आखिर ना-नुकुर करते-करते सुबह पाँच तैंतीस पर उठ ही गए। बाहर आया। सुबह कुछ और सिहरनभरी हो चली है; हवा में ठंडकपन अब दस्तक देने लगी है। स्टेडियम के रास्ते पर था। पीछे कुछ लड़के "लाइन लगने" पर बात करते हुए चल रहे है। उनकी बातों से लगा अब पहले वाली "तुम तो सभ्य नहीं हुए" जैसी बात नहीं रह गई है।
याद आया, बीस-पच्चीस साल पहले इलाहाबाद में पढा़ई के दिनों में, किसी फार्म भरने या बैंक में फीस जमा करते समय यदि लाईन लगती भी तो टूट जाती थी.. लाईन तोड़कर लोग खिड़की पर ऐसे इकट्ठे होते जैसे छत्ते पर मधुमक्खियां भिनभिना रहीं हों। तब लाईन-फाईन जैसी कोई चीज न रह जाती। मैं सोचता, काश! कोई लाईन लगवाने वाला होता तो चाहे जित्ति देर खड़े रहते।
एक बार मैं किसी बैंक की खिड़की पर लाइन में खड़ा था..वहाँ ऐसी धकापेल मची हुई थी, लाइन बनती और टूट जाती। दादा टाइप के लड़के बीच में ही खिड़की पर पहुँचकर काम निपटाकर निकल लेते। लाइन में लगे बाकी लोग जैसे वहां तमाशा देखने के लिए खड़े हों। कोई बोलता तो वे उसे हड़का लेते। ये दस रुपए में किसी का भी खिड़की से काम करा देते। मैं मायूस लाइन में खड़ा था।
उस दिन किसी परीक्षा की फीस जमा करने का अन्तिम दिन था। तभी एक पुलिस वाला मेरे पास आया और मेरी मायूसी देखकर द्रवित हुआ। उसने मुझसे मेरा फार्म और फीस के पैसे लिए। दस रूपए में फीस जमा करने का सौदा तय हुआ। कुछ ही क्षणों बाद फीस जमा कर वह वापस आ गया और मुझे रसीद सौंप दिया। इस बात से लेने-देने का महत्व समझ में आया।
स्टेडियम में पहुँचते ही टहलबाज-ग्रुप वालों से भेंट हो गई। उनकी बातचीत पर कान लगा दिया। इस बातचीत को सुनने के लिए मैं अब थोड़ा धीरे चलने लगा। इनके बीच कुछ इस तरह की बातें हो रही थी,
"लाइन में लगने वाले समोसा हाथ में लेकर लाइन में लगे होते हैं..दो तीन घंटे बाद काम कर फिर से लाइन में लग लेते हैं…वैसे लाइन लगाने से जनता परेशान नहीं है..इसके बाद भी नोटबंदी की प्रशंसा कर रही है.. हाँ परेशानी तब होती है जब दो-तीन घंटे लाइन में लगने के बाद काउंटर पर यह कह दिया जाता है कि कैश खतम हो गया है।"
"आइ बी ने रिपोर्ट भेजा है कि नेता दंगे करवा सकते हैं....आखिर नोटबंदी से इन्हीं नेता का ही सबसे अधिक नुकसान हुआ है… अब समस्या उतनी नहीं रह गई है यदि इन मजदूरों को नोट बदलवाने का अच्छा-खासा काम मिल गया है।"
"अभी बैंक में स्याही नहीं पहुँची है..मार्कर तो लगा रहे हैं लेकिन मजदूर इसे मिटा कर फिर लाइन लगा लेते हैं।"
यह उनके बीच नोटबंदी के कारण नोट बदलवाने के लिए बैंकों में लगी लाइन पर चर्चा हो रही थी। खैर....
मैंने स्टेडियम का दो चक्कर लगाया। फिर वापस हो लिया। आज आवास वापस पहुँचने तक कुल बारहसौ कदम गुणे दो धन आठ सौ कदम गुणे दो, मने कुल चार हजार कदम टहल चुके होंगे।
बीच सड़क पर एक गाय अपने बछड़े को दूध पिलाती हुई दिखी। बछड़ा उझक-उझककर उसके थनों से दूध पी रहा था। गाय भी मातृत्व की सहज ममता में उसका वह उझकना चुपचाप सहती हुई पगुराते-पगुराते उसे भरपेट दूध पी लेने का अवसर दिए जा रही थी।
एक माँ ही अपने बच्चे से ऐसा ममत्व रख सकती है। वैसे यह दृश्य कभी रहे किसी राजनीतिक दल के चुनाव-चिह्न जैसा लगा।
लेकिन सुबह-सुबह ममत्व के इस दर्शन ने हृदय को एक ताजगी भरे निर्मल अहसास से भी भर दिया।
इधर वहीं पर एक कुत्ता नोटबंदी की चिन्ता से बेफिक्र अपनी एक टाँग से गर्दन खुजला रहा था।
उसे देखते मैं आगे बढ़ गया था।
मुख्य सड़क पर पहुँचा तो सात-आठ कुत्ते भौंकते हुए एक तरफ भागते दिखाई पड़े, मुझे नहीं पता लेकिन उनका भौंकना और एक ओर भागना जैसे उनकी किसी आसन्न परेशानी का सवब जान पड़ा। वैसे भी नोटबंदी से परेशान बहुतेरे हलकान हुए इसके विरोध में इधर-उधर भाग ही रहे हैं!
मैं अपने आवासीय परिसर में लौट आया था।
वैसे मैं चाय कड़क नहीं पीता, बचपन में दादा जी कड़क चाय पीते थे। उनके साथ मैं ऐसी चाय पीता था। अब तो चाय में अदरक-वदरक मिलाकर चाय को थोड़ा जायकेदार बना लेता हूँ...ऐसे ही आज भी स्वयं की बनाई हुई चाय पिया।
फिर अखबार पढ़ा.."सुषमा की किडनी फेल, जल्द होगा प्रत्यारोपण" पढ़कर ईश्वर से दुआ मांगी कि भगवान उन्हें शीघ्र स्वस्थ कर दें।
बाकी खबरें राजनीतिक टाइप की थी। उसकी चर्चा आवश्यक नहीं।
#सुबहचर्या
(17/11/16)
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