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गुरुवार, 26 अगस्त 2021

वे छह शिकायतें

         उस दिन महिलाओं द्वारा की गई शिकायतों की सुनवाई के समय मैं भी उपस्थित था। शिकायतों की सुनवाई बारी-बारी हुई।        
         पहली लड़की आई। उसे कुर्सी पर बैठने के लिए कहा गया। उस लड़की को मैं ध्यान से देख रहा था, जिसकी उम्र सत्ररह-अट्ठारह वर्ष के बीच थी। उसके खामोशी भरी उदास चेहरे से ऐसा लगा जैसे किसी सर्द और खामोश रात में बर्फ सी जमी झील पर कुहासे का धुंध छाया हो। उसे अपने पति से गुजारा भत्ता चाहिए, इस बात से मुझे किंचित आश्चर्य हुआ। 'पति इसे दो साल से छोड़ सुदूर मुंबई में रहता है! पंद्रह वर्ष से भी कम उम्र में इसका निकाह हुआ होगा और क्या पता इसका पति गुजारा भत्ता देने लायक है भी या नहीं? लड़की अनपढ़ भी है इसका भविष्य क्या होगा?' लड़की की त्रासदी पर मैंने सोचा। किसी ने उससे पूँछा, 'क्यों तुम पढ़ना चाहोगी'। लड़की ने प्रश्न करने वाले की ओर देखा और देखती रही। जैसे उससे कुछ अजूबा सवाल पूँछ लिया गया हो। उसके मुंह से बोल नहीं फूटे। शायद उसे पढ़ाई के मायने भी नहीं बताए गए थे। कम उम्र में शादी करने तथा पति के गुजारा भत्ता देने लायक होने के बारे में उसकी मां का कहना था, "वह छोटा-मोटा काम करता है...जल्दी निकाह इसलिए किया कि, न करती तो क्या करती और भी तो लड़कियां हैं..लड़के भी तो हैं...धीरे-धीरे सभी को निपटाना है।" गरीबी और अशिक्षा के साथ धर्म का घालमेल व्यक्ति के जीवन को नर्क बनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखता। अन्त में समस्या का समाधान न सूझने पर लड़की की मां से यही कहा गया, 'इस बच्ची को पढ़ाई के साथ कुछ सिलाई-कढ़ाई भी सिखाओ।' 
         दूसरी लड़की भी उम्र उन्नीस-बीस से ज्यादा नहीं थी। वह स्याह स्लेट पर खड़िया से लिखी किसी इबारत की तरह लगी, जिसे मिटाने का प्रयास किया गया हो। शिकायती पत्र देते समय उसकी खामोशी पिघल कर आँखों से बह निकली। रोते हुए उसने कहा, वे मुझे मार डालेंगे। दरअसल इस मुस्लिम लड़की का निकाह अल्पवय में कर दिया गया था। पति का चाचा उसे परेशान करता है। उसकी बातों से लगा कि वह यौन-उत्पीड़न की शिकार है। पति से शिकायत करने पर वह इस बात पर ध्यान नहीं देता। उसके मामले में पुलिस को हस्तक्षेप करने के लिए कहा गया।
         तीसरी लड़की चौबीस-पच्चीस वर्ष के आसपास थी। अनपढ़ थी और पति से अनबन होने के कारण मायके में रह रही थी। उसके पति को भी बुलाया गया। वह पढ़ा-लिखा और स्मार्ट दिखाई पड़ा। समझाने पर वह लड़की को साथ ले जाने के लिए सहमत हो गया । दरअसल यहां बेमेल विवाह की समस्या थी। इसी तरह चौथी लड़की का पति तलाक चाहता था। 
        पाँचवीं शिकायत एक महिला की थी, जिसकी उम्र अड़तीस-चालीस वर्ष के आसपास थी। उसका पति किसी बड़े शहर में माली का काम करता है और वह अपने परिवार की आय बढ़ाने के लिए घरों में खाना बनाने का काम करती है। उसकी समस्या यह थी कि उसकी बहू मायके से ससुराल पिछले एक साल से नहीं आ रही थी। लड़की के माता-पिता भी उसे ससुराल भेजने में रुचि नहीं दिखा रहे थे। जबकि वह महिला बहू को अपने घर लाने के लिए परेशान थी। उसके अनुसार बहू पढ़ी-लिखी और कम्प्यूटर चलाना जानती है और आत्मनिर्भर है जबकि लड़का आठवीं तक ही पढ़ा है। 
        छठी लड़की की आयु तेईस वर्ष के लगभग थी। वह बिना बाँह के कुर्ता पहने थी और पारदर्शी दुपट्टा ओढ़े थी। उसका पहनावा परिस्थितियों के अनुरूप न होने से अस्वाभाविक जान पड़ा। उसकी भृगुटी थोड़ी चढ़ी हुई और चेहरे पर तनाव झलक रहा था। जब मुझे पता चला कि लड़की का पति उसके साथ नहीं रहना चाहता और वैवाहिक संबंध तोड़ना चाह रहा है, तो मुझे लगा कि इस लड़की को सम‌झने की जरूरत है। स्वभावत: यह लड़की ईमानदार होगी और हो सकता है जो चीज इसे अच्छी न लगती हो उसका विरोध करती हो। लेकिन शायद उसका यह गुण उसकी वैवाहिक समस्या का कारण बन रहा हो। लड़की का पिता उसकी शादी टूटने के अंदेशे से दुःखी होकर रो रहा था। उसकी समस्या यह थी कि कैसे वह लड़की की दूसरी शादी करेगा।
         दरअसल इन छह शिकायतों में ऊपर की चार शिकायतें मुस्लिम लड़कियों की थी और पांचवीं तथा छठी हिंदू लड़कियों की। 'धर्म' महिलाओं की सुरक्षा और उसके अधिकार की चिंता नहीं करते तथा धार्मिक मान्यताएं महिलाओं का हितपोषण भी नहीं करती। अधिकांशतः 'धार्मिक मान्यताएं' पुरुषवादी सत्ता का पोषण करती हैं, जिसमें स्त्रियां दोयम दर्जे की नागरिक बनकर रह जाती है। यह सच है कि स्त्रियों के लिए जाति और धर्म का कोई अर्थ नहीं होता। विवाह-व्यवस्था कहीं संविदा तो कहीं धार्मिक-बंधन के रूप में स्वीकार किया गया है, लेकिन सही अर्थों में स्त्रियों की प्रताड़ना के पीछे मानव स्वभाव उत्तरदायी होता है और स्वभाव व्यक्ति की परिवेशगत परिस्थितियों से निर्मित होता है।   

