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शनिवार, 9 मई 2015

फाल और मेढक...

            धीरे-धीरे मैं प्लेटफार्म पर चढ़ आया..ट्रेन के आने में थोड़ा समय शेष था..| काफी मात्रा में यात्री ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे...कुछ यात्री यात्री-शेड के नीचे की तीन-चार बेंचों पर बैठे हुए थे तो कुछ प्लेटफार्म पर खड़े थे..एक बेंच पर थोड़ी सी जगह देख मैं वहाँ जाकर बैठ गया..| पास में ही चार-पाँच युवा, जो लगभग चौबीस-पच्चीस वर्ष के रहे होंगे, शायद वे भी ट्रेन की ही प्रतीक्षा कर रहे होंगे, उनमें आपस में हो रही बातों को मैं सुनने का प्रयास करने लगा था..|
            उनमें से कोई एक कह रहा था.. ‘मेरे तो फेसबुक पर पचास से ज्यादा मित्र नहीं है...’
            दूसरा बोला.. ‘जिसको जानते हों उन्हीं को दोस्त बनाना चाहिए..’
           पहला फिर बोल उठा, ‘ऐसा है यार..बहुत ज्यादा फेसबुक मित्र हो जाने पर पता नहीं कैसे-कैसे लोग जुड़ जाते है...’
            दूसरे ने फिर कहा, ‘हाँ कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो उल्टी-सीधी चीजें पोस्ट कर देते हैं..’
            पहले युवक ने फिर कहा, ‘हाँ..बात यह है हमारे फेसबुक-वाल पर परिवार के सदस्य भी जुड़े होते हैं जिनमें परिवार की लड़कियाँ, रिश्तेदार या बड़े लोग भी सम्मिलित होते हैं, लेकिन कुछ लड़कों के फेसबुक फ्रेंड-लिस्ट में उनके परिवार के लोग या लड़कियाँ नहीं जुडी होती, केवल लड़के ही उनकी लिस्ट में शामिल होते हैं और यदि हम किसी परिचित लड़की की पोस्ट पर ‘लाइक या कमेन्ट’ करते हैं तो इसका डर बना रहता है कि ऐसे फेसबुक-मित्र जो अपने परिवार के सदस्यों से नहीं जुड़े होते वे बड़ी उल्टी-सीधी टिप्पड़ियां कर बैठते है...तब हमें बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है...इसीलिए..जो अपने परिवार से जुड़े हों और जिम्मेदारी का परिचय दे रहे होते है, उन्ही की फ्रेंड-रिक्वेस्ट स्वीकार करते है...’
           अब तीसरा युवक बोल उठा.. ‘हाँ यार..! सही कहा..ऐसे लोग ही गैर जिम्मेदार होते है..फेसबुक पर अपने परिवार से भी जुड़ा होना चाहिए...’
          “इनकी बातें तो तथ्यपूर्ण हैं..सच में सोशल मीडिया ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ तक ही सीमित नहीं है..” इन बातों को सुन मैं यही सोच ही रहा था कि तभी ट्रेन के आने की घंटी बजी...मैंने देखा आपस में वार्तालाप कर रहे उन युवकों में से दो जो अपने मित्र को स्टेशन पर छोड़ने आये रहे होंगे वापस जा रहे थे...
          मैंने सुनी वार्तालाप के पहले युवक को उनसे कहते हुए सुना, ‘हाँ.. ठीक हैं पहुँचने पर फोन से बात होगी...अरे वैसे तो हम सब फेसबुक पर तो हैं ही...’
          ट्रेन आती हुई दिखाई दी और मैं भी ट्रेन में चढ़ने की तैयारी करने लगा..
                             *                           *
         ट्रेन प्लेटफार्म पर आ चुकी थी...मैंने एक अन्य व्यक्ति के साथ एक डिब्बे चढ़ने का प्रयास किया...उसके दरवाजे पर ही खड़े टी.टी. ने उस बोगी को रिजर्वेशन कोच कहते हुए उसमें चढ़ने से मना कर दिया..| हालांकि, ऐसा नहीं था....वह कहीं से भी रिजर्व-कोच नहीं लगा..बल्कि साधारण श्रेणी का ही डिब्बा वह भी था..| खैर, हम दोनों दूसरे डिब्बे में चढ़ गए...सीटें खाली थी...मैंने वहाँ सफ़ेद लक-दक कुरता-पायजामा पहने एक नेता-टाइप व्यक्ति को एक पुलिसवाले के साथ बैठे हुए देखा, ‘शायद यह पुलिस-वाला इनका सुरक्षा-गार्ड हो’ इस विचार के साथ मैं भी वहीँ उन दोनों के सामने वाली सीट पर बैठ गया| हम आपस में एक दूसरे को देखे जा रहे थे...नेता टाइप व्यक्ति हमसे हमारे गंतव्य स्थल के बारे में पूँछ बैठे, हमारा गंतव्य स्थल एक ही शहर में होने के कारण बातचीत सम्बन्धी हममें प्रगाढ़ता पनप गई| सफ़ेद लक-दक कुरता-पायजामा पहने व्यक्ति के लिए ‘नेता-टाइप’ शब्द का प्रयोग उनके पहनावे के कारण किया है, क्योंकि प्रायः हमारे यहाँ के नेताओं ने भी अपने लिए लगभग इसी तरह का ‘ड्रेस-कोड’ निर्धारित कर लिया है..और..इस ड्रेस में दिखाई देने वाले को कोई भी आसानी से ‘नेता जी’ समझ सकता है|
         
         ट्रेन अपनी गति के रौ में थी...‘वैसे हम अकसर अपनी गाड़ी से ही राजधानी जाते हैं और ट्रेन की अपेक्षा कम समय में पहुँच जाते हैं...यह सब सड़कों में सुधार होने से हुआ’ नेता जी के इसी कथन से आपस में हमारी बात-चीत आरम्भ हुई| ‘देखिए दो मजबूत राजनैतिक दलों की सत्ता की दावेदारी में प्रतिस्पर्धात्मक विकास तो होता ही है’ नेता जी की इस बात को सुन मैंने यह कहते हुए स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया कि वास्तव में इधर विकास तो हुआ ही है|
       
        ‘लेकिन भाई साहब... इस विकास से बहुत से लोग बेरोजगार भी हो रहे हैं’ लक-दक कुरता-पायजामा पहने नेता जी के इस वाक्य को सुन मेरे चेहरे पर प्रश्नवाचक चिह्न उभर आया..! इस चिह्न को भाँप नेता जी ने इस विकास से बढ़ती बेरोजगारी की अपने तरीके से व्याख्या की..!
         
        उनका कहना, ‘सड़कों के इस तरह के विकास से तमाम फ़्लाइओवर बन रहे हैं यहाँ तक कि बाजारों में भी जहाँ से ये सड़कें गुजरती हैं लोगों के घरों और दुकानों को तोड़कर फ़्लाइओवर बना दिए जा रहे हैं..बेचारे दुकानदार बेरोजगार होते जा रहे हैं..और तो और इन सड़कों से लोग ऊपर-ऊपर ही गुजर जाते हैं, दुकानदारों की दुकानदारी भी नहीं चल पाती’ फिर आगे उन्होंने इसमें और जोड़ा, ‘बेरोजगारी बढ़ी की नहीं..?’
       
           मुझे लगा जैसे नेताजी कोई चुनावी भाषण देने लगे हों...हालाँकि मैंने अपने कुछ तर्कों के साथ उनके इस कथन के प्रतिवाद की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी..मुझे लगा यह महाशय मेरे इस यात्रा के साथी हैं अतः मैंने भी उनके इस कथन की सहमति में फिर दो बार सिर हिलाया..| यहाँ एक बात और स्पष्ट करना होगा कि ट्रेन में मिले इस व्यक्ति के पहनावे के आधार पर ही मैंने मन ही मन इन्हें ‘नेता-टाइप’ व्यक्ति का संबोधन दिया था, लेकिन बातों ही बातों में इन्होंने स्वीकार भी कर लिया कि ये वास्तव में ‘नेतागीरी’ करते हैं, जैसे इनके ये कथन ‘यदि सब नियम से ही काम करने लगे तो फिर हम नेताओं का क्या काम..!’ और ‘वैसे मैं किसी सरकारी आदमी को गलत काम करने के लिए नहीं कहता...’ उनकी नेतागीरी को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है|
        
            ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी हुई थी...बाहर घना अँधेरा था..हमारी बोगी इंजन के पास वाली ही थी इसलिए प्लेटफार्म के ऐसे स्थान पर थी जहाँ प्रकाश व्यवस्था नहीं होगी...मेरा ध्यान नेताजी के पास ही बैठे पुलिस-वाले पर चला गया जिसे मैं नेता जी का सुरक्षा-गार्ड समझ रहा था..| मैंने ध्यान दिया वह पुलिस-वाला कोई हथियार जैसे स्टेनगन या राइफल वगैरह नहीं लिए हुए था, मैंने यही सोचा ‘शायद यह नेता जी का बाडीगार्ड न हो..!’ ट्रेन में भीड़ कम थी नेता जी पैर फैला जैसे सोने का उपक्रम करने लगे और मैं भी थोड़े आराम की मुद्रा में आ गया था| ट्रेन चल पड़ी, अचानक नेता जी उठ बैठे और मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘बहुत भ्रष्टाचार बढ़ गया है...अरे..! आदमी के लिए कितना चाहिए फिर भी संतोष नहीं...इस चक्कर में तो लोग नैतिकता जैसे भूल ही गए हैं, सरकारी आदमी को देखो, वेतन मिल रहा हैं लेकिन यदि काम भी कर रहा है तो बस जैसे पैसा ही खोज रहा हो, उसके बगैर कोई काम करने का जैसे उसके लिए कोई मतलब ही नहीं..और इसके बगैर उसका काम करने में मन भी नहीं लगता है..!’ मैंने भी उनकी हाँ में हाँ मिलाया लेकिन बोला कुछ नहीं, मुझे ऐसा प्रतीत हुआ यह तो बहुत अच्छा नेता है बिलकुल आम आदमी जैसा..! लेकिन प्रशंसा में मैं कुछ बोल नहीं पाया...| ट्रेन फिर कहीं रुकी हुई थी|

            ‘यहाँ कोई स्टापेज नहीं..पता नहीं क्यों रोक दिए है..ये अब ऐसे ही करेगी’ नेता जी ने फिर कहा, ‘देखिए पुलिस वाले बेचारे रात-दिन नौकरी करते हैं लेकिन जरा सी बात पर सस्पेंट हो जाते हैं, कोई इनकी मजबूरियों को नहीं समझता’ मुझे ध्यान आया कि नेता जी के बगल में ही पुलिसवाला बैठा है, ‘तो शायद यह नेता जी का बाडीगार्ड नहीं है...फिर ये महाशय भी तो इतने बड़े नेता नहीं लगते कि इन्हें बाडीगार्ड की जरुरत पड़े..इसका मतलब पुलिसवाले को देख ये मुंहसोहासी कह रहे हैं’ यही सब सोचते उस पुलिसवाले को देखते हुए मैंने एक ऐसी पुलिस-व्यवस्था को अपनाने के लिए कहा जिसमें पुलिस डयूटी में इन्हें कुछ आराम मिल सके| ‘नहीं सरकार ने पहले इस विषय पर सोचा था लेकिन इतनी भर्तियाँ कौन करेगा..फिर यह सब ठंडे बस्ते में चला गया है..’ मेरी बात सुन पुलिस वाले ने यही कहा|
         
            अब-तक ट्रेन चल चुकी थी... ‘वास्तव में पुलिस की दुर्दशा है, इतनी अधिक डयूटी करते है..वह भी लगभग चौबीसों घंटे की, लेकिन वेतन कितना कम रहता है..? वहीँ आई.ए.एस-पी.सी.एस. बन लोग मौज काटते हैं...हमारे यहाँ काम और वेतन में तो कोई तालमेल ही नहीं है..बहुत असमानता है!’ यह कहते हुए नेताजी पुलिस वाले की ओर मुखातिब होते हुए फिर बोले, ‘आप को तो इसका अच्छा अनुभव होगा..?’ मैं यह सुनते ही यह सोचते हुए ‘पक्का...यह पुलिसवाला इन नेता जी का बाडीगार्ड नहीं है..मतलब ये वजनदार नेता नहीं हैं’ उस पुलिस वाले की ओर देखने लगा| असल में ‘बाडीगार्ड’ से मैं मन ही मन नेता जी को तौल रहा था|
           
           “अरे भाई..! गांधी जी ने एक बात कही थी कि फाल किसी एकाध मेढक को ही लगता है..|” पुलिसवाले ने यह बात हमारी ओर देखते हुए कहा| मैंने इस कथन के अर्थ को समझने का प्रयास किया किन्तु असफल रहा, ‘लेकिन गांधी जी ने कहाँ और कब इसे कहा है, किसी किताब में तो मैंने इसे पढ़ा नहीं..और तो और..गांधी जी की किसी विचारधारा से भी यह कथन मेल नहीं खा रहा है’ यह सोचते हुए मैंने उस पुलिस वाले की ओर देखा, तभी उन महाशय की आवाज सुनाई दी, “आप समझे नहीं...अरे मेढक जो हैं न..अपनी निष्क्रियता की अवस्था में जमीन में दबे-पड़े रहते हैं, जब किसान खेत की जुताई करने लगता है तो कोई एकाध मेढक को ही उसके हल का फाल लगता है जबकि जमीन में तो बहुत मेढक दबे रहते हैं, जिस मेढक को यह फाल लग गया वही बेचारा दुर्भाग्यशाली होता है...!” साथ ही इसमें उन्होंने आगे जोड़ा, ‘बस इसी तरह हम भी हैं हमको यही पुलिस की नौकरी बदा थी..क्या हमीं थे...लेकिन वही है कि किसान का फाल हमें ही लग गया..और हमें यही  नौकरी मिली’ उधर उस बेचारे का यह वाक्य पूरा हुआ इधर मैं इस कथन के दूसरे ही अर्थ में खो गया..
         
