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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

बेखुदी में सनम

“बेखुदी में सनम…
उठ गए जो कदम…
आ गए…आ गए…आ गए पास हम…”
         सुबह जब आवास से निकलकर सड़क पर आया तो सवारी की तलाश में खड़े ऑटो के बड़े भाई, एक टैम्पो में यही गीत बज रहा था। गीत की मनभावन धुन सुबह की हवा में घुलकर मानो वातावरण को जगा रही थी। मैं उसे सुनते हुए स्टेडियम की ओर बढ़ता गया…
       गाने की धुन से चलते-चलते मन भी किसी और ही दिशा में बहक गया। सोचने लगा… यह "बेखुदी" आखिर कैसी चीज होती होगी? काम की या बेकाम की? गीत की मिठास से तो यही एहसास हुआ कि यह बड़ी काम की चीज है। आखिर इसी बेखुदी में तो कदम उठते हैं… रास्ते तय होते हैं.. और लोग एक-दूसरे के पास आ जाते हैं.. बेखुदी में हम चल पड़ते हैं! 
      वाकई! “बेखुदी” कोई मामूली अवस्था नहीं होती। कभी यही इतिहास रच देती है, कभी क्रांति बन जाती है। और कभी यही आमने-सामने खड़ी दो बेखुदियों का संघर्ष भी बन जाती है। बेखुदी में आदमी क्या से क्या हो जाता है!
       सोचिए, क्या आप कभी “बेखुदी” में हुए हैं?
       अगर हुए होंगे तो निश्चित ही कदम बढ़ाए होंगे। और अगर कभी नहीं हुए, तो शायद जीवनभर केवल हाथ ही मलते रह गए होंगे। फिर तो भीतर कहीं न कहीं जड़ता ही रही होगी।
       अब प्रश्न यह है कि "बेखुदी" को आखिर माना क्या जाए… बेवकूफी की निशानी या बुद्धिमानी की? 
         इसका उत्तर देना मेरे वश में नहीं। क्योंकि बेखुदी अपने साथ तमाम लफड़े भी लेकर आती है। शायद इसी कारण शुरूआत में लोग इसे मूर्खता ही समझते हैं। कभी-कभी उसकी तुलना हराकिरी तक से कर दी जाती है। लेकिन एक बात तय है… बेखुदी में उठाया गया पहला कदम प्रायः लोगों को बेवकूफी ही लगता है! लेकिन यही कदम कभी-कभी अंधे के हाथ बटेर लगने जैसा हो जाता है! तब समझ आता है… "अरे नहीं यार..यह बेखुदी में होने वाला तो बड़ा समझदार निकला!" फिर ऐसे ही गीत गुनगुनाए जाने लगते हैं।
         मैं तो अब मानने लगा हूँ बिना बेखुदी में हुए आदमी कुछ बड़ा नहीं कर सकता। कुछ करने के थोड़ा अपने आपे से बाहर निकलना पड़ता है। हाँ, इस दुनियाँ से बेमुरौव्वत! बेपरवाह!! जैसे कि ग़र दुनियाँ भी मिल जाए तो क्या !! फिर देखिए बेखुदी में होने का मज़ा!!! 
       वैसे इसमें असली मज़ा तब है जब आपकी बेखुदी में कोई और शामिल हो… जब वह "पैरलल" चल रही हो। जैसे इस गीत में दोनों एक साथ बेखुद हैं, तभी तो साथ-साथ गा पा रहे हैं। बेखुदी अगर हो तो ऐसी हो.. दूरियां मिटाने वाली जिसमें स्वर भी साथ हों और कदम भी।
        लेकिन देखिए न, आजकल तो लगता है हम सब किसी-न-किसी की बेखुदी के शिकार बने हुए हैं। इसीलिए कुछ लोग बेखुदी को लानत-मलामत की निगाह से भी देखते हैं.. इससे डरते हैं। सही है, जब भीड़ बेखुदी का शिकार हो उठती है तो यह चीज ठीक नहीं! फिर भी लोग समवेत स्वर में बेखुदी हुए जा रहे हैं। 