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

सभ्यता की अदालत

           सुबह बड़े आराम से उठा, वैसे तो मोबाइल ने साढ़े पाँच बजे से ही मुझे उठाने का उपक्रम शुरू कर दिया था, लेकिन मैं था कि खुद के बनाए हुए उसूलों के प्रति ही विद्रोही रुख अख्तियार कर बिस्तर से नहीं उठ रहा था| यह उसूल कोई बड़ेवाला टाइप का नहीं, बस इतना ही था कि मोबाइल का एलार्म बजने पर मैं उठ जाया करुंगा| वैसे भी, मैं कोई राजा भी तो नहीं हूँ कि "प्राण जाय पर वचन न जाए" टाइप के बड़े और महान उसूलों को लेकर चलूँ| इस तरह के उसूलों का बनाना मैं "फ्युडलिज्म" का प्रतीक मानता हूँ! आखिर भला, एक अदना या साधारण इंसान क्या अपने बनाए बड़े उसूलों पर टिक सकता है? उसे तो पग-पग पर अपने उसूलों से समझौता करने की जरूरत होती है|  इसीलिए समझदार लोग कह गए हैं, "जैसी बहे बयार पीठ कीजै तब तैसी|"

      तो मैं तब बिस्तर छोड़ा, जब मोबाइल भी थक-हारकर मुझे उठाना बंद कर दिया और मैं छह बजे के बाद ही उठा| खैर शरीर की अकड़न दूर करने के लिए मैं अपने आवास के कमरों में चहलकदमी करने लगा| इस बीच मेरी दृष्टि कमरे में ही फुदकते एक मेढक पर पड़ी, जो मेरी इस सुबहचर्या को पढ़ते होंगे उन्हें याद होगा एक बार इसमें मैंने अपनी दयालुता और संवेदनशीलता की डींग हांकते हुए लिखा था कि कैसे एक मेढक को कमरे से बाहर कर देने के बाद उसे फिर कमरे में आने दिया था! लेकिन आज मैंने इस मेढक के प्रति वैसी दया नहीं दिखाई, बल्कि उसे अपनी मुट्ठी में दबोचकर बाउंड्रीवाल के उसपार फेक दिया जहाँ से वह लौट कर न आ पाए!! खैर|

         मैं थोड़ा कमरे में और थोड़े आवासीय कैंपस में काम भर का टहल लिया था| इसके बाद चाय-वाय लेकर अखबार के पन्ने पलटने लगा| अखबार में एक जगह पढ़ा कि सुप्रीम कोर्ट अपने किसी अवमानना के मामले में किसी से कह रही है कि माफी मांगने में बुराई क्या| 

         लेकिन, जब कोई जाना माना हो जाता है तो उसे अपने उसूल भी जाने-माने रखने चाहिए! तो ऐसे ही एक जाने-माने सज्जन शायद अपने जाने-माने उसूल के कारण ही माफी मांगने के लिए तैयार नहीं हैं!! खैर यह तो जानी-मानी कोर्ट और उन 'जाने-माने' के बीच की बात है, दोनों के बीच कोई न कोई सर्वमान्य हल निकल ही आएगा|

          'गैर जाने-माने' लोगों के साथ ऐसे ही मामले में क्या हो सकता है, यह सोचने की बात है!! इस बात पर मैं विचारों की चकरघिन्नी में फंस गया था कि मेरा ध्यान रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास 'गोरा' के उस अंश पर गया, जिसमें 'गोरा' गाँव के साधारण लोगों के पक्ष में, उनके लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ना चाहता है और इस चक्कर में उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है| तब गोरा का सहपाठी 'सातकौड़ी' जो एक वकील भी है, उसे जमानत पर छुड़ाने का प्रस्ताव देता है, लेकिन इस प्रस्ताव के प्रतिवाद में 'गोरा' कहता है - "नहीं, मैं वकील भी नहीं करूंगा और मुझे जमनत पर छुड़ाने की चेष्टा भी नहीं करनी होगी|" 

          इसके लिए 'गोरा का तर्क है- "संयोग से मेरे पास साधन है, दोस्त हैं, इसलिए मैं बच जाऊं, यह मैं नहीं चाहता…..न्याय करने की जिम्मेदारी राजा की है, प्रजा के साथ अन्याय न हो यह राजा का ही धर्म है, लेकिन इस राज में यदि वकील की फीस न जुटा सकने पर प्रजा को हवालात में सड़ने या जेल में मरना पड़े, सिर पर राजा के रहते भी पैसा देकर इंसाफ खरीदने की कोशिश में लुट जाना पड़े, तो ऐसे अन्याय के लिए एक धेला भी मैं खर्च करना नहीं चाहता|" 

     'गोरा' आगे फिर कहता है -

    "आजकल इंसाफ के लिए राजा के सामने जाने पर चाहे वादी हो, चाहे प्रतिवादी,चाहे दोषी हो, चाहे निर्दोष, प्रजा को रोना ही पड़ता है| जो गरीब है, इंसाफ की लड़ाई में उसके लिए हार-जीत दोनों ही में सर्वनाश है, फिर जहाँ राजा वादी है और हम जैसे लोग प्रतिवादी, वहाँ उनकी ओर से ही सब वकील बैरिस्टर हैं| अगर मैं जुटा सकूं तो ठीक है, नहीं तो मेरा भाग्य|" (आज के संदर्भ में 'राजा' का आशय 'ताकतवर व्यक्ति या समूह' से लिया जा सकता है)

        उत्तर में 'सातकौड़ी' का यह कथन आज की न्याय-व्यवस्था पर भी एक व्यंग्य की ही तरह है -

       "सिविलाइजेशन कोई सस्ती चीज तो नही है| इंसाफ में बारीकी के लिए कानून में भी बारीकी आवश्यक है-कानून में बारीकी होने पर बिना पेशेवर कानूनदां के काम नहीं चलता- पेशे की बात आते ही बिक्री-खरीद की बात आ जाती है, इसलिए सभ्यता की अदालत में इंसाफ अपने-आप दुकानदारी हो जाता है|"

       लेकिन गोरा राजा को न्याय के लिए जिम्मेदार मानता है इसीलिए वह कहता है, "अभागे वादी-प्रतिवादी दोनों पक्षों के लिए वकील नियुक्त करता|" 

      वाकई यह सोचने की बात है, अंग्रेजों के जमाने से लेकर आज तक हमारी न्याय व्यवस्था में आखिर क्या बदलाव आया? आज हम कानून जरूर बनाते हैं, लेकिन उन्हें लागू करने का वही पुराना तरीका और वैसी ही न्याय-प्रणाली!! न्यायालय के परिसर में जाने पर उसी अंग्रेजियत आबोहवा से मुलाकात होती है| 

      आखिर में दिमाग भन्ना सा गया, जैसे कुछ लंबी सोच लिए…

#चलते_चलते 

        दो के उसूलों की टकराहट में असमंजसावस्था उत्पन्न होती है! 

