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गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

उस दिन....!

            उस दिन..! मैं शहर से गाँव जा रहा था..माँ को उनके घुटनों के आपरेशन के बाद गाँव छोड़ना था..कार की पिछली सीट पर पत्नी और अगली सीट पर इंटर प्रथम में पढ़ रहे पुत्र श्रेयांश के साथ मैं स्वयं कार ड्राइव कर रहा था...करीब आधे घंटे की ड्राइव फोर-लेन पर मैं कर चुका था...मेरे आगे-आगे एक ट्रक मेरे बाईं लेन पर चला जा रहा था...मेरी गति स्वाभाविक रूप से ट्रक से अधिक थी लगभग 80 किमी/घंटे.. मुझे उससे पास लेकर आगे बढ़ना था..मैंने सड़क के दाएँ लेन से यानि अपनी साइड से ट्रक से आगे निकलने का प्रयास किया..इस प्रयास में मैं ट्रक से कुछ ही मीटर की दूरी पर था कि अकस्मात् ट्रक ड्राइवर ने अपने ट्रक को दाएँ लेन की ओर यानि मेरे लेन पर मोड़ दिया...टक्कर की आशंका से मैं भयभीत हुआ लेकिन बिना समय गँवाए मेरे पैर ने ब्रेक को दबा दिया सड़क पर कार के पहियों के घिसटने की तेज आवाज हुई..मेरी कार कुछ मीटर घिसटने के बाद ट्रक से कुछ ही इंच की दूरी पर रुक गयी मैं ट्रक ड्राइवर से कोई प्रतिक्रिया करता तब तक ट्रक सड़क के डिवाइडर के कट से दूसरी ओर निकल चुकी थी..ट्रक-ड्राइवर के प्रति मन में गुस्सा था..लेकिन मैं भी समय बरबाद न करने की गरज से कार को आगे बढ़ा दिया..पुत्र श्रेयांश ने मुझसे कहा कि गाड़ी रोककर ट्रक ड्राइवर से उसकी गलती के लिए उसे डाट खिलानी चाहिए थी..खैर मैं कुछ बोला नहीं..फिर श्रेयांश बोले “मैंने तो सोच लिया था कि कम से कम कार में डेंट तो पड़ ही जाएगा...” मैं कुछ बोलता तब तक श्रीमती जी मेरी आलोचना करते हुए बोल उठी, “अरे..ये ऐसे ही चलाते हैं...” इस पर मेरे सुपुत्र जी ने कहा, “नहीं इसमें पापा की गलती नहीं है...” अब मैंने अपनी प्रतिक्रिया दी, “वैसे भाई जब मैं गाड़ी चलता हूँ तो अपनी गति के तुलनात्मक इस बात का ध्यान रखता हूँ कि यदि कोई आकस्मात सामने आ जाए तो अपनी गाड़ी को नियंत्रित कर सकूँ..” अब मेरी माँ बोली “कम से कम ड्राइवर को डाँटना चाहिए था...” मैं भी यही सोचने लगा |
         अब मैं लगभग पंद्रह मिनट की ड्राइविंग और कर चुका था सब कुछ सामान्य था पिछली घटना का कोई तनाव नहीं था...एक पुल से मैं गुजर रहा था..पुल को पार करते समय मेरी निगाह हाईवे के विपरीत ओर सड़क निर्माण संबंधी किसी हलचल पर पड़ी मैं उस ओर देखने लगा जैसे मैं भूल गया कि मैं गाड़ी चला रहा था आकस्मात श्रेयांश की आवाज मेरे कानों में पड़ी, “अरे..अरे..हाँ..हाँ..” मेरी तन्द्रा भंग हुई..सामने देखा...! अरे बाप रे...! ठीक सामने एक इनोवा कार मेरी ओर बढ़ी आ रही थी..दिन में ही उसकी जलती हेड लाइटें आँखों को चौंधिया रही थी ! एक दम सीधी टक्कर की संभावना से मैं सिहर सा गया.. प्रत्युत्पन्नमति वश स्टेयरिंग एक ओर घूम गई पलक झपकते इनोवा मेरे बगल से निकल चुकी थी...! आगे मेरी नजर डाइवर्जन पर पड़ी...गाड़ियों को पुल पर चल रहे कार्य की वजह से विपरीत लेन से निकाला जा रहा था इसी क्रम में वह इनोवा भी मेरे सामने से आ रही थी...मेरे पुत्र ने कहा, “आखें बंद कर गाड़ी क्यों चला रहे हो मैं टक्कर को अवश्यम्भावी समझ तनाव में आ गया..” मैंने अपने पुत्र की ओर देखा..कुछ बोल नहीं पाया...बस इतना ही बोला, “हाँ मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई थी...” बेटे ने कहा, “इस बार आपकी पूरी गलती थी...भले ही इनोवा हमारे लेन पर थी लेकिन यह डाइवर्जन के कारण था उसका कोई दोष नहीं माना जाता..” मैंने सहमति से सिर हिलाई..तभी माँ बोल पड़ी, “अरे..तू अईसे हईयाई हया एक ड्राइवर तो राखि नाहीं सकता..” मैं कुछ नहीं बोला अपनी गलतियों पर ही मनन करता रहा...
       कुछ देर मौन ही गाड़ी चलता रहा...मैंने बेटे से कहा, “ईश्वर ने हम लोगों को बचा दिया...” वह इतना बोला “आँख खोल कर चलाया करिए..” मैंने कहा “इस तरह की यह पहली गलती थी..शायद ईश्वर ने इसी कारण बचा दिया...” मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया...! एक बात है...कोई ईश्वर को माने या न माने यह एक निजी व्यक्तिगत मामला हो सकता है लेकिन एक नैतिक सत्ता अवश्य है जिससे यह सारा ब्रह्माण्ड परिचालित है..वह “ऋत” नामक नैतिक सत्ता इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर इसे परिचालित करती है..कहने का आशय यह भी हैं कि यदि हम दुर्घटनाग्रस्त हुए होते तो ईश्वर या ऋत नामक सत्ता न होती ऐसा नहीं....वह तब भी होती...क्योंकि मैंने अपने बेटे से कहा कि हम यदि बार-बार ऐसी गलती करेंगे तो नहीं बच पाएँगे..खैर जो भी हो...!
     
       कुछ देर और कार-ड्राइव करने के बाद मैंने कार को ग्रामीण इलाके में सड़क के किनारे की एक साफ़-सुथरी चाय की दुकान पर रोकी चायवाले को बढ़िया चाय बनाने के लिए कह दिया और उसकी चाय बनने का इन्तजार करने लगा...मैंने देखा उसी समय तीन-चार लोग किसी गाड़ी से उतरकर चायवाले की दुकान पर आये चायवाले के यहाँ का लड़का तीन-चार कुर्सियाँ खींच कर उन लोगों के लिए लगा दिया वे सभी उस पर बैठ चुके थे...इस बीच दो-चार लोग और उनको घेर कर खड़े हो चुके थे...हम लोग कार पर अपनी-अपनी सीटों पर बैठे हुए ही चाय का इन्तजार कर रहे थे...तभी मेरा ध्यान उन नेता टाइप व्यक्ति के साथ आये एक लड़के पर पड़ी...सत्रह-अट्ठारह साल का वह लड़का हाथ में एक गन नुमा बंदूक लिए हुए था...मैंने उसकी उम्र और उसके हाथ के गन पर गौर किया...मैंने बेटे श्रेयांश से कहा, “इसको देखो..” उसकी ओर देखते हुए बेटे ने हँसते हुए कहा, “अरे इसमें कौन सी नई बात है आजकल यह ट्रेंड आम हैं...ऐसे लोग सत्रह-अट्ठारह वर्ष के लड़कों के हाथ में गन देकर उसे आपने साथ ले चलते हैं...और स्वयं सफ़ेद शर्ट और पायजामें में नेता जैसे दिखाई देने का प्रयास करते है..हाँ इस तरह के लोग चेहरे से अनपढ़ जैसे लगते है...ये लोग पुराने हो चुके स्कोर्पियो या फिर टाटा सफारी जैसे वाहन से चलते है...उस पर किसी पार्टी का झंडा भी लगा होता है..इस तरह ये लोग भौकाल मारते है...” सुनकर मैंने पीछे मुड़कर उनकी गाड़ी को देखा वास्तव में वह एक पुरानी स्कार्पियो थी...और किसी पार्टी का उस पर झंडा भी लगा था..बेटे के इस ज्ञान पर मैं मुस्कुराने लगा...
      ...फिर मैंने बेटे से उसके गन के बारे में चर्चा शुरू कर दी..मैंने पूँछा, “यह गन कैसी है...” बेटे ने कहा, “ऐसी गनें सत्रहवीं-अट्ठारवीं शताब्दी में अमेरिका में प्रचलित थी..वहाँ के लोग ऐसी गन से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते थे...” मुझे बेटे से हो रही इस वार्ता में आनंद आ रहा था...मैंने पूँछा, “पता नहीं यह लड़का इसे चला पायेगा या नहीं..” बेटे ने कहा “यह केवल भौकाल के लिए है इस गन को लोड करने में ही इसे एक घंटे लग जायेंगे...और इसका चलना भी मुश्किल होगा..शायद चल ही न पाए..” मैं समझ गया सुपुत्र महोदय के ज्ञान का श्रोत हिस्ट्री चैनल, डिस्कवरी चैनल और उनका कम्प्यूटर गेम के प्रति रुझान था...हालाँकि नेताओं के ट्रेंड के बारे में बेटे का अनुभव मुझे मौलिक लगा...खैर अब तक हम लोग चाय पी चुके थे...जैसे ही मैंने गाड़ी स्टार्ट किया बेटे ने कहा, “आँखे खोल कर गाड़ी चलाइयेगा...” मैंने उनकी ओर देखा और बोला “वहाँ भी ट्रक से पास लेते समय भले ही वह अपनी लेन में उस समय था और मैं अपनी लेन में..! फिर भी मुझे हार्न बजाना चाहिए था...” यह सोचकर मौन हो गया कि अब ऐसी गलती नहीं होने दूँगा...
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मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

