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शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

भगवान से भी बढ़कर मनुष्य है-3

संकल्प और विकल्प

           मेरा मानना है कि वाल्मीकि के राम स्तुति और अराधना के विषय नहीं हैं, बल्कि इन्हें अपने अन्तर में अनुभव किया जा सकता है। हाँ इन राम में स्वयं को खोजा जा सकता है। दरअसल स्तुति और अराधना भक्ति का वह सोपान है, जिसपर खड़ा व्यक्ति विवेकशून्य हो जाता है, ऐसा अराधक विकल्पहीन होता है, जबकि विकल्पों के बीच ही व्यक्ति को कर्म करने के अवसर दिखाई पड़ते हैं।
           वैसे मनुष्यता, संकल्प और विकल्प के बीच ही विकसित होती है। हमारे अधिकांशतया महात्मन् संकल्प को श्रेष्ठ मानकर विकल्प को खारिज करते हैं और विकल्पों को संकल्प की सिद्धि में बाधक के रूप में देखते है। लेकिन वे यहीं पर भूल करते हैं, मानवीयता विकल्पों के बीच ही विकसित होती है। संकल्पवान् को सिद्धि तो प्राप्त होती है, लेकिन आवश्यक नहीं कि यह सिद्धि संसार के लिए कल्याणकारी ही हो! पुराण कथाओं में राक्षस भी अपने संकल्प के बल सिद्धि प्राप्ति हेतु संकल्पित होकर तप करते दिखाए गए हैं, लेकिन वे अपनी सिद्धियों का दुरुपयोग करते हुए ही देखे गए हैं। आखिर ऐसा क्यों?
       
        दरअसल स्वार्थपूर्ति हेतु अर्जित सिद्धियां कल्याणकारी नहीं होती। ये संसार के लिए अहितकारी तो होती ही हैं स्वयं धारक का भी विनाश कर डालती हैं। इस प्रकार बिना कर्तव्यपथ का अनुगमन किए यदि मात्र संकल्प से ही सिद्धि अर्जित की जाती है तो यह सिद्धि कल्याणकारी नहीं हो सकती। इसीलिए वाल्मीकि के राम संकल्प और विकल्पों के बीच जूझते हुए कर्तव्यपथ के अनुगामी हैं। ऐसे राम में 'राजत्व' नहीं है, तभी वे राक्षसों के साथ रावण का विनाश कर पाते हैं। वहीं विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा के लिए जब राजा दशरथ से राम को मांगते हैं तो पुत्रमोह से व्यथित हो दशरथ स्वयं अपनी सेना के साथ चलकर यज्ञ की रक्षा का प्रस्ताव देते हैं कि -

           इयमक्षौहिणी पूर्णा यस्याहं पतिरीश्वरः ।
           अनन्या संवृतो गत्वा योद्धाहं तैर्निशाचरैः।।
  
           मेरे पास जो भारी सेना है, उसे साथ लेकर मैं उन राक्षसों से लड़ुंगा और आगे विश्वामित्र से कहते हैं "अहं तत्र गमिस्यामि न रामं तेतुमर्हसि" अर्थात् मैं स्वयं वहाँ जाउंगा, आप श्री राम जी को न ले जाइए। इसके बाद वे यानि दशरथ द्वारा उन विघ्नकारी राक्षसों का परिचय पूँछे जाने पर विश्वामित्र "पुलस्त्यवंश प्रभवो रावणो नाम राक्षसः" कहते हुए रावण का परिचय देते हैं और बताते हैं कि उसकी प्रेरणा से बड़े बलवान दो राक्षस जिनके नाम मारीच और सुबाहु है, ऐसे यज्ञों में विघ्न डालते हैं -
       
         "तेन संचोदितौ द्वौ तु राक्षसौ सुमहावलौ 
         मारीचश्च सुबाहुश्च यज्ञविघ्नं करिष्यति।। 

         विश्वामित्र की बात सुनकर राजा दशरथ ऐसे दुरात्मा का सामना‌ करने से इनकार कर देते हैं - 
      
       "न हि शक्तोस्मि संग्रामें स्थातुं तस्य दुरात्मनः" 
और कहते हैं कि रावण युद्ध में बलवानों का बल क्षय कर देता है, अतएव मैं उसके या उसकी सेना के साथ युद्ध करके पार नहीं पा सकता-

          स हि वीर्यवतां वीर्यमादत्ते युद्धि राक्षसः।
          तेन चाहं न शक्रोमि शंयोद्धुं तस्य वा वलैः।।
          
        वाल्मीकि जी ने इस प्रसंग के माध्यम से जैसे यहाँ कहने का प्रयास किया है कि राजत्व से राक्षसत्व को नहीं जीता जा सकता! बल्कि संकल्प और विकल्प के बीच अपने कर्त्तव्यपथ की खोज करने वाले मानवीय भाव वाले राम ही ऐसे राक्षसत्व पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

          ताड़का एक स्त्री है, राम को उसका वध करने में हिचक हो सकती है इसीलिए विश्वामित्र राम को समझाते हैं कि ताड़का अधर्मी है और पहले भी पृथ्वी का नाश चाहने वाली विरोचन की लड़की मन्थरा को इंद्र ने मार डाला था। इसी प्रकार भगवान विष्णु ने भी इंद्र का नाश चाहने वाली भृगु की पतिव्रता पत्नी औत शुक्र की माता को मार डाला था -
          अधर्म्या जहि काकुत्स्थ धर्मो हास्या न विद्यते
           श्रुयते हि पुरा शक्रो विरोचन सुतं नृप।।
           पृथ्वी हन्तुमिच्छन्तीं मन्थरामभ्यमुढ्यत
           विष्णुना च पुरा राम भृगुपत्नी दृढ़व्रतो
           अनिंन्द्रं लोकमिच्छंन्ती काव्यमाता निपिद्रिता।।
     और इसी प्रकार अनेक पुरुषोत्तम राजकुमारों ने समय-समय पर अनेक अधर्माचरण वाली स्त्रियों का वध किया है। अतएव तुमको भी इस दुष्ट यक्षिणी को मारने में किसी प्रकार का विचार न करना चाहिए -

          एतैरन्यैश्च बहुभी राजपुत्र महात्मभि:
          अधर्मनिरता नार्यो हताः पुरुषसत्तमैः
            तस्मादेनां घृणा त्यक्त्वा
             जहि मच्छासनान्नृप।।

       विश्वामित्र के यह समझाने पर राम "गो ब्राह्मणहितार्थाय देशस्यास्य सुखाय च" अर्थात गो ब्राह्मण के हित और इस देश वासियों को सुखी करने हेतु ताड़का को मारने के लिए तैयार होते हैं, लेकिन ताड़का के सामने आने पर उसके कान और नाक काट कर केवल उसे भगाने का ही उद्यम करते हैं - 
       एनां पश्य दुराधर्पा मायावलसमन्वितम
        विनिवृत्तां करोम्यद्य हृतकर्णाग्रानासिकाम्।
क्योंकि वे सोचते हैं, स्त्री की जान लेना ठीक नहीं उसे केवल दुष्ट कर्म करने लायक नहीं रहने देना चाहते -
       न हृयेनामुत्सहे हन्तुं स्त्रीस्वभावेन रक्षिताम्।
       वीर्यं चास्या गतिं चापि हनिष्यामीति मे मतिः।।
       