#सुबहचर्या

रविवार, 26 जुलाई 2020

तभी सौ साल जीने की सार्थकता है

 'जीवेम शरदः शतम्' अथर्ववेद का यह मंत्र ईश्वर से सुखायु एवं दीर्घायु कामना करने का मंत्र है। इस मंत्र में आठ सूक्त है -

प्रथम सूक्त - 'पश्येम शरदः शतम्' अर्थात सौ वर्षों तक हमारी नेत्र इंद्रिय स्वस्थ रहे।

द्वितीय सूक्त - 'जीवेम शरदः शतम्' अर्थात हम सौ वर्ष तक जीयें।

तृतीय सूक्त - 'बुध्येम शरदः शतम्' अर्थात् हम मानसिक तौर पर सौ वर्षों तक स्वस्थ रहे।

चतुर्थ सूक्त - 'रोहेम शरदः शतम्' अर्थात् हम सौ वर्षों तक उन्नति को प्राप्त करते रहे ।

पाँचवाँ सूक्त - 'पूषेम शरदः शतम्' अर्थात् हमें सौ वर्षों तक अच्छा भोजन मिलता रहे।

छठा सूक्त - 'भवेम शरदः शतम्' अर्थात् हम सौ वर्षों तक बने रहे।

सातवाँ सूक्त -'भूयेम शरदः शतम' अर्थात् हम सौ वर्षों तक पवित्र बनें रहे।

आठवाँ सूक्त - 'भूयसी शरदः शतम्' अर्थात् सौ वर्षों के बाद भी हम ऐसे ही बने रहें।

       इन आठों सूक्तों में मानव के सम्पूर्ण शरीरिक तथा मानसिक स्वस्थ्य सहित उसके दीर्घायु होने की कामना व्यक्त की गई है।

         लेकिन आज इक्कीसवीं सदी में मानव जीवन का नियमन करने वाले ढेर सारे कारक उत्पन्न हो चुके हैं, तो दूसरी ओर इस 'जीवन को गतिमान रखने वाले अनेक उद्देश्य हैं।' विज्ञान में आई प्रगति के बीच भोगवाद जीवन को तहस-नहस करता जा रहा है और मनुष्य अपनी मनोवृत्तियों की पहचान कर पाने में अक्षम हो रहा है। इस भोगवादी वृत्ति में जीवन का सारा गणित उलझकर रह गया है। परिवार, समाज, राष्ट्र, मानवता के प्रति अपनी भूमिका में संतुलन स्थापित करने में व्यक्ति चूक रहा है। जीवन में पवित्रता के मायने भी बदल गए हैं तथा दूसरों के पराभव की कामना में उसे संतोष मिलता है और इसमें ही वह अपनी बुद्धि की सफलता मानने लगा है।  

        मनुष्य के लिए सौ वर्ष जीना ही महत्वपूर्ण नहीं है, जीवन में संतुलन होना भी जरूरी है। 'ययाति' जैसे पौराणिक चरित्र के माध्यम से इस नाम के उपन्यास में उपन्यासकार ने जीवन में संतुलन की आवश्यकता बताई है। उपन्यासकार के अनुसार, "परिवार, समाज, राष्ट्र, मानवता और विश्व के केंन्द्र में स्थित परमशक्ति के साथ अपनी प्रतिबद्धता को जो जानता है और मानता है वही भोगवाद के युग में भी जीवन का संतुलन बनाए रख सकेगा।"

        यह जीवन संसार का सबसे बड़ा मीठा फल है। लेकिन ययाति के शब्दों में ‘‘इस संसार में मीठे फलों को ही कीड़ा लगने का खतरा अधिक रहता है।’’ और "जीवन भी इसी तरह का है। सुन्दर है मधुर भी है किन्तु पता नहीं कब और कहाँ से उसमें कीड़ा लग जाता है।’’ इसे जानते रहने के लिए ही दीर्घायु मंत्र में 'बुध्येम शरदः शतम्' अर्थात् सौ वर्षों तक मानसिक स्वास्थ्य की अभिलाषा की गई है। हमारा मानसिक स्वास्थ्य हमें जीवन को समझने की शक्ति देता है। 'ययाति' में आया यह कथन कि "हर आदमी ज़िन्दगी के अन्तिम मोड़ पर कुछ सयाना अवश्य हो जाया करता है, लेकिन यह समझदारी दूसरों की ठोकरों से नहीं, बल्कि उसके अपने ज़ख्मों से आया करती है" जीवनपर्यंत सीखने के महत्व को रेखांकित करता है। क्या है कि जीवन सीखने या चेतना के उन्नयन की प्रकृया है और इस प्रकृया का थम जाना ही मृत्यु है, क्योंकि इससे जीवन जैसे मीठे फल में लगे कीड़े को जानने की शक्ति समाप्त हो जाती है। 

        ययाति अपने अमात्य से जब यह शिक्षा ग्रहण करता है कि "यह दुनिया आदमी के मन की दया पर नहीं, बल्कि उसकी कलाई की ताकत पर चला करती है। आदमी केवल प्रेम पर जीवित नहीं रह सकता। वह दूसरों का पराभव करके ही जिया करता है। आदमी की इस दुनिया में चल रही सारी दौड़-धूप केवल भोग के लिए होती है। त्याग की बातें मंदिर, पुराण और कीर्तन में ही ठीक लगती हैं, लेकिन जीवन कोई मंदिर नहीं, वह एक समरभूमि है" तो वह यह भी स्वीकार करता है कि "क्रूरता और शूरता जुड़वा बहिनें हैं।" देखा जाए तो व्यक्ति के वैभव के पीछे यदि उसकी शूरता है तो यहीं पर उसकी क्रूरता भी सिद्ध होती है। ययाति के शब्दों में "जितना वैभव अधिक, उतना ही आत्मा का पतन भी अधिक होता है" वैभव शरीर की पूजा करवाती है। फिर तो, "शरीर के पुजारियों की आत्मा चेतना-विहीन हो जाती है।" ऐसी स्थिति में व्यक्ति उपभोग की ओर प्रवृत्त होकर भोक्ता बन बैठता है और वासनाओं का गुलाम हो जाता है। उसकी वासनाएँ उसकी मनोवृत्तियों को मनोविकार में बदल देती है और फिर व्यक्ति पाषाणवत् यंत्रचालित जैसा हो जाता है । 

         'ययाति' के शब्दों में, हम अपनी वासनाओं के वशीभूत "आठों पहर आत्मपूजा में ही लीन रहते हैं दिन-रात अपनी ही दृष्टि से दुनियां को देखा करते हैं, यही नहीं, बल्कि अपने से परे किसी दुनियां का अस्तित्व मानने से भी इनकार करते हैं उनकी समझ में यह बात शायद कभी आती ही नहीं है! यह तो एक ऐसी हकीकत है जैसा बहरा व्यक्ति संगीत का आनंद नहीं ले सकता और अंधा प्रकृति की सुन्दरता पर मोहित नहीं हो सकता। अत्मपूजन में लगे व्यक्ति भी मन से अंधे और अंतःकरण से बहरे हो जाते हैं" और "अनजाने मनुष्य किस तरह अपने ही चारों ओर चक्कर काटता रहता है। कई गांवों को अपनी चपेट में ले लेने वाली दूर की बाढ़ की अपेक्षा उसे अपनी आँखों के आँसुओं का महत्त्व अधिक प्रतीत होता है!" तात्पर्य यह कि ऐसा आत्मकेंन्द्रित व्यक्ति दूसरों की या समाज के कष्टों, समस्याओं को नहीं समझ पाता और जाने अनजाने में स्वयं का भी दुश्मन बन बैठता है। इस संबंध में 'ययाति' में शर्मिष्ठा भी यही सोचती है कि "मनुष्य का सच्चा बैरी भाग्य नहीं, स्वयं मनुष्य ही है।"  

