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शनिवार, 8 अगस्त 2015

तड़फड़ाती ये नन्हीं सी मछलियाँ

        “भईया तू शहर जाएगा...?” ‘बिने’ की छोटी बहन ने जब अपने भाई से यह प्रश्न किया तो दोनों अपने गाँव के किनारे वाले भीटे पर खेल रहे थे...हरी-हरी दूब पर वे दोनों अपने में ही मगन थे कि तभी दिप्पी ने अपने से चार-पाँच साल बड़े भाई से यही प्रश्न पूँछ लिया था..उस समय बिने दूब की डंठल से सींकें बनाकर इसे चींटों के बिल में डाल कीड़े निकाल रहा था...बिल में जब कीड़ा इस सींक को पकड़ता तो उसे ऐसा लगता जैसे यह कीड़ा सींक को अपनी ओर खींच रहा हो...तब बिने सींक को धीरे-धीरे बिल से खींचने लगता...इसी के साथ वह कीड़ा भी निकल आता...! इसे देख दोनों ताली बजाते...एक बिल से दूसरे में वह यही क्रिया दुहराता जा रहा था...इस खेल में उसे बहुत मजा आ रहा था...गाँव के अन्य बच्चे भी वहीँ पास में ही नीम के पेड़ की छाया में बैठ अपनी घास चरती भैसों की रखवाली कर रहे थे कि कहीं ये किसी की फसल वाली खेतों में न चली जाएं...कुछ बच्चे वहीँ नजदीक के गड़हे में मछलियाँ भी पकड़ रहे थे...हालांकि बिने के पास चराने के लिए अपनी भैंस तो थी नहीं..! लेकिन अपने-अपने जानवर चराते बच्चों के साथ खेलना उसे बहुत अच्छा लगता...कभी-कभी तो उसका पूरा दिन ऐसे ही खेलते हुए बीत जाता...! आज उसकी छोटी बहन भी उसके साथ खेलने आई थी...खेलते-खेलते ही उसने अपने भाई से यही पूँछा था...!

         छोटी बहन दिप्पी के इस अप्रत्याशित प्रश्न पर “नहीं तो..” कहते हुए बिने सींक को वहीँ बिल में छोड़ उसकी ओर देखने लगा...! “बापू कह रहे थे भईया शहर से तेरे लिए नई फिराक लाएगा...” भाई को अपनी ओर देखते हुए दिप्पी ने फिर कहा| “कैसे शहर जाऊँगा..? छोटा हूँ...बड़े होने पर तेरे लिए फिराक लाऊंगा..!” कहते हुए बिने उठ खड़ा हुआ..लेकिन..पता नहीं क्यों अब वह थोडा उदास सा हो गया था...खेलने में उसका मन नहीं लगा..“आ घर चलें” कहते हुए उसने दिप्पी का हाथ पकड़ लिया..दोनों घर की ओर चल दिए...वैसे बिने खेलने में ही मस्त रहता है, अभी वह किसी दुनियादारी को नहीं समझता...लगभग इग्यारह-बारह साल का लड़का कुछ समझेगा भी नहीं..! लेकिन छोटी बहन के इस प्रश्न ने उसे थोड़ा विचलित जरुर कर दिया...

         आज से दो दिन पहले वह ऐसे ही खेल कर जब घर वापस आया था तो साँझ हो चली थी...माँ ने घर में अभी तक चूल्हा नहीं जलाया था..! अकसर माँ इस समय तक चूल्हा जला लेती थी...हालाँकि कभी-कभी उसे चूल्हा जलता हुआ नहीं भी मिलता था...तब पिता के आने के बाद ही माँ खाना बनाना शुरू करती थी...लेकिन माँ आज उदास थी..! उसे देखते ही वह गुस्से में बिफर पड़ी थी...और फिर...उसकी पीठ और गाल माँ की मार से लाल हो गए थे...! माँ रोते हुए अपना भाग्य भी कोसते जा रही थी “हे भगवान कहाँ से यह ‘बहीपार’ लड़का दे दिए हो..! न पढ़ाई न लिखाई...बस खेलना...एक इसी का तो आस था...यह भी...” तभी उसके पिता घर के सामने छप्पर के नीचे पड़े झिंलगी सी चारपाई पर साथ लाए छोटे से झोले को रखते हुए “का बात हइ..” कहते हुए बिने की ओर देखने लगे थे...बिने माँ से मार खा चुपचाप सिर झुकाए खड़ा था....उसके पिता को समझते देर न लगी “अच्छा ये ससुर आज फिर बहीपारी किये हैं...” कहते हुए पिता ने उसे मारने के लिए हाथ उठाया...तभी बिने की माँ बोल उठी “रहई दो हमने बहुत मारा है”...और इसी के साथ पति का हाथ भी पकड़ लिया..“ससुरा हेहर हो चुका है..” कह बिने के पिता झिंलगी चारपाई की ओर दिप्पी को पुकारते हुए लौट गए...माँ से मार खाते भाई को दिप्पी भी वहीँ खड़ी होकर चुपचाप देख रही थी..पिता ने झोला दिप्पी को पकड़ाया...शायद वह मजूरी कर के आए थे..! फिर थोड़ी देर बाद ही चूल्हा भी जल चुका था...

          उस दिन पिता माँ से कह रहे थे “अधिया खेत की जोताई में कोनों फायदा नहीं..एक तो मालिक खाद-बीज, पानिऊ का नाहीं देते...कहते हैं..फसल में सब काट के बाँट लो...और फसल कैसे हो...? पानी नाहीं बरसत...! नहर के हाल ई है कि एक तो आवत नहीं औउर आवत भी है तो ई बड़कन पहिले से ही घार काट लेत हैं...पानी मिलबे क नाहीं...बोलो तो मार करई पर उतारू....कैसे खेती हो...देखो न पिछली बार कुछ पैदई नाहीं भा औउर खाद..बीज..जुताई का कर्जा ऊपर से...हाँ...एंसवऊँ का हाल इहे जान पडत है..!”

           इधर पास में ही एक टूटे पायों वाले खटोले जो शायद उसके जन्म के समय उसके पिता ने बनवाया था..उसी पर वह माँ की पिटाई से नाराज लेटा माता-पिता के बीच चल रही  वार्तालाप भी सुनता जा रहा था...“हमहूँ सोचे रहे ई तोहार लड़िका पढ़ी लेत तो कुछ कष्ट कटत...लेकिन एकर कोनऊ ठीक लच्छन नाहीं देखात बा” माँ ने ही कहा..पिता की आवाज सुनाई दी “अरे हाँ..ऊ आज तो बड़ी मुश्किल से काम मिला...हम तो निराश लौटा आवत रहे..ऊ तो गोमवा मिली गवा कहेस कि जहाँ काम कर रहा है एक मजूर की अउर जरुरत है...मुला बहुत खटई क पड़ा पूरे आठ घंटा..!” माँ सुनती रही थी...कुछ क्षण बाद लम्बी स्वाँस भरते हुए बोली, “हाँ...तो आज फिर चूल्हा जलबऊ मुश्किल होतई...” अचानक उसके पिता को जैसे कुछ याद आ गया था..बोले..“अरे हाँ..! याद आवा...गोमावा के जान-पहचान का कोई साहेब शहर में रहत हैं...उनको कोनऊ लड़िका का जरुरत है...ऊ कहत रहे कि महीना में पैसा ठीक-ठाक मिलि जावा करे...”

          फिर...उसने ने सुना...उसी को शहर भेजने की बात पिता कर रहे हैं क्योंकि वह स्कूल नहीं जाता..दिन भर खेलता रहता है..’बहीपारी’..करता रहता है...ऐसे में शहर वाले साहेब के यहाँ उसके काम करने से दो-चार पैसे मिलेंगे...चूल्हा जलने में आसानी होगी...फिर..दिप्पी के विवाह में भी उसकी कमाई काम आएगी...बिने ने माता-पिता के इस वार्तालाप को सुना भर...! इससे ज्यादा वह कुछ सोच नहीं पाया था...तभी दिप्पी की आवाज भी उसके कानों में पड़ी थी...”माँ भईया शहर जाएगा..?” माँ के गले को पकड़ लगभग झूलती सी दिप्पी ने पूँछा था.. “हाँ तेरे लिए वह शहर से फिराक लाएगा..” यह सुन उसने खटोले से ही माँ की ओर देखा था..पिता वहीं माँ के पास मोढ़े पर बैठे दिप्पी से यही कह रहे थे...रोटी सेंकती माँ झल्लाई सी दिप्पी को परे धकेल दिया था...दिप्पी आकर पिता की गोंद में बैठ गई थी...भीटे पर खेलते समय दिप्पी ने इन्हीं बातों को सुन भाई से शहर जाने वाला प्रश्न किया है|

          माता-पिता ने उसकी ‘बहीपारी’ से पहले उसे स्कूल भेजने का भी प्रयास किया था...पहले दिन तो पिता स्वयं उसे स्कूल तक लेकर गए थे..! दूसरे दिन वह स्कूल नहीं जाना चाहता था...रोने लगा था..माँ की धोती पकड़ लटक सा गया...तब..उसे खींच कर उसकी बाँह पकड़े हुए ही पिता उसे भीटे तक ले गए थे...! इस भीटे से होकर गुजरता रास्ता स्कूल तक जाता था...उस दिन तो वह रोते हुए ही अन्य बच्चों के साथ स्कूल गया था..! गाँव के इस दूर-दराज के स्कूल में अकसर मास्टर जी ही नहीं आते थे..! कभी-कभार मास्टर जी आये भी तो प्रधानाध्यापक कक्ष में ही बैठे-बैठे न जाने क्या करते रहते...वह स्कूल में यूँ ही बैठा रहता...कोई किताब खोलने के लिए भी उससे नहीं कहता..! बस स्कूली बस्ते के साथ वह आता और वैसे ही वापस फिर घर चला जाता...इस स्कूली पढ़ाई से उसका मन उचटने लगा था...ऐसे ही कुछ दिन बीतने के बाद वह स्कूल जाते रास्ते से ही खेलने के लिए मुड़ जाता...और..दिन भर इधर-उधर खेलता रहता...

         खासकर बरसात के दिनों में...! कई दिनों की बारिश के बाद जब तालाब का गँदला पानी बह जाता और चारों तरफ हरियाली फूट पड़ती तब इसके बाद होने वाली बारिशों से उफनते तालाब से साफ पानी नाले की ओर बहने लगता...! इस साफ बहते पानी में तैरती छोटी-छोटी मछलियों को बिने देर तक देखता रहता...! कभी-कभी झुण्ड में तैरती इन नन्हीं-नन्हीं मछलियों को वह अपनी छोटी-छोटी अंजुरियों में भरकर उठा लेता...अंजुरियों का पानी रिस जाने पर जब ये मछलियाँ तड़फड़ाने लगती तो वह इन्हें फिर से उसी पानी के बहाव में छोड़ देता...आड़े-तिरछे तैरकर भागती इन नन्हीं मछलियों को देख वह बहुत खुश होता...! ...और स्कूल जाने की बात भूल जाता....!