          ‘हम सभी तो दबे-पड़े हैं, अपने ऊपर पता नहीं किस मिट्टी की मोटी परत दर परत चढ़कर...एकदम मेढक की सी शीत निष्कृयता लेकर...! एक अजीब सी व्यवस्था के नीचे ‘हाइबरनेशन’ की अवस्था है हमारी..!! हैं तो सभी इसमें, लेकिन जिसको फाल लग गया वही बेचारा...!’
         
          अभी मैं इसी अर्थ में खोया था कि नेता जी की आवाज सुनाई दी, ‘बात तो सही है आप पुलिस बन गए और यहाँ मैं नेतागीरी करने लगा..अपना-अपना भाग्य..! लेकिन भाई सबको संतोष होना चाहिए...कोई सिर पर थोड़े ही न ले जाना है...हमने तो आवश्यकता सीमित कर रखी है जिससे व्यर्थ की मगज़मारी न करनी पड़े..’ अब नेता जी मेरी ओर मुखातिब हुए, ‘आप क्या करते हो..?’ मैं बताना तो नहीं चाहता था लेकिन छिपाने का प्रयास करते हुए भी नहीं छिपा पाया और नेता जी को पता चल गया कि मैं भी कुछ हूँ|

           ‘इतनी दूर पोस्टिंग लिए हैं..’ नेता जी के इस बात पर मैंने कहा, ‘नौकरी करनी ही है, जहाँ भी तैनाती मिलेगी जाना तो पड़ेगा ही..’ अब नेताजी लगभग बलपूर्वक बोले, ‘अरे आप नाहक परेशान हैं...बताइए मैं बात चलाऊं...? मेरा फोन नम्बर ले लें और अपना भी दे दें..बात हो जाएगी..’ मैं किसी तरह नम्बर के आदान-प्रदान को टालते हुए बोला, ‘नहीं कौन इस पचड़े में पड़े और ज्यादा उलझन नहीं पालना चाहिए...|’ मेरी पचड़े वाली बात सुन नेता जी बोले, ‘देखिए भाई साहब आदमी को भगवान् बन कर नहीं जीना चाहिए वह इंसान है इंसान बन कर ही रहे...अरे थोडा-बहुत सब चलता है..नहीं तो जिंदगी भी नहीं चलेगी..’ यह कहते हुए नेता जी मेरा फोन नम्बर लेना भूल चुके थे..
            
            ट्रेन की गति धीमी पड़ रही थी...शायद कोई बड़ा स्टेशन नजदीक ही था, धीरे-धीरे कर ट्रेन रुक गई, प्लेटफार्म रोशनी में नहाया हुआ था..! तभी नेता जी ने अचानक प्लेटफार्म की ओर देखते हुए पता नहीं क्या सोच कर मुझसे कहा, ‘ये औरते न होती हैं बड़ी रहस्यमयी’ इसे सुन मैं चौंक पड़ा| मैं अभी उनके इस कथन के मर्म को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि आगे इसमें उन्होंने और जोड़ा, ‘बात यह है भाई साहब कि इनका कोई भरोसा नहीं कि ये कब क्या कर बैठें और आप इस बात का अनुमान नहीं लगा सकते” अब मुझसे नहीं रहा गया मैंने लगभग नेता जी के कहे इन कथनों पर प्रतिवाद दर्ज कराने की नीयत से कहा, ‘अरे नहीं भाई, ऐसी बात नहीं...इन्हें बहुत कुछ सहना और समझना पड़ता है...’ मेरे इस विचार को नेता जी ने कोई तवज्जो नहीं दिया और गंभीरता लिए शब्दों में मुझसे कहना शुरू किए, “देखिए भाई साहब आप ध्यान दीजिए...एक स्त्री के कितने रूप होते हैं..माँ..बहन..बुआ..भाभी...चाची..ताई...पत्नी...प्रेमिका...आदि, और वह इन रिश्तों को सबसे अलग-अलग एक ही साथ कुशलता से निभाती है...अब आप ही बताइए...! कोई एक साथ इतने रूप धारण कर सकता है...तो कैसे आप स्त्री के चरित्र का भरोसा करेंगे?” नेता जी के स्त्री के प्रति इस विचार को सुन एक क्षण के लिए मैंने अपना सिर पकड़ लिया..जो बात एक स्त्री को गौरवान्वित करता है उन्हीं बातों के आधार पर नेता जी द्वारा निकाले गए निष्कर्ष को मैंने मन ही मन कोई महत्त्व नहीं दिया|
        
           ‘एक स्त्री की संवेदनशीलता को लोग समझ ही नहीं पाते...स्त्री तो एक जलधारा के सदृश है, जो सागर..नदी...झील...बादल...सभी में मिल जाती है...! उसकी तरलता, उसकी संवेदना को हम समझ नहीं पाते...!! शायद उसकी यही संवेदनशीलता एक साथ इतने रिश्तों को निभाने की उसे शक्ति भी प्रदान करता है..और..उसकी भावनाएं भी वही समझ सकता है जो उसी के जैसा संवेदनशील हो...नहीं तो लोग उसे चरित्रहीन का तमगा दे देते हैं...! लेकिन, हम भूल जाते हैं कि जलधारा स्वयं में पवित्र होती है, क्योंकि इसकी तरलता में प्रक्षालन की शक्ति होती है....!’ मन हुआ नेता जी को मन की ये सारी बातें सुना दें...लेकिन ऐसा नहीं कर सका क्योंकि सबके अपने-अपने तर्क होते हैं...और फिर कुतर्कों से जीतना मुश्किल है|
         
            मैं मन की इन भावनाओं में डूबा ही था कि नेता जी का स्वर सुनाई दिया.. ‘भाई साहब सो गए क्या...? पता नहीं ट्रेन कब चलेगी..इतनी देर से खडी है...’ अपने इस स्वर के साथ वह प्लेटफार्म का जैसे मुआयना करने लगे थे| एक मूंगफली वाले को बुलाकर मूँगफली खरीदा, ‘सफ़र में मैं और कुछ नहीं खाता..तला-भुना तो एकदम नहीं खाना चाहिए..’ शायद ऐसा इसलिए कहा था कि मैं पकौड़े लेने के चक्कर में था लेकिन नहीं लिया...फिर, मैंने भी उनकी इस बात का समर्थन किया| ‘अरे..आप भी लीजिए...’ कहते हुए मूँगफली के ठोंगे को मेरे सामने कर दिया, लेकिन मेरे लिए इसके छिलकों को फेंकने की समस्या होती फिर भी उनके आग्रह को टाल नहीं पाया और एक-दो फली उठाने लगा| उसी समय, एक साठ-पैंसठ वर्षीय व्यक्ति ट्रेन की खिड़की से हम लोगों की ओर हाथ बढ़ा भींख माँगते दिखाई दिया, नेता जी अपनी जेबों को टटोलते हुए कहा, ‘फुटकर नहीं है जाओ’ और इधर मैं भी प्रतिक्रियाहीन मूंगफली फोड़े जा रहा था, लेकिन वह भिखमंगा जाने का नाम नहीं ले रहा था.. ‘अरे भाई मैंने कहा न कि हम लोगों के पास फुटकर नहीं है...तुम जाते क्यों नहीं...” लेकिन फिर भी वह नहीं गया और बोला, ‘अरे बाबूजी कुछ भी हो दे दो, चाहे कुछ खाने का ही दे दो..’ यह कहते हुए वह जैसे कुछ न कुछ लेने के लिए अड़ सा गया, इसे भाँप नेता जी ने दो मूंगफली के दाने उसकी ओर बढ़ा दिया, आश्चर्य..! दो मूंगफली का दाना पाकर भी वह खुश था और चलता बना..!
         
            यह देख मैं मुस्कुरा दिया..नेता जी ने मुझे देखते हुए कहा, ‘देखा आपने भींख माँगने की भी एक आदत होती है..लोगों को भींख पाए बिना भी चैन नहीं मिलता..!’ ‘अरे भाई साहब..आपको पता है...! दिल्ली-विल्ली जैसे शहरों में तो भींख माँगने की थोड़ी खाट भर की जगह भी ये भिखमंगे पचास-पचास लाख में खरीदते और बेंचते हैं...यह बात तो मेरे विधायक जी ने बताई थी...!’ मैंने थोडा अचंम्भित हो नेता जी को सुना| वे फिर बोले, ‘आप को विश्वास नहीं होगा...लेकिन एक बार मैं अपने विधायक जी के साथ दिल्ली गया था वहीँ पर एक जगह जहाँ कोई भींख मांग रहा था..उसकी ओर इशारा करते हुए विधायक जी ने यही बात उस जगह के बारे में बताया था..’ इस समय ट्रेन प्लेटफार्म छोड़ने लगी..और इधर मैं सोच रहा था हो सकता है नेता जी की इस बात में अतिशयोक्ति हो लेकिन इसमें कुछ न कुछ सच्चाई भी होगी....ट्रेन सरपट भाग रही थी|
           
          कुछ देर तक हमारे बीच मौन छाया रहा लेकिन ट्रेन फिर रुकने लगी, नेता जी ने कहा, ‘देखा, अब ऐसे ही होगा..अब इसे रोक-रोक कर अन्य गाड़ियों को आगे बढाते रहेंगे...इसका क्या..इसे तो यहीं तक जाना है...दूर की ट्रेनों को निकालते रहेंगे...’ मन ही मन मैंने भी सोचा ‘ठीक है कि हमको बस अगले स्टेशन तक ही जाना है और ट्रेन को भी, लेकिन क्या रेलवे वालों को हमारे लोगों के समय का ध्यान नहीं..?’
    
             अब नेता जी से बात करने में मेरा मन नहीं लग रहा था, जबकि उन्होंने कई बार मुझसे बात करने की कोशिश की...एक बार तो मैंने सोचा ‘नाहक ही इनसे इतनी बातें कर ली’ क्योंकि बातों से उनका मन अब भी भरा नहीं था...इसीलिए बातों के लिए जैसे वे मुझे कुरेद रहे थे...उस रुकी ट्रेन से उतर बाहर टहलने लगा था..और इया प्रतीक्षा में था कि ट्रेन कब चले....
         
             मुख्य स्टेशन तक ट्रेन दो घंटे बिलम्ब कर जैसे-तैसे पहुँची...प्लेटफार्म से बाहर आते ही नेता जी और मैं विपरीत दिशाओं की ओर अपने गंतव्यों के लिए ऑटो तलाश रहे थे...इस समय रात के बारह से अधिक हो रहा था...मुझे एक ऑटो मिला..उस ऑटो में पहले से ही एक व्यक्ति सवार था...मैंने उसे रिजर्व कर लिया और  घर के लिए निकल पड़ा...ऑटोवाला ऑटो को तेज़ गति से भगाए जा रहा था...एक मोटरसाइकिल पर दो पुलिसवाले मंथर गति से चले जा रहे थे...ऑटोवाला तेजी से उनसे आगे बढ़ गया...मैंने देखा दोनों पुलिसवाले अपनी मोटरसाइकिल से ऑटो के आगे तेजी से आए और उसे रुकने का इशारा किया...ऑटो रुक गयी..एक पुलिसवाले ने झट से ऑटोड्राइवर का गिरेबान पकड़ा और भद्दी गालियाँ देते हुए कहा, ‘..सा...ले...ठीक से चलना नहीं आता...देखो न हमारे ऊपर धूल उड़ी’ किसी तरह ऑटोवाले ने उन पुलिसवालों से हाथ-पैर जोड़ हम लोगों से यह कहते हुए आगे बढ़ा, ‘बाबूजी देखा..इन पुलिसवालों को..! मेरी कौन सी गलती थी...? लेकिन..इनके मुँह कौन लगे..’ मैं भी सोचने लगा, ‘इस बेचारे ऑटोड्राइवर की आखिर ऐसी कौन सी गलती थी जिसके कारण नाहक ही पुलिसवालों से उसे अपमानित होना पड़ा..?’
        