        आत्मपूजन में लगे व्यक्ति की भावनाएँ निरपेक्ष नहीं रह जाती, इससे उसके जीवन की स्वाभाविकता नष्ट हो जाती है तथा आत्मा और शरीर के बीच का संतुलन नष्ट हो जाता है। यह आत्मप्रेम है जो देह के आकर्षण से उत्पन्न होता है। 'ययाति' भी इसके आकर्षण से विद्ध सोच रहा है,  "देह नहीं तो मधुर संगीत नहीं, देह नहीं तो सुंदर चंद्रोदय नहीं। देह नहीं तो स्वादिष्ट व्यंजन-पकवान नहीं, देह नहीं तो खुशबूदार फूल नहीं, देह नहीं तो प्यारभरा स्पर्श नहीं!" और,

       "सच तो यही है कि इस संसार में हर कोई केवल अपने लिए ही जिया करता है। मनुष्य सुख के लिए अपने निकट के लोगों का सहारा ठीक उसी तरह खोजते हैं जैसे वृक्षलताओं की जड़ें पास की आर्द्रता की ओर मुड़ जाती हैं। इसी झुकाव को दुनिया कभी प्रेम कहती है कभी प्रीति, तो कभी मैत्री। लेकिन वास्तव में वह होता है आत्मप्रेम ही। एक तरफ की आर्द्रता नष्ट होते ही पेड़-पौधे सूख नहीं जाते हैं उनकी जड़ें किसी और आर्द्रता की खोज में दूसरी ओर मुड़ जाती हैं–वह आर्द्रता नज़दीक हो या दूर–और उसे खोजकर वे फिर से लहलहाने लगते है।" दरअसल 'केवल अपने लिए ही जीना' व्यक्ति की उसकी अपनी वासनाओं के कारण है और इन वासनाओं की प्रवृत्ति क्या होती है, 'ययाति' इस संबंध में विचार करता है कि  "क्या हर वासना शेर जैसी होती है? उसे एक बार जिस उपभोग का चसका लग जाए, उसी के पीछे वह पागल की तरह भागती है! शायद वासना के केवल जीभ ही होती है! भगवान ने उसे कान, आँखें, मन, हृदय कुछ नहीं दिया है। उसे अन्य किसी बात की पहचान होती ही नहीं है। वह पहचानती है केवल अपने सन्तोष को!" आशय यही है वासनाएँ व्यक्ति को विवेकशून्य बना देती हैं और ऐसे व्यक्ति के लिए "प्रीति, वात्सल्य, ममता कुछ भी सच नहीं।" वह इनके प्रयोग से अपना एक नकली चेहरा ही गढ़ता है। इस चेहरे के साथ "मानव केवल अपने सुख के लिए जीता है। केवल अपने अहंकार की तृप्तता के लिए जीता है।"

    उपन्यास में शाप से ययाति का असमय ही बूढ़ा हो जाना वासनाओं के अनियंत्रित उपभोग के कारण है, वासनाएँ व्यक्ति की मनःस्थिति को विकृत कर देती हैं और उसकी आत्मपूजा की प्रवृत्ति उसे दूर से आती बाढ़ नहीं देखने देती, उसे केवल अपने ही आँसुओं में उलझाकर रख देती है।

      तो फिर! मनुष्य का जीवन कैसा हो ? क्या वह वैरागी बनकर जीवन जिये? आखिर यह तो सच ही है कि "आसक्ति ही आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु है' और चाहे यह विलासिता के रूप में हो या शक्ति के, ये दोनों जगत को सुखी बनाने में असमर्थ हैं। अकसर 'विरक्ति' के पीछे शक्ति प्राप्त करने की भावना होती है या फिर विरक्ति में भी अतृप्त वासनाएँ मन को बेचैन किए रहती हैं। 'ययाति' भी कुछ ऐसा ही सोचता है, "हरी दूब में सांप भी दबे-छिपे रहते हैं। विरक्ति की ओट में उसी प्रकार आसक्ति भी...’’ यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है, 'विरक्ति' के भाव में व्यक्ति अपने मन में स्वयं को ऊँचा उठा हुआ मान लेने का भ्रम पाल लेता है, और तब 'ययाति' के शब्दों में, "वे रहे महान ॠषि ! सामान्य लोगों के, सामान्य दुःखों को भला वे कैसे देख पाते?" दरअसल ययाति ने अपने बड़े भाई यति के बचपन में ही संन्यासी बन जाने से उपजे अपनी माँ के दुःखों को देखा है और शायद इसीलिए वह एक जगह कहता है, "जिस दिन से मालूम हुआ कि यति ने माँ को कितना दुख पहुँचाया है, आश्रम-जीवन के प्रति मेरे मन में अनजाने ही एक घृणा पैदा हो गई थी।" इन बातों से यह भी स्पष्ट है कि मनुष्य का जीवन केवल उसके अपने लिए ही नहीं होता, उसे परिवार, समाज, राष्ट्र और मानवता के लिए भी जीना पड़ता है।

         तो जीवन रूपी इस मीठे फल में कीड़ा न लगे, इसलिए मानव को पहले अपना मन जीतना चाहिए। लेकिन "मन को जीतना जग को जीतने जैसा आसान नहीं..!" इसके लिए 'ययाति' इस रूपक को याद करता है, ‘मानव जीवन में आत्मा रथी, शरीर रथ, बुद्धि सारथी और मन लगाम है। विविध इंद्रियाँ घोड़े हैं। उपभोग के सभी विषय उसके रास्ते हैं और इंद्रियाँ और मन से युक्त आत्मा उसका भोक्ता है।' और "इसलिए मनुष्य की आत्मा हमेशा जाग्रत रहनी चाहिए! नशे में धुत् सारथी के हाथों से लगाम छूट जाती है, घोड़े बेकाबू होकर मनमानी दिशा में भाग खड़े होते हैं, रथ गहरी खाई में गिरकर चकनाचूर हो जाता है और उसमें बैठा धनुर्धर व्यर्थ प्राणों से हाथ धो बैठता है।’’