         ऐसे ही बरसात के दिनों में, बहते पानी से मछलियाँ पकड़ने के लिए वह लोगों को ‘परहा’ लगाए देखता तो स्कूल का रास्ता छोड़ वहीँ पहुँच जाता..और...घंटों उछलती-कूदती मछलियों को ‘परहे’ में फँसता देखता रहता..! ‘परहे’ में फँसी इन मछलियों को पास में ही खोदे गए एक छोटे से गड्ढे में रखा जाता...गड्ढे के थोड़े से पानी में ये मछलियाँ तड़फड़ाते हुए मरती रहती...! ऐसे ही एक दिन जब वह एक परहे के पास बैठा था...गड्ढे में रखी इन मछलियों पर उसका ध्यान गया...! आव देखा न ताव उसने झट से अपनी छोटी-छोटी अंजुरियों से गड्ढे की सारी मछलियों को बहते पानी में उलीच दिया...! ऐसा करते देख कोई चिल्लाते हुए उसकी ओर दौड़ा था...किसी तरह मार खाने से बचते हुए वह घर भाग कर पहुँचा...बाद में, पिता की खूब मार पड़ी...उस ‘परहे’ के पास से उसके छूटे हुए स्कूली बस्ते को भी पिता ही ले आए थे...! पहले से ही स्कूल से उसका मन उचटता जा रहा था लेकिन इस घटना के बाद तो उसका स्कूल जाना ही लगभग बंद हो गया...! इसके लिए कई बार मार भी पड़ी लेकिन उस पर कोई असर नहीं होता...हाँ दो दिन पहले माँ की मार से वह नाराज हो खटोले पर सो गया था...माँ ने उसे खाने के लिए बाद में जगाया था|

         भीटे से ही दिप्पी का हाथ पकडे-पकड़े जब बिने घर पहुँचा तो...चूल्हा जला हुआ था...धुएँ से घिरी माँ उसे देखते ही उठ खड़ी हुई...उसके पास आई...उसके माथे पर अपना हाथ फेरा और कुछ ऐसा ही बोली “तू इतना खेल कर भी नहीं थकता” माँ ने जैसे उसे दुलारा हो..! पिता ‘मजूरी’ से आज कुछ जल्दी आ गए थे...शायद गोमा से मिलने चले गए थे...माँ तब तक कच्ची कोठरी से एक लड्डू ले आई और आधा-आधा भाई-बहन को दे दिया...

        अगले दिन सबेरे बिने जब सोकर उठा तो देखा...पिता ‘मजूरी’ पर नहीं गए थे...बात यह थी कि वह नजदीक के कस्बे में एक निर्माणधीन मकान में ‘मजूरी’ कर रहे थे, कल ही उस मकान पर छत डाला गया था..वहाँ का काम अब खतम हो गया था...हाँ वह लड्डू भी छत पड़ने की ख़ुशी में उसी निर्माणाधीन मकान के मालिक ने बाँटा था...पिता ने इस लड्डू को वहाँ नहीं खाया था....जिस दिन पिता घर पर रहते उस दिन बच्चों के साथ खेलने जाना उसके लिए आफत को दावत देने जैसा होता...हालाँकि..ऐसी स्थितियों में...खेलने के चक्कर में गाहे-बगाहे पिता से मार खा जाना उसकी आदत में शुमार होता जा रहा था....

         लगातार तीन-चार दिनों की ‘मजूरी’ के बाद बिने के पिता को आज आराम करने का मौका मिल गया था...हाँ अब तक दिन भी चढ़ गया था...बिने ने देखा पिता झिंलगी खटिया पर आँखें बंदकर हुए लेटे हुए थे...माँ भी दिप्पी के साथ पड़ोस में कहीं गई थी...इधर बिने की मंडली के बच्चे अपने-अपने जानवरों को ले निकल गए थे...वह उन बच्चों के साथ खेलने के लिए बेचैन हो उठा...

          बिने इस समय अपनी पूरी ताकत के साथ दौड़ रहा था....वह जल्दी से जल्दी उन बच्चों के साथ हो लेना चाहता था...उनके साथ खेलना चाहता था....बिने दौड़ते हुए भीटे पर पहुँचा..लेकिन बच्चे वहाँ नहीं मिले...दूर उसे बाग़ के पास कुछ जानवर चरते दिखाई दिए...उसने फिर दौड़ना शुरू किया...अरे...! आज सब ‘चिल्होर’ खेल रहे है...हाँ इस खेल में उसे बहुत मजा आता है...पेड़ों पर चढ़ने का तो वह मास्टर है ही....कोई तने और डालों में ही अटका हो तब तक वह पेड़ की फुनगी छू लेता था....और उसकी यह योग्यता ‘चिल्होर’ जैसे खेल में खूब काम आती...मजाल है कि कोई बच्चा उसे छू ले..! इस डाल से उस डाल पर बंदरों की भांति उछलते-कूदते फिर धम्म से जमीन पर...और जब तक ‘चोर’ बच्चा छूने के लिए उसके पास पहुँचे वह उस दो पेड़ों के बीच गोले में रखी दो फीट की डंडी के पास पहुँच जाता...और एक टांग को उठाकर  उसके बीच से उस डंडी को ऐसा फेंकता कि दूर जाकर गिरती...जब तक ‘चोर’ बच्चा उसे उठा कर वापस उसी गोले में रखता तब तक बिने पेड़ की डालियों के बीच बैठा हँस रहा होता...उसे ‘चोर’ बनने का मौका कम ही मिलता...हाँ बच्चों के बीच उसे ‘बंदर’ की उपाधि मिली थी...

          बिने अपने प्रिय खेल ‘चिल्होर’ के इसी खेल में मगन था...अभी-अभी वह डंडी फेंककर पेड़ की डालियों के बीच आया ही था...उसके कानों में “भईया..भईया...तू...कहाँ हो...” सुनाई पड़ा...अरे ...यह तो दिप्पी की आवाज है...उसकी छोटी बहन की...! जो रूवांसी हो उसी को पुकार रही थी...वह झट से पेड़ से उतर आया...उसने देखा....दूर..दिप्पी दौड़ती चली आ रही है...! वह दौड़ कर दिप्पी के पास पहुँच गया...

          बात यह थी...जब बिने, पिता को सोता समझ खेलने के लिए चला गया था उसी के थोड़ी देर बाद ही उसकी माँ भी पड़ोस से वापस आ गई थी...आहट पा उसके पिता जाग पड़े थे...आते ही माँ ने पूँछा “बिने के बापू...बेटूवा कहाँ गवा...?” पिता ने इधर-उधर नजरें घुमाई “अरे दिप्पी की माई...! गवा होये ससुरा कहीं..बहीपारी करई...ई धोबी क कुत्ता न घर का न घाट का...” यह कहने को तो बिने के पिता ने कह दिया..लेकिन पत्नी से जैसे आँखे चुराते हुए कहा हो...तभी बिने की माँ बोल उठी “बस बहुत होई ग बिने क बापू..बेटुवा क इतना जिनि बोला...कई त लिहा अपने मन का...अबई हमार ई छोट बच्चा तू अबहीं से सयान बनइ देत हया...!” इतना कह बिने की माँ वहीँ घर के सामने नीम के पेड़ के चारों ओर बने मिट्टी के चबूतरे पर बैठ सुबकने लगी..इस घटनाक्रम से भौंचक दिप्पी सुबकते हुए माँ को देखे जा रही थी...पिता दूसरी ओर मुँह फेर जैसे अनजानी सी राहों की ओर ताकने लगे थे...
                                               
         माँ सुबक रही थी...देख...दिप्पी परेशान हो उठी...उससे नहीं रहा गया...माँ के पास पहुँची...बोली...माँ रोती क्यों हो...भईया शहर जाएगा...फिराक लाने..? हाँ...न..नहीं..हाँ...कब लेकर आएगा..? ...कल आ जाएगा न..?...नहीं...फिर मेरा फिराक कब लाएगा...? मेले में पहनुंगी...माँ कुछ नहीं बोली...माँ बता..भईया काल्हि के काल्हि के बाद फिराक ले कर आ जाएगा न...?....नहीं दीवाली पर आएगा...दीवाली पर...? माँ...एक दिन तू कह रही थी इस बार भईया और हम दोनों साथ मेला देखने जायेंगे...माँ कुछ नहीं बोली...नहीं माँ मैं फिराक नहीं लुंगी...भैया शहर न जाए...फिराक नहीं लुंगी माँ...! अब दिप्पी भी सुबकने लगी...माँ ने उसे अपनी गोंदी में बैठा लिया...अचानक दिप्पी का सुबकना बंद हो गया..धीरे से...माँ से अलग हो वहीँ से भीटे की ओर देखने लगी...वह भीटे की ओर दौड़ पड़ी...

         भीटे के चारों ओर दिप्पी ने भईया को खोजा...फिर वह तालाब की ओर गयी...बिने वहां भी नहीं दिखाई दिया..भईया..! हे भईया..!! ई भैइयवा कहाँ गवा...भईया रे...जोर से दिप्पी चिल्लाई...! दिप्पी अब बाग़ की तरफ भागी...भईया पेड़ पर चढ़ता दिखा..भईया...भईया पुकारते वह उसी ओर दौड़ पड़ी...

         पेड़ से उतर दिप्पी को पकडे-पकडे बिने बोला..“का है दिप्पी”....“भ..ई...या...ऊ..” दिप्पी हांफ रही थी कुछ क्षण की चुप्पी के बाद दिप्पी ने कुछ इसी तरह से कहा, “भईया...मैं...फ़िराक...नहीं..लुंगी..तू शहर नहीं जाएगा..” दिप्पी फिर बोली.. “चल भैया..बापू से बता दे...” बिने के कुछ समझ में नहीं आया उसने अपने पीछे खड़े बच्चों की ओर मुड़कर देखा..और...दिप्पी का हाथ पकड़ धीरे-धीरे क़दमों से घर की दिशा में चल पड़ा...बिने को कुछ-कुछ इसका अहसास हो चला था कि उसे शहर जाना है..कल रात...पिता जब गोमा के यहाँ से लौट कर आये थे तो माँ से यही कह रहे थे...गोमा के यहाँ शहर वाले साहब से बात हुई गयी है...पिता माँ से यह भी कह रहे थे कि दो दिन बाद लड़के को शहर लेकर जाना है...फिर उसे गहरी नींद आ गई थी...लेकिन रात वाली यह बात सबेरे वह भूल चुका था...और वैसे ही मस्ती में खेलने चला गया...

           घर पहुँच कर उसने देखा पिता वैसे ही खटिया पर पड़े थे...माँ देहरी पर उदास बैठी थी...उसे देख माँ कुछ नहीं बोली...वह जाकर पिता की खटिया पर बैठ गया...पिता को कुछ आहट हुई...देखा बिने बैठा है...वह उठ गए...बिने के सिर पर हाथ रखते हुए कहा “काल्हि” शहर चलना है आठ बजे वाली गाड़ी से...सबेरे ही नहा-धो लेना...बिने कुछ नहीं बोला..दिप्पी भी आई...पिता से बोली “बापू फिराक नहीं लेंगे..” बापू ने अनसुनी कर दिया...बिने अब वहां से उठकर दुवारे के छोटे से नीम के पेड़ की छाया में अपने टूटे हुए से खटोले पर जाकर लेट गया...वहीँ दिप्पी भी आ गयी...वह वहीँ खटोले के ही पास जमीन पर बैठ मिटटी से कुछ खेलने लगी थी...बिने शांत लेटा हुआ दिप्पी को देखते जा रहा था....

           आज बिने को शहर जाना था...पिता ने सबेरे ही उसे जगा दिया था...हाँ दिप्पी भी जाग उठी थी...दिप्पी को भी यह अहसास हो चला था कि भईया आज शहर चला जाएगा...दिप्पी बिने के पास आई..बोली...भईया चलें खेलें...बिने ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की...दिप्पी ने बिने का हाथ खींचते हुए फिर खेलने वाली बात दुहराई...बिने चुपचाप दिप्पी का हाथ पकड़ भीटे की ओर चल दिया..वहाँ घूमते हुए वह तालाब की तरफ मुड़ गया...हाँ...हाल में ही हुयी बरसात से तालाब उफन चुका था...इसका साफ़ पानी छहरते हुए धीमी गति से बहता हुआ दूर नाले में जाकर मिल रहा था...बिने ने देखा...इस छहरते पानी में नन्हीं छोटी-छोटी मछलियाँ आड़े-तिरछे तैरती चली जा रही थी...हाँ...आज वह इन्हें अपनी अंजुरियों में भरकर नहीं उठा रहा था...इन नन्हीं मछलियों को वह ऐसे ही तैरते देख बहुत खुश हो रहा था...अपने पैरों से छहर कर बहते इस पानी में..छप..छप..करते इन मटमैली...चमकीली...तैरती नन्हीं मछलियों के पीछे वह बहन के साथ भागने लगा था..दोनों भाई-बहन इसी में मगन थे तभी पीछे से पिता की आवाज कानों में पड़ी...
        