         यही है वाल्मीकि के राम की मानवीयता! उनका उद्देश्य या संकल्प केवल यज्ञ की रक्षा करने का है, इसके लिए अनावश्यक किसी की वे जान नहीं लेना चाहते!! कर्तव्य पालन के पीछे ऐसी ही भावना होती है और यहाँ विकल्पों को भी महत्त्व मिलता है, यही तो मनुष्यत्त्व भी है। मनुष्यता किसी सिद्धि के लिए लालायित नहीं होती। 

       लेकिन ताड़का रुकती नहीं उसका रूप और भी विध्वंसक होता चला जाता है, इसे देखकर विश्वामित्र राम के इस दया भाव को लक्षित करते हुए उन्हें पुनः समझाते हैं कि इस पर अब दया दिखाने की जरूरत नहीं है -

          दृष्टा गाधिसुतः श्रीमानिदं वचनमव्रवीत्
          अलं ते घृणया राम पापैपा दुष्टचारिणी।।

          यहाँ तुलसी के राम की अपेक्षा वाल्मीकि के राम अधिक मानवीय हैं क्योंकि तुलसी के राम इतना सोच-विचार नहीं करते और ताड़का के दिखाई पड़ने पर मात्र एक ही वाण से वे उसका वध कर डालते हैं -

 चले जात मुन्हि दीन्हि दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई। 
  एकहि बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा।।

         तुलसी में मोक्ष की कामना है, उनके राम भगवान हैं और इसीलिए राम ताड़का को 'दीन' समझकर उसे देवस्थान भी प्रदान करते हैं। 

     लेकिन वाल्मीकि के राम द्वारा ताड़का के मारे जाने पर ताड़का के वन का शाप छूट गया और वह चैत्ररथ वन की तरह अत्यंत रमणीक हो गया -

          मुक्तशापं वनं तच्च तस्मिन्नेव तदाहनि।
          रमणीयं विवभ्राज तथा चैत्ररथं वनम्।।

         वाकई ! कर्त्तव्य पथ का अनुगामी मनुष्य धरती को रमणीय बनाता है। इस प्रकार तुलनात्मक रूप से हम कह सकते हैं कि जहाँ भगवान की कल्पना के केंन्द्र में मुमुक्षु भक्त होता है वहीं मानवीयता के केंन्द्र में विश्व और उसका प्रत्येक कण-कण होता है। इसीलिए ऊपर वाले को केंन्द्र में रखने वाले किसी धार्मिक की अपेक्षा मनुष्यता को केंन्द्र में रखकर कर्तव्य पथ के अनुगामी व्यक्ति इस धरती को अधिक कल्याणकारी और सुंदर बना सकता है। एक कवि की कल्पना में उसका महानायक भी ऐसा ही होता है और वाल्मीकि के राम ऐसे ही हैं। 

भगवान से भी बड़ा मनुष्य है -2

नारद जी महर्षि वाल्मीकि से मिलने आते हैं, तो महर्षि वाल्मीकि जिज्ञासु भाव से उनसे पूँछ बैठते हैं -       

         को न्वास्मिन्सांप्रतं लोके सत्य वाक्यो दृढ़व्रतः।
         धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्य वाक्यो दृढ़व्रतः ।।
         चरित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः।
          विद्वान्कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः।।
         आत्मवान्को जितक्रोधो द्युतिमान्कोनसूयकः।
         कस्य विभ्याति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ।।
       
        अर्थात इस संसार में गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी, दॄढ़व्रत, अनेक प्रकार के चरित्र करने वाले, प्राणिमात्र के हितैषी, विद्वान, समर्थ, अति दर्शनीय, धैर्यवान, क्रोध को जीतने वाले, तेजस्वी, ईर्ष्याशून्य और युद्ध में क्रुद्ध होने पर देवताओं को भयभीत करने वाले कौन हैं।
     
        इसके उत्तर में नारद मुनि ने महर्षि वाल्मीकि को श्री राम के जीवन चरित्र का संक्षिप्त वृत्तांत सुनाया। 

        नारद जी के देवलोक प्रस्थान करने के पश्चात वाल्मीकि जी अपने शिष्यों के साथ स्नान हेतु तमसा नदी के तट पर आए और वहीं पर मिथुनरत क्रौंच पक्षी के जोड़े के नर क्रौंच पक्षी को एक बहेलिया द्वारा मारा जाना देखते हैं तथा इस पापपूरित हिंसा कर्म और विलाप करती हुई क्रौंची पक्षी को देख शोकार्त्त महात्मा वाल्मीकि के मुख से सहसा निकल पड़ता है -
        
         मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समा।
         यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्।।
       
         हे बहेलिये! तूने जो इस कामोन्मत्त नर पक्षी को मारा है, इसलिए अनेक वर्षों तक तू इस वन में मत आना, अथवा तुझे सुख शान्ति न मिले।
         
         लेकिन वे यह सोचकर और भी दुखी हो उठे कि इस पक्षी के कष्ट से व्यथित उनके मुँह से यह क्या निकल गया ! अर्थात उन्होंने बहेलिए को शाप क्यों दे दिया -
       
        तस्यैवं व्रुवतश्चिंता वभूव हृदि वीक्षतः ।
       शोकार्त्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतंमया।।
       
        फिर उन्हें वहीं पर यह भी अनुभूत हुआ कि यह श्लोक उनके मुख से शोकार्त्त ही निकला है, इसमें चार पद हैं प्रत्येक पद में समान अक्षर हैं और वीणा पर भी यह गाया जा सकता है, अतः इसमें मेरा अपयश नहीं है-
      
     पादवध्दोक्षरशमस्तन्त्रीलयसमन्वितः।
     शोकार्त्त प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा।।
     
       इसके बाद ब्रह्मा जी उनसे मिलने आते हैं, लेकिन महर्षि वाल्मीकि का ध्यान बार-बार बहेलिये की ओर ही जा रहा था और वे यह सोचकर चिंतातुर और दुखी हो रहे थे कि पापी बहेलिये ने वैर बुद्धि से आनंद से खेलते हुए पक्षी का वध, व्यर्थ ही कर डाला-
       "पापात्मना कृतं कष्ट वैरग्रहण बुद्धिवा" 

        महर्षि वाल्मीकि को इस प्रकार दुखी देखकर ब्रह्मा जी ने उनसे नारद जी के मुख से सुन चुके श्री रामचन्द्र जी के छिपे हुए अथवा प्रकट सम्पूर्ण चरित्र का वर्णन करने के लिए कहा - 
      
       रामस्य चरित कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम।
       धर्मात्मनो गुचवतो लोके रामस्य धीमतः।।
       वृत्तं कथय वीरस्य यथा ते नारदाच्छुतम।
       रहस्यं च प्रकाशं च यद्वत्तं तस्य धीमतः।।

        आगे ब्रह्मा जी ने यह भी कहा कि तुम श्रीरामचन्द्र जी की मनोहर पवित्र कथा को श्लोकबद्ध बनाओ। जब तक इस धराधाम पर पहाड़ और नदियाँ रहेंगी, तब तक इस लोक में श्री रामचन्द्र जी की कथा का प्रचार रहेगा -

       कुरु रामकथा पुण्यां श्लोकवद्धां मनोरमाम्।
       यावत्स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले।।
       तावद्रामायणकथा लोकेषु प्रचरिप्यति।
       यावद्रामायणकथा त्वकृता प्रचरिप्यति।।

         और अंततः ब्रह्मा जी की बात से प्रेरणा पाकर महर्षि वाल्मीकि ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला समुद्र की तरह रत्नों से भरा पूरा और सुनने से मन को हरने वाला; श्री रामचन्द्र जी का चरित्र जैसा कि नारद जी से सुन चुके थे, वैसा ही बनाया -