          आत्मा की जाग्रत अवस्था पाप और पुण्य के खेल से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि आज "परलोक या परमात्मा के बारे में परंपरा से चली आई श्रद्धा, विज्ञान के चौंधिया देने वाले प्रकाश में विचरने वाले समाज का नियमन करने में असमर्थ हो रही है।" 'ययाति' भी कुछ इसी बात की ओर संकेत करता है, "पाप और पुण्य तो धूर्त पंडितों और मूर्ख मनुष्यों द्वारा गढ़ी गई कल्पनाएं हैं। इस दुनिया में केवल सुख या दुख ही सत्य है, बाकी सब माया है। पाप और पुण्य मन के मात्र आभास हैं कल्पना के खेल हैं।" दरअसल आत्मा की जाग्रत अवस्था चीजों को सही परिपेक्ष्य में देखने की दृष्टि प्रदान करती है और बिना इसके पाप और पूण्य की सारी अवधारणाएँ व्यर्थ है।

        आत्मा की जाग्रत अवस्था में मनुष्य के भाव निरपेक्ष होते चले जाते हैं, 'ययाति' में कच के शब्दों में, "प्रेम मनुष्य को अपने से परे देखने की शक्ति देता है। प्रेम किसी से भी हो गया हो, मनुष्य से अथवा वस्तु से; किन्तु वह प्रेम सच्चा होना चाहिए। अन्तःकरण की तह से उठता हुआ आना चाहिए! वह स्वार्थी, लोभी या धोखेबाज़ नहीं होना चाहिए। राजकन्ये, सच्चा प्रेम हमेशा निःस्वार्थी होता है, निरपेक्ष होता है। फिर वह फूल से किया गया हो या किसी जीव से। प्रकृति की सुन्दरता से हो या माता-पिता से। प्रीतम या प्रेयसी से किया हो अथवा वंश, जाति या राष्ट से! निःस्वार्थ, निरपेक्ष, निरहंकार प्रेम ही मनुष्य की आत्मा के विकास की पहली सीढ़ी होती है।'' मनुष्य प्रेम के इस मनोभाव के साथ अपनी आसक्तियों पर विजय प्राप्त कर सकता है क्योंकि इसी के साथ व्यक्ति का कर्तव्यबोध भी जाग्रत हो उठता है। तभी तो 'ययाति' में कच से कहलवाया गया है, 'प्रेम जीवन की एक उच्च भावना है। किन्तु कर्तव्य उससे भी श्रेष्ठ भावना है!' और कर्तव्य-भावना से रहित प्रेम को ढकोसला मानता है, "प्रेम चाहे माँ-बाप का हो या पति-पत्नी का, सब ढकोसला ही होता है। केवल नाटक होता है! अपने अन्तरतम में मानव केवल अपने से प्यार करता है, अपने शरीर से, अपने सुखों से और अपने अहंकार से प्यार करता है।" 

         यहाँ एक विशेष बात भी है कलाकार कौन होता है? कर्तव्यपथ पर चलने वाला व्यक्ति या अपनी भावनाओं, मानसिक आवेगों में डूबा रहने वाला व्यक्ति?  'ययाति' भी इस पर विचार करता है, "क्या मनुष्य के भीतर का कलाकार उससे सर्वथा भिन्न होता है?" 'ययाति' में यह जिज्ञासा इसलिए उठायी गई है कि व्यावहारिक जीवन में दूसरों को पराभूत करने की मानसिकता लिए व्यक्ति छल-छद्म का सहारा लेते हुए मानव मन की पवित्र भावनाओं का दुरुपयोग करता हुआ दिखाई पड़ता है, लेकिन उसी व्यक्ति के हाथ में जब तूलिका आ जाती है, तो उसका कलाकार मन संसार को निरपेक्ष ढंग से देखने लगता है! दरअसल यह कर्तव्यबोध की ही अवस्था है, अपने कर्तव्यों के प्रति सजग व्यक्ति ही कलाकार भी हो सकता है, क्योंकि कर्तव्य पथ पर चलने वाला इंसान कुछ अधिक ही संवेदनशील भी होता है। एक कलाकार का मन सबसे अधिक प्राकृतिक होता है, शायद इसी को लक्षित कर 'ययाति' सोचता है, "निसर्ग और मानव का नाता अनादि अनंत है। ये दोनाें मानो जुड़वाँ भाई हैं। इसीलिए निसर्ग के सान्निध्य में जीवन अपनी सारी सच्चाइयाँ लेकर हमारे सामने प्रकट हो जाता है।" और "मानव निसर्ग से दूर हो जाता है तो उसका जीवन एकांगी होने लगता है। उस कृत्रिम और एकांगी जीवन में उसकी कल्पनाएं, भावनाएं, वासनाएं सब अवास्तविक और विकृत बन जाती हैं।" निसर्ग मानव को सहज बनाती है और वह अपने दुखों के प्रति भी संवेदनशील हो जाता है, तभी तो ययाति के मन में यह प्रश्न उठता है, "क्या कलाकार के दुःख से ही उसकी कला अधिक सजीव, अधिक सुंदर और अधिक रसीली बन जाती है?"

       इसीलिए हमें प्रकृति से सीख लेनी चाहिए कि कैसे झंझावातों के बीच प्रकृति निरपेक्ष भाव से अपना काम करती रहती है! 'ययाति' को अन्तत: इसका ज्ञान होता है, "प्रेम करना सीखना चाहते हो न? तो नदी को गुरु करो। वृक्ष को गुरु करो। माता को गुरु कर लो।’’ और वह अपनी वासनाओं से मुक्त होता है तथा मन पर विजय प्राप्त करने की बात कहता है, "मानव समाज को सुखी बनाना हो तो मानव को अपने मन पर विजय प्राप्त करनी होगी।’’ अंत में 'ययाति' को समझ आती है-

         ‘सुख में, दुःख में, हमेशा एक बात गांठ बाँध लो। काम और धर्म महान पुरुषार्थ हैं। बहुत ही प्ररेक पुरुषार्थ हैं। जीवन के लिए अतीव पोषक पुरुषार्थ हैं। किन्तु ये पुरुषार्थ स्वच्छन्दता से भाग जाते हैं। ये पुरुषार्थ कब अंधे हो जाएंगे, कोई भरोसा नहीं! उनकी लगाम हमेशा धर्म के हाथ रहने दो... 