         ...माँ फटे आँचल से अपने आँसू पोंछे जा रही थी...और...दिप्पी माँ का हाथ पकड़े सुबक रही थी...बिने पिता के पीछे-पीछे चला जा रहा था...उसे शहर के लिए आज गाड़ी पकड़ना था...

              बिने को शहर आए हुए दो माह से अधिक हो चला था...शहर में दो पड़ोसनों के बीच की इन बातों को  एक पड़ोसन ने अपने पति से साझा किया...वह बात यह थी....

            "क्या कहें वह बच्चा ही तो था उसकी उम्र यही कोई दस-बारह वर्ष के बीच रही होगी...पड़ोसन के यहाँ वह नौकर के रूप में काम करने आया था...घर के सारे काम तो वह बहुत सलीके से करता था लेकिन पड़ोसन ने बताया कि उस लड़के का यहाँ शहर में उनके घर मन नहीं लगता था...उस बच्चे के पिता ने घर की आर्थिक तंगी के चलते ही उसे एक घरेलू नौकर के रूप में शहर में भेजा था लेकिन उस बच्चे को यह नहीं पता था कि वह यहाँ एक घरेलू नौकर के रूप में काम करने आया है...उस बच्चे के घरेलू काम करने के बदले मासिक ढाई हजार रूपया उसके पिता के हाथों में दे दिया जाता था...
         
               पड़ोसन यह भी कह रही थी कि...वह लड़का अकसर अपने घर और गाँव को लेकर परेशान हो उठता और कहता, “मैं यदि अपने गाँव होता तो तालाब में नहाने जाता; दिन भर तालाब में डूबा रहता...मछली मारता..पेड़ पर चढ़ आम तोड़ता..गंजी खोदता...लेकिन यहाँ क्या है..यहाँ कुछ भी नहीं है?” पड़ोसन बता रही थी कि अकसर वह इन्हीं बातों को दुहराता रहता था....एक दिन जब वह बच्चा बहुत परेशान हो उठा तो पड़ोसन ने अपना मोबाइल बच्चे को देकर अपने पिता से बात कर लेने के लिए कहा...बच्चे ने मोबाइल पकड़ते ही अपने पिता से कहना शुरू किया, “अरे बापू..! यहाँ आऊ हमको तुरन्त लियाव जाव...यहाँ न तालाब है..न गंजी के खेत हैं...न आम के पेड़ हैं...यहाँ कुछ नहीं है, हमारा मन नहीं लगता हमें लियाई जाव..” पड़ोसन ने बताया....यह बात करते समय उस बच्चे की आँखों में आंसू भी छलक पड़े थे.....फिर उस बच्चे का पिता शहर आया और उसे वापस गाँव लिवाकर चला गया.....हाँ...पड़ोसन यह कह रही थी कि यदि वह लड़का घर पर रुकता तो हम उसके महीने के पैसे और बढ़ा देती क्योंकि वह घर के कामों को बहुत होशियारी और लगन के साथ करता था...

              .....मैं सोचती हूँ...उस बच्चे का बचपना..कितना अल्हड़..रहा होगा..! एकदम निच्छल..निर्मल..! उस बच्चे को उसका पिता तो वापस लेकर चला गया, लेकिन न जाने ऐसे कितने बच्चे अपनी इस अल्हड़ता और निर्मलता को जीवन की इन कठोर चट्टानों के बीच खो देते होंगे...असमय उनके अन्दर की असीम प्रतिभाएँ मर जाती होंगी...न जाने हम क्या कर रहे हैं...बालश्रम के कानून का ढिढोरा हम अवश्य पीटते हैं..लेकिन समाज या सरकार के स्तर पर हम ऐसे बच्चों के लिए क्या कर पाते हैं..?"

                   लेकिन एक बात और थी जो इन शहरी लोगों को नहीं पता था... बिने को लेकर उसके पिता गाँव के लिए 'साहब' के घर से निकल चुके थे....थोड़ी दूर चलने पर बिने को सड़क के दोनों और कुछ दुकानें दिखाई पड़ी....बिने एक ऐसी ही दूकान देखकर ठिठक पड़ा...जब पिता ने उसे इस तरह ठिठकते हुए देखा तो बिने ने एक दूकान की ओर इशारा किया और पिता से बोला...."बापू ऊ जो फिराक टंगा है न...उसे दिप्पी के लिए खरीद लेऊ....दिप्पी खुश हो जायेगी...." पिता ने बिने को एक भर नजर देखा..! यह सोचते हुए कि "हमार बिने इतना सयान हो चुका है...?"  उस दुकान की ओर अपना कदम बढ़ा दिया... 
                                                                            -----विनय 

रविवार, 26 जुलाई 2015

छतरी के नीचे बैठे लोग

    वह सुबह थाने पहुँचा तो उसे कुछ पुलिसवाले छतरी के नीचे बैठे आराम करते दिखाई पड़े। वह अपनी तहरीर लेकर सीधे उनके पास गया। उनमें से एक ने बेरुखी से उसे मुंशी के कक्ष में जाने का इशारा किया।

     घसीटू थाने के फर्श पर ही ऊँकडू-मुकडू बैठा था। उसकी जेब में अब एक भी पैसा नहीं बचा था। किसी तरह सौ रुपये का इंतज़ाम करके वह घर से निकला था। उनमें से आधा तो तहरीर टाइप कराने में खर्च हो गए और बचे रुपये थाने के मुंशी को दही-जलेबी खिलाने में। लेकिन उसकी तहरीर अब भी मुंशी के मेज पर वैसे ही अनसुनी पड़ी है।

     उसे यह डर सता रहा था कि कहीं मुंशी फिर दही-जलेबी लाने के लिए न कह दे। उसकी झुँझलाहट मन ही मन दही-जलेबी वाले दुकानदार पर उतरने लगी, "उफरि पड़‌इ ई दुकानदार! एहका भी यहीं थाने के मुहाने पर दूकान खोल‌इ के रही? पता नहीं का सोचि के खोलिस? जरूर थाने से मिलीभगत होई!” 

     फिर वह खुद पर ही झुँझला उठा। पहली बार मुंशी ने तो कहा था कि पैसे लेते जाओ, लेकिन उसने ही मना कर दिया था। भला वह मुंशी से पैसे कैसे लेता! आखिर रिपोर्ट तो उसी से लिखवानी थी। यही सोचकर उसने पैसे नहीं लिए थे।

     मुंशी एक-एक जलेबी दही में डुबोकर बड़े चाव से खा रहा था। उधर घसीटू सुबह एक ढेला गुड़ और एक लोटा पानी के सहारे घर से निकला था; तब से उसके पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं गया था।

     मुंशी दही-जलेबी के दोनों दोने खाली कर चुका था। अब वह बोतल मुँह से लगाकर पानी पीने लगा। तभी पंखे की हवा से खाली दोने मेज़ से सरककर फर्श पर आ गिरे। पानी पीने के बाद उसकी नज़र एक पल के लिए घसीटू पर पड़ी। फिर उसने दराज़ से एक कागज़ निकाला और उस पर कुछ लिखने लगा।

     घसीटू चुपचाप उठा, दोने उठाकर बाहर कूड़ेदान में डाल आया। जैसे रिपोर्ट लिखवाने के लिए यह करना भी ज़रूरी हो।

    घसीटू लौटा तो मुंशी अब भी उसी कागज़ पर झुका हुआ था। उसे लगा, दोने फेंकने से पहले मुंशी को बता देना चाहिए था। शायद तब मुंशी उसकी रिपोर्ट लिख देता। तभी मुंशी की नज़र उस पर पड़ी। घसीटू बिना कुछ कहे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

    मुंशी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। गाली बुदबुदाकर तल्ख़ लहजे में बोला, "अरे, बैठ अभी! एक तो उसे ठीक से खूंटे से बाँधता नहीं, ऊपर से रिपोर्ट लिखाने चला है... जैसे बाप का थाना हो! अब यही काम रह गया है हमन सब का! पहले बड़े साहब तौ आवन दे।” यह बोलते हुए उसने अपनी नजरें फिर उसी कागज पर गड़ा दीं। मानो घसीटू सामने खड़ा ही न हो।

     मुंशी की झिड़की खाकर उसकी यह पूछने की भी हिम्मत नहीं हुई कि "मुंशी जी, बड़े साहब कित्ती देर में अइहैं?" वह चुपचाप बैठ गया। ये 'बड़े साहब' ही थाने के इंचार्ज थे।

     दूसरी बार घसीटू को दही-जलेबी एक 'साहब' के लिए तब लानी पड़ी, जब मुंशी ने, "ये छोटे साहब हैं," कहकर उनकी ओर देखा और खिस्स से हँस दिया था। वह हँसी घसीटू को भीतर तक चुभ गई थी।

      इस बार मुंशी ने 'पैसे लेते जाओ' भी नहीं कहा। घसीटू समझ गया कि पहली बार का वह कहना केवल दिखावा भर था। अब वह मन ही मन यही प्रार्थना कर रहा था, “'हे भगवान! अब दही-जलेबी लाने की नौबत ही न आए।'”

    इसी बीच उन साहब की नज़र घसीटू पर टिक गई। अचानक उन्होंने मुंशी से उसकी ओर इशारा करते हुए पूछा,       

"ये यहाँ क्यों बैठा है?”

     “भैंस गायब होने की रिपोर्ट लिखाने आया है..” मुंशी के इतना कहते ही उन्होंने घसीटू को सिर से पाँव तक घूरा। फिर होंठ बिचकाकर बोले, "क्यों रे..! अब तुम्हारी हगनी-मुतनी उठाने के लिए ही पुलिस बैठी है क्या? जब भैंस की रखवाली नहीं कर सकता था, तो खरीदी ही क्यों?" 

    ये शब्द सुनते ही घसीटू के पैरों और घुटनों में जैसे अजीब-सी झनझनाहट दौड़ गई। उससे वैसे बैठा नहीं गया। वह थोड़ा पीछे खिसका और दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया। क्या कहता? उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था।

     बैंक से कर्ज लेकर भैंस खरीदा। इसके लिए वह बाजार से नया पगहा खरीदकर लाया था। घंटियों वाला पगहा था। घर के दरवाजे के ठीक सामने खूँटा गाड़ा था। उसी में भैंस को बाँधता। रात में, पगहे की घंटियां टन-टन बजती तो अचानक वह सोते से जाग उठता। भैंस खूंटे से बँधी मिलती। लेकिन न जाने क्यों उस रात घंटी की आवाज वह नहीं सुन पाया। तड़के उठा तो भैंस खूँटे पर नहीं थी। 

      कितना और कहाँ-कहाँ नहीं खोजा उसे। जब कहीं पता नहीं चला, तो गाँव वालों की सलाह पर ही वह थाने आया था। गाँव वाले भी कह रहे थे कि भैंस चोरी हुई है।

       उसी समय निहलवा की बात उसके कानों में फिर से गूँज उठी, "भँइस मत खरीद, पइसा रखि ल्यौ।"

       घसीटू ने सोचा, अगर उस दिन निहलवा की बात मान ली होती, तो शायद आज यह दिन न देखना पड़ता। गाँव में कुछ लोगों ने तो बैंक से मिलीभगत करके यही किया था। लेकिन उसने तो सपने देख लिए थे। उस पर धुन सवार थी कि भैंस की सेवा करेगा, दूध बेचेगा, घर का खर्च चलाएगा और धीरे-धीरे बैंक का कर्ज भी उतार देगा। लेकिन अब उसे लगा, भैंस नहीं, उसने अपने लिए ही आफत मोल ले ली थी। 

    तभी छोटे साहब के मोबाइल फोन की रिंगटोन बजी। मुंशी ने उनसे कहा, “देखिये साहब किसका फोन है।” 

      “अरे इंचार्ज साहब का फोन है!” कहकर वह फोन पर बात करने लगा,

     “जी सर...क्या?... अच्छा!... जी सर...  जी, जी.. सर.. क्या.. चौबीस घंटे के भीतर? यस सर.. फिर तो अभी निकलता हूँ।"