         कामार्थगुण संयुक्तं धर्मार्थगुणविस्तरम्।
         समुद्रामिव रत्नाढ्यं सर्वश्रुति मनोहरम्।।|  
         स यथा कथितं पूर्व नारदेन महर्षिणा।
         रघुनाथस्थ चरितं चकार भगवानृपिः।।

भगवान से भी बढ़कर मनुष्य है-1

         भगवान से भी बढ़कर मनुष्य होता है। दरअसल 'मनुष्य होना' अस्तित्व बोध है तो वहीं 'ईश्वरत्व' इस अस्तित्व-बोध का खंडन है। जब हम "सियाराममय सब जग जानी" कहते हैं तो इसमें सब कुछ को, ईश्वर के रूप में स्वीकार कर चलने की बात है। लेकिन ठीक इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक भाव, 'ईश्वर' की इस 'सब कुछ' से एक खामोशी भरी दूरी को भी स्वीकारता है। इस 'खामोशी भरी दूरी' में चीजों के प्रति उपेक्षा का भाव निहित है, और जो प्रकारांतर से 'अमानवीयता' ही है। 'ईश्वर' की यह 'अमानवीयता' इस रूप में समझ सकते हैं कि यदि मनुष्यता का मुक्ति में विश्वास है तो 'ईश्वरत्व' चीजों को अपने से 'परे' नहीं जाने देती। देखा जाए तो ईश्वर पाश्चात्य दार्शनिक स्पिनोजा के ईश्वर की तरह सर्वग्रासी है। तभी तो, ऐसे सर्वग्रासी ईश्वर को सिंह की गुफा के सदृश्य माना गया, जिसमें जाते हुए पदचिह्न्न तो दिखाई पड़ते हैं लेकिन बाहर आते हुए पदचिह्न्न नहीं मिलते।

           वैसे 'भगवान' और 'मनुष्य' के बीच के यह झगड़ा सुलझाने के लिए अद्वैत, विशिष्टाद्वैत या द्वैतवाद भी पर्याप्त नहीं है। क्योंकि ईश्वर की अवधारणा में ही सारे विवाद की जड़ अन्तर्निहित है। इस समस्या का समाधान दार्शनिक दृष्टि में नहीं, अपितु मानवीय संवेदनाओं से उपजी साहित्यिक-दृष्टि, इसपर अधिक समग्रता के साथ और संवेदनशील होकर विचार करती हुई प्रतीत होती है।

            किसी कृति की साहित्यिक दृष्टि उसकी रचना प्रक्रिया से समझी जा सकती है। इसके लिए महाकवि वाल्मीकि के रामायण के राम और तुलसी के रामचरित मानस के राम का चरित्र तुलनीय है। रामायण की रचना प्रक्रिया के पीछे महाकवि वालमीकि के "मा निषाद प्रतिष्ठां.." में अभिव्यक्त 'शोकार्त्त' भाव वाली संवेदनशीलता है। स्वयं आदिकवि वाल्मीकि जी इस बात को स्वीकार करते हैं -

       "शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा"
   
        अर्थात यह श्लोक हमने अपने मुख से शोकार्त्त ही निकाला है।
          
        जिस अभिव्यक्ति के पीछे शोक से उपजी मनःस्थिति हो; वह दूसरों के हृदय में वैसी ही वेदना की कल्पना कर सकता है। ऐसे रचनाकार की रचनावृत्ति मनोवैज्ञानिक ढ़ग से अपने पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को उद्घाटित करते हुए चलती है। इसीलिए आदि कवि वाल्मीकि के राम "सम्पूर्ण मनुष्य" की ओर अग्रसर हैं। नामवर सिंह जी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के कथन का उल्लेख करके यही दिखाने का प्रयास किया है - "वाल्मीकि ने नेता की ही खोज की थी। ऐसे नर चंद्रमा की, जिसमें मनुष्य की 'समग्रा लक्ष्मी' का निवास हो। उन्हें उन नेताओं के किसी ऐसे स्थाई भाव की खोज नहीं थी, जो विभावानुभाव संचारी भाव के संयोग से रस रूप में परिणत हो सके। वे मनुष्य के संपूर्ण और आदर्श रूप के जिज्ञासु थे।" कहने का आशय यह भी है कि महाकवि रामायण में बिना किसी "वाग्जाल" के राम की प्रतिष्ठा और उनके चरित्र की खोज करते हैं और जिसमें नामवर जी के अनुसार, द्विवेदी जी के शब्दों में "उस युग के सम्पूर्ण मनुष्य को उद्भासित करने की क्षमता है।" 

          इस प्रकार यदि वाल्मीकि की संवेदनशीलता एक 'सम्पूर्ण मनुष्य' की खोज करती है तो वहीं तुलसी ने रामचरित मानस को भक्ति-भाव की भूमि पर रचा है और यहाँ राम का पाला 'भक्त' से पड़ा है। इसीलिए तुलसी मानते हैं कि सुकवि की कविता होने पर भी राम नाम के बिना वह श्रेष्ठ नहीं कहलाती। जैसे वस्त्र के बिना अन्य साज-सज्जा के होते हुए भी नारी शोभनीय नहीं होती -     

"भनिति विचित्र सुकवि कृत न जोऊ, राम नाम बिनु सोह न सोऊ।
बिधुवदनी सब भांति संवारी, सोन न बसन बिना बर नारी।।"
       
        भक्ति-मानस की पृष्ठभूमि में तुलसी की सारी संवेदनाएँ "भगवान" की प्रतिष्ठा में ही खर्च हो जाती है। महिमामंडन के इस प्रयास में "भगवान" का चरित्र ऐसा उभरता है कि 'राम' उसके नीचे दब जाते हैं।
      
        यहाँ इस चर्चा के परिपेक्ष्य में, रामायण और रामचरित मानस में आए अहिल्या वाले प्रसंग से राम के चरित्र की तुलना कर दोनों महाकवियों, वाल्मीकि और तुलसी के 'सर्जनात्मक दृष्टि का लक्ष्य' समझ सकते हैं।

(क्रमशः... )