   न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति 

    हविषा कृष्णवर्त्मेंव भूय एवाभिवर्धते।’’

          तभी सौ साल जीने की सार्थकता है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

कोरोना से हम मुकाबला कर लेंगे

         आज दो क्वारंटाइन सेंटर पर जाना हुआ। एक सेंटर पर चार लोग क्वारंटाइन थे। एक निश्चित दूरी पर उनके बिस्तर लगे थे| वहाँ एक पंजिका भी रखी थी, जिसमें क्वारंटाइन होने की तिथि एवं अवधि पूरी होने पर मुक्त किए जाने की तिथि अंकित की जाती है| इसके साथ ही इनके चिकित्सकीय परिक्षण हेतु आने वाले डाक्टर/चिकित्सा कर्मी के हस्ताक्षर भी होते हैं| इसी प्रकार एक दूसरी पंजिका इन्हें दिए जा रहे नाश्ते एवं भोजन के अंकन हेतु रखा था| कोरोना के भय से उस पंजिका को मेरी छूने की हिम्मत नहीं हुई| वहाँ उपस्थित एक चिकित्सा कर्मी ने उस पंजिका के पन्ने पलटते हुए उसका निरीक्षण कराया, जो स्वयं क्वारंटाइन में रहते हुए अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहा है| इसीतरह एक दूसरे सेंटर पर पंद्रह व्यक्ति क्वारंटाइन किए गए थे, मिले| इन सेंटर्स पर कुर्सी पर बैठने पर भी मुझे डर लग रहा था|
        
          खैर इन दोनों स्थानों पर संबंधित प्रधान, ग्राम सचिव, चिकित्सा कर्मी प्राणपण के साथ इन सेंटरों की व्यवस्था करते हुए दिखाई पड़े| इसी तरह जनपद में अन्य स्थानों पर भी क्वारंटाइन सेंटर बनाए गए हैं, जिनमें लॉकडाउन तोड़कर सुदूर शहरों से आने वाले श्रमिकों/ व्यक्तियों को क्वारंटाइन किया गया है और उन सबके लिए ऐसी व्यवस्थाएं की गई हैं| 
   
          एक बात है,भारत को गरीब मानकर कुछ लोग इस देश में स्वास्थ्य सेवाओं को विकसित देशों की अपेक्षा कमतर मानते हैं, जो कोरोना जैसी महामारी की दृष्टि से नाकाफ़ी है, मतलब हमारे देश की स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता इस महामारी का सामना करने लायक नहीं है| यह बात सत्य भी हो सकती है, लेकिन वहीं पर यह भी देख सकते हैं कि अति आधुनिक चिकित्सकीय सुविधाओं वाले राष्ट्र भी इस महामारी के सामने त्राहिमाम कर रहे हैं| लेकिन यह तथ्य वैसा नहीं है, जैसा हम समझ रहे हैं| भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं और अमेरिकी-यूरोपीय स्वास्थ्य सेवाओं में उद्देश्यपरक और चारित्रिक अंतर है| अमेरिका के स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में ज्यांद्रेज एवं अमर्त्यसेन का मानना है कि-
    
           "अमेरिका में उच्च स्तरीय मेडिकल सेवा होने की शानदार गुणवत्ता के बावजूद इस देश में स्वास्थ्य सेवा का पर्याप्त विस्तार नहीं हुआ है; और उससे कई लोग अछूते रह गए हैं। औद्योगिक देशों में अमेरिका की स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था सबसे महँगी और अप्रभावी है, वहाँ स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च का आँकड़ा यूरोप के मुकाबले दोगुना ज्यादा है लेकिन इस व्यवस्था के नतीजे खराब हैं, और अमेरिका जीवन प्रत्याशा के मामले में विश्व में 50 वें रैंकिंग पर है|" इसका आशय यही है कि अमेरिका की यह व्यवस्था विषमतापूर्ण है| शायद यही वजह है कि अमेरिका इस महामारी का सामना करने में स्वयं को असहाय पा रहा है और उसकी स्वास्थ्य सेवाएं नाकाफी साबित हो रही है|
     
           वहीं पर भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की प्रकृति सामाजिक है और इसका स्वरूप लोकतांत्रिक होने के कारण यहाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का फैलाव भी है, जिसमें जनभागीदारी के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंन्द्रों का जाल भी है| इसी वजह से बहुत हद तक हम बीमारियों को रोकने में कामयाब भी  होते हैं| भारतीय स्वास्थ्य सेवा की यह प्रकृति ही उसे कोरोना जैसी महामारी का सामना करने में सक्षम भी बनाती है| क्वारंटाइन केंन्द्रों पर भ्रमण के समय हमें यह अहसास हुआ कि कोरोना जैसी महामारी का हम सफलतापूर्वक मुकाबला कर लेंगे|
         
            फिर भी, इस महामारी से सबक लेकर विशेषज्ञों की यह राय मानना जरूरी है कि "भारत में संस्थागत परिवर्तन करके बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने की जरूरत है बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी में से ज्यादा अनुपात में सार्वजनिक खर्च किया जाए|" अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं को हम 'जन-विमर्श' का विषय बनाएँ|
     
           खैर, इसी के साथ हमें विकास के मायने भी बदलने होंगे| सिमेंटेड दुनियां या फिर इस दुनिया को नाप लेना ही 'विकास' नहीं हो सकता| हाँ, खेत की मेड़ पर निर्द्वन्द्व बैठकर आपस में मुस्कराते-बतियाते भैंस चराते और हरियाले झुरमुटों तथा पेड़ों के बीच इनके साफ-सुथरे घर भी विकास के मायने हो सकते हैं, बस इनके लिए हमें स्वास्थ्य और शिक्षा का बेहतर प्रबंध करना होगा|

शनिवार, 28 मार्च 2020

साम्यवाद का 'कोरोना-मिशन'

         इस साम्यवाद में बहुत धोखेदारी है, जब साम्यवाद विस्तारवादी राष्ट्रवाद में परिणत हो जाता है तो दुनियाँ को कोरोनामय कर देता है! हाँ साम्यवादी बुद्धि बहुत विचित्र तरीके से काम करती है| किसी जमाने में पूँजीवाद का विरोध इसका हथियार था और आज पूँजीवाद में छिपे लालच को इसने अपना हथियार बनाया हुआ है| इसके बल पर ही अब यह दुनिया पर कब्जे के लिए रणभेरी बजा रहा है, और दुनियां है कि सहमी हुई इसे देख रही है| इसे देखने के सिवा शेष विश्व के पास और कोई चारा भी तो नही! आज चीन की इसी साम्यवादी-विस्तारवादी प्रवृत्तियों ने दुनियाँ को डस लिया है| 
        
          अमेरिका हो या यूरोप, साम्यवादी-बुद्धि के खेल को समझ नहीं पाए! दरअसल इसमें अमेरिका, युरोप या भारत जैसे देशों का दोष नहीं है, लोकतंत्र में निहित उस खामी का दोष है, जिसे अभी तक पूँजीवाद को साधना नहीं आ पाया| लोकतंत्र ने इसे (पूँजीवाद) ही लक्ष्य मान लिया और इसी लक्ष्य ने साम्राज्यवादी-साम्यवाद को अवसर प्रदान किया| परिणामस्वरूप आज दुनियाँ कोरोना के डंक से कराह रही है, तथा लोकतंत्र किंकर्तव्यविमूढ़ है, आखिर ऐसा क्यों हुआ? 
          