     यह वार्ता समाप्त होते ही वह मुंशी से बोला, ‘क्या कहें.. अब हमें भी जाना पड़ेगा.. बड़े साहब को अल्टीमेटम मिल गया है... यदि चौबीस घंटे के भीतर उसका पता नहीं चला, तो उन्हें अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर तैयार रखना होगा.. ससुरा अब तो यह भी हाईप्रोफाइल मामला हो गया है।”  

     घसीटू कुछ समझ पाता, उससे पहले ही वे साहब कुर्सी से उठे और हड़बड़ी में बाहर निकल गए।

     उनके के बाहर निकलते ही पूरे थाने में हलचल मच गई। हाई-प्रोफाइल मामले की सूचना मिलते ही वही पुलिस वाले, जो अभी तक सुस्त पड़े थे, छतरी के नीचे से दौड़ते हुए निकल पड़े। 

    घसीटू की तहरीर अब भी पेपरवेट के नीचे दबी थी। पंखे की हवा से उसका एक कोना बार-बार फड़फड़ा उठता। घसीटू दीवार से पीठ टिकाए चुपचाप बैठा रहा। 

     उसने मुंशी की ओर देखा। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट तैर रही थी। वह मुस्कुराहट उसकी समझ से बाहर थी। उसे लगा, शायद अब उसकी रिपोर्ट लिखे जाने की बारी आ जाए। तभी मुंशी की कही बात याद आई, "पहिले बड़े साहब तौ आवन दे।" उसकी उम्मीद फिर ढीली पड़ गई। "बड़े साहब कब आएँगे?" यह पूछने का साहस भी उसमें नहीं बचा था।

     मुंशी फिर से कागजों में कुछ लिखने में खो गया था। पिछले दो घंटे की जद्दोजहद उसके तन और मन दोनों पर भारी पड़ चुकी थी। अब वहाँ बैठे रहना उसके लिए कठिन होता जा रहा था। आखिर कब तक यूँ ही बैठा रहे?

     उसके मन में आया, पूछ ही ले कि बड़े साहब कब आएंगे। ज्यादा से ज्यादा मुंशी एक बार फिर गाली ही तो देगा।

      अचानक मुंशी के चेहरे पर एक हल्की-सी शिकन उभरी। वह सिर उठाकर सामने की ओर देखने लगा। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि आँखें सामने थीं, मगर वह सोच कुछ और रहा था।

        घसीटू को जैसे ही लगा कि वह उसे देख रहा है। उसने तुरंत लड़खड़ाती-सी आवाज में पूछा, "मुंशी जी... बड़े साहब कब..?"

      लेकिन वह जैसे घसीटू को भूल ही चुका था। घसीटू के यह पूछते ही चौंक उठा। अगले पल ही सहज होते हुए बोला, "अरे... तू अभी तक बैठा है? आज जाओ। एक हाईप्रोफाइल मामला आ गया है। कल आना।"

      यह 'कल आना' सुनते ही घसीटू का मुँह खुला का खुला रह गया। उसे लगा, पिछले दो घंटे से वह थाने के फर्श पर नहीं, अपनी उम्मीदों की ज़मीन पर बैठा था; और अभी-अभी किसी ने उसके पैरों तले से यह जमीन खिसका दी हो!

    वह मायूस हो गया। एक क्षण के लिए उसे लगा, शायद उसकी मायूसी देखकर मुंशी पसीज जाए। लेकिन उसकी कड़क आवाज गूँजी, "अच्छा, चल... उठ यहाँ से। कल सुबह आना।"

     घसीटू चुपचाप उठ खड़ा हुआ। उसके पैर जैसे भारी हो गए थे। वह धीमे-धीमे, बोझिल कदमों से थाने के बाहर निकल गया।

        आज दूसरा दिन था।

       घसीटू खोई भैंस की चिंता में सुबह ही घर से निकल पड़ा था। थाने पहुँचा तो दिन चढ़ आया था। सूरज की तपन महसूस होने लगी थी। वह सीधे मुंशी के पास गया। मुंशी ने उसे देखते ही बाहर लॉन में छतरी के नीचे बैठे लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा, “उधर जा...  साहब लोग वहीं बैठे हैं, पहले उनसे अपनी बात बता।” 

      बाहर आकर उसने देखा -

     लॉन में बने गोल चबूतरे पर लगी छतरी के नीचे बड़े साहब और छोटे साहब बैठे थे। सामने रखी मेज़ के चारों ओर कई कुर्सियाँ थीं। उन्हीं में से एक पर सफेद शर्ट, सफेद पैंट और सफेद जूते पहने एक लंबा-चौड़ा आदमी इत्मीनान से बैठा था। छतरी से कुछ ही दूर दो फ़ॉर्च्यूनर गाड़ियाँ खड़ी थीं, जिनके इर्द-गिर्द हथियारबंद लोग चौकन्ने खड़े थे। वहाँ मानो किसी बड़े आदमी का दरबार लगा था।

     साहब लोगों के सामने मेज पर झबरे बालों वाला कोई विचित्र-सा जानवर बैठा था, वे बारी-बारी से उसके सिर पर दुलार से हाथ फेर रहे थे। उधर दो-तीन सिपाही बिस्कुट जैसी कोई चीज अपने हाथ से उसे खिलाने की कोशिश कर रहे थे। तभी एक सिपाही कटोरी में कुछ लेकर आया और बड़े जतन से उसे पिलाने लगा। 

     घसीटू को अचरज हुआ। उसे लगा, उस विचित्र-से जानवर को खिलाने-पिलाने की इन सिपाहियों के बीच मानो होड़-सी मची हो।

     वह चबूतरे से कुछ दूर ही आकर ठिठक गया। चबूतरे पर चढ़ने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। वह दोनों हाथ जोड़े चुपचाप खड़ा रहा। उसकी निगाहें बार-बार छतरी के नीचे बैठे साहबों की ओर उठतीं और फिर झुक जातीं। लेकिन छतरी के नीचे बैठे लोगों की निगाहें अभी उसकी ओर उठनी बाकी थीं।

    इसी बीच कुछ लोग और आ गए। देखते ही देखते हँसी-ठट्ठा शुरू हो गया। छतरी के नीचे दो-तीन कुर्सियां और लगा दी ग‌ईं। नवांगतुक लोग बैठ ग‌ए। थोड़ी देर बाद ठंडा भी आ गया।

      कुछ ही देर में साहबों के सामने माइक लगा दिए गए। घसीटू समझ नहीं पा रहा था कि वहाँ क्या होने वाला है। तभी एक आदमी आगे बढ़ा और उनसे सवाल पूछने लगा। अगले ही पल कैमरों की फ्लैश लाइटें चमकने लगीं। यह सब देखकर घसीटू को लगा, जरूर कोई बहुत बड़ा मामला है।

     उस आदमी ने पूछा, "सर, इस महत्वपूर्ण मामले का वर्कआउट कैसे हुआ?" उन्होंने इसे एक शातिर चोर की करतूत बताते हुए कहा…

     "हम इस मामले पर लगातार काम कर रहे थे। मुखबिर से सूचना मिली कि वह इसे शहर में बेचने की फिराक में है। हमने तुरंत बरामद कर लिया।”

     तभी कैमरामैन ने कैमरा मेज़ पर बैठे झबरे बालों वाले उस विचित्र जानवर की ओर घुमा दिया, फिर कुछ पल बाद कैमरे का मुँह सफेद शर्ट-पैंट पहने उस लंबे-चौड़े आदमी पर टिक गया। उसके चेहरे पर एक खास किस्म की दबंगई और आत्मविश्वास तैर रहा था। उसकी आवभगत में मानो पूरा थाना ही लगा हुआ था और वह मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। 

    बरामदगी का स्थान पूछे जाने पर बड़े साहब एक पल को सकपका गए। वे छोटे साहब की ओर देखने लगे। उन्होंने तुरंत संगठित गिरोह की आशंका जताते हुए विवेचना जारी होने का हवाला दे दिया।

       इस उत्तर पर हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति की मुस्कान चौड़ी हो उठी। उसने पत्रकार की ओर ठंडे का गिलास बढ़ाते हुए कहा, "अरे छोड़िए न... ठंडा लीजिए, बाहर बड़ी गर्मी है।”

       उसके इस अंदाज पर थाने के बड़े साहब भी मुस्कुरा उठे। दोनों की नजरें मिलीं और उनके होंठों पर एक-सी मुस्कान तैर गई। लगा, जैसे दोनों बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह गए हों। लेकिन वे फिर गंभीर हो गए। फिर वह पत्रकारों से मुखातिब हुआ—

    “ये हमारे थानाध्यक्ष अच्छा काम कर रहे हैं। इनके पहले वाले का काम देखकर मैंने ही उनका ट्रांसफर कराया था…”

     हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति के चुप होते ही एक पत्रकार उनके पास जाकर उनके कान में फुसफुसाया, "सर जी, मैं तो आपके घर अकसर आता-जाता रहता हूँ। यह पिल्ला वह पिल्ला नहीं है!”

     उसने पत्रकार के कंधे पर हाथ रखा और हलकी मुस्कान लाकर महीन आवाज में कहा, "यार, जाने भी दो... पहले वाले से बढ़िया नस्ल का है। मेरे लिए तो यही वही है... समझो, मिल गया।" 

      वह पत्रकार भी मुस्कुराया। दोनों की बातें बड़े साहब सुन रहे थे। उनके चेहरे पर भी दबी-सी मुस्कान थी। उन्होंने हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति से धीरे से कहा, 

     "महोदय, ऐसी नस्ल का पिल्ला आसानी से नहीं मिलता... हमारे छोटे दरोगा जी ने बहुत मेहनत की है।" 

      यह सुनते ही उसका हाथ उनके कंधे पर जा टिका। उनके चेहरे पर वैसी ही संतुष्टि उतर आई, जैसी किसी कठिन 'वर्क-आउट' के सफल हो जाने पर उतरती है। 

      उधर घसीटू धूप में खड़े-खड़े थकने लगा था। इस बीच एक पुलिस वाले ने उसे दो बार छाया में खड़े हो जाने को कहा। लेकिन घसीटू ने उसकी बात अनसुनी कर चबूतरे के पास, छतरी के छज्जे के नीचे चला आया। फिर भी वहाँ भी धूप उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। धूप की परवाह किए बिना उसके मन में बस एक ही उम्मीद थी, शायद छतरी के नीचे बैठे लोगों की नज़र उस पर भी पड़ जाए। 

       उन लोगों की निगाह तो उस पर नहीं पड़ी, मगर उनकी आवाजें अब उसके कानों तक पहुँचने लगी थीं। बड़े साहब के मुँह से 'शातिर चोर', 'शहर में बेचने' और 'बरामदगी' जैसी बातें सुनते ही उसका दिल धक् से रह गया। उसे लगा, जरूर उसकी चोरी हुई भैंस की ही बात हो रही है। वह खुशी से भर उठा। पुलिस वालों के लिए उसके मन से दुआएँ निकलने लगीं। उसे पूरा विश्वास हो गया कि पुलिस ने उसकी भैंस का पता लगा लिया है और छतरी के नीचे बैठे लोग उसी चोरी का खुलासा कर रहे हैं।

     लेकिन अगले ही क्षण उनके मुँह से 'पिल्ला' शब्द और फिर, 'छोटे दरोगा ने इसके लिए बहुत मेहनत की है' निकलते ही घसीटू की सारी उम्मीदें भरभराकर ढह गईं।

     सुबह से खाली पेट, कड़ी धूप में लगातार खड़े रहने और इस अचानक मिले मानसिक आघात का बोझ उसका शरीर सह न सका। उसकी आँखों के आगे क्षणभर के लिए अँधेरा-सा छा गया और वह लड़खड़ा उठा।

     ठीक उसी समय वही पत्रकार, जो हाई-प्रोफाइल वाले व्यक्ति के असली पिल्ले को पहचाता था, हलकी सी मुस्कान लेकर बड़े साहब की ओर मुखातिब हो रहा था,

      "सर जी, एक बात और... पिल्ला तो मिल गया, लेकिन चोर की गिरफ्तारी भी हुई या अभी नहीं?"