गुरुवार, 26 अगस्त 2021

वे छह शिकायतें

         उस दिन महिलाओं द्वारा की गई शिकायतों की सुनवाई के समय मैं भी उपस्थित था। शिकायतों की सुनवाई बारी-बारी हुई।        
         पहली लड़की आई। उसे कुर्सी पर बैठने के लिए कहा गया। उस लड़की को मैं ध्यान से देख रहा था, जिसकी उम्र सत्ररह-अट्ठारह वर्ष के बीच थी। उसके खामोशी भरी उदास चेहरे से ऐसा लगा जैसे किसी सर्द और खामोश रात में बर्फ सी जमी झील पर कुहासे का धुंध छाया हो। उसे अपने पति से गुजारा भत्ता चाहिए, इस बात से मुझे किंचित आश्चर्य हुआ। 'पति इसे दो साल से छोड़ सुदूर मुंबई में रहता है! पंद्रह वर्ष से भी कम उम्र में इसका निकाह हुआ होगा और क्या पता इसका पति गुजारा भत्ता देने लायक है भी या नहीं? लड़की अनपढ़ भी है इसका भविष्य क्या होगा?' लड़की की त्रासदी पर मैंने सोचा। किसी ने उससे पूँछा, 'क्यों तुम पढ़ना चाहोगी'। लड़की ने प्रश्न करने वाले की ओर देखा और देखती रही। जैसे उससे कुछ अजूबा सवाल पूँछ लिया गया हो। उसके मुंह से बोल नहीं फूटे। शायद उसे पढ़ाई के मायने भी नहीं बताए गए थे। कम उम्र में शादी करने तथा पति के गुजारा भत्ता देने लायक होने के बारे में उसकी मां का कहना था, "वह छोटा-मोटा काम करता है...जल्दी निकाह इसलिए किया कि, न करती तो क्या करती और भी तो लड़कियां हैं..लड़के भी तो हैं...धीरे-धीरे सभी को निपटाना है।" गरीबी और अशिक्षा के साथ धर्म का घालमेल व्यक्ति के जीवन को नर्क बनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखता। अन्त में समस्या का समाधान न सूझने पर लड़की की मां से यही कहा गया, 'इस बच्ची को पढ़ाई के साथ कुछ सिलाई-कढ़ाई भी सिखाओ।' 
         दूसरी लड़की भी उम्र उन्नीस-बीस से ज्यादा नहीं थी। वह स्याह स्लेट पर खड़िया से लिखी किसी इबारत की तरह लगी, जिसे मिटाने का प्रयास किया गया हो। शिकायती पत्र देते समय उसकी खामोशी पिघल कर आँखों से बह निकली। रोते हुए उसने कहा, वे मुझे मार डालेंगे। दरअसल इस मुस्लिम लड़की का निकाह अल्पवय में कर दिया गया था। पति का चाचा उसे परेशान करता है। उसकी बातों से लगा कि वह यौन-उत्पीड़न की शिकार है। पति से शिकायत करने पर वह इस बात पर ध्यान नहीं देता। उसके मामले में पुलिस को हस्तक्षेप करने के लिए कहा गया।
         तीसरी लड़की चौबीस-पच्चीस वर्ष के आसपास थी। अनपढ़ थी और पति से अनबन होने के कारण मायके में रह रही थी। उसके पति को भी बुलाया गया। वह पढ़ा-लिखा और स्मार्ट दिखाई पड़ा। समझाने पर वह लड़की को साथ ले जाने के लिए सहमत हो गया । दरअसल यहां बेमेल विवाह की समस्या थी। इसी तरह चौथी लड़की का पति तलाक चाहता था। 
        पाँचवीं शिकायत एक महिला की थी, जिसकी उम्र अड़तीस-चालीस वर्ष के आसपास थी। उसका पति किसी बड़े शहर में माली का काम करता है और वह अपने परिवार की आय बढ़ाने के लिए घरों में खाना बनाने का काम करती है। उसकी समस्या यह थी कि उसकी बहू मायके से ससुराल पिछले एक साल से नहीं आ रही थी। लड़की के माता-पिता भी उसे ससुराल भेजने में रुचि नहीं दिखा रहे थे। जबकि वह महिला बहू को अपने घर लाने के लिए परेशान थी। उसके अनुसार बहू पढ़ी-लिखी और कम्प्यूटर चलाना जानती है और आत्मनिर्भर है जबकि लड़का आठवीं तक ही पढ़ा है। 
        छठी लड़की की आयु तेईस वर्ष के लगभग थी। वह बिना बाँह के कुर्ता पहने थी और पारदर्शी दुपट्टा ओढ़े थी। उसका पहनावा परिस्थितियों के अनुरूप न होने से अस्वाभाविक जान पड़ा। उसकी भृगुटी थोड़ी चढ़ी हुई और चेहरे पर तनाव झलक रहा था। जब मुझे पता चला कि लड़की का पति उसके साथ नहीं रहना चाहता और वैवाहिक संबंध तोड़ना चाह रहा है, तो मुझे लगा कि इस लड़की को सम‌झने की जरूरत है। स्वभावत: यह लड़की ईमानदार होगी और हो सकता है जो चीज इसे अच्छी न लगती हो उसका विरोध करती हो। लेकिन शायद उसका यह गुण उसकी वैवाहिक समस्या का कारण बन रहा हो। लड़की का पिता उसकी शादी टूटने के अंदेशे से दुःखी होकर रो रहा था। उसकी समस्या यह थी कि कैसे वह लड़की की दूसरी शादी करेगा।
         दरअसल इन छह शिकायतों में ऊपर की चार शिकायतें मुस्लिम लड़कियों की थी और पांचवीं तथा छठी हिंदू लड़कियों की। 'धर्म' महिलाओं की सुरक्षा और उसके अधिकार की चिंता नहीं करते तथा धार्मिक मान्यताएं महिलाओं का हितपोषण भी नहीं करती। अधिकांशतः 'धार्मिक मान्यताएं' पुरुषवादी सत्ता का पोषण करती हैं, जिसमें स्त्रियां दोयम दर्जे की नागरिक बनकर रह जाती है। यह सच है कि स्त्रियों के लिए जाति और धर्म का कोई अर्थ नहीं होता। विवाह-व्यवस्था कहीं संविदा तो कहीं धार्मिक-बंधन के रूप में स्वीकार किया गया है, लेकिन सही अर्थों में स्त्रियों की प्रताड़ना के पीछे मानव स्वभाव उत्तरदायी होता है और स्वभाव व्यक्ति की परिवेशगत परिस्थितियों से निर्मित होता है।   

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

सभ्यता की अदालत

           सुबह बड़े आराम से उठा, वैसे तो मोबाइल ने साढ़े पाँच बजे से ही मुझे उठाने का उपक्रम शुरू कर दिया था, लेकिन मैं था कि खुद के बनाए हुए उसूलों के प्रति ही विद्रोही रुख अख्तियार कर बिस्तर से नहीं उठ रहा था| यह उसूल कोई बड़ेवाला टाइप का नहीं, बस इतना ही था कि मोबाइल का एलार्म बजने पर मैं उठ जाया करुंगा| वैसे भी, मैं कोई राजा भी तो नहीं हूँ कि "प्राण जाय पर वचन न जाए" टाइप के बड़े और महान उसूलों को लेकर चलूँ| इस तरह के उसूलों का बनाना मैं "फ्युडलिज्म" का प्रतीक मानता हूँ! आखिर भला, एक अदना या साधारण इंसान क्या अपने बनाए बड़े उसूलों पर टिक सकता है? उसे तो पग-पग पर अपने उसूलों से समझौता करने की जरूरत होती है|  इसीलिए समझदार लोग कह गए हैं, "जैसी बहे बयार पीठ कीजै तब तैसी|"

      तो मैं तब बिस्तर छोड़ा, जब मोबाइल भी थक-हारकर मुझे उठाना बंद कर दिया और मैं छह बजे के बाद ही उठा| खैर शरीर की अकड़न दूर करने के लिए मैं अपने आवास के कमरों में चहलकदमी करने लगा| इस बीच मेरी दृष्टि कमरे में ही फुदकते एक मेढक पर पड़ी, जो मेरी इस सुबहचर्या को पढ़ते होंगे उन्हें याद होगा एक बार इसमें मैंने अपनी दयालुता और संवेदनशीलता की डींग हांकते हुए लिखा था कि कैसे एक मेढक को कमरे से बाहर कर देने के बाद उसे फिर कमरे में आने दिया था! लेकिन आज मैंने इस मेढक के प्रति वैसी दया नहीं दिखाई, बल्कि उसे अपनी मुट्ठी में दबोचकर बाउंड्रीवाल के उसपार फेक दिया जहाँ से वह लौट कर न आ पाए!! खैर|

         मैं थोड़ा कमरे में और थोड़े आवासीय कैंपस में काम भर का टहल लिया था| इसके बाद चाय-वाय लेकर अखबार के पन्ने पलटने लगा| अखबार में एक जगह पढ़ा कि सुप्रीम कोर्ट अपने किसी अवमानना के मामले में किसी से कह रही है कि माफी मांगने में बुराई क्या| 