           खैर, थोड़ी देर बाद ऑटोवाला ऑटो में बैठे मेरे साथ के यात्री को उतारते हुए मुख्य सड़क छोड़ हमारे ब्लाक की ओर जानेवाली सड़क पर मुड़ गया..कुछ आगे जाने पर मुझे दो पुलिस वाले दिखाई पड़े, लेकिन ये पहलेवाले नहीं थे, एक पुलिसवाला लघुशंका में तल्लीन था और उसके पास ही एक मोटरसाइकिल खड़ी थी, तो दूसरा हमारे ऑटो की ओर देखते हुए सड़क पर लाठी पटकने लगा था...पास पहुँचने पर ऑटो को रुकने का इशारा किया, सहमा-सहमा सा ड्राइवर ने ऑटो रोक दिया.... ‘क्यों बे इतनी रात को ऑटो इधर क्यों लाया..’ पुलिस वाले ने ऑटो-ड्राइवर को लगभग डाटते हुए कहा| ‘बोलता नहीं...क्यों बे तू...साले..अभी दो चार थप्पड़ रशीद करेंगे तो होश ठिकाने आ जाएगा..’ पुलिसवाले ने फिर घुड़की थी| सहमें-सहमें ऑटो-ड्राइवर ने कहा, ‘अरे साहब बाबूजी मिल गए इन्हें यहाँ तक आना था..इन्हें पहुँचाने आए हैं...’ ऑटो वाले ने डर से ऐसे कहा जैसे मुफ्त मे मेरे ऊपर एहसान कर रहा हो..!
          पुलिस वाले ने अब मेरी ओर देखकर मुझ से पूँछा, ‘क्यों तुमको इतनी रात में ही आना था..’ अब मुझे उस पुलिस वाले पर क्रोध सा आ गया, मैंने कहा, ‘पहले तो तमीज सीखो कि कैसे बात करनी चाहिए..वर्दी पहन पुलिसिया अंदाज़ मुझे मत दिखाओ...तुम लोगों की यही सबसे बड़ी खराबी है...अभी मैं तुम-तुम कह तुमसे बात करूँ तो कैसा लगेगा’ पुलिसवाला थोडा सकपकाया और बोला, ‘नहीं मेरा मतलब इतनी रात को क्यों चल रहे हैं..’ मैंने कहा, ‘क्या रात में चलना कोई गुनाह है...तुम्हारे किस कानून में लिखा है...कोई अपने घर रात में नहीं जा सकता..? और सुनो अगर गुनाह भी है तो ट्रेन लेट हो गई...पहले रेलवे पर मुक़दमा दर्ज करो जिसके कारण इतनी रात हुई?’ पुलिसवाले ने फिर कहा, ‘अरे आप बुरा मत मानिए हमारा काम है..’ मैंने कहा, ‘काम है..करो..अच्छी बात है..लेकिन सभ्य तरीके से पेश आओ..हाँ हमारी तलाशी भी ले सकते हो..’ फिर उसने ऑटो-ड्राइवर से कहा, ‘जाओ..’
         मुझे अनुभव हुआ कि ‘हमारी प्रशासनिक व्यवस्था में अंग्रेजों के जमाने की वह चिरंतन कमी अभी भी जारी है...जहाँ प्रशासनिक व्यवस्थाएँ मात्र लोगों को डराने के लिए हुआ करती थी..और अंग्रेजों से मिले हुए सामंती तत्व इसका बखूबी अपने हित में प्रयोग किया करते थे...इस प्रशासन का प्रभाव उन सामंतों पर नहीं होता था बल्कि उन सामंतों का आम-सीधे जनों पर शोषणकारी प्रभुत्व वैसे ही बरक़रार रहता था...आज उन सामंतों के स्थान पर दूसरे लोग उभर आए हैं...हो सकता है चालाक या असली अपराधी इस व्यवस्था के हाथ न आएँ बल्कि नादान या सीधे-साधे लोग इससे इसी तरह प्रताड़ित होते रहें...वास्तव में अभी भी प्रशिक्षण का तरीका और इसका उद्देश्य जैसे कुछ भी नहीं बदला...! और व्यवस्था ही अपने नागरिकों से गुंडई करती हुई हर जगह दिखाई दे जाती है..!’
          हाँ, यही सब मैं सोच रहा था कि मेरा घर आ गया...मैंने घर के पास ऑटो-ड्राइवर को रुकने का इशारा किया ऑटो से उतर मैंने ड्राइवर को किराया दिया..| ‘बाबूजी वे पुलिसवाले लौटते समय मुझे परेशान कर सकते है...कोई दूसरा रास्ता बताइए..’ ऑटो-ड्राइवर ने कहा| मैंने एक सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘जाओ इसी रास्ते से चले जाओ आगे जाकर यह उसी रास्ते में मिल जाएगी..वे पुलिसवाले नहीं मिलेंगे..|’ औटोवाला जा चुका था...पत्नी ने गेट खोला ये बाते उन्हें बताई..उन्होंने कहा, ‘इधर चोरियाँ बढ़ गयी हैं..इसीलिए पुलिसवाले रात में गस्त कर रहे है...हो सकता है ऑटोवाले के पास रात में यहाँ तक आने का परमिट न हो...’ लेकिन, मैं यही सोच रहा था कि पुलिस का व्यवहार भी अपने में एक समस्या है..|

          बेचारा ऑटो-ड्राइवर..! दो बार तो किसी तरह उसे ‘फाल’ लगते-लगते बचा...फिर कहीं किसी ‘फाल’ का शिकार न हो जाए...
          यह ‘फाल’ किसी को भी लग सकता है, थके हुए से इन विचारों के साथ मुझे नींद आ गयी....

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गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

मिटती पगडंडियाँ....