     उन्होंने गला साफ करते हुए उत्तर दिया "नहीं... हमारे सब इंस्पेक्टर साहब इस पर भी लगातार काम कर रहे हैं। एक संदिग्ध व्यक्ति को हिरासत में लिया गया है। उससे पूछताछ चल रही है। पूछताछ पूरी होते ही हम उसे..."

      इसी बीच छोटे साहब किंचित घबड़ाहहट में चिल्ला उठे थे, 

      "अरे..पकड़ो.. पकड़ो उसे...!" 

      छोटे साहब की इस अचानक उठी चीख में बड़े साहब के मुँह से निकलने वाला शब्द, "गिरफ्तार कर लेंगे" दबकर रह ग‌या। 

     तब तक दो सिपाही लपककर पहुँचे और गिरने ही वाले घसीटू को अपनी बाँहों में थाम लिया। उसके पैरों में जैसे जान ही नहीं बची थी। दोनों लगभग उसे टाँगे हुए तेजी से बरामदे की ओर ले गए।

      तभी एक पत्रकार ने घसीटू की ओर इशारा करके कहा, 

     “यही होगा चोर..!”

     बस फिर क्या था! कैमरों की फ्लैश लाइटें यकायक उसी पर चमकने लगीं। अगले ही पल घसीटू, बिना कुछ जाने-समझे, 'पिल्ला चोर' के संदिग्ध के रूप में तस्वीरों में कैद किया जा रहा था।

        कुछ पल के लिए छतरी के नीचे बैठे लोग असमंजस में पड़ गए। बड़े साहब कुछ बोलने को हुए, तभी छोटे साहब ने हलके-से इशारे से उन्हें रोक दिया। बड़े साहब चुप रह गए।

    अब तक पत्रकार वार्ता समाप्त हो चुकी थी। पत्रकार एक-एक कर वहाँ से निकलने लगे। जाते-जाते वे एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा देते।

     उधर हाई-प्रोफाइल शख्स अपनी गाड़ी की ओर बढ़ा। एक सिपाही उसके पिल्ले को लेकर पीछे-पीछे चल रहा था। गाड़ी के पास पहुँचते ही छोटे साहब लपककर आगे बढ़े और दरवाज़ा खोल दिया। उसने सिपाही से पिल्ला लिया, उसे गोद में रखा और कार में बैठ गया।

     तब तक घसीटू को बरामदे की छाया में पड़ी एक बेंच पर लिटा दिया गया था। उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे गए। कुछ देर बाद उसकी पलकों में हरकत हुई। उसने धीरे-धीरे आँखें खोली।

     अपने चारों ओर खड़े पुलिस वालों को देख भौंचक्का-सा वह उन्हें ताकता रह गया। उस क्षण उसे अपनी तहरीर की भी सुध न रही। उसके मन में अब बस एक ही इच्छा बची थी, किसी तरह यहाँ से निकलकर जल्द से जल्द अपने घर पहुँच जाए।

     इसी क्षण दोनों साहब बरामदे में आ पहुँचे। उनकी निगाहें सीधे बेंच पर लेटे घसीटू पर जाकर ठहर गईं।

        अचानक बड़े साहब सिपाहियों पर गरज पड़े, "अरे, इसे अभी... इसी वक्त इसके घर पहुँचाओ! यहाँ इसे कुछ हो जाता, तो लेने के देने पड़ जाते। पूरे थाने की बदनामी हो जाती!”

     दो सिपाही घसीटू को बाँह थामे उसे सहारा देते हुए धीरे-धीरे उसे जीप की ओर ले चले। उसकी तहरीर मुंशी के टेबल पर अभी भी पेपरवेट के नीचे पंखे की हवा में फड़फड़ा रही थी।

    घसीटू घर लौट आया। उसकी भैंस नहीं मिली। तहरीर का क्या हुआ, उसने फिर कभी पता नहीं किया।

     अगले दिन अखबारों में एक खबर छपी थी-

     "हाई-प्रोफाईल पिल्ला चोरी कांड में संदिग्ध हिरासत में"       

    खबर के साथ दो तस्वीरें थीं। पहली तस्वीर में साहब लोग मीडिया को जानकारी दे रहे थे। दूसरी में दो पुलिसकर्मी एक संदिग्ध को सहारा देकर ले जा रहे थे। संयोग से उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

       निहलवा उससे मिलने आया था। वह कुछ पूछने ही वाला था कि घसीटू ने उसे हाथ के इशारे से चुप करा दिया। उसे छतरी के नीचे का दृश्य याद हो आया। वह बोला, “अब बसि करऽ... हम मजूरै भले। ई रोजगार-फोजगार, थाना-फाना अउर कोरट-कचहरी सब बड़कन के बदे हय। हमन सुभा ऐसेई भल, एहिमइ हमार इज्जत बची हय। हमार बेटउआ इही बदे सहर भागि के मजूरी करै चलि गवा। कउन इंहाँ रहिके गारी खाय... गाँऊ-देस का हालि तू तो जनतै हया।”

                          *****

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

प्रतिमा देवी के वाल से..

         हाँ वह बालक ही तो था उसकी उम्र यही कोई दस-बारह वर्ष के बीच रही होगी| मेरे पड़ोसन के यहाँ वह नौकर के रूप में काम करने आया था| सारे घर के काम तो वह बहुत सलीके से करता था लेकिन पड़ोसन ने बताया कि उस लड़के का यहाँ शहर में उसके घर मन नहीं लगता था| उस बच्चे के पिता ने घर की आर्थिक तंगी के चलते ही उसे एक घरेलू नौकर के रूप में शहर में भेजा था लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वह यहाँ एक घरेलू नौकर के रूप में काम करने आया है| उस बच्चे के घरेलू काम करने के बदले मासिक ढाई हजार रूपया उसके पिता के हाथों में दे दिया जाता था, ऐसा पड़ोसन ने बताया था|
         
          मेरी पड़ोसन ने बताया कि वह लड़का अकसर अपने घर और गाँव को लेकर परेशान हो उठता और कहता, “मैं यदि अपने गाँव होता तो तालाब में नहाने जाता; दिन भर तालाब में डूबा रहता...मछली मारता..पेड़ पर चढ़ आम तोड़ता..गंजी खोदता...लेकिन यहाँ क्या है..यहाँ कुछ भी नहीं है?” पड़ोसन बता रही थी कि अकसर वह इन्हीं बातों को दुहराता रहता था| एक दिन जब वह बच्चा बहुत परेशान हो उठा तो पड़ोसन ने अपना मोबाइल बच्चे को देकर अपने पिता से बात कर लेने के लिए कहा| बच्चे ने मोबाइल पकड़ते ही अपने पिता से कहना शुरू किया, “अरे बापू..! यहाँ आऊ हमको तुरन्त लियाव जाव...यहाँ न तालाब है..न गंजी के खेत हैं...न आम के पेड़ हैं...यहाँ कुछ नहीं है, हमारा मन नहीं लगता हमें लियाई जाव..|” पड़ोसन ने बताया यह बात करते समय उस बच्चे की आँखों में आंसू भी छलक पड़े थे| फिर उस बच्चे का पिता एक दिन शहर आया और उसे वापस गाँव लिवाकर चला गया| मेरी पड़ोसन बता रही थी कि यदि वह लड़का घर पर रुकता तो हम उसके महीने के पैसे और बढ़ा देती क्योंकि वह घर के कामों को बहुत होशियारी और लगन के साथ करता था|

         मैं सोचती हूँ...उस बच्चे का बचपना..कितना अल्हड़..रहा होगा..! एकदम निच्छल..निर्मल..! उस बच्चे को उसका पिता तो वापस लेकर चला गया, लेकिन न जाने ऐसे कितने बच्चे अपनी इस अल्हड़ता और निर्मलता को जीवन की इन कठोर चट्टानों के बीच खो देते होंगे...असमय उनके अन्दर की असीम प्रतिभाएँ मर जाती होंगी...न जाने हम क्या कर रहे हैं...बालश्रम के कानून का ढिढोरा हम अवश्य पीटते हैं..लेकिन समाज या सरकार के स्तर पर हम ऐसे बच्चों के लिए क्या कर पाते हैं..?    

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

प्रतिमा देवी के वाल से



        यही गर्मी की भरी दुपहरी रही होगी, हम अपने पति और छोटे पुत्र के साथ कार से कहीं जा रहे थे| पति महोदय कार चला रहे थे| मैंने देखा कि गर्मी की भरी दोपहरी में एक बूढ़ी औरत एक छोटी लड़की का हाथ पकड़े हुए दोनों नंगे पाँव ही पक्की सड़क पर चले जा रहे थे| मैं उस कड़ी धूप, तपती हुई पक्की सड़क और उस पर उनके नंगे पांवों को देख सिहर सी गई| मैं अभी यह देख पति से अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करती कि मेरी कार उनसे आगे निकल गयी, एक बार मैंने सोचा पति से कार रोकने के लिए कहूँ, और हमारे पास जो एक जोड़ी अतिरिक्त चप्पल था पहनने के लिए उन्हें दे दूँ! लेकिन ऐसा नहीं कर पाई और हम आगे चले गए| मैं सोचती रह गयी कि अभी भी हमारे देश में ऐसे लोग हैं जो एक जोड़ी चप्पल के लिए तरस रहें हैं|

         इधर हम लोग दो-तीन घंटे बाद पुनः उसी रास्ते से वापस लौट रहे थे| लौटते हुए मैंने देखा वही बूढी औरत और साथ की वह बच्ची सड़क के किनारे के एक घनी छाया वाले पेड़ के नीचे बैठे सुस्ता रहे थे इस बीच ऐसे ही नंगे पावों से वे पाँच-छह किमी की दुरी तय कर लिए थे| मैं उन्हें सुस्ताते हुए देख रही थी और हमारी कार आगे निकल गयी थी...पता नहीं यह सब मेरे पति ने देखा था या नहीं!
   
        एक दिन हम अपने पति और छोटे पुत्र के साथ ऐसे ही बैठे गप्पें लड़ा रहे थे की मुझे यह घटना ध्यान में आई और इसका जिक्र मैंने अपने पति से किया, पति के मुँह से सहसा निकला, “अरे! हमको उसी समय बताती, मैं उनकी एक तस्वीर ले लेता..और..उन्हें फेसबुक पर पोस्ट कर देता..|” मुझे पति की ये बातें बहुत ही नागवार गुजरी लेकिन मेरे समझ में कुछ नहीं आया कि इस पर इन्हें मैं क्या कहूँ, लेकिन तभी मैंने अपने छोटे पुत्र को पति महोदय से कहते हुए सुना, “हुँह..हूँ..ऊँ..! आप फेसबुकिए जैसे लोगों को बस यही एक बीमारी है, किसी की पीड़ा भी आपके फेसबुकवाल पर फैशन-शो जैसा इश्तेमाल होता है..|” पुत्र ने अपने पिता को ऐसा जबाव दिया कि मैं मन ही मन प्रसन्न हो गई और उधर पति महोदय पुत्र को आँखें फाड़कर देखे जा रहे थे लेकिन उनके मुँह से कुछ भी नहीं निकल पाया|

                                         -प्रतिमा

मंगलवार, 30 जून 2015

ये बायोडाटा चाहने वाले लोग....

        उस दिन सुबह-सुबह दर्पण में चेहरा देखा तो सिर के बाल कुछ बढ़े देख मन ने नाई के यहाँ जाने का निर्णय ले लिया| लेकिन आज उसके सैलून पर भीड़ कुछ ज्यादा ही थी एक तो उसके सैलून की चारों कुर्सियां भरी थी दूसरे पाँच लोग अपनी बारी की प्रतीक्षा करते लाइन लगाए बैठे थे, अपनी बारी आने में बिलम्ब का अनुमान कर एक बार तो लौटने का मन किया..फिर आगे समय मिल पाए या न यह ध्यान आते ही मैं भी छठे नम्बर पर अपनी बारी की प्रतीक्षा में वहाँ बैठ गया...दायें-बाएं देखा तो सैलून का मालिक नहीं दिखा...कौन ग्राहक किस क्रम पर आया है इस बात का ध्यान वही रखता है...
        