          दरअसल पूँजीवाद में लोकतंत्रात्मक नहीं बल्कि अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ होती हैं और जो अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में लोकतंत्र की आत्मा का शिकार करती है| इस पूँजीवादी व्यवस्था के लिए समाज का वर्ग-चरित्र एक आवश्यक बुराई की तरह है, और जिस तरह से साम्यवाद वर्ग-चरित्र को नष्ट करने का ढोंग करता है उसी तरह से लोकतंत्र में भी यह ढोंग होता है| विशुद्ध पूँजीवादी देश अपने संसाधनों और अपनी बौद्धिक पूँजी के बल पर इस आवश्यक बुराई पर विजय पाने में कुछ हद तक सफल हुए हैं लेकिन इसके सफल होने की भी एक सीमा है और यहीं पर चीन जैसे देश को अवसर मिलता है| यदि विकसित यूरोप और अमरीका अपने नागरिकों के आर्थिक-जीवन में उपभोग के स्तर को कमतर नहीं देखना चाहते, तो चीन भी पूँजीवाद की चकाचौंध से अपने नागरिकों के बीच साम्यवाद की सफलता की कहानी लिखना चाहता है, यह बिना साम्राज्यवादी हुए संभव नहीं| इसीलिए चीन  दुनियां भर में बाजार खोजकर इनपर कब्जा जमाना चाहता है और फिर उसकी साम्यवादी सत्ता-व्यवस्थाएँ क्रूर से क्रूरतम होकर कोरोना जैसे वायरस को जन्म दे देती हैं| सच तो यह है कि यह चीन की साम्यवादी-साम्राज्यवादी कोरोना-मिशन है, क्योंकि समय रहते उसने शेष विश्व को इसके बारे में आगाह नहीं किया| 
       
        वाकई! लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ जहाँ पूँजीवाद के मकड़जाल में उलझकर, अर्थव्यवस्था, जीडीपी और आर्थिक-प्रगति की चिंता में इस 'कोरोना-मिशन' के सामने किंकर्त्तव्यविमूढ़ खड़ी असहाय हैं वहीं स्वयं चीन के साम्यवाद के लिए भी एक घातक परिस्थिति बन रही है, क्योंकि शेष विश्व को कोरोना से यह भी सीख मिल रही है कि पूँजीवाद से आया शहरीकरण और उपभोक्तावाद तथा विभिन्न विचारों-मतों और धर्म की साम्राज्यवादी मनोवृत्तियाँ समग्र मानवता के लिए ख़तरनाक है; परिणामस्वरूप एक दिन सारा विश्व एकजुट होकर मानवता-विरोधी' कोरोना-मिशन' जैसी इन प्रवृत्तियों से लड़ रहा होगा और इस चीनी साम्राज्यवाद को खाद-पानी मिलना बंद हो जाएगा| इस नए विश्व में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होने जा रही है|

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

'मरे' हुए 'विवेक' का कोरोना

          सुबह साढ़े पांच बजे नींद टूटी, लेकिन उस वक्त उठने का मन नहीं हुआ, मन जैसे प्रमादग्रस्त था। इस प्रकार मिनट दर मिनट गुजरते हुए सवा छह हो गए। कंबल झटक कर उठ खड़ा हुआ। फिर तय किया कि चलकर थोड़ा टहलकदमी किया जाए। आवास से बाहर निकला, लेकिन सड़क पर बढ़ती आवाजाही देखकर, उस पर जाने का मन नहीं हुआ। आवास के छोटे से कैम्पस से सड़क तक चहलकदमी करता रहा। एक चक्कर में सौ कदम होते हैं। खैर मन के कोने में थोड़ा पश्चाताप भी हुआ कि यदि और पहले टहलने निकल लेते तो सुबह के सौन्दर्य को ताक लेते! कभी-कभी सुबह इतनी खूबसूरत लगती है कि जैसे यह ठहर जाए। दरअसल सुबहें बिना लाग-लपेट की होती है और मन भी इस वातावरण में बिना लाग-लपेट के हो जाता है। ऐसे समय मन का सौन्दर्य भी निखर आता है और इसका आनंद ही कुछ और होता है, हाँ यही सुबह-ए-आनंद है! लेकिन सुबह ही क्यों, मन तो कभी भी बिना लाग-लपेट वाला हो सकता है।
          उस दिन घर की लाबी में बैठे हम पति-पत्नी आपस में कुछ बातें कर रहे थे, यही कोई दोपहर का वक्त था। अचानक बाहर से आता चिड़ियों की चहचहाहट का शोर सुनाई पड़ा। यह आवाज़ तेज हो रहा था। पत्नी किचेन में चली गई। वापस आकर रहस्यात्मक अंदाज में मुझे किचेन की खिड़की तक ले आईं और मुझे बाहर देखने के लिए इशारा किया। देखा! बाउंड्री वॉल के लोहे वाले ग्रिल पर गौरैयों का झुंड चीं-चीं करते हुए उड़-बैठ रहा था। दरअसल पत्नी ने खिड़की के ऊपर गौरैयों के लिए लकड़ी का एक घोंसला बनवा कर रखा है। गौरैयों को अपना चोंच उस घोंसले की ओर कर उन्हें चींचियाते देख मैंने पत्नी से कहा कि ये इस घोंसले पर कब्जे को लेकर आपस में झगड़ रही हैं। पत्नी अपनी इस सफलता पर प्रसन्न हो रहीं थीं कि उनका रखवाया यह घोंसला गौरैया चिड़ियों के काम आने वाला था। 
        हम दोनों कुछ क्षण तक इन गौरैयों के इस झगड़े को निहारते रहे। अचानक! पत्नी ने किचेन की खिड़की से घोंसले के ओर झाँका और मुझसे बोल पड़ी, "अरे! बात यह नहीं है, इस घोंसले पर बुलबुल बैठा है, यह भी शायद इस पर कब्ज़ा जमाने की ताक में है और गौरैयों को यह नागवर गुजरा है, इसीलिए इस बुलबुल को भगाने के लिए इकट्ठे होकर प्रयास कर रही हैं।"
       वाकई! यह सब देखकर मुझे भी आश्चर्य हुआ कि गौरैयों को यह ज्ञान है कि यह घोंसला उन्हीं के लिए है और बुलबुल इस पर अनधिकृत कब्ज़ा करना चाहता है! इसीलिए इसपर बुलबुल का बैठना इन्हें बर्दाश्त नहीं है। इधर बुलबुल ने भी गौरैयों के झगड़े से परेशान होकर वहाँ से उड़ने में ही अपनी भलाई समझा। इधर इस घटना में खोए हुए ही मैं चार हजार कदम मने तीन किलोमीटर चल चुका था। 
          इसके बाद चाय पीते समय पत्नी का फोन आया। उन्होंने भी अपने सुबह के टहलने की कहानी सुनाई। एक जगह कुछ क्यूट टाइप के पिल्ले खेल रहे थे, उनमें से एक छोटे पिल्ले को सहलाते हुए वे उससे खेलने लगीं, जिसकी उम्र ढाई-तीन महीने के बीच थी। एक काला बड़ा पिल्ला, जो पाँच-छह महीने का था, उन्हें उस छोटे पिल्ले को छूने से बार-बार रोक रहा था और उनके हाथ को पकड़ लेता कि इसे मत छुओ या मत पकड़ो ! और जब एक अन्य छोटा पिल्ला पत्नी को देख-देख भूंकने लगा तो उस काले बड़े पिल्ले ने उस छोटे पिल्ले पर गुर्राते हुए उसे भूंकने से रोकने की कोशिश की। जैसे वह उसे समझाना चाहा हो कि इनसे खतरा नहीं, इनपर मत भूंको!
       जरा सोचिए, पशु-पक्षियों के इस विवेकपूर्ण व्यवहार को हम केवल उनकी सहजवृत्ति कहकर उनके 'विवेक' को खारिज़ कर देते हैं। और इस 'सहजवृत्ति' को जड़वत व्यवहार मान उनकी संवेदना और पीड़ा को भी नजरंदाज कर देते हैं। इनके प्रति हमारे क्रूरतापूर्ण व्यवहार के पीछे यही भावना काम करती है। हाँ 'विवेक' केवल मनुष्यों की ही बपौती नहीं है, पशु-पक्षियों के साथ यह पूरी कायनात ही विवेकवान है, हम अपने 'विवेक' के अहंकार में इस तथ्य को विस्मृत किए रहते हैं।
       सच बात तो यह हमारे पास वह 'क्षण' ही नहीं है जिसमें प्रकृति में व्याप्त 'विवेक' को हम समझ सकें! दरअसल हम अपने 'मरे' हुए 'विवेक' के साथ जीते हैं। यह हमारा मरा हुआ 'विवेक' ही कोरोना बनकर हमें डराता है।
        आखिर, हमारा 'विवेक' क्यों 'मरा' हुआ होता है!! शायद इसलिए कि हम 'लाग' और 'लपेट' में जीते हैं।
(17.03.2020)