                  आज कई वर्षों बाद मैं ट्रेन से अपने गाँव आया था....मेरे गाँव से स्टेशन बमुश्किल डेढ़ किमी पर होगा..उस स्टेशन पर लगभग सभी प्रमुख ट्रेनों का ठहराव है...इसका कारण भी है क्योंकि हमारे गाँव से सटा क़स्बा धीरे-धीरे कर काफी बड़ा हो चुका है..अब तो कसबे के पास ही एक औद्योगिक क्षेत्र का भी विकास किया जा चुका है वहाँ कुछ छोटे-बड़े कारखाने भी लगाए जा चुके हैं..अतः कस्बे से प्रमुख शहरों की ओर आवाजाही भी बढ़ चुकी है..फिर..जनसंख्या भी तो बढ़ चुकी है..। 
                ...ट्रेन से उतरते ही पिताजी का फोन आ गया..घर से किसी को स्टेशन मुझे लेने के लिए भेजना चाहते थे...वैसे कोई सामान तो था नहीं मेरे पास...और मैं भी इस समय तक कूल माइंड का हो चला था मतलब दिमाग पर कोई रूटीन कामवाला तनाव भी नहीं था...सोचा...आज पैदल ही पुरानी यादों को ताजा करता हुआ गाँव चलूँगा...
                  हाँ.., ट्रेन के जाने के बाद ही मैं प्लेटफार्म से नीचे आया..तमाम मोटरसाइकिल...ऑटो-टैम्पो वहाँ खड़े थे..और..रिक्शे वाले तो इक्के-दुक्के ही दिखाई दिए...इनमें से कुछ तो अपने परिचितों को लेने आए रहे होंगे....लेकिन ज्यादातर सवारियाँ ढूंढ रहे थे...अचानक मेरे दिमाग में कौंधा...अब यहाँ इन वाहनों की इतनी भीड़...! पन्द्रह वर्षों पहले की बात याद आ गयी...तब...इस स्टेशन पर किसी ट्रेन के आने पर छह-सात रिक्शे-वाले ही खड़े रहते थे...लेकिन अब काफी कुछ बदल गया है...बदला नहीं तो वह पाकड़ का पेड़ और उसकी घनी छाया...उसकी घनी छाया में गोमती में चलने वाली वह चाय की दूकान...! मैंने देखा उस चाय की दूकान पर भीड़ लगी थी...
                पुरानी यादों में खोया सा मैं कुछ क्षणों तक वहीँ खड़ा रहा...फिर धीरे-धीरे कर गाँव की ओर चल पड़ा...प्लेटफार्म के नीचे-नीचे पगडण्डी पकड़ मैं चलने लगा...कुछ कदम चलने के बाद प्लेटफार्म पर के उस इमली के पेड़ को मैं खोजने लगा... “अरे..! यह तो वही इमली का पेड़ है...लेकिन इसकी यह दुर्दशा...! इसकी तो कई डालें अब गिर चुकी हैं...यह पेड़ तो अब किसी खण्डहर जैसा हो गया है...” असल में गाँव के प्राइमरी स्कूल की पढ़ाई के बाद मैं अपने इस कस्बे के इण्टर कालेज में उच्च प्राथमिक स्तर के साथ इण्टर तक की शिक्षा पूरी की थी...और गाँव से उस कालेज तक आने-जाने के लिए इस प्लेटफार्म को ही पैदल रास्ते के रूप में प्रतिदिन प्रयोग करते थे...क्योंकि...सड़क मार्ग से बाजार का भी चक्कर लगाना पड़ता, उसकी अपेक्षा इस प्लेटफार्म से होते हुए गाँव से स्कूल की दूरी कम हो जाती थी... “इस पेड़ के पास प्लेटफार्म के किनारे के रेलिंग के चौड़ी पट्टी वाले दो छड़ अभी भी वैसे ही टूटे हैं....और...रेलिंग के नीचे की मिट्टी वैसे ही है...बल्कि अब नीचे की मिट्टी कुछ अधिक ही कट-बह गयी है...आराम से इस रास्ते से प्लेटफार्म पर चढ़ा जा सकता है..” सोचते-सोचते मैं थोड़ा झुकते हुए रेलिंग के नीचे से आराम से प्लेटफार्म पर चढ़ गया...इमली के उस पेड़ को ध्यान से देखने लगा..
                    बचपन में स्कूल से लौटते समय इसी इमली के पेड़ पर चढ़ हम अपने साथियों के साथ इमली तोड़ने या खाने का मजा लिया करते थे...हाँ तब यह पेड़ इतना घना हुआ करता था कि इसकी पत्तियों के बीच हम बच्चे स्टेशन मास्टर से छिप कर इमलियाँ तोड़ते थे...और यदि हमारे ऊपर उनकी नजर भी पड़ जाती तो इसके पहले कि वे हम तक पहुँचते हम उसी रेलिंग के कटे रास्ते से धीरे से सरक लेते...लेकिन..अब कोई चिड़िया भी इस पेड़ पर बैठी हो तो वह दूर से दिख जाएगी...
             उस पेड़ को देखते ही अचानक मोहन की छवि स्मृतियों में उभर आई...मोहन को हम लोग पागल मानते थे...शायद वह पागल ही रहा होगा...चिथड़ों में लिपटा मोहन अकसर वहीँ इमली के पेड़ के तने के सहारे बैठा मिल जाता...कोई कभी कुछ दे देता तो वह खा लेता...स्कूल से लौटते समय जब वह दिखाई देता तो हम उससे पूंछते, “मोहन..वह जाता है..” मोहन झट से बोल देते “ही गोज..” “मोहन..वह स्कूल जा रहा है” तो मोहन कहता “ही इज गोइंग टू स्कूल” यानी इसी प्रकार वह हमारे द्वारा बोले गए वाक्यों का अंग्रेजी में अनुवाद करता जाता..हाँ कोई वाक्य बोलने के पहले उसका नाम भी पुकारना अनिवार्य होता अन्यथा वह उत्तर नहीं देता था...स्कूल से दिए गए ट्रांसलेशन के होमवर्क को वहीँ मोहन से पूँछ लेते और बदले में उसे इमली तोड़ कर खिला देते..!
            ...मुझे याद आया...उन दिनों पंजाब मेल और काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस में ही डीजल-इंजन लगता था शेष सभी गाड़ियों में भाप के इंजन हुआ करते थे..इसी इमली के पास ही इंजन रुकता...कई मैले-कुचैले कपड़े पहने लड़के उस भाप-इंजन से गिरे हुए जलते कोयले को एक लोहे की छड़ जिसका एक सिरा मुड़ा होता उससे उलट-पुलट कर बुझाते..और उन कोयले के टुकड़ों को अपने झोले में रखते जाते..बाद में इसे बाजार में बेंच दिया करते थे..हम स्कूल जाते-आते बच्चे अकसर जब कोई गाड़ी आकर खडी होती तो उसके भाप के इंजन को बड़े ध्यान से देखते थे...ट्रेन-ड्राइवर गाड़ी के रुके होने पर भाप-इंजन के भट्ठी में जल रहे कोयले को उलटता-पलटता था..इसी प्रक्रिया में इंजन से जलते कोयले पटरियों के बीच गिर पड़ते थे या ड्राईवर अतिरिक्त जलते कोयले को गिरा देते रहे होंगे..
             ...ट्रेन जाने के बाद पटरियों के बीच से कोयला बीनते बच्चों के बीच हम एक विशेष बात देखते थे..। उन बच्चों के साथ कोयला बीनने में वह कमली भी शामिल रहती थी जो कोयला बीन कर उन बच्चों को ही दे दिया करती थी और वह एक पागल सी औरत थी...मैले कुचैले फटे-चिथड़े धोती पहने हुए अकसर प्लेटफार्म के किसी न किसी छोर पर स्कूल जाते समय हमें दिखाई दे जाती थी, हाँ..जब वह कोयला बीन रही होती तो कोयला बीनते बच्चों में से कोई बच्चा जब उसे चिढ़ाता तो इमली के तने के सहारे बैठा मोहन भड़क उठता और कंकड़ उठाकर कुछ बड़बड़ाते हुए कोयला बीनते बच्चों पर फेंकने लगता...! जब इस क्रिया को देखते तो हम भी कभी-कभी कमली को चिढ़ाने की कोशिश मोहन की प्रतिक्रिया जानने के खेल में करते, तब मोहन हमसे नाराज हो जाता और या तो वह हमें दौड़ा लेता या फिर हमारे कहे वाक्यों का अंग्रेजी में अनुवाद करने की जगह मौन ही रहता..फिर तो हमें उसे मनाना पड़ता..। हम बच्चे कमली को मोहन की ‘मेहरारू’ कहते थे...लेकिन कभी भी हमने मोहन को कमली से बात करते हुए नहीं देखा था...!
              यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चलता रहा...धीरे-धीरे कर भाप के इंजन की जगह सभी गाड़ियों में डीजल इंजन लग गए थे...एक दिन स्कूल जाते समय हमने देखा कि मोहन इसी इमली के पेड़ के नीचे बैठा था, उसने अपने पास काफी मात्रा में ईंट के टुकड़े और कंकड़ जमा कर रखे थे और इन्हें उठा-उठा कर देखता भी जा रहा था..! हमें कुछ अजीब सा लगा था, मैं उसके पास जाना ही चाहता था कि किसी ने कहा वह ढेले फेंक कर मार देगा...फिर मैं दूर से ही जोर से बोला था.. “मोहन...मैं स्कूल जा रहा हूँ..” मोहन ने बस मेरी ओर देखा लेकिन उसने कोई उत्तर नहीं दिया तब हम कुछ समझ नहीं पाए थे और स्कूल की ओर चल पड़े थे...! इसके बाद हमने ध्यान दिया कि मोहन जब भी किसी अनजाने से व्यक्ति को देखता तो उसे दौड़ा लेता....और अकसर रोता रहता...! पता चला कि कमली कई दिन से गायब है...उसके साथ कोई अनहोनी घट गई थी..., कुछ समय बाद किसी ने हमें बताया था कि कमली की मृत्यु भी हो गई है..! ...अब मोहन हमारी बातों का कोई उत्तर नहीं देता था....! इस घटना के तीन या चार वर्षों बाद मोहन भी इस दुनियाँ में नहीं रहा था, ...तब-तक हम कालेज भी छोड़ चुके थे....न जाने क्यों उस इमली के पेड़ को देखते-देखते स्मृतियों के मानस-पटल पर क्षण भर में ये सारी बातें सजीव हो उठी थी।
           *                                 *                                   *
          मैंने निगाह प्लेटफार्म पर दौड़ाई तथा दोनों प्लेटफार्मों को जोड़ने वाले ओवरब्रिज की ओर देखा, ‘यह तो अभी हाल ही के वर्षों में बना है’ यह सोचते हुए मेरा इस बात पर ध्यान गया कि दो भिन्न किनारों को मिलाने वाला कोई पुल तो होना ही चाहिए जिससे सुरक्षित होते हुए बिना किसी बाधा के लोग अपने-अपने गन्तव्यों के अनुसार किनारों को चुन सकें...ऐसे किनारों को जोड़ने वाले पुलों की आवश्यकता भी है क्योंकि अब यात्री और ट्रेन दोनों की भीड़ कुछ ज्यादा ही हो गई है या अनजाने में लोग किसी टकराहट से भी बच जाएँ..। ‘पहले दोनों प्लेटफार्म के सिरों पर रेलवे लाइन को क्रास करने के लिए मुश्किल से तीन या चार फीट की चौड़ाई में क्रासिंग-पथ बनाया गया था, इसी का प्रयोग लोग कभी-कभी प्लेटफार्म बदलने के लिए करते थे...इसके साथ ही ग्रामीण भी इसी रास्ते से रेलवे-लाइन को क्रास करते..हम भी प्रतिदिन स्कूल जाते समय इसी रास्ते का प्रयोग करते..
              ...ऐसे ही एक दिन मैं इस रास्ते से लाइन को क्रास कर रहा था..शायद तब मैं आठवीं में था...अकस्मात् मुझे सामने से एक लड़की आते हुए दिखाई पड़ी, वह उम्र में मुझसे थोड़ी बड़ी ही रही होगी, मैं उसे रास्ता देने के लिए इस क्रासिंग-पथ से बायीं तरफ उतर गया ठीक उसी समय वह लड़की भी मेरी ही ओर क्रासिंग पथ से नीचे उतर गयी...यह देख फिर से मैं उस क्रासिंग-पथ पर आ गया इसी समय वह भी ऊपर आ गयी..अब मैं उसे रास्ता देने के लिए दायीं ओर हुआ तो वह फिर मेरे सामने आ गयी..इस समय हम दोनों एक दूसरे के आमने-सामने खड़े थे..। अचानक मुझे अपनी गाल पर एक जोरदार तमाचे का एहसास हुआ...मैं अपना गाल सहलाने लगा था...पीछे मुड़कर देखा वह लड़की चली जा रही थी...हमें तब बहुत गुस्सा आया था...सोचा अभी दौड़कर उसके पास जाऊं और उसे झिंझोड़ कर कहूँ तुम्हें ग़लतफ़हमी हुई है..लेकिन मेरे साथी आते हुए मुझे दिखाई दिए थे...मुझे लगा वे मुझपर हँस रहे हैं...मैं भी शर्मा सा गया था और गाल सहलाते स्कूल की ओर बढ़ चला..’ इस स्मृति के साथ ही मेरा हाथ मेरे गाल पर चला गया जैसे अभी-अभी चाँटा पड़ा हो..,मेरा ध्यान भंग हुआ...मन ही मन मुस्कुराने लगा..अब-तक प्लेटफार्म यात्रियों से खाली हो गया था।
                          *                                                     *                                                    * 
                    मैं प्लेटफार्म के पूर्व दिशा में स्थित अपने गाँव की ओर मुड़ा और धीरे-धीरे अपने कदम घर की तरफ बढ़ाने लगा... “अरे..यह क्या..! प्लेटफार्म को इतना लम्बा किया जा रहा है..” घर की तरफ आगे कदम बढ़ाते हुए प्लेटफार्म की लगभग बढ़ाई गई लम्बाई को देखकर मैंने यही सोचा..। पहले इमली के पेड़ के पास ही प्लेटफार्म की सीमा समाप्त होती थी तथा हिंदी और उर्दू में ‘बादशाहपुर’ का बोर्ड लगा होता था...तब इस नाम को उर्दू में लिखने का अभ्यास मैं इसी बोर्ड को देखकर किया करता था...लेकिन सीख नहीं पाया भूल भी जाता था...! अब यही बोर्ड पूर्वी छोर पर स्थित केबिन के पास लग गया है अर्थात प्लेटफार्म की लम्बाई वहां तक बढ़ा दी गयी है, केबिन का अस्तित्व तो कब का समाप्त हो चुका था..। हाँ..उस नवनिर्मित प्लेटफार्म पर चलते हुए मेरा ध्यान रेल की पटरियों की ओर चला गया, तब स्कूल से आते समय जैसे ही हम प्लेटफार्म से नीचे उतरते हम बच्चों में आपस में इस पटरी के ऊपर बैलेंस बनाकर चलने की प्रतियोगिता शुरू हो जाती और जिसका पैर पटरी से नीचे पहले पड़ता उसकी हार मान ली जाती.. इन्ही स्मृतियों के सहारे मैं अब उस स्थान पर पहुँच गया था जहाँ रेलवे लाइन को छोड़ अपने गाँव की ओर जाने वाली पगडण्डी को पकड़ना था...उस पगडण्डी को पहचानने की कोशिश की लेकिन वह पगडण्डी अब मिट चुकी थी...! 
                   ...किसी तरह पुरानी यादों के सहारे मैं रास्ता तलाश कर कुछ आगे बढ़ा तो मुझे सी.सी. रोड दिखाई दिया... ‘यहाँ तो अब सी.सी. रोड बन गयी है..’ इसे देख मैं अपने गाँव की दिशा की ओर इसी मार्ग पर चलने लगा| इस मार्ग के किनारे एक-दो पक्के घर भी बने हुए थे...! हाँ..पहले यहाँ ऊसरीली रेह से भरी पगडंडी हुआ करती थी, कभी-कभी मैंने धोबियों को इस पर से कपड़े धोने के लिए रेह इकठ्ठा करते हुए देखा था.. । खैर आगे करीब दो-सौ मीटर जाने के बाद इस रास्ते का अंत हो गया था, इसके किनारे पर पहुँच कर मैं खड़ा हो गया, अब आगे जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था क्योंकि पुरानी उस पगडण्डी का कोई चिह्न भी अवशेष नहीं था, वहाँ खेत बनाए जा चुके थे और उन खेत की मेड़ों को देखकर ऐसा लगा जैसे अब कोई इस रास्ते से नहीं आता...! ‘मुझे कोई बाहरी न समझ ले और एक अजनबी सा कहीं मैं टोका-टाकी का शिकार न हो जाऊं..’ मेड़ों के बीच रास्ता खोजते एक क्षण तो मैंने यही सोच लिया था..