         नज़रे घुमाई तो देखा एक कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के बालों की कटिंग के साथ उसकी ढाढ़ी भी बन चुकी थी..लेकिन वह चेहरे की फेसियल करा रहा था...मतलब...इस कुर्सीवाला व्यक्ति अभी पन्द्रह मिनट खायेगा...! पता नहीं फेसियल की इसे कौन सी आवश्यकता आन पड़ी कि व्यर्थ का समय नष्ट कर रहा है...यह सोचते हुए दूसरी कुर्सी पर निगाह पड़ी..इसकी तो अभी हेयर कटिंग चल रही है...अरे..! इसकी दाढ़ी भी तो बढ़ी है...मतलब आधे घंटे के लिए यह कुर्सी भी बुक..! तीसरी कुर्सीवाला मुँह टेढ़ा कर बार-बार शीशे की ओर निहार रहा था...सोचा इसकी कटिंग वगैरह तो हो चुकी है तो फिर यह क्यों मुँह चियार रहा है ? लेकिन अगले ही पल उसने नाई से कटिंग को ठीक करने के लिए कहा...यह कुर्सी मुश्किल से चार-पाँच मिनट में खाली हो जायेगी...चौथी कुर्सी पर एक बच्चा बाल कटवा रहा था...मैंने सोचा चलो इसके तो दाढ़ी है नहीं दस मिनट में यह कुर्सी खाली हो जायेगी...अभी यह सोच ही रहा था कि तीसरी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अपने सफ़ेद बालों पर हेयर-डाई लगवाना शुरू कर दिया..मतलब इस काम में यह दस मिनट खाएगा...लेकिन इस उम्र में इस पर सफ़ेद बाल ही अच्छे लगेंगे...खा-म-खा का बाल रंगने में समय बर्बाद किये दे रहा है...
         अभी मैं अपने इसी मुआयानें और विचारों में खोया ही था कि मेरा ध्यान अपनी बारी की प्रतीक्षा में सामने बैठे मोबाइल पर किसी से बात करते व्यक्ति की ओर उसकी यह बात सुनकर गया कि वह इस समय फला जगह पर है जबकि फला जगह यहाँ से तीन किमी की दूरी पर है...मुझे ध्यान आया कई बार ऐसे ही बॉस ने भी मेरे होने के स्थान के बारे में पूँछा तो मैं भी गाड़ी का इंजन बंद कर ऑफिस के रास्ते से ही उन्हें बताया कि कार्यालय में हूँ...यह ध्यान आते ही मैं मुस्कुरा पड़ा...
        
        ‘हाँ..हाँ..आप चाहे जब आ जाइए....अरे नहीं..हाँ लम्बाई कितनी है....नहीं...पहले लड़की की एजुकेशन...हाँ...हाँ..बायोडाटा भेज दीजिए...मेरे ईमेल पर..नोट करिए..फिर बैठ कर बाते होंगी....हाँ..हाँ..पूरा बायोडाटा...अरे बाकी बातें बाद में हो जायेंगी..’ शायद यह व्यक्ति लड़कावाला रहा होगा फोन पर ही वैवाहिक कार्यक्रम तय हो रहा था...इनका तो बाल और दाढ़ी दोनों बनेगा यह आधे घंटे का समय खायेगा...इसी तरह मैं वहाँ अपनी-अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे व्यक्तियों को देख सैलून में अपनी प्रतीक्षा-अवधि का मन ही मन आकलन करता रहा..अभी भी सामने बैठा व्यक्ति फोन पर बातें किये जा रहा था..उसकी वार्ता अभी तक ‘बायोडाटा’ पर ही जारी थी...हाँ अब उसके साथ ‘कुण्डली’ भी आकर जुड़ गई थी...
      
        मैं सोच रहा था यह ‘बायोडाटा’ क्या होता है...अकसर मैंने नौकरी वाले विज्ञापन में पढ़ा है.. “अपना बायोडाटा इस पते पर भेजें..” हो सकता हैं नौकरियों के लिए बायोडाटा अनिवार्य हो, परीक्षा प्रणाली का अंग हो..लेकिन..नौकरियों जैसा ही विवाह के लिए भी उसी तरह से बायोडाटा की माँग किया जाना मेरे समझ में नहीं आता...और वह भी बेचारी लड़कियों का विशेष रूप से उनके नख-शिख वर्णन के साथ...!

        अब-तक फेसियल वाले की कुर्सी खाली हो चुकी थी...हम प्रतीक्षारत में से एक की बारी आ गयी थी, वह उस खाली कुर्सी पर अपना आसन जमा चुका था...अब मेरा पाँचवा क्रम हो गया था...इधर मैं सोच रहा था...यह बायोडाटा भी गजब का होता है...किसी न्यायालय के निर्णय जैसा अंधे-कानून का सहारा लेते हुए सा...! बस साक्ष्य चाहिए और इन्हीं साक्ष्यों पर आधारित होता है निर्णय...! वास्तविकता की आँखों में आँसू हो तो हो, हाँ...ऐसा ही होता है यह बायोडाटा, जो किसी के अंतर्मन में नहीं झाँक पाता उस पर कोई निर्णय नहीं सुना पाता..!! केवल इस बायोडाटा मात्र से किसी व्यक्ति का मूल्याँकन कैसे किया जा सकता है..? लम्बाई..चौड़ाई..ऊँचाई..डिग्री और परिवार क्या केवल इतने भर से किसी व्यक्ति पर कोई निर्णय सुनाया जा सकता है..? अगर ऐसा है तो यह व्यक्ति की उपेक्षा ही है जो उसके अंतर्मन की गरिमा को उपेक्षित करता है...फिर तो बायोडाटा पर विश्वास करने वाले क्रूर होने के साथ ही अज्ञानी भी होते होंगे...!
          
        ‘देखो न वह बायोडाटा माँग रहा था बेचारी बच्ची का...! अरे तुम बच्ची को सामने देख ही रहे हो...उससे बातें भी कर रहे हो...शिक्षा-दीक्षा का अंदाज तो हो ही जाना चाहिए..इसके बाद भी कैसा बायोडाटा...? यहीं नहीं उसने बच्ची को खड़ा कर उसकी लम्बाई भी माप रहा था...भूल गया कि उसकी भी बेटियाँ है...अपना नहीं देखता कि कोई उसका ऐसे ही बायोडाटा लेने लगे वह कहाँ ठहरेगा...! अरे बच्चियों की भावनाओं-संस्कारों की पहचान और इनका कद्र तो करना सीखो...क्या बच्चियाँ कोई सामान हैं कि...लड़के वाले हैं तो इतने अहंकारी हो जाएँ..?’ हाँ इन बातों को बताते हुए श्रीमती जी उस दिन बहुत गुस्से में थी...
        
         इन्हीं बातों में खोया था..तीसरी कुर्सी खाली हो चुकी थी मैंने देखा उस पर बैठे महाशय तो अपने सिर के बालों के साथ ही मूँछे भी रंगवा चुके थे...! उन्हें देख पता नहीं मैं क्यों मुस्कुरा उठा..! वैसे आजकल मैं भी अपने सिर के बालों पर रंग चढ़ाने लगा हूँ...अब मेरा क्रमांक चौथा हो चुका था...बायोडाटा वाले महाशय कोई नम्बर मिला रहे थे...हाँ ध्यान आ गया...बायोडाटा...!!
        
        उन दिनों सोलह-सत्रह वर्ष की आयु रही होगी, मेरी शादी तय हो चुकी थी...मेरे दादा जी की विशेष इच्छा थी इसके पीछे...! एक दिन उनके तकिये के नीचे मुझे एक अंतर्देशीय-पत्र मिला, उत्सुकता वश उसे मैं पढ़ने लगा था...अरे यह क्या..! इस पत्र में उस लड़की के बारे में लिखा था जिससे मेरा विवाह होने वाला था.. “हाँ माथे पर गड्ढे जैसा निशान है...” तथा पहनावे आदि का वर्णन करते हुए अंत में लिखा था.. “शादी न हो तो अच्छा है...” उस पत्र को पढ़ने के बाद उसे वैसे ही मोड़कर तकिए के नीचे रख दिया था...लेकिन दादा जी का निर्णय अडिग रहा था...पत्र में वर्णित भावी पत्नी की छवि मन में लिए उन्हें देखने की इच्छा अवश्य उठी लेकिन तब की पारिवारिक परम्पराओं के अनुसार मेरे लिए यह संभव नहीं था...श्रीमती जी के ही शब्दों में ‘गुड्डे-गुड़ियों जैसा हमारा विवाह’ हो गया था...हाँ वह भी कहती हैं कि मैं भी उस समय चौदह वर्ष की थी...! उन्हें देखने की इच्छा मन में ही दबाये धीरे-धीरे पांच वर्ष व्यतीत हो गया..फिर हमारा गौना हुआ...उस पत्र में वर्णित बायोडाटा से बहुत कोशिश करने के बाद भी मैं उनकी कोई समानता स्थापित नहीं कर पाया था...|

          बहुत दिनों बाद...! एक दिन अपनी कोशिशों से थक-हार कर  मैंने श्रीमती जी से पूँछा, “पहले तुम्हारे माथे पर कोई गड्ढा था क्या..?” उनका उत्तर था, “नहीं तो..मुझे याद नहीं...लेकिन हाँ...बचपन में...शायद तब मैं बहुत छोटी थी तो माथे पर चोट लगी थी..लेकिन ऐसे किसी निशान का मुझे पता नहीं” एक निर्दोष मासूम सा उत्तर मेरे सामने था...उस समय उस पत्र की बात मैंने श्रीमती जी से छिपा लिया था..

        ‘बायोडाटा’ शब्द के कारण ही इन स्मृतियों में मैं खो गया था...क्योंकि किसी ‘बायोडाटा’ में आत्मा, मन और शरीर नहीं होता...तो फिर इस ‘बायोडाटा’ पर इतना महत्त्व क्यों..? यह निर्जीव सा बायोडाटा किसी के मन और आत्मा का दर्पण नहीं बन सकता...और शरीर भी तो कोई बस्तु नहीं है...एक निर्दोष मासूम सी भावनाओं को बायोडाटा तले नहीं रौंदा जाना चाहिए...    

         मैंने देखा वो ‘बायोडाटा वाले महाशय’ सैलून वाली कुर्सी पर विराज चुके थे...नाई उनका हजामत बना रहा था..यकायक वो पुनः अपने मोबाइल पर बातें करने लगे थे...नाई हजामत बनाना छोड़ दूर खड़ा हो उनकी फोन पर चल रही वार्ता के समाप्त होने का इंतजार करने लगा...लेकिन मोबाइल पर चल रही उनकी यह वार्ता समाप्त ही नहीं हो रही थी..! मुझे लगा जैसे वो बायोडाटा के एक-एक बिंदु पर चर्चा कर रहे हों...इस तरह कई मिनट बीत गया...नाई समेत प्रतीक्षारत लोगों को अब यह नागवार लगने लगा था...अंत में मुझसे नहीं रहा गया...मैं उस नाई से बोल उठा, “इन्हें तो जैसे किसी अन्य व्यक्ति की परवाह ही नहीं...इन्हें इसका एहसास कराओ..” शायद यह कहते हुए उनने मुझे सुन लिया..फिर अपनी खींसे निपोरते हुए मोबाइल पर बात करना बंद कर दिए..
       
          अंत में मेरी भी बारी आ गयी..मैं कुर्सी पर बैठ चुका था...मेरा वाला नाई कटिंग के लिए तैयार हो रहा था...इसी बीच मेरे बगल की कुर्सी पर हेयर-कटिंग करा रहा व्यक्ति अपने नाई से पूँछा, “क्यों तुम्हारा मालिक कहाँ गया..?” “अरे..वह तो जेल में हैं...” मैं भी सोच रहा था कि आज इस सैलून का मालिक नहीं दिखा..! अब-तक बायोडाटा वाले महोदय भी जा चुके थे...