         लेकिन, जब कोई जाना माना हो जाता है तो उसे अपने उसूल भी जाने-माने रखने चाहिए! तो ऐसे ही एक जाने-माने सज्जन शायद अपने जाने-माने उसूल के कारण ही माफी मांगने के लिए तैयार नहीं हैं!! खैर यह तो जानी-मानी कोर्ट और उन 'जाने-माने' के बीच की बात है, दोनों के बीच कोई न कोई सर्वमान्य हल निकल ही आएगा|

          'गैर जाने-माने' लोगों के साथ ऐसे ही मामले में क्या हो सकता है, यह सोचने की बात है!! इस बात पर मैं विचारों की चकरघिन्नी में फंस गया था कि मेरा ध्यान रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास 'गोरा' के उस अंश पर गया, जिसमें 'गोरा' गाँव के साधारण लोगों के पक्ष में, उनके लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ना चाहता है और इस चक्कर में उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है| तब गोरा का सहपाठी 'सातकौड़ी' जो एक वकील भी है, उसे जमानत पर छुड़ाने का प्रस्ताव देता है, लेकिन इस प्रस्ताव के प्रतिवाद में 'गोरा' कहता है - "नहीं, मैं वकील भी नहीं करूंगा और मुझे जमनत पर छुड़ाने की चेष्टा भी नहीं करनी होगी|" 

          इसके लिए 'गोरा का तर्क है- "संयोग से मेरे पास साधन है, दोस्त हैं, इसलिए मैं बच जाऊं, यह मैं नहीं चाहता…..न्याय करने की जिम्मेदारी राजा की है, प्रजा के साथ अन्याय न हो यह राजा का ही धर्म है, लेकिन इस राज में यदि वकील की फीस न जुटा सकने पर प्रजा को हवालात में सड़ने या जेल में मरना पड़े, सिर पर राजा के रहते भी पैसा देकर इंसाफ खरीदने की कोशिश में लुट जाना पड़े, तो ऐसे अन्याय के लिए एक धेला भी मैं खर्च करना नहीं चाहता|" 

     'गोरा' आगे फिर कहता है -

    "आजकल इंसाफ के लिए राजा के सामने जाने पर चाहे वादी हो, चाहे प्रतिवादी,चाहे दोषी हो, चाहे निर्दोष, प्रजा को रोना ही पड़ता है| जो गरीब है, इंसाफ की लड़ाई में उसके लिए हार-जीत दोनों ही में सर्वनाश है, फिर जहाँ राजा वादी है और हम जैसे लोग प्रतिवादी, वहाँ उनकी ओर से ही सब वकील बैरिस्टर हैं| अगर मैं जुटा सकूं तो ठीक है, नहीं तो मेरा भाग्य|" (आज के संदर्भ में 'राजा' का आशय 'ताकतवर व्यक्ति या समूह' से लिया जा सकता है)

        उत्तर में 'सातकौड़ी' का यह कथन आज की न्याय-व्यवस्था पर भी एक व्यंग्य की ही तरह है -

       "सिविलाइजेशन कोई सस्ती चीज तो नही है| इंसाफ में बारीकी के लिए कानून में भी बारीकी आवश्यक है-कानून में बारीकी होने पर बिना पेशेवर कानूनदां के काम नहीं चलता- पेशे की बात आते ही बिक्री-खरीद की बात आ जाती है, इसलिए सभ्यता की अदालत में इंसाफ अपने-आप दुकानदारी हो जाता है|"

       लेकिन गोरा राजा को न्याय के लिए जिम्मेदार मानता है इसीलिए वह कहता है, "अभागे वादी-प्रतिवादी दोनों पक्षों के लिए वकील नियुक्त करता|" 

      वाकई यह सोचने की बात है, अंग्रेजों के जमाने से लेकर आज तक हमारी न्याय व्यवस्था में आखिर क्या बदलाव आया? आज हम कानून जरूर बनाते हैं, लेकिन उन्हें लागू करने का वही पुराना तरीका और वैसी ही न्याय-प्रणाली!! न्यायालय के परिसर में जाने पर उसी अंग्रेजियत आबोहवा से मुलाकात होती है| 

      आखिर में दिमाग भन्ना सा गया, जैसे कुछ लंबी सोच लिए…

#चलते_चलते 

        दो के उसूलों की टकराहट में असमंजसावस्था उत्पन्न होती है! 

#सुबहचर्या

रविवार, 26 जुलाई 2020

तभी सौ साल जीने की सार्थकता है

 'जीवेम शरदः शतम्' अथर्ववेद का यह मंत्र ईश्वर से सुखायु एवं दीर्घायु कामना करने का मंत्र है। इस मंत्र में आठ सूक्त है -

प्रथम सूक्त - 'पश्येम शरदः शतम्' अर्थात सौ वर्षों तक हमारी नेत्र इंद्रिय स्वस्थ रहे।

द्वितीय सूक्त - 'जीवेम शरदः शतम्' अर्थात हम सौ वर्ष तक जीयें।

तृतीय सूक्त - 'बुध्येम शरदः शतम्' अर्थात् हम मानसिक तौर पर सौ वर्षों तक स्वस्थ रहे।

चतुर्थ सूक्त - 'रोहेम शरदः शतम्' अर्थात् हम सौ वर्षों तक उन्नति को प्राप्त करते रहे ।

पाँचवाँ सूक्त - 'पूषेम शरदः शतम्' अर्थात् हमें सौ वर्षों तक अच्छा भोजन मिलता रहे।

छठा सूक्त - 'भवेम शरदः शतम्' अर्थात् हम सौ वर्षों तक बने रहे।

सातवाँ सूक्त -'भूयेम शरदः शतम' अर्थात् हम सौ वर्षों तक पवित्र बनें रहे।

आठवाँ सूक्त - 'भूयसी शरदः शतम्' अर्थात् सौ वर्षों के बाद भी हम ऐसे ही बने रहें।

       इन आठों सूक्तों में मानव के सम्पूर्ण शरीरिक तथा मानसिक स्वस्थ्य सहित उसके दीर्घायु होने की कामना व्यक्त की गई है।

         लेकिन आज इक्कीसवीं सदी में मानव जीवन का नियमन करने वाले ढेर सारे कारक उत्पन्न हो चुके हैं, तो दूसरी ओर इस 'जीवन को गतिमान रखने वाले अनेक उद्देश्य हैं।' विज्ञान में आई प्रगति के बीच भोगवाद जीवन को तहस-नहस करता जा रहा है और मनुष्य अपनी मनोवृत्तियों की पहचान कर पाने में अक्षम हो रहा है। इस भोगवादी वृत्ति में जीवन का सारा गणित उलझकर रह गया है। परिवार, समाज, राष्ट्र, मानवता के प्रति अपनी भूमिका में संतुलन स्थापित करने में व्यक्ति चूक रहा है। जीवन में पवित्रता के मायने भी बदल गए हैं तथा दूसरों के पराभव की कामना में उसे संतोष मिलता है और इसमें ही वह अपनी बुद्धि की सफलता मानने लगा है।  

        मनुष्य के लिए सौ वर्ष जीना ही महत्वपूर्ण नहीं है, जीवन में संतुलन होना भी जरूरी है। 'ययाति' जैसे पौराणिक चरित्र के माध्यम से इस नाम के उपन्यास में उपन्यासकार ने जीवन में संतुलन की आवश्यकता बताई है। उपन्यासकार के अनुसार, "परिवार, समाज, राष्ट्र, मानवता और विश्व के केंन्द्र में स्थित परमशक्ति के साथ अपनी प्रतिबद्धता को जो जानता है और मानता है वही भोगवाद के युग में भी जीवन का संतुलन बनाए रख सकेगा।"