         और हों भी क्यों न?
         क्या बेखुदी किसी की बपौती है कि केवल वही बेखुद हो और बाकी लोग आपे में पड़े रहें? वैसे भी, दूसरों को बेखुद होता देखकर भला कौन हमेशा अपने होश सँभाले रह सकता है? ऐसे में किसी-न-किसी को तो कभी-न-कभी आपा खोना ही पड़ता है। शायद बिना थोड़ा-सा खोए यहाँ किसी को कुछ मिलता भी नहीं। 
       दरअसल हमारी सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि हम बेखुद होने से डरते हैं। जैसे कोई अजीब-सी घूँटी पिलाकर हमें सयाना बना दिया गया हो। कुछ लोग खुद तो बेखुद हो लेते हैं, लेकिन सामने वाले को नहीं होने देते। उसे “लफड़ा” बताकर बाकायदा बेवकूफी घोषित कर देते हैं। डराते हैं… “मत पड़ो इसमें!”
        राजनीतिक इसका फायदा उठाते हैं। खुद तो होशोहवास में रहते हैं लेकिन दूसरों को बेखुदी में कर देते हैं! बहुत सोच-समझकर ये अपने हिसाब से बेखुद लोगों का समूह बनाते हैं और बेखुद होने से सावधान भी करते हैं। यही लोग बेखुदी का बंटाधार कर देते हैं।
       एक बात और.. जब आदमी बहुत ज़्यादा आगा-पीछा सोचने लगता है, तब वह बेखुद नहीं हो पाता। हमारे यहाँ विचारधाराएँ भी इसी चक्कर में फँसी दिखाई देती हैं। जो लोग कभी दुनिया को बेखुद होकर बदलने निकले थे, वही अब हिसाब-किताब में उलझ पड़े। बेखुदी का वीणा उठाने वाले लोग ही अब दूसरों को उसका “रिस्क फैक्टर” समझाने लगे हैं। 
        शायद इसी कारण यह देश सदियों से पूरी तरह बेखुद नहीं हो पाया। लोग तरसते रह ग‌ए…  
     हालाँकि, जब-जब यह देश सचमुच बेखुद हुआ है, तब-तब इतिहास बदला है।
      इन्हीं विचारों में डूबा मैं स्टेडियम पहुँच गया। कुछ अन्यमनस्क-से चक्कर लगाए और लौट आया।
      घर आकर चाय पीते हुए अखबार खोला तो एक खबर पर नजर टिक गई—
        “हिलेरी के पक्ष में लाखों फर्जी वोट पड़े।”
       मतलब ट्रंप कह रहे हैं कि “हिलेरी को धांधली से ज्यादा वोट मिले।”
        मैं मुस्करा पड़ा। हम तो नाहक ही अपने देश को कोसते रहते हैं! ये बड़े मियाँ तो यहाँ भी सुभानअल्ला निकले। वहाँ भी लोग अपने नेताओं के लिए बेखुद हो जाते हैं।
        खैर, अब मैं इस मामले में अपने देशवासियों को नहीं कोसूँगा।
        एक बात जरूर है.. आमने-सामने की बेखुदी में नोटबंदी भी लागू हो जाती है… और कभी-कभी लोग बेवफा भी हो जाते हैं। लेकिन क्या हुआ, क्या होगा, क्या नहीं होगा.. इन सबकी चिंता छोड़िए…
         और बस गुनगुनाइए—
         “बेखुदी में सनम…
           उठ गए जो कदम…
            आ गए…आ गए…आ गए पास हम…”
 #चलते_चलते
           सुबहचर्या तो यह कल की थी लेकिन आज पोस्ट कर पाया हूँ... वैसे आज तबियत कुछ खराब सा है... स्टेडियम की ओर नहीं जा पा रहा हूँ.... 
#सुबहचर्या 
(30.११.१६)

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