          हाँ...वास्तव में सैलून वाली बात मैं भूल सा गया था...लेकिन उस दिन श्रीमती जी ने फोन पर मुझसे पूँछा, ‘अरे आज आप को कुछ याद है कि कौन सी तारीख है..?” मैंने थोडा सा मस्तिष्क को टटोला और झट से बोल उठा, ‘हाँ..हाँ..याद है...!” फिर उन्होंने बताया “हमारे विवाह को आज इत्ते साल हो गए...लेकिन आप को तो जैसे कुछ याद ही नहीं रहता एक फोन तक नहीं किया..?” मैं मारे डर के कोई सफाई नहीं दे पाया क्योंकि मेरे किसी उत्तर पर ‘नोक-झोंक’ तय था...हाँ..इस विवाह तिथि के याद आते ही हमें वह पत्र भी याद आ जाता है...और श्रीमती जी के कथनानुसार अपना वह ‘गुड्डे-गुडियों जैसा विवाह’ भी...! आज मैं सोचता हूँ..दादा जी के तकिए के नीचे का वह पत्र भी मेरे लिए किसी लड़की के बायोडाटा जैसा ही था...लेकिन हम भी उस समय मासूम से ही थे...उस समय के हमारे निर्दोष मासूमपने के सामने इस बायोडाटा रूपी पत्र की कोई अहमियत नहीं थी...
     
        आज..हमारी उस विवाह-तिथि के बत्तीस वर्ष हो चुके हैं और श्रीमती जी के साथ साढ़े सत्ताइस वर्ष का समय गुजर चुका है...! लेकिन हमारे रिश्ते की सहजता ऐसी रही कि लगता है जैसे अभी कल की ही बातें हैं..! हाँ...हमें कभी इसे जताना नहीं आया, बस हम इसे जीते चले जा रहे हैं क्योंकि जिंदगी को तो जिया जाता है...इसीलिए फोन-फान, दिन, तिथि सब भूल जाते हैं...याद रहता है तो बस केवल जीना...!

        एक बात है ये ‘बायोडाटा’ होते हैं बड़े झूठे...!! यदि इन पर आप विश्वास करते हो तो एक खूबसूरत जिंदगी से हाथ धोते हो...श्रीमती जी द्वारा विवाह तिथि के याद दिलाने से उस झूठे बायोडाटा की याद आ गयी..और फिर सैलून पर के वे ‘बायोडाटा वाले महोदय’ जैसे लोग याद आए, जो दूसरों की परवाह करना जानते ही नहीं...!
     
         अंत में मैंने एक गलती कर ही दिया हमारे बीच ‘नोक-झोंक’ होना तय..! क्योंकि विवाह तिथि जो मुझे याद नहीं रहती..!!

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शुक्रवार, 5 जून 2015

इस धरती की खूबसूरती के राज....

        उस दिन इलाहाबाद से महोबा स्वयं ड्राइव करते हुए कार से जाने का मन कर गया...साथ में श्रीमती जी और छोटे पुत्र श्रेयांश भी थे...एक बात है ड्राइविंग भी एक प्रकार का नशा है...ध्यानावस्था है..जब आप ड्राइविंग करते हैं तब आपको अपनी सारी समस्याओं को भूलना होता है..और केवल ड्राइविंग पर ही अपनी चेतना को केन्द्रित करना होता है...यह स्थिति भी एक प्रकार से आनंदानुभूति की होती है..योग की ध्यानाक्रिया से कुछ मिलती-जुलती...! इस स्थिति में आप तमाम तरह के मनोविकार उत्पन्न करने वाले चिंतन से मुक्त होते हैं...यही आनंदानुभूति की अवस्था होती है...इस आनंदानुभूति के साथ ड्राइविंग का रोमांच भी अलग से जुड़ जाता है....
         
           हाँ तो अलसुबह ही हम इलाहाबाद से निकल पड़े थे..यमुना पर नया बना झूले सा ब्रिज आकर्षित कर रहा था...श्रेयांश चलती कार से ही इसकी वीडियो रिकार्डिंग करने लगे थे...पुल पार कर हम टोल टैक्स दे आगे बढ़ चले...एक पेट्रोलपम्प पर मैंने तेल लेने के लिए अपनी कार रोकी..मुझे अनुभव हुआ कि पेट्रोलपंप-कर्मी अलसाए हुए से थे...एक कर्मी धीरे-धीरे कर मेरे कार के पास तक आया..शायद यह सोचते हुए ‘इतने सबेरे-सबेरे यह तेल लेने कहा से टपक पड़ा..’ मुझसे पूँछा, ‘कितने का..’ मैंने एक हजार का इशारा किया...उसने मशीन में फीड किया और मुझे इसे दिखाते हुए तेल की पाइप कार की टंकी में लगा कर आराम से चलते हुए वहीँ टंकी के चबूतरे पर बैठा गया..मैंने पेट्रोलपंप के प्वाइंट को देखना शुरू किया..अरे इतना स्लो प्वाइंट चल रहा है...! ऐसे में एक हजार का तेल पूरा होते-होते मिनटों लग जायेंगे..मैंने देखा वह पम्प-कर्मी चबूतरे पर आराम से बैठा ऊँघ सा रहा था..श्रेयांश मेरी ओर देखते हुए इस स्थिति को समझ मुस्कुरा दिए...खैर..जैसे-तैसे कर तेल पूरा हुआ अब हम आगे बढ़ चले...
        
           इस समय हम इलाहबाद से बाँदा मार्ग पर चल रहे थे..धीरे-धीरे पथरीला और पहाड़ी क्षेत्र आरम्भ हो चुका था...इस क्षेत्र को श्रीमती जी और उनके सुपुत्र महोदय बड़ी उत्सुकता से देखे जा रहे थे...बारा में एक बिजली घर बनता हुआ दिखाई दिया..श्रीमती जी ने इसे देखते हुए कहा, ‘इस तरह के उद्योग या प्लांट ऐसे ही स्थानों पर स्थापित किए जाने चाहिए..’ उनका कहने का आशय यही था कि उद्योगों कारखानों आदि के प्लांट इसी तरह के अनुपजाऊ और बेकार पड़ी हुई भूमि पर ही स्थापित किये जाने चाहिए जिससे कृषि योग्य भूमि के सुरक्षित रहने के साथ ही इस तरह के पिछड़े क्षेत्रों का भी विकास हो सके...इधर मैं कार ड्राइव किये जा रहा था एक ऊँचे पहाड़ को देखते हुए श्रेयांश जी इसके बनावट और उत्पत्ति के सम्बन्ध में मुझसे तर्क करने लगे थे..खैर एक पहाड़ और जंगल को देखते हुए माँ-बेटे ने कहा धरती बहुत खुबसूरत है...आगे एक पहाड़ की ऊँचाई नापते हुए उस पर चढ़ने की इच्छा जताने लगे लेकिन मैं समय की दुहाई देते हुए कार आगे बढ़ाता जा रहा था...अचानक दूर से सड़क के किनारे हमें कुछ बन्दर दिखाई पड़े और हम लोगों की निगाह बन्दर के एक बच्चे पर पड़ी जो सड़क पर ही उछल-कूद कर रहा था...तभी हमने देखा एक बन्दर जो उसकी माँ रही होगी शायद उसने हमारी कार को सड़क पर खेलते अपने बच्चे की ओर आते हुए देखा..वह काफी तेजी से सड़क पर आई और अपने उस बच्चे को लगभग इन्सानों की तरह गोंदी में उठाकर तेजी से सड़क के किनारे पटरी पर चली गयी और गुजरती हमारी कार को सड़क की पटरी से देखने लगी थी...इस दृश्य को देखकर हम आपस में हँस पड़े थे और हँसते हुए ही मैंने श्रेयांश से कहा इतनी तत्परता तो तुम्हारी मम्मी भी नहीं दिखा पाएंगी जितनी इस बंदरिया ने अपने बच्चे के प्रति मेरी कार से उसे बचाने के लिए दिखाई है...मेरी इस बात को सुन श्रीमती जी कुछ नाराज सी हो गयीं और सुपुत्र महोदय मुस्कुराने लगे थे...वास्तव में प्रेम या अपने बच्चों की चिंता करना तथा उनके प्रति केयरफुल होना केवल इंसानों की ही बपौती नहीं है...प्रकृति का यह एक सहज गुण है जो सभी जीवों के लिए कुछ अपवादों को छोड़कर समानधर्मा है..और..इस खूबसूरत धरती का राज भी यही है...!!
         
          मैं आराम से ड्राइविंग किए जा रहा था..अब हम एक ऐसे क्षेत्र से गुजर रहे थे जहाँ दूर-दूर तक मैदान ही दिखाई पड़ रहा था...वहाँ किसानों के खेत भी थे...लेकिन लगभग असिंचित सा क्षेत्र था वह..! किसान वहाँ एक या मुश्किल से दो ही फसल ले पाते होंगे...बीच-बीच में बबूल के पेड़ दिखाई दे जाते थे...सड़क के किनारे एक ऐसे ही पेड़ को देख मैंने उसकी छाया में कार रोक दी हमने वहाँ पर साथ लाए पानी को पिया तथा मुँह पर उसके कुछ छींटे भी मारे...वहाँ मैंने देखा पाइप के ढेर पड़े हुए थे...और मशीन से पाइप बिछाने का कार्य भी चल रहा था, मुझे एक व्यक्ति दिखाई दिया शायद वह ठेकेदार रहा होगा...मैं यूँ ही उसके पास चला गया...पूँछने पर उसने बताया कि रिलायंस कंपनी टू-जी, थ्री-जी केबल हेतु पाईप बिछाने का कार्य कर रही है जो अभी कुछ ही महीनों पहले शुरू हुआ है...मैं दूर-दूर तक फैले असिंचित खेतों और उन गरीब किसानों जो बिना सिंचाई साधनों के मात्र वर्षा जल की आस लगाये खेती पर निर्भर होते हैं तथा गरीबी का दंश झेलते रहते है, को देखते हुए चल रही इस परियोजना का विरोध करने का मन कर गया लेकिन मन-मसोस कर रह गया और इस बात का जिक्र कार चलाते हुए पत्नी से किया, उन्होंने कहा, ‘अरे, अब तो गरीब से गरीब मजदूरों के हाथ में भी तो मोबाइल होता है...! उनके भी तो काम आएगा यह सब..’ फिर उन्होंने कहा, ‘हाँ यह जरुर होना चाहिए कि सरकारों को पहले इन सूखे खेतों तक पानी पहुँचाने का कार्य करना चाहिए उसके बाद टू-जी, थ्री-जी...!’
         
           हाँ, होना तो यही चाहिए कि सरकारों को सबसे पहले कृषि प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए सिंचाई साधनों का विकास करते हुए कम से कम पानी खर्च कर अधिक से अधिक फसलों के उत्पादन के लिए योजनाएँ बनानी चाहिए कि सूखे के दिनों में किसानों को आसमान की ओर टकटकी न लगाना पड़े...आखिर नदियों का पानी भी तो समुद्र में बह जाता है..क्या पाइप-लाइन बिछाकर पानी को इन खेतों तक नहीं लाया जा सकता....? मैं इन्हीं विचारों में खोया था कि मेरी कार हिचकोले लेने लगी..बात यह था कि सड़क पर कमजोर पुल की जगह मजबूत नया पुल बनाया जा रहा था..और..मैं उसके लिए बने डायवर्जन से गुजर रहा था..खैर अब तक बन रहे ऐसे तीन-चार पुलों को मैं पार कर चुका था..श्रीमती जी अचानक बोल उठी, ‘एक बात है..सरकारें विकास कार्य तो करा ही रही हैं..’ मैंने भी सहमति में सिर हिलाया और धूल उड़ाती हुई सामने से आ रही गाड़ियों को देखने लगा...हाँ..आगे सड़क निर्माण का कार्य भी चल रहा था...
       