                          मैंने अपने बाएँ देखा.. ‘अरे मंडी की चहारदीवारी यहाँ तक पहुँच गई है..’ हाँ उस चहारदीवारी के उस पार मंडी के कई भवन और शेड बन चुके थे, बचपन में इस रास्ते से स्कूल जाते समय यह मंडी नहीं बनी थी लेकिन अपना यह क़स्बा छोड़ने के कुछ वर्षों बाद ही इस ‘मंडी-समिति’ का निर्माण कराया गया था.. अब तो यहाँ काफी चहल-पहल रहती है, पहले इस क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा न होने से लोग अधिकांशतया अरहर की ही खेती करते थे और वे अरहर के खेत बहुत हरे-भरे दिखाई देते..| ‘लेकिन जब खेत ही नहीं बचेंगे तो फिर मंडी का क्या काम..’ सोचते हुए मैंने देखा कि बाजार से आनेवाली सड़क जो मंडी और मेरे गाँव से होकर आगे जाती है उसके किनारे-किनारे अब लोगों ने मकान और दूकान बना लिए हैं, जो मेरे घर तक फैलते चले गए है..! फिर भी मैं आज खेतों के बीच से गाँव जाने का अपने स्कूली दिनों का वही पुराना रास्ता तलाशने लगा, लेकिन..! अब वह रास्ता कहाँ मिलता..., शायद वह कब का मिटा दिया गया है क्योंकि स्टेशन से गाँव के बीच लोगों की आवाजाही अब सड़क से ही होने लगा है...पता नहीं क्यों मुझे इन पगडंडियों के मिटने का दुःख भी हुआ..! ‘बचपन में इन पगडंडियों से न जाने क्यों मुझे प्रेम था...घासों के बीच में पतली सी पगडंडियाँ मुझे सदैव आकर्षित किया करती थी...इन पर मैं खूब दौड़ लगाया करता था...!’ अपने इन्हीं विचारों में खोया-खोया सा मैं खेतों के टेढ़े-मेढ़े मेड़ों को ही रास्ते के रूप में प्रयोग करना आरम्भ कर दिया.
                                मेड़ों के बीच आड़े-तिरछे चलने की आदत कब की छूट चुकी है, किसी तरह सँभलता हुआ मैंने अपने दायीं ओर देखा, हाँ..वहाँ से थोड़ी दूर ‘ठाकुर की चक्की’ अब नहीं है..! तब वहाँ एक पम्पसेट भी हुआ करता था, उसके चारों तरफ गर्मी के दिनों में भी गजब की हरियाली रहा करती थी...! पपीता, शहतूत, आम, अमरुद, नीम आदि तरह-तरह के पेड़ों से घिरा हुआ पंचवटी जैसा वह स्थान हुआ करता..। कई बार हम वहाँ ‘आटा पिसाने’ या शहतूत खाने गए हैं, शहतूत जैसे पेड़ों से प्रथम परिचय मैंने वहीँ प्राप्त किया और डीजल इंजन की ‘पुक-पुक’ की मधुर आवाज दूर से कानों को बड़ी सुहावनी लगती थी...! हालांकि वहाँ की एक दुखद स्मृति भी उभर आई, उस परिवार का एक होनहार युवा, चक्की के मशीन के पट्टों में फँस कर अपनी जान गँवा बैठा था..! लेकिन आज वहाँ इन सब का कोई निशान अवशेष दिखाई नहीं दे रहा है, मैंने उस स्थान को पहचानने की कोशिश की ‘अरे वह छोटा सा मंदिर तो ठीक चक्की के बगल वाला ही हैं’ हाँ..इसी मंदिर से मैंने उस चक्की वाले स्थान को दूर से पहचाना, अब वही अकेला मंदिर बचा है...!
                          चलते हुए ही मैंने उन आम के पेड़ों को तलाशना शुरू किया जो हमारे स्कूल आने-जाने के रास्ते के ही बीच में पड़ता, ‘लेकिन अब यहाँ दो पेड़ ही बचे हैं वे भी जैसे लकड़ा गए हों; अब इनमें फल भी क्या लगते होंगे’ मन में यही विचार उठे उन दो आमों के पेड़ों को देखकर...! असल में स्कूली दिनों में वहां कई पेड़ हुआ करते थे उनमें से एक पेड़ का आम अपने कच्चेपन में भी बहुत मीठा हुआ करता...अकसर ‘टिकोरा’ लगने पर स्कूल आते-जाते हम, लोगों की आँखों से बच-बचा कर उन्हें तोड़ने का प्रयास करते थे, एक बार तो गर्मियों की छुट्टियों में अपने खानदानी चचेरे भाई के साथ भरी दोपहरी में झोले लेकर चोरी से उन कच्चे ही मीठे आमों को तोड़ने आया था..! हाँ, तब मैं कई दिनों तक इस बात से डरता रहा था कहीं मेरे बाबू यानी दादा जी को पता न चल जाए...! हालांकि दादा जी के डर के कारण ही मैं उन तोड़े गए आमों को घर नहीं ले जा सका था...इन यादों के ताजा होने पर मेरे होठों पर पुनः मुस्कान तैर गयी..
                      इन्हीं यादों में खोया हुआ मैं अपने घर की ओर आगे बढ़ चला... ‘अरे यह क्या यहाँ जो मैदान जैसा स्थान था...वह क्या हुआ...और तो और...इसी स्थान पर बहुत पहले ईंट का भट्ठा हुआ करता था... ‘एक बार जब यह भट्ठा चल रहा था, मैं बहुत छोटा था, तो ऊपर पकती ईंटों पर चढ़ गया तब मेरा पाँव जलने लगा था...’ इस स्मृति के साथ उस भट्ठे का अवशेष खोजने लगा...जिसका अब कोई नामोनिशान नहीं बचा है..! इन स्थानों की मिट्टियाँ खोद कर उन स्थलों को गड्ढे में बदल दिया गया है, शायद मिट्टी-माफिया ने यहाँ से मिटटी खोद कर बेच डाली है..| पास में थोड़ी दूर पर प्लाटिंग का भी कार्य चल रहा है..? तो क्या अब बड़े शहरों का रोग यहाँ भी लगने वाला है’ चलते-चलते अपने अगल-बगल के स्थानों को देख कर मैं यही सोचने लगा और आगे बढ़ चला....,
                 ‘यहाँ की झाड़ियाँ कहाँ चली गई...वे बेचारे खरगोश अब कहाँ छिपते होंगे..’ मैंने चलते ही उन झाड़ियों को खोजने का प्रयास किया जिसमें से स्कूल आते-जाते समय कई बार खरगोश को उनमें से निकल कर भागते हुए देखा था..., कई बार तो ऐसा भी हुआ कि जैसे ही झाड़ियों से निकल कर खरगोश भागता हम भी अपना बस्ता वहीँ पास में ही किसी पेड़ की डाली पर लटका उस खरगोश को पकड़ने उसके पीछे भाग लेते, लेकिन कुलाँचे भरता खरगोश इधर-उधर भागता हुआ आँखों से ओझल हो जाता, फिर हम लौट बस्ते ले घर की ओर चल पड़ते..। ब तो उनमें से वहां उन झाड़ियों के ही साथ कोई पेड़ भी नहीं बचा है, हाँ..वहाँ उस निर्जन स्थान पर के नीम या महुआ के पेड़ों की एक विशेष बात देखी थी..! उन पेड़ों पर अकसर कौओं के ही घोसले हुआ करते थे, लेकिन खरगोश, झाड़ियाँ और पेड़ अब इन पगडंडियों के साथ ही ओझल हो चुके हैं..!
                     अब यहाँ से मेरे खेत दिखाई देने लगे थे, दूर से ही मैंने देखा, पकी गेहूँ की फसलें वहाँ खड़ी थी, मेरे खेतों के उस पार बगीचे पर मेरी निगाह पड़ी.. ‘पहले आम और महुआ के कितने बड़े-बड़े पेड़ थे...! अब तो आम के पेड़ों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है और ले दे के दो ही महुआ के पेड़ दिखाई दे रहे हैं और इनकी भी इतनी दूर से डालियाँ भी गिनी जा सकती हैं...! मतलब वे कभी हरियाली से झूमने वाले पेड़, अब मात्र पेड़ होने के अवशेष में बदल चुके हैं..!’ सोचते हुए मैंने देखा कि दूर से ही पूरे बाग़ में विलायती बबूल के हरे-भरे पेड़ ही अब दिखाई दे रहे हैं.., ‘तो क्या अब बच्चे यहाँ नहीं घूमते होंगे..’ बात यह है कि बचपन में हम बच्चे अकसर गर्मियों में इन्हीं आमों या महुआ के पेड़ों के नीचे भरी दोपहरी में खेलते रहते थे..| इन्हीं सब में खोया-खोया मैं अपने खेतों के बीच आ गया था, देखा, गेहूँ की पकी बालियाँ हाल ही की बेमौसम की बरसात के कारण कुछ-कुछ काली सी दिखाई दे रही थी तो कुछ गेहूं की फसल गिरी पड़ी थी, ‘प्रकृति ने भी अब अपने रंग-ढंग बदल लिए हैं, इस मौसम में बारिश..!’ मन में यही विचार कौंधा
             अपनी स्मृतियों को टटोलते-टटोलते अब मैं वहाँ पहुँच चुका था जहाँ से मेरे खेत की सीमा समाप्त हो कर बाग़ की सीमा शुरू होती है... “बचपन में यहाँ से सीधे घर तक पगडंडी लगी होती थी..और तो और...कई दिशाओं की ओर तमाम पगडंडी भी फूटती थी यहाँ से..! लेकिन अब उनमें से किसी एक का भी अस्तित्व शेष नहीं, हाँ...मन को एक अजीब से उल्लास में भर देने वाली वे पगडंडियां अब नहीं हैं, इन्हीं पगडंडियों पर बचपन के कोमल नंगे पैरों से पतझड़ में गिरे सूखे पत्तों को रौंदते हुए इसकी आवाजों में मगन, पैरों में गड़े देशी बबूल के काँटों को निकालते हुए ‘बित्ती रैया बनगो रैया..रैया..रैया..’ कहते हुए दौड़ लगाया करते थे..!” इन यादों के साथ ही मैंने देखा कि बाग़ भर में वही विलायती बबूल के पेड़ बिखरे पड़े हैं और उनके काँटे भी इस जमीन पर भरे पड़े हैं, इनके बीच से जाना भी मुश्किल है...! ‘अब सड़क से ही मुड़ कर घर तक पहुँचना होगा..’ फिर मैं पास से ही गुजरती सड़क पर हो लिया..
                      *                                                               *                                                           *
                      घर पहुँचा तो देखा, माँ और पिता मेरा इंतजार कर रहे थे..., उनके चेहरों पर वृद्धावस्था का प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ता दिखाई दे रहा था...| मुझे देखते ही माँ बोली, ‘अरे..स्टेशन से आने में इतनी देर लग गई...’ मैंने कहा, ‘बस कुछ घूमते हुए से आ रहा था...’ अब माँ ने फिर कहा, ‘बहुत अच्छा किए इस बार अपनी गाड़ी से नहीं आए..., हम लोगों का जी डरा रहता है...’ फिर माँ मेरे लिए पानी लाने चली गयीं...
                        दोपहर का हम खाना खा चुके थे, पिता से इधर-उधर की चर्चा चल रही थी..। न्होंने कहा, ‘अब सबेरे भी एक गाड़ी जाने लगी है, उससे जाने की सुविधा हो गयी है..’ यह कहते हुए जैसे मुझे सबेरे तक रुकने की बात वह कहना चाह रहे हों, मैं कुछ नहीं बोला था...! फिर कुछ देर बाद पिता जी किसी काम से कहीं चले गए थे, मुझ पर भी थकान अपना असर दिखाने लगा और मुझे झपकी सी आ गई। कुछ देर बाद आँखें खुली तो देखा माँ पास में ही बैठी थी, वह बच्चों का हाल-चाल पूंछने लगी थी, मैं भी ‘हाँ..हूँ..’ में ही जबाव देता रहा...मुझे शाम को फिर वापस जाना था...एक अजीब सी उदासी मन में घेरे हुए थी...मन को निर्दय बनाना था...इसीलिए तो माँ से बातों में नहीं उलझना चाहता था...बार-बार मन पिता जी के वापस आने का इंतज़ार करने लगा था..क्योंकि धीरे-धीरे ट्रेन का समय हो रहा था...पिता जी कहीं मोटर साइकिल से गए थे| वह वापस आ रहे थे, उन्हें मोटर साइकिल चलाते देख मैंने सोचा, ‘अब इस उम्र में इनसे मोटरसाइकिल सँभलना मुश्किल हो रहा होगा..’ अब तक वे मोटर साइकिल खड़ी कर चुके थे, उन्होंने मुझे कपड़े पहने कहीं जाने के लिए तैयार जैसा देखा, उनकी निगाहें जैसे कुछ पूँछना चाह रही थी...मैं ही बोल पड़ा, “वो क्या है कल ही एक बहुत जरुरी काम है इसीलिए आज ही शाम वाली गाड़ी से जाना पड़ रहा है..’ इसे सुन वह कुछ नहीं बोले, मुझे देखते रहे, जैसे कहना चाह रहे हों सबेरे की गाड़ी से जाते तो क्या ठीक न होता...लेकिन वे कुछ नहीं बोले...तब-तक माँ की आवाज हमें सुनाई दी.., ‘घर में इस समय कोई लड़का नहीं हैं..बाबा..को आप ही स्टेशन छोड़ देते...’ पिता ने हामी भर दी..।
                         ...पिता मुझे स्टेशन छोड़ने के लिए मोटरसाइकिल की किक मार रहे थे कई बार की किक के बाद यह स्टार्ट हुई...‘सत्तर के ऊपर के हो चुके हैं पापा, इनसे यह मोटरसाईकिल सँभलने में अब कठिनाई हो रही है’ हाँ यही सोचते हुए मेरे मन में एक क्षण के लिए विचार आया कि मोटरसाइकिल हम उनसे ले और चलाते हुए स्टेशन तक उन्हें पीछे बैठा कर ले चलें और वहां से ये फिर वापस आ जाएँगे...लेकिन...यह मन न जाने क्यों वर्षों पुराने निहायत बचपन के दिनों में चला गया, तब स्कूटर हुआ करती थी और ऐसे ही पिता के पीछे बैठा मैं चला करता था, न जाने क्यों आज उसी बचपन को एक बार फिर जीने का मन कर गया...एक छोटे बच्चे सा पिता के साए में निश्चिन्त हो जाने का एहसास लिए मैं क्षण भर के लिए इस कठोर वर्तमान को विस्मृत कर गया और उनके पीछे मोटरसाइकिल पर उझक कर बैठ गया था...!
                       हाँ वह मोटरसाइकिल चलाते हुए ही बोले थे, ‘अब यह बहुत भारी लगने लगी है, मुझसे संभलती नहीं...’ मैं भी बोल उठा, ‘हाँ यह तो सही है..’ फिर पिता बोले, ‘अरे एक दिन तो यह गिर पड़ी थी..संयोग था..बच गए नहीं तो पैरों पर चोट लग जाती....’ इसी तरह बात करते-करते स्टेशन आ गया था, उन्होंने मोटरसाइकिल रोकी शायद किसी ने उन्हें नमस्कार किया था..हाँ वह पाकड़ के नीचेवाला चायवाला ही था...मैं मोटरसाइकिल से उतर कर उन्हें देखा...फिर मैंने प्लेटफार्म की ओर देखा, मैंने कहा, ‘लगता है अभी गाड़ी आने में देर है...घर चले जाइए नहीं तो अँधेरा गहरा जाएगा...” यह सुन उन्होंने मेरी ओर देखा जैसे कहना चाह रहे हों कि अँधेरा तो गहरा ही गया है..., इस समय मैं उनसे आँखें नहीं मिलाना चाहता था और प्लेटफार्म की ओर ही देखे जा रहा था...! अब वह मोटरसाइकिल पर बैठ उसे स्टार्ट कर चुके थे मैं भी प्लेटफार्म की सीढ़ियों की ओर बढ़ चला, अचानक मैंने अपना चेहरा पिता को देखने के लिए उनकी ओर घुमाया, देखा..! वह धीरे-धीरे चले जा रहे थे...मैं वहीँ स्थिर हो गया जैसे उन्हें भर-पूर आँखों से देख लेना चाहता था...मैं...ऐसे ही जब तक वे ओझल नहीं हो गए तब तक उन्हें देखता रहा....असहाय सा जैसे समय को क्षण-क्षण मुट्ठी से फिसलते हुए देख रहा था...अब वास्तव में अँधेरा काफी गहरा गया था...!
                             -----------------------------------विनय       