        यह जीवन संसार का सबसे बड़ा मीठा फल है। लेकिन ययाति के शब्दों में ‘‘इस संसार में मीठे फलों को ही कीड़ा लगने का खतरा अधिक रहता है।’’ और "जीवन भी इसी तरह का है। सुन्दर है मधुर भी है किन्तु पता नहीं कब और कहाँ से उसमें कीड़ा लग जाता है।’’ इसे जानते रहने के लिए ही दीर्घायु मंत्र में 'बुध्येम शरदः शतम्' अर्थात् सौ वर्षों तक मानसिक स्वास्थ्य की अभिलाषा की गई है। हमारा मानसिक स्वास्थ्य हमें जीवन को समझने की शक्ति देता है। 'ययाति' में आया यह कथन कि "हर आदमी ज़िन्दगी के अन्तिम मोड़ पर कुछ सयाना अवश्य हो जाया करता है, लेकिन यह समझदारी दूसरों की ठोकरों से नहीं, बल्कि उसके अपने ज़ख्मों से आया करती है" जीवनपर्यंत सीखने के महत्व को रेखांकित करता है। क्या है कि जीवन सीखने या चेतना के उन्नयन की प्रकृया है और इस प्रकृया का थम जाना ही मृत्यु है, क्योंकि इससे जीवन जैसे मीठे फल में लगे कीड़े को जानने की शक्ति समाप्त हो जाती है। 

        ययाति अपने अमात्य से जब यह शिक्षा ग्रहण करता है कि "यह दुनिया आदमी के मन की दया पर नहीं, बल्कि उसकी कलाई की ताकत पर चला करती है। आदमी केवल प्रेम पर जीवित नहीं रह सकता। वह दूसरों का पराभव करके ही जिया करता है। आदमी की इस दुनिया में चल रही सारी दौड़-धूप केवल भोग के लिए होती है। त्याग की बातें मंदिर, पुराण और कीर्तन में ही ठीक लगती हैं, लेकिन जीवन कोई मंदिर नहीं, वह एक समरभूमि है" तो वह यह भी स्वीकार करता है कि "क्रूरता और शूरता जुड़वा बहिनें हैं।" देखा जाए तो व्यक्ति के वैभव के पीछे यदि उसकी शूरता है तो यहीं पर उसकी क्रूरता भी सिद्ध होती है। ययाति के शब्दों में "जितना वैभव अधिक, उतना ही आत्मा का पतन भी अधिक होता है" वैभव शरीर की पूजा करवाती है। फिर तो, "शरीर के पुजारियों की आत्मा चेतना-विहीन हो जाती है।" ऐसी स्थिति में व्यक्ति उपभोग की ओर प्रवृत्त होकर भोक्ता बन बैठता है और वासनाओं का गुलाम हो जाता है। उसकी वासनाएँ उसकी मनोवृत्तियों को मनोविकार में बदल देती है और फिर व्यक्ति पाषाणवत् यंत्रचालित जैसा हो जाता है । 

         'ययाति' के शब्दों में, हम अपनी वासनाओं के वशीभूत "आठों पहर आत्मपूजा में ही लीन रहते हैं दिन-रात अपनी ही दृष्टि से दुनियां को देखा करते हैं, यही नहीं, बल्कि अपने से परे किसी दुनियां का अस्तित्व मानने से भी इनकार करते हैं उनकी समझ में यह बात शायद कभी आती ही नहीं है! यह तो एक ऐसी हकीकत है जैसा बहरा व्यक्ति संगीत का आनंद नहीं ले सकता और अंधा प्रकृति की सुन्दरता पर मोहित नहीं हो सकता। अत्मपूजन में लगे व्यक्ति भी मन से अंधे और अंतःकरण से बहरे हो जाते हैं" और "अनजाने मनुष्य किस तरह अपने ही चारों ओर चक्कर काटता रहता है। कई गांवों को अपनी चपेट में ले लेने वाली दूर की बाढ़ की अपेक्षा उसे अपनी आँखों के आँसुओं का महत्त्व अधिक प्रतीत होता है!" तात्पर्य यह कि ऐसा आत्मकेंन्द्रित व्यक्ति दूसरों की या समाज के कष्टों, समस्याओं को नहीं समझ पाता और जाने अनजाने में स्वयं का भी दुश्मन बन बैठता है। इस संबंध में 'ययाति' में शर्मिष्ठा भी यही सोचती है कि "मनुष्य का सच्चा बैरी भाग्य नहीं, स्वयं मनुष्य ही है।"  

        आत्मपूजन में लगे व्यक्ति की भावनाएँ निरपेक्ष नहीं रह जाती, इससे उसके जीवन की स्वाभाविकता नष्ट हो जाती है तथा आत्मा और शरीर के बीच का संतुलन नष्ट हो जाता है। यह आत्मप्रेम है जो देह के आकर्षण से उत्पन्न होता है। 'ययाति' भी इसके आकर्षण से विद्ध सोच रहा है,  "देह नहीं तो मधुर संगीत नहीं, देह नहीं तो सुंदर चंद्रोदय नहीं। देह नहीं तो स्वादिष्ट व्यंजन-पकवान नहीं, देह नहीं तो खुशबूदार फूल नहीं, देह नहीं तो प्यारभरा स्पर्श नहीं!" और,

       "सच तो यही है कि इस संसार में हर कोई केवल अपने लिए ही जिया करता है। मनुष्य सुख के लिए अपने निकट के लोगों का सहारा ठीक उसी तरह खोजते हैं जैसे वृक्षलताओं की जड़ें पास की आर्द्रता की ओर मुड़ जाती हैं। इसी झुकाव को दुनिया कभी प्रेम कहती है कभी प्रीति, तो कभी मैत्री। लेकिन वास्तव में वह होता है आत्मप्रेम ही। एक तरफ की आर्द्रता नष्ट होते ही पेड़-पौधे सूख नहीं जाते हैं उनकी जड़ें किसी और आर्द्रता की खोज में दूसरी ओर मुड़ जाती हैं–वह आर्द्रता नज़दीक हो या दूर–और उसे खोजकर वे फिर से लहलहाने लगते है।" दरअसल 'केवल अपने लिए ही जीना' व्यक्ति की उसकी अपनी वासनाओं के कारण है और इन वासनाओं की प्रवृत्ति क्या होती है, 'ययाति' इस संबंध में विचार करता है कि  "क्या हर वासना शेर जैसी होती है? उसे एक बार जिस उपभोग का चसका लग जाए, उसी के पीछे वह पागल की तरह भागती है! शायद वासना के केवल जीभ ही होती है! भगवान ने उसे कान, आँखें, मन, हृदय कुछ नहीं दिया है। उसे अन्य किसी बात की पहचान होती ही नहीं है। वह पहचानती है केवल अपने सन्तोष को!" आशय यही है वासनाएँ व्यक्ति को विवेकशून्य बना देती हैं और ऐसे व्यक्ति के लिए "प्रीति, वात्सल्य, ममता कुछ भी सच नहीं।" वह इनके प्रयोग से अपना एक नकली चेहरा ही गढ़ता है। इस चेहरे के साथ "मानव केवल अपने सुख के लिए जीता है। केवल अपने अहंकार की तृप्तता के लिए जीता है।"