क्रिकेट की वह गेंद.....!

          क्रिकेट की वह गेंद...! हाँ उस गेंद की याद फिर ताजा हो आई...धीरे-धीरे कर उस घटना के लगभग तीस वर्ष होने को आ गए हैं...अकसर शाम चार बजे अपने बाग के मैदान में क्रिकेट खेलने निकल जाते थे...खिलाड़ियों में हम-उम्र पारिवारिक बच्चों के साथ गाँव के ही अन्य बच्चे हुआ करते थे...ऐसे ही एक दिन हम खेल रहे थे...मेरे ही हम-उम्र के थे...वे पारिवारिक संबंधों में मेरे चाचा लगते थे..सुरेश..! ...लेकिन हममे संबंध उतना महत्वपूर्ण नहीं था बल्कि मित्रता उससे भी बढ़कर थी...वही क्रिकेट का बल्ला ले बल्लेबाजी कर रहे थे...संयोग से गेंदबाजी भी चचेरा खानदानी भाई कर रहा था...मैं उस समय फील्डिंग कर रहा था...और बल्लेबाज के एकदम करीब गली में था...मुझे याद हैं...गेंदबाज की गेंदें स्टंप से दूर इधर-उधर पड़ रही थी और सुरेश ठीक से खेल नहीं पा रहे थे...आचानक...गेंदबाज से चिढकर बोले थे... “यार तोहका गेंदबाजी क सहूर नहीं है...ई मार्शलवा को देदो गेंद..थोड़ा खेलई में तो मजा आये...” चूँकि मैं थोड़ी तेज गेंदबाजी करता था इसीलिए क्रिकेट खेलते समय वह मुझे ‘मार्शल’ (समकालीन वेस्टइंडीज का तेज गेंदबाज) की उपाधि दे देते...यह सुनते ही मैंने गेंदबाजी कर रहे उस चचेरे भाई से कहा “यार थोड़ी सटीक गेंद डाल..मिडिल स्टंप उड़ा दे...बड़ा गावस्कर बन रहे हैं...”
        मेरे इतना कहते ही वह अगली गेंद फेंकने के लिए लम्बी दौड़ लगाते हुए गेंद फेंकी...हाँ वह गेंद काफी तेज थी...हवा में उड़ती हुई सी आई...सुरेश ने उससे बचने का प्रयास किया और थोड़ा घूम गए...वह गेंद सीधे पिछले गर्दन से ऊपर और सिर के निचले भाग में जा कर लगी...वह सीधे सिर के पीछे हाथ ले जाकर बल्ला छोड़ वहीँ बैठ गए...हम लोग दौड़ कर उनके पास पहुँचे...उनके आँखों में आँसू आ गए थे...कुछ मिनट वह ऐसे ही बैठे रहे हम बारी-बारी से चोट लगे स्थान को मलते जा रहे थे..कुछ मिनटों के बाद वह सामान्य हुए..हम लोग खेल बंद कर घर वापस लौट आये...
       हाँ करीब साल भर बीता होगा उनके सिर में हलका-हलका दर्द होने लगा था...कभी-कभी वह सिर दर्द की दवा ले लेते तो दर्द से राहत मिलती..लेकिन दवा का असर समाप्त होने के बाद दर्द पुनः प्रारंभ हो जाता...यह क्रम कुछ महीनों तक चलता रहा...फिर सुबह-सुबह उन्हें उल्टियों की शिकायत होने लगी...लेकिन कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था...सिर में लगी चोट की बात तो लगभग हम भूल चुके थे...धीरे-धीरे कर उनके एक आँख की रोशनी कम हो रही थी...कस्बे के डॉक्टर ने आँखों की जाँच कराने की सलाह दी...उन दिनों मैं इलहाबाद में रह कर अपनी पढ़ाई कर रहा था...एक दिन सुरेश चाचा मेरे कमरे पर आये...उन्होंने बताया था की डॉक्टर ने आँखों की जाँच कराने के लिए बोला है...उसी दिन मैं उन्हें अपनी साइकिल से स्वरुपरानी जिला चिकित्सालय ले गया...डॉक्टर ने उनकी आँखों में दवा डाली फिर तीन घंटे इन्तजार के बाद आँखों की जाँच के बाद चश्मा लगाने की सलाह दी...सुरेश चाचा फिर गाँव लौट गए थे...लेकिन उनकी बिमारी गंभीर होती जा रही थी...एक दिन मैं गाँव गया मैंने उन्हें एक अच्छे डॉक्टर को दिखाने की सलाह दी...लेकिन वे बहुत ही संकोची स्वाभाव के थे किसी से भी कुछ कहना नहीं चाहते थे...मुझसे उनके सिर के दर्द को देखा नहीं जाता...मैं फिर इलाहबाद लौट आया था...
      एक दिन दोपहर बाद पिता जी मेरे पास आये...मुझे कुछ आशंका सी हुई मैंने उनसे सुरेश के बारे में पूँछा उन्होंने धीरे से बस इतना ही कहा सुरेश अब नही रहे...मैं सुनकर आवक रहा...यह मेरे लिए एक अविश्वसनीय और अकल्पनीय घटना थी....सुरेश साथ छोड़ देंगे यह कभी हमने सोचा ही नहीं था...लेकिन अब सच्चाई यही थी...बाद में पिता जी ने बताया कि ब्रेन स्कैनिंग में पता चला था कि उनके सिर के पिछले हिस्से में एक गाँठ थी...जो शायद चोट के कारण ही थी..उसके आपरेशन के लिए उस दिन उन्हें बंबई ले जाया जा रहा था..वह स्वयं तैयार हो रहे थे..लेकिन उसी समय वह गाँठ सिर के अंदर ही फूट गई थी....जो उनकी मौत का कारण बनी...

       यह एक ऐसी घटना थी जो मुझे आज-तक सालती रहती है...फिलिप ह्यूज की घटना ने सुरेश की याद को पुनः तजा कर दी...ये लोग एक ऐसी भावना के साथ प्राण त्याग किये हैं जहाँ जीतने वाला भी आनंदित होता है तो हारने वाला भी आनंदित होता हैं...क्योंकि खेल का मजा दोनों को ही मिलता है...तभी तो हार के डर से कोई खेलना नहीं छोड़ता...! खेल भावना सबसे बड़ीं सामजिक भावना है..ऐसी सामाजिकता ही इन लोगों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी...!

शनिवार, 15 नवंबर 2014

यह मुआ तो बड़े दिमागदारों का खेल है...!

“आओ सेकुलरिज्म-सेक्युलरिज्म खेलें..!”