बुधवार, 11 मार्च 2015

ये निठल्ले शब्द

          न जाने क्यों कई दिनों से मन में बेचैनी सी छाई हुई थी..इसका कारण खोजने लगा तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था..फिर अपने अन्दर डुबकी लगाने की सूझी...जैसे सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा जी बिष्णु की नाभि-कमल की नाल में इसका उद्गम स्थल खोजने के लिए नाल के अन्दर उतर जाते हैं...खैर..ब्रह्मा जी को कमल-नाल का कोई ओर-छोर नहीं मिला था। लेकिन मेरी समस्या इतनी अनंत नहीं थी...! खोदा पहाड़ निकली चुहिया के अंदाज में मुझे मेरी बेचैनी का कारण भी मिल गया...! हाँ इधर कई दिनों से कुछ लिख नहीं पाया था, यही न लिख पाना ही मेरी बेचैनी का कारण था...! अब ब्रह्मा जी तो अपने सृष्टि-कमल पर अकेले ही बैठे थे, फलतः अपनी समस्या का अनंत व्याख्यान लिख गए जिसका धर्म हम सब आज तक निभाते आ रहे हैं...। लेकिन...भले ही शब्द ब्रह्म हो, इस सृष्टि-धर्म के चक्रव्यूह में इधर कई दिनों से हम कुछ लिख नहीं पा रहे थे...क्योंकि अब इस विकसित सृष्टि में हम अकेले तो हैं नहीं...!
           उस दिन लिखने की कोशिश की तो श्रीमती जी ने तमाम उपाधियों से हमें विभूषित कर दिया। अंत में पूँछा कि आपके इस लिखने-विखने में क्या फायदा..? ये भी तो नहीं कि कहीं छपते हो कि दो पैसे की आमदनी हो रही हो और घर चले...। नौकरी करो और कभी समय मिले तो लिखने बैठ जाओ..., मैं ही एक वेबकूफ हूँ जो घर की चक्की में पिसती रहती हूँ...! अब इतनी बातें सुन किसमें लिखने जैसी निठल्लेपन की हिम्मत बचेगी..? मैं भी शब्द को ही ब्रह्म मानने की बात को भूल समझ श्रीमती जी की सृष्टि का एक प्यांदा बन गया...और लेखकीय जैसे धतकर्म से मन उचट गया..। 
           इस दौरान मैं उन्हें बराबर लिखने के महत्त्व को समझाता जा रहा था, जैसे कि..देखो भाई शब्दों का अपना महत्त्व होता है..। वह छपे या न छपे लेकिन शब्द अमर्त्य होते हैं, तभी तो..जब कोई बात निकलती है तो दूर तक जाती है...! मैंने उन्हें यह भी समझाया कि अपने शब्दों से ही कोई पप्पू..फेंकू..या कुछ भी हो जाता है..और.…इन्हीं शब्दों से कोई अपने लिए सत्ता की सृष्टि रच लेता है...तथा...इन्हीं शब्दों से ही आप का बंटाधार भी हो सकता है...क्योंकि शब्दों से तमाम ‘अर्थ रूपी माया’ जुड़ कर तरह-तरह का व्यावहारिक जगत निर्मित होने लगता है। इस व्यावहारिक जगत में कहनेवाला-सुननेवाला दोनों अपने-अपने तरीके से प्रवृत्त हो जाते हैं...! फिर, मैंने उन्हें यह भी समझाने की कोशिश की कि पहले के ऋषि-मुनि कौन सा छपने के लिए लिखते थे..! आखिर उन्हीं के लिखे को पढ़-पढ़ कर हमने भी अपनी यह सृष्टि रच ली है, मेरा कहने का मतलब दो जून की रोटी के जुगाड़ वाली इस नौकरी को पा लिए हैं...। आगे मैंने फिर कहा, “देखो यह सब न सही..तुम तो जानती ही हो कि मैं कोई नशा-पाती तो करता नहीं..! मेरे लिए समझो यही नशा-पाती है...लिख कर मैं अपने तमाम स्ट्रेस दूर कर लेता हूँ..छपना-वपना मेरे लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है..!” इस पर श्रीमती जी बोली, “अरे..जब छ्पोगे-वपोगे नहीं तो इस लिखने का क्या मतलब...आखिर तुम्हारे विचारों को भी लोग कैसे जानेंगे..?”   
          उनके इस मौंजू प्रश्न पर मैंने अपनी लफ्फाजी को थोड़ा और आगे बढ़ाया...। अब उन्हें समझाने के लिए मैंने साइंस का सहारा लिया। इसके लिए मुझे ‘उर्जा संरक्षण का नियम’ मुफीद लगा...! मैंने श्रीमती जी को समझाने की कोशिश की..देखो उर्जा कभी ख़तम नहीं होती उसका रूप भले ही बदल जाए...! उसी प्रकार शब्द भी एक उर्जा हैं, यदि शब्द गढ़ लिए गए तो उसका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता और वह छपे तभी उसका महत्त्व है ऐसा नहीं...! देखो जिन शब्दों को हम गढ़ते हैं, कहीं न कहीं इस सृष्टि की निरंतरता में उनका योगदान होता है...! ये शब्द कभी व्यर्थ नहीं जाते इनका कोई न कोई सामाजिक योगदान तो होता ही है...। स्थितियां-परिस्थितियाँ तक इन्हीं शब्दों के बल पर बदल जाती है..।कम से कम इसी बहाने समाज-सेवा ही करने दो...! अब श्रीमती जी की झल्लाहट उभर आई...! बोली, “देखों बातों से पेट नहीं भरता...! तुम्हारे निठल्ले से इन शब्दों से क्या मिलने वाला है, तुम्हें तो जैसे हम सब की परवाह ही नहीं...!” यह सुनते ही मैं बोल पड़ा, “यह तुम कैसे कहती हो..? यह पूरी जिंदगी तुम्हारे लिए कुर्बान है...तुम सब की परवाह करने के कारण ही मैं, मैं हूँ...।”
         मैं समझ गया था कि इस समय लिखना बड़ा मुश्किल है...यह सोचते ही मैंने बड़े मीठे अंदाज में कहा, “अच्छा सुनों...जरा चाय बना सकती हो..?” सुन श्रीमती जी ने मेरी ओर देखा और किचेन में चली गयीं..। अगले कुछ पलों बाद मेरे हाथ में चाय का कप था...! हाँ, अब मैं मुस्कुरा रहा था...। उनके मेरे इस मुस्कराहट का कारण पूँछने पर मैंने कहा, “यह चाय का कप भी मेरे शब्द ‘कुर्बानी’ का असर है...! देखा शब्द भी पेट भर देते है..।” श्रीमती जी मेरी बात को समझ गयीं…आँखे तरेरी..,जैसे कह रही हों कि स्त्रियों की भावनाओं को तुम पुरुष गंभीरता से नहीं लेते...। मैं भी लिखने की बेचैनी लिए ही लिखने की टेबल से उठ गया था..!
         लेकिन आज कई दिनों बाद छुट्टी के दिन मैंने अपनी इस बेचैनी को दूर करने की ठान ली..। किसी को ‘पाती’ लिखना था...! सुबह-सुबह ही सुपुत्र जी के कक्ष में प्रवेश किया...। कलम-कागज़ का युग तो अब समाप्त प्राय है, सो उन्हीं के कंप्यूटर पर अपने शब्द-ब्रह्म को उतारने की सोची...। लेकिन यह क्या..! सुपुत्र महोदय भी सबेरे-सबेरे ही अपने कंप्यूटर पर गेम खेलने में जुटे पड़े है...! ओह इन्हें इनके कंप्यूटर से बेदखल करना इस समय बड़ा मुश्किल काम है...! हालांकि ये जानते हैं कि श्रीमती जी के डर के कारण मैं इनके कंप्यूटर चेयर पर कम से कम लिखने के लिए काबिज नहीं हो सकता वह भी इनको इससे जबरदस्ती उठाकर...! लेकिन मेरी बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी, मैं मन ही मन उन्हें उठाने की तरकीब सोचने लगा...। अचानक ही मन में तरकीब कौंधी...! एक पारंपरिक पिता की कठोरता ले नाटकीय अंदाज में सुपुत्र के मर्म पर प्रहार किया, “सुबह-सुबह ही कम्पूटर पर गेम खेलने बैठ गए...जब देखो तब गेम खेलते रहते हो...इसी कारण पिछली परीक्षा में कम नंबर मिले थे...क्यों अपनी बर्बादी पर तुले हो...!” जैसा मैंने सोचा था मेरा तीर निशाने पर लगा था, सुपुत्र महोदय कंप्यूटर को ऑफ कर पैर पटकते हुए एक झटके से अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए, और मुझे घूरते हुए पास में ही पड़ी पढ़ने के मेज पर चले गए..। इधर मैं भी बिना समय गँवाए उनकी कुर्सी पर धम्म से बैठ गया जैसे मुझे अपने मन की मांगी मुराद मिल गयी हो..। 
                मैंने कम्पूटर ऑन किया, की-बोर्ड पर उंगलियाँ चलने लगी थी...मतलब मैं ‘पाती’ टाइप कर रहा था...। इस बीच अपने पढ़ने की मेज से सुपुत्र जी बीच-बीच में मुझे अपने आग्नेय नेत्रों से घूर लिया करते थे, जैसे कहना चाह रहे हों कि अपने लिखने के चक्कर में मेरा खेल बिगाड़ दिए हो मैं भी देख लुँगा..। मैं भी लिखते हुए कनखियों से, मुस्कुराते हुए, उन्हें इस भय के साथ देख लिया करता कि कहीं अपनी माता जी से मेरी पोल न खोल दें..। कुछ देर बाद श्रीमती जी भी आयीं और मेरे बगल में ही कुर्सी खींच बैठ, मुझे लिखते हुए देखती रही।इधर एक अज्ञात भय लिए लिखने की मेरी तन्द्रा भंग सी होने लगी, लेकिन मुझे इस लेखकीय धर्म को निभाते देख श्रीमती जी ने कोई टिप्पड़ी नहीं की..। कुछ देर बैठकर वह फिर घरेलू कार्य निपटाने चली गई, ऐसा उन्होंने दो बार किया..! दूसरी बार तो जैसे मुझे कुछ टोकते-टोंकते रह गयी हों...। मैं अपने शब्द-ब्रह्म की माया में ही उलझा रहा..! अचानक घर की लॉबी से उनका स्वर सुनाई पड़ा, “तुमको तो लिखने से ही फुर्सत नहीं...मुझे भी अपने एक काम से मार्केट जाना है..।” मैं चौक गया...! यह प्लान तो लग रहा है जैसे मेरे लिखते रहने की भावना से आचानक उपज आई है, क्योंकि किसी मार्केटिंग की पहले से कोई योजना तो थी नहीं..! मेरा लिखने का काम पूरा होने वाला ही था, इसे पूरा करने का लोभ संवरण मैं नहीं कर पाया..., बोल पड़ा, “यार बस हो गया है..दो लाइन और बचा है..इसे पूरा कर उठता हूँ..।” इधर सुपुत्र जी अपनी माँ की आवाज सुन मुस्कुराते हुए कनखियों से मुझे देखने लगे, जैसे कहना चाहते हों कि लिखो-लिखो और लिखो, अब मजा आएगा...! श्रीमती जी ने लगभग पांच मिनटों तक मेरे उठने का इंतज़ार किया फिर मार्केट चली गयीं...। 
                   श्रीमती जी के जाने के कुछ क्षण बाद ही लिखने का मेरा काम पूरा हो गया...। मैं उठ गया, देखा तो वे जा चुकी थीं...लॉबी में आ, पसर कर मैं टी.वी. देखने लगा था..। लगभग डेढ़ घंटे बाद वे लौटी..., लॉबी में इत्मीनान से मुझे बैठे देख जैसे उन्हें तसल्ली नहीं हुई, मुझसे न पूँछकर सीधे सुपुत्र जी से पूँछा, “क्यों ये कब तक लिखते रहे..?” सुपुत्र जी भी जैसे मुझसे बदला लेने के ही इंतज़ार में बैठे थे...। श्रीमती जी के यह पूंछने भर की देरी थी कि झट से बोल पड़े, “अरे...मम्मी आपके आने की आहट सुन अभी-अभी पापा कम्प्यूटर छोड़े हैं...जबकि मैंने कहा था कि मम्मी नाराज होंगी...लेकिन पिता श्री नहीं माने..।” सुनते ही मैं तत्काल बोल पड़ा, “नहीं...ये महाशय झूँठ बोल रहे हैं..! मेरा काम तो उसी समय समाप्त हो गया था...मैं डेढ़ घंटे से बैठा टी.वी. देख रहा हूँ..।” लेकिन मेरी इस बात का श्रीमती जी पर कोई असर नहीं हुआ और इसे होना भी नहीं था...वे आईं...मेरे बगल ही दीवान पर बैठ गयी, बोली, “केवल अपने लिए जीते हो...नौकरी करो और यदि उससे समय बचे तो लिखो...स्वार्थी हो..बाकी परिवार की जैसे कोई जिम्मेदारी ही नहीं...सुनो यह नौकरी कर तुम भी मेरे ऊपर कोई अहसान नहीं करते हो...मैं भी बच्चों को पालती हूँ...घर का सारा काम करती हूँ..।” मुझे लगा जैसे श्रीमती जी यह कहते-कहते कुछ रूवांसी सी होने लगी थी। मैंने बात को यह कहते हुए सँभालने का प्रयास किया कि तुम गलत समझ रही हो इधर कई दिनों से कुछ लिखा नहीं था..मन में अचानक एक विचार कौंधा सोचा उसे लिख डाले...बस..। 
                  “बड़े आए विचार वाले...! तुम्हीं एक विचार वाले हो...? सुनो..अगर मैं अपनी कहानी और विचार लिखने बैठ जाऊँ तो पूरी एक किताब बन जाएगी...लेकिन मुझे घर-बच्चों के लिए समय देना है, यही मेरी किताब और यही मेरी कहानी है..इसे लिखने की मैं जरुरत नहीं समझती...समझे..!” श्रीमती जी ने कहा। मेरा कोई उत्तर उन पर असर नहीं कर रहा था..। बचाव की मुद्रा छोड़ते हुए जैसे ही मैंने कहना चाहा, “तुम भी तो...” इस पर तुरंत श्रीमती जी बोल पड़ी, “सबेरे से ही लिखने बैठे हो...मैं क्या करती..? मुझे भी अपना काम करना था...मैं भी चली गई..! और सुनो...तुम जो मोबाइल खरीदने की बात कर रहे थे..अब नहीं खरीदुंगी..घर के अन्य कामों के लिए भी पैसों की जरुरत है..तुम निठल्ले..तुम्हारे शब्द निठल्ले...!” हाँ...कुछ दिन पहले ही मैंने एक अच्छे फोन खरीदने की अनुमति श्रीमती जी से मांगी थी..कारण..राह चलते भी अपनी भाषा में मैं कुछ लिख सकूँ...लेकिन उनकी यह बात सुनते ही मैं हँस पड़ा..और बोल पड़ा, "जैसी तुम्हारी मर्जी...हाँ पहली बार पता चला कि शब्द भी निठल्ले होते हैं...!" और मैंने उनसे उसी समय कह दिया था कि तुम्हारी आज की इस कहानी को मैं अपने निठल्ले से शब्दों में व्यक्त कर दुँगा...!
               जैसे बहुत बारिश हुयी हो जिससे किसी नदी में बाढ़ का पानी उफान मारने लगा हो..तथा यह नदी अपने साथ सब-कुछ बहा ले जाना चाहती हो...लेकिन इस बारिश के गुजर जाने के बाद धीरे-धीरे यही नदी सागर की ओर बहते हुए फिर शान्त हो जाती है...! स्त्री की मनोदशा इसी नदी के सामान ही होती है उसके भी आवेग संवेग शायद ऐसे ही होते है...और....सागर भी अपनी अतल गहराइयों को लिए तमाम लहरों को अपने में समेटते हुए धीर-गंभीर ही बना रहता है...लेकिन अपने वाष्पन से नदी को जल भी देता रहता है...! इसी सागर के सामान शायद यह पुरुष होता है...हम दोनों अपनी-अपनी भूमिकाओं को निभाते जा रहे थे...दोनों का अस्तित्व एक दूसरे पर ही निर्भर करता हैं..अतः हम दोनों अपनी सीमाओं को समझते हुए एकदम शान्त-चित्त हो चुके थे....! 
               आज मैं जब अपने इन्हीं निठल्ले शब्दों को व्यक्त कर रहा था तो टी.वी. समाचार में किसी बड़े आदर्शवादी नेता के कहे राजनीतिक शब्दों का स्टिंग चल रहा था..और उनके इन शब्दों से उनकी नई-नई उभरी राजनीतिक पार्टी में विभाजन जैसा राजनीतिक भूचाल खड़ा हो गया है..! पहली बार मेरे समक्ष यह भी प्रमाणित हो गया कि उन शब्दों का क्या मतलब जो भूचाल न लाए...! यदि शब्द भूचाल नहीं ला पाते तो फिर वे निठल्ले ही माने जाएंगे...!  
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शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