    उपन्यास में शाप से ययाति का असमय ही बूढ़ा हो जाना वासनाओं के अनियंत्रित उपभोग के कारण है, वासनाएँ व्यक्ति की मनःस्थिति को विकृत कर देती हैं और उसकी आत्मपूजा की प्रवृत्ति उसे दूर से आती बाढ़ नहीं देखने देती, उसे केवल अपने ही आँसुओं में उलझाकर रख देती है।

      तो फिर! मनुष्य का जीवन कैसा हो ? क्या वह वैरागी बनकर जीवन जिये? आखिर यह तो सच ही है कि "आसक्ति ही आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु है' और चाहे यह विलासिता के रूप में हो या शक्ति के, ये दोनों जगत को सुखी बनाने में असमर्थ हैं। अकसर 'विरक्ति' के पीछे शक्ति प्राप्त करने की भावना होती है या फिर विरक्ति में भी अतृप्त वासनाएँ मन को बेचैन किए रहती हैं। 'ययाति' भी कुछ ऐसा ही सोचता है, "हरी दूब में सांप भी दबे-छिपे रहते हैं। विरक्ति की ओट में उसी प्रकार आसक्ति भी...’’ यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है, 'विरक्ति' के भाव में व्यक्ति अपने मन में स्वयं को ऊँचा उठा हुआ मान लेने का भ्रम पाल लेता है, और तब 'ययाति' के शब्दों में, "वे रहे महान ॠषि ! सामान्य लोगों के, सामान्य दुःखों को भला वे कैसे देख पाते?" दरअसल ययाति ने अपने बड़े भाई यति के बचपन में ही संन्यासी बन जाने से उपजे अपनी माँ के दुःखों को देखा है और शायद इसीलिए वह एक जगह कहता है, "जिस दिन से मालूम हुआ कि यति ने माँ को कितना दुख पहुँचाया है, आश्रम-जीवन के प्रति मेरे मन में अनजाने ही एक घृणा पैदा हो गई थी।" इन बातों से यह भी स्पष्ट है कि मनुष्य का जीवन केवल उसके अपने लिए ही नहीं होता, उसे परिवार, समाज, राष्ट्र और मानवता के लिए भी जीना पड़ता है।

         तो जीवन रूपी इस मीठे फल में कीड़ा न लगे, इसलिए मानव को पहले अपना मन जीतना चाहिए। लेकिन "मन को जीतना जग को जीतने जैसा आसान नहीं..!" इसके लिए 'ययाति' इस रूपक को याद करता है, ‘मानव जीवन में आत्मा रथी, शरीर रथ, बुद्धि सारथी और मन लगाम है। विविध इंद्रियाँ घोड़े हैं। उपभोग के सभी विषय उसके रास्ते हैं और इंद्रियाँ और मन से युक्त आत्मा उसका भोक्ता है।' और "इसलिए मनुष्य की आत्मा हमेशा जाग्रत रहनी चाहिए! नशे में धुत् सारथी के हाथों से लगाम छूट जाती है, घोड़े बेकाबू होकर मनमानी दिशा में भाग खड़े होते हैं, रथ गहरी खाई में गिरकर चकनाचूर हो जाता है और उसमें बैठा धनुर्धर व्यर्थ प्राणों से हाथ धो बैठता है।’’

          आत्मा की जाग्रत अवस्था पाप और पुण्य के खेल से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि आज "परलोक या परमात्मा के बारे में परंपरा से चली आई श्रद्धा, विज्ञान के चौंधिया देने वाले प्रकाश में विचरने वाले समाज का नियमन करने में असमर्थ हो रही है।" 'ययाति' भी कुछ इसी बात की ओर संकेत करता है, "पाप और पुण्य तो धूर्त पंडितों और मूर्ख मनुष्यों द्वारा गढ़ी गई कल्पनाएं हैं। इस दुनिया में केवल सुख या दुख ही सत्य है, बाकी सब माया है। पाप और पुण्य मन के मात्र आभास हैं कल्पना के खेल हैं।" दरअसल आत्मा की जाग्रत अवस्था चीजों को सही परिपेक्ष्य में देखने की दृष्टि प्रदान करती है और बिना इसके पाप और पूण्य की सारी अवधारणाएँ व्यर्थ है।

        आत्मा की जाग्रत अवस्था में मनुष्य के भाव निरपेक्ष होते चले जाते हैं, 'ययाति' में कच के शब्दों में, "प्रेम मनुष्य को अपने से परे देखने की शक्ति देता है। प्रेम किसी से भी हो गया हो, मनुष्य से अथवा वस्तु से; किन्तु वह प्रेम सच्चा होना चाहिए। अन्तःकरण की तह से उठता हुआ आना चाहिए! वह स्वार्थी, लोभी या धोखेबाज़ नहीं होना चाहिए। राजकन्ये, सच्चा प्रेम हमेशा निःस्वार्थी होता है, निरपेक्ष होता है। फिर वह फूल से किया गया हो या किसी जीव से। प्रकृति की सुन्दरता से हो या माता-पिता से। प्रीतम या प्रेयसी से किया हो अथवा वंश, जाति या राष्ट से! निःस्वार्थ, निरपेक्ष, निरहंकार प्रेम ही मनुष्य की आत्मा के विकास की पहली सीढ़ी होती है।'' मनुष्य प्रेम के इस मनोभाव के साथ अपनी आसक्तियों पर विजय प्राप्त कर सकता है क्योंकि इसी के साथ व्यक्ति का कर्तव्यबोध भी जाग्रत हो उठता है। तभी तो 'ययाति' में कच से कहलवाया गया है, 'प्रेम जीवन की एक उच्च भावना है। किन्तु कर्तव्य उससे भी श्रेष्ठ भावना है!' और कर्तव्य-भावना से रहित प्रेम को ढकोसला मानता है, "प्रेम चाहे माँ-बाप का हो या पति-पत्नी का, सब ढकोसला ही होता है। केवल नाटक होता है! अपने अन्तरतम में मानव केवल अपने से प्यार करता है, अपने शरीर से, अपने सुखों से और अपने अहंकार से प्यार करता है।" 

         यहाँ एक विशेष बात भी है कलाकार कौन होता है? कर्तव्यपथ पर चलने वाला व्यक्ति या अपनी भावनाओं, मानसिक आवेगों में डूबा रहने वाला व्यक्ति?  'ययाति' भी इस पर विचार करता है, "क्या मनुष्य के भीतर का कलाकार उससे सर्वथा भिन्न होता है?" 'ययाति' में यह जिज्ञासा इसलिए उठायी गई है कि व्यावहारिक जीवन में दूसरों को पराभूत करने की मानसिकता लिए व्यक्ति छल-छद्म का सहारा लेते हुए मानव मन की पवित्र भावनाओं का दुरुपयोग करता हुआ दिखाई पड़ता है, लेकिन उसी व्यक्ति के हाथ में जब तूलिका आ जाती है, तो उसका कलाकार मन संसार को निरपेक्ष ढंग से देखने लगता है! दरअसल यह कर्तव्यबोध की ही अवस्था है, अपने कर्तव्यों के प्रति सजग व्यक्ति ही कलाकार भी हो सकता है, क्योंकि कर्तव्य पथ पर चलने वाला इंसान कुछ अधिक ही संवेदनशील भी होता है। एक कलाकार का मन सबसे अधिक प्राकृतिक होता है, शायद इसी को लक्षित कर 'ययाति' सोचता है, "निसर्ग और मानव का नाता अनादि अनंत है। ये दोनाें मानो जुड़वाँ भाई हैं। इसीलिए निसर्ग के सान्निध्य में जीवन अपनी सारी सच्चाइयाँ लेकर हमारे सामने प्रकट हो जाता है।" और "मानव निसर्ग से दूर हो जाता है तो उसका जीवन एकांगी होने लगता है। उस कृत्रिम और एकांगी जीवन में उसकी कल्पनाएं, भावनाएं, वासनाएं सब अवास्तविक और विकृत बन जाती हैं।" निसर्ग मानव को सहज बनाती है और वह अपने दुखों के प्रति भी संवेदनशील हो जाता है, तभी तो ययाति के मन में यह प्रश्न उठता है, "क्या कलाकार के दुःख से ही उसकी कला अधिक सजीव, अधिक सुंदर और अधिक रसीली बन जाती है?"