          इस मार्ग से मैं पहली बार यात्रा कर रहा था...मैं अब कर्वी क्षेत्र में प्रवेश कर रहा था..पत्नी ने ऊँचे पहाड़ों को देखते हुए कहा कि ‘यहीं कहीं चित्रकूट भी तो है..?’ मैंने कहा, ‘हाँ है तो...’ ‘तो चलिए घूम लिया जाए..’ श्रीमती जी की इस इच्छा को मैंने भी स्वीकार कर लिया क्योंकि इधर श्रेयांश की भी इन सब चीजों को देखने की ललक बढ़ गई थी...तभी सड़क के बगल की एक ऊँची पहाड़ी पर मंदिर दिखाई दिया ...तथा नीचे से ऊँचाई पर स्थित उस मंदिर तक सीढ़ियाँ जाती हुई दिखी..श्रीमती जी ने वहाँ रुकने के लिए कहा...मैंने कार रोक दी... हम लोग कार से उतर कर उस पहाड़ी और उसके ऊपर स्थित मंदिर तक जाती सीढियों का मुआयना सा करने लगे...पत्नी ने किसी से पूँछ कर मुझे बताया कि ऊपर देवी जी का मंदिर है...उनहोंने इसकी तुलना मैहर से करनी शुरू कर दी, ‘अरे ऐसे ही तो मैहर माता जी का मंदिर है...वहाँ भी तो सीढियों से चढ़ना पड़ता है...मैं तो सीढियों से ही वहाँ चढ़ी थी..कुछ महिलायें तो गश खा गयी थीं..’ बात यह थी कि एक बार इन्होंने मुझसे मैहर देवी जी के दर्शन करने के लिए चलने को कहा था...लेकिन मैं अपनी व्यस्तताओं का हवाला दे मना कर दिया था फिर ये अपने बड़े पुत्र तथा परिवार के अन्य लोगों के साथ वहां हो आई थीं...मैंने उन्हें पुत्र से कहते हुए सुना, ‘चलो इन सीढ़ियों से चल मंदिर में दर्शन कर आयें..’ पुत्र महोदय ने लगभग उन्हें डाट लगाते हुए कहा, ‘अभी वहीँ ऊपर गश खाकर गिर पड़ोगी तो लेने के देने पड़ जाएँगे..’ मैंने लगभग मध्यस्थता के अंदाज में कहा, ‘चलो चित्रकूट घूम लेते है...’ फिर हम आगे बढ़ चले...
         
          अब हम चित्रकूट क्षेत्र में थे..हमारे पास समय की कमी थी अतः हमने तीन स्थानों पर जाना तय किया...हमने स्फटिक शिला देखा...हमें सबसे अधिक प्रभावित वहाँ के प्राकृतिक वातावरण के साथ ही स्फटिक शिला ने किया क्योंकि यह पत्थर वहाँ के अन्य पत्थरों से भिन्न था...इसके बाद हम अनुसूया मंदिर गए यह पूरा क्षेत्र इस भीषण गर्मी में भी अपनी हरियाली संजोये हुए था..कार पार्क करने के बाद अनुसूया मंदिर जाने वाले मन्दाकिनी नदी के किनारे वाले मार्ग पर कुछ दुकाने लगी हुई थी जो पूजन सामग्री और जलपान की थी...नदी का दूसरा किनारा प्राकृतिक रमणीक दृश्य प्रस्तुत कर रहा था...इस प्राकृतिक दृश्य के बीच मुझे एक बात खल रही थी वह थी दुकाने..! मेरे समझ से यहाँ पर किसी अन्य गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए क्योंकि इससे नदी के प्रदूषित होने के साथ ही क्षेत्र की सुरम्यता बाधित हो सकती है..
        
          मेरी जिज्ञासा अनुसूया मंदिर को देखने की थी...हम लोग मंदिर में प्रवेश किए...देखा दो पुजारी आसन लगाए हुए बैठे थे उनके सामने एक चादर बिछी हुयी थी जिस पर कुछ नोट और सिक्के बिखरे हुए थे...मैंने सोचा शायद श्रद्धालुओं ने उसपर चढ़ाए होंगे...हाँ हमे वहाँ से आगे मंदिर में जाने का रास्ता नहीं दिखाई पड़ा तो मैंने पुजारी से अन्दर जाने का रास्ता पूँछा...उसने चढ़ावे की ओर इशारा किया उसके अभिप्राय को समझते हुए भी मैंने कोई चढ़ावा नहीं दिया और दूसरी ओर मुड़ गया वहाँ भी पुजारी बैठे हुए थे लेकिन उनने बताया कि यह लौटने का मार्ग है...और फिर उसी ओर इशारा किया..मैं पुनः उन्ही पुजारियों के पास लौटा और रास्ते के बारे में पूँछा लेकिन उसने कहा, ‘जाइए-जाइए उन्हीं से पता करें..’ मैं बात को समझते हुए दश का नोट उस चादर पर रख दिया तुरंत पुजारी नें हाथ के इशारे से रास्ता दिखा दिया..मैंने श्रीमती जी से कहा, ‘यह इसीलिए रास्ता नहीं बता रहा थ..’ खैर हमने पूरा मंदिर घूमा उस मंदिर ने हमें प्रभावित नहीं किया शायद मुझमें श्रद्धा की कमी रही हो हाँ वहाँ एक बात हमने अवश्य देखी...उस मन्दिर में कई स्थानों पर गुरुओं और भिन्न-भिन्न देवताओं की मूर्तिया स्थापित थीं और सबके सामने पुजारी चादर फैलाए बैठे थे..और सभी चादर की ओर इशारा करते थे...मंदिर से बाहर आते ही मैंने श्रीमती जी से कहा, ‘इसीलिए मैं मंदिर जाना पसंद नहीं करता..’ श्रीमती जी ने कहा, ‘ये कर्म से भागे हुए लोग हैं ये दूसरों को क्या आशीर्वाद देंगे..?’ इसके बाद हम गुप्त गोदावरी गए वहाँ की गुफाएँ प्रभावशाली और देखने लायक थीं..सुपुत्र जी ने उन गुफाओं को देख उनकी निर्माण प्रक्रिया के बारे में हमें समझाने लगे, ‘यहाँ सैंड स्टोन रहा होगा जो धीरे-धीरे पानी की बूंदों के साथ बहता गया होगा और इन गुफाओं का निर्माण हुआ होगा..’ हाँ...उन गुफाओं में घुटनों तक ठंडा पानी भरा हुआ था...इन स्थानों का भ्रमण हम लोगों के लिए काफी आनंददायक रहा...
       
         अब हम बाँदा होते हुए महोबा की ओर चल पड़े...महोबा क्षेत्र में प्रवेश करते ही हमें पथरीले पहाड़ और क्रेशर दिखाई पड़ने लगे थे...यहाँ पर पहाड़ों को ब्लास्टिंग से तोड़कर ग्रेनाईट चट्टानों का कारोबार किया जाता है, मैंने श्रीमती जी को बताया कि यह कबरई है.. ‘अरे कबरई की गिट्टी तो मशहूर हैं..’ मैंने कहा, ‘आपको कैसे पता..?’ ‘अरे घर पर छत डालने के लिए जो गिट्टी आई थी ठेकेदार उसे कबरई की ही बता रहा था...’ श्रीमती जी की इस जानकारी से मैं अभी तक अनभिज्ञ ही था...इसके आगे मैंने उन्हें अपनी जानकारी दी कि ऐसे ही यहाँ के कई पहाड़ अपने अस्तित्व को खो दिए हैं उन्हें तोड़कर बेंच दिया गया है, यही नहीं सैकड़ों फीट नीचे जमीन को खोद कर पत्थर निकाल लिए गए है..इसपर पत्नी ने मुझसे पूँछा, ‘सरकार रोकती नहीं...’ मैंने कहा, ‘सरकार क्यों रोकेगी वह टैक्स लेती है...’ फिर श्रीमती जी ने कहा, ‘यहाँ तो चारों और धूल ही धूल उड़ रही है..’ ‘यह यहाँ चल रहे क्रेशरों के कारण है...इससे स्वांस की बीमारियाँ भी हो सकती है...यही नहीं यहाँ के लोग बताते हैं कि जहाँ क्रेशर चल रहे होते हैं उसके आस-पास की कई बीघे की जमीन इस धूल जमाव के कारण अनुपजाऊ हो जाती है..जिस किसान ने क्रेशर के लिए जमीन दी होती है वह तो किराया पाता है लेकिन क्रेशर के आस-पास की भूमि के किसान अपनी भूमि से फसल भी नहीं ले पाते उनका तो नुक्सान ही होता है लेकिन उनका सुनने वाला कोई नहीं है..’ श्रीमती जी इन बातों को सुन दुखी सी हो गईं, उनकी इस भाव-भंगिमा को देखकर मैंने कहा, ‘कम से कम हमें दुखी होने का अधिकार तो नहीं ही है..’ आश्चर्य से मेरी ओर देखते हुए उन्होंने पूँछा, ‘क्यों...’ मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ‘अरे भाई..हमारे घर की छत भी तो कबरई की गिट्टी से ही तो बनी है...’ इसे सुन वह कुछ नहीं बोली..
         
          ‘आखिर इन पहाड़ों को कैसे बचाया जा सकता है...?’ श्रीमती जी के इस प्रश्न को सुन मैं कुछ क्षण मौन रहा..अचानक उनके इस प्रश्न को अनसुनी करते हुए से मैंने कहा, ‘वह देखो दूर वह जो पहाड़ पर गोलाई में भवन दिखाई दे रहा है वही विकास भवन है...’ ‘पहले मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए कि इन पहाड़ों को ख़तम होने से कैसे बचाया जाए..?’ मैंने उनकी ओर देखते हुए कहा, ‘इनके ऊपर मन्दिर या मस्जिद बना दिए जाए..!’ ‘अरे इससे कैसे ये बच जायेंगे...’ इस प्रश्न पर मैंने कहा, ‘यहाँ के लोग बताते हैं कि जिन पहाड़ों पर मंदिर होते हैं उनका खनन पट्टा नहीं दिया जाता और वे ब्लास्टिंग से बच जाते हैं...’ अचानक उन्होंने इन पहाड़ों की और देखते हुए कहा, ‘अरे कितना तोड़ेंगे...बहुत पहाड़ हैं...!’ लेकिन इंसान की भूँख को सोच मेरी रूह काँप गई..पहाड़ भी इसके सामने मुझे बहुत छोटे नजर आने लगे थे...!

       मैंने कहा ‘ये पहाड़ ज्वालामुखी से बने हैं...एक पहाड़ की चट्टानों की ओर इंगित करते हुए मैंने उन्हें दिखाया कि देखो इसकी चट्टानें पिघलती हुई सी परत दर परत बहती हुई सी हैं...’ उन्होंने कहा, ‘हाँ यह हिमालय से पुराने पहाड़ हैं..’ मैं उनके इस ज्ञान की प्रशंसा करते हुए सोचने लगा..

        “जब धरती बनी होगी तब न इसपर जीवन रहा होगा और न ये पहाड़ रहे होंगे.. तब यह गर्म धरती इन तमाम ज्वालामुखियों के साथ उबल सी रही होगी...फिर धीरे-धीरे इनसे ये पहाड़ बने होंगे यह धरती ठंडी होती गयी होगी..पेड़ पौधे उगे होंगे और फिर हमारे रहने लायक पर्यावरण बना होगा...लेकिन इन पहाड़ों को तोड़ते हुए हम जहाँ से आए हैं क्या हम फिर वहीँ वापस जाने का मार्ग तो नहीं बना रहे..?” क्योंकि इन पहाड़ों से ही तो हमारा अस्तित्व बना होगा..हवा-पानी की इस धरती पर स्थिरता का कारण धरती की यदि इसी बनावट पर निर्भर होता होगा तो फिर इन्हें नष्ट कर हम जल और प्राण-वायु को भी धीरे-धीरे अंतरिक्ष में विलीन कर देंगे और यह धरती तपती हुयी सांय-सांय करती वियावान निर्जन गोले में बदल जायेगी...फिर हम कहाँ होंगे...!!” यही सोचते-सोचते हम अपने गंतव्य तक पहुँच गए थे....


          आज पाँच जून है...विश्व पर्यवरण दिवस....! संयोग से यह वृत्तांत आज ही आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.....