प्रेम; एक अनकहा अहसास

             भरी दोपहरी में टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर वह चला जा रहा था...सूर्य की तीखी किरणें उसके शरीर को बेधती जा रही थी...उसका विश्रांत-क्लांत मन छाया की तलाश करने लगा...जहाँ..वह दो पल ठहर विश्राम कर ले...और...फिर अपने गंतव्य की ओर बढ़ चले...लेकिन दूर-दूर तक उसे कोई ऐसा आश्रय-स्थल नहीं दिखाई दे रहा था....आखिर वह चला ही जा रहा था...!
             यकायक..! दूर क्षितिज में उसे एक दृश्यावली उभरती हुई सी दिखाई पड़ी...कहीं कोई यह मृग मरीचिका तो नहीं...! यह पथ...! हाँ इस भरी दुपहरी में वह ऐसी ही तमाम मृग-मरीचिकाओं का ही तो सामना करते हुए चला जा रहा है...दूर की यह दृश्यावली भी कहीं इन्हीं मरीचिकाओं का हिस्सा तो नहीं...? उसने अपनी आँखों को दोनों हाथों से मला...अरे..! नहीं दूर यह पेड़ों के समूह ही हैं...शायद कोई जंगल हो..उसे एक आस बंधी...कुछ क्षण वह किसी पेड़ के नीचे सुस्ता लेगा...
         अब यह पगडंडी उस जंगल में प्रवेश कर रही थी...ऊँचे-ऊँचे पेड़ों की सघन छाया उसे अब भाने लगी थी...ये विशाल और ऊँचे-ऊँचे पेड़ और इनकी छायाओं में उसका मन विश्राम की तलाश करने लगा...ऐसे ही एक विशाल पेड़ को उसने अपना विश्राम-स्थल चुन लिया...तने की टेक लिए बैठे हुए उसके थके मन और शरीर को उस वृक्ष की सघन छाया माँ की गोंद का अहसास देने लगे थे...यह सोचते हुए धीरे-धीरे उसकी आँखें बंद हो रही थी...काश, इस वृक्ष की ये डालियाँ अपने कोमल पत्तों से उसे तनिक सहला देती...थपकी भरा प्रेम का एक अहसास मिलता..! धीरे-धीरे उसकी आँखें बंद होने लगी...वह सपनों में खो गया था...
        ....नहीं-नहीं वह निर्दयी नहीं है...हाँ वह किसी को सहलाता नहीं..किसी को थपकी नहीं दे पाता..किसी के सिर पर हाथ नहीं रखता...वह भी तो तन कर खड़ा रहता है...अरे हाँ...! ये उसके हाथ...! नहीं-नहीं ये उसके हाथ नहीं...ये..! ये..!! ये तो डालियाँ हैं..! रोयें नहीं पत्तों से भरी डालियाँ...! हाँ उसके शरीर पर डालियाँ उग रही हैं...पत्तियों से भरी तमाम डालियाँ..! वह कितना प्रसन्न है...!! लेकिन वह निर्दय है...? तना है...खड़ा है...वह कैसा वृक्ष है...? वह अपनी डालियों को झुका नहीं पा रहा है...अपने कोमल पत्तों से देखो न वह किसी को प्रेम की थपकी भी नहीं दे पा रहा है..! लेकिन...लेकिन...तुम्हें धूप नहीं लगने देगा...दो शब्द तुम्हारे लिए बोल नहीं पाएगा...लेकिन...! निश्चिन्त सा तुम शरीर पर उगी इन डालियों और इसके पत्तों की छाया में विश्राम कर लो...वह तना रहेगा, बस उसके शरीर पर ये डालियाँ ऐसे ही उगी रहें...! अपनी इन डालियों और पत्तों में तो वह सूरज की गर्मी को तो स्वयं सोख लेगा...! लेकिन...एक अनकहा अहसास लिए तुम्हें धूप और गर्मी से बचाते तुम्हारे लिए इसी तरह छाया देता रहेगा...!!

         अरे...! ये चेहरे पर गर्मी कैसी..! धीरे-धीरे आँखें खुली... ओह..! ऊँचे तने की टहनी की कोई पत्ती हिली थी...क्षण भर के लिए पत्तियों के झुरमुट से दोपहर के सूरज की तीखी किरणें चेहरे पर आ पड़ी थी...उसने देखा..यह तो धनेश है...! डालियों के फुनगियों पर जो धीरे-धीरे सरक रहा है...शायद इसी कारण पत्तियाँ हिली थीं...हाँ उस धनेश को भी तो अपने हिस्से के आश्रय स्थल की तलाश थी...और...वृक्ष निश्चित ही तुम निर्दय नहीं हो...सबके हिस्से का अनकहा अहसास बाँटते जा रहे हो..! जागते ही उसने सोचा.....!!

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

ये नुकीली सींग वाली काली भैंसें...!

           बाने...! हाँ..शायद यही नाम था उनका...हम बच्चे उन्हें कभी-कभी ‘बाने बबा’ कह कर संबोधित कर लेते..।एक दम आम आदमी जैसा रूप रंग...और..उसी तरह के हाव-भाव...! हाव-भाव तो छोड़िये लोगों का उनके प्रति यही नजरिया भी था...नजरिया माने..वे शक्तिहीन...अधिकार विहीन...दूसरों की दया पर निर्भर रहने वाले जीव थे। जिस तरह इस सिस्टम में एक आम व्यक्ति उपेक्षित होता है ठीक उसी प्रकार से थे वे...! उपेक्षित से ही तो थे वे..!! घर पर पशुओं को चारा देना..., उन्हें इस नाद से उस नाद बाँधना.., या फिर बैलों के काधें जुआ चढ़ा और हल अपने काधें रख खेतों की और निकल जाना...फिर..शाम ढले खेत की जुताई कर घर वापस आना...! यदि इन सब से फुरसत मिलती तो शाम को हमारे घर आना...और...बाबा, दादा जो भी होता उनकी ओर यह कहते हुए हाथ बढ़ाना कि “भईया रचि के सुरतिया खियऊता..” फिर सुरती लेते और उसे हथेली पर ले अंगूठे से मलते, दो-चार गप्पे लड़ाते कुछ क्षण बिताते..! इसी बीच उनके घर से आवाज हमारे घर तक पहुँचने लगती... “अरे..बाने...हे..बाने..! ई कहाँ गवा...देखा..अ..ई बनवा..निकलि लेहसि...” फिर सुरती मुँह में रख यह कहते हुए अपने घर वापस होते “देखी भईया का बात हवई...अबई त बरधन (बैलों) क सानी पानी दई क आये ह..” हाँ तो.…लगभग यही दिनचर्या थी उनकी...! जो कई वर्षों तक हमारी आँखों से गुजरती रही..। 
         गाहे-बगाहे बाने को परिवार का विशिष्ट सदस्य होने का सम्मान भी मिल जाता जैसे हमारे भारतीय लोकतन्त्र में चुनाव के समय जनता को मिलता है...! अकसर शादी-विवाह या फिर किसी अन्य पारिवारिक उत्सव जैसे अवसर पर वे भी नए धोती कुरते में दिखाई दे जाते...! इस क्षण उनके परिवार वाले बाने को बड़े भाई, दादा या चाचा होने का गौरव भी प्रदान कर देते...! लेकिन हम बच्चे उनके इस नए रूप को देख कर उनसे चुहल करने लगते...! कभी उनके पहने कुरते के बारे में उनसे पूँछते तो कभी उनकी नई धोती के बारे में पूंछते...और...वे भी अपने इस नए रूप से उपजी प्रसन्नता को दबा न पाते..! इनका बखान करते जाते...हाँ हमारी उनसे यह चुहल भी ठीक उसी तरह की होती जैसे आज के चुनाव के अवसर पर आम जनता को उसकी स्थिति का भान कराते हुए नेता अपने नए-नए वादों के साथ आम जन से चुहलबाजी करते हैं...!! लेकिन इतना तो तय था बाने बबा की अपने परिवार में कोई औकात नहीं थी...जैसा कि आम आदमी का इस सिस्टम के आगे...!
         धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य के द्वंद्व से परे अविवाहित बाने किसी भी आशा आकांक्षा से शून्य जैसे आज के उस मेहनत-कश आम आदमी की ही तरह थे जिसके लिए ये व्यर्थ के सरोकार होते हैं...और इन झमेलों से जैसे उसे कोई मतलब नहीं...! और बाने भी इन सभी झमेलों से मुक्त आस-पास से बेखबर सुरती खाने की एक तुच्छ सी तलब लिए अपने काम से फुरसत पा टहल लेते थे...! हाँ तो...बाने बबा अपने सुरती खाने की तलब को दबा नहीं पाते थे...और जब यह तलब जोर मारती तो वे हमारे घर का रुख कर लेते...हमारे यहाँ भी तो इसके तलबगार होते...! बाने की यह तलब आम आदमी की रोजमर्रा की रोटी दाल चलती रहे जैसी जरूरतों के समान ही होती...एक तुच्छ सी जरुरत...! इसी के पूरा होने में पूर्ण संतुष्टि का भाव...!! उनके इस तलब को हम-उम्र बच्चे भी इसी तुच्छ भाव से लेते और उन्हें आते हुए देख हम आपस में कह उठते, “देख..अ...बाने सुरती खाई आवत अहैंन..” और सुरती बनाते ठोंकते बाने की ओर हाथ बढ़ाते ददा..बबा..चचा..जो भी होते कहते जाते, “बाने क परिवार वाले सुरतियौ नाईं खरीदी कै इन्हईं दई सकतेन..” और बाने इन सब से बेखबर...सुरती पा गर्वित हो जाते...!
        ऐसे ही एक दिन बाने हमारे घर की ओर आते हुए दिखाई दिए...उन दिनों किशोरावस्था के अंतिम पायदान पर हम पहुँच रहे थे....हमारे एक दम पड़ोस के चाचा के यहाँ एक नुकीली सींगों वाली काली भैंस हुआ करती थी...उसे हम मरकहिया भैंस कहते थे...वह भी कम नहीं थी...! आए दिन पता नहीं कैसे खूंटे से पगहा निकाल इधर-उधर झौंकारती-फुफकारती निकल पड़ती और हमारे चचा को हाथ में लट्ठ लिए पीछे-पीछे पूरे गाँव का चक्कर लगवाती, तब कहीं जाकर वापस अपने खूंटे पर आ खड़ी होती..। उस दिन संयोग से बाने को सुरती खिलाने वाला हमारे घर पर कोई नहीं मिला। मुझे अकेला देख हाल-चाल पूँछ आगे अपनी चिर-परिचित तलब मिटाने चचा के घर की ओर चल पड़े, ठीक उसी समय मरकहिया भैस खूँटा तुड़ा चुकी थी...लेकिन बाने आम आदमी की तरह इस संभावित खतरे से अनजान अपनी तलब की रौ में ही थे...इस बीच उस भैस से मेरा भी ध्यान हट चुका था...तभी बाने का आर्त्र स्वर “अरे ई मारेसि...बचावा भईया...!” सुनते ही मैंने बाने की ओर देखा, अरे..! बाने तो पीठ के बल जमीन पर गिरे थे...और नुकीली सींगों वाली मरकहिया भैस अपनी सींगों के साथ सिर को बाने के पेट पर गड़ाए हुए थी....बाने छटपटा से रहे थे...मैं अपनी औकात की चिंता न कर अगले ही पल उस भैस की सींगों को पकड़ अपनी पूरी ताकत से बाने के पेट से उसे उठा कर झटकने की कोशिश करते हुए उससे भिड़ सा गया...! मेरे इस अप्रत्याशित हमले से घबड़ा कर अपने सींगों को मेरे हाथ से झटक वह मरकहिया भैंस भाग खड़ी हुई...! फिर किसी तरह झाड़ पोंछ कर बाने को सहारा देते हुए मैने उन्हें खड़ा किया...बाने के मुँह से बस इतना ही निकला, “अरे बाबा...अबहीं ई त हमईं मारि डालेसि रही..” और मैं किसी के जीवन की रक्षा करने के गर्व से भर गया था...! हालांकि मेरे लिए गर्व करने लायक यह कोई विषय नहीं था...क्योंकि...किसी की सहायता करना भी जीवों की स्वाभाविक प्रवृत्ति या जैविक गुण होता है...और तत्क्षण की मेरी प्रतिक्रिया जीवों की इसी स्वाभाविक प्रवृत्ति का प्रगटीकरण था...इसमें गर्व कैसा...?
       इस घटना के घटित होने को आज कई वर्ष हो आया है...यहाँ तक कि बाने को भी गुजरे कई वर्ष बीत चुका है...हाँ इस घटना का स्मरण मुझे उस समय हो आया था...जब कार्यस्थल पर ‘बाने’ जैसे एक सहकर्मी को ‘नुकीली सींगों वाली काली भैसों’ से उलझते पाया...और ताकतवर लोग उस ‘बाने’ को अपनी ताकत का अहसास इस आशय से करा रहे थे कि वे स्वयं सभी खतरों से बचने में सक्षम हैं...और तुम ‘बाने’ हो..! इन नुकीली सींगों वाली भैसे अपनी ताकत का भ्रम फैला 'बाने' को डराती रहती हैं.…, तब उस ‘बाने’ ने मेरी और आर्त्र भाव से देखा था...तभी अपनी यह भैंस वाली कहानी मुझे याद आई.…मैंने अपनी यह कहानी उसे सुनाई...तो उस बाने ने मुझसे पूँछा था, “तो क्या मैं भैस की नुकीली सींगों से निश्चिन्त रहूँ...?” मैंने भी कुछ ऐसा ही आश्वासन दिया था...यह वैसा ही था जैसे एक ‘बाने’ दूसरे ‘बाने’ को आश्वासन दे रहा हो...!
        और हाँ इस कहानी के याद आने का एक और दूसरा कारण भी है...एक तो ये ‘नुकीली सींगों वाली काली भैसे’ हमेशा आम आदमी के पेट पर ही हमला करती हैं...और उन्हें बचाने वाला कोई ताकतवर नहीं होता बल्कि वह भी उन्हीं जैसा एक आम आदमी ही होता है...लेकिन जब यह पूरी शिद्दत से इन ‘सींगों वाली भैसों’ से भिड़ता है तो ये ‘भैंसें’ भाग खड़ी होती हैं, और पूरा मैदान इन्हीं के हाथ में आ जाता है...लेकिन बाने को कोई विजयोत्सव भी नहीं मनाना चाहिए यह तो उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है...चलो इतना ख़ुशी तो मना ही सकते हैं कि एक ‘बाने’ भी इन ‘नुकीली सींगों वाली काली भैसों’ के सामने विजयी हो सकता है...जैसे उस मरकहिया भैंस के सामने मेरी कोई औकात नहीं थी फिर भी मैं बाने को बचाने में कामयाब हुआ था...। हस्तिनापुर नामक राज्य का चुनाव भी इसका प्रमाण है... 