       इसीलिए हमें प्रकृति से सीख लेनी चाहिए कि कैसे झंझावातों के बीच प्रकृति निरपेक्ष भाव से अपना काम करती रहती है! 'ययाति' को अन्तत: इसका ज्ञान होता है, "प्रेम करना सीखना चाहते हो न? तो नदी को गुरु करो। वृक्ष को गुरु करो। माता को गुरु कर लो।’’ और वह अपनी वासनाओं से मुक्त होता है तथा मन पर विजय प्राप्त करने की बात कहता है, "मानव समाज को सुखी बनाना हो तो मानव को अपने मन पर विजय प्राप्त करनी होगी।’’ अंत में 'ययाति' को समझ आती है-

         ‘सुख में, दुःख में, हमेशा एक बात गांठ बाँध लो। काम और धर्म महान पुरुषार्थ हैं। बहुत ही प्ररेक पुरुषार्थ हैं। जीवन के लिए अतीव पोषक पुरुषार्थ हैं। किन्तु ये पुरुषार्थ स्वच्छन्दता से भाग जाते हैं। ये पुरुषार्थ कब अंधे हो जाएंगे, कोई भरोसा नहीं! उनकी लगाम हमेशा धर्म के हाथ रहने दो... 

   न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति 

    हविषा कृष्णवर्त्मेंव भूय एवाभिवर्धते।’’

          तभी सौ साल जीने की सार्थकता है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

कोरोना से हम मुकाबला कर लेंगे

         आज दो क्वारंटाइन सेंटर पर जाना हुआ। एक सेंटर पर चार लोग क्वारंटाइन थे। एक निश्चित दूरी पर उनके बिस्तर लगे थे| वहाँ एक पंजिका भी रखी थी, जिसमें क्वारंटाइन होने की तिथि एवं अवधि पूरी होने पर मुक्त किए जाने की तिथि अंकित की जाती है| इसके साथ ही इनके चिकित्सकीय परिक्षण हेतु आने वाले डाक्टर/चिकित्सा कर्मी के हस्ताक्षर भी होते हैं| इसी प्रकार एक दूसरी पंजिका इन्हें दिए जा रहे नाश्ते एवं भोजन के अंकन हेतु रखा था| कोरोना के भय से उस पंजिका को मेरी छूने की हिम्मत नहीं हुई| वहाँ उपस्थित एक चिकित्सा कर्मी ने उस पंजिका के पन्ने पलटते हुए उसका निरीक्षण कराया, जो स्वयं क्वारंटाइन में रहते हुए अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहा है| इसीतरह एक दूसरे सेंटर पर पंद्रह व्यक्ति क्वारंटाइन किए गए थे, मिले| इन सेंटर्स पर कुर्सी पर बैठने पर भी मुझे डर लग रहा था|
        
          खैर इन दोनों स्थानों पर संबंधित प्रधान, ग्राम सचिव, चिकित्सा कर्मी प्राणपण के साथ इन सेंटरों की व्यवस्था करते हुए दिखाई पड़े| इसी तरह जनपद में अन्य स्थानों पर भी क्वारंटाइन सेंटर बनाए गए हैं, जिनमें लॉकडाउन तोड़कर सुदूर शहरों से आने वाले श्रमिकों/ व्यक्तियों को क्वारंटाइन किया गया है और उन सबके लिए ऐसी व्यवस्थाएं की गई हैं| 
   
          एक बात है,भारत को गरीब मानकर कुछ लोग इस देश में स्वास्थ्य सेवाओं को विकसित देशों की अपेक्षा कमतर मानते हैं, जो कोरोना जैसी महामारी की दृष्टि से नाकाफ़ी है, मतलब हमारे देश की स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता इस महामारी का सामना करने लायक नहीं है| यह बात सत्य भी हो सकती है, लेकिन वहीं पर यह भी देख सकते हैं कि अति आधुनिक चिकित्सकीय सुविधाओं वाले राष्ट्र भी इस महामारी के सामने त्राहिमाम कर रहे हैं| लेकिन यह तथ्य वैसा नहीं है, जैसा हम समझ रहे हैं| भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं और अमेरिकी-यूरोपीय स्वास्थ्य सेवाओं में उद्देश्यपरक और चारित्रिक अंतर है| अमेरिका के स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में ज्यांद्रेज एवं अमर्त्यसेन का मानना है कि-
    
           "अमेरिका में उच्च स्तरीय मेडिकल सेवा होने की शानदार गुणवत्ता के बावजूद इस देश में स्वास्थ्य सेवा का पर्याप्त विस्तार नहीं हुआ है; और उससे कई लोग अछूते रह गए हैं। औद्योगिक देशों में अमेरिका की स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था सबसे महँगी और अप्रभावी है, वहाँ स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च का आँकड़ा यूरोप के मुकाबले दोगुना ज्यादा है लेकिन इस व्यवस्था के नतीजे खराब हैं, और अमेरिका जीवन प्रत्याशा के मामले में विश्व में 50 वें रैंकिंग पर है|" इसका आशय यही है कि अमेरिका की यह व्यवस्था विषमतापूर्ण है| शायद यही वजह है कि अमेरिका इस महामारी का सामना करने में स्वयं को असहाय पा रहा है और उसकी स्वास्थ्य सेवाएं नाकाफी साबित हो रही है|
     
           वहीं पर भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की प्रकृति सामाजिक है और इसका स्वरूप लोकतांत्रिक होने के कारण यहाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का फैलाव भी है, जिसमें जनभागीदारी के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंन्द्रों का जाल भी है| इसी वजह से बहुत हद तक हम बीमारियों को रोकने में कामयाब भी  होते हैं| भारतीय स्वास्थ्य सेवा की यह प्रकृति ही उसे कोरोना जैसी महामारी का सामना करने में सक्षम भी बनाती है| क्वारंटाइन केंन्द्रों पर भ्रमण के समय हमें यह अहसास हुआ कि कोरोना जैसी महामारी का हम सफलतापूर्वक मुकाबला कर लेंगे|
         
            फिर भी, इस महामारी से सबक लेकर विशेषज्ञों की यह राय मानना जरूरी है कि "भारत में संस्थागत परिवर्तन करके बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने की जरूरत है बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी में से ज्यादा अनुपात में सार्वजनिक खर्च किया जाए|" अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं को हम 'जन-विमर्श' का विषय बनाएँ|
     
           खैर, इसी के साथ हमें विकास के मायने भी बदलने होंगे| सिमेंटेड दुनियां या फिर इस दुनिया को नाप लेना ही 'विकास' नहीं हो सकता| हाँ, खेत की मेड़ पर निर्द्वन्द्व बैठकर आपस में मुस्कराते-बतियाते भैंस चराते और हरियाले झुरमुटों तथा पेड़ों के बीच इनके साफ-सुथरे घर भी विकास के मायने हो सकते हैं, बस इनके लिए हमें स्वास्थ्य और शिक्षा का बेहतर प्रबंध करना होगा|