रविवार, 15 मार्च 2020

साँप का चिड़िया में बदल जाना (लघु कथा)

        उसका वह बचपन ! खूब उछलता कूदता एकदम उन्मुक्त! किसी बंधन में रहना उसके लिए जैसे पिजड़े में फँसी चिड़िया के समान होता! उसे कोई न रोके और टोके! वाह, ऐसी चीजें ही तो सुंदर होती हैं!! जो जितना स्वतंत्र, वह उतना ही सुंदर और उसमें वैसे ही चमक लिए उन्मुक्तता की चाहत! लेकिन, नहीं-नहीं सुंदर चीजें धोखेबाज नहीं होती, बस पिंजड़े में जाकर असुंदर होने से बचना चाहती हैं| लोग न जाने क्यों खूबसूरत सी चीजों से खेलना चाहते हैं| सच बताएँ, खूबसूरत चीजों से खेलने वाले, होते हैं बहुत बदसूरत! खूबसूरत चीजों से खेलकर ये केवल अपनी कुंठा या भड़ास निकालते हैं| हाँ, सच तो यह है इन्हें परवाज की उड़ान से भी चिढ़ होती है! इनका वश चले तो परिंदे खुले आसमान में तैर ही न पाएँ!
         यह ऊलजुलूल बात नहीं,  बचपन में वह भी सुंदर सी चीजों के लिए बेचैन हो उठता था! उसकी निगाहें जैसे इसकी खोज में लगी रहती| एक बार मित्रों के साथ वह खेल रहा था| उसका खेलना भी क्या खेलना ! बस इधर-उधर निरुद्देश्य घूमना, लेकिन इसमें भी उसे खूब मज़ा आता| वह प्रत्येक चीज को जैसे निरखता हुआ चलता! हाँ उसने तो केवल निरखना ही सीखा है, इसीलिए मौन रहने की उसे आदत पड़ चुकी है!! उस दिन वह ऐसे ही घुमंतू बना हुआ मित्रों संग आवारगी कर रहा था, मौन आवारगी! यह उसकी आवारगी ही होती!! उसकी इस घुमंतू वाली खेल प्रवृत्ति के कारण उसे घर से डाट में उसे आवारा की उपाधि मिलती! 
         हाँ उस दिन खेलते-खेलते उसके दोस्त नाले के उस पार जा चुके थे| लेकिन वह नाले के उस मूक सौंदर्य में खो गया था!! उसके किनारे-किनारे दूर तक चली गई वृक्षावलियों की पंक्तियाँ और उन पर खिले रंग-बिरंगे और लाल-लाल टेसू जैसे फूल! उनकी झड़ती पंखुड़ियाँ..यह सब कितना खूबसूरत लग रहा था उसे!! जैसे हरे वस्त्र वाली धरती ने कोई माणिक्य-जड़ित सुंदर नीला हार धारण किया हो! हरियाले वृक्षों पर लदे फूलों की पंखुड़ियां झरती हुई कल-कल बहती इस नदी के नीले जल में प्रवाहमान थी| वह इस प्राकृतिक सौंदर्य को सब कुछ भूलकर मंत्रमुग्ध सा निहारने लगा था! इस सौंदर्य ने उसे अभिभूत कर दिया, मित्र कब दूर दूर निकल गए उसे इसका ध्यान ही न रहा|!
        लेकिन इस सौंदर्य में खोया हुआ उसने देखा, इस छोटी सी नदी के नीले साफ जल में बही जा रही रंग-बिरंगे फूलों की पंखुड़ियों के बीच छोटी-छोटी मछलियाँ अठखेलियाँ करती हुई आड़े-तिरछे तैरती जा रही थीं| अचानक उसे एक बेहद खूबसूरत रंगीन साँप नदी की तलहटी में तैरता दिखाई दिया!! ईल मछली की तरह उसका तैरना देख वह आत्मविभोर हो चुका था| इस खूबसूरत साँप को पकड़ने की उसमें चाहत जाग उठी, लेकिन इसमें विष हो सकता है, एक पल के लिए वह डर सा गया था| लेकिन सुन्दर चीजें विषैली नहीं होती और यह सुंदर साँप विषैला नहीं है, सोचते हुए उसने पानी में तैरते उस खूबसूरत साँप को अपलक निहारने लगा था!!
         तभी उस रंगीले साँप को पकड़ने के लिए उसने अपना हाथ पानी में बढ़ा दिया| लेकिन यह क्या !! वह साँप उछलकर पानी से बाहर नदी के किनारे सूखी जमीन पर आ गिरा!! वह उस ओर दौड़ा, उसे पकड़ना चाहा| लेकिन !!! लेकिन साँप अब एक रंग-बिरंगी खूबसूरत छोटी चिड़िया में बदल गया था !! एकदम सोन चिरैया की तरह!! वह उसे पकड़ पाता, तब तक चिड़िया बना वह साँप आकाश में फुर्र से उड़ चला! हाँ वह सोन चिड़िया उसके पकड़ में नहीं आई| काश ! वह उस साँप को पकड़ने की कोशिश ही न करता !!