         हर सिस्टम के अपने-अपने ‘बाने’ हैं और ‘नुकीली सींगों वाली काली भैंसें’ हैं...और ये नुकीली सींगों वाली काली भैंसें बाने जैसों का शिकार कर ही ताकतवर होने का भ्रम पाले रहती हैं.…यदि इसकी सींगों से कोई बचाएगा तो वह भी ‘बाने’ ही होगा क्योंकि उसे ‘बाने’ होने की पीड़ा का भान रहता है...बाकी सब नुकीली सींग लिए फिर रहे है....     

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

एक महीन सी सीमा रेखा...!

           हाँ..अलसाए हुए से थे वह..! लेकिन मुझे देख चहकते हुए बोले, “आइए..आइए..! यार..मैं इधर कई दिनों से आपकी ही प्रतीक्षा में था...” मैं थोड़ा सा विस्मित होते हुए उनसे पूँछा, “अरे..क्या बात हैं..यह चहकना कैसा..?” मित्र ने कहा, “भइये..तुम तो जानते ही हो...जब मैं किसी उलझन में या प्रश्नों के चक्रव्यूह में होता हूँ तो तुम ही याद आते हो..! तुमसे दो-चार बातें कर मन को थोड़ा शान्त कर लेता हूँ..!” “भाई मेरे..! बड़े मतलबी हों..मैं आपका मित्र न होकर गोया कोई instrument हूँ..जिससे खेल कर तुम अपना मन बहला लेते हो...” मैंने अपना यह वाक्य अभी पूरा ही किया था कि मित्र ने मेरी बाँह पकड़ सोफे पर अपने पास ही बैठा लिया तथा कुछ क्षणों का विराम ले, यह कहते हुए कि “नहीं यार ऐसी कोई बात नहीं, अपने लंगोटिया यार पर इतना अधिकार तो होना ही चाहिए..” एक पुराने अखबार का पेंज मेरे सामने कर दिया| जब मैं कुछ समझ नहीं पाया तो मित्र ने अखबार की एक हेडलाइन पर अपनी ऊँगली रखा और उसे पढ़ने के लिए मुझसे कहा, वह पन्ना कुछ दिनों पुराना हो चला था...! मैंने सोचा, “तो इस पन्ने को मुझे पढ़ाने के लिए ही कुछ दिनों से संरक्षित कर रखा है इन्होंने..!” खैर..मैंने खबर पढ़ी |
        अखबार में छपी खबर कुछ इस प्रकार की थी... ‘एक व्यक्ति चोरी करने की नियत से रात में बैंक में घुसा लेकिन चोरी नहीं कर पाया फिर वह बैंक शाखा प्रबंधक के नाम एक मार्मिक सा पत्र लिख चोरी किये बिना वापस चला आया | उस पत्र में उसने अपनी कुछ मजबूरियों के कारण बैंक में चोरी करने की कोशिश करने का उल्लेख किया था...!’ इसे पढ़ने के बाद मित्र के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कराहट उभरते मैंने देखा और उनसे कहा, “इसमें मुस्कुराने की क्या बात है...वह चोरी नहीं कर पाया...बैंक में चोरी करने का निर्णय उसने मज़बूरीवश लिया...बेचारा...!” अकस्मात मित्र थोड़ा गंभीर हो कर बोले, “यदि बैंक में ही वह उस रात पकड़ लिया जाता तो उसके साथ क्या होता...? शायद जीवन भर के लिए उसे अपराधी घोषित कर दिया जाता...! या वह चोरी करने में सफल हो जाता तो शायद इससे प्रोत्साहित हो और चोरियां करता..!” एक गहरी स्वांस लेते हुए मित्र ने फिर कहा, “उसके द्वारा चोरी के प्रयास की सफलता या पकड़े जाने पर क्षण मात्र में उसकी दुनियाँ बदल जाती...और...अभी भी यदि वह पकड़ा जाता है तो बैंक में चोरी करने के प्रयास में उसे गिरफ्तार किया जा सकता है..! पल भर में एक चोर का तमगा पा लेगा...लेकिन...हो सकता है इस समय अपने घर में बैठा वह पश्चात्ताप की आग में जलते हुए भविष्य में फिर ऐसा काम न करने की मन ही मन कसमें खा रहा हो...!”
        मैंने मित्र की बातें सुनी...इस समय हमारे बीच सन्नाटा पसर गया था...मित्र ने मेरी ओर देखा, “बताओ...क्या उसे सजा मिलनी चाहिए..?” मेरे कुछ समझ में नहीं आया और मैं चुप ही रहा| मित्र महोदय को मुस्कुराते देख मैं कुछ खीझते हुए बोला, “यार इसमें मुस्कुराने की कौन सी बात आ गयी...!” लेकिन मेरी इस बात से बेपरवाह वह बोले, “याद है...!” मैंने उनकी तरफ जिज्ञासु आँखों से देखा...मुस्कुराते हुए मित्र मेरे इस जिज्ञासु भाव से जैसे उत्साहित हो गए तथा अपनी बातों को थोड़ा रहस्यात्मक आवरण में लपेटते हुए बोले, “जब हम दोनों शहर में पढ़ते थे...!” लेकिन मुझे कुछ याद नहीं आ रहा था...मित्र ने याद दिलाने की कोशिश की, “अरे भाई...जब हम दोनों किसी काम से शहर के ही एक कालेज में गए थे...उस समय हम दोनों के बीच में एक ही साइकिल हुआ करती थी....” मित्र के इतना कहते ही मुझे वह पूरी घटना याद आ गई..! जो इस प्रकार थी...
        ....हम दोनों उन दिनों पढ़ाई के लिए शहर में एक साथ रहते थे...हमारे बीच वही एक साइकिल थी जिसे हम बारी-बारी से इस्तेमाल कर करते थे..! हाँ वह साइकिल मित्र की ही थी...उस दिन कालेज के बाहर साइकिल खड़ी कर हम कालेज-कैम्पस में चले गए थे...कुछ देर बाद वापस आने पर हमें अपनी साइकिल नहीं मिली...! हम परेशान हो उठे...हमारी साइकिल को कोई उठा ले गया था...! हाँ...साइकिल चोरी हो चुकी थी...हमें गुस्सा भी बहुत आया था...! फिर वहीँ कालेज के बाहर हम दोनों एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ आपस में बातें करते जा रहे थे...कि...अचानक हम दोनों को वहीँ से एक साइकिल चुराने की बात सूझ गई...! फिर हमने तय करना शुरू कर दिया कि कौन सी साइकिल उठाई जाए...! अकस्मात् मेरी निगाह एक पुरानी सी साइकिल पर...जो कालेज की बाउंड्रीवाल के सहारे उपेक्षित सी खड़ी थी...पड़ी...! हम दोनों ने उसी साइकिल को उठाने का निश्चय किया...! हममें अब इस बात पर उधेड़बुन मची थी कि कैसे उस साइकिल को ले आएं..! यह सोचते-सोचते काफी देर तक उस साइकिल को देखते हुए हम यूँ ही बैठे रहे...|
        ...तभी हमने देखा...! बेहद गरीब सा दिखाई देने वाला एक विकलांग लड़का उस साइकिल के पास आया और उस साइकिल को ले चल पड़ा...! हाँ...यह साइकिल उसी की थी, ध्यान से उसे जाते हम देखते रहे..! हम दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और अपनी मद्धिम हँसी को दबा दिए लेकिन अगले ही पल हम सिर नीचा कर जमीन की और देखने लगे थे...! फिर...हम अपने-अपने चेहरे उठा एक दूसरे को देखते हुए खिलखिला कर हँस पड़े थे...! उस समय ऐसा प्रतीत हुआ जैसे हम किसी अप्रत्याशित सी मिली ख़ुशी की अनुभूति पा हँस पड़े हों...!
      इतने वर्षों पूर्व की वह घटना मेरे स्मृति-पटल पर पूरी तरह जीवंत हो उठी थी...! तभी मित्र की आवाज सुनाई पड़ी, “बताओं...उस दिन एक पल में हम चोर बन गए होते..! साइकिल चोर..!! फिर तो...हम आज यहाँ न होते...”  “हाँ यार..पल भर में हम क्या से क्या बन गए होते...” मेरे मुँह से निकला| मित्र ने कहा, “देखो...मैंने कहीं पढ़ा था कि हमारे व्यवहार में परिवर्तन लाने वाली एक बहुत ही महीन सीमा रेखा होती है...अर्थात् हमारे द्वारा कोई अपराध कारित होने या न होने के बीच एक बहुत ही महीन विभाजक रेखा होती है, यदि इसे हम पहचान न पाए तो क्षण भर में हम अपराधी बन जाते हैं तथा हमारा व्यवहार क्या से क्या हो जाता है!” “इसका मतलब उस दिन हम इस सीमा रेखा को पहचान गए थे...!” मैंने थोड़ा विनोद भाव से कहा| “नहीं यार..अपनी बात छोड़ों..मैंने तो इसलिए उस घटना को याद दिलाया कि हो सकता है यही बातें उस बैंक में चोरी की नियत से घुसे उस व्यक्ति पर भी लागू हों...”
        मित्र के इतना कहते ही मैं कह उठा, “हाँ यार..! एक-दम सही कहा...हो सकता है कि वह व्यक्ति बैंक वाली घटना के बाद अपने मानस-पटल के उस महीन झीने से विभाजक आवरण को पहचान जाए जो पल भर में हमारे व्यवहार को बदल हमें अपराधी बना देते हैं..!” मैंने एक गहरी स्वांस भरते हुए पुनः कहा, “फिर तो उसे उस दिन की सजा नहीं मिलनी चाहिए बल्कि उसे समझने और समझाने का अवसर मिलना चाहिए...|”
         मेरी यह बात सुनते ही मित्र महोदय उछलते हुए से बोल पड़े, “आपने तो मेरे मुँह की बात एकदम से छीन ली...! यही तो मैं कहना चाहता था...इसीलिए मैंने तुम्हें हमारी वाली घटना की याद दिलाई...हाँ सजगता पूर्वक हमें अपने हर उस पल का पहचान करते रहना चाहिए जब हम किसी निर्णय प्रक्रिया से गुजर रहे हों क्योंकि उस बेहद झीनी सी सीमा रेखा के इस पार से उस पार जाने पर क्षण भर में हमारे व्यवहार की परिभाषा बदल जाती है..! और क्या कहा था..? हाँ.....यदि संभव हो तो किसी को अपने व्यवहार को समझने और समझाने का अवसर दे देना चाहिए..!”
        अंत में मित्र फिर बोले, “बस यही सब उलझन था मेरे मन में, जो अब दूर हो गया है, उस बेचारे को भी यह अवसर मिलना चाहिए, अब तुम जा सकते हो..” मैं भी थोड़ा बनावटी क्रोध दिखाते हुए बोला, “अच्छा..! instrument का काम अब खतम...! लेकिन यार पहले चाय-वाय पिलाओ तब मैं जाऊँगा..” दोनों एक साथ हँस पड़े..|
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