इस भावना में ही तो मेवा है। ऐसे में मेवा मिलता रहे हम गाँधीगीरी करते रहे.. सब का काम चलता रहे। गाँधी, नोट और वोट सब जगह काम आते हैं।
               
               हाँ, एक बात है, दलिद्रों को भी "दलित" जैसे शब्द से सीख लेते हुए "दलिद्रनारायण" सम्बोधन पर अब आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। इस शब्द में भेदभाव जैसा भाव छिपा होता है..एकदम छुआछूत जैसा! क्या मजाक है! भला आज तक "दलिद्र" से कभी "नारायण" जुड़ पाए हैं? अब तक दलिद्रों को, अपने नारायणों का खेल समझ में आ जाना चाहिए था, जो नहीं आया। खैर, मैं यही सोचता रहा और सभा विसर्जित हो चुकी थी। अन्त में, साबिर ने दो गाँधी भजन गाया, जिसे गुनगुनाते हुए मैं उठ गया था -
            "वैष्णव जन तेणे कहिए, जे पीर पड़ाई जाणे रे" और
             "ईश्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान"

                                          --Vinay
                                          #दिनचर्या 21/2.9.16