“ये सेक्युलरिज्म क्या है..?”

“इतने पॉपुलर खेल के बारे में तुम्हें नहीं पता...? अच्छा...इसका मतलब भेड़िया आया-भेड़िया आया कहानी कभी नहीं पढ़े...!”

“अरे यार..मेरे भाई..! कहानी तो पढ़ा है...”

“लेकिन इसे समझ नहीं पाए...तभी इस खेल को भी नहीं समझ पा रहे हो..!”

“अच्छा भई..! अब तुम्हीं समझाओ, इस खेल को लगे हाथ हम भी खेल लेंगे..!”

“हाँ...! उसी कहानी की तरह ‘सेक्युलरिज्म-सेक्युलरिज्म’ कह कर यह खेल खेला जाता है...मानो कोई बड़ी आफत आनेवाली हो या आ गयी हो..!”

“देखो पहेली मत बुझाओ..खेल की विधि बताओ..!”

“यह तो जानते हो कि स्वतंत्रता हमारा मौलिक अधिकार भी है..और इस स्वतंत्रता की सार्थकता हमारे खेलने की स्वतंत्रता पर निर्भर है..”

“मतलब...? मैं समझा नहीं...”

“मतलब यह कि यदि स्वतंत्रता हो तो हम सभी तरह के खेल खेल सकते है...!”

“मतलब इस खेल के खिलाड़ियों के लिए स्वतंत्रता एक अनिवार्य तत्व है..”

“सही समझे..! आगे और ध्यान से सुनो पूरा खेल समझ में आ जाएगा...”

“नहीं...नहीं..एक बात और समझाओ..मान लो इस खेल के खिलाडियों को स्वतंत्रता न हो तो...?”

“तब तो खेलई नहीं होगा..!”

“ऐसा क्यों..?”

“क्योंकि तब सेक्युलरिज्म-सेक्युलरिज्म कहने वाले भी नहीं रहेंगे..! और न ही खिलाड़ी अलग-अलग रंगों की गोटी इस्तेमाल कर पाएंगे जो इस खेल का प्रमुख तत्व है..”

“अच्छा अब खेल समझाओ...”
“कोई जमीन तैयार करो..फिर तमाम गोटियाँ ले लो...हाँ साथ में कुछ अलग-अलग रंग भी लेना जरुरी होगा...”

“हाँ..ये चीजें हमने ले ली..आगे..”

“अब गोटियों को अपने हिसाब से अलग-अलग रंगों में रंग लिया जाए..”

“क्या प्रत्येक रंग के लिए गोटियों की संख्या बराबर-बराबर होनी चाहिए..?”

“बराबर-बराबर तो कर सकते हो..लेकिन खेल का मज़ा तभी आएगा जब एकाध रंग की गोटियों की संख्या अधिक या किसी रंग की कम हो..अलग-अलग रंगों वाली गोटियों की संख्या भी इस खेल का तत्व है...! क्योंकि इस खेल का मूल तत्व भय है जो गोटियों की एक-दूसरे से कम या ज्यादा संख्या पर विशेष रूप से निर्भर होती  है...”

“ओ.के.-ओ.के...अब आगे..”

“अब तैयार जमीन पर गोटियों को बिछा दिया जाये..”

“नहीं..ये तो बताया ही नहीं कि गोटियों को मैदान में किस प्रकार से बिछाया जाए..मेरा मतलब गोटियों को मिक्स बिछाएं या उनके रगों के समूह के आधार पर..!”

“हाँ इस पर ध्यान देना आवश्यक है..तैयार जमीन पर गोटियाँ आप दोनों तरीके से मसलन मिक्स या रंगों के समूह में, दोनों विधि से बिछा सकते हो..लेकिन दोनों तरीकों के मजे अलग-अलग हैं..मान लो विभिन्न रंगों की गोटियों को मिक्स तरीके से बिछाते हैं..तो खेल की अवधि थोड़ी लम्बी होगी..और यदि रंगों के समूह के आधार पर इन्हें बिछाते हैं तो खेलने की अवधि छोटी हो सकती है..क्योंकि तब खेल आधा ही बचता है...”

“वो कैसे...”

“वो ऐसे कि जब भिन्न रंगों की गोटियों को आपस में मिक्स करके बिछाओगे तो उन्हें अपने-अपने रंगों वाली गोटियों के समूह में लाना होगा और इसके लिए खेल के बाहर के लोगों को भी इस तरह प्रशिक्षित कर खेल का हिस्सा बनाना पड़ेगा कि वो हूटिंग-शूटिंग कर सकें...! इसी प्रक्रिया में गोटियाँ अपने-अपने रंगों वाले समूह की गोटियों में शामिल होने लगती है..यह तब-तक चलता रहे जब-तक कि पूरी तरह गोटियाँ अपने-अपने रंगों के समूहों में न हो जाएं...ध्यान रहे यह गोटियों में आपसी भय या डर पैदा करने का खेल है...और इसे बनाए रखना होगा...”

“अच्छा..! यह बताओ यदि गोटियाँ अपने-अपने रंगों के समूह में हों तो...”

“तो...एक दूसरे को उनके रंगों का भय दिखाते रहो...हाँ अब कुछ ‘सेक्युलरिज्म-सेक्युलरिज्म’ कहने वाले खिलाड़ियों को भी इसमें शामिल करना पड़ेगा...! और...जब तक इस तरह का समूह बना रहेगा..तब तक खेल का आनंद चलता रहेगा...हाँ..भय की मात्रा इस तरह निर्धारित करो कि गोटियाँ आपस में मिक्स न होने पाएं...”

“ये ‘सेक्युलरिज्म-सेक्युलरिज्म’ कहने वाले कैसे होते हैं..और इसका मतलब क्या है...”

“इसका मतलब यह है ये संख्या को भय के रूप में बदलने में माहिर होते हैं..और...यानी..कम संख्या वाले समूह को अधिक संख्या वाले समूह का भय दिखाओ...और..बीच-बीच में उसके अस्तित्व पर संकट दिखाते जाओ... यही भेड़िया है...वैसे यह भेड़िया आता कभी नहीं...! यही प्रक्रिया एक प्रकार की सेक्युलरिज्म है..”

“तो सेक्युलरिज्म का मतलब...”

“अरे मेरे भाई...अब जिन रगों के समूहों में गोटियों की संख्या थोड़ी कम हो उन्हें अधिक संख्या वाले गोटियों के समूह का भय दिखाते रहो..यही तो सेक्युलर-सेक्युलर का खेल है..और ये सेक्युलर-सेक्युलर कहने वाले गोटियों और खिलाड़ियों पर बहुत बारीक नजर रखते हैं..ये एक प्रकार का माइंड-गेम खेलते हैं..”

“ये माइंड-गेम खेलने वाले क्या रेफरी की भूमिका में होते हैं..जो गोटियों और खिलाड़ियों पर नजर रखते हैं..?”

“ये माइंड-गेम खेलने वाले कुछ-कुछ रेफरी जैसा आचरण करते दिखाई देना पसंद करते हैं..लेकिन असल में होते हैं ये भी इस खेल के खिलाड़ी ही...! इनका काम गोटियों के बीच खासकर कम रंगों की संख्या वाले गोटियों में इनसिक्योरिटी का भाव जगाए रखना जिससे ये खेल और खिलाड़ियों के बीच भी बने रहें...”

“यार..तुम तो हमको शतरंज की जैसे चालें बताने लगे...गोटियों को मिक्स ही रहने दो तो क्या फर्क पड़ता है...क्यों इन्हें हाथी, घोड़ा, शेर, बाघ में बदल रहे हो..?”

“यही फर्क पड़ेगा कि तब सारा खेल ख़त्म...!”

“अच्छा एक चीज अन्त में और बता दो..यदि हम अलग-अलग रंगों के समूहों की गोटियों को आपस में मिक्स करने का खेल खेलें तो...?”

“तो..तो..ओ..ओ.. हाँ, तब भेड़िये का डर नहीं रहेगा और खेल का मजा भी ख़त्म...!”   

“लेकिन... यह मुआ आपका खेल है बड़े दिमागदारों का खेल...!”

“तभी तो इतना दिमाग लगाने के बाद भी इस खेल को नहीं समझा पा रहा हूँ..”

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मंगलवार, 4 नवंबर 2014

क्या कर्म करने वाला वास्तव में खुराफाती होता है......?

        “डिप्रेशन” हाँ...उस दिन इसी विषय पर बहस चल रही थी..बहस के प्रतिभागी थे..मेरा भांजा, पिता जी और मैं स्वयं...शायद उसी दिन आमिर का इसी विषय पर ‘सत्यमेव जयते’ प्रसारित हुआ था...हालांकि मैं उसे देख नहीं पाया था...हम लोगों का विषय यही था कि आखिर डिप्रेशन किसी को क्यों होता है..? यहाँ मैं उन तर्कों का उल्लेख नहीं करूँगा जो इसके कारण के रूप में हम लोग दे रहे थे क्योंकि फेसबुक के सभी मित्र विद्वान् और चिंतनशील होते हैं..वो..इन तर्कों को जानते और समझते हैं....अतः ज्ञान बघारने की आवश्यकता नहीं..!
        खैर...बात यहीं से बिगड़ी जब पिता जी ने कहा “भाई हमें तो किसी प्रकार की चिंता और तनाव होता ही नहीं...” उनकी बात मुझे पसंद नहीं थी क्योंकि भक्ति से मुझे चिढ़ सी होती है...! अब बात कर्म और भक्ति की ओर मुड़ गई... तर्क ये भी थे कि कर्म में रत रहने वालों को ही तनाव होता है...भक्ति वाले तो हर चीज से निश्चिंत होते हैं..ईश्वर उनकी मदद करता रहता है..!
        फिर बात आई कर्म और भक्ति में कौन श्रेष्ठ है...! हम आपस में तर्कबाजी में उलझ गए...तभी मेरे भानजे ने कहा, “मामा मेरे एक विद्वान् गुरुजन ने इस विषय पर एक कहानी सुनाई थी..और कहा था कि कहानी सुनने के बाद निष्कर्ष स्वयं निकालना कि कर्म और भक्ति में कौन श्रेष्ठ है...आप भी कहानी सुनने के बाद निष्कर्ष निकालिए....! 
         
         भानजे ने कहानी सुनाना आरम्भ किया जो इस प्रकार थी...

        “एक गुरुकुल में पढ़नेवाले दो छात्र आपस में मित्र थे..एक कर्म में विश्वास रखता तथा कर्मार्जन से जीवन-यापन करता था..! और.. दूसरा भक्ति में..उसके लिए भगवन का नामस्मरण ही सब कुछ था...इसी में वह निश्चिंत रहता था..! एक दिन दोनों आपस में बहस करने लगे..एक कहता कर्म ही श्रेष्ठ है तो दूसरा भक्ति को श्रेष्ठ बताने लगता..! उन दोनों का यह विवाद उनके गुरु जी के पास पहुँच गया...गुरु जी ने एक सुबह उन दोनों को बुलाया और उन्हें एक बड़ी सी कोठरी में बंद कर दिया उस कोठरी में घुप अँधेरा था..! धीरे-धीरे कर कई घंटे बीत गए अब उन दोनों को भूख लगने लगी थी...वहाँ खाने के लिए कुछ था भी नहीं...और अँधेरे में कुछ सूझ भी नहीं रहा था..! भक्ति में तल्लीन रहने वाला मित्र जब भूख से कुलबुलाने लगा तो उसे अपने भगवान् याद आने लगे और वह उनका नाम-जप करने लगा..! इधर दूसरा मित्र भी भूख से बेचैन हो उठा था...लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अँधेरे में क्या करे..! हाँ उसका कर्म-भाव जागृत हो चुका था...वह यूँ ही अँधेरे में ही यहाँ से वहाँ इस कोने से उस कोने यह सोचकर हाँथ मारने लगा कि कहीं कुछ खाने को मिल जाए...अचानक...! उस अँधेरी कोठरी के एक कोने में रखे एक घड़े से उसका हाथ टकरा गया..झट से उस घड़े में हाथ डाला..हाथ में कुछ लगा..उसे घड़े से निकाल कर खाने का प्रयास किया...लेकिन...वह खा नहीं सका..उस ककड़ को उसने अपने मित्र की ओर उछाल दिया और फिर घड़े में हाथ डाला..अबकी बार फिर कुछ हाथ लगा और उसे मुट्ठी में ले मुँह में रखा..अरे वाह...! शायद यह चना था..| इस प्रकार यदि उसके हाथ ककड़ लगता तो उसे वह मित्र की ओर उछाल देता और यदि चना मिलता तो उसे खा लेता...धीरे-धीरे उसकी भूख शांत हो गयी और वह अपने स्थान पर आकर आराम से सो गया..
        ...अब दूसरा दिन...उस कोठरी का दरवाजा खुला गुरूजी उन दोनों के सामने खड़े थे...गुरूजी ने उन दोनों से हाल-चाल के साथ ही उनके भूँख के बारे में भी सवाल किया तो कर्म में विश्वास करने वाले शिष्य ने तपाक से जबाव दिया कि “गुरु जी मैंने तो किसी तरह घड़ा खोज उसमें रखे चने से अपनी भूँख शांत कर ली है...” अब गुरूजी ने दूसरे शिष्य से पूंछा तो वह कुछ नहीं बोला..अपनी बंद मुट्ठी गुरु जी के सामने खोल दी...दोनों मित्रों की आँखे चौंधिया गयी..क्योंकि मुट्ठी में अशर्फियाँ थी...!
        ...फिर गुरु जी ने कहा कि अब तुम दोनों सोचो कि कर्म और भक्ति में कौन श्रेष्ठ है..!”
      
       भानजे ने यह कहानी यहीं पर समाप्त करते हुए कहा, “मामा अब आप बताएं कि इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है..!” 
        मैं भी पशोपेश में पड़ गया..क्योंकि यहाँ एक भूखे मित्र के हाथ में अशर्फियाँ तो दूसरे मित्र ने अपने प्रयासों से अपना भूख शान्त कर लिया था...! फिर कुछ सोचकर मैंने भांजे से पूंछा, 
       “क्या गुरूजी ने यह नहीं बताया कि कर्म और भक्ति में कौन श्रेष्ठ है..?” भांजे ने कहा, “नहीं..उन्होंने भी इसे हम पर छोड़ दिया|”
       मैंने कहा, “..यहाँ कर्म ही श्रेष्ठ है..क्योंकि इसी के बिना पर उसकी भूख शांत हुई...अशर्फियों से तो भूख शांत नहीं होती..!” 
          हलांकि, मैं पहले ही कर्म को भक्ति से श्रेष्ठ बताया था..इसीलिए इस कहानी को सुनने के बाद भी मैंने अपने इसी तर्क को आगे बढ़ाया..लेकिन अशर्फियों के लालच में मैं रह-रह कर इस संबंध में अपनी धारणा बदलने के लिए प्रेरित हो रहा था..! और इसी क्रम में मेरा भी भक्ति की ओर झुकाव बढ़ने लगा क्योंकि यहाँ तो बिना कुछ कर्म किए ही अशर्फियाँ हाथ लगी थी...!
         फ़िलहाल मैं अपने तर्क को संशोधित करने के प्रयास में ही था कि पिता जी गीता का श्लोक बोल पड़े, “कर्मनेवाधिकारास्ते मा फलेषु कदाचनः...” मैं अपने दिमाग पर जोर डालना शुरू किया कि किसे श्रेष्ठ सिद्ध करे लेकिन इस श्लोक का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तथा मैं स्पष्ट निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा था...चूंकि अशर्फियों का लालच मन में था ही इसलिए अब मैं कर्म में खोट खोजने लगा...मैं सोचने लगा...
      “यदि कहीं अशर्फियों की जगह वास्तव में मित्र की मुट्ठी से कंकड़ ही निकलता तो दोनों मित्रों के बीच भविष्य में होने वाले महाभारत की पटकथा लिख गयी होती...! और...वह कर्मवादी मित्र अब अपने अज्ञान पर भी पछता रहा होगा..काश..! मैं उसे कंकड़ न समझता तो भूख तो शान्त हुई ही थी..अशर्फियाँ भी हाथ आ जाती...| उसके कर्म में जरूर कुछ न कुछ कमी रह गयी जिसके कारण वह घड़े में अशर्फियाँ होने के ज्ञान से वंचित हुआ...! जरुर उस कर्मवादी मित्र ने यही सोचा होगा...|”
        जैसे ही मेरे विचार में यह सब आया मैं अशर्फियों के लालच में बोल पड़ा.. “पूर्ण ज्ञान के साथ कर्म करना चाहिए..और इस रूप में ही कर्म भक्ति से भी श्रेष्ठ होती है..!” इतना कह कर मैं चुप हुआ ही था कि भानजा पूँछ बैठा, “वो कैसे मामा...!”
        मैने अपने मन की चोरी अर्थात दिमाग के खुराफात को छिपाते हुए उत्तर देने से बचने का प्रयास करने लगा...आकस्मात..! यह सब सोचते-सोचते मैं सोच बैठा...
         "क्या वास्तव में कर्म करने वाला खुराफाती होता है..?” तभी बीमार माँ को देखने डॉक्टर साहब आ गए और हमारी वार्ता समाप्त हो गयी..तथा मैं उत्तर देने से भी बच गया...!

         अब इस बारे में आप भी सोचिए....
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मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

शायद दीपक जल चुका था....!

       
         “क्या बात है भाई जी.. ऐसे उदास क्यों बैठे हो...?”

         “उदास कहाँ हैं...!”

         “अच्छा ठीक है..! उदास नहीं हैं तो सोचनीय सी मुद्रा में क्यों बैठे हैं...?” मित्र की ओर कौतूहल से देखते हुए मैंने पूँछा। 

         “क्या बताएं यार..जानते ही हो दिपावली आ गयी है..” मित्र ने मायूसी के अंदाज में कहा। 

         “तो...फिर धूम-धड़का जैसे पटाखे का अंदाज होना चाहिए..! इस तरह शान्त हो मुँह लटका कर तो नहीं बैठना चाहिए..” कहते हुए मैंने प्रतिक्रिया जानने की उत्सुकता में एक तिरछी दृष्टि उन पर डाली। 

           “कौन सा पटाखे का अंदाज बनाएं...बाद में जो गोला-बारूद झेलना होगा उसका क्या होगा..?” कुछ सोचते हुए  ने फिर कहा, “हाँ...! सच कह रहे हो...यही सोचकर उदास हूँ..!” मित्र जी एकदम जैसे पटाखे की तरह फटे हों। 

         “ऐसे बोल रहे हो जैसे आपको भारत-पाकिस्तान के बार्डर पर जाना हो..! और फिर...जाना भी पड़े तो ख़ुशी-ख़ुशी जाना चाहिए...इसमें भी लोग उदास नहीं होते..यही तो देश-भक्ति है..! लेकिन..यह गोले-बारूद का डर कहाँ से आ गया है कि दीपावली की फुलझड़ियाँ भी फुस्स किए दे रहे हो....!” मैं माहौल को कुछ हलका करने की प्रत्याशा में अपनी बात पूरी की। 

           “भईया मेरे..! भारत-पाकिस्तान के बार्डर पर जाना...गोला-बारूद खाना तो बहुत आसान लग रहा है चाहे कोई इसे देश-भक्ति माने या न माने..! लेकिन...मैं उस...गोले-बारूद की बात नहीं कर रहा हूँ...फिर मैं कौन सा बार्डर सिक्योरिटी फोर्स का जवान हूँ कि बार्डर पर जाना है..” मित्र महोदय ने कुछ व्यंग्यात्मक लहज़े में यह बात कही। 

          “वो तो मैं जानता हूँ कि तुम कौन से बी.एस.यफ. के जवान हो...लेकिन यह दिवाली बाद गोला-बारूद झेलने की बात कहाँ से आयी..!” दोस्ताना अंदाज में बात की तह में पहुँचने की मैंने कोशिश की। 

          “बी.एस.यफ. के जवान ही गोला-बारूद नहीं झेलते...हम सब भी अपने-अपने तरीके से इसे झेलते है...” मित्र ने कुछ रहस्यात्मक ढंग से कहा। 

           “यार...! मैं समझा नहीं...!” मेरे आवाज में उत्सुकता थी। 

          “देखो..दीपावली है..कर्ट्सी में अपने बड़ों से मिलना होता है कि नहीं...? कुछ गिफ्ट-विफ्ट का पैक तो ले जाना ही पड़ता है...क्योंकि बड़ों की अपेक्षा कुछ ऐसी होती भी है..|” मित्र नें मेरी आँखों में झाँकते हुए ‘बड़ों’ शब्द पर कुछ व्यंग्यात्मक बल देते हुए से कहा। 

          “हाँ..हाँ..भाई...! जब दीपावली जैसे त्यौहार पर किसी अपने बड़े से मिलना होता है तो खाली हाथ थोड़े ही न मिला जाता है...और किसको मिलना अच्छा नहीं लगता..!” किसी विषय-विशेषज्ञ की भांति मैंने कहा। 

           “भाई मेरे..! यहीं से तो मेरी प्रॉब्लम शुरू होती है....!” कुछ परेशान सी मित्र की आवाज थी। 

           “इसमें प्रॉब्लम...?” मैंने पूँछा

           “भाई..क्यों मिलूँ...और क्या सोचकर मिलूँ...? रही बात गिफ्ट की..तो जैसे-तैसे गिफ्ट भी दे सकता हूँ...लेकिन..आखिर ऐसा क्यों किया जाए..यही सोच-सोच कर मेरा टेंशन बढ़ जाता है...क्या यह सोचकर किया जाए कि अगला मुझसे खुश रहे...? या यह वास्तव में उसके प्रति मेरी शुभकामनाओं की अभिव्यक्ति हैं..! या..कि अपना वह बड़ा..! हमारे प्रति शुभकामनाएँ रखे इसलिए उससे शुभकामनाओं का यह लेन-देन रखा जाए...और..यही मेरी समस्या है...अंतरात्मा यहीं पर मुझे ऐसा करने से रोकती है..!” मित्र बोलते समय थोड़ा चिन्तित लग रहे थे। 

            “अरे..भाई..! जरा सोचो...जब कोई हमसे मिलने आता है तो हमें अच्छा लगता है कि नहीं...? वैसे ही जब हम अपने बड़ों से मिलेंगे तो उन्हें भी तो अच्छा लगता होगा...फिर..अनजाने भी तो उलटे-सीधे काम हमसे हो जाते हैं...कोई दूध के धुले हम थोड़े ही हैं...कम से कम मिलने-जुलने से नाहक परेशानी तो दूर रहेगी...” मैंने यह कहते हुए जैसे इस संबंध में अपना व्यावहारिक ज्ञान बघारा..!

           “हाँ..हम अपने को दूध के धुले तो नहीं कह सकते...इसके लिए हम तमाम स्थितियों-परिस्थितियों को भी जिम्मेदार मान सकते हैं...लेकिन...कम से कम ऐसी स्थितियाँ बनती रहें इसके लिए तो हम प्रयास नहीं कर सकते..! रही बात कोई हमसे मिले यह हमें अच्छा लगता है...लेकिन...कोई हमसे क्यों मिलने आ रहा है यह भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिना मतलब के कोई मिलने से रहा...! ..मिलकर वह हमें मिलने के अहसान से कर्जदार भी बना देता है..और..चलो फिर उसका कर्ज उतारो..! ऐसा मिलना क्या मिलना...समझे...!” मित्र महोदय ने ऐसा उड़ेल दिया कि एक बारगी मेरे पल्ले ही नही पड़ा


           “इसका मतलब तुममे एक मानवीय और सामाजिक दृष्टिकोण नहीं है तभी इसको इस नजरिए से देखते हो...” मैंने कुछ तीखे होते स्वर में बोला.

           “अच्छा....! अब तुम इस मिलने-जुलने के कार्यक्रम को सामाजिकता और मानवीयता से भी जोड़ दिए हो...! वाह मेरे भाई..वाह..! इसी मानवीयता और सामाजिकता में तुम्हारा वह भाव...! क्या कहा था...? हाँ...दूध का धुला...उलटे सीधे काम हो जाना..इस डर से ही तुम्हारी यह सामाजिकता और मानवीयता यहाँ जीवित हुई है..! अरे भाई...तुम्हारी यह गिरोहबंदी वाली सामाजिकता और इसे फलने-फूलने देने वाली मानवीयता मेरे समझ में नहीं आती...!” 

           मित्र ने मेरी किसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं की..और पुनः कहना प्रारंभ कर दिए.... 

          “जानते हो ऐसे रिश्तों को निभाने के लिए हमें कितना असामाजिक और अमानवीय होना पड़ता है...कुछ अनुमान है...? हाँ ऐसे रिश्तों के लिए गरीब की थाली की रोटी छीनना ही नहीं उस पर डकैती डालनी होती है...उसे झोपड़ी में ही रहने के लिए मजबूर किये रहना पड़ता है...और...जिस समाज के लिए हमारा यह समाज मतलब गिरोह बना है, उस समाज को भगवान् के रहमों-करम पर उसे उसी के हाल पर ही छोड़ देना पड़ता है....और..न जाने क्या...क्या करना पड़ता है...तुम्हारी इस सामाजिकता और मानवीयता के लिए...तभी तुम्हारी यह सामाजिकता जश्न मना पाती है!” अब मित्र का स्वर तीखा हो चला था…। 

          “यार..! तुमसे बात करना मतलब दिवार पर सिर मारने जैसा ही है...तुमसे दोस्ती भी खतरनाक है...! खैर...ये बताओ ये गोला-बारूद से डरने की बात कहाँ से आ गयी..!” मैंने मित्र को लगभग कुरेदा..!

        “अच्छा...! मेरी दोस्ती खतरनाक है....वाह..! सही कहा तुम्हारे लिए मेरी यह दोस्ती खतरनाक तो होगी ही...! मैं आसामाजिक जो ठहरा...!” उन्होंने जैसे मुझ पर कटाक्ष करते हुए कहा हो..!

        “नहीं भाई मेरे कहने का वह अर्थ नहीं...” मैंने सफाई देने के प्रयास में कहा..|

        “नहीं सफाई देने की आवश्यकता नहीं..ये जो तुम्हारा नव वर्ष..होली..दीपावली जैसे त्यौहार हैं और इसे मनाने के लिए हमारे गिरोह के लिए जो पैमाने नियत हैं वही मेरे लिए गोला-बारूद हैं और इसे झेलते हुए मैं तुम्हारे लिए वास्तव में खतरनाक सिद्ध हो सकता हूँ...!” मित्र का स्वर पता नहीं क्यों थोड़ा रोषयुक्त था..!

         “मैं समझा नहीं..!” आकस्मात मेरे मुँह से निकला। 

         “समझाता हूँ...” कहते हुए मित्र ने आगे कहना प्रारंभ किया....

         “अपने ऐसे ही विचारों के कारण मैंने तुम्हारे इस गिरोह की रीति-नीति का पालन नहीं किया था..! उस ‘बड़े’ की दीपावली और नववर्ष तथा होली बिना मेरी शुभकामनाओं के ही बीत रही थी...बस फिर क्या था..! उसने मुझे सबक सिखाने की ठान ली..औंर..मन भर गोला-बारूद मुझ पर चलाया...तरह-तरह के आरोपों..अपशब्दों..प्रताड़नाओं...जांचों..परीक्षणों से गुजरता रहा...लेकिन मैं भी ठहरा हेहर..! तनिक भी उफ़ तक नही किया...! फिर तुम जैसे साथियों के लिए भी मैं खतरनाक हो गया था...कुछ तो मुझ पर हँसते भी थे...! मेरे साथ वे उस बड़े की नजर में न आएं इसलिए तुम जैसे मित्र मुझसे कन्नी काटने लगे थे...! क्योंकि उन्हें भी नुकसान उठाने का भय हो जाता था..और गिरोह से बहिष्कृत कर दिए जाने का भी भय सताता था !”
         
         फिर उन्होंने मेरी ओर देखते हुए कहा,
         
         “यही कारण है कि मुझे प्रत्येक वर्ष आने वाले इस होली, दीपावली और नववर्ष के बाद गोला-बारूद झेलने का भय सताने लगता है..और...तुम जैसों के लिए असामाजिक हो जाने का भय भी...और आज के दिन की उदासी का कारण भी यही है...लेकिन क्या करूँ अन्तरात्मा की आवाज को ज्यादा दबा नहीं पाता..और..इसी कारण तुम्हारे इन त्योहारों पर मैं हर वर्ष उदास हो जाता हूँ!”

          मित्र ने यह कहते हुए जैसे मेरी प्रतिक्रिया जानने के लिए मुझ पर निगाह डाली..!

         “तुम्हारे इस अंतरात्मा की आवाज की ऐसी की तैसी...इसे इतना अपने सिर न चढाओ...! नहीं तो ऐसे ही भोगोगे...!”

           मैंने अपना यह वाक्य पूरा ही किया था कि आकस्मात अपने स्थान से खड़े हो मित्र ने लगभग मेरी ओर झपटते हुए से अपने दोनों हाथों से मेरा कॉलर पकड़ कर झकझोरने लगे और बहुत ही तल्ख़ स्वरों में बोले। 

         “क्या कहा अंतरात्मा की ऐसी की तैसी...? .....लेकिन...तुम मुरदे लोग क्या सुनोगे इस आवाज को...!” कहते हुए मित्र ने धीरे-धीरे मेरे कॉलर की पकड़ को ढीली कर दी और अंत में उसे छोड़ अपनी कुर्सी पर पुनः शांत भाव से बैठ गए। 

          इधर मैं हक्का-बक्का सा कुछ समझ ही नहीं पाया कि क्या हो गया...फिर..मित्र ने धीरे से मेरी ओर अपना हाथ बढ़ाया और मेरे बेतरतीब हुए शर्ट और इसके कॉलर को अपने दोनों हाँथों ठीक करने लगे...मैं थोड़ा संयत हो चुका था...पता नहीं क्यों मित्र अब बहुत ही शांत हो चुके थे...इधर मैंने अपना दाहिना हाथ उनके कंधे पर रख दूसरी ओर खिड़की की तरफ मुँह फेर लगभग डूब रहे सूरज को देखने लगा था...!
        
        आचानक मैं मित्र से बोल पड़ा,

        “यार कमरे में अँधेरा छा गया है बिजली भी अभी नहीं आई है कैंडिल तो जला दो...!”

        “मेरा मन उठने का नहीं है...तुम्हीं जला दो...” कंधे पर रखे मेरे हाथों को अपने हाथों से धीरे से दबाते हुए शांत भाव से मित्र ने कहा। 

        “नहीं मुझसे नहीं होगा...माचिस तुम्हीं ढूंढ पाओगे...!” मैंने भी उसी शांत भाव से उत्तर दिया। 

          अब वे उठ चुके थे..शायद माचिस खोज लिए थे..सर्र की आवाज हुई...इधर मैंने अपनी आखें बंद कर ली थी..लेकिन मेरे पलकों के भीतर एक रोशनी का अहसास हो रहा था...शायद दीपक जल चुका था...!

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मेरे और मेरी पत्नी के बीच का संवाद.....


“हलो..हलो...हलो...”

“हाँ...हाँ...बोल तो रही हूँ...बोलो क्या बात है...?”

“अरे..! तुम तो करवां-चौथ नहीं रहती हो...?”

“कहाँ से यह ध्यान आ गया कि मैं करवां-चौथ नहीं रहती हूँ...! क्या कोई नई बात है क्या..?”

“नहीं मैं इसलिए पूँछ रहा था कि आज करवां-चौथ के ब्रत की बड़ी चर्चा हो रही है...! और...अखबारों, टी.वी. और..और..मेरा मतलब..हर जगह करवां-चौथ मनाती सजे-धजे वस्त्रों में लोगों की तस्वीरें दिखाई दे रही है...!”

“अच्छा तो ये बात है...! फिर ये बताओ इस ब्रत को रहने के लिए गहनों की तो बात छोडिए कम से कम एक नई साड़ी की आवश्यकता पड़ेगी...क्योंकि नई साड़ी पहन कर ही छलनी से तुम्हें देखूंगी....मतलब चाँद को भी..! और..हर साल यह ब्रत रहूंगी तो हर साल एक नई साड़ी लानी पड़ेगी...! फिर, एक बात और है...तुम अपने काम में इतना व्यस्त रहते हो कि तुम्हें इस दिन भी छुट्टी नहीं मिलेगी जबकि..पति ही पानी पिला कर ब्रत समाप्त कराता है..!”

“इसका मतलब तुमको पति से प्रेम नहीं साड़ी से ही प्रेम है...सज-धज कर ही ब्रत रहोगी तो रहोगी नहीं तो नही...?”

“सुनो..! हमको ज्यादा प्रेम-व्रेम न सिखाओ..! याद है...! कुछ याद है कि...हमारी शादी कब हुई थी...? मैं चौदह वर्ष की रही होउंगी...हाँ...तब मेरा गौना भी नहीं आया था..और..मैंने तुमको देखा भी नहीं था..! हाँ.., तब से मैं तीज का ब्रत रहती आई हूँ...और आज भी रहती हूँ...! वह भी तो पति के लिए ही रहा जाता है...!”

“हाँ हम लोगों की तरफ तीज ही रहा जाता है...लेकिन..यार ये बताओ इस ब्रत में नयी साड़ी नहीं पहना जाता क्या..?”

“क्यों नहीं पहना जाता..?”

“लेकिन मुझे ध्यान आता है..कभी मैं ब्रत के लिए तुम्हें साड़ी नहीं ले आया..!”
“अरे..! तुम साड़ी लाओ तभी मैं ब्रत रहूँगी...? भईया आते-जाते नयी साड़ी दिए रहते है...तीज ब्रत में वही साड़ी पहन लेती हूँ...वैसे तुम तो जानते ही हो मेरी साड़ियों में रूचि नहीं रहती..!”

“लेकिन यार मुझे तो पता ही नहीं चलता...”
“तो क्या यह बताने की चीज है..? या..कि कोई प्रदर्शन करना है...?”
 
 करवां-चौथ के दिन का यह संवाद मेरे और मेरी पत्नी के बीच का है...!
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रविवार, 28 सितंबर 2014

मेरे स्कूटर पर दूल्हे राजा.....!

         बात उन दिनों की है..तब मैं इंटर का छात्र हुआ करता था..भविष्य की चिंता से मुक्त एक प्रकार की निश्चिन्तता और मस्ती भरे दिन गुजर रहे थे..! मैं..कभी-कभी अपने विजय-सुपर स्कूटर से विद्यालय चला जाया करता था...कालेज के मित्रों के बीच कभी मेरे स्कूटर से कालेज आने की आलोचना होती..तो..कभी मेरी इस बात पर आलोचना होती कि...मैं अकसर अपने स्कूटर पर पीछे उस छात्र को बैठाकर क्यों चलता था जो गरीब होने के साथ ही तथाकथित ऊँची जाति का नहीं था...लेकिन मैं..इन आलोचनाओं पर न तो ध्यान देता और न ही इन बातों की परवाह करता...
          मेरी ऐसी ही आलोचनाओं में अग्रणी भूमिका निभाने वाले मेरे एक मित्र की शादी तय हो गयी...उस दिन उन्होंने बड़ी ही प्रसन्नता से बताया था, “यार मेरी शादी तय हो गयी है..! मई में बारात चलना होगा..और हाँ अपने स्कूटर से चलना..” उस समय मुझे प्रतीत हुआ कि जैसे वे मुझे नहीं मेरे स्कूटर को अपने बारात में चलने का निमंत्रण दे रहे हों...! खैर..जो भी रहा हो..मैंने उनकी बारात में चलने के लिए हामी भर लिया था..., हाँ..उन्होंने हम दोनों के बीच के एक कॉमन मित्र को भी उसी समय निमंत्रित किया और मुझे इस बात के लिए ताकीद किया कि इन्हें भी अपने साथ लाना होगा..हम दोनों उनकी बारात में चलने के लिए उत्साहित भी थे। 
        मित्र के विवाह का दिन आ गया...किसी तरह.…घर से अनुमति लेकर..हम दोनों बारात में शामिल होने के लिए स्कूटर से निकल पड़े। करीब पचीस किलोमीटर की दूरी तय करते हुए हम उस स्थान पर पहुँचे जिसके आस-पास के ही किसी गाँव में बारात को पहुँचना था। मैंने स्कूटर रोक दिया..और.…सिर घुमाते हुए कॉमन मित्र से पूँछा, “यार किस गाँव में चलना है..?” उन्होंने जवाब दिया, “मुझे तो नहीं मालुम..!” मैं भी अजीब बुद्धू निकला...मार्कंडेय को भी नहीं पता...! उस समय मैं कुछ-कुछ यही सोचने लगा था..। हाँ.. मेरे कॉमन मित्र का नाम मार्कंडेय ही था...! घर से चलते समय मैंने बारात के गंतव्य स्थल के बारे में इसलिए विशेष जानने की कोशिश नहीं की थी कि मार्कंडेय को पता मालुम होगा। खैर, अब हम दोनों थोड़ा सा परेशान हो गए थे...। फिर हमने तय किया कि आगे इस रास्ते पर बढ़ते हुए यदि कहीं कोई बारात आयी हो या आनेवाली हो तो पूँछ लिया जाये...। 
       हम थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि एक सजा-धजा घर दिखाई दे गया.., पूँछने पर बताया गया कि यहाँ बारात तो आनेवाली है..! पर वह हम लोगों वाली बारात नहीं थी..। फिर हम लोग लगभग एक किमी आगे बढ़ गये...यहाँ तो सड़क के किनारे कोई बस्ती ही नहीं थी.…! जो बस्ती या गाँव दिखाई पड़ रहे थे वे उस सड़क के दोनों ओर आधा से एक किलोमीटर की दूरी पर थे...हम वहाँ स्कूटर रोक कर खड़े हो गए थे और सड़क के दोनों ओर दूर स्थित बस्तियों पर निगाहें दौड़ाने लगे..दूर..कई जगहों पर लाइटें टिमटिमा रही थी...! हम दोनों सोचने लगे कि क्या किया जाए..फिर हमने तय किया कि उन प्रकाश-स्थलों पर चलकर पता किया जाए शायद हमारी वाली बारात मिल जाए..क्योंकि..उस दिन की लगन बहुत तेज थी कई स्थलों पर बारात आई हुई लग रही थी..। पुनः स्कूटर स्टार्ट कर हम एक निकट के स्थल की ओर चल पड़े लेकिन वहाँ बताया गया कि यहाँ किसी और की बारात आने वाली थी...। अब शाम का धुंधलका छाने लगा था...मायूस हो हम वहाँ से लौट पड़े..और दूर दिखाई पड़ रहे रोशनी स्थल तक जाने का निर्णय लिया गया..। हालाकि वहाँ की दूरी लगभग एक से डेढ़ किमी की रही होगी..किसी तरह वहाँ पहुँचे तो गाँव के बाहर ही बारात मिली और बाराती शायद द्वारचार के लिए वहाँ तैयार हो रहे थे...लेकिन वहाँ भी वही..! वह बारात भी हमारी वाली नहीं थी...! अब हम लोग पूरी तरह से निराश हो चुके थे। कारण...एक तो किसी नजदीक स्थल पर कोई रोशनी नहीं दिखाई दे रहा था कि वहाँ चल कर पता किया जाता और दूसरा सबसे बड़ा डर मुझे इस बात का सता रहा था कि मेरे स्कूटर में स्टेपनी भी नहीं थी..! यदि पहिया पंचर हो गया तो मैं क्या करूँगा...! क्योंकि जिस स्थल पर हम लोग थे वह किसी छोटी-मोटी नदी का क्षेत्र था जहाँ बबूल के पेड़ की बहुतायत थी और बने हुए खोरी में चलते हुए उनके काँटों से स्कूटर पंचर हो जाने का डर इस अँधेरे में गहरा गया था..। मैंने मित्र मार्कंडेय से सामने दिखाई दे रहे एक टीले पर चढ़ कर रोशनी तलाश करने के लिए कहा...। इसी बीच एक बाराती गहराती रात का हवाला देते हुए हमारे पास इस अनुरोध के साथ आया कि हम चाहें तो उसके बारात में शामिल हो सकते हैं..उसकी भी इज्जत थोड़ी बढ़ जाएगी...! हाँ उस दौर में दो-पहिया वाहन भी कम ही होते थे..किसी बारात में दो-चार ऐसे वाहन होने पर शान की बात समझा जाता था। 
        एक बारगी तो मेरे मन में आया कि उस बारात में शामिल होने के लिए हाँ कह दूँ..क्योंकि अगर बिना बारात किए ही घर लौटा तो घर वालों को क्या उत्तर दूँगा कि क्यों लौट आया...और.…यदि यह कारण बताया तो अपनी बेवकूफी सिद्ध कर दूँगा। इसी बीच मेरे मित्र टीले पर चढ़ कर लौट आये थे...आते ही उन्होंने बताया कि काफी दूर उस ओर एक रोशनी दिखाई तो दे रही है..! लेकिन तमाम आशंकाओं के बीच मैं थोड़ा परेशान सा हो गया था.…इसलिए मार्कंडेय भी वहाँ चलने का जोर नहीं दे पा रहे थे। उसी समय साईकिल से एक राहगीर गुजरा..वह हम लोगों को देखकर रुक गया..शायद वह निमंत्रण दे कर लौट रहा था और उसी इलाके का भी था। उसने हम लोगों से मित्र द्वारा टीले पर चढ़ कर देखी गयी रोशनी की ओर इशारा करते हुए कहा कि शायद वह बारात आप ही लोगों की तरफ से आई है..! एक बार आप लोग वहाँ जाकर पता कर लीजिए...। अब हम लोगों के लिए उस राहगीर की बात में एक आशा की किरण झलकी...वहाँ तक चलने का निश्चय किया गया। 
       हम वहाँ पहुचे ही थे की एक परिचित दिखाई दे गए और वे हमे देखते ही पूँछ बैठे, “अरे भाई..आप लोग कहाँ रह गए थे...राकेश आप लोगों का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं...” अब हमारे जान में जान आई और साथ में ही बेवकूफियों पर पटाक्षेप भी हो गया। जनवासे में देखा...राकेश जी आराम से मसनद पर पीठ टेके हुए दूल्हे की वेशभूषा में बैठे हुए थे...! हम लोगों को देखते ही वे जैसे उछल पड़े..कुछ देर उनके पास बैठा गया उनकी शिकायत आई कि द्वारचार के समय हम लोग क्यों नहीं पहुँच पाए, बीच में मार्कंडेय ने सारी कहानी बताई..। थोड़ी हँसी हुई फिर हम लोग सामान्य हो गए...इस समय बारात को खाना खिलाने की तैयारी हो रही थी..क्योंकि अब तक रात के लगभग साढ़े दस बज चुके थे…! खाने की व्यवस्था लड़की वालों के दरवाजे पर ही था...आजकल के बफर सिस्टम जैसा नहीं था। खाना खाने के बाद मैं जनवासे में आ गया था और राकेश विवाह मंडप में चले गए थे...विवाह की रस्में पूरी होने के बाद ही उन्हें खाना था। 
         जनवासे में आते ही मुझे गहरी नींद आ गयी...आधी रात के बाद किसी ने मुझे जगाया...जगाने वाले ने बताया कि कार का ड्राइवर कहीं चला गया है इसलिए मुझे ही अपनी स्कूटर से दूल्हे को विवाह मंडप से ले आना है। मैं उनींदे ही स्कूटर लेकर लड़की वालों के दरवाजे पर पहुँच गया...! गरमी के दिन थे ही उस समय आंधी आने की सम्भावना बन रही थी...और हवाएँ तेज चल रही थी...! दूल्हे के लिबास (तब जोड़ा-जामा प्रचालन में था) में राकेश मेरा इंतजार कर रहे थे...मैं वहाँ पहुँचा..मैं स्कूटर पर उन्हें बैठा कर गाँव के किनारे के रास्ते से निकलने लगा..उस कच्चे रास्ते के एक ओर घर थे तो दूसरी ओर लोगों के खेत फैले हुए थे...और घरों से पानी निकालने की नाली उस कच्चे रास्ते को जगह-जगह से काट रही थी। ऐसी ही एक-दो नालियों को मैं क्रास किया..उस समय धूल भरी आँधी चलने लगा था..और.…तेज धूल भरी हवाओं से बचने के प्रयास में मैं ऐसी ही एक नाली को नहीं देख पाया..! मेरा स्कूटर जोर से उछल गया.…! किसी तरह मैं उसे संभालते हुए आगे बढ़ गया...
       कुछ आगे मैं बढ़ा ही था कि मुझे आवाज सुनाई दी, “अरे भाई...विनय..!” आवाज जानी-पहचानी थी..मैंने पीछे मुड़ कर देखा..मैं हतप्रभ..! दूल्हे राजा मेरे स्कूटर पर नहीं थे...! हाँ..वह उसी नाली के पास स्कूटर उछलने और स्टेपनी न होने के कारण गिर पड़े थे...! जैसे-तैसे मैंने स्कूटर रोकी मुझे चिंता हुई कि दूल्हे बने राकेश को कहीं चोट तो नहीं आई...मैं उनकी ओर बढ़ा...! मेरे उनके पास पहुंचते-पहुंचते वे पता नहीं क्यों...चकरोड के किनारे के खेतों की ओर दौड़ पड़े....मैं कुछ समझ पाता उसके पहले ही मैंने देखा कि वे हवा में उछल-उछल कर जैसे कुछ पकड़ रहे थे...और बोलते जा रहे थे.. “विनय भाई ये उड़ा...देखिए...उधर गया...” तब तक एक पचास रूपए का लहराता हुआ नोट हवा में मेरे आगे से गुजरा...मैं लपक कर उसे पकड़ लिया...आँधी वाली हवा तेज थी...इसी बीच उन्होंने बताया कि गिरने से, उनके नोट जो शगुन आदि में मिले थे, हाथ से छूट गए थे...! वही हवा में उड़ रहे थे...फिर मैंने कई उड़ते नोटों को पकड़ा...! अब हम दोनों दूर-दूर तक खेतों में नोट ढूंढ रहे थे....मैंने सोचा कि नोट खोजते और इस तरह उछल-कूद करते कोई घराती न देख ले...अँधेरा था...लेकिन चन्द्रमा के प्रकाश की सहायता से लगभग सारे नोटों को हम लोग खोज लिए थे...! मैंने मित्र दूल्हे से पूँछा, “देखो पूरे हुए कि नहीं..” उन्होंने हाथ में लिए नोटों को मुट्ठी में मोड़ते हुए कहा. “हाँ इतना ही मोटा तो था...” मुझे थोड़ी हँसी आ गयी..और पूँछ बैठा, “गिने थे कि नहीं...?” “अरे यार गिनने का मौका कहाँ था...” आगे उन्होंने फिर कहा.. “तुम भी तो सो गए थे...!”
     तभी एक टार्च की रोशनी हम लोगों पर पड़ी..! वे हमारे पास आये बोले “क्या बात है..?” वह घराती थे..! तब-तक हम सामान्य हो चुके थे...मैं लगभग इस अंदाज में यह सोचकर बोला कि हम लोगों के साथ क्या घटी है वह भांप न पाए, “भई आपके यहाँ बारात आ रही है और आप लोगों में इतनी भी सभ्यता नहीं कि कम से कम रास्ते की इन नालियों को आज के लिए ही समतल कर दें बच गए नहीं तो हम गिर पड़ते...!” यह कह मैं दूल्हे का मुँह देखने लगा..तभी उन्होंने टार्च की रोशनी नाली की ओर मारी..वहाँ उन्हें कुछ दिखा..पचास रुपये का एक नोट उन्हें वहाँ गिरा पड़ा मिला..! इस पर मैंने उन्हें बताया कि स्कूटर उछलने से मेरा पर्स जेब से गिर गया था..शायद यह नोट पर्स से गिर पड़ा था...मैं घराती महोदय को यह समझा ही रहा था कि बीच में ही दुल्हे जी बोल उठे... “अरे टार्च है...! हो सकता है आपके पर्स के और नोट खेतों की ओर न उड़ गए हों..” मित्र बने दूल्हे की ओर देख मैं हलके से मुस्कुरा दिया और उन सज्जन से खेत की ओर इशारा करते हुए बोला, “हाँ..हाँ..जरा अपनी टार्च से थोड़ा खेतों में भी देख लें कहीं कोई और नोट हवा में उड़ यहाँ तक तो नहीं आ गया है..?” फिर हम तीनों टार्च की रोशनी में उड़े हुए नोट खोजने लगे...इस प्रयास में शायद एक-दो नोट और मिले थे। फिर वापस आकर हम स्कूटर स्टार्ट कर जनवासे की ओर चल पड़े.. मेरे कान के पास मुँह लाकर मित्र दूल्हे ने कहा, “चलो यार कम से कम सभी मिल गए..”
     मुझे अब हँसी आने लगी थी..किसी तरह मैं अपनी हँसी रोके हुए